IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 30 जनवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय, “आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना“, भारत में आदिवासी समुदायों पर औपनिवेशिक शासन के प्रभाव और बिरसा मुंडा जैसे व्यक्तियों के नेतृत्व में हुए बाद के प्रतिरोध पर केंद्रित है।

ब्रिटिश शासन के पूर्ण प्रभाव से पहले, आदिवासी समूह विभिन्न प्रकार की जीवन पद्धतियों का पालन करते थे:

  • झूम खेती (Jhum Cultivation): इसे ‘घुमंतू खेती’ भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से पूर्वोत्तर और मध्य भारत के जंगलों में जमीन के छोटे टुकड़ों पर की जाती थी। इसमें पेड़ों के ऊपरी हिस्सों को काट दिया जाता था ताकि धूप जमीन तक पहुँच सके और घास-फूस को जलाकर उसकी राख (जिसमें पोटाश होता था) को मिट्टी में मिला दिया जाता था।
  • शिकारी और संग्राहक: उड़ीसा के ‘खोंड’ जैसे समूह जंगलों से फल, जड़ें और औषधीय जड़ी-बूटियाँ इकट्ठा करके अपना जीवन बिताते थे। वे खाना पकाने के लिए साल और महुआ के बीजों के तेल का इस्तेमाल करते थे। जब जंगलों में पैदावार कम हो जाती थी, तो वे मज़दूरी के लिए गाँवों की ओर जाते थे।
  • पशुपालक: कई जनजातियाँ चरवाहे थीं जो मौसम के अनुसार अपने जानवरों (गाय-बैल या भेड़-बकरी) के झुंड के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे। जैसे—पंजाब की पहाड़ियों के ‘वन गुज्जर’, आंध्र प्रदेश के ‘लबाडी’, कुल्लू के ‘गद्दी’ और कश्मीर के ‘बकरवाल’
  • एक जगह टिककर खेती करने वाले: मुंडा, गोंड और संथाल जैसे कई समूहों ने 19वीं सदी से पहले ही एक स्थान पर बसकर खेती करना और हल का उपयोग करना शुरू कर दिया था। वे धीरे-धीरे अपनी ज़मीन के मालिक बनते जा रहे थे।

ब्रिटिश प्रशासन ने आदिवासियों के जीवन में विनाशकारी बदलाव लाए:

  • मुखियाओं की शक्ति का ह्रास: अंग्रेजों के आने से पहले जनजातीय मुखियाओं का अपने क्षेत्र पर आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण होता था। ब्रिटिश शासन के तहत, उनकी शक्तियाँ छीन ली गईं और उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बनाए गए कानूनों को मानने के लिए मजबूर किया गया। वे अब केवल नाममात्र के मुखिया रह गए थे।
  • घुमंतू खेती करने वालों की समस्या: अंग्रेज चाहते थे कि आदिवासी एक जगह बसकर स्थायी किसान बनें ताकि राज्य को नियमित राजस्व (Tax) मिल सके। लेकिन पानी की कमी और सूखी मिट्टी वाले क्षेत्रों में बसकर खेती करना मुश्किल था, इसलिए पूर्वोत्तर के झूम काश्तकारों ने इसका कड़ा विरोध किया।
  • वन कानून और उनके प्रभाव: अंग्रेजों ने जंगलों को ‘राज्य की संपत्ति’ घोषित कर दिया। कुछ जंगलों को ‘आरक्षित वन’ घोषित किया गया जहाँ आदिवासियों को रहने, शिकार करने या फल इकट्ठा करने की अनुमति नहीं थी। इससे वन विभाग के सामने मजदूरों की कमी की समस्या पैदा हुई, जिसे हल करने के लिए उन्होंने ‘वन ग्राम’ बसाए।
  • व्यापारी और साहूकार: आदिवासी अपनी जरूरतों का सामान खरीदने के लिए व्यापारियों और साहूकारों पर निर्भर थे। साहूकार उन्हें बहुत ऊँची ब्याज दरों पर कर्ज देते थे, जिससे आदिवासी कर्ज के जाल और गरीबी के दुष्चक्र में फंस गए। आदिवासियों ने इन बाहरी लोगों (दिकुओं) को अपनी दुर्दशा का मुख्य कारण माना।

दमनकारी कानूनों और शोषण के खिलाफ उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में आदिवासियों ने विद्रोह किए:

  • कोल विद्रोह: 1831-32 में।
  • संथाल विद्रोह: 1855 में।
  • बस्तर विद्रोह: 1910 में (मध्य भारत)।
  • वर्ली विद्रोह: 1940 में (महाराष्ट्र)।

बिरसा मुंडा ने 1890 के दशक के अंत में छोटानागपुर क्षेत्र (झारखंड) में एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया।

  • स्वर्ण युग की कल्पना: बिरसा ने अपने अनुयायियों से अपने गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त करने का आह्वान किया। उन्होंने एक ऐसे ‘स्वर्ण युग’ (सत्युग) की बात की जब मुंडा लोग एक अच्छा जीवन जीते थे, तटबंध बनाते थे, कुदरती झरनों का नियंत्रण करते थे और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहते थे।
  • ‘दिकुओं’ के खिलाफ संघर्ष: बिरसा ने ‘दिकु’ (बाहरी लोग जैसे—मिशनरी, साहूकार, हिंदू जमींदार और अंग्रेज अधिकारी) को अपनी गरीबी और गुलामी का कारण बताया। उनका मानना था कि ये लोग आदिवासियों की पारंपरिक जीवन शैली को नष्ट कर रहे हैं।
  • राजनीतिक लक्ष्य: इस आंदोलन का उद्देश्य मिशनरियों, साहूकारों और सरकार को बाहर निकालकर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में ‘मुंडा राज’ स्थापित करना था।
  • परिणाम: 1895 में बिरसा को गिरफ्तार किया गया और 1897 में रिहा होने के बाद उन्होंने फिर से समर्थन जुटाना शुरू किया। 1900 में हैजा (Cholera) से उनकी मृत्यु हो गई और आंदोलन धीमा पड़ गया। हालाँकि, इस आंदोलन ने औपनिवेशिक सरकार को दो महत्वपूर्ण काम करने के लिए मजबूर किया:
    1. ऐसे कानून बनाए गए जिससे ‘दिकु’ लोग आदिवासियों की ज़मीन आसानी से न छीन सकें (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम)।
    2. इसने साबित कर दिया कि आदिवासी अन्याय के खिलाफ खड़े होने और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अपना गुस्सा व्यक्त करने में सक्षम हैं।
  1. दिकु (Diku): आदिवासियों द्वारा बाहरी लोगों (जैसे साहूकार, जमींदार) के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द।
  2. उलगुलान (Ulgulan): बिरसा मुंडा के आंदोलन को दिया गया नाम, जिसका अर्थ है ‘महान हलचल’।
  3. बेगार: बिना किसी भुगतान के काम करवाना।
  4. प्रति (Fallow): कुछ समय के लिए बिना खेती के छोड़ी गई ज़मीन ताकि उसकी उर्वरता वापस आ सके।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 4

आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना

पारंपरिक आजीविका
झूम खेती: उत्तर-पूर्व और मध्य भारत के वन क्षेत्रों पर की जाने वाली घुमंतू खेती।
शिकारी और संग्राहक: उड़ीसा के कोंड जैसे समूह वनोपज और सामूहिक शिकार पर निर्भर थे।
पशुपालक: वन गुर्जर और लबाडी जैसे चरवाहे मवेशियों के साथ मौसमी प्रवास करते थे।
औपनिवेशिक प्रभाव
सत्ता की हानि: आदिवासी मुखिया ब्रिटिश कानूनों के अधीन हो गए और उन्होंने अपनी प्रशासनिक स्वायत्तता खो दी।
वन कानून: वनों को “आरक्षित” घोषित करने से आदिवासियों की आवाजाही प्रतिबंधित हो गई, जिससे संगठित विद्रोह हुए।
बिरसा मुंडा की कल्पना
बिरसा का उदय: 1890 के दशक के अंत में, बिरसा ने मुंडा गौरव की बहाली के लिए छोटानागपुर में उलगुलान (महान हलचल) का नेतृत्व किया।
दीकुओं को निशाना बनाना: इस आंदोलन ने “दीकुओं” (बाहरी लोग जैसे साहूकार, व्यापारी और ब्रिटिश अधिकारी) को आदिवासियों के कष्टों का स्रोत माना।
स्वर्ण युग (सतयुग): बिरसा ने एक ऐसे अतीत की कल्पना की जहाँ मुंडा प्रकृति के साथ सद्भाव में रहते थे और शोषण व कर्ज से मुक्त थे।
राजनीतिक उद्देश्य: एक मुंडा राज स्थापित करना। हालाँकि 1900 में बिरसा की मृत्यु हो गई, लेकिन आंदोलन ने अंग्रेजों को नए कानूनों के माध्यम से आदिवासियों के भूमि अधिकारों की रक्षा करने के लिए मजबूर किया।
अन्य विद्रोह: कोल (1831), संथाल (1855), बस्तर (1910) और वर्ली (1940) सभी ने औपनिवेशिक उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई।

दीकु

आदिवासियों द्वारा साहूकारों और ब्रिटिश अधिकारियों जैसे बाहरी लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द जिन्होंने उनका शोषण किया।

आरक्षित वन

राज्य द्वारा नियंत्रित वन जहाँ आदिवासियों का संग्रहण या खेती करना प्रतिबंधित था।

उलगुलान

इसका अर्थ है “महान हलचल”, यह बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए विशाल विद्रोह को संदर्भित करता है।

जंगल की आवाज़
औपनिवेशिक शासन ने जंगल को एक साझा घर से बदलकर एक राज्य की वस्तु बना दिया। आदिवासी प्रतिरोध केवल भूमि के लिए नहीं था, बल्कि एक ऐसी संस्कृति और जीवन शैली को बचाने के लिए था जिसे अंग्रेज न तो माप सकते थे और न ही नियंत्रित कर सकते थे।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-4 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना

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मंत्रिपरिषद (Council of Ministers – CoM) एक बड़ा निकाय है जो संघ के कार्यकारी कार्यों का निष्पादन करता है। 91वें संविधान संशोधन अधिनियम (2003) के अनुसार, मंत्रिपरिषद की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।

मंत्रिपरिषद को रैंक और जिम्मेदारी के आधार पर तीन स्तरों में विभाजित किया गया है:

  • कैबिनेट मंत्री (Cabinet Ministers):
    • स्थिति: ये सबसे वरिष्ठ सदस्य होते हैं जो गृह, रक्षा, वित्त और विदेश जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के प्रमुख होते हैं।
    • भूमिका: ये कैबिनेट की बैठकों में भाग लेते हैं और केंद्र सरकार के मुख्य नीति-निर्माता होते हैं।
  • राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) (Ministers of State – Independent Charge):
    • स्थिति: ये छोटे मंत्रालयों/विभागों के प्रमुख होते हैं, लेकिन ये किसी कैबिनेट मंत्री को रिपोर्ट नहीं करते।
    • भूमिका: इन्हें कैबिनेट की बैठकों में केवल तभी आमंत्रित किया जाता है जब उनके विशिष्ट विभागों से संबंधित मामलों पर चर्चा होती है।
  • राज्य मंत्री (Ministers of State – MoS):
    • स्थिति: ये कनिष्ठ (Junior) मंत्री होते हैं जो कैबिनेट मंत्रियों के साथ जुड़े होते हैं।
    • भूमिका: ये कैबिनेट मंत्रियों को उनके प्रशासनिक, राजनीतिक और संसदीय कर्तव्यों में सहायता करते हैं। ये कैबिनेट की बैठकों में भाग नहीं लेते।
  • उप मंत्री (Deputy Ministers):
    • स्थिति: ये रैंक में सबसे नीचे होते हैं और कैबिनेट मंत्रियों या राज्य मंत्रियों की सहायता के लिए नियुक्त किए जाते हैं।
    • भूमिका: ये विशुद्ध रूप से प्रशासनिक और संसदीय सहायता प्रदान करते हैं। (वर्तमान में इनकी नियुक्ति बहुत कम होती है)।

छात्र अक्सर इन दोनों के बीच भ्रमित हो जाते हैं। मुख्य अंतर नीचे दी गई तालिका में दिए गए हैं:

विशेषतामंत्रिपरिषद (CoM)मंत्रिमंडल (The Cabinet)
आकारबड़ा निकाय (60-80 मंत्री)।छोटा निकाय (15-25 वरिष्ठ मंत्री)।
संवैधानिक स्थितियह एक संवैधानिक निकाय है (अनुच्छेद 74-75)।मूल संविधान में नहीं था; 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया।
बैठकेंएक निकाय के रूप में इसकी बैठकें शायद ही कभी होती हैं।यह नीतियों के निर्धारण के लिए बार-बार बैठकें करता है।
कार्ययह वह निकाय है जो औपचारिक रूप से सलाह देता है।यह वह निकाय है जो वास्तव में निर्णय लेता है।

कैबिनेट समितियाँ कैबिनेट के कार्यभार को कम करने और जटिल मुद्दों की गहन जाँच करने के लिए बनाए गए विशिष्ट समूह हैं।

  • संविधानेत्तर (Extra-Constitutional): इनका उल्लेख मूल संविधान में नहीं है; इनकी स्थापना ‘कार्य आवंटन नियम’ (Rules of Business) के तहत की जाती है।
  • दो प्रकार:
    1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees): ये स्थायी प्रकृति की होती हैं।
    2. तदर्थ समितियाँ (Ad Hoc Committees): ये अस्थायी होती हैं, जिन्हें विशिष्ट कार्यों के लिए बनाया जाता है।
  • संरचना: आमतौर पर इनमें 3 से 8 कैबिनेट मंत्री होते हैं। प्रधानमंत्री इनमें से अधिकांश की अध्यक्षता करते हैं।
समितिअध्यक्षजिम्मेदारी
राजनीतिक मामलों की समितिप्रधानमंत्रीघरेलू और विदेशी नीति से संबंधित मामले। इसे “सुपर-कैबिनेट” कहा जाता है।
आर्थिक मामलों की समितिप्रधानमंत्रीआर्थिक क्षेत्र में सरकारी गतिविधियों का निर्देशन और समन्वय करना।
नियुक्ति समितिप्रधानमंत्रीकेंद्रीय सचिवालय में सभी उच्च-स्तरीय नियुक्तियों का निर्णय करना।
संसदीय मामलों की समितिगृह मंत्रीसंसद में सरकारी कार्यों की प्रगति की देखरेख करना। (नोट: इसकी अध्यक्षता PM नहीं करते)।
सुरक्षा संबंधी समिति (CCS)प्रधानमंत्रीकानून-व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा और रक्षा मामलों से संबंधित निर्णय।

UPSC परीक्षा में अक्सर यह पूछा जाता है कि किस समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नहीं करते—वह ‘संसदीय मामलों की समिति’ है, जिसकी अध्यक्षता गृह मंत्री करते हैं।

संघीय कार्यपालिका • श्रेणियाँ • समितियाँ
मंत्रिपरिषद

मंत्रियों का पदानुक्रम और भूमिकाएँ

संवैधानिक सीमा
91वें संशोधन (2003) के अनुसार, मंत्रिपरिषद की संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।
कैबिनेट का दर्जा
संविधान में “कैबिनेट” शब्द को 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 के माध्यम से जोड़ा गया था।
त्रि-स्तरीय पदानुक्रम
कैबिनेट मंत्री: गृह, रक्षा और वित्त जैसे महत्वपूर्ण विभागों के प्रमुख वरिष्ठ सदस्य; ये प्राथमिक नीति-निर्माता होते हैं।
राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार): ये स्वतंत्र रूप से छोटे विभागों के प्रमुख होते हैं; केवल विशिष्ट विभागीय मामलों के लिए बैठकों में भाग लेते हैं।
कैबिनेट समितियाँ
कार्यभार कम करने और विशिष्ट निर्णयों की सुविधा के लिए कार्य संचालन नियमों के तहत स्थापित संविधानेतर निकाय।

राजनीतिक मामले

इसकी अध्यक्षता PM करते हैं; यह घरेलू/विदेशी नीति से संबंधित है। इसे “सुपर-कैबिनेट” कहा जाता है।

आर्थिक मामले

अध्यक्षता PM द्वारा; आर्थिक क्षेत्र में सरकार की सभी गतिविधियों को निर्देशित और समन्वित करती है।

सुरक्षा (CCS)

अध्यक्षता PM द्वारा; राष्ट्रीय रक्षा, कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा के मामलों को संभालती है।

परिषद बनाम
कैबिनेट
परिषद (CoM) एक बड़ा संवैधानिक निकाय है जो औपचारिक रूप से राष्ट्रपति को सलाह देता है, लेकिन इसकी बैठकें विरल होती हैं। कैबिनेट एक छोटा, वरिष्ठ समूह (15-25 सदस्य) है जो बार-बार मिलता है और संघ के वास्तविक नीति-निर्माण इंजन के रूप में कार्य करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (30 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; योजना; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि)।

  • संदर्भ: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, भारत के मध्यम अवधि के विकास अनुमान को बढ़ाकर 7% करता है, लेकिन साथ ही गंभीर वैश्विक आर्थिक जोखिमों की चेतावनी भी देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • घरेलू अपग्रेड: पूंजीगत वृद्धि, श्रम भागीदारी और उत्पादन दक्षता में सुधार के कारण घरेलू विकास का अनुमान 6.5% से बढ़ाकर 7% कर दिया गया है।
    • वैश्विक संकट का जोखिम: सर्वेक्षण के अनुसार 2026 में 2008 के वित्तीय संकट से भी बदतर वैश्विक संकट आने की 10%-20% संभावना है।
    • AI निवेश बुलबुला (Bubble): एक बड़ा उभरता हुआ जोखिम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में “अत्यधिक ऋण आधारित” (Highly-leveraged) निवेश है, जो सुधार होने पर बाजार में भारी अस्थिरता पैदा कर सकता है।
    • FY27 का पूर्वानुमान: सर्वेक्षण ने अगले वित्तीय वर्ष (2026-27) के लिए 6.8%-7.2% की विकास सीमा का अनुमान लगाया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “आर्थिक योजना”, “मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता” और “वैश्विक वित्तीय जोखिमों” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • तीन वैश्विक परिदृश्य: सर्वेक्षण तीन संभावित परिदृश्यों को रेखांकित करता है: परिदृश्य 1 (सामान्य व्यवसाय – 40%-45%), परिदृश्य 2 (बहुध्रुवीय बिखराव – 40%-45%), और परिदृश्य 3 (सबसे खराब स्थिति – 10%-20%)।
    • रुपये पर प्रभाव: सभी परिदृश्य भारत के लिए पूंजी प्रवाह (Capital flow) के बाधित होने और परिणामस्वरूप रुपये पर दबाव के माध्यम से एक सामान्य जोखिम पैदा करते हैं।
    • रक्षात्मक प्रतिक्रिया: भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से वैश्विक तरलता (Liquidity) कम हो सकती है और विभिन्न क्षेत्रों में रक्षात्मक आर्थिक नीतियों की ओर बदलाव हो सकता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध; राजकोषीय संघवाद)।

  • संदर्भ: केंद्रीय कर हस्तांतरण के अस्थिर होने के कारण ‘राज्य विकास ऋण’ (SDLs) पर राज्यों की बढ़ती निर्भरता का विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • उधारी में उछाल: SDLs अब तमिलनाडु में राजस्व प्राप्तियों का लगभग 35% और महाराष्ट्र में 26% हिस्सा हैं, जो एक दशक पहले असाधारण माना जाता था।
    • सेस (Cess) द्वारा क्षरण: यद्यपि विभाज्य पूल (Divisible Pool) में राज्यों की हिस्सेदारी 41% तय है, लेकिन केंद्र द्वारा सेस और अधिभार (Surcharge) के बढ़ते उपयोग ने राज्यों को मिलने वाले प्रभावी संसाधनों को कम कर दिया है।
    • क्राउडिंग आउट (Crowding Out): कल्याणकारी प्रतिबद्धताओं (पेंशन/स्वास्थ्य बीमा) के लिए उच्च उधारी सार्वजनिक पूंजीगत व्यय और निजी निवेश के लिए उपलब्ध धन को सीमित करती है।
    • क्षैतिज पुनर्गठन: लेख में हस्तांतरण मानदंडों को फिर से तैयार करने की मांग की गई है ताकि केवल जनसंख्या के बजाय कर प्रयास और दक्षता को अधिक महत्व दिया जा सके।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “राज्य ऋण प्रबंधन” और “शासन वित्त”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • वित्तीय स्वायत्तता का क्षरण: बड़े कर आधार वाले औद्योगिक राज्य वित्तीय स्वायत्तता के निरंतर क्षरण का सामना कर रहे हैं क्योंकि वे अपने नियमित खर्चों के लिए भी कर्ज पर निर्भर हैं।
    • संरचनात्मक निर्भरता: पश्चिम बंगाल जैसे राज्य संरचनात्मक रूप से केंद्रीय हस्तांतरण पर निर्भर हैं (औसत 47.7%) और इसके बावजूद भारी कर्ज ले रहे हैं।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: दिल्ली में आयोजित दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (30-31 जनवरी, 2026) 22 सदस्यीय अरब लीग के साथ भारत की गहरी रणनीतिक पहुंच को उजागर करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • आर्थिक आधार: द्विपक्षीय व्यापार वर्तमान में $240 बिलियन से अधिक है। यह क्षेत्र भारत के 60% कच्चे तेल और 70% प्राकृतिक गैस आयात की आपूर्ति करता है।
    • फिनटेक अभिसरण: भारत का UPI अब बहरीन, सऊदी अरब, कतर और UAE में स्वीकार किया जाता है, जबकि दुबई हवाई अड्डों पर रुपया कानूनी मुद्रा है।
    • रणनीतिक चोक पॉइंट्स: भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार स्वेज नहर और अदन की खाड़ी से होकर गुजरता है, जिससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है।
    • रक्षा निर्यात: अरब देश संयुक्त उत्पादन और भारतीय प्लेटफार्मों जैसे तेजस लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस और आकाश मिसाइलों में बढ़ती रुचि दिखा रहे हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “ऊर्जा सुरक्षा” और “समुद्री डोमेन जागरूकता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • क्षेत्रीय दरारें: भारत को सऊदी अरब और UAE के बीच नए तनावों (विशेष रूप से यमन को लेकर) के बीच सावधानी से अपनी क्षेत्रीय रणनीति बनानी होगी।
    • IMEC कनेक्टिविटी: ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) दीर्घकालिक गति और सामूहिक समृद्धि के लिए एक केंद्र बिंदु बना हुआ है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; स्वास्थ्य नीति) और GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: सरकार ने ‘नये ड्रग्स और क्लिनिकल ट्रायल नियम, 2019’ में संशोधन किया है ताकि अनुसंधान के लिए अनिवार्य परीक्षण लाइसेंस के स्थान पर ‘पूर्व सूचना’ (Prior Intimation) तंत्र लागू किया जा सके।
  • मुख्य बिंदु:
    • ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस: गैर-व्यावसायिक दवा निर्माण के लिए अनिवार्य लाइसेंस के स्थान पर ‘सुगम पोर्टल’ (SUGAM Portal) के माध्यम से ऑनलाइन सूचना देने की व्यवस्था की गई है।
    • समय सीमा में कमी: इस कदम से दवा विकास की समय सीमा में कम से कम तीन महीने की कमी आने की उम्मीद है।
    • गति बनाम गुणवत्ता: उच्च जोखिम वाली साइकोट्रोपिक दवाओं के लिए वैधानिक प्रसंस्करण समय 90 दिनों से घटाकर 45 दिन किया जा रहा है।
    • अनुसंधान पर ध्यान: ‘इरादे की सूचना’ ऑनलाइन स्वीकार होने के बाद कंपनियां अनुसंधान के लिए दवा संश्लेषण (Synthesis) शुरू करने के लिए स्वतंत्र हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “फार्मास्युटिकल विनियमन”, “अनुसंधान एवं विकास सहायता” और “सार्वजनिक स्वास्थ्य दक्षता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • ‘लाइसेंस राज’ की समाप्ति: संपादकीय बाधाओं को दूर करने की सराहना करता है लेकिन चेतावनी देता है कि गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) से समझौता नहीं होना चाहिए।
    • घातक चूक: हाल ही में कफ सिरप से जुड़ी मौतों ने उजागर किया है कि फार्मा विनिर्माण में खराब निगरानी घातक हो सकती है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; सामाजिक न्याय; उच्च शिक्षा)।

  • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना, 2026) पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि ये “अत्यधिक व्यापक” (Too sweeping) हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • जाति-केंद्रित पूर्वाग्रह: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2026 के नियम केवल SC/ST/OBC छात्रों के खिलाफ भेदभाव को मान्यता देते हैं, जबकि सामान्य श्रेणी के छात्रों को सुरक्षा देने में विफल रहते हैं।
    • विभाजनकारी क्षमता: CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि इन नियमों के ऐसे व्यापक परिणाम हो सकते हैं जो “समाज को विभाजित करेंगे।”
    • रैगिंग के उपाय: कोर्ट ने नोट किया कि नए नियमों के तहत, यदि कोई सामान्य श्रेणी का छात्र किसी SC/ST वरिष्ठ छात्र द्वारा की जा रही रैगिंग का विरोध करता है, तो उसके पास कोई उपाय नहीं होगा।
    • समावेशी दायरा: न्यायमूर्ति बागची ने सुझाव दिया कि नियमों को केवल जाति के बजाय “सर्व-समावेशी भेदभाव” पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “न्यायिक निरीक्षण” और “संवैधानिक समानता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • शिक्षा में एकता: न्यायालय ने जोर दिया कि “भारत की एकता उसके शैक्षणिक संस्थानों में परिलक्षित होनी चाहिए,” और अलग-थलग स्कूलों या छात्रावासों के प्रति चेतावनी दी।
    • यथास्थिति: फिलहाल, पुराने 2012 के इक्विटी नियम लागू रहेंगे जब तक कि 2026 के संस्करण की गहन जांच नहीं हो जाती।

संपादकीय विश्लेषण

30 जनवरी, 2026
GS-3 अर्थव्यवस्था आर्थिक सर्वेक्षण 25-26

घरेलू विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7% किया गया। 2008 जैसे वैश्विक व्यवस्थागत संकट को जन्म देने वाले AI निवेश बुलबुले की चेतावनी।

GS-2 IR भारत-अरब लीग संबंध

द्विपक्षीय व्यापार $240 बिलियन से अधिक। खाड़ी के संकीर्ण जलमार्गों (chokepoints) में समुद्री सुरक्षा और तेजस/ब्रह्मोस जैसे रक्षा निर्यात पर ध्यान।

GS-2 शिक्षा UGC इक्विटी नियमों पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों को स्थगित रखा। समाज को बांटने वाले व्यापक परिणामों की चेतावनी; 2012 के नियम लागू रहेंगे।

राजकोषीय: हस्तांतरण मानदंडों को केवल जनसंख्या के बजाय कर दक्षता और प्रयासों को पुरस्कृत करना चाहिए।
सुरक्षा: अधिकांश भारतीय व्यापार स्वेज नहर से गुजरता है, जिससे अरब लीग एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार बन जाता है।
फार्मा: अनुसंधान में ‘लाइसेंस राज’ को खत्म करना महत्वपूर्ण है, फिर भी विनिर्माण निरीक्षण पर समझौता नहीं किया जा सकता।
सर्वेक्षण: बेहतर पूंजी विकास और श्रम भागीदारी भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) अपग्रेड के प्राथमिक इंजन हैं।
GS-4
न्याय और एकता
तात्विक समानता: UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक ‘समावेशी भेदभाव’ की नैतिक जटिलता को रेखांकित करती है। शैक्षिक नियमों को सामाजिक ताने-बाने की एकता को बनाए रखना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि एक समूह की सुरक्षा दूसरे के लिए प्रणालीगत भेद्यता पैदा न करे।

संपादकीय विश्लेषण

30 जनवरी, 2026
GS-3 अर्थव्यवस्था आर्थिक सर्वेक्षण 25-26

घरेलू विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7% किया गया। 2008 जैसे वैश्विक व्यवस्थागत संकट को जन्म देने वाले AI निवेश बुलबुले की चेतावनी।

GS-2 IR भारत-अरब लीग संबंध

द्विपक्षीय व्यापार $240 बिलियन से अधिक। खाड़ी के संकीर्ण जलमार्गों (chokepoints) में समुद्री सुरक्षा और तेजस/ब्रह्मोस जैसे रक्षा निर्यात पर ध्यान।

GS-2 शिक्षा UGC इक्विटी नियमों पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों को स्थगित रखा। समाज को बांटने वाले व्यापक परिणामों की चेतावनी; 2012 के नियम लागू रहेंगे।

राजकोषीय: हस्तांतरण मानदंडों को केवल जनसंख्या के बजाय कर दक्षता और प्रयासों को पुरस्कृत करना चाहिए।
सुरक्षा: अधिकांश भारतीय व्यापार स्वेज नहर से गुजरता है, जिससे अरब लीग एक महत्वपूर्ण रणनीतिक भागीदार बन जाता है।
फार्मा: अनुसंधान में ‘लाइसेंस राज’ को खत्म करना महत्वपूर्ण है, फिर भी विनिर्माण निरीक्षण पर समझौता नहीं किया जा सकता।
सर्वेक्षण: बेहतर पूंजी विकास और श्रम भागीदारी भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) अपग्रेड के प्राथमिक इंजन हैं।
GS-4
न्याय और एकता
तात्विक समानता: UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक ‘समावेशी भेदभाव’ की नैतिक जटिलता को रेखांकित करती है। शैक्षिक नियमों को सामाजिक ताने-बाने की एकता को बनाए रखना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि एक समूह की सुरक्षा दूसरे के लिए प्रणालीगत भेद्यता पैदा न करे।

यहाँ सीमा बुनियादी ढांचे (Border Infrastructure) और जनवरी 2026 तक के नए मान्यता प्राप्त संरक्षण स्थलों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

सीमावर्ती सड़कों और सुरंगों का मानचित्रण आपके पाठ्यक्रम के “आंतरिक सुरक्षा” और “बुनियादी ढांचा” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।

  • अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे (NH-913): वर्तमान में निर्माणाधीन एक विशाल 1,840 किमी लंबा राजमार्ग।
    • मैपिंग पॉइंट: इसे अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ ट्रेस करें, जो मांगो-टिंग्बू (Mago-Thingbu) को विजयनगर से जोड़ता है।
  • शिंकु ला सुरंग (Shinku La Tunnel): यह दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग (15,800 फीट पर) बनने वाली है, जो हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ेगी।
  • सेला सुरंग (Sela Tunnel): 13,000 फीट की ऊंचाई पर पहले से ही चालू है; यह तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है।
  • DS-DBO रोड: लद्दाख में 255 किमी लंबी दरबुक-शोक-दौलत बेग ओल्डी सड़क, जो दुनिया की सबसे ऊँची हवाई पट्टी (Airstrip) तक जाती है।

राजस्थान और तमिलनाडु संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार में सबसे सक्रिय रहे हैं।

विशेषताराज्यमहत्व
गंगा भैरव घाटीराजस्थान (अजमेर)फरवरी 2025 में घोषित; शुष्क क्षेत्र की जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण।
सोरसन I, II, और IIIराजस्थान (बारां)गोडावण (Great Indian Bustard) और काले हिरण के लिए नए आरक्षित क्षेत्र।
कोपरा जलाशयछत्तीसगढ़2025 के अंत में रामसर स्थल के रूप में नामित; प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण।
नंजरायण अभयारण्यतमिलनाडुतिरुपुर जिले की एक प्रमुख आर्द्रभूमि जिसे रामसर सूची में शामिल किया गया है।

मानचित्र पर इन उत्पादों को उनके स्थान से जोड़कर देखना परीक्षा के लिए उपयोगी होता है।

  • अरुणाचल याक चुरपी (Yak Churpi): तवांग और पश्चिम कामेंग क्षेत्रों के याक के दूध से बना एक अनूठा पनीर।
  • मेघालय गारो दकमंदा (Garo Dakmanda): गारो जनजाति का एक पारंपरिक वस्त्र।
  • कच्छी खरेक (Kachchhi Kharek): गुजरात के कच्छ क्षेत्र की खजूर की एक विशिष्ट किस्म।
  • माजुली मास्क और पांडुलिपि पेंटिंग: असम के नदी द्वीप माजुली के पारंपरिक शिल्प।
  • त्रिपुरा रिसा (Tripura Risa): त्रिपुरा का एक प्रसिद्ध पारंपरिक हथकरघा वस्त्र।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे ऊँची सुरंगशिंकु लाहिमाचल-लद्दाख सीमा
सबसे लंबी फ्रंटियर रोडअरुणाचल फ्रंटियर हाईवेLAC, अरुणाचल प्रदेश
गोडावण आवाससोरसन रिजर्वबारां, राजस्थान
कपड़ा GI हबत्रिपुरा रिसात्रिपुरा

सीमा परियोजनाओं (जैसे DS-DBO रोड) को मैप करते समय उनके पास स्थित नदियों (जैसे शोक नदी) को भी चिह्नित करें, क्योंकि सामरिक भूगोल में नदियों का मार्ग अक्सर सड़क निर्माण को प्रभावित करता है।

मानचित्रण विवरण

सीमा बुनियादी ढांचा और संरक्षण
हिमालयी रक्षा रणनीतिक सुरंगें

शिंकू ला (15,800 फीट) लाहौल को ज़ांस्कर से जोड़ती है। सेला सुरंग तवांग (अरुणाचल प्रदेश) के लिए हर मौसम में संपर्क सुनिश्चित करती है।

जीआई (GI) टैग 2026 स्थान-से-उत्पाद

तवांग की याक चुरपी और गुजरात की कच्छी खरेक (खजूर) नवीनतम भौगोलिक संकेत मानचित्र का नेतृत्व कर रहे हैं।

सीमावर्ती राजमार्ग
अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे (NH-913)

वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के समानांतर चलने वाली एक विशाल 1,840 किमी लंबी धमनी, जो मागो-थिंग्बू को विजयनगर के पूर्वी छोर से जोड़ती है।

नए संरक्षण रिजर्व
राजस्थान और मध्य भारत

गंगा भैरव घाटी (अजमेर) और सोरसन रिजर्व (बारां) ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ और ‘काला हिरण’ के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं।

रामसर अपडेट

छत्तीसगढ़ का कोपरा जलाशय और तमिलनाडु का नंजरायण अभयारण्य भारत के आर्द्रभूमि नेटवर्क के नवीनतम महत्वपूर्ण अंग हैं।

सबसे ऊंची सुरंग शिंकू ला (हिमाचल-लद्दाख सीमा)।
सीमावर्ती सड़क NH-913 (LAC अरुणाचल)।
बस्टर्ड आवास सोरसन रिजर्व (राजस्थान)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 2026 का मानचित्रण उत्तरी सुरक्षा के लिए DS-DBO रोड अक्ष और सांस्कृतिक भूगोल के लिए गारो दकमंदा कपड़ा केंद्रों पर केंद्रित है। उन ट्रांजिट बिंदुओं पर ध्यान दें जहाँ बुनियादी ढांचा संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों से मिलता है।

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अध्याय 3, “ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना“, में वर्णन किया गया है कि कैसे इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और किसानों पर उसकी राजस्व नीतियों का क्या प्रभाव पड़ा।

12 अगस्त 1765 को मुगल सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का ‘दीवान’ नियुक्त किया।

  • वित्तीय प्रशासन: दीवान के रूप में, कंपनी अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र की मुख्य वित्तीय प्रशासक बन गई।
  • राजस्व की आवश्यकता: कंपनी को राजस्व संसाधनों को इस तरह व्यवस्थित करना था कि उसे अपने बढ़ते सैन्य और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त लाभ मिल सके।
  • व्यापार में बदलाव: 1865 से पहले, कंपनी भारत से सामान खरीदने के लिए ब्रिटेन से सोने और चाँदी का आयात करती थी; लेकिन बंगाल की दीवानी मिलने के बाद, यहाँ से इकट्ठा किए गए राजस्व से ही निर्यात के लिए सामान खरीदा जाने लगा।

बंगाल की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट का सामना कर रही थी, जिसका परिणाम 1770 के भीषण अकाल के रूप में निकला, जिसमें एक करोड़ (10 मिलियन) लोग मारे गए। राजस्व के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए, कंपनी ने भू-राजस्व की नई प्रणालियाँ शुरू कीं:

  • स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement – 1793): इसे लॉर्ड कॉर्नवालिस ने शुरू किया था। इस व्यवस्था में भू-राजस्व की राशि हमेशा के लिए (स्थायी रूप से) तय कर दी गई थी।
    • राजा और ताल्लुकदार: उन्हें ‘जमींदार’ के रूप में मान्यता दी गई और उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने की जिम्मेदारी दी गई।
    • प्रभाव: जमींदार अक्सर उच्च तय राजस्व चुकाने में विफल रहे और उनकी जमीनें छीन ली गईं। किसानों को यह व्यवस्था दमनकारी लगी क्योंकि लगान बहुत अधिक था और जमीन पर उनका कोई अधिकार सुरक्षित नहीं था।
  • महलवारी व्यवस्था (Mahalwari System – 1822): इसे होल्ट मैकेंजी ने बंगाल प्रेसिडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लिए तैयार किया था।
    • महल: इसमें राजस्व गाँव या गाँवों के एक समूह से इकट्ठा किया जाता था, जिसे ‘महल’ कहा जाता था।
    • गाँव का मुखिया: जमींदार के बजाय, गाँव के मुखिया को राजस्व इकट्ठा करने और कंपनी को देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसमें राजस्व को समय-समय पर संशोधित किया जाना था।
  • रैयतवारी व्यवस्था (Ryotwari System): इसे दक्षिण भारत में कैप्टन अलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो द्वारा विकसित किया गया था।
    • सीधा समझौता: इस व्यवस्था में राजस्व का समझौता सीधे उन किसानों (रैयतों) के साथ किया गया जो पीढ़ियों से जमीन जोतते आ रहे थे।
विशेषतास्थायी बंदोबस्तमहलवारी व्यवस्थारैयतवारी (मुनरो) व्यवस्था
शुरुआत (वर्ष)लॉर्ड कॉर्नवालिस (1793)होल्ट मैकेंजी (1822)थॉमस मुनरो और अलेक्जेंडर रीड
मुख्य क्षेत्रबंगाल, बिहार और उड़ीसाबंगाल प्रेसिडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतदक्षिण भारत (मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी)
आकलन की इकाईव्यक्तिगत जमींदारमहल (गाँव या गाँवों का समूह)रैयत (व्यक्तिगत किसान)
राजस्व भुगतानकर्ताजमींदार (राजा और ताल्लुकदार)गाँव का मुखियाव्यक्तिगत किसान (रैयत)
राजस्व की प्रकृतिस्थायी रूप से तय; भविष्य में कभी नहीं बढ़ाया जाना थासमय-समय पर संशोधित; स्थायी रूप से तय नहींखेतों के सर्वेक्षण के बाद समय-समय पर संशोधित
स्वामित्व अधिकारजमींदारों को जमीन का मालिक माना गयास्वामित्व अक्सर गाँव समुदाय के पास रहारैयतों को जमीन का पैतृक मालिक/जोतने वाला माना गया
बिचौलियों की भूमिकाअत्यधिक; जमींदार राज्य और किसान के बीच कड़ी थेमध्यम; गाँव के मुखिया ने राजस्व एकत्र कियान्यूनतम; राज्य और किसान के बीच सीधा समझौता

अंग्रेजों ने महसूस किया कि ग्रामीण क्षेत्र न केवल राजस्व दे सकते हैं, बल्कि वहां वे फसलें भी उगाई जा सकती हैं जिनकी यूरोप में ज़रूरत थी, जैसे अफीम और नील

  • नील (Indigo) की मांग: भारतीय नील की यूरोप में इसके गहरे नीले रंग के कारण बहुत अधिक कीमत थी। 18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन में औद्योगीकरण के कारण कपड़े के उत्पादन में वृद्धि हुई, जिससे नील की मांग और बढ़ गई।
  • नील उत्पादन की विधियाँ: खेती की दो मुख्य प्रणालियाँ थीं:
    1. निज खेती: बागान मालिक सीधे अपनी नियंत्रित भूमि पर नील का उत्पादन करता था।
    2. रैयती खेती: बागान मालिक रैयतों (किसानों) को एक अनुबंध (सट्टा) पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करते थे और उन्हें अपनी कम से कम 25% जमीन पर नील उगाने के लिए कम ब्याज पर अग्रिम धन (कर्ज) देते थे।

नील की खेती की दमनकारी प्रकृति के कारण मार्च 1859 में बंगाल में एक विशाल जन-विद्रोह हुआ।

  • प्रतिरोध: रैयतों ने नील उगाने और लगान देने से मना कर दिया और नील की फैक्ट्रियों पर हमला किया। उन्हें स्थानीय जमींदारों और गाँव के मुखियाओं का भी समर्थन मिला, जो बागान मालिकों की बढ़ती शक्ति से नाखुश थे।
  • परिणाम: सरकार ने नील आयोग का गठन किया। आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया और घोषणा की कि रैयत मौजूदा अनुबंधों को पूरा करने के बाद भविष्य में नील की खेती से इनकार कर सकते हैं।
  • बिहार की ओर स्थानांतरण: बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया और बागान मालिक बिहार चले गए। यहाँ भी उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 1917 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चंपारण आंदोलन हुआ।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 3

ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

दीवानी अधिकार
1765: मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल का दीवान नियुक्त किया, जिससे वे बंगाल के मुख्य वित्तीय प्रशासक बन गए।
आर्थिक बदलाव: अब बंगाल के राजस्व से कंपनी के व्यापार का वित्तपोषण होने लगा, जिससे ब्रिटेन से सोना/चांदी आयात करने की आवश्यकता समाप्त हो गई।
ग्रामीण संकट
1770 का अकाल: बंगाल में एक करोड़ लोग मारे गए; इस संकट ने कंपनी को राजस्व सुरक्षित करने के लिए खेती में सुधार करने पर मजबूर किया।
प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्थाएँ
स्थायी बंदोबस्त (1793): लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा शुरू किया गया। राजस्व स्थायी रूप से तय किया गया था। ज़मींदार बिचौलियों के रूप में कार्य करते थे लेकिन उच्च माँग के कारण अक्सर अपनी ज़मीन खो देते थे।
महलवारी व्यवस्था (1822): होल्ट मैकेंज़ी द्वारा तैयार की गई। राजस्व ‘महल’ (गाँव) से ग्राम प्रधान के माध्यम से एकत्र किया जाता था और समय-समय पर संशोधित किया जाता था।
रैयतवारी व्यवस्था: थॉमस मुनरो द्वारा विकसित। दक्षिण भारत में बिचौलियों को हटाकर सीधे काश्तकारों (रैयतों) के साथ बंदोबस्त किया गया।
नील का संघर्ष: भारतीय नील की ब्रिटिश माँग के कारण दमनकारी रैयती व्यवस्था (अनुबंध/सट्टा) शुरू हुई और अंततः 1859 में नील विद्रोह हुआ।

नील आयोग

1859 के विद्रोह के बाद स्थापित; इसने घोषणा की कि नील का उत्पादन रैयतों के लिए लाभदायक नहीं था।

निज खेती

नील उत्पादन की वह व्यवस्था जहाँ बागान मालिक सीधे तौर पर किराए के मजदूरों के साथ ज़मीन पर नियंत्रण रखते थे।

चंपारण

बिहार का वह स्थान जहाँ महात्मा गांधी ने 1917 में नील बागान मालिकों के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था।

नील की खेती का सच
ग्रामीण इलाकों में “सुधार” करने का कंपनी का प्रयास राजस्व के लालच से प्रेरित था। इसके कारण ऐसी दमनकारी प्रणालियाँ बनीं जिन्होंने अंततः किसानों की चुप्पी तोड़ी और भारत में संगठित कृषि प्रतिरोध का मार्ग प्रशस्त किया।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-3 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

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भारतीय संसदीय प्रणाली में, जहाँ राष्ट्रपति नाममात्र का प्रमुख (विधितः – De Jure) होता है, वहीं प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (यथार्थ – De Facto) होता है। प्रधानमंत्री ‘सरकार का प्रमुख’ और राष्ट्र की नीतियों का मुख्य वास्तुकार होता है।

  • नियुक्ति: संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा। परंपरा के अनुसार, राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल (या गठबंधन) के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
  • विवेकाधीन शक्ति: यदि किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत न हो, तो राष्ट्रपति अपने व्यक्तिगत विवेक का उपयोग करके सबसे बड़े दल/गठबंधन के नेता को नियुक्त कर सकता है और उन्हें एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक महीने) के भीतर अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकता है।
  • योग्यता:
    1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
    2. लोकसभा (न्यूनतम आयु 25 वर्ष) या राज्यसभा (न्यूनतम आयु 30 वर्ष) का सदस्य होना चाहिए।
    3. एक गैर-सदस्य को भी नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन उसे 6 महीने के भीतर किसी भी सदन की सदस्यता प्राप्त करनी होगी।
  • पदावधि: प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure) पद धारण करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति उसे कभी भी हटा सकता है; जब तक प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, उसे बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

यह अनुच्छेद राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद (COM) के बीच संबंधों को परिभाषित करता है।

  • नियम: राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।
  • बाध्यकारी प्रकृति: राष्ट्रपति ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है। हालाँकि, राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है; लेकिन पुनर्विचार के बाद दी गई दूसरी सलाह राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य होती है।
  • गोपनीयता: मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी गई सलाह की प्रकृति की किसी भी अदालत द्वारा जाँच नहीं की जा सकती।

अनुच्छेद 78 राष्ट्रपति और कैबिनेट के बीच संवैधानिक सेतु (Bridge) के रूप में कार्य करता है। प्रधानमंत्री के कर्तव्य हैं:

  • सूचित करना: संघ के प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों को राष्ट्रपति को संप्रेषित करना।
  • जानकारी प्रदान करना: प्रशासन या विधान से संबंधित ऐसी कोई भी जानकारी देना जिसे राष्ट्रपति माँगे।
  • विचारार्थ प्रस्तुत करना: यदि राष्ट्रपति ऐसा चाहे, तो किसी ऐसे मामले को मंत्रिपरिषद के विचार के लिए रखना जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो लेकिन परिषद ने विचार न किया हो।
  • सिफारिश: वह उन व्यक्तियों की सिफारिश करता है जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा मंत्री नियुक्त किया जाता है।
  • विभागों का आवंटन: वह मंत्रियों के बीच विभिन्न विभागों (Portfolios) का आवंटन और फेरबदल करता है।
  • अध्यक्षता: वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णयों को प्रभावित करता है।
  • समन्वय: वह सभी मंत्रियों की गतिविधियों का मार्गदर्शन, निर्देशन, नियंत्रण और समन्वय करता है।
  • इस्तीफा: चूंकि प्रधानमंत्री प्रमुख है, उसका इस्तीफा या मृत्यु स्वचालित रूप से मंत्रिपरिषद के विघटन का कारण बनती है।
  • प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संचार का मुख्य माध्यम है।
  • वह राष्ट्रपति को भारत के महान्यायवादी (Attorney General), CAG, UPSC के अध्यक्ष, चुनाव आयुक्तों आदि जैसे महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में सलाह देता है।
  • सदन का नेता: प्रधानमंत्री निचले सदन (लोकसभा) का नेता होता है।
  • सत्र बुलाना/सत्रावसान: वह राष्ट्रपति को संसद के सत्र बुलाने और सत्रावसान (Proroguing) के संबंध में सलाह देता है।
  • विघटन: वह किसी भी समय राष्ट्रपति को लोकसभा भंग (Dissolve) करने की सिफारिश कर सकता है।
  • नीतिगत घोषणाएँ: वह सदन के पटल पर सरकार की प्रमुख नीतियों की घोषणा करता है।
  • मुख्य प्रवक्ता: वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर केंद्र सरकार का मुख्य प्रवक्ता होता है।
  • विदेश नीति: वह देश की विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • पदेन अध्यक्ष: वह कई महत्वपूर्ण निकायों का पदेन (Ex-officio) अध्यक्ष होता है:
    1. नीति आयोग (NITI Aayog)
    2. राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC)
    3. राष्ट्रीय एकता परिषद
    4. अंतर-राज्य परिषद
    5. राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद
  • संकट प्रबंधक: वह आपातकाल के दौरान राजनीतिक स्तर पर मुख्य संकट प्रबंधक होता है।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75): मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ है कि प्रधानमंत्री और मंत्री “एक साथ तैरते हैं और एक साथ डूबते हैं।” यदि प्रधानमंत्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पूरी कैबिनेट को इस्तीफा देना पड़ता है।
  • व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: राष्ट्रपति किसी मंत्री को हटा सकता है, लेकिन वह ऐसा केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर ही करता है।
अनुच्छेदकीवर्ड (Keyword)मुख्य शासनादेश
74सलाहप्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए परिषद का प्रमुख होता है (सलाह बाध्यकारी है)।
75नियुक्तिप्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा; सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत।
78सूचनाराष्ट्रपति को सरकार के निर्णयों के बारे में सूचित रखना प्रधानमंत्री का कर्तव्य है।

प्रधानमंत्री भारतीय संविधान का सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी है। जहाँ राष्ट्रपति “राष्ट्र का प्रमुख” है, वहीं प्रधानमंत्री “सरकार का प्रमुख” होता है, जो कार्यपालिका के इंजन और विधायिका के नेता के रूप में कार्य करता है।

शासनाध्यक्ष • वास्तविक कार्यपालिका
भारत के प्रधानमंत्री

नियुक्ति, शक्तियाँ और भूमिका

अनुच्छेद 75
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है; परंपरा के अनुसार, लोकसभा में बहुमत दल का नेता।
अनुच्छेद 74
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करते हैं। ऐसी सलाह बाध्यकारी है।
संवैधानिक सेतु (अनु. 78)
कर्तव्य: कैबिनेट के सभी निर्णयों की सूचना राष्ट्रपति को देना और मांगे जाने पर प्रशासनिक/विधायी जानकारी प्रदान करना।
विचार-विमर्श: किसी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को, जिस पर कैबिनेट ने विचार न किया हो, परिषद के समक्ष विचार के लिए रखना।
संसद से संबंध
सदन के नेता के रूप में, प्रधानमंत्री सत्रों को बुलाने/सत्रावसान करने की सलाह देते हैं और लोकसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।

कैबिनेट की आधारशिला

पोर्टफोलियो आवंटित करना, बैठकों की अध्यक्षता करना और सभी मंत्रियों की गतिविधियों का समन्वय करना।

पदेन अध्यक्ष

नीति आयोग, राष्ट्रीय एकता परिषद और अंतर-राज्य परिषद सहित महत्वपूर्ण निकायों के प्रमुख।

सामूहिक उत्तरदायित्व

मंत्री सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं; वे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में “एक साथ तैरते और डूबते” हैं।

वास्तविक
शक्ति
जहाँ राष्ट्रपति ‘नाममात्र’ के प्रमुख हैं, वहीं प्रधानमंत्री वास्तविक (De Facto) कार्यकारी हैं। प्रधानमंत्री का इस्तीफा या मृत्यु स्वतः ही पूरी मंत्रिपरिषद के विघटन का कारण बनती है, जबकि किसी अन्य मंत्री की मृत्यु केवल एक रिक्ति पैदा करती है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (29 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया गया है, जो 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के दौरान व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है।
  • मुख्य बिंदु:
    • रणनीतिक बीमा: इस समझौते को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं के खिलाफ दोनों पक्षों के लिए “भू-राजनीतिक बीमा पॉलिसी” के रूप में देखा जा रहा है।
    • संतुलित व्यापार: भारत ने एक ऐसे सौदे पर सफलतापूर्वक बातचीत की है जो उसके घरेलू डेयरी और कृषि क्षेत्रों की रक्षा करता है, साथ ही वस्त्र और फार्मास्यूटिकल्स के लिए बेहतर बाजार पहुंच प्राप्त करता है।
    • निवेश संरक्षण: एक अलग निवेश संरक्षण समझौता (IPA) भारत में यूरोपीय निवेशकों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
    • भौगोलिक संकेत (GIs): समझौते में GI के लिए कड़े संरक्षण शामिल हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि दार्जिलिंग चाय या फेटा चीज़ जैसे पारंपरिक उत्पादों को नकल से बचाया जाए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक साझेदारी”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “द्विपक्षीय निवेश संधियाँ” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM): हालांकि FTA पर हस्ताक्षर हो गए हैं, लेकिन भारत यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स को लेकर चिंतित है, जिसे वह एक गैर-टैरिफ बाधा (Non-tariff barrier) मानता है। दोनों पक्ष इन चिंताओं को दूर करने के लिए “संयुक्त निगरानी तंत्र” पर सहमत हुए हैं।
    • रणनीतिक स्वायत्तता: संपादकीय इस बात पर जोर देता है कि यह सौदा “रणनीतिक स्वायत्तता” की जीत है, जो दर्शाता है कि दो बड़े लोकतांत्रिक ब्लॉक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के समझौते पर पहुँच सकते हैं।
    • डिजिटल सहयोग: यह समझौता एआई (AI) और सेमीकंडक्टर्स जैसे उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में डेटा पर्याप्तता और सहयोग की नींव रखता है, जो पहले व्यापार वार्ता से अलग थे।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों और राजनीति का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान को उसके परमाणु कार्यक्रम के संबंध में गंभीर चेतावनी दी है, और संवर्धन गतिविधियों (Enrichment activities) को तुरंत न रोकने पर “पूर्ण परिणामों” की धमकी दी है।
  • मुख्य बिंदु:
    • परमाणु सीमा (Nuclear Threshold): ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की कगार पर है, जो वर्तमान अमेरिकी प्रशासन के लिए एक “रेड लाइन” है।
    • आर्थिक नाकाबंदी: अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार जारी रखने वाले किसी भी देश (भारत सहित) पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जो विशेष रूप से तेल और खनिज निर्यात को लक्षित करता है।
    • राजनयिक अलगाव: अमेरिका यूरोपीय सहयोगियों पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को फिर से लागू करने (Snap back) के लिए दबाव डाल रहा है, जिससे 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) के बचे हुए अवशेष भी समाप्त हो सकते हैं।
    • चाबहार पर प्रभाव: बढ़ते तनाव से चाबहार बंदरगाह की परिचालन स्थिरता को खतरा है, जहाँ भारत ने महत्वपूर्ण रणनीतिक और वित्तीय निवेश किया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “अमेरिकी प्रतिबंध और भारत” और “परमाणु अप्रसार” को समझने के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • वैश्विक तेल अस्थिरता: फारस की खाड़ी में किसी भी सैन्य या आर्थिक वृद्धि से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की उम्मीद है, जिससे भारत के राजकोषीय घाटे और रुपये के मूल्य पर सीधा असर पड़ेगा।
    • दबाव में रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को ईरान के साथ अपनी रणनीतिक ऊर्जा साझेदारी और अपने सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार अमेरिका की व्यापारिक दंड की धमकी के बीच एक कठिन विकल्प का सामना करना पड़ रहा है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि)।

  • संदर्भ: दिसंबर 2025 में भारत का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) 26 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, जो विनिर्माण (Manufacturing) में मजबूत सुधार का संकेत देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • विनिर्माण की बढ़त: विनिर्माण क्षेत्र, जिसका IIP में सबसे अधिक भार है, इलेक्ट्रॉनिक्स और परिवहन उपकरणों के कारण 8.2% बढ़ा।
    • पूंजीगत वस्तुओं में वृद्धि: पूंजीगत वस्तुओं (Capital Goods) में दोहरे अंकों की वृद्धि बताती है कि लंबे समय के ठहराव के बाद निजी निवेश अंततः गति पकड़ रहा है।
    • उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं: टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की बढ़ती मांग 2026-27 के केंद्रीय बजट से पहले शहरी उपभोग की मजबूती का संकेत देती है।
    • खनन और बिजली: खनन में 5.4% की वृद्धि हुई, जबकि बिजली उत्पादन में 6.1% की वृद्धि देखी गई, जो उच्च औद्योगिक गतिविधि को दर्शाती है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “आर्थिक संकेतक”, “विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन” और “निवेश रुझान” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नीतिगत प्रोत्साहन: संपादकीय इस वृद्धि का श्रेय आंशिक रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के विलंबित प्रभाव को देता है।
    • बजटीय अपेक्षाएं: यह सकारात्मक डेटा सरकार को आगामी केंद्रीय बजट में बुनियादी ढांचे और ग्रामीण मांग पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अधिक राजकोषीय स्थान प्रदान करता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य) और GS पेपर 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: कुत्तों के हमलों के बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों में पशु जन्म नियंत्रण (ABC) कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर कड़ी असंतोष व्यक्त किया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • कार्यान्वयन अंतराल: कोर्ट ने नोट किया कि पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 के बावजूद, स्थानीय निकाय व्यवस्थित नसबंदी और टीकाकरण करने में विफल रहे हैं।
    • मानव-पशु संघर्ष: पीठ ने जोर दिया कि जहाँ पशु अधिकार महत्वपूर्ण हैं, वहीं नागरिकों, विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों के “जीवन और सुरक्षा का अधिकार” सर्वोपरि होना चाहिए।
    • निधि की जवाबदेही: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से राज्यों को आवंटित धन और नगर निगमों द्वारा उनके उपयोग के बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
    • डेटा की कमी: आवारा कुत्तों की वास्तविक आबादी पर विश्वसनीय डेटा का अभाव नीतिगत हस्तक्षेपों को अप्रभावी बना रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “शासन और सार्वजनिक सुरक्षा”, “स्थानीय निकाय जवाबदेही” और “पशु अधिकारों में नैतिकता” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • शहरी शासन की विफलता: संपादकीय इस बात पर प्रकाश डालता है कि आवारा कुत्तों का संकट भारतीय शहरों में खराब अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) का एक लक्षण है, जो कुत्तों के झुंडों को “खाद्य सुरक्षा” प्रदान करता है।
    • कानूनी उत्तरदायित्व: कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या कुत्तों के हमलों के पीड़ितों को मुआवजे के लिए स्थानीय अधिकारियों को वित्तीय रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप) और GS पेपर 3 (आपदा प्रबंधन)।

  • संदर्भ: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कोलकाता के आनंदपुर में दो बड़े गोदामों में लगी विनाशकारी आग के परिणामस्वरूप कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई, जो शहरी सुरक्षा में व्यवस्थागत विफलताओं को उजागर करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • अवैध संरचनाएं: राज्य अग्निशमन विभाग ने पुष्टि की कि 12,000 वर्ग फुट में फैले गोदामों को अग्नि सुरक्षा के लिए मंजूरी नहीं दी गई थी और उनमें बुनियादी सुरक्षा सुविधाओं का अभाव था।
    • हाशिए पर रहने वाले पीड़ित: मृतक मुख्य रूप से पूर्वी मेदिनीपुर के प्रवासी श्रमिक थे जो इन अस्थायी, ज्वलनशील संरचनाओं का उपयोग रैन बसेरों के रूप में कर रहे थे।
    • प्रशासनिक उदासीनता: संपादकीय राज्य एजेंसियों की “मौन” प्रतिक्रिया और मुख्यमंत्री द्वारा स्थल का आधिकारिक दौरा न करने की आलोचना करता है, जो चुनाव से पहले त्रासदी को कम करके दिखाने की इच्छा का संकेत देता है।
    • बढ़ते जोखिम: आग मंगलवार दोपहर तक धधकती रही, जिसके लिए 12 दमकल इंजनों की आवश्यकता पड़ी। इसने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बनी संरचनाओं के लिए योजना की कमी को रेखांकित किया।
  • UPSC प्रासंगिकता: “शहरी शासन”, “औद्योगिक सुरक्षा मानक” और “प्रवासी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नागरिक पतन (Civic Decay): कभी भारत के अग्रणी शहर रहे कोलकाता में ऐसी बड़ी, बिना मंजूरी वाली संरचनाओं का होना वर्तमान नागरिक प्रशासन की दयनीय स्थिति का एक “स्पष्ट प्रमाण” है।
    • सुरक्षा का सामान्यीकरण: लेख चेतावनी देता है कि कोलकाता में विनाशकारी आग एक “परेशान करने वाली नियमित घटना” बनती जा रही है। पिछले साल बड़ाबाजार में होटल की आग में भी 14 लोगों की जान गई थी।

संपादकीय विश्लेषण

29 जनवरी, 2026
GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध ईरान परमाणु ‘रेड लाइन’

अमेरिका ने ईरान के व्यापारिक भागीदारों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी। रणनीतिक ऊर्जा संबंध और चाबहार बंदरगाह की स्थिरता सीधे दबाव में।

GS-3 अर्थव्यवस्था IIP बढ़कर 7.8% हुआ

विनिर्माण क्षेत्र 8.2% की दर से बढ़ा, जो 26 महीने का उच्चतम स्तर है। पूंजीगत वस्तुओं (Capital Goods) में दोहरे अंकों की वृद्धि निजी निवेश में सुधार का संकेत है।

GS-3 आपदा प्रबंधन कोलकाता गोदाम अग्निकांड

11 मौतों ने अवैध औद्योगिक संरचनाओं को उजागर किया। नागरिक प्रशासनिक उदासीनता के कारण विनाशकारी आग ‘चिंताजनक रूप से सामान्य’ होती जा रही है।

संघवाद: सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशु नीति की विफलता को ठीक करने के लिए नगर निगमों से निधि उपयोग रिपोर्ट मांगी।
शहरी सुरक्षा: खराब अपशिष्ट प्रबंधन आवारा कुत्तों के लिए “खाद्य सुरक्षा” का कार्य करता है, जिससे मानव-पशु संघर्ष बढ़ता है।
रणनीतिक स्वायत्तता: भारत-यूरोपीय संघ FTA साबित करता है कि प्रमुख लोकतांत्रिक गुट बाहरी हस्तक्षेप के बिना समझौते कर सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा: फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल अस्थिरता का खतरा है, जिससे भारत का राजकोषीय घाटा प्रभावित हो सकता है।
GS-4
सुरक्षा की नैतिकता
सार्वजनिक सुरक्षा बनाम प्रशासनिक उदासीनता: कोलकाता की आग नागरिक क्षय का एक स्पष्ट प्रमाण है। जब सुविधा के लिए सुरक्षा मानदंडों की अनदेखी की जाती है, तो सबसे कमजोर वर्ग—प्रवासी श्रमिक—संस्थागत विफलता की भारी कीमत चुकाते हैं।

यहाँ 2026 के लिए अद्यतन (Updated) संरक्षण स्थलों और रणनीतिक औद्योगिक गलियारों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है।

UPSC और राज्य PCS 2026 की परीक्षाओं के लिए ये बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से भारत के पारिस्थितिक और आर्थिक मानचित्र में हुए नवीनतम बदलावों को ट्रैक करने के लिए।

2026 की शुरुआत तक, भारत ने 96 रामसर स्थलों का मील का पत्थर हासिल कर लिया है, जिससे यह दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुँच गया है।

नया रामसर स्थलराज्यमुख्य महत्व
कोपरा जलाशयछत्तीसगढ़सबसे हालिया जुड़ाव (2025 के अंत में); बिलासपुर के पास प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण।
सिलीसेढ़ झीलराजस्थान2025 के अंत में नामित; अलवर में स्थित, यह एक महत्वपूर्ण मीठे पानी का आवास है।
गोगाबील झीलबिहारभारत का 94वाँ स्थल; गंगा-कोसी प्रणाली में एक प्रमुख गोखुर झील (Oxbow lake)
नंजरायण अभयारण्यतमिलनाडुकावेरी बेसिन में स्थित; ‘सेंट्रल एशियन फ्लाईवे’ (प्रवास मार्ग) का समर्थन करता है।

मैपिंग टिप: वर्तमान में तमिलनाडु 20 रामसर स्थलों के साथ देश में सबसे आगे है, उसके बाद उत्तर प्रदेश (10) का स्थान है। बिहार और ओडिशा 6-6 स्थलों के साथ इसके बाद आते हैं।

भारत में 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें से 13 अब यूनेस्को (UNESCO) के विश्व नेटवर्क के तहत मान्यता प्राप्त हैं।

  • कोल्ड डेजर्ट (हिमाचल प्रदेश): 2025 में यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त; यह हिम तेंदुआ (Snow Leopard) और हिमालयी साकिन (Ibex) की रक्षा करता है।
  • नीलगिरी BR (TN/KL/KN): भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (1986); इसमें ‘साइलेंट वैली’ और ‘बांदीपुर’ उद्यान शामिल हैं।
  • कच्छ का महान रण (गुजरात): भारत का सबसे बड़ा जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।
  • डिब्रू-सैखोवा (असम): भारत का सबसे छोटा जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।

राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम (NICDP) भारत के विकास के लिए एक “एकीकृत स्थानिक रीढ़” तैयार कर रहा है।

गलियारा (Corridor)मुख्य मार्गरणनीतिक नोड्स (Nodes)
DMICदिल्ली-मुंबई (1,504 किमी)धोलेरा (GJ), ऑरिक (MH), ग्रेटर नोएडा (UP)।
AKICअमृतसर-कोलकातागया (BR), खुरपिया (UK), राजपुरा (PB)।
CBICचेन्नई-बेंगलुरुकृष्णपट्टनम (AP), तुमकुरु (KN)।
ECECपूर्वी तट आर्थिक गलियाराविजाग-चेन्नई (चरण 1); NH-5 का अनुसरण करता है।
  • मिग ला दर्रा (Mig La Pass), लद्दाख: हाल ही में 19,400 फीट की ऊंचाई पर खोला गया, यह अब दुनिया का सबसे ऊँचा मोटर योग्य दर्रा है, जिसने ‘उमलिंग ला’ को पीछे छोड़ दिया है।
  • चिनाब रेलवे ब्रिज (जम्मू-कश्मीर): दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल (359 मीटर); यह कश्मीर घाटी को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करता है।
  • नवी मुंबई हवाई अड्डा: ‘वॉटर टैक्सी’ (Water Taxi) से जुड़ा भारत का पहला हवाई अड्डा।
विशेषतामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
नवीनतम BR (UNESCO)कोल्ड डेजर्टहिमाचल प्रदेश
सबसे ऊँचा मोटर मार्गमिग ला दर्रालद्दाख
सबसे छोटा BRडिब्रू-सैखोवाअसम
रामसर स्थलों में अग्रणीतमिलनाडु20 रामसर साइट्स

औद्योगिक गलियारों को मैप करते समय उनके पास स्थित प्रमुख बंदरगाहों और हवाई अड्डों को भी चिह्नित करें। उदाहरण के लिए, DMIC सीधे JNPT बंदरगाह से जुड़ता है, जो इसके निर्यात-आयात लॉजिस्टिक्स के लिए महत्वपूर्ण है।

मानचित्रण विवरण

संरक्षण और रणनीतिक गलियारे
रामसर स्थल 96 आर्द्रभूमि मील के पत्थर

तमिलनाडु 20 स्थलों के साथ अग्रणी है। हाल के प्रमुख जुड़ावों में कोपरा जलाशय (छ.ग.) और सिलीसेढ़ झील (रा.) शामिल हैं।

जैवमंडल नेटवर्क यूनेस्को (UNESCO) अपडेट

शीत मरुस्थल (हि.प्र.) नवीनतम यूनेस्को जुड़ाव (2025) है। डिब्रू-सैखोवा सबसे छोटा रिजर्व बना हुआ है।

औद्योगिक गलियारे (NICDP)
एकीकृत स्थानिक आधार

DMIC (दिल्ली-मुंबई) धोलेरा और AURIC जैसे नोड्स को जोड़ता है। AKIC (अमृतसर-कोलकाता) गया और राजपुरा को एक विशाल पूर्वी आर्थिक धमनी में एकीकृत करता है।

रणनीतिक बुनियादी ढांचा
2026 कनेक्टिविटी की ऊंचाइयां

मिग ला दर्रा (लद्दाख) अब 19,400 फीट पर दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरमार्ग है। चेनाब रेल ब्रिज कश्मीर घाटी को सबसे ऊंचा संरचनात्मक लिंक प्रदान करता है।

तटीय अर्थव्यवस्था

ECEC (पूर्वी तट) चरण 1 विजाग-चेन्नई अक्ष पर केंद्रित है, जो तीव्र बंदरगाह-आधारित औद्योगिकीकरण के लिए NH-5 का उपयोग करता है।

नवीनतम BR शीत मरुस्थल यूनेस्को (HP)
सबसे ऊंचा दर्रा मिग ला दर्रा (लद्दाख)
आर्द्रभूमि अग्रणी तमिलनाडु (20 स्थल)
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 2026 के मानचित्रण के लिए रामसर स्थलों की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को NICDP गलियारों की औद्योगिक तीव्रता के साथ संतुलित करने की आवश्यकता है। GS-III विश्लेषण के लिए DMIC और अरावली संरक्षण क्षेत्रों के मिलन बिंदु की पहचान करें।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 28 जनवरी 2026 (Hindi)

अध्याय 2, “व्यापार से साम्राज्य तक“, बताता है कि कैसे इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक छोटे व्यापारिक निकाय से भारत में प्रमुख राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गई।

  • शक्ति का शून्य होना: 1707 में अंतिम शक्तिशाली मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु के बाद, विभिन्न मुगल गवर्नरों (सूबेदारों) और बड़े जमींदारों ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और अपने क्षेत्रीय राज्य स्थापित कर लिए।
  • प्रतीकात्मक महत्व: हालाँकि दिल्ली अब एक प्रभावी केंद्र के रूप में नहीं रही, लेकिन मुगल सम्राटों का प्रतीकात्मक महत्व बना रहा। उदाहरण के लिए, 1857 के विद्रोह के समय विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफ़र को ही अपना स्वाभाविक नेता माना था।
  • रॉयल चार्टर (1600): 1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से एक ‘इजाज़तनामा’ (चार्टर) प्राप्त किया, जिसने कंपनी को पूर्व के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दे दिया। इसका अर्थ था कि इंग्लैंड की कोई अन्य व्यापारिक कंपनी इसके साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती थी।
  • वाणिज्यिक नीति (Mercantilism): कंपनी का व्यावसायिक मॉडल भारत से कम कीमत पर सामान खरीदना और उन्हें यूरोप में ऊँची कीमतों पर बेचना था।
  • व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता: अंग्रेजों को अन्य यूरोपीय शक्तियों—पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी से कड़ी टक्कर मिली। सभी कंपनियाँ भारत के उच्च गुणवत्ता वाले सूती कपड़े, रेशम और मसालों (काली मिर्च, लौंग, इलायची और दालचीनी) को खरीदना चाहती थीं।
  • किलेबंदी और संघर्ष: प्रतिस्पर्धा के कारण इन कंपनियों के बीच “व्यापारिक युद्ध” शुरू हो गए। वे एक-दूसरे के जहाज डुबो देते और अपने व्यापारिक केंद्रों की किलेबंदी करते थे, जिससे स्थानीय भारतीय शासकों के साथ उनका टकराव होने लगा।
  • पहली फैक्ट्री: अंग्रेजों की पहली व्यापारिक फैक्ट्री 1651 में हुगली नदी के तट पर स्थापित की गई।
  • जमींदारी अधिकार: 1696 तक कंपनी ने अपनी बस्ती के चारों ओर एक किला बनाना शुरू कर दिया और मुगल अधिकारियों को रिश्वत देकर तीन गाँवों की जमींदारी हासिल कर ली, जिनमें से एक ‘कालिकाता’ (बाद में कोलकाता) था।
  • शुल्क मुक्त व्यापार: कंपनी ने सम्राट औरंगजेब को एक ‘फरमान’ जारी करने के लिए मना लिया, जिसने कंपनी को बिना शुल्क चुकाए व्यापार करने का अधिकार दिया। हालाँकि, कंपनी के अधिकारी अपने निजी व्यापार के लिए भी इसका उपयोग करने लगे और कर नहीं चुकाते थे, जिससे बंगाल के राजस्व को भारी नुकसान हुआ।
  • नवाबों के साथ टकराव: औरंगजेब की मृत्यु के बाद, बंगाल के नवाबों (मुर्शिद कुली खान, अलीवर्दी खान और सिराजुद्दौला) ने कंपनी को रियायतें देने से मना कर दिया, बड़ी भेंट माँगी और किलेबंदी बढ़ाने पर रोक लगा दी।
  • प्लासी का युद्ध (1757): यह भारत में कंपनी की पहली बड़ी जीत थी। रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला के खिलाफ कंपनी की सेना का नेतृत्व किया। नवाब की हार का मुख्य कारण उनके सेनापति मीर जाफर की गद्दारी थी, जिसे अंग्रेजों ने नवाब बनाने का वादा किया था।
  • कठपुतली शासक: प्लासी के बाद अंग्रेजों ने व्यापारिक लाभ सुनिश्चित करने के लिए मीर जाफर और बाद में मीर कासिम जैसे “कठपुतली” नवाबों को गद्दी पर बैठाया।
  • बक्सर का युद्ध (1764): जब मीर कासिम ने कंपनी के हस्तक्षेप का विरोध किया, तो उसे बक्सर के युद्ध में हराया गया। इसके बाद कंपनी ने निर्णय लिया कि “अब हमें खुद ही नवाब बनना होगा।”
  • दीवानी अधिकार (1765): 1765 में मुगल सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल प्रांत का ‘दीवान’ नियुक्त किया। इससे कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्रण मिल गया, जिसका उपयोग वे अपने व्यापार और सेना के खर्च के लिए करने लगे।
  • रेजिडेंट प्रणाली: सीधे सैन्य हमलों के बजाय, कंपनी ने भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए ‘रेजिडेंट’ नामक राजनीतिक और व्यावसायिक एजेंटों की नियुक्ति की।
  • सहायक संधि (Subsidiary Alliance): रिचर्ड वेलेज़ली द्वारा शुरू की गई इस नीति के तहत, भारतीय राजाओं को अपनी स्वतंत्र सेना रखने की अनुमति नहीं थी। उन्हें कंपनी की “सहायक सेना” के रखरखाव का खर्च उठाना पड़ता था। भुगतान न करने पर उनका इलाका छीन लिया जाता था।
  • टीपू सुल्तान (मैसूर का शेर): हैदर अली और टीपू सुल्तान के नेतृत्व में मैसूर बहुत शक्तिशाली हो गया था। टीपू ने अपने बंदरगाहों से चंदन और मसालों के निर्यात को रोक दिया। अंग्रेजों के साथ चार युद्ध हुए और अंततः 1799 में अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान मारे गए।
  • मराठों से युद्ध: अंग्रेजों ने युद्धों की एक श्रृंखला के माध्यम से मराठों को कमजोर किया। तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-19) ने मराठा शक्ति को पूरी तरह कुचल दिया और पेशवा के पद को समाप्त कर दिया।
  • विलय की नीति (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी द्वारा शुरू की गई इस नीति के अनुसार, यदि किसी भारतीय शासक की मृत्यु बिना किसी पुरुष उत्तराधिकारी के होती थी, तो उसका राज्य कंपनी के क्षेत्र का हिस्सा बन जाता था। इसी तरह सतारा, संबलपुर, उदयपुर और अंत में अवध का विलय किया गया।
  • प्रेसिडेंसी: अंग्रेजों ने अपने क्षेत्रों को तीन प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया, जिन्हें ‘प्रेसिडेंसी’ कहा जाता था: बंगाल, मद्रास और बंबई। प्रत्येक का शासन एक गवर्नर द्वारा चलाया जाता था।
  • न्याय व्यवस्था: 1772 से एक नई न्याय प्रणाली स्थापित की गई, जिसके तहत प्रत्येक जिले में दो अदालतें बनाई गईं: एक फौजदारी अदालत (Criminal Court) और एक दीवानी अदालत (Civil Court)।
  • कलेक्टर: जिले का मुख्य अधिकारी ‘कलेक्टर’ होता था, जिसका मुख्य कार्य राजस्व एकत्र करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।
  • कंपनी की सेना: अंग्रेजों ने भारतीय किसानों को प्रशिक्षित करके एक पेशेवर पैदल सेना तैयार की, जिन्हें ‘सिपाही’ (Sepoy) कहा जाता था। युद्ध की तकनीक बदलने के साथ, घुड़सवारों का महत्व कम हो गया और मस्कट व मैचलॉक (बंदूकें) से लैस पैदल सेना का महत्व बढ़ गया।

निष्कर्ष: इस प्रकार, एक व्यापारिक कंपनी के रूप में आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी कूटनीति, व्यापारिक नीतियों और सैन्य शक्ति के बल पर पूरे भारत को अपने नियंत्रण में ले लिया।

NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 2

व्यापार से साम्राज्य तक

सत्ता का शून्य
1707 के बाद: औरंगजेब के बाद, क्षेत्रीय नवाबों और ज़मींदारों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए।
वाणिज्यिकवाद: कंपनी का मॉडल भारतीय सामान सस्ते में खरीदने और यूरोप में ऊंचे मुनाफे पर बेचने पर आधारित था।
शुरुआती घर्षण
शुल्क मुक्त व्यापार: शाही फरमानों के दुरुपयोग से बंगाल के नवाबों को भारी राजस्व हानि हुई।
किलाबंदी: व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण कंपनी ने अपनी चौकियों को सशस्त्र बनाया, जिससे स्थानीय शासकों के साथ संघर्ष हुआ।
विस्तार और विजय
प्लासी का युद्ध (1757): प्रमुख निर्णायक मोड़; मीर जाफर के विश्वासघात के बाद सिराजुद्दौला की हार हुई।
बक्सर का युद्ध (1764): इसके कारण 1765 में दीवानी अधिकार मिले, जिससे कंपनी को बंगाल का विशाल भू-राजस्व इकट्ठा करने की अनुमति मिली।
सहायक संधि: राज्यों को ब्रिटिश सेना के रख-रखाव के लिए भुगतान करने को मजबूर किया गया; विफल होने पर क्षेत्र कंपनी को सौंपना पड़ता था।
टीपू सुल्तान: ‘मैसूर के शेर’ ने 1799 में वीरगति प्राप्त करने से पहले ब्रिटिश व्यापारिक एकाधिकार को रोकने के लिए चार युद्ध लड़े।
विलय नीति (Doctrine of Lapse): डलहौजी की नीति जिसके तहत यदि कोई शासक बिना पुरुष उत्तराधिकारी के मर जाता, तो उसका राज्य (जैसे अवध) हड़प लिया जाता था।

फरमान

एक शाही आदेश, जैसे कि शुल्क मुक्त व्यापार अधिकार प्रदान करने वाला आदेश।

रेजीडेंट

भारतीय दरबारों में तैनात राजनीतिक एजेंट जो राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते थे।

सिपाही

पेशेवर पैदल सेना (Sepoys) के रूप में भर्ती और प्रशिक्षित किए गए भारतीय किसान।

कंपनी से राज्य तक
ईस्ट इंडिया कंपनी की यात्रा एक अनूठा ऐतिहासिक बदलाव था जहाँ एक व्यापारिक संस्था ने सैन्य तकनीक और राजनीतिक हेरफेर का उपयोग करके एक उपमहाद्वीप का संप्रभु स्वामी बनने का सफर तय किया।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-2 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: व्यापार से साम्राज्य तक

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उपराष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है। भारत में यह पद अमेरिकी उपराष्ट्रपति की तर्ज पर बनाया गया है, जो राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में “स्टैंडबाय” (विकल्प) के रूप में कार्य करता है।

  • अनुच्छेद 63: इसमें कहा गया है कि “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।”
  • दोहरी भूमिका: उपराष्ट्रपति दो क्षमताओं में कार्य करता है:
    1. राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) के रूप में।
    2. राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में।

राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति भी जनता द्वारा सीधे नहीं, बल्कि एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।

  • इसमें संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं।
  1. इसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं।
  2. इसमें राज्यों की विधानसभाओं के सदस्य (विधायक/MLAs) शामिल नहीं होते।
  • आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा।
  • मतदान गुप्त मतदान के माध्यम से होता है।

उपराष्ट्रपति पद के लिए पात्र होने के लिए व्यक्ति को:

  1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर लेनी चाहिए।
  3. राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए योग्य होना चाहिए। (ध्यान दें: राष्ट्रपति के लिए लोकसभा की योग्यता अनिवार्य है)।
  4. केंद्र, राज्य या किसी स्थानीय प्राधिकरण के अधीन किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए।
  • कार्यकाल: पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष
  • त्यागपत्र: वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
  • हटाने की प्रक्रिया: उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए औपचारिक “महाभियोग” की आवश्यकता नहीं होती।
    • हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही पेश किया जा सकता है।
    • इसे राज्यसभा द्वारा प्रभावी बहुमत (Effective Majority) से पारित किया जाना चाहिए और लोकसभा द्वारा साधारण बहुमत से सहमति दी जानी चाहिए।
    • प्रस्ताव लाने से पहले 14 दिन का नोटिस देना अनिवार्य है।

उपराष्ट्रपति की दो मुख्य कार्यात्मक भूमिकाएँ हैं:

  • उनकी शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के समान होते हैं।
  • वह सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं और सदन की गरिमा व व्यवस्था बनाए रखते हैं।
  • निर्णायक मत (Casting Vote): वह सामान्यतः मतदान नहीं करते, लेकिन मत बराबर होने की स्थिति में वह निर्णायक मत दे सकते हैं।
  • राष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने की स्थिति में वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।
  • जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, तो वे राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों का पालन नहीं करते (उस समय उपसभापति यह कार्य संभालते हैं)।
  • इस अवधि के दौरान उन्हें राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और वेतन-भत्ते प्राप्त होते हैं।
अनुच्छेदकीवर्डमुख्य प्रावधान
63पदभारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
64सभापतिवह राज्यसभा का पदेन सभापति होगा।
65स्टैंडबायराष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक राष्ट्रपति।
66चुनावसंसद के सभी सदस्य (निर्वाचित + मनोनीत) वोट देते हैं।
67कार्यकाल5 वर्ष का कार्यकाल और पद से हटाने की प्रक्रिया।
69शपथराष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा दिलाई जाती है।
71विवादउपराष्ट्रपति चुनाव से जुड़े विवादों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट करेगा।

हमेशा याद रखें कि उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति तो होता है, लेकिन वह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता। इसीलिए वह पहली बार में वोट नहीं दे सकता।

संवैधानिक पद • अनु. 63-71
भारत के उपराष्ट्रपति

निर्वाचन, भूमिका और पदच्युति

पात्रता
भारत का नागरिक होना चाहिए, आयु 35+ वर्ष, और राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के लिए पात्र होना चाहिए।
दोहरी भूमिका
राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में और ‘स्टैंडबाय’ कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।
निर्वाचन (अनु. 66)
निर्वाचक मंडल: इसमें संसद के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं। राष्ट्रपति के विपरीत, राज्यों के विधायक (MLAs) इसमें शामिल नहीं होते हैं।
प्रक्रिया: गुप्त मतदान के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत पद्धति
पदच्युति प्रक्रिया (अनु. 67)
प्रस्ताव अनिवार्य रूप से राज्यसभा (प्रभावी बहुमत) में शुरू होना चाहिए और 14 दिनों के नोटिस के बाद लोकसभा (साधारण बहुमत) द्वारा सहमत होना चाहिए।

सभापति की शक्तियाँ

कार्यवाही की अध्यक्षता करना, मर्यादा बनाए रखना, और मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग करना।

कार्यवाहक राष्ट्रपति

रिक्तियों के दौरान, राष्ट्रपति की सभी शक्तियों और उपलब्धियों का आनंद लेते हैं; इस अवधि में सभापति के कर्तव्यों को त्याग देते हैं।

निर्वाचन विवाद

अनु. 71 के तहत, उपराष्ट्रपति चुनावों के संबंध में सभी विवादों की जांच और निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है।

कानूनी
तथ्य
उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है (अनु. 67)। पद पर रहते हुए वे कोई लाभ का पद धारण नहीं कर सकते। पदभार ग्रहण करने पर, शपथ (अनु. 69) विशेष रूप से राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा दिलाई जाती है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (28 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बाहरी क्षेत्र; विनिमय दर प्रबंधन) और GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: पूर्व आरबीआई गवर्नर सी. रंगराजन ने अप्रैल 2025 से रुपये के मूल्य में आई 6% की गिरावट का विश्लेषण किया है, जिसका मुख्य कारण आर्थिक के बजाय राजनयिक कारकों को बताया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • पूंजी का बहिर्वाह (Capital Outflow): पिछले संकटों के विपरीत, वर्तमान गिरावट $3,900 मिलियन के शुद्ध पूंजी बहिर्वाह के कारण है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में $10,615 मिलियन का निवेश आया था।
    • अमेरिकी टैरिफ दबाव: ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात पर 50% शुल्क और ईरान के साथ व्यापार करने पर 25% अतिरिक्त शुल्क की धमकी से बाजार में डर पैदा हो गया है।
    • अवमूल्यन (Devaluation) समाधान नहीं: भारत के निर्यात में आयातित वस्तुओं का हिस्सा बढ़ रहा है, इसलिए रुपये के अवमूल्यन से अब उतना लाभ नहीं होता, बल्कि यह कच्चे तेल के आयात को महंगा बनाकर मुद्रास्फीति (महंगाई) को बढ़ाता है।
    • कूटनीति की ओर बदलाव: चूंकि इस बार अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि जैसे कोई स्पष्ट आर्थिक कारण नहीं हैं, इसलिए समाधान अब आर्थिक क्षेत्र से हटकर राजनयिक मंच पर आ गया है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • अस्थिरता की नई परिभाषा: संपादकीय का तर्क है कि आरबीआई को यह स्पष्ट करना चाहिए कि “अस्थिरता कम करने” का अर्थ केवल उतार-चढ़ाव को रोकना नहीं, बल्कि एक स्थिर गिरावट को भी नियंत्रित करना है।
    • भू-राजनीतिक शस्त्रीकरण: चूंकि टैरिफ का उपयोग भू-राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है, इसलिए भारत को पूंजी प्रवाह को स्थिर करने के लिए अमेरिका के साथ राजनयिक समझ विकसित करनी होगी।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का निष्कर्ष और “2030 के लिए व्यापक रणनीतिक एजेंडा” का शुभारंभ।
  • मुख्य बिंदु:
    • आपूर्ति श्रृंखला से आगे: यह समझौता “विषम एकीकरण” (Heterogeneous integration – उन्नत सेमीकंडक्टर पैकेजिंग) और चिप डिजाइन में संयुक्त अनुसंधान और विकास (R&D) पर केंद्रित है।
    • AI सुरक्षा समन्वय: यह सुरक्षित और मानव-केंद्रित AI मॉडल विकसित करने के लिए यूरोपीय AI कार्यालय को भारत के राष्ट्रीय AI मिशन से जोड़ता है।
    • ब्लू वैलीज़ (Blue Valleys): ऐसे नियामक क्षेत्रों का निर्माण जहाँ भारतीय मानक यूरोपीय मानकों के अनुरूप होंगे, जिससे भारतीय पुर्जे बिना नई प्रमाणपत्र प्रक्रिया के यूरोपीय आपूर्ति श्रृंखला में शामिल हो सकेंगे।
    • वित्तीय एकीकरण: भारत “क्षितिज यूरोप” (Horizon Europe) के साथ जुड़ने की संभावना तलाशेगा, जिससे भारतीय चिप स्टार्टअप्स को यूरोपीय संघ के €95.5-बिलियन के शोध बजट तक पहुंच मिल सकेगी।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • डिजाइनर बनाम भौतिक पूंजी: यह समझौता भारत की डिजाइन प्रतिभा (दुनिया का 20% हिस्सा) को यूरोप के भौतिक अनुसंधान बुनियादी ढांचे (IMEC/Fraunhofer) के साथ जोड़ता है ताकि अमेरिकी बौद्धिक संपदा पर निर्भरता कम हो सके।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; औद्योगिक नीति; विनिर्माण क्षेत्र)।

  • संदर्भ: एक विश्लेषण कि क्यों केवल पूंजीगत सहायता बैटरी सेल और सौर विनिर्माण के लिए एक मजबूत घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में विफल हो रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • अपस्ट्रीम अड़चनें (Upstream Bottlenecks): जहाँ असेंबली (Downstream) का लक्ष्य 56% पूरा हो गया है, वहीं पॉलीसिल्कन और वेफर विनिर्माण (Upstream) जैसे महत्वपूर्ण खंड अपने लक्ष्य का केवल 14% और 10% ही हासिल कर पाए हैं।
    • बैटरी उत्पादन की धीमी गति: ₹18,000 करोड़ के परिव्यय के बावजूद, लक्षित 50 GWh क्षमता में से केवल 2.8% (1.4 GWh) ही चालू हो पाई है।
    • वीजा मुद्दे: इन उच्च विशिष्ट सुविधाओं को स्थापित करने के लिए आवश्यक चीनी तकनीकी विशेषज्ञों को वीजा जारी करने में सरकार की हिचकिचाहट एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
    • सख्त समय सीमा: कई कंपनियों को समय सीमा चूकने पर भारी जुर्माने का सामना करना पड़ रहा है, जो नीतिगत महत्वाकांक्षा और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को दर्शाता है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • मानदंडों पर पुनर्विचार: संपादकीय सुझाव देता है कि PLI योजना में सफल क्रियान्वयन के लिए कंपनियों की ‘नेट वर्थ’ के बजाय उनकी “विशेषज्ञता और तकनीकी जानकारी” (Technical know-how) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार; श्रम सुधार) और GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय)।

  • संदर्भ: चार श्रम संहिताएं नवंबर 2025 में लागू हुईं, जिनका उद्देश्य 29 केंद्रीय कानूनों को एकीकृत करना और अनुपालन को सरल बनाना है।
  • मुख्य बिंदु:
    • युवा बेरोजगारी संकट: PLFS डेटा के अनुसार युवा बेरोजगारी 10.2% है, जिसमें भारी लैंगिक अंतर है—केवल 28.8% युवा महिलाएं श्रम शक्ति में शामिल हैं।
    • अनौपचारिकता का जाल: लगभग 90% युवा श्रमिक अनौपचारिक रूप से नियोजित हैं, और नियमित वेतन वाली नौकरियों में लगे 60.5% लोगों के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है।
    • सांविधिक न्यूनतम मजदूरी: राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी (Floor Wage) की शुरुआत से कम वेतन वाली शुरुआती नौकरियों में कमाई बढ़ने की उम्मीद है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • गिग वर्कर (Gig Worker) की मान्यता: पहली बार, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों (जिनकी संख्या 2029-30 तक 2.35 करोड़ होने का अनुमान है) को कानून में मान्यता दी गई है और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का प्रावधान किया गया है।
    • अनुबंधात्मक असुरक्षा: 66.1% नियमित युवा श्रमिकों के पास कोई लिखित अनुबंध नहीं है, जो उन्हें नौकरी से अचानक निकाले जाने के प्रति संवेदनशील बनाता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; दक्षिण अमेरिकी भू-राजनीति)।

  • संदर्भ: वेनेजुएला में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के “खुले साम्राज्यवाद” की आलोचना, जिसमें नौसैनिक घेराबंदी और पूर्व राष्ट्राध्यक्ष की गिरफ्तारी शामिल है।
  • मुख्य बिंदु:
    • तेल पर नियंत्रण: संपादकीय का तर्क है कि अमेरिकी कार्रवाई लोकतंत्र के बारे में नहीं, बल्कि वेनेजुएला के विशाल तेल संसाधनों पर विशेष नियंत्रण सुरक्षित करने के बारे में है।
    • नव-औपनिवेशिक तर्क: वाशिंगटन का लक्ष्य मौजूदा सरकारी ढांचे पर कब्जा करना और उसके कार्यों को अपने अनुसार निर्देशित करना है, ताकि इराक जैसे सीधे कब्जे की लागत से बचा जा सके।
    • “डोनरो डॉक्ट्रिन” (Donroe Doctrine): इसे मोनरो सिद्धांत के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ यह एकपक्षीय कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था की नींव को खतरे में डालती है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • दोहरे मानक: अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यूक्रेनी संप्रभुता के उल्लंघन के लिए रूस की निंदा की, लेकिन पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी अतिक्रमण पर “मौन” बना हुआ है।
    • ग्लोबल साउथ (Global South) को खतरा: लेख चेतावनी देता है कि यदि इस मिसाल को चुनौती नहीं दी गई, तो ग्लोबल साउथ का कोई भी देश बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित नहीं रह पाएगा।

संपादकीय विश्लेषण

28 जनवरी, 2026
GS-2 IR / GS-3 तकनीक भारत-यूरोपीय संघ FTA: टेक 2030

सेमीकंडक्टर्स में हेटरोजीनियस इंटीग्रेशन की ओर बदलाव। भारतीय स्टार्टअप्स को €95.5-बिलियन के होराइजन यूरोप बजट तक संभावित पहुंच मिलेगी।

GS-3 उद्योग विनिर्माण PLI की चुनौतियां

अपस्ट्रीम वेफर विनिर्माण लक्ष्य का केवल 10%। केवल पूंजीगत सहायता बैटरी सेल में दशक भर पुराने R&D अंतर को पाट नहीं सकती।

GS-2 IR डोनरो सिद्धांत (Donroe Doctrine)

वेनेजुएला की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का नग्न साम्राज्यवाद के रूप में विश्लेषण। लोकतांत्रिक स्थिरता के बजाय तेल संसाधनों पर नियंत्रण पर ध्यान।

अर्थव्यवस्था: भारत के निर्यात में उच्च आयात-सामग्री के कारण अवमूल्यन मुद्रास्फीति को बढ़ावा देता है; कूटनीति अब नया उपचार है।
तकनीकी कूटनीति: ‘ब्लू वैली’ नियामक क्षेत्र भारतीय घटकों को यूरोपीय संघ की आपूर्ति श्रृंखलाओं में निर्बाध रूप से प्रवेश करने की अनुमति देंगे।
श्रम: युवा रोजगार में अनौपचारिकता के जाल को सुलझाने के लिए निश्चित अवधि के श्रमिकों के लिए समानता अनिवार्य करना आवश्यक है।
ग्लोबल साउथ: पश्चिमी गोलार्ध में संप्रभुता का उल्लंघन नियम-आधारित व्यवस्था की नींव के लिए खतरा है।
GS-4
वैश्विक नैतिकता
यथार्थवाद बनाम संप्रभुता: व्यापार का हथियारकरण और नौसैनिक नाकेबंदी आत्मनिर्णय के अधिकार पर नैतिक प्रश्न उठाती है। हस्तक्षेपवाद पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी वैश्विक शासन में सार्वभौमिक नैतिक मानकों को अवैध बनाने का जोखिम पैदा करती है।

यहाँ भारत की प्रमुख मृदा (मिट्टी) के प्रकारों और कृषि पेटियों का विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। यह आपकी UPSC और राज्य PCS 2026 की तैयारी के लिए एक अनिवार्य विषय है, क्योंकि यह भूगोल और अर्थव्यवस्था के बीच के स्थानिक संबंध को दर्शाता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारतीय मिट्टी को 8 प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। मानचित्रण के लिए इन शीर्ष 4 समूहों पर ध्यान केंद्रित करें, जो भारत की 80% से अधिक भूमि को कवर करते हैं।

मृदा का प्रकारभौगोलिक वितरणमानचित्रण मुख्य बिंदु
जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)उत्तरी मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र) और तटीय डेल्टा।सबसे व्यापक (लगभग 43%); इसे खादर (नई जलोढ़) और भांगर (पुरानी जलोढ़) में विभाजित किया गया है।
काली मृदा (Black Soil)दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक के हिस्से)।इसे ‘रेगुर’ या ‘काली कपास मृदा’ भी कहा जाता है; यह लोहा, चूना और मैग्नीशियम से भरपूर होती है।
लाल और पीली मृदापूर्वी और दक्षिणी दक्कन पठार (ओडिशा, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु)।फेरिक ऑक्साइड के कारण इसका रंग लाल होता है; जलयोजित रूप (Hydrated form) में यह पीली दिखाई देती है।
लेटराइट मृदा (Laterite Soil)पश्चिमी और पूर्वी घाट की चोटियाँ (केरल, कर्नाटक, ओडिशा, असम की पहाड़ियाँ)।भारी वर्षा के कारण तीव्र निक्षालन (Leaching) से निर्मित; यह अम्लीय और मोटे दाने वाली होती है।

कृषि मानचित्रण यह पहचानता है कि मिट्टी और जलवायु के आधार पर प्राथमिक खाद्य और नकदी फसलें कहाँ केंद्रित हैं।

  • गेहूँ पेटी (उत्तर-पश्चिम):
    • प्रमुख राज्य: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश।
    • मृदा फोकस: दोमट जलोढ़ मृदा (Loamy Alluvial Soil)।
  • चावल पेटी (पूर्व और दक्षिण):
    • प्रमुख राज्य: पश्चिम बंगाल (सबसे बड़ा उत्पादक), उत्तर प्रदेश, पंजाब और आंध्र प्रदेश।
    • मृदा फोकस: चीकायुक्त जलोढ़ मृदा (Clayey Alluvial Soil)।
  • कपास पेटी (काली मिट्टी का क्षेत्र):
    • प्रमुख राज्य: महाराष्ट्र, गुजरात और तेलंगाना।
    • मृदा फोकस: रेगुर (काली) मृदा।
  • गन्ना पेटी:
    • उत्तर भारत: उत्तर प्रदेश (सर्वाधिक क्षेत्रफल)।
    • दक्षिण भारत: महाराष्ट्र और कर्नाटक (समुद्री प्रभाव के कारण यहाँ प्रति हेक्टेयर पैदावार अधिक होती है)।
  • चाय (Tea): असम की पहाड़ियों (ब्रह्मपुत्र घाटी), दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) और दक्षिण में नीलगिरी की पहाड़ियों में केंद्रित।
  • कॉफी (Coffee): लगभग पूरी तरह से कर्नाटक की पहाड़ियों (बाबाबूदन पहाड़ियों), केरल और तमिलनाडु में।
  • जूट (Jute): पश्चिम बंगाल का डेल्टा क्षेत्र (हुगली नदी बेल्ट) वैश्विक स्तर पर जूट उत्पादन में अग्रणी है।
फसल/मृदामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
कपास के लिए मृदादक्कन ट्रैपमहाराष्ट्र और गुजरात
चावल का केंद्रबंगाल डेल्टापश्चिम बंगाल
कॉफी की पहाड़ियाँबाबाबूदन पहाड़ियाँकर्नाटक
भारत का अन्न भंडारपंजाब और हरियाणाउत्तर-पश्चिमी मैदान

मिट्टी के वितरण को समझने के लिए इसे भारत के वर्षा मानचित्र (Rainfall Map) के साथ जोड़कर देखें। उदाहरण के लिए, जहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है, वहाँ ‘लेटराइट’ मिट्टी मिलने की संभावना अधिक होती है, और जहाँ मध्यम वर्षा होती है, वहाँ ‘जलोढ़’ मिट्टी का विस्तार पाया जाता है।

मानचित्रण विवरण

मृदा और कृषि पेटियाँ
मृदा परिच्छेदिका ICAR वर्गीकरण

जलोढ़ (43%) उत्तरी मैदानों को कवर करती है। काली मृदा (रेगुर) दक्कन ट्रैप पर हावी है, जबकि लैटेराइट घाटों के शिखरों तक ही सीमित है।

वृक्षारोपण मानचित्र चाय, कॉफी और जूट

असम घाटी चाय में अग्रणी है; बाबाबुदन पहाड़ियाँ (KT) कॉफी के लिए; और हुगली डेल्टा वैश्विक जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

प्रमुख फसल पेटियाँ
उत्तर-पश्चिम का अन्नागार

गेहूं की पेटी पूरे पंजाब और हरियाणा की दुमटी जलोढ़ मृदा पर पनपती है। इसके विपरीत, चावल की पेटी पश्चिम बंगाल और तटीय डेल्टाओं के मृण्मय जलोढ़ क्षेत्रों पर हावी है।

नकदी फसल गतिशीलता
कपास और गन्ना

कपास महाराष्ट्र और गुजरात की काली कपास मृदा में केंद्रित है। गन्ना दोहरे केंद्र प्रदर्शित करता है: उच्च रकबा वाले यूपी के मैदान और उच्च पैदावार वाला तटीय दक्षिण

लाल और पीली मृदा

पूर्वी दक्कन (ओडिशा/छत्तीसगढ़) में वितरित, जहाँ फेरिक ऑक्साइड की मात्रा परिदृश्य को अपना विशिष्ट लाल रंग देती है।

कपास केंद्र दक्कन ट्रैप (MH/GJ) को चिह्नित करें।
चावल केंद्र बंगाल डेल्टा (पश्चिम बंगाल) का पता लगाएं।
कॉफी पहाड़ियाँ बाबाबुदन पहाड़ियों (कर्नाटक) को लोकेट करें।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: उर्वरता के सूक्ष्म-मानचित्रण के लिए जलोढ़ मृदा में खादर-बांगर के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। ध्यान दें कि उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (Leaching) अम्लीय, मोटे दाने वाली लैटेराइट मृदा का निर्माण करता है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 27 जनवरी 2026 (Hindi)

अध्याय 1, “कैसे, कब और कहाँ“, इस बात की पड़ताल करता है कि हम इतिहास का अध्ययन कैसे करते हैं, जिसमें तिथियों के महत्व, काल-विभाजन की प्रक्रिया और ब्रिटिश प्रशासन द्वारा संरक्षित अभिलेखों के प्रकारों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

इतिहास वक्त के साथ आने वाले बदलावों के बारे में होता है—यह पता लगाना कि अतीत में चीजें कैसी थीं और उनमें किस तरह के बदलाव आए हैं।

  • तारीखों पर ध्यान: तारीखें तब महत्वपूर्ण हो जाती हैं जब इतिहास घटनाओं के एक विशेष समूह पर केंद्रित होता है, जैसे कि किसी राजा की ताजपोशी कब हुई, कोई युद्ध कब लड़ा गया, या कोई विशेष सरकारी नीति कब लागू की गई।
  • प्रासंगिक चयन: तारीखों का कोई भी समूह अपने आप में “महत्वपूर्ण” नहीं होता; वे केवल उन कहानियों और अतीत के पहलुओं के आधार पर महत्वपूर्ण बन जाती हैं जिन्हें इतिहासकार उजागर करना चुनते हैं। यदि हमारे अध्ययन का विषय बदल जाता है, तो महत्वपूर्ण तारीखें भी बदल जाती हैं।

इतिहासकार अतीत को अलग-अलग कालखंडों में विभाजित करने की कोशिश करते हैं ताकि किसी विशेष समय की केंद्रीय विशेषताओं और उसके प्रमुख लक्षणों को समझा जा सके।

  • जेम्स मिल का विभाजन: 1817 में स्कॉटलैंड के अर्थशास्त्री और राजनीतिक दार्शनिक जेम्स मिल ने अपनी विशाल पुस्तक ‘ए हिस्ट्री ऑफ ब्रिटिश इंडिया’ (ब्रिटिश भारत का इतिहास) में भारतीय इतिहास को तीन कालखंडों में विभाजित किया: हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश
    • मिल का मानना था कि सभी एशियाई समाज सभ्यता के मामले में यूरोप से निचले स्तर पर थे।
    • उनके अनुसार, ब्रिटिश शासन से पहले भारत में केवल धार्मिक तानाशाही, जातिगत पक्षपात और अंधविश्वास का बोलबाला था। उन्होंने तर्क दिया कि भारत को “सभ्य” बनाने के लिए ब्रिटिश शासन, संस्थाओं और कानूनों की आवश्यकता थी।
  • मिल के दृष्टिकोण की समस्याएँ: आधुनिक इतिहासकारों का तर्क है कि इतिहास के किसी भी युग को केवल शासकों के धर्म के आधार पर परिभाषित करना गलत है। उस समय समाज में विभिन्न धर्मों के लोग और विभिन्न प्रकार का जीवन एक साथ मौजूद था।
  • वैकल्पिक काल-निर्धारण: अधिकांश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को आमतौर पर प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल में विभाजित किया है। हालाँकि, इस विभाजन की भी अपनी समस्याएँ हैं क्योंकि “आधुनिक काल” को विज्ञान, तर्क, लोकतंत्र और स्वतंत्रता जैसे आधुनिक मूल्यों के उदय से जोड़ा जाता है, जबकि मध्यकाल को ऐसे समाज के रूप में देखा जाता है जहाँ ये आधुनिक विशेषताएँ मौजूद नहीं थीं।

जब एक देश दूसरे देश पर अपना प्रभुत्व स्थापित करता है और इसके परिणामस्वरूप वहां राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन आते हैं, तो इस प्रक्रिया को ‘औपनिवेशीकरण’ कहा जाता है।

  • भारत के संदर्भ में, अंग्रेजों ने स्थानीय नवाबों और राजाओं को जीतकर अपना शासन स्थापित किया।
  • उन्होंने अर्थव्यवस्था और समाज पर नियंत्रण किया, अपनी जरूरतों के लिए राजस्व (Tax) एकत्र किया, अपनी पसंद की फसलें उगाईं और भारतीय मूल्यों, रीति-रिवाजों और प्रथाओं में बदलाव किए।

भारतीय इतिहास के पिछले 250 वर्षों का विवरण लिखने के लिए इतिहासकार विभिन्न स्रोतों का उपयोग करते हैं:

  • प्रशासनिक रिकॉर्ड (आधिकारिक रिकॉर्ड): ब्रिटिश प्रशासन का मानना था कि चीजों को लिखना महत्वपूर्ण है। हर निर्देश, योजना, नीतिगत निर्णय, समझौते और जांच को स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए था।
  • अभिलेखागार और संग्रहालय: अंग्रेजों ने सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों और पत्रों को सावधानीपूर्वक सुरक्षित रखने के लिए सभी प्रशासनिक संस्थानों (जैसे कलेक्ट्रेट, तहसील, अदालतों) के साथ ‘रिकॉर्ड रूम’ (अभिलेख कक्ष) बनवाए। बाद में, भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार और राष्ट्रीय संग्रहालय जैसे विशेष संस्थान भी बनाए गए।
  • सर्वेक्षण का बढ़ता महत्व: अंग्रेजों का मानना था कि किसी देश पर प्रभावी ढंग से शासन करने के लिए उसे सही ढंग से जानना जरूरी है।
    • उन्होंने गाँवों में राजस्व सर्वेक्षण किए ताकि धरती की प्रकृति, मिट्टी की गुणवत्ता, वहां के पेड़-पौधों और फसलों के बारे में जानकारी मिल सके।
    • 19वीं सदी के अंत से, हर दस साल में ‘जनगणना’ शुरू की गई। इसके अलावा वनस्पति, प्राणी विज्ञान, पुरातत्व और मानव विज्ञान संबंधी सर्वेक्षण भी किए गए।

आधिकारिक रिकॉर्ड की अपनी सीमाएँ होती हैं:

  • अधिकारियों का नज़रिया: आधिकारिक रिकॉर्ड हमें मुख्य रूप से वही बताते हैं जो सरकारी अधिकारी सोचते थे, उनकी किन चीजों में रुचि थी और वे भविष्य के लिए किन चीजों को सुरक्षित रखना चाहते थे।
  • आम जनता की खामोशी: ये रिकॉर्ड हमें यह समझने में मदद नहीं करते कि देश के अन्य लोग (किसान, आदिवासी, मजदूर) क्या महसूस कर रहे थे या उनके कार्यों के पीछे क्या कारण थे।
  • वैकल्पिक स्रोत: आम लोगों के जीवन की जानकारी प्राप्त करने के लिए इतिहासकारों को अन्य स्रोतों की तलाश करनी पड़ती है, जैसे:
    • लोगों की निजी डायरियाँ।
    • तीर्थयात्रियों और यात्रियों के यात्रा वृत्तांत।
    • महत्वपूर्ण हस्तियों की आत्मकथाएँ।
    • स्थानीय बाज़ारों में बिकने वाली लोकप्रिय पुस्तिकाएं।
    • उस समय के समाचार पत्र और वे मुद्दे जिन पर सार्वजनिक रूप से बहस होती थी।

निष्कर्ष: जैसे-जैसे हम आधिकारिक रिकॉर्ड से आगे बढ़कर निजी स्रोतों की ओर बढ़ते हैं, हमें उन लोगों के जीवन की अधिक स्पष्ट तस्वीर मिलती है जिनका इतिहास सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं हो पाया था।

NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 1

कैसे, कब और कहाँ

काल-निर्धारण
जेम्स मिल (1817): भारतीय इतिहास को हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश काल में विभाजित किया, और एशिया को “कम सभ्य” माना।
समस्याएँ: आधुनिक इतिहासकार मिल के दृष्टिकोण को खारिज करते हैं, यह देखते हुए कि विविध धर्म हमेशा एक साथ अस्तित्व में रहे।
औपनिवेशीकरण
अधीनता: एक देश द्वारा दूसरे देश को जीतने की प्रक्रिया, जिससे राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन होते हैं।
नियंत्रण: अंग्रेजों ने अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित किया, राजस्व एकत्र किया और स्थानीय मूल्यों को बदल दिया।
स्रोत और दस्तावेज़ीकरण
आधिकारिक रिकॉर्ड: अंग्रेजों का मानना था कि हर योजना और नीति को लिखा जाना चाहिए, जिससे कागजी कार्रवाई का एक विशाल भंडार बन गया।
अभिलेखागार और संग्रहालय: महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय राष्ट्रीय अभिलेखागार जैसे विशेष संस्थान बनाए गए थे।
विस्तृत सर्वेक्षण: प्रभावी प्रशासन के लिए भारत को “जानने” हेतु राजस्व, वानस्पतिक और प्राणि-वैज्ञानिक सर्वेक्षण किए गए।
छिपे हुए दृष्टिकोण: आधिकारिक रिकॉर्ड राज्य के हितों को दर्शाते हैं; इतिहासकारों को ‘आम’ आवाजों को खोजने के लिए डायरियों और समाचार पत्रों का उपयोग करना चाहिए।

खुशनवीस

वे विशेषज्ञ जो छपाई आम होने से पहले दस्तावेजों की खूबसूरती से नकल (नक्काशी) करते थे।

जनगणना

विस्तृत जनसंख्या डेटा और जातियों को रिकॉर्ड करने के लिए हर 10 साल में आयोजित होने वाले अभियान।

स्थलाकृति

प्रारंभिक औपनिवेशिक सर्वेक्षणों के हिस्से के रूप में भूमि की भौतिक विशेषताओं का मानचित्रण करना।

तारीखों से परे
इतिहास तारीखों की सूची से कहीं अधिक है। यह परिवर्तन का एक गतिशील अध्ययन है। जबकि ब्रिटिश अभिलेखागार सत्ता का एक व्यवस्थित दृश्य प्रदान करते हैं, “कैसे” और “कहाँ” को समझने के लिए आधिकारिक स्याही से परे आम लोगों के जीवन को देखना आवश्यक है।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-1 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: कैसे, कब और कहाँ

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भारत का राष्ट्रपति कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का औपचारिक प्रमुख होता है। संविधान द्वारा राष्ट्रपति में निहित विभिन्न शक्तियों में, क्षमादान की शक्ति (अनुच्छेद 72) और आपातकालीन शक्तियाँ (अनुच्छेद 352-360) सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली मानी जाती हैं।

संविधान का अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को यह शक्ति प्रदान करता है कि वह कुछ विशिष्ट मामलों में अपराधियों को क्षमा प्रदान कर सके या उनके दंड को निलंबित, कम या बदल सके। यह शक्ति न्यायपालिका से स्वतंत्र एक कार्यकारी शक्ति है, जिसका उद्देश्य न्यायिक गलतियों को सुधारना या मानवीय आधार पर राहत प्रदान करना है।

राष्ट्रपति इन शक्तियों का प्रयोग निम्नलिखित मामलों में कर सकता है:

  • यदि दंड संघीय कानून (Union Law) के विरुद्ध किए गए अपराध के लिए दिया गया हो।
  • यदि दंड सैन्य अदालत (कोर्ट मार्शल) द्वारा दिया गया हो।
  • यदि दंड का स्वरूप मृत्युदंड (Sentence of Death) हो।
  1. क्षमा (Pardon): इसके द्वारा अपराधी को दंड और दोषसिद्धि (Conviction) दोनों से पूरी तरह मुक्त कर दिया जाता है। व्यक्ति ऐसी स्थिति में आ जाता है जैसे उसने कभी कोई अपराध किया ही न हो।
  2. लघुकरण (Commutation): इसका अर्थ है दंड के स्वरूप को बदलकर उसे हल्के स्वरूप में बदलना।
    • उदाहरण: मृत्युदंड को बदलकर कठोर कारावास में बदलना।
  3. परिहार (Remission): इसका अर्थ है दंड की प्रकृति बदले बिना उसकी अवधि (Period) को कम करना।
    • उदाहरण: 10 वर्ष के कठोर कारावास को घटाकर 5 वर्ष का कठोर कारावास करना।
  4. विराम (Respite): किसी विशेष तथ्य के कारण (जैसे दोषी की शारीरिक विकलांगता या महिला अपराधी की गर्भावस्था) मूल रूप से दी गई सजा को कम करना।
  5. प्रविलंबन (Reprieve): इसका अर्थ है किसी दंड (विशेषकर मृत्युदंड) के निष्पादन पर अस्थायी रोक लगाना। इसका उद्देश्य दोषी को राष्ट्रपति से क्षमा या लघुकरण की मांग करने के लिए समय देना होता है।
  • बाध्यकारी सलाह: राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मनमाने ढंग से नहीं कर सकता। उसे केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही कार्य करना होता है।
  • मौखिक सुनवाई नहीं: याचिकाकर्ता को राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है।
  • सीमित न्यायिक समीक्षा: उच्चतम न्यायालय (केहर सिंह और एपुरु सुधाकर मामले) ने यह स्पष्ट किया है कि राष्ट्रपति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है यदि वह निर्णय मनमाना, दुर्भावनापूर्ण या अप्रासंगिक आधारों पर लिया गया हो।

भारतीय संविधान में असाधारण स्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इन्हें तीन श्रेणियों में बांटा गया है:

  • आधार: युद्ध, बाहरी आक्रमण, या सशस्त्र विद्रोह (44वें संशोधन द्वारा ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को ‘सशस्त्र विद्रोह’ से बदल दिया गया)।
  • घोषणा: राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा तभी कर सकता है जब उसे केंद्रीय कैबिनेट (मंत्रिमंडल) से लिखित सिफारिश प्राप्त हो।
  • संसदीय स्वीकृति: इसे एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  • प्रभाव:
    • देश का संघीय ढांचा एकात्मक (Unitary) हो जाता है (केंद्र राज्यों को किसी भी विषय पर निर्देश दे सकता है)।
    • लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाया जा सकता है।
    • अनुच्छेद 359 के तहत, राष्ट्रपति मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अदालत जाने के अधिकार को निलंबित कर सकता है (अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर)।
  • आधार: यदि राष्ट्रपति को राज्यपाल से रिपोर्ट मिलने पर या अन्य किसी माध्यम से यह विश्वास हो जाए कि राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं चलाई जा सकती।
  • अनुच्छेद 365: यदि कोई राज्य संघ द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने में विफल रहता है, तो भी इसे संवैधानिक तंत्र की विफलता माना जा सकता है।
  • संसदीय स्वीकृति: इसे दो महीने के भीतर संसद द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  • प्रभाव:
    • राष्ट्रपति राज्य मंत्रिपरिषद को बर्खास्त कर देता है।
    • राज्य का राज्यपाल (राष्ट्रपति की ओर से) राज्य का प्रशासन चलाता है।
    • संसद राज्य के लिए कानून बनाती है और बजट पारित करती है।
  • आधार: यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हो कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिससे भारत की वित्तीय स्थिरता या साख (Credit) को खतरा है।
  • संसदीय स्वीकृति: इसे दो महीने के भीतर संसद द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  • प्रभाव:
    • केंद्र राज्यों को वित्तीय औचित्य के सिद्धांतों का पालन करने का निर्देश दे सकता है।
    • राष्ट्रपति केंद्र या राज्य की सेवा करने वाले सभी वर्गों के व्यक्तियों (जिनमें उच्चतम और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश भी शामिल हैं) के वेतन और भत्तों में कटौती का आदेश दे सकता है।
  • स्थिति: भारत में आज तक कभी भी वित्तीय आपातकाल की घोषणा नहीं की गई है।
शक्ति का प्रकारसंवैधानिक अनुच्छेदमुख्य उद्देश्यमहत्वपूर्ण तथ्य
क्षमादान शक्तिअनुच्छेद 72न्यायिक त्रुटियों को सुधारना या दया दिखाना।मंत्रिपरिषद की सलाह पर आधारित।
राष्ट्रीय आपातकालअनुच्छेद 352देश की सुरक्षा और अखंडता की रक्षा।लिखित सिफारिश और विशेष बहुमत आवश्यक।
राष्ट्रपति शासनअनुच्छेद 356राज्यों में संवैधानिक व्यवस्था बहाल करना।साधारण बहुमत से अनुमोदन।
वित्तीय आपातकालअनुच्छेद 360राष्ट्र की आर्थिक स्थिरता की रक्षा करना।भारत में अभी तक कभी लागू नहीं हुआ।
कार्यकारी • न्यायिक • विशेष शक्तियाँ
भारत का संविधान

क्षमादान एवं आपातकालीन शक्तियाँ

अनुच्छेद 72
राष्ट्रपति को संभावित त्रुटियों को सुधारने के लिए न्यायपालिका से स्वतंत्र क्षमादान देने का अधिकार देता है।
दायरा
यह केंद्रीय कानून के अपराधों, कोर्ट मार्शल, और मृत्युदंड के सभी मामलों में लागू होता है।
राष्ट्रीय आपातकाल (अनु. 352)
आधार: युद्ध, बाह्य आक्रमण, या सशस्त्र विद्रोह। इसके लिए कैबिनेट की लिखित सिफारिश और 1 महीने के भीतर संसद का अनुमोदन आवश्यक है।
प्रभाव: ढांचा एकात्मक हो जाता है; मौलिक अधिकारों (अनु. 20 और 21 को छोड़कर) का प्रवर्तन निलंबित किया जा सकता है।
राष्ट्रपति शासन (अनु. 356)
यदि राज्य की मशीनरी विफल हो जाती है या अनु. 365 का उल्लंघन होता है, तो इसे लागू किया जाता है। राज्यपाल राष्ट्रपति की ओर से राज्य का प्रशासन चलाते हैं।

लघुकरण (Commutation)

सजा के एक रूप को हल्के रूप में बदलना (जैसे, मृत्युदंड को कठोर कारावास में बदलना)।

परिहार (Remission)

सजा की प्रकृति बदले बिना उसकी अवधि कम करना (जैसे, 10 वर्ष के कठोर कारावास को 5 वर्ष करना)।

विराम एवं प्रविलंबन

विशेष तथ्यों (विकलांगता) के लिए सजा कम करना या मृत्युदंड के निष्पादन पर अस्थायी रोक लगाना।

वित्तीय
स्थिरता
अनुच्छेद 360 के तहत, यदि वित्तीय स्थिरता को खतरा हो तो राष्ट्रपति वित्तीय आपातकाल घोषित कर सकते हैं। हालांकि यह वेतन (न्यायाधीशों सहित) में कटौती की अनुमति देता है, लेकिन भारत में इसे आज तक कभी घोषित नहीं किया गया है

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (27 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; योजना, संसाधनों का संग्रहण, विकास और रोजगार से संबंधित मुद्दे)।

  • संदर्भ: मनरेगा (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act) को बदलने या कमजोर करने के तर्कों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण बचाव और विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • निराधार आलोचना: संपादकीय उस तर्क का खंडन करता है कि मनरेगा केवल “गड्ढे खोदने” की योजना है। यह स्पष्ट किया गया है कि 60% से अधिक कार्य प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (NRM) से संबंधित टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण की ओर ले जाते हैं।
    • स्व-लक्षित तंत्र (Self-Targeting Mechanism): योजना का डिज़ाइन—कम मजदूरी और शारीरिक श्रम—यह सुनिश्चित करता है कि यह एक सुरक्षा जाल बना रहे जो केवल उन लोगों को आकर्षित करता है जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है, जिससे यह एक कुशल “स्वचालित स्टेबलाइजर” बन जाता है।
    • ग्रामीण संकट के लिए बफर: आर्थिक झटकों या कृषि विफलताओं के दौरान, यह योजना एक महत्वपूर्ण बीमा तंत्र के रूप में कार्य करती है, जो बड़े पैमाने पर पलायन और ग्रामीण भुखमरी को रोकती है।
    • परिसंपत्ति निर्माण: हालिया डेटा सिंचाई, तालाबों के पुनरुद्धार और ग्रामीण संपर्क में महत्वपूर्ण योगदान दिखाता है, जो छोटे और सीमांत किसानों की निजी कृषि उत्पादकता को बढ़ाता है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • उत्पादक बनाम अनुत्पादक: विश्लेषण का तर्क है कि योजना को बदलने के तर्कों में “दम की कमी” इसलिए है क्योंकि वे व्यापक अर्थव्यवस्था पर ग्रामीण खर्च के ‘गुणक प्रभाव’ (Multiplier effect) को पहचानने में विफल रहते हैं।
    • श्रम बाजार पर प्रभाव: एक न्यूनतम मजदूरी आधार प्रदान करके, यह योजना ग्रामीण श्रम की ‘सौदेबाजी की शक्ति’ (Bargaining power) में सुधार करती है। इसे अक्सर बड़े भूस्वामियों द्वारा शिकायत के रूप में उद्धृत किया जाता है, लेकिन यह सामाजिक समानता के लिए सकारात्मक है।
    • फंडिंग की बाधाएं: लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि प्रशासनिक बाधाएं—जैसे भुगतान में देरी और तकनीकी बाधाएं (ABPS)—कानूनी गारंटी को पूरा करने के बजाय “मांग को कम करने” के लिए इस्तेमाल की जा रही हैं।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; संघवाद; अंतर-राज्यीय जल विवाद)।

  • संदर्भ: SYL नहर जल-बंटवारे विवाद को सुलझाने के लिए पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों के बीच बैठकों का एक नया प्रयास।
  • मुख्य बिंदु:
    • ऐतिहासिक संघर्ष: यह विवाद 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के समय का है, जिसमें हरियाणा SYL नहर के माध्यम से रावी-ब्यास जल में अपने हिस्से की मांग कर रहा है।
    • पंजाब का रुख: पंजाब का तर्क है कि उसके पास साझा करने के लिए कोई अतिरिक्त पानी नहीं है। वह गिरते भूजल स्तर और “रिपेरियन सिद्धांत” (Riparian principle – जिसके अनुसार जल पर उसी का हक है जहाँ से नदी बहती है) का हवाला देता है।
    • हरियाणा का दावा: हरियाणा का तर्क है कि उसके दक्षिणी जिले गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं और नहर का निर्माण न होना 1981 के समझौते के अनुसार उसके कानूनी अधिकारों का हनन है।
    • न्यायिक अधिदेश: सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार नहर के निर्माण का निर्देश दिया है, साथ ही केंद्र से बातचीत के माध्यम से समाधान की सुविधा प्रदान करने का आग्रह भी किया है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जल-तनावपूर्ण वास्तविकता: संपादकीय विश्लेषण करता है कि बहस अब केवल कानूनी हकदारी से हटकर दोनों राज्यों में पानी की कमी की व्यावहारिक वास्तविकता पर आ गई है, जिसका कारण जलवायु परिवर्तन और गहन कृषि है।
    • राजनीतिक अस्थिरता: यह मुद्दा दोनों राज्यों में अत्यधिक संवेदनशील है। वर्तमान जल उपलब्धता के तटस्थ और डेटा-संचालित मूल्यांकन के बिना विशुद्ध रूप से राजनीतिक समाधान मुश्किल बना हुआ है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/शिक्षा का विकास और प्रबंधन; सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप)।

  • संदर्भ: परिसरों में समानता और समावेश को बढ़ावा देने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर बढ़ता विरोध और शैक्षणिक बहस।
  • मुख्य बिंदु:
    • पक्षपात के आरोप: आलोचकों का तर्क है कि नए नियम समानता के नाम पर “वैचारिक पुलिसिंग” (Ideological policing) और शैक्षणिक स्वायत्तता (Academic autonomy) को कम करने का कारण बन सकते हैं।
    • मानकीकरण बनाम विविधता: विवाद का केंद्र यह है कि क्या नियमों का एक केंद्रीकृत सेट भारत के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों की अद्वितीय सामाजिक-सांस्कृतिक गतिशीलता को संबोधित कर सकता है।
    • संकाय चिंताएं: डर यह है कि ये नियम भर्ती प्रक्रियाओं और प्रमुख संस्थानों की “योग्यता-आधारित” (Meritocratic) परंपराओं में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
    • छात्र कल्याण: समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षा में व्याप्त व्यवस्थागत भेदभाव (जाति, लिंग और क्षेत्रीय) को रोकने के लिए ये नियम आवश्यक हैं।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कार्यान्वयन की चुनौतियां: विश्लेषण समानता के “इरादे” और प्रशासनिक आदेशों के “स्वरूप” के बीच के अंतर को उजागर करता है, जो अक्सर वास्तविक समावेश के बजाय केवल कागजी कार्यवाही (Bureaucracy) बनकर रह जाते हैं।
    • वैश्विक उदाहरण: लेख पश्चिमी विश्वविद्यालयों में “विविधता, समानता और समावेश” (DEI) की बहसों के साथ यूजीसी के इस कदम की तुलना करता है और ध्रुवीकरण के जोखिम को नोट करता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; जीव विज्ञान और भौतिकी में वर्तमान विकास)।

  • संदर्भ: एक वैज्ञानिक लेख जो बताता है कि जीवित कोशिकाएं जीवित और कार्यात्मक रहने के लिए “साम्यावस्था से दूर” (Far from equilibrium) की स्थिति कैसे बनाए रखती हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • ATP हाइड्रोलिसिस: कोशिकाएं आवश्यक रासायनिक प्रतिक्रियाओं को चलाने के लिए ATP से ADP के अनुपात को साम्यावस्था स्तर से 10 अरब गुना अधिक बनाए रखती हैं।
    • संचालित रासायनिक चक्र: साम्यावस्था पर “मृत्यु” को रोकने के लिए, कोशिकाएं लगातार चक्रों में ऊर्जा पंप करती हैं, जिससे सटीक नियंत्रण और कार्य करने की क्षमता मिलती है।
    • “ऊष्मा कर” (Heat Tax): इस असंतुलन को बनाए रखने से भारी मात्रा में गर्मी पैदा होती है, जो एक “कर” की तरह है जिसे जीव जीवन के लिए आवश्यक नियंत्रण और बहुमुखी प्रतिभा के लिए चुकाते हैं।
    • विकासवादी समझौता: गणना दर्शाती है कि ये चक्र शरीर द्वारा छोड़ी जाने वाली गर्मी के एक बड़े हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं—एक ऐसा निवेश जिसे विकास (Evolution) ने योग्य माना है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जीवन का ऊष्मागतिकी (Thermodynamics): लेख बताता है कि भौतिक विज्ञान में साम्यावस्था का अर्थ स्थिरता है, लेकिन जैविक संदर्भ में इसका अर्थ “मृत्यु” है, क्योंकि जीवन को बनाए रखने के लिए ऊर्जा का निरंतर प्रवाह जरूरी है।
    • शुद्धता और नियंत्रण: साम्यावस्था से दूर रहकर, जैविक तंत्र पर्यावरणीय परिवर्तनों पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सकते हैं, जो स्थिर तंत्रों के लिए असंभव है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत और इसके पड़ोसी)।

  • संदर्भ: 2024 की राजनीतिक हिंसा के संबंध में बांग्लादेश में एक महत्वपूर्ण न्यायिक घटनाक्रम।
  • मुख्य बिंदु:
    • हिंसा के लिए जवाबदेही: ढाका की एक अदालत ने जुलाई-अगस्त 2024 के विद्रोह के दौरान प्रदर्शनकारियों की हत्या में उनकी भूमिका के लिए तीन पुलिस अधिकारियों को मौत की सजा सुनाई है।
    • संस्थागत हिसाब-किताब: इस फैसले को अंतरिम सरकार द्वारा पिछली सरकार के सुरक्षा बलों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघनों को संबोधित करने की दिशा में एक बड़े कदम के रूप में देखा जा रहा है।
    • पुलिस मनोबल पर प्रभाव: इस निर्णय ने बांग्लादेश में “ऊपर से आदेश” के बचाव बनाम राज्य प्रायोजित हिंसा के लिए व्यक्तिगत जवाबदेही पर बहस छेड़ दी है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संक्रमणकालीन न्याय (Transitional Justice): संपादकीय विश्लेषण करता है कि वर्तमान प्रशासन देश को स्थिर करने की कोशिश करते हुए पिछली सरकार के कार्यों को अवैध घोषित करने के लिए न्यायपालिका का उपयोग कैसे कर रहा है।
    • क्षेत्रीय निहितार्थ: भारत के लिए, बांग्लादेश में स्थिरता और कानून का शासन यह सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है कि आंतरिक उथल-पुथल सीमा पार न फैले या कट्टरपंथी तत्वों को सशक्त न करे।

संपादकीय विश्लेषण

27 जनवरी, 2026
GS-3 अर्थव्यवस्था मनरेगा (MGNREGA) कवच

60% से अधिक संपत्ति सृजन प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा है। यह योजना ग्रामीण संकटकालीन प्रवासन के खिलाफ एक स्वचालित स्थिरता (Automatic Stabilizer) के रूप में कार्य करती है।

GS-3 विज्ञान जीवन का ऊर्जा कर

कोशिकाएं साम्यावस्था से 10 अरब गुना ऊपर ATP अनुपात बनाए रखती हैं। जीवन निरंतर ऊर्जा प्रवाह द्वारा परिभाषित होता है; स्थिरता का अर्थ मृत्यु है।

GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध ढाका न्यायिक निर्णय

2024 के विद्रोह की हिंसा के लिए तीन पुलिस अधिकारियों को मृत्युदंड। बांग्लादेश में संक्रमणकालीन न्याय (Transitional Justice) की दिशा में एक बड़ा कदम।

समानता: मनरेगा ग्रामीण श्रम की मोलभाव करने की शक्ति में सुधार करता है, जो सामाजिक समानता के आधार के रूप में कार्य करता है।
संघवाद: पंजाब और हरियाणा दोनों में जल संकट को हल करने के लिए निष्पक्ष, डेटा-संचालित मूल्यांकन की आवश्यकता है।
शैक्षणिक स्वतंत्रता: संस्थागत स्वायत्तता को कम किए बिना समावेश के लिए प्रशासनिक आदेशों को संतुलित करना।
पड़ोस: सीमा पार अशांति के प्रसार को रोकने के लिए भारत के लिए बांग्लादेश में स्थिरता महत्वपूर्ण है।
GS-4
कर्तव्य और न्याय
संस्थागत जवाबदेही: ढाका का फैसला “ऊपर से मिले आदेश” वाले बचाव को चुनौती देता है। राज्य प्रायोजित हिंसा के लिए व्यक्तिगत उत्तरदायित्व सार्वजनिक सेवा में ईमानदारी और मानवाधिकार संरक्षण का आधार बना हुआ है।

यहाँ भारत के जलवायु क्षेत्रों और वर्षा के वितरण का विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। यह UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए एक आधारभूत विषय है, क्योंकि यह भारत की कृषि, वनस्पति और आपदा प्रतिरूपों के पीछे के स्थानिक तर्क की व्याख्या करता है।

भारत में वर्षा अत्यधिक मौसमी और असमान रूप से वितरित है। मानचित्र पर इन क्षेत्रों को वार्षिक वर्षा की मात्रा के आधार पर परिभाषित किया गया है।

  • अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (>200 सेमी):
    • पश्चिमी घाट: पवनमुखी ढाल (को तटीय महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल)।
    • उत्तर-पूर्वी भारत: “सात बहन” राज्य, विशेष रूप से मेघालय की खासी पहाड़ियाँ (मौसिनराम और चेरापूंजी)।
  • मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (100–200 सेमी):
    • पूर्वी मैदान: पश्चिम बंगाल, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश।
    • तटीय क्षेत्र: ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय भाग।
  • न्यून वर्षा वाले क्षेत्र (50–100 सेमी):
    • मध्य भारत: मध्य प्रदेश के हिस्से, गुजरात और दक्कन का पठार।
    • उत्तरी मैदान: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश।
  • शुष्क/अल्प वर्षा वाले क्षेत्र (<50 सेमी):
    • पश्चिमी राजस्थान: थार मरुस्थल का क्षेत्र।
    • लेह-लद्दाख: ट्रांस-हिमालय का शीत मरुस्थल।
    • वृष्टि-छाया क्षेत्र: दक्कन के पठार के आंतरिक हिस्से (मराठवाड़ा और रायलसीमा)।

यह भूगोल वैकल्पिक विषय और सामान्य अध्ययन के प्रश्नपत्रों के लिए एक उच्च-स्तरीय तकनीकी मानचित्रण आवश्यकता है।

कोड (Code)जलवायु का प्रकारमानचित्रण क्षेत्र (Region)
Amwलघु शुष्क ऋतु वाली मानसूनी जलवायुभारत का पश्चिमी तट (मुंबई के दक्षिण में)।
Asशुष्क ग्रीष्म ऋतु वाली मानसूनी जलवायुकोरोमंडल तट (तमिलनाडु और आंध्र के कुछ हिस्से)।
Awउष्णकटिबंधीय सवाना जलवायुकर्क रेखा के दक्षिण में अधिकांश प्रायद्वीपीय पठार।
BWhwगर्म मरुस्थलीय जलवायुसुदूर पश्चिमी राजस्थान (थार मरुस्थल)।
BShwअर्ध-शुष्क स्टेपी जलवायुपश्चिमी घाट का वृष्टि-छाया क्षेत्र और हरियाणा/गुजरात के हिस्से।
Cwgशुष्क शीत ऋतु वाली मानसूनी जलवायुगंगा का अधिकांश मैदान और उत्तर-मध्य भारत।
Dfcलघु ग्रीष्म तथा ठंडी आर्द्र शीत ऋतुसिक्किम और अरुणाचल प्रदेश।
Eध्रुवीय प्रकारजम्मू और कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल प्रदेश।

मौसमी हवाओं का मानचित्रण मानसून-पूर्व और मानसूनी प्रतिरूपों को समझने में मदद करता है।

  • दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): मानचित्र पर इसकी दो शाखाओं को देखें: “अरब सागर शाखा” (पश्चिमी तट पर टकराती है) और “बंगाल की खाड़ी शाखा” (उत्तर-पूर्व से टकराकर गंगा के मैदानों की ओर मुड़ती है)।
  • उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): ये हवाएं स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, जो मुख्य रूप से तमिलनाडु तट पर शीतकालीन वर्षा लाती हैं।
  • स्थानीय तूफान (मानसून-पूर्व):
    • लू (Loo): उत्तर भारत के मैदानों में चलने वाली गर्म और शुष्क हवाएं (मई/जून)।
    • आम्र वर्षा (Mango Showers): कर्नाटक और केरल (आमों को पकाने में सहायक)।
    • काल-बैसाखी (Kalbaisakhi): पश्चिम बंगाल और असम में आने वाले विनाशकारी गरज के साथ तूफान।
विशेषतामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे आर्द्र स्थानमौसिनरामपूर्वी खासी हिल्स, मेघालय
सबसे शुष्क स्थानजैसलमेर / लेहराजस्थान / लद्दाख
शीतकालीन वर्षा का केंद्रकोरोमंडल तटतमिलनाडु
मानसून का प्रवेश द्वारमालाबार तटकेरल

वर्षा के वितरण को समझने के लिए हमेशा भारत के राहत मानचित्र (Relief Map) का उपयोग करें। पहाड़ियाँ और पर्वत (जैसे हिमालय और पश्चिमी घाट) नमी वाली हवाओं को रोककर वर्षा के वितरण में प्राथमिक भूमिका निभाते हैं। इसे “पर्वतीय वर्षा” (Orographic Rainfall) के रूप में याद रखें।

मानचित्रण विवरण

जलवायु क्षेत्र और वर्षा
वर्षा क्षेत्र वर्षण की चरम सीमाएँ

पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व में भारी वर्षा (>200 सेमी)। थार मरुस्थल और लेह-लद्दाख में अत्यंत कम वर्षा।

स्थानीय तूफान मानसून पूर्व की गतिविधियाँ

काल बैसाखी का बंगाल पर प्रभाव; मैंगो शॉवर्स कर्नाटक/केरल में सहायक, जबकि गर्म लू उत्तरी मैदानों में चलती है।

कोपेन वर्गीकरण
तकनीकी-जलवायु मानचित्रण

मुख्य कोड में पश्चिमी तट पर Amw (मानसून/अल्प शुष्क), कोरोमंडल तट पर As (शुष्क ग्रीष्म), और गंगा के मैदानों में Cwg शामिल हैं।

मौसमी पवनें
मानसून प्रवाह और निवर्तन

दक्षिण-पश्चिम मानसून अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की शाखाओं में विभाजित होता है। उत्तर-पूर्वी मानसून तमिलनाडु को महत्वपूर्ण शीतकालीन वर्षा प्रदान करता है।

वृष्टि-छाया प्रभाव

घाटों की विमुख ढाल (लेवर्ड साइड) पर होने के कारण आंतरिक दक्कन (मराठवाड़ा/रायलासीमा) में कम वर्षा (50-100 सेमी) होती है।

सर्वाधिक आर्द्र स्थान मासिनराम (खासी पहाड़ियाँ) को लोकेट करें।
शीतकालीन वर्षा कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) का पता लगाएं।
प्रवेश द्वार मालाबार तट (मानसून आगमन) की पहचान करें।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 100 सेमी की समवर्षा रेखा चावल-प्रधान पूर्व को गेहूं-प्रधान पश्चिम से विभाजित करने वाली एक महत्वपूर्ण सीमा है। वर्षा की असमानता को समझने के लिए पश्चिमी घाट की पर्वतकृत बाधा (Orographic Barrier) को देखना महत्वपूर्ण है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 26 जनवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन” 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के पतन और उसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं के नाटकीय पुनर्गठन का वर्णन करता है।

मुगल साम्राज्य को कई कारकों के संयोजन का सामना करना पड़ा जिससे उसका पतन हुआ:

  • उत्तराधिकार और दक्कन का युद्ध: औरंगजेब ने दक्कन में लंबी लड़ाइयाँ लड़ीं, जिससे साम्राज्य के सैन्य और वित्तीय संसाधन समाप्त हो गए।
  • प्रशासनिक गिरावट: शाही प्रशासन की कार्यक्षमता बिगड़ गई, जिससे बाद के मुगल सम्राटों के लिए अपने शक्तिशाली मनसबदारों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया।
  • विद्रोह: उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में किसानों और जमींदारों के विद्रोहों ने दबाव बढ़ा दिया। ये विद्रोह अक्सर उच्च करों के बोझ के कारण होते थे।
  • विदेशी आक्रमण: ईरान के शासक नादिर शाह ने 1739 में दिल्ली पर आक्रमण किया और शहर को जमकर लूटा। इसके बाद अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने 1748 और 1761 के बीच पाँच बार आक्रमण किए।

अठारहवीं शताब्दी के दौरान, मुगल साम्राज्य धीरे-धीरे कई स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों में बिखर गया। इन राज्यों को तीन समूहों में बांटा जा सकता है:

  • पुरानी मुगल रियासतें (Old Mughal Provinces): अवध, बंगाल और हैदराबाद जैसे राज्य अत्यंत शक्तिशाली और काफी स्वतंत्र थे, लेकिन इनके शासकों ने मुगल सम्राट के साथ औपचारिक संबंध नहीं तोड़े।
    • हैदराबाद: इसकी स्थापना निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह ने की थी। उसने उत्तर भारत से कुशल सैनिकों और प्रशासकों को लाकर और इजारेदारी (Ijaradari) प्रथा अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की।
    • अवध: बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान को 1722 में सूबेदार नियुक्त किया गया था। उसने जागीरदारों की संख्या कम करके और रिक्त पदों पर अपने वफादार नौकरों को नियुक्त करके मुगल प्रभाव को कम करने की कोशिश की।
    • बंगाल: मुर्शिद कुली खान के नेतृत्व में बंगाल धीरे-धीरे दिल्ली के नियंत्रण से अलग हो गया। उसने सभी मुगल जागीरदारों को उड़ीसा स्थानांतरित कर दिया और बंगाल के राजस्व का बड़े पैमाने पर पुनर्मूल्यांकन करने का आदेश दिया।
  • राजपूतों के वतन (Vatans of the Rajputs): कई राजपूत राजाओं (विशेषकर अंबर और जोधपुर के) ने मुगलों के अधीन विशिष्ट सेवाएँ दी थीं। उन्हें अपनी ‘वतन जागीर’ में काफी स्वायत्तता प्राप्त थी। अठारहवीं शताब्दी में, इन शासकों ने आसपास के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास किया।
  • मराठों, सिखों और जाटों के राज्य: इन समूहों ने एक लंबे सशस्त्र संघर्ष के बाद मुगलों से अपनी स्वतंत्रता छीन ली थी।

सिखों के एक राजनीतिक समुदाय के रूप में संगठित होने से पंजाब में क्षेत्रीय राज्य निर्माण में मदद मिली।

  • गुरु गोविंद सिंह: दसवें गुरु ने राजपूत और मुगल शासकों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं और 1699 में ‘खालसा’ की स्थापना की।
  • बंदा बहादुर: उनके नेतृत्व में खालसा ने मुगल सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया, गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह के नाम पर सिक्के जारी करके अपने संप्रभु शासन की घोषणा की और अपना प्रशासन स्थापित किया।
  • मिसल (Misls): अठारहवीं शताब्दी में सिखों ने खुद को कई जत्थों और बाद में ‘मिसलों’ में संगठित किया। उनकी संयुक्त सेना को ‘दल खालसा’ के नाम से जाना जाता था।

मुगल शासन के निरंतर विरोध से उत्पन्न होने वाला मराठा राज्य एक और शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य था।

  • शिवाजी: उन्होंने शक्तिशाली योद्धा परिवारों (देशमुखों) और अत्यधिक गतिशील कृषक-पशुपालकों (कुनबियों) के सहयोग से एक स्थिर राज्य की स्थापना की।
  • पेशवा: शिवाजी की मृत्यु के बाद, मराठा राज्य की प्रभावी शक्ति चितपावन ब्राह्मणों के एक परिवार के हाथ में रही, जिन्होंने शिवाजी के उत्तराधिकारियों की सेवा ‘पेशवा’ (प्रधानमंत्री) के रूप में की।
  • विस्तार: 1720 और 1761 के बीच मराठा साम्राज्य का विस्तार हुआ। उन्होंने मुगलों से मालवा और गुजरात छीन लिया और राजस्थान, बंगाल तथा उड़ीसा पर छापे मारे।
  • राजस्व: वे उन क्षेत्रों से चौथ (भू-राजस्व का 25%) और सरदेशमुखी (9-10%) वसूलते थे जो उनके सीधे नियंत्रण में नहीं थे।

अन्य राज्यों की तरह, जाटों ने सत्रहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के दौरान अपनी शक्ति संगठित की।

  • चूड़ामन: उनके नेतृत्व में जाटों ने दिल्ली के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया।
  • सूरज मल: उनके अधीन भरतपुर का राज्य एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।
  1. इजारेदारी: राजस्व वसूली के लिए ठेकेदारी की प्रथा।
  2. चौथ: मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से वसूला जाने वाला कर (उपज का 1/4 हिस्सा)।
  3. सरदेशमुखी: मुख्य राजस्व अधिकारी होने के नाते वसूला जाने वाला अतिरिक्त कर (9-10%)।
  4. खालसा: सिखों का सैन्य दल।
  5. तकरीबन: लगभग (इतिहास की तिथियों के संदर्भ में प्रयोग)।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-7
अध्याय – 10

अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन

साम्राज्य का संकट
दक्कन के युद्ध: औरंगज़ेब के लंबे संघर्ष ने राजकोष को खाली कर दिया और सैन्य प्रशासन को कमजोर कर दिया।
आक्रमण: नादिर शाह (1739) और अहमद शाह अब्दाली ने मुगल सिंहासन की प्रतिष्ठा को चकनाचूर कर दिया।
नई व्यवस्थाएँ
इजारादारी: राजस्व वसूली का ठेका देना सामान्य हो गया क्योंकि राज्य को तत्काल नकदी की आवश्यकता थी।
क्षेत्रीय पहचान: गवर्नरों (सूबेदारों) ने अपनी शक्ति को मजबूत किया और व्यवहार में वे स्वतंत्र शासक बन गए।
स्वतंत्र राज्यों का उदय
हैदराबाद: इसकी स्थापना आसफ़ जाह द्वारा की गई थी। वह उत्तर से कुशल सैनिकों को लाया और दिल्ली के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से शासन किया।
अवध: बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान ने समृद्ध जलोढ़ मैदानों का प्रबंधन किया और मुगल-नियुक्त जागीरदारों की संख्या कम कर दी।
बंगाल: मुर्शिद कुली खान के नेतृत्व में राज्य स्वायत्त हो गया और राजस्व का संग्रह अत्यंत कड़ाई से नकद में किया जाने लगा।
मराठा: पेशवाओं के अधीन उन्होंने एक ऐसी सैन्य प्रणाली विकसित की जो छापामार युद्ध के माध्यम से मुगल किलों को चकमा दे देती थी।

चौथ

मराठों द्वारा गैर-मराठा क्षेत्रों से मांगे जाने वाले भू-राजस्व का 25 प्रतिशत हिस्सा।

खालसा

सिखों की संप्रभु संस्था, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने एक राज्य शक्ति में बदल दिया था।

जाट

समृद्ध कृषक जिन्होंने सूरज मल के नेतृत्व में भरतपुर में एक मजबूत राज्य का निर्माण किया था।

एक युग का अंत
18वीं शताब्दी केवल “पतन” का काल नहीं थी, बल्कि एक गतिशील संक्रमण थी। जहाँ एक ओर मुगल छत्रछाया सिमट रही थी, वहीं दूसरी ओर जीवंत क्षेत्रीय संस्कृतियों और प्रशासनिक नवाचारों का उदय हुआ, जिसने आधुनिक भारत के विविध राजनीतिक परिदृश्य का मार्ग प्रशस्त किया।
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कक्षा-7 इतिहास अध्याय-10 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन

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राष्ट्रपति भारतीय संघ का सर्वोच्च प्रमुख होता है। यद्यपि उनका पद “नाममात्र” का होता है, लेकिन देश के शासन के लिए उनकी इन शक्तियों का कानूनी महत्व बहुत अधिक है।

भारत सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।

राष्ट्रपति देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारियों की नियुक्ति करता है:

  • प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री (प्रधानमंत्री की सलाह पर)।
  • भारत के महान्यायवादी (Attorney General) – राष्ट्रपति उनके वेतन और कार्यकाल का निर्धारण भी करते हैं।
  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त, तथा UPSC के अध्यक्ष व सदस्य।
  • राज्यों के राज्यपाल (Governors)।
  • अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council): केंद्र-राज्य और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए इसकी नियुक्ति।
  • राष्ट्रपति किसी भी क्षेत्र को ‘अनुसूचित क्षेत्र’ घोषित कर सकता है और उसे अनुसूचित क्षेत्रों व जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  • वह प्रधानमंत्री से किसी भी ऐसे मामले पर निर्णय मंत्रिपरिषद के विचारार्थ प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है, जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो लेकिन परिषद ने विचार न किया हो।

राष्ट्रपति संसद का एक अभिन्न अंग होता है। इस कारण उसे विधायी प्रक्रिया से संबंधित कई शक्तियाँ प्राप्त हैं:

  • सत्र बुलाना और सत्रावसान (Summoning & Proroguing): वह संसद के सत्र को बुला सकता है या उसका सत्रावसान कर सकता है तथा लोकसभा को भंग कर सकता है।
  • संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108): किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध (Deadlock) होने की स्थिति में वह संयुक्त बैठक बुला सकता है।
  • मनोनयन (Nominations): वह राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करता है (साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों से)।
  • पूर्व सिफारिश: कुछ विधेयकों को उनकी पूर्व सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता (जैसे—धन विधेयक, या राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन से संबंधित विधेयक)।

जब संसद द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 111 के तहत उनके पास तीन विकल्प होते हैं:

  1. आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto): “नहीं” कहने की शक्ति। वह विधेयक पर अपनी सहमति सुरक्षित रख लेता है, जिससे विधेयक समाप्त हो जाता है और कानून नहीं बन पाता।
    • उपयोग: आमतौर पर गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों या तब किया जाता है जब सहमति देने से पहले मंत्रिमंडल इस्तीफा दे दे।
  2. निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): “पुनर्विचार” के लिए कहने की शक्ति। वह विधेयक को संसद को वापस भेज देता है।
    • शर्त: यदि संसद उस विधेयक को दोबारा (संशोधन के साथ या बिना) पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजती है, तो राष्ट्रपति को अपनी सहमति देनी ही पड़ती है।
    • नोट: वह ‘धन विधेयक’ के लिए इसका उपयोग नहीं कर सकता।
  3. पॉकेट वीटो (Pocket Veto): “मौन” रहने की शक्ति। वह विधेयक पर न तो सहमति देता है, न उसे अस्वीकार करता है और न ही वापस भेजता है, बल्कि उसे अनिश्चित काल के लिए लंबित रखता है।
    • परीक्षा तथ्य: भारतीय राष्ट्रपति की ‘जेब’ (Pocket) अमेरिकी राष्ट्रपति से बड़ी है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति को 10 दिनों के भीतर विधेयक वापस करना होता है, जबकि भारतीय संविधान में ऐसी कोई समय सीमा नहीं है।

यह राष्ट्रपति की सबसे महत्वपूर्ण विधायी शक्ति है, जो उसे तब कानून बनाने की अनुमति देती है जब संसद सत्र में न हो।

  • समय: इसे केवल तभी जारी किया जा सकता है जब संसद का कोई एक सदन (या दोनों) सत्र में न हो।
  • आवश्यकता: राष्ट्रपति को संतुष्ट होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं जिनमें तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक है।
  • प्रभाव: अध्यादेश का वही बल और प्रभाव होता है जो संसद के अधिनियम का होता है, लेकिन यह एक अस्थायी कानून है।
  • संसद के पुन: सत्र शुरू होने पर अध्यादेश को दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना चाहिए।
  • 6 सप्ताह का नियम: यदि संसद इसे अनुमोदित कर देती है, तो यह अधिनियम बन जाता है। यदि कोई कार्रवाई नहीं की जाती, तो संसद की बैठक शुरू होने के 6 सप्ताह बाद यह समाप्त हो जाता है।
  • अधिकतम अवधि: चूँकि संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने हो सकता है, इसलिए किसी अध्यादेश का अधिकतम जीवन 6 महीने और 6 सप्ताह हो सकता है।
शक्ति का प्रकारअनुच्छेदमुख्य शासनादेशकार्यान्वयन विवरण
वीटो शक्ति111विधेयकों पर सहमतिआत्यंतिक, निलंबनकारी या पॉकेट।
अध्यादेश123कानून बनाने की शक्ति6 महीने + 6 सप्ताह तक वैध।
संयुक्त बैठक108गतिरोध सुलझानाराष्ट्रपति बुलाता है, अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
क्षमादान72न्यायिक राहतमृत्युदंड तक को क्षमा कर सकते हैं।

हमेशा याद रखें कि राष्ट्रपति अपनी वीटो शक्ति या अध्यादेश शक्ति का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। (42वें और 44वें संशोधन के अनुसार)।

संवैधानिक प्रमुख   •   कार्यपालिका
संघीय प्रशासन

राष्ट्रपति की शक्तियाँ

कार्यकारी भूमिका
भारत सरकार के सभी औपचारिक कार्यकारी कार्य राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
नियुक्तियाँ
वे प्रधानमंत्री, महान्यायावादी (AG), CAG और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति करते हैं।
विधायी अधिकार
संसद: वे संसद के अभिन्न अंग हैं; सदनों को आहूत/सत्रावसान कर सकते हैं और लोकसभा को भंग कर सकते हैं।
संयुक्त बैठक: सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए संयुक्त अधिवेशन (अनुच्छेद 108) बुला सकते हैं।
अध्यादेश (अनुच्छेद 123)
संसद का सत्र न होने पर अध्यादेश जारी कर सकते हैं। इसे पुन: बैठक के 6 सप्ताह के भीतर अनुमोदित होना अनिवार्य है।

आत्यंतिक वीटो

सहमति रोकने की शक्ति; विधेयक तुरंत समाप्त हो जाता है और कानून नहीं बन पाता।

निलंबनकारी वीटो

विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस करना। यदि पुन: पारित हो जाए, तो सहमति अनिवार्य है।

पॉकेट वीटो

विधेयक को अनिश्चित काल के लिए लंबित रखना। संविधान में इसकी कोई समय सीमा तय नहीं है।

संवैधानिक
सार
राष्ट्रपति भारतीय राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। हालांकि वास्तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है, लेकिन राष्ट्रपति का पद गरिमा और निरंतरता का प्रतीक है, जो संकट के समय राष्ट्र के संरक्षक के रूप में कार्य करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (26 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारतीय संविधान; संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारतीय संघवाद के स्वास्थ्य का विश्लेषण, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित किया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • राजकोषीय केंद्रीकरण (Fiscal Centralization): संपादकीय नोट करता है कि केंद्र द्वारा ‘उपकर’ (Cess) और ‘अधिभार’ (Surcharge) के बढ़ते उपयोग के माध्यम से विभाज्य कर पूल में राज्यों की हिस्सेदारी प्रभावी रूप से कम हो रही है।
    • राज्यपाल की भूमिका: केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों द्वारा संवैधानिक सेतु के बजाय “राजनीतिक एजेंट” के रूप में कार्य करने से कार्यपालिका के संबंधों में तनाव आया है।
    • विधायी अतिक्रमण: राज्य सूची के विषयों (जैसे कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा) में केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से बढ़ते हस्तक्षेप ने “एकात्मक झुकाव” (Unitary bias) की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
    • भाषा और पहचान: ‘हिंदी थोपने’ की बहस और 2027 के बाद होने वाला परिसीमन अभ्यास क्षेत्रीय उप-राष्ट्रवाद के लिए संभावित ‘फ्लैशप्वाइंट’ के रूप में उभर रहे हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारतीय संघवाद की प्रकृति”, “संवैधानिक पदाधिकारियों की भूमिका” और “राजकोषीय संघवाद” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद: विश्लेषण का तर्क है कि जहाँ “प्रतिस्पर्धी संघवाद” ने व्यापार करने में आसानी (Ease of doing business) में सुधार किया है, वहीं इसने सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में “सहकारी संघवाद” को कमजोर किया है।
    • स्वायत्तता का क्षरण: राज्यों की उधारी सीमाओं पर केंद्रीय शर्तों को थोपना राज्य के वित्तीय प्रबंधन में “पिछले दरवाजे से प्रवेश” के रूप में वर्णित किया गया है।
    • आगे की राह: संपादकीय विश्वास बहाल करने के लिए अंतर-राज्य परिषद को पुनर्जीवित करने और राज्यपालों की नियुक्ति पर सरकारिया आयोग की सिफारिशों को अपनाने का सुझाव देता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (न्यायपालिका; शासन के महत्वपूर्ण पहलू; जवाबदेही)।

  • संदर्भ: न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना उच्च न्यायपालिका के भीतर कदाचार के आरोपों को संबोधित करने के लिए एक औपचारिक तंत्र की आवश्यकता पर चर्चा।
  • मुख्य बिंदु:
    • इन-हाउस प्रक्रिया की सीमाएँ: न्यायाधीशों की जांच के लिए वर्तमान “इन-हाउस” तंत्र की पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास की कमी के लिए आलोचना की जाती है।
    • महाभियोग की बाधाएं: महाभियोग (Impeachment) की संवैधानिक प्रक्रिया को इसकी अत्यधिक राजनीतिक प्रकृति और कठोर आवश्यकताओं के कारण “व्यावहारिक रूप से असंभव” बताया गया है।
    • ‘अंकल जज’ सिंड्रोम: संपादकीय न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद (Nepotism) और इसके परिणामस्वरूप “कॉलेजियम बनाम सरकार” के गतिरोध पर चिंता व्यक्त करता है।
    • न्यायिक मानक विधेयक: न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों के निपटान के लिए ‘न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक’ के समान एक वैधानिक ढांचे की फिर से मांग की गई है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता” और “चेक्स एंड बैलेंसेज” (नियंत्रण और संतुलन)।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • पारदर्शिता बनाम स्वतंत्रता: लेख का तर्क है कि जवाबदेही स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं है; बल्कि, “बंद कमरे” वाला दृष्टिकोण अक्सर कार्यपालिका के हस्तक्षेप को आमंत्रित करता है।
    • आचार संहिता: कानूनी आवश्यकताओं से परे, संपादकीय सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरियों और सार्वजनिक व्यस्तताओं के संबंध में एक कड़ाई से लागू नैतिक संहिता की आवश्यकता पर जोर देता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी; आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)।

  • संदर्भ: नासा (NASA) द्वारा ‘ExoMiner++’ जारी करना, जो कि केपलर और TESS मिशन डेटा से ‘एक्सोप्लैनेट’ (सौर मंडल के बाहर के ग्रह) के उम्मीदवारों को सत्यापित करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक ओपन-सोर्स AI मॉडल है।
  • मुख्य बिंदु:
    • संकेतों में अंतर: AI मॉडल वास्तविक ‘ग्रहीय पारगमन’ (किसी तारे की चमक में गिरावट) को बाइनरी सितारों या बैकग्राउंड शोर जैसे झूठे संकेतों से अलग करने में मदद करता है।
    • व्याख्यात्मक AI (Explainable AI): “ब्लैक-बॉक्स” मॉडल के विपरीत, ExoMiner++ खगोलविदों को एक स्कोर और यह जानकारी प्रदान करता है कि उसने किसी सिग्नल को ग्रह के रूप में क्यों वर्गीकृत किया।
    • सफलता: इस मॉडल ने केपलर डेटा से 370 नए एक्सोप्लैनेट को पहले ही सत्यापित कर दिया है जो संदिग्ध संकेतों के कारण “वैज्ञानिक अधर” में फंसे हुए थे।
    • TESS और भविष्य: उपकरण ने TESS डेटा में 7,000 संभावित उम्मीदवारों की पहचान की है और भविष्य के नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप के लिए इसके महत्वपूर्ण होने की उम्मीद है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतरिक्ष अन्वेषण में AI के अनुप्रयोग”, “विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग” और “खगोल विज्ञान में वर्तमान विकास”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • डेटा का लोकतंत्रीकरण: सॉफ्टवेयर को गिटहब (GitHub) पर ओपन-सोर्स बनाकर, नासा वैश्विक शोधकर्ताओं को एल्गोरिदम को परिष्कृत करने और उन्हें विभिन्न डेटासेट पर लागू करने की अनुमति दे रहा है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे)।

  • संदर्भ: भारत की बदलती सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया की समीक्षा, क्योंकि डेंगू शहरी केंद्रों में एक मौसमी प्रकोप से बदलकर साल भर रहने वाले “स्थानिक खतरे” (Endemic threat) में बदल रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • वायरस की निरंतरता: वर्षा के बदलते पैटर्न और तेजी से अनियोजित शहरीकरण ने ‘एडिस एजिप्टी’ मच्छर के लिए स्थायी प्रजनन स्थल बना दिए हैं।
    • स्ट्रेन विविधता: डेंगू के सभी चार सीरोटाइप (DENV-1 से 4) का एक साथ प्रसार एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट के कारण ‘गंभीर डेंगू’ के जोखिम को बढ़ाता है।
    • टीकाकरण की बाधाएं: यद्यपि वैश्विक स्तर पर ‘क्यूडेंगा’ (Qdenga) जैसे टीके मौजूद हैं, भारत की विशिष्ट सीरोटाइप स्थिति के लिए स्थानीय नैदानिक परीक्षणों और एक सतर्क रोलआउट रणनीति की आवश्यकता है।
    • सामुदायिक उदासीनता: संपादकीय नोट करता है कि जल-निकासी (ठहरे हुए पानी को हटाना) सरकारी दृष्टिकोण के रूप में विफल रहा है, इसके लिए अब एक “जन आंदोलन” की आवश्यकता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन”, “शहरी नियोजन और स्वास्थ्य” और “महामारी विज्ञान के रुझान”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जीनोम अनुक्रमण: लेख विभिन्न स्ट्रेन की घातकता को ट्रैक करने और भविष्य के प्रसार पैटर्न की भविष्यवाणी करने के लिए जीनोमिक निगरानी बढ़ाने की वकालत करता है।
    • एकीकृत वाहक प्रबंधन: फॉगिंग (जो काफी हद तक दिखावटी है) से आगे बढ़ते हुए, ध्यान ‘वोल्बाचिया’ (Wolbachia) बैक्टीरिया से संक्रमित मच्छरों जैसे जैविक नियंत्रणों पर केंद्रित होना चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; गरीबी और विकास संबंधी मुद्दे)।

  • संदर्भ: हालिया FMCG बिक्री आंकड़ों का विश्लेषण जो लंबे समय के ठहराव के बाद ग्रामीण मांग में सुधार के संकेत दे रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • वॉल्यूम ग्रोथ: दो वर्षों में पहली बार ग्रामीण बाजारों ने वॉल्यूम ग्रोथ (बिक्री की मात्रा) में शहरी बाजारों को पीछे छोड़ दिया है, जिसका मुख्य कारण छोटे और सस्ते पैकेट (Lower-unit-price packs) हैं।
    • मजदूरी का अंतराल: वॉल्यूम में वृद्धि के बावजूद, वास्तविक ग्रामीण मजदूरी (महंगाई के लिए समायोजित) लगभग स्थिर बनी हुई है, जिससे पता चलता है कि खपत बढ़ती अमीरी के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।
    • मानसून का प्रभाव: यह सुधार “सामान्य” मानसून के पूर्वानुमान पर निर्भर है, जो कृषि आय को स्थिर करता है और खाद्य मुद्रास्फीति को कम करता है।
    • FMCG रणनीति: कंपनियां अब ग्रामीण मध्यम वर्ग की मांग को पकड़ने के लिए “ब्रिज पैक्स” (मध्यम आकार के उत्पादों) पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “ग्रामीण-शहरी आर्थिक विभाजन”, “उपभोग पैटर्न” और “FMCG क्षेत्र एक आर्थिक संकेतक के रूप में”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • K-आकार की रिकवरी: डेटा शहरी क्षेत्रों में प्रीमियम खपत और ग्रामीण क्षेत्रों में मूल्य-आधारित खपत के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है, जो बताता है कि सुधार सभी आय स्तरों पर समान नहीं है।
    • सुरक्षा के रूप में मनरेगा: संपादकीय जोर देता है कि निजी निवेश बढ़ने तक इस उपभोग की गति को बनाए रखने के लिए ग्रामीण रोजगार योजनाओं (MGNREGA) पर निरंतर सरकारी खर्च महत्वपूर्ण है।

संपादकीय विश्लेषण

02 जनवरी, 2026
GS-3 विज्ञान एवं तकनीक AI: नासा का ExoMiner++

ओपन-सोर्स AI ने 370 नए एक्सोप्लैनेट्स की पुष्टि की। ग्रहीय पारगमन और बैकग्राउंड शोर के बीच अंतर करने के लिए ‘एक्सप्लेनेबल AI’ की ओर बदलाव।

GS-2 स्वास्थ्य डेंगू की व्यापकता

डेंगू अब साल भर रहने वाला खतरा बन गया है। 4 सेरोटाइप के एक साथ सक्रिय होने से जोखिम चरम पर है। अब ध्यान ‘वोल्बाचिया’ जैसे जैविक नियंत्रणों पर होना चाहिए।

GS-3 अर्थव्यवस्था ग्रामीण उपभोग की नब्ज

ग्रामीण विकास शहरी क्षेत्रों से आगे है; हालाँकि, वास्तविक मजदूरी स्थिर बनी हुई है, जो दर्शाती है कि उपभोग धन के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।

संघवाद: राज्यपालों पर सरकारिया आयोग की सिफारिशें संवैधानिक विश्वास बहाल करने का महत्वपूर्ण मार्ग बनी हुई हैं।
स्पेस टेक: नैन्सी ग्रेस रोमन टेलीस्कोप डेटा में 7,000+ उम्मीदवारों की खोज के लिए ExoMiner++ महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था: MGNREGA ‘K-आकार की रिकवरी’ के बीच उपभोग को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण बफर के रूप में कार्य करता है।
न्यायपालिका: न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरियों हेतु स्पष्ट आचार संहिता की आवश्यकता है।
GS-4
कर्तव्य की नैतिकता
जवाबदेही बनाम स्वतंत्रता: पारदर्शिता स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं है। ‘बंद दरवाजे’ वाला दृष्टिकोण हस्तक्षेप को आमंत्रित करता है, जबकि सार्वजनिक व्यस्तताओं के संबंध में लागू नैतिक संहिता ‘न्याय के संरक्षकों’ की अखंडता को बनाए रखती है।

यहाँ भारत के प्रमुख ऊर्जा संसाधनों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। यह UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि यह भारत की आर्थिक और औद्योगिक नींव को समझने के लिए अनिवार्य है।

भारत में कोयला मुख्य रूप से गोंडवाना (Gondwana) और टर्शियरी (Tertiary) चट्टानों में पाया जाता है। मानचित्रण के लिए पूर्वी और मध्य भारत की “कोयला पेटियों” पर ध्यान केंद्रित करें।

  • गोंडवाना कोयला (98% भंडार): यह दामोदर, महानदी, सोन और गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है।
    • झरिया (झारखंड): भारत का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र; उच्च गुणवत्ता वाले ‘कोकिंग कोल’ के लिए प्रसिद्ध।
    • रानीगंज (पश्चिम बंगाल): भारत में खोली गई पहली कोयला खदान।
    • बोकारो और गिरिडीह (झारखंड): इस्पात उद्योग के लिए प्रमुख केंद्र।
    • कोरबा (छत्तीसगढ़): एक विशाल ‘ओपन-कास्ट’ (खुली खदान) खनन केंद्र।
    • सिंगरेनी (तेलंगाना): देश के दक्षिणी भाग का एकमात्र प्रमुख कोयला क्षेत्र।
  • टर्शियरी कोयला (लिग्नाइट):
    • नेवेली (तमिलनाडु): भारत में लिग्नाइट (भूरा कोयला) का सबसे महत्वपूर्ण भंडार।

पेट्रोलियम का मानचित्रण तटीय और उत्तरी क्षेत्रों की अवसादी चट्टानों (Sedimentary rocks) में स्थित ‘अपतटीय’ और ‘स्थलीय’ बेसिनों को कवर करता है।

  • पश्चिमी अपतटीय (Western Offshore):
    • मुंबई हाई: अरब सागर में स्थित भारत का सबसे बड़ा पेट्रोलियम क्षेत्र।
    • बसीन (Bassein): मुंबई हाई के दक्षिण में स्थित, प्राकृतिक गैस के लिए प्रसिद्ध।
  • पूर्वी स्थलीय/अपतटीय (Eastern Onshore/Offshore):
    • डिगबोई (असम): भारत का सबसे पुराना तेल कुआं (19वीं शताब्दी में खोदा गया)।
    • नहरकटिया और मोरन-हुग्रीजन (असम): उत्तर-पूर्व के अन्य प्रमुख तेल क्षेत्र।
    • KG बेसिन (कृष्णा-गोदावरी): बंगाल की खाड़ी में स्थित एक प्रमुख गहरा जल गैस भंडार।
  • उत्तर-पश्चिमी स्थलीय (North-Western Onshore):
    • अंकलेश्वर और कलोल (गुजरात): खंभात (Cambay) बेसिन के प्रमुख क्षेत्र।
    • बाड़मेर बेसिन (राजस्थान): यहाँ ‘मंगला’ तेल क्षेत्र स्थित है, जो भारत की सबसे बड़ी स्थलीय खोजों में से एक है।

परमाणु ऊर्जा का मानचित्रण आपके 2026 की तैयारी के “विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी” और “पर्यावरण” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।

संयंत्र का नामराज्यमहत्व
नरोराउत्तर प्रदेशगंगा नदी के पास उपजाऊ गंगा के मैदानों में स्थित।
रावतभाटाराजस्थानचंबल नदी पर राणा प्रताप सागर बांध के पास स्थित।
काकरापारगुजरातसूरत के पास औद्योगिक पट्टी में स्थित।
तारापुरमहाराष्ट्रभारत का पहला व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा केंद्र (1969 में स्थापित)।
कैगाकर्नाटकपश्चिमी घाट में स्थित; दक्षिणी ग्रिड के लिए महत्वपूर्ण।
कलपक्कम (MAPS)तमिलनाडुभारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी परमाणु ऊर्जा केंद्र।
कुडनकुलमतमिलनाडुभारत का सबसे बड़ी क्षमता वाला परमाणु संयंत्र (VVER रिएक्टर)।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे बड़ा कोयला क्षेत्रझरियाझारखंड
सबसे पुराना तेल क्षेत्रडिगबोईअसम
पहला परमाणु संयंत्रतारापुरमहाराष्ट्र
सबसे बड़ा परमाणु संयंत्रकुडनकुलमतमिलनाडु

ऊर्जा संसाधनों को याद रखने के लिए उन्हें प्रमुख औद्योगिक गलियारों (Industrial Corridors) के साथ जोड़कर देखें। उदाहरण के लिए, झारखंड-छत्तीसगढ़ बेल्ट भारत के ‘लौह-इस्पात’ उद्योग को ऊर्जा प्रदान करती है। मानचित्र पर इन केंद्रों की उत्तर-से-दक्षिण स्थिति को जरूर चिह्नित करें।

मानचित्रण विवरण

भारत के ऊर्जा संसाधन
कोयला क्षेत्र काला सोना

गोंडवाना संरचनाओं में केंद्रित। झरिया (JH) सबसे बड़ा क्षेत्र है; सिंगरेनी दक्षिण का एकमात्र प्रमुख क्षेत्र है।

पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन बेसिन

मुंबई हाई सबसे बड़ा क्षेत्र बना हुआ है; डिगबोई (AS) सबसे पुराना सक्रिय कुआँ है।

परमाणु ऊर्जा
रणनीतिक संयंत्र स्थल

प्रमुख स्थलों में तारापुर (MH), भारत का पहला स्टेशन, और कुडनकुलम (TN), उच्चतम क्षमता वाला संयंत्र शामिल हैं। नरौरा गंगा के मैदानों में एक प्रमुख उत्तरी केंद्र है।

अपतटीय एवं ऑनशोर बेसिन
प्राकृतिक गैस और ऑनशोर खोजें

KG बेसिन एक प्रमुख गहरे पानी का गैस भंडार है। ऑनशोर में, बाड़मेर बेसिन (RJ) मंगला क्षेत्र का घर है, जबकि अंकलेश्वर गुजरात में एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र के रूप में कार्य करता है।

टर्शियरी लिग्नाइट

सबसे महत्वपूर्ण भूरा कोयला (लिग्नाइट) भंडार नेवेली (तमिलनाडु) में स्थित है, जो दक्षिणी पावर ग्रिड के लिए आवश्यक है।

कोयला बेल्ट दामोदर और महानदी घाटियों का पता लगाएं।
हाइड्रोकार्बन खंभात बेसिन और डिगबोई को चिह्नित करें।
परमाणु ग्रिड कैगा (KT) और रावतभाटा (RJ) की पहचान करें।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: औद्योगिक विश्लेषण के लिए गोंडवाना कोयले और तटीय पेट्रोलियम बेसिन की भौगोलिक एकाग्रता को समझना आवश्यक है। भारत के ऊर्जा केंद्र की कल्पना करने के लिए मुंबई हाई-बसीन अक्ष को लोकेट करें।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 24 जनवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण“बताता है कि कैसे स्थानीय परंपराओं और उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों के विचारों के मेल-जोल से क्षेत्रीय पहचान विकसित हुई, जिसने अनूठी भाषाओं, कला रूपों और धार्मिक पद्धतियों को जन्म दिया।

भाषा और क्षेत्र के बीच का संबंध लोगों का वर्णन करने का एक प्राथमिक तरीका है।

  • चेर शासक: नौवीं शताब्दी में वर्तमान केरल में स्थापित ‘महोदयपुरम्’ के चेर राज्य ने अपने अभिलेखों में मलयालम भाषा और लिपि का प्रयोग किया।
  • संस्कृत का प्रभाव: क्षेत्रीय भाषा का उपयोग करने के बावजूद, चेर शासकों ने संस्कृत परंपराओं से भी बहुत कुछ लिया। मलयालम के शुरुआती साहित्यिक कार्य (12वीं शताब्दी) संस्कृत के ऋणी थे।
  • मणिप्रवालम्: 14वीं शताब्दी का एक ग्रंथ, ‘लीलातिलकम’, ‘मणिप्रवालम्’ शैली में लिखा गया था। इसका शाब्दिक अर्थ है “हीरा और मूंगा”, जो दो भाषाओं—संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ प्रयोग को दर्शाता है।

अन्य क्षेत्रों में, क्षेत्रीय संस्कृतियाँ धार्मिक परंपराओं के इर्द-गिर्द विकसित हुईं।

  • जगन्नाथ संप्रदाय: उड़ीसा के पुरी में, स्थानीय देवता को विष्णु का स्वरूप माना गया। आज भी स्थानीय जनजातीय लोग देवता की लकड़ी की प्रतिमा बनाते हैं।
  • राजनीतिक संरक्षण: 12वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजा अनंतवर्मन ने जगन्नाथ के लिए एक मंदिर बनवाया। बाद में, राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना राज्य देवता को अर्पित कर दिया और खुद को ईश्वर का “प्रतिनिधि” घोषित किया।
  • विजय और नियंत्रण: जैसे-जैसे मंदिर तीर्थयात्रा का केंद्र बना, इसका सामाजिक और राजनीतिक महत्व बढ़ गया। मुगलों, मराठों और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस मंदिर पर नियंत्रण करने की कोशिश की ताकि उनका शासन स्थानीय लोगों को स्वीकार्य हो सके।

19वीं शताब्दी में, अंग्रेजों ने वर्तमान राजस्थान के क्षेत्र को ‘राजपूताना’ कहा।

  • शूरवीर आदर्श: ये अक्सर राजपूतों से जुड़े थे, जो हार स्वीकार करने के बजाय युद्ध के मैदान में मृत्यु को चुनना पसंद करते थे।
  • चारण-भाट (Minstrels): राजपूत नायकों की कहानियों को कविताओं और गीतों में दर्ज किया गया, जिन्हें चारण-भाटों द्वारा गाया जाता था। इन यादों को इसलिए सुरक्षित रखा गया ताकि दूसरे लोग भी उनके उदाहरण का अनुसरण करने के लिए प्रेरित हों।
  • सती प्रथा: महिलाएँ भी इन वीरतापूर्ण कहानियों का हिस्सा थीं। कभी-कभी वे सती प्रथा के माध्यम से अपने मृतक पतियों के साथ चिता पर आत्मदाह कर लेती थीं।

विभिन्न क्षेत्रों में अनूठे नृत्य रूप विकसित हुए जिनकी जड़ें अक्सर धार्मिक थीं।

  • उत्पत्ति: कथक की शुरुआत उत्तर भारत के मंदिरों में ‘कथा’ (कहानी) सुनाने वाली एक जाति से हुई, जो इशारों और गानों के साथ प्रदर्शन करते थे।
  • विकास: भक्ति आंदोलन के प्रसार के साथ, कथक एक विशिष्ट नृत्य शैली के रूप में विकसित हुआ, जिसमें राधा और कृष्ण की कहानियों (रासलीला) को शामिल किया गया।
  • संरक्षण: मुगल सम्राटों के शासन में यह दरबार में प्रदर्शित किया जाने लगा और इसने अपने वर्तमान स्वरूप—तेज पद-संचालन और विस्तृत वेशभूषा—को प्राप्त किया। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण में यह कला बहुत फली-फूली।
  • शास्त्रीय दर्जा: हालांकि ब्रिटिश शासकों ने इसे नापसंद किया, लेकिन यह जीवित रहा और इसे भारत के छह “शास्त्रीय” नृत्यों में से एक के रूप में मान्यता मिली।

एक अन्य क्षेत्रीय परंपरा लघुचित्रकला की थी—छोटे आकार के चित्र जो आमतौर पर कपड़े या कागज पर जलरंगों (Watercolors) से बनाए जाते थे।

  • मुगल प्रभाव: मुगल सम्राटों ने अत्यधिक कुशल चित्रकारों को संरक्षण दिया जो ऐतिहासिक वृत्तांतों और कविता वाली पांडुलिपियों को चित्रित करते थे।
  • क्षेत्रीय शैलियाँ: मुगल साम्राज्य के पतन के साथ, चित्रकार दक्कन और राजस्थान के राजपूत दरबारों जैसे क्षेत्रीय न्यायालयों में चले गए। उन्होंने पौराणिक कथाओं और कविता के विषयों पर आधारित विशिष्ट शैलियाँ विकसित कीं।
  • बसोहली और कांगड़ा: हिमालय की तलहटी (हिमाचल प्रदेश) में, ‘बसोहली’ नामक एक साहसी शैली विकसित हुई। बाद में, वैष्णव परंपराओं से प्रेरित ‘कांगड़ा शैली’ उभरी, जिसकी विशेषता कोमल रंग और काव्यात्मक विषय थे।

बंगाली भाषा का विकास भाषाओं के जटिल मिश्रण को दर्शाता है।

  • भाषा: हालाँकि बंगाली संस्कृत से निकली है, लेकिन यह विकास के कई चरणों से गुज़री। फारसी, यूरोपीय और जनजातीय भाषाओं के शब्दों का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक बंगाली का हिस्सा बन गया।
  • साहित्य: शुरुआती बंगाली साहित्य में संस्कृत महाकाव्यों के अनुवाद और ‘नाथ’ साहित्य (जैसे मयनामती और गोपी चंद्र के गीत) शामिल हैं।
  • पीर और मंदिर: 16वीं शताब्दी से लोग दक्षिण-पूर्वी बंगाल में बसने लगे। समुदाय के नेताओं, जिन्हें अक्सर ‘पीर’ (आध्यात्मिक मार्गदर्शक) कहा जाता था, ने स्थिरता प्रदान की। बंगाल में मिट्टी और ईंटों के कई ‘टेराकोटा’ मंदिर बनाए गए।
  • भोजन के रूप में मछली: क्षेत्रीय संस्कृतियाँ अक्सर खान-पान की आदतों से प्रभावित होती हैं। चूंकि बंगाल एक नदीय मैदान है, इसलिए मछली और चावल मुख्य आहार बन गए। दिलचस्प बात यह है कि बंगाल में ब्राह्मणों को कुछ किस्मों की मछली खाने की अनुमति थी, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और मंदिरों की दीवारों पर मिलता है।
  1. मणिप्रवालम्: संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा के मेल वाली शैली।
  2. पीर: फारसी शब्द जिसका अर्थ ‘आध्यात्मिक मार्गदर्शक’ है।
  3. टेराकोटा: पकी हुई मिट्टी।
  4. चारण-भाट: वे लोग जो नायकों की प्रशंसा में गीत गाते थे।

🎨 क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण

🗣️ भाषा और क्षेत्र
केरल की मलयालम भाषा 9वीं शताब्दी में उभरी। संस्कृत के साथ इसके मेल से मणिप्रवालम (हीरा और मूंगा) शैली का जन्म हुआ। क्षेत्रीय साहित्य अक्सर ऐसी ही भाषाई मिलावट से विकसित हुआ।
🕍 धार्मिक संप्रदाय
पुरी (ओडिशा) का जगन्नाथ संप्रदाय एक स्थानीय देवता को विष्णु का रूप मानने से विकसित हुआ। राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना पूरा राज्य देवता को अर्पित कर मंदिर को राजनीतिक केंद्र बना दिया।
💃 नृत्य और वीरता
कथक उत्तर भारतीय कथावाचकों से विकसित होकर वाजिद अली शाह के संरक्षण में शास्त्रीय नृत्य बना। वहीं, राजपूतों की वीरता को ‘चारण-भाटों’ ने गीतों के माध्यम से अमर कर दिया।
🖌️ लघुचित्र (Miniature)
क्षेत्रीय दरबारों में छोटी पेंटिंग्स फली-फूलीं। जहाँ बसोहली शैली साहसी थी, वहीं कांगड़ा शैली ने कोमल रंगों और वैष्णव परंपराओं के काव्यमय चित्रण से अपनी अलग पहचान बनाई।
बंगाल का उदाहरण बंगाली संस्कृति में गहरा मिश्रण दिखता है; सामुदायिक नेता जिन्हें ‘पीर’ कहा जाता था, उन्होंने स्थिरता दी। यहाँ के टेराकोटा मंदिर और मछली खाने की परंपरा स्थानीय भूगोल का प्रभाव दर्शाती है।
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कक्षा-7 इतिहास अध्याय-2 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नये राजा और उनके राज्य

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राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का प्रमुख होता है। जहाँ प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख (De Facto) होता है, वहीं राष्ट्रपति औपचारिक या नाममात्र का प्रमुख (De Jure) होता है।

यह अनुच्छेद पद की स्थापना करता है। यह स्पष्ट कहता है: “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”

  • संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित होंगी।
  • वह इन शक्तियों का प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों (मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करेगा।
  • वह भारत के रक्षा बलों का सर्वोच्च सेनापति (Supreme Commander) होता है।

नोट: राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यकारी (कानूनी रूप से प्रमुख) होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी (वास्तविक रूप से प्रमुख) होता है।

राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

  1. संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य
  2. राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
  3. केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (70वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया)।

महत्वपूर्ण नोट: संसद और विधानसभाओं के मनोनीत (Nominated) सदस्य चुनाव में भाग नहीं लेते हैं।

चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote – STV) के माध्यम से होता है। मतदान गुप्त मतदान (Secret Ballot) द्वारा किया जाता है।

  • एक विधायक (MLA) के मत का मूल्य: Value=Total Population of StateTotal Elected Members of State Legislative Assembly×11000
  • एक सांसद (MP) के मत का मूल्य: Value=Total Value of Votes of all MLAs of all StatesTotal Elected Members of Parliament
  • राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है।
  • वह उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप सकता है।
  • संविधान के उल्लंघन के लिए उसे महाभियोग (Impeachment) द्वारा हटाया जा सकता है।

भारत का राष्ट्रपति कितनी भी बार पुनर्निर्वाचित हो सकता है (अमेरिका में अधिकतम दो बार की सीमा है)।

राष्ट्रपति चुने जाने के लिए व्यक्ति को:

  1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर लेनी चाहिए।
  3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए योग्य होना चाहिए।
  4. केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के तहत किसी लाभ के पद (Office of Profit) पर नहीं होना चाहिए।
  • वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति निर्वाचित होता है, तो पद ग्रहण की तारीख से उसकी वह सीट रिक्त मानी जाएगी।
  • उसके कार्यकाल के दौरान उसकी उपलब्धियों और भत्तों को कम नहीं किया जा सकता।
  • वह बिना किराया दिए आधिकारिक निवास (राष्ट्रपति भवन) के उपयोग का हकदार होगा।
  • राष्ट्रपति को शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) दिलाते हैं। उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।
  • राष्ट्रपति “संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण” करने की शपथ लेता है।

यह राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया है।

  • आधार: केवल “संविधान का उल्लंघन”
  • प्रक्रिया:
    1. 14 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य है।
    2. आरोप पत्र पर उस सदन के कम से कम 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
    3. प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्यता के 2/3 बहुमत से पारित होना चाहिए।
    4. दूसरा सदन आरोपों की जाँच करता है; यदि वह भी 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देता है, तो राष्ट्रपति को पद छोड़ना पड़ता है।
  • कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए राष्ट्रपति का चुनाव करा लेना चाहिए।
  • यदि रिक्ति मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने के कारण हुई है, तो चुनाव 6 महीने के भीतर होने चाहिए। इस अंतराल में उपराष्ट्रपति ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के रूप में कार्य करता है।
अनुच्छेदकीवर्डयाद रखने की ट्रिक
52पदभारत का एक राष्ट्रपति होगा।
54निर्वाचनकौन वोट देगा (निर्वाचक मंडल)।
56कार्यकाल5 वर्ष की अवधि।
58योग्यताएं35 वर्ष + लोकसभा की योग्यता।
60शपथCJI द्वारा दिलाई जाती है।
61महाभियोगहटाने की प्रक्रिया (2/3 बहुमत)।
62रिक्ति6 महीने के भीतर चुनाव अनिवार्य।

🏛️ भारत का राष्ट्रपति (अनुच्छेद 52–62)

👑 कार्यकारी प्रमुख (52-53)
राष्ट्रपति भारत का राज्य प्रमुख और रक्षा बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है। वह नाममात्र का प्रमुख (De Jure) है। संघ की सभी कार्यकारी शक्तियाँ उसमें निहित होती हैं।
🗳️ निर्वाचक मंडल (54)
संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य + राज्यों की विधानसभाओं (दिल्ली, पुडुचेरी और J&K सहित) के निर्वाचित सदस्य। मनोनीत सदस्य मतदान नहीं कर सकते।
📜 योग्यताएं (58)
वह भारत का नागरिक हो, न्यूनतम आयु 35 वर्ष हो, और लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो। वह किसी ‘लाभ के पद’ पर न हो।
⚖️ महाभियोग (61)
हटाने का एकमात्र आधार: “संविधान का अतिक्रमण”। 14 दिन का नोटिस, 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर और दोनों सदनों में कुल सदस्यता के 2/3 बहुमत की आवश्यकता।
📊 मतों का मूल्य (अनुच्छेद 55)
चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा होता है।
विधायक (MLA) के मत का मूल्य = [राज्य की कुल जनसंख्या / निर्वाचित विधायकों की कुल संख्या] × [1/1000]
सांसद (MP) के मत का मूल्य = [सभी राज्यों के विधायकों के मतों का कुल मूल्य / निर्वाचित सांसदों की कुल संख्या]
✍️ शपथ और रिक्ति (60-62)
शथप: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा दिलाई जाती है। रिक्ति: चुनाव 6 महीने के भीतर होने चाहिए; तब तक उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।
⏳ पदावधि (56-57)
कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। वह कितनी भी बार पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र है। राष्ट्रपति अपना इस्तीफा उपराष्ट्रपति को संबोधित करते हैं।
त्वरित सारांश
54: निर्वाचन | 56: कार्यकाल | 58: योग्यता (35 वर्ष) | 60: शपथ (CJI) | 61: महाभियोग

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (24 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; संवैधानिक समायोजन; संघवाद; क्षेत्रीय संतुलन)।

  • संदर्भ: जनगणना 2027 के बाद होने वाले आगामी परिसीमन (Delimitation) अभ्यास का विश्लेषण, जो स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पुनर्गठन होगा।
  • मुख्य बिंदु:
    • संवैधानिक रोक (Freeze): जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले राज्यों को दंडित होने से बचाने के लिए 1976 से लोकसभा सीटों के वितरण को 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर रोक दिया गया है।
    • प्रजनन दर में अंतर: उत्तर भारत के राज्यों (यूपी, बिहार) में जनसंख्या वृद्धि जारी है, जबकि दक्षिण और पश्चिम के राज्यों ने प्रजनन दर में भारी कमी हासिल की है।
    • अनुमानित आंकड़े: 888 सदस्यों वाली विस्तारित लोकसभा में, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 151 और बिहार की 40 से बढ़कर 82 हो सकती हैं, जो सदन की कुल संख्या का 26% से अधिक होगा।
    • सापेक्ष प्रभाव में गिरावट: यद्यपि तमिलनाडु (39 से 53) और केरल (20 से 23) जैसे राज्यों की सीटों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन कुल सदन में उनकी प्रतिशत हिस्सेदारी काफी कम हो जाएगी।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद की चुनौतियां”, “चुनावी प्रतिनिधित्व” और “शासन पर जनसंख्या नीति के प्रभाव”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नैतिक विरोधाभास: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, सुशासन (जनसंख्या नियंत्रण) के लिए राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नुकसान के रूप में सजा क्यों मिलनी चाहिए?
    • भारित फॉर्मूला (Weighted Formula): एक प्रस्तावित समाधान ऐसा फॉर्मूला है जिसमें 80% महत्व जनसंख्या को और 20% विकास संकेतकों (साक्षरता, स्वास्थ्य) को दिया जाए।
    • राज्यसभा का सुदृढ़ीकरण: संघीय संतुलन बहाल करने के लिए राज्यसभा में अधिवास (Domicile) आवश्यकताओं को फिर से लागू करने और राज्यों के स्तर (बड़े, मध्यम, छोटे) के अनुसार प्रतिनिधित्व देने के सुझाव दिए गए हैं।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध; रणनीतिक स्वायत्तता)।

  • संदर्भ: गणतंत्र दिवस और 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली में यूरोपीय संघ (EU) के नेतृत्व की आगामी यात्रा की तैयारी।
  • मुख्य बिंदु:
    • भू-राजनीतिक बीमा: 2007 से बातचीत के अधीन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब वैश्विक अनिश्चितता (अमेरिकी टैरिफ और चीन की आक्रामकता) के खिलाफ एक ‘बीमा पॉलिसी’ के रूप में देखा जा रहा है।
    • जलवायु इक्विटी मुद्दे: एक प्रमुख बाधा यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) है, जिसे भारत एक ‘गैर-टैरिफ बाधा’ मानता है जो निर्यात पर 20%-35% शुल्क लगा सकता है।
    • रक्षा साझेदारी: व्यापार के अलावा, एक प्रस्तावित सुरक्षा और रक्षा साझेदारी यूरोपीय संघ को भारत के बाजार तक और भारत को यूरोपीय उच्च तकनीक तक पहुंच प्रदान करेगी।
    • रणनीतिक स्वायत्तता: दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि संप्रभु विकल्प स्वतंत्र रहने चाहिए, जिसमें वाशिंगटन, मास्को या बीजिंग का ‘वीटो’ न हो।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक संबंध”, “जलवायु वित्त/व्यापार नीति” और “वैश्विक बहुपक्षवाद”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सह-उत्पादन के अवसर: भारत के लिए, यह साझेदारी हिंद महासागर में संयुक्त सैन्य अभ्यास और सह-उत्पादन के अवसर खोलकर ‘मेक इन इंडिया’ को पूरक बनाती है।
    • बहुध्रुवीय व्यवस्था: इस गठबंधन का उद्देश्य बहुपक्षवाद का एक नया अध्याय सह-निर्मित करना है जो लचीला और न्यायसंगत हो।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य का विकास और प्रबंधन; गरीबी और भूख से संबंधित मुद्दे)।

  • संदर्भ: पश्चिम बंगाल में आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा मासिक वेतन ₹15,000 करने की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन।
  • मुख्य बिंदु:
    • दर्जे से वंचित: क्रमिक सरकारों ने श्रम कानूनों और स्थायी कर्मचारी लाभों से बचने के लिए इन आवश्यक श्रमिकों को ‘स्वयंसेवक’ (Volunteers) या ‘कार्यकर्ता’ (Activists) के रूप में वर्गीकृत किया है।
    • बजटीय कटौती: 2015 में ICDS बजट में कटौती की गई और 2018 में केंद्र ने कार्यकर्ताओं के वेतन में अपने योगदान को स्थिर (Freeze) कर दिया।
    • अंतर-राज्यीय असमानता: केंद्र के मानदेय में वृद्धि न होने के कारण, धनी राज्यों ने अपने बजट से अतिरिक्त भुगतान किया, जिससे वेतन में क्षेत्रीय असमानता पैदा हो गई है।
    • कानूनी वर्गीकरण: संपादकीय न्यूनतम मजदूरी और पेंशन सुनिश्चित करने के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ के तहत उन्हें ‘वैधानिक कर्मचारी’ के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने की मांग करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा”, “श्रम कानून सुधार” और “कल्याणकारी शासन”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सामाजिक अनुबंध का उल्लंघन: राज्य ने अपने सबसे कमजोर श्रमिकों के साथ सामाजिक अनुबंध को तोड़ दिया है।
    • शोषणकारी ढांचा: मुख्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए इन पर निर्भर रहना और उन्हें उचित हक न देना जानबूझकर किया गया शोषण है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; राज्यपाल की भूमिका; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्षी शासित राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधानसभा से बहिर्गमन (Walkout) और नीतिगत भाषणों के चुनिंदा अंशों को पढ़ना।
  • मुख्य बिंदु:
    • अनुच्छेद 176 (1) का अधिदेश: संविधान निर्दिष्ट करता है कि राज्यपाल विधानमंडल को संबोधित “करेगा” (Shall); इसे एक कार्यकारी कार्य माना जाता है।
    • सीमित विवेकाधिकार: उच्चतम न्यायालय (जैसे नबाम रेबिया मामला) ने माना है कि राज्यपाल के पास पैराग्राफ छोड़ने या सरकारी नीति की आलोचना करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है।
    • सहायता और सलाह: राज्यपाल का भाषण राज्य मंत्रिमंडल की नीति को दर्शाता है, और राज्यपाल संवैधानिक रूप से उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद विवाद”, “संवैधानिक पदाधिकारी” और “केंद्र-राज्य घर्षण”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • लोकतंत्र का प्रतीक: संबोधन जनता की निर्वाचित सरकार के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है; इसमें व्यवधान डालना “कर्तव्य से विमुख होना” माना जाता है।
    • संस्थागत पुनर्परिभाषा: राज्यपाल के पद की गरिमा को दलीय राजनीति से ऊपर बनाए रखने के लिए इस भूमिका को फिर से परिभाषित करने की मांग बढ़ रही है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 1 (सामाजिक मुद्दे; प्रौद्योगिकी का प्रभाव) और GS पेपर 2 (शासन; नैतिकता)।

  • संदर्भ: केरल की एक दुखद घटना जहाँ एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में छेड़छाड़ का आरोप लगने के बाद आत्महत्या कर ली।
  • मुख्य बिंदु:
    • तत्काल न्याय: यह प्रकरण उजागर करता है कि कैसे सोशल मीडिया एक “युद्धक्षेत्र” बन गया है जहाँ जनमत न्यायाधीश और जूरी की भूमिका निभाता है।
    • पुलिस जाँच: बाद में सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयानों की समीक्षा में व्यक्ति के व्यवहार में “कुछ भी असामान्य या आपत्तिजनक नहीं” पाया गया।
    • कानूनी ग्रे ज़ोन: साइबर अपराध जांचकर्ताओं का कहना है कि बिना सहमति के सार्वजनिक स्थानों पर वीडियो बनाना और सार्वजनिक अपमान के लिए उनका उपयोग करना व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल नैतिकता”, “साइबर अपराध और कानून” और “डिजिटल युग में सामाजिक अनुबंध”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • विनाशकारी शक्ति: यह मामला “त्वरित और लापरवाह रील्स” के दौर में जवाबदेही, सहानुभूति और झूठे आरोपों के जोखिम पर असहज सवाल उठाता है।
    • सामान्यीकृत आघात: मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि सार्वजनिक अपमान के कारण मानसिक आघात के जवाब में जीवन समाप्त करना सामान्य होता जा रहा है।

संपादकीय विश्लेषण

24 जनवरी, 2026
GS-2 राजव्यवस्था
🗳️ परिसीमन: संघीय विरोधाभास
2027 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन में यूपी की सीटें बढ़कर 151 हो सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रभाव कम होगा। मुद्दा: जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित करना। समाधान: जनसंख्या के साथ सुशासन (स्वास्थ्य/शिक्षा) को भी महत्व देना।
GS-2 अंत. संबंध
🌍 भारत-ईयू: रणनीतिक जोखिम निवारण
वैश्विक अस्थिरता के बीच FTA “भू-राजनीतिक बीमा” का कार्य करेगा। मुख्य बाधा: ईयू का कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) जो भारतीय निर्यात पर 20-35% शुल्क लगाएगा। लक्ष्य: रक्षा साझेदारी के माध्यम से भारत को उच्च-तकनीक (High-tech) तक पहुंच प्रदान करना।
GS-2 सामाजिक
🏥 आशा (ASHA) कार्यकर्ता: गरिमा का अधिकार
₹15,000 मासिक वेतन के लिए विरोध “स्वयंसेवक” दर्जे की कानूनी खामी को उजागर करता है। आलोचना: श्रम कानूनों से बचने के लिए आवश्यक स्वास्थ्य कर्मियों को केवल कार्यकर्ता मानना। आवश्यकता: न्यूनतम वेतन हेतु सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत इनका वैधानिक वर्गीकरण।
GS-2 राजव्यवस्था
🏛️ राज्यपाल: संवैधानिक सीमाएं
राज्यपालों द्वारा नीतिगत संबोधनों के अंशों को चयनात्मक रूप से पढ़ना अनुच्छेद 176(1) का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट (नबाम रेबिया) के अनुसार: राज्यपाल के पास कैबिनेट द्वारा अनुमोदित भाषण को अपनी इच्छा से बदलने का विवेक नहीं है।
GS-1 समाज
📱 सोशल मीडिया ट्रायल और भीड़ न्याय
केरल की हालिया त्रासदी “त्वरित न्याय” के जोखिम को दर्शाती है। बिना संदर्भ के वायरल क्लिप्स के आधार पर ‘डिजिटल शेमिंग’ करना समाज में जज और जूरी की भूमिका ले रहा है। नैतिकता: अपमान के लिए बिना सहमति वीडियो बनाना अनुच्छेद 21 और निर्दोषता की उपधारणा का हनन है।
त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):1971 जनगणना: वर्तमान लोकसभा सीटों का आधार (2026 के बाद पहली जनगणना तक स्थिर)। • CBAM: कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म – ईयू का प्रस्तावित जलवायु टैरिफ। • शमशेर सिंह केस: 1974 का फैसला जो राज्यपाल की शक्तियों को कैबिनेट की सलाह तक सीमित करता है।

यहाँ भारत के प्रमुख समुद्री बंदरगाहों और रणनीतिक समुद्री मार्गों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। ये विषय UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये आर्थिक भूगोल को भू-राजनीतिक रणनीति (जैसे SAGAR पहल और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स) के साथ जोड़ते हैं।

पश्चिमी तट अपनी प्राकृतिक बंदरगाह संरचनाओं के लिए जाना जाता है और यह मध्य पूर्व तथा यूरोप के साथ व्यापार का प्रवेश द्वार है।

  • कांडला (दीनदयाल बंदरगाह), गुजरात: यह एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal port) है और पेट्रोलियम व उर्वरक आयात का मुख्य केंद्र है। यह उत्तर-पश्चिमी भारत के औद्योगिक क्षेत्रों की सेवा करता है।
  • मुंबई बंदरगाह, महाराष्ट्र: भारत का सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त प्राकृतिक बंदरगाह
  • जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT), महाराष्ट्र: इसे ‘न्हावा शेवा’ के नाम से भी जाना जाता है; यह भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह है, जिसे मुंबई बंदरगाह के दबाव को कम करने के लिए विकसित किया गया था।
  • मर्मगाओ, गोवा: भारत का प्रमुख लौह अयस्क निर्यातक बंदरगाह।
  • न्यू मंगलुरु, कर्नाटक: कुद्रेमुख की खानों से लौह अयस्क के निर्यात का प्रबंधन करता है।
  • कोच्चि, केरल: यह विंलिंगडन द्वीप (Willingdon Island) पर वेम्बनाड झील के मुहाने पर स्थित है।

पूर्वी तट डेल्टा संरचनाओं के लिए जाना जाता है और यह दक्षिण-पूर्व एशिया और सुदूर पूर्व के देशों के साथ व्यापार का प्रवेश द्वार है।

  • तूतूकोरिन (V.O. चिदंबरनार), तमिलनाडु: श्रीलंका और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों के लिए विभिन्न प्रकार के माल का प्रबंधन करता है।
  • चेन्नई, तमिलनाडु: पूर्वी तट के सबसे पुराने कृत्रिम बंदरगाहों में से एक।
  • एन्नौर (कामराजार बंदरगाह), तमिलनाडु: भारत का पहला कॉर्पोरेट बंदरगाह, जो चेन्नई के उत्तर में स्थित है।
  • विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश: भारत का सबसे गहरा स्थलसीमा से घिरा (Landlocked) और सुरक्षित बंदरगाह; जापान को लौह अयस्क निर्यात का मुख्य केंद्र।
  • पारादीप, ओडिशा: महानदी डेल्टा में स्थित; लौह अयस्क और कोयले के निर्यात में विशेषज्ञता।
  • कोलकाता-हल्दिया, पश्चिम बंगाल: यह हुगली नदी पर स्थित एक नदीय बंदरगाह (Riverine port) है। हल्दिया को भारी माल के प्रबंधन के लिए कोलकाता के एक सहायक बंदरगाह के रूप में विकसित किया गया था।

इनका मानचित्रण “आंतरिक सुरक्षा” और “अंतर्राष्ट्रीय संबंध” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।

विशेषता (Feature)सामरिक महत्व (Strategic Importance)मानचित्र की स्थिति (Mapping Location)
6 डिग्री चैनलग्रेट निकोबार को सुमात्रा (इंडोनेशिया) से अलग करता है।इंदिरा पॉइंट के दक्षिण में
पाक जलडमरूमध्यबंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी से जोड़ता है।तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच
10 डिग्री चैनलअंडमान द्वीप समूह को निकोबार समूह से अलग करता है।10° उत्तरी अक्षांश रेखा
9 डिग्री चैनलमिनिकॉय द्वीप को मुख्य लक्षद्वीप से अलग करता है।9° उत्तरी अक्षांश रेखा
  • NW-1: गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली (प्रयागराज से हल्दिया)।
  • NW-2: ब्रह्मपुत्र नदी (सादिया से धुबरी)।
  • NW-3: केरल में पश्चिमी तट नहर (कोट्टापुरम से कोल्लम)।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे गहरा बंदरगाहविशाखापत्तनमआंध्र प्रदेश
पहला कॉर्पोरेट बंदरगाहएन्नौरतमिलनाडु
सबसे बड़ा कंटेनर पोर्टJNPT (न्हावा शेवा)महाराष्ट्र
नदीय बंदरगाहकोलकातापश्चिम बंगाल

पश्चिमी और पूर्वी तट के बंदरगाहों को उनके उत्तर-से-दक्षिण क्रम में याद रखें। उदाहरण के लिए, पश्चिम में: कांडला → मुंबई → मर्मगाओ → मंगलुरु → कोच्चि। परीक्षाओं में अक्सर इनका सही भौगोलिक क्रम पूछा जाता है।

समुद्री प्रवेश द्वार (Maritime Gateways)

पश्चिमी तटरेखा
⚓ अरब सागर के बंदरगाह
प्राकृतिक बंदरगाहों की प्रधानता वाला यह तट कांडला (ज्वारीय हब), मुंबई (सबसे व्यस्त प्राकृतिक पत्तन), और JNPT—भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह समेटे हुए है।
अभ्यास: कोच्चि में विलिंगडन द्वीप को खोजें और न्यू मंगलौर तक कुद्रेमुख लौह अयस्क मार्ग की पहचान करें।
पूर्वी तटरेखा
🚢 डेल्टा क्षेत्र के प्रवेश द्वार
दक्षिण-पूर्वी एशिया का प्रवेश द्वार, जिसमें कोलकाता-हल्दिया का नदीय बंदरगाह, चेन्नई का कृत्रिम बंदरगाह, और विशाखापत्तनम—भारत का सबसे गहरा भू-आबद्ध बंदरगाह शामिल है।
अभ्यास: पारादीप को खोजने के लिए महानदी डेल्टा का पता लगाएं और भारत के पहले कॉर्पोरेट बंदरगाह, एन्नोर की पहचान करें।
भू-राजनीति
🌊 रणनीतिक चोक पॉइंट्स
राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग, जिसमें समुद्री चैनल और पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) शामिल हैं।
विशेषता रणनीतिक महत्व स्थान
6° चैनलनिकोबार को सुमात्रा से अलग करता हैइंदिरा पॉइंट के दक्षिण में
पाक जलडमरूमध्यबंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी से जोड़ता हैतमिलनाडु और श्रीलंका के बीच
10° चैनलअंडमान को निकोबार से अलग करता है10° उत्तरी अक्षांश
अभ्यास: प्रयागराज से हल्दिया बंदरगाह तक राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (NW-1) के मार्ग को ट्रेस करें।
समुद्री मैपिंग चेकलिस्ट
श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
सबसे गहरा बंदरगाहविशाखापत्तनमआंध्र प्रदेश
कॉर्पोरेट बंदरगाहएन्नोर (कामराजर)तमिलनाडु
सबसे बड़ा कंटेनर हबJNPT (न्हावा शेवा)महाराष्ट्र
नदीय बंदरगाहकोलकाता बंदरगाहहुगली नदी, प. बंगाल

Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 23, 2026

Dainik CSAT Quiz (23 January 2026)
दैनिक CSAT क्विज़

दैनिक CSAT क्विज़

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    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 23 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “ईश्वर से अनुराग” आठवीं शताब्दी के बाद से विकसित हुए विभिन्न भक्ति और सूफी आंदोलनों की व्याख्या करता है, जिन्होंने ईश्वर के प्रति प्रेम और सामाजिक भेदभाव के त्याग पर जोर दिया।

    बड़े राज्यों के उदय से पहले लोग स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते थे। जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़े, नए विचार पैदा हुए:

    • पुनर्जन्म का चक्र: यह विश्वास व्यापक हो गया कि सभी जीव अपने अच्छे और बुरे कर्मों के आधार पर जन्म और पुनर्जन्म के चक्रों से गुजरते हैं।
    • सामाजिक असमानता: यह विचार कि सामाजिक विशेषाधिकार किसी “कुलीन” परिवार या “ऊँची” जाति में जन्म लेने से मिलते हैं, बहुत प्रबल हो गया।
    • व्यक्तिगत भक्ति: कई लोग सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए बुद्ध या जैनों की शिक्षाओं की ओर मुड़े। अन्य लोग ‘भक्ति’ के विचार से आकर्षित हुए, जिसमें एक परमेश्वर तक प्रेम और समर्पण के माध्यम से पहुँचा जा सकता था। यह विचार ‘भगवद्गीता’ में लोकप्रिय हुआ।

    सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच, दक्षिण में नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व नयनारों और अलवारों ने किया।

    • संत: नयनार (शिव के भक्त) और अलवार (विष्णु के भक्त) सभी जातियों से आए थे, जिनमें पुलैयार और पनार जैसी “अस्पृश्य” मानी जाने वाली जातियों के लोग भी शामिल थे।
    • दर्शन: उन्होंने मुक्ति के मार्ग के रूप में शिव या विष्णु के प्रति गहरे प्रेम का उपदेश दिया। वे विभिन्न गाँवों में घूमते थे और स्थानीय मंदिरों में स्थापित देवताओं की प्रशंसा में सुंदर कविताएँ रचते थे।
    • मंदिर निर्माण: दसवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच, चोल और पांड्य राजाओं ने उन धार्मिक स्थलों पर भव्य मंदिर बनवाए जहाँ इन संत-कवियों ने यात्रा की थी, जिससे भक्ति परंपरा और मंदिर पूजा के बीच संबंध मजबूत हुए।
    • शंकर (8वीं शताब्दी): केरल में जन्मे शंकर ‘अद्वैतवाद’ के समर्थक थे। इसके अनुसार जीवात्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं। उन्होंने सिखाया कि संसार एक ‘माया’ (भ्रम) है और उन्होंने ज्ञान के लिए संन्यास का मार्ग अपनाने का उपदेश दिया।
    • रामानुज (11वीं शताब्दी): तमिलनाडु में जन्मे रामानुज अलवार संतों से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार मुक्ति प्राप्त करने का सबसे अच्छा साधन विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति भाव रखना है। उन्होंने ‘विशिष्टाद्वैत’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार आत्मा, परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलग सत्ता बनाए रखती है।

    वीरशैव आंदोलन की शुरुआत बसवन्ना और उनके साथियों (अल्लम प्रभु और अक्कमहादेवी) ने 12वीं शताब्दी के मध्य में कर्नाटक में की थी।

    • मान्यताएँ: उन्होंने सभी मनुष्यों की समानता के लिए और जाति व महिलाओं के प्रति व्यवहार के बारे में ब्राह्मणवादी विचारों के विरुद्ध तर्क दिया।
    • कर्मकांड: वे सभी प्रकार के कर्मकांडों और मूर्ति पूजा के विरोधी थे।

    तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संत-कवियों तथा सखूबाई जैसी महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

    • विट्ठल भक्ति: यह परंपरा पंढरपुर में भगवान विट्ठल (विष्णु का एक रूप) की पूजा पर केंद्रित थी।
    • कर्मकांडों का त्याग: इन संतों ने सभी प्रकार के कर्मकांडों, पवित्रता के बाहरी प्रदर्शन और जन्म पर आधारित सामाजिक अंतरों को खारिज कर दिया। उन्होंने अपने परिवारों के साथ रहने, रोजी-रोटी कमाने और जरूरतमंद साथी मनुष्यों की सेवा करने को प्राथमिकता दी।

    इस काल में कई धार्मिक समूहों ने पारंपरिक धर्म और सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की।

    • मुक्ति का मार्ग: उन्होंने संसार का त्याग करने (संन्यास) की वकालत की और माना कि निराकार परम सत्य का चिंतन और ध्यान ही मुक्ति का मार्ग है।
    • अभ्यास: इसके लिए उन्होंने योगासन, प्राणायाम और ध्यान जैसी क्रियाओं के माध्यम से मन और शरीर को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया।

    सूफी मुसलमान रहस्यवादी थे। उन्होंने बाहरी धार्मिकता को खारिज कर दिया और ईश्वर के प्रति प्रेम व भक्ति तथा सभी मनुष्यों के प्रति दया भाव पर बल दिया।

    • ईश्वर से मिलन: सूफियों का मानना था कि दुनिया को देखने के लिए दिल को प्रशिक्षित किया जा सकता है। उन्होंने ज़िक्र (नाम का जाप), चिंतन और समा (गाना) जैसे प्रशिक्षण के विस्तृत तरीके विकसित किए।
    • सिलसिले: सूफी गुरुओं की वंशावली को सिलसिला कहा जाता था। भारत में चिश्ती सिलसिला सबसे प्रभावशाली था, जिसमें ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया जैसे महान शिक्षक हुए।

    तेरहवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की एक शक्तिशाली लहर आई।

    • कबीर: सबसे प्रभावशाली संतों में से एक, उनका पालन-पोषण वाराणसी के एक मुस्लिम बुनकर (जुलाहा) परिवार में हुआ था। उनके विचार ‘साखी’ और ‘पद’ नामक छंदों के संग्रह में मिलते हैं। वे निराकार परमेश्वर में विश्वास करते थे और उन्होंने जाति व्यवस्था व बाहरी पूजा के सभी रूपों को खारिज कर दिया।
    • बाबा गुरु नानक (1469–1539): उन्होंने करतारपुर में एक केंद्र स्थापित किया। उनकी शिक्षाओं ने एक ईश्वर की उपासना और ईमानदारी से जीवन जीने पर जोर दिया। उन्होंने अपनी शिक्षाओं के सार के लिए नाम, दान और इस्रान शब्दों का प्रयोग किया। उनके भजनों को ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित किया गया है।
    • मीराबाई: मेवाड़ के राजघराने की एक राजपूत राजकुमारी, वे ‘अस्पृश्य’ मानी जाने वाली जाति के संत रविदास की शिष्या बनीं। उनके गीतों ने “ऊँची” जातियों के मानदंडों को खुली चुनौती दी और वे आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हुए।
    1. अद्वैतवाद: जीवात्मा और परमात्मा के एक होने का सिद्धांत।
    2. विशिष्टाद्वैत: आत्मा के परमात्मा से मिलने के बाद भी अपनी पहचान बनाए रखने का सिद्धांत।
    3. खानकाह: सूफी संस्था जहाँ सूफी संत अक्सर रहते थे और चर्चा करते थे।
    4. तांडा: बंजारों का समूह।

    🪕 ईश्वर से अनुराग

    🕉️ दक्षिण में भक्ति
    इसका नेतृत्व नयनारों (शिव भक्त) और अलवारों (विष्णु भक्त) ने किया, जिन्होंने जातिवाद को नकारा। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद (परमात्मा से एकता) और रामानुज ने भक्ति को मोक्ष का मार्ग बताया।
    🕌 सूफ़ी रहस्यवाद
    सूफ़ी संतों ने ईश्वर के प्रति प्रेम और दया पर जोर दिया। वे ज़िक्र (नाम का जाप) और समा (गायन) का उपयोग करते थे। निज़ामुद्दीन औलिया जैसे संतों के कारण चिश्ती सिलसिला भारत में अत्यधिक प्रभावी हुआ।
    🧘 विद्रोही विचारक
    कर्नाटक के वीरशैवों ने समानता के लिए संघर्ष किया। नाथपंथी और योगियों जैसे समूहों ने संसार का त्याग कर योगासनों और प्राणायाम के माध्यम से निराकार परम सत्य के ध्यान की वकालत की।
    📖 उत्तर भारत के संत
    कबीर ने बाहरी आडंबरों को ठुकराया। बाबा गुरु नानक ने करतारपुर केंद्र बनाया और ‘नाम, दान और इस्रान’ की शिक्षा दी। राजपूत राजकुमारी मीराबाई ने अपने भजनों से उच्च जातियों के नियमों को चुनौती दी।
    साझा संदेश मध्यकालीन संतों ने कर्मकांडों और सामाजिक भेदभाव को त्याग कर साधारण लोगों के बीच रहने और क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी भक्ति व्यक्त करने को प्राथमिकता दी।
    📂

    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-8 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: ईश्वर से अनुराग

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    यहाँ भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) के अंतर्गत मौलिक अधिकार (FR) एवं नीति निदेशक तत्वों (DPSP) की तुलना और मौलिक कर्तव्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

    संविधान के भाग III (FR) और भाग IV (DPSP) के बीच का संबंध समय के साथ उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है। जहाँ मौलिक अधिकार व्यक्तिगत और वाद-योग्य हैं, वहीं DPSP समाजवादी और अवाद-योग्य हैं।

    विशेषतामौलिक अधिकार (भाग III)नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
    प्रकृतिनकारात्मक (राज्य को कुछ करने से रोकना)।सकारात्मक (राज्य को कुछ करने का निर्देश देना)।
    न्यायिकतावाद-योग्य (अदालत द्वारा प्रवर्तनीय)।अवाद-योग्य (अदालत द्वारा अप्रवर्तनीय)।
    उद्देश्यराजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना।सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना।
    कानूनी स्थितिसामान्यतः DPSP से वरिष्ठ।सामान्यतः FR के अधीनस्थ (Subordinate)।
    1. चंपकम दोराईराजन मामला (1951): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं। यदि DPSP को लागू करने के लिए बनाया गया कोई कानून FR का उल्लंघन करता है, तो वह कानून शून्य होगा। DPSP को FR के “सहायक” के रूप में काम करना चाहिए।
    2. गोलकनाथ मामला (1967): कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार “पवित्र” हैं और DPSP के कार्यान्वयन के लिए उन्हें कम नहीं किया जा सकता।
    3. 25वाँ संशोधन अधिनियम (1971): संसद ने अनुच्छेद 31C पेश किया, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे अनुच्छेद 14 या 19 का उल्लंघन करते हैं।
    4. मिनर्वा मिल्स मामला (1980): सुप्रीम कोर्ट ने “सामंजस्य का सिद्धांत” (Doctrine of Harmony) स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान भाग III और भाग IV के बीच संतुलन की आधारशिला पर टिका है। एक को दूसरे पर पूर्ण प्राथमिकता देना संविधान की मूल संरचना को बिगाड़ देगा।

    मौलिक कर्तव्य मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे। इन्हें आपातकाल के दौरान नागरिकों को यह याद दिलाने के लिए जोड़ा गया था कि अधिकारों के साथ-साथ उनके कुछ कर्तव्य भी हैं।

    • संदर्भ: सरकार ने राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक कर्तव्यों पर सिफारिशें देने के लिए इस समिति का गठन किया।
    • परिणाम: इसकी सिफारिशों के आधार पर 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1976) पारित किया गया।
    • नया जोड़: संविधान में एक नया भाग IV-A और एक अकेला अनुच्छेद 51A जोड़ा गया।
    • स्रोत: यह पूर्व सोवियत संघ (USSR – अब रूस) के संविधान से प्रेरित है।

    मूल रूप से 10 कर्तव्य थे; 11वाँ बाद में जोड़ा गया।

    1. संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना।
    2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखना और उनका पालन करना।
    3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना और उसे अक्षुण्ण रखना।
    4. देश की रक्षा करना और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना।
    5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करना; महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना।
    6. हमारी सामासिक संस्कृति (Composite Culture) की समृद्ध विरासत का महत्व समझना और उसका परिरक्षण करना।
    7. प्राकृतिक पर्यावरण (वन, झील, नदी और वन्यजीव) की रक्षा करना और उसका संवर्धन करना।
    8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना।
    9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना और हिंसा से दूर रहना।
    10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना।
    11. 6 से 14 वर्ष तक की आयु के अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करना (इसे 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया)।
    कर्तव्य का केंद्रयाद रखने के लिए कीवर्ड
    ध्वज/गानसम्मान (Respect)
    स्वतंत्रता संग्रामआदर्श (Ideals)
    संप्रभुताएकता की रक्षा
    राष्ट्रीय सेवादेश की रक्षा
    भाईचारासमरसता
    संस्कृतिविरासत (Heritage)
    पर्यावरणवन्यजीव/नदियाँ
    विज्ञानवैज्ञानिक दृष्टिकोण
    संपत्तिसार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा
    उत्कृष्टतासर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
    बच्चों की शिक्षा6-14 वर्ष की आयु (86वां संशोधन)
    • अवाद-योग्य (Non-Justiciable): DPSP की तरह, मौलिक कर्तव्य भी कानून द्वारा तब तक लागू नहीं किए जा सकते जब तक कि संसद उनके लिए कोई विशेष कानून न बनाए (जैसे राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम)।
    • केवल नागरिकों के लिए: कुछ मौलिक अधिकारों के विपरीत (जो विदेशियों पर भी लागू होते हैं), मौलिक कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों के लिए हैं।

    ⚖️ FR और DPSP में संतुलन

    विशेषता मूल अधिकार (भाग III) निदेशक तत्व (भाग IV)
    प्रकृतिनकारात्मक (राज्य पर रोक)सकारात्मक (राज्य को निर्देश)
    न्यायिकतावाद-योग्य (अदालत द्वारा प्रवर्तनीय)गैर-वादयोग्य
    लक्ष्यराजनीतिक लोकतंत्रसामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र
    प्राथमिकतासामान्यतः उच्च और पवित्रमूल अधिकारों के पूरक
    📜 गोलकनाथ मामला (1967)
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूल अधिकार अलंघनीय हैं और निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए भी इनमें कटौती नहीं की जा सकती।
    🤝 मिनर्वा मिल्स (1980)
    कोर्ट ने सामंजस्य का सिद्धांत दिया। संविधान भाग III और भाग IV के बीच संतुलन की बुनियाद पर खड़ा है।
    विधिक तथ्य अनुच्छेद 31C के अनुसार, अनु. 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कानून अनु. 14 या 19 का उल्लंघन होने पर भी मान्य होंगे।

    🇮🇳 मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A)

    ✍️ उत्पत्ति और स्रोत
    42वें संशोधन (1976) द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़े गए। ये पूर्व सोवियत संघ (USSR) से प्रेरित हैं। भाग IV-A बनाया गया।
    🛡️ दायरा और प्रकृति
    DPSP की तरह ये भी गैर-वादयोग्य हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात: ये केवल नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशियों पर नहीं।
    कर्तव्य का क्षेत्र मुख्य शब्द (Keyword) याद करने की ट्रिक
    ध्वज/राष्ट्रगानसम्मानसंवैधानिक प्रतीकों का आदर
    एकता/अखंडतासंप्रभुताभारत के मानचित्र की रक्षा
    भाईचारासमरसतास्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथा त्यागना
    पर्यावरणवन्यजीवझील, नदी और वनों का संरक्षण
    ज्ञानवैज्ञानिक दृष्टिकोणजांच और सुधार की भावना
    संपत्तिसार्वजनिक संपत्तिहिंसा से दूर रहना
    शिक्षा6–14 वर्ष आयु86वें संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया
    मुख्य नोट वर्तमान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं। 11वां कर्तव्य (शिक्षा का अवसर) शिक्षा के अधिकार (अनु. 21A) के साथ तालमेल के लिए जोड़ा गया था।

    यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (23 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

    • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने भारत निर्वाचन आयोग (EC) से सवाल किया है कि क्या मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के लिए “अवैध सीमा पार आप्रवासन” (Illegal cross-border immigration) को स्पष्ट रूप से कारण बताया गया था, जिसके कारण लगभग 6.5 करोड़ नाम हटा दिए गए।
    • मुख्य बिंदु:
      • अस्पष्ट कारण: पीठ ने पाया कि SIR अधिसूचना में “बार-बार होने वाले प्रवास” (Frequent migration) को एक कारण बताया गया था, लेकिन 2003 के नागरिकता अधिनियम संशोधनों के तहत नागरिकता सत्यापन से जोड़ने वाला कोई “स्पष्ट उल्लेख” नहीं था।
      • न्यायिक स्पष्टीकरण: कोर्ट ने एक स्पष्ट अंतर बताया: भारत के भीतर “प्रवास” (Migration) एक मौलिक स्वतंत्रता है और हमेशा वैध है, जबकि “अवैध आप्रवासन” (Illegal immigration) में अंतर-देशीय आवाजाही शामिल है।
      • नागरिकों पर बोझ: कोर्ट ने उन लाखों लोगों (जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता और बुजुर्ग भी शामिल हैं) को होने वाले “अत्यधिक तनाव” को रेखांकित किया, जिन्हें अपनी पहचान साबित करने के लिए भौतिक सुनवाइयों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
      • विवेकाधिकार की सीमाएँ: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि निर्वाचन आयोग के पास व्यापक विवेकाधिकार हैं, लेकिन वह निर्धारित मानदंडों से “पूरी तरह मुक्त” नहीं है और उसे निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए।
    • UPSC प्रासंगिकता: “निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ”, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” और “प्रशासनिक कार्यों की न्यायिक समीक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • अवैध प्रवासी की परिभाषा: 2003 में पेश की गई इस अवधारणा के अनुसार किसी मतदाता के माता-पिता दोनों का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है; आयोग का तर्क है कि अनुच्छेद 324 उन्हें इसे सत्यापित करने का अधिकार देता है।
      • प्रक्रियात्मक सुधार: उत्तर प्रदेश के मतदाता अब निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर दस्तावेज अपलोड करके या अधिकृत प्रतिनिधियों के माध्यम से भौतिक सुनवाई से बच सकते हैं।
      • मताधिकार की पवित्रता: संपादकीय चेतावनी देता है कि वास्तविक मतदाताओं को ‘फॉर्म 6’ (नए मतदाताओं के लिए) के माध्यम से फिर से पंजीकरण करने के लिए मजबूर करना तर्कहीन है और उनके मतदान के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

    • संदर्भ: भारत 2026 में अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) को एक एकीकृत जलवायु लचीलापन और हरित विकास रणनीति पर नेतृत्व करने का अवसर प्रदान करता है।
    • मुख्य बिंदु:
      • बहुपक्षवाद को स्थिर करना: एक ऐसी दुनिया में जहाँ सहयोगी बहुपक्षवाद (जैसे अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का हटना) तनाव में है, भारत ब्रिक्स को जलवायु कार्रवाई के लिए एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
      • भू-राजनीतिक संतुलन: भारत को ब्रिक्स की “पश्चिम-विरोधी” छवि और अमेरिका के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करनी होगी।
      • साझा चिंताएँ: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता और तटीय जोखिम जैसे जलवायु प्रभाव ब्रिक्स के सभी सदस्यों (जैसे ब्राजील, रूस, भारत, चीन) के लिए साझा चुनौतियाँ हैं।
      • विस्तार का प्रभाव: मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और यूएई के शामिल होने के बाद ब्रिक्स अब वैश्विक जीडीपी का 40% और वैश्विक व्यापार का 26% प्रतिनिधित्व करता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु परिवर्तन में वैश्विक नेतृत्व”, “भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति” और “दक्षिण-दक्षिण सहयोग”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • जलवायु वित्त: विश्लेषण में सुझाव दिया गया है कि वैश्विक जलवायु वित्त को गति देने के लिए विश्व बैंक और आईएमएफ प्रमुखों को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल किया जाना चाहिए।
      • चीनी महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला: ब्रिक्स के भीतर एक मजबूत भारतीय हरित एजेंडा पर्यावरण नेतृत्व की वैश्विक दौड़ में चीन को संतुलित करने का काम करेगा।
      • राजनयिक चतुराई: भारत को वैश्विक तेल भू-राजनीति और टैरिफ खतरों के बीच वाशिंगटन के साथ संबंधों को सुचारू रखते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ के हितों को आगे बढ़ाना होगा।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; द्विपक्षीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव)।

    • संदर्भ: दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” (BoP) की उद्घाटन बैठक से भारत की अनुपस्थिति का विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • BoP की संरचना: इस बोर्ड का लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरना है, जिसके अध्यक्ष ट्रंप हैं। इसमें गाजा संघर्ष को सुलझाने के लक्ष्य के बावजूद फिलिस्तीनी नेतृत्व को शामिल नहीं किया गया है।
      • सदस्यता के स्तर: एक विवादास्पद “दो-स्तरीय” प्रणाली के तहत $1 बिलियन की “फीस” देकर स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव दिया गया है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है।
      • क्षेत्रीय दबाव: पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई के इसमें शामिल होने से भारत पर भी भागीदारी का दबाव है, बावजूद इसके कि इसकी संरचना स्पष्ट नहीं है।
      • कश्मीर का जोखिम: भारत के लिए एक बड़ा “खतरा” यह है कि ट्रंप कश्मीर विवाद को भी अपनी इस शांति योजना में शामिल कर सकते हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध”, “पश्चिम एशिया भू-राजनीति” और “बहुपक्षवाद की चुनौतियां” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • रणनीतिक स्वायत्तता: संपादकीय सलाह देता है कि भारत को केवल “पीछे छूट जाने के डर” या अमेरिका की नाराजगी के डर से कार्य नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने भागीदारों से परामर्श करना चाहिए।
      • संयुक्त राष्ट्र के समानांतर: जहाँ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गाजा प्रस्ताव के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है, BoP एकतरफा रूप से संयुक्त राष्ट्र के कार्यों को प्रतिस्थापित करता प्रतीत हो रहा है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन)।

    • संदर्भ: उत्तराखंड के पारिस्थितिक रूप से नाजुक और आपदा-प्रवण क्षेत्रों में चार धाम सड़क परियोजना के लिए लगभग 7,000 देवदार (Deodar) के पेड़ों को काटने के फैसले का आलोचनात्मक विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • दोषपूर्ण मानक: यह परियोजना ‘डबल लेन विद पेव्ड शोल्डर’ (DL-PS) मानक का उपयोग करती है, जो अस्थिर ढलानों पर भी 12 मीटर की चौड़ाई अनिवार्य बनाती है, जहाँ बड़े निर्माण की मनाही होनी चाहिए।
      • पारिस्थितिक क्षति: पेड़ों के नुकसान के अलावा, सड़क चौड़ी करने के कारण 700 किलोमीटर के दायरे में 800 से अधिक नए सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र बन गए हैं।
      • जड़ प्रणाली के लाभ: देवदार के जंगल ढलानों को स्थिर करते हैं, भूस्खलन रोकते हैं और हिमस्खलन (Avalanches) के खिलाफ प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं।
      • जल गुणवत्ता: ये जंगल अपनी लकड़ी और छाल में मौजूद सूक्ष्मजीव-रोधी गुणों के कारण गंगा के पानी की गुणवत्ता भी बनाए रखते हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)”, “सतत पर्वतीय विकास” और “हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSHE)”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • नियमों का उल्लंघन: परियोजना का कार्यान्वयन इस बात का उदाहरण है कि निर्माण कैसे नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें व्यापक EIA की अनदेखी और खड़ी पहाड़ियों की कटाई शामिल है।
      • जोखिमों में वृद्धि: जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्र वैश्विक औसत से 50% अधिक तेज़ी से गर्म हो रहे हैं, जो वनों की कटाई के साथ मिलकर विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन को बढ़ावा देता है।
      • स्थानीय प्रतिक्रिया: बार-बार होने वाले भूस्खलन और क्षति के कारण स्थानीय लोग इस ‘ऑल-वेदर रोड’ को मज़ाक में “ऑल-पैदल” रोड कहने लगे हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; समावेशी विकास)।

    • संदर्भ: घरेलू वित्त आंकड़ों का विश्लेषण, जो बताता है कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता तेजी से ‘घरेलू कर्ज’ (Household Debt) पर निर्भर होती जा रही है।
    • मुख्य बिंदु:
      • बढ़ता कर्ज: घरेलू कर्ज 2021 में जीडीपी के 36% से बढ़कर मार्च 2025 तक 41.3% हो गया है; हालाँकि यह अन्य देशों की तुलना में कम है, लेकिन यह घरेलू आय के तनाव को छिपा देता है।
      • उपभोग के लिए कर्ज: क्रेडिट (कर्ज) का उपयोग तेजी से आय-व्यय के अंतर को पाटने के लिए किया जा रहा है, न कि संपत्ति निर्माण के लिए। यह स्थिर वास्तविक आय वृद्धि का विकल्प बनता जा रहा है।
      • बचत में कमी: शुद्ध वित्तीय बचत में भारी उतार-चढ़ाव आया है, जो इंगित करता है कि बचत का एक बड़ा हिस्सा नए कर्ज को चुकाने में जा रहा है।
      • जोखिम का हस्तांतरण: राजकोषीय नीतियां जो पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देती हैं और राजस्व व्यय को सीमित करती हैं, वे अनजाने में आर्थिक जोखिम को राज्य से हटाकर परिवारों पर स्थानांतरित कर रही हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय नीति”, “मौद्रिक नीति का संचरण” और “समाज कल्याण अर्थशास्त्र” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • संवेदनशील समूह: कम आय वाले समूहों के लिए रोजगार के अवसरों की कमी और आय में वृद्धि न होना, मध्यम ऋण स्तर को भी भेद्यता (Vulnerability) का एक बड़ा स्रोत बना देता है।
      • बजट 2026 का कार्य: आगामी बजट के लिए मुख्य कार्य लोगों की ‘खर्च करने योग्य आय’ (Disposable Income) बढ़ाकर और श्रम-प्रधान रोजगार पैदा करके संतुलन बहाल करना है।

    संपादकीय विश्लेषण

    23 जनवरी, 2026
    GS-2 राजव्यवस्था
    🗳️ चुनाव आयोग पर SC: विवेक बनाम संवैधानिक स्वतंत्रता
    सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से SIR के दौरान 6.5 करोड़ नामों के विलोपन पर सवाल किए। पीठ ने “आंतरिक प्रवासन” (वैध) और “अवैध आप्रवासन” के बीच अंतर स्पष्ट किया। आलोचना: वास्तविक मतदाताओं को “अत्यधिक दबाव” में नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करना मताधिकार की पवित्रता का उल्लंघन है।
    GS-2 अंत. संबंध
    🌍 ब्रिक्स 2026: भारत का हरित नेतृत्व
    भारत 2026 में ब्रिक्स की मेजबानी के लिए तैयार है, जो वैश्विक GDP के 40% का प्रतिनिधित्व करता है। रणनीति: NDB के माध्यम से जलवायु वित्त और ग्लोबल साउथ के लचीलेपन के लिए ब्रिक्स को एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित करना, जबकि अमेरिकी टैरिफ खतरों व चीनी महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना।
    GS-2 अंत. संबंध
    🏳️ बोर्ड ऑफ पीस: $1 बिलियन की सदस्यता
    दावोस में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिद्वंद्वी के रूप में ट्रम्प के “बोर्ड ऑफ पीस” (BoP) का परिचय, जहाँ स्थायी सीटों के लिए $1 बिलियन शुल्क का प्रस्ताव है। भारत के लिए जोखिम: BoP के जनादेश का कश्मीर विवाद तक विस्तार होने की संभावना, जो संयुक्त राष्ट्र के कार्यों को दरकिनार कर सकता है।
    GS-3 पर्यावरण
    🌲 हिमालयी पारिस्थितिकी विनाश: चारधाम की लागत
    सड़क चौड़ीकरण (DL-PS मानक) के लिए 7,000 देवदार के पेड़ों की कटाई को मंजूरी। पारिस्थितिक परिणाम: 800 सक्रिय भूस्खलन क्षेत्रों का निर्माण। आलोचना: बुनियादी ढांचा परियोजनाएं NMSHE (2014) के जनादेशों की अनदेखी कर रही हैं, जिससे “ऑल-वेदर सड़कें” असुरक्षित गलियारों में बदल रही हैं।
    GS-3 अर्थव्यवस्था
    📉 घरेलू ऋण: उपभोग का जाल
    घरेलू ऋण बढ़कर GDP का 41.3% हो गया है। चिंता: ऋण का उपयोग संपत्ति निर्माण के बजाय आय-व्यय के अंतर को पाटने के लिए किया जा रहा है। परिणाम: व्यापक आर्थिक जोखिम राज्य से परिवारों की ओर स्थानांतरित हो रहा है, जिससे वित्तीय बचत कम हो रही है।
    त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):DL-PS मानक: पेव्ड शोल्डर के साथ डबल लेन (12 मीटर चौड़ाई) – संवेदनशील हिमालयी ढलानों के लिए अनुपयुक्त। • धारा 21(3): लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम – चुनाव आयोग को विवेक प्रदान करता है, लेकिन यह कानून के शासन के अधीन है। • NMSHE: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन – वर्तमान पेड़ों की कटाई से इसे क्षति पहुँच रही है।

    यहाँ भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों (National Parks) और वन्यजीव अभयारण्यों का भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    ये उद्यान उच्च-ऊंचाई वाली वनस्पतियों और ‘हिम तेंदुआ’ (Snow Leopard) व ‘कस्तूरी मृग’ (Musk Deer) जैसे जीवों के लिए जाने जाते हैं।

    • दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान (जम्मू-कश्मीर): यह ‘हंगुल’ (कश्मीरी स्टैग) के लिए प्रसिद्ध है।
    • हेमिस राष्ट्रीय उद्यान (लद्दाख): यह भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है और हिम तेंदुओं का वैश्विक गढ़ माना जाता है।
    • फूलों की घाटी और नंदा देवी (उत्तराखंड): यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, जो अपने अल्पाइन घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध हैं।
    • जिम कॉर्बेट (उत्तराखंड): यह भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान है, जो शिवालिक की तलहटी में स्थित है।
    • ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (हिमाचल प्रदेश): यह ‘वेस्टर्न ट्रैगोपन’ और ‘हिमालयी तहर’ के लिए जाना जाता है।

    यहाँ का ध्यान शुष्क पर्णपाती वनों और रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के अनुकूल प्रजातियों पर होता है।

    • गिर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात): यह एशियाई शेरों (Asiatic Lion) का दुनिया में एकमात्र प्राकृतिक आवास है।
    • डेजर्ट नेशनल पार्क (राजस्थान): यह ‘गोडावण’ (Great Indian Bustard) के अंतिम बचे हुए घरों में से एक है।
    • रणथंभौर और सरिस्का (राजस्थान): अरावली और विंध्य श्रेणियों में स्थित प्रमुख बाघ अभयारण्य (Tiger Reserves)।
    • समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (कच्छ की खाड़ी): यह भारत का पहला समुद्री पार्क है, जो प्रवाल भित्तियों (Corals) और ‘डगोंग’ (समुद्री गाय) के लिए प्रसिद्ध है।

    ये क्षेत्र “महा-शाकाहारी” (Mega-herbivore) संरक्षण और उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के मानचित्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं।

    • काजीरंगा (असम): ‘एक सींग वाले गेंडे’ के लिए विश्व प्रसिद्ध।
    • मानस (असम): भूटान की सीमा पर स्थित एक बाघ अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।
    • केइबुल लामजाओ (मणिपुर): यह दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है (लोकटक झील पर स्थित), जो ‘संगाई’ (ब्रो-एंटलर्ड हिरण) का घर है।
    • नामदफा (अरुणाचल प्रदेश): यह एकमात्र ऐसा पार्क है जहाँ बड़ी बिल्ली की चार प्रजातियाँ (बाघ, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और क्लाउडेड तेंदुआ) पाई जाती हैं।
    • सुंदरवन (पश्चिम बंगाल): दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन; रॉयल बंगाल टाइगर के लिए प्रसिद्ध।

    ये उद्यान पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार में हाथी और बाघ संरक्षण के मुख्य केंद्र हैं।

    उद्यान का नामराज्यमुख्य मैपिंग विशेषता
    कान्हा और बांधवगढ़मध्य प्रदेश“टाइगर स्टेट” का हृदय स्थल; कान्हा ‘बारहसिंगा’ के लिए प्रसिद्ध है।
    बांदीपुर और नागरहोलकर्नाटकनीलगिरी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का हिस्सा; यहाँ हाथियों का उच्च घनत्व है।
    पेरियारकेरलएक कृत्रिम झील के चारों ओर स्थित हाथी और बाघ अभयारण्य।
    शांत घाटी (Silent Valley)केरलनीलगिरी में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन; ‘शेर जैसी पूंछ वाले मकाक’ का घर।
    श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
    सबसे बड़ा उद्यानहेमिसलद्दाख
    एकमात्र तैरता उद्यानकेइबुल लामजाओमणिपुर
    शेरों का प्राकृतिक आवासगिरगुजरात
    गेंडे का गढ़काजीरंगाअसम

    परीक्षा में अक्सर इन उद्यानों को उत्तर से दक्षिण या पूर्व से पश्चिम के क्रम में लगाने के लिए पूछा जाता है। मानचित्र पर इनकी सापेक्ष स्थिति को ध्यान से देखें (जैसे: जिम कॉर्बेट उत्तर में है और पेरियार दक्षिण में)।

    वन्यजीव परिदृश्य (Wildlife Horizons)

    हिमालयी क्षेत्र
    🏔️ उच्च तुंगता शरणस्थल
    लद्दाख के हेमिस (भारत का सबसे बड़ा पार्क) से लेकर फूलों की घाटी तक विस्तृत। ये क्षेत्र हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग और हिमालयी तहर का संरक्षण करते हैं।
    अभ्यास: जम्मू-कश्मीर में दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान को खोजें और इसे लुप्तप्राय ‘हंगुल’ के मुख्य आवास के रूप में पहचानें।
    शुष्क एवं समुद्री
    🦁 शुष्क पर्णपाती गढ़
    अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र; जैसे गीर (एशियाई शेरों का अंतिम निवास) और मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान, जो ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोडावण) का घर है।
    अभ्यास: कच्छ की खाड़ी में समुद्री राष्ट्रीय उद्यान खोजें—जो भारत का पहला समर्पित समुद्री अभयारण्य है।
    पूर्वी वर्षा-पट्टी
    🦏 मेगा-शाकाहारी हब
    महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि और वर्षावन; जिनमें काजीरंगा (एक सींग वाला गैंडा) और केइबुल लामजाओ—लोकतक झील पर स्थित विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान शामिल है।
    अभ्यास: पश्चिम बंगाल डेल्टा में सुंदरबन को लोकेट करें, जो बाघों के लिए विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है।
    दक्षिण एवं मध्य भारत के रत्न
    उद्यान का नाम राज्य मुख्य मैपिंग विशेषता
    कान्हा एवं बांधवगढ़म.प्र.बाघ हृदयस्थल; ‘बारहसिंगा’ के लिए प्रसिद्ध
    बांदीपुर एवं नागरहोलकर्नाटकनीलगिरि बायोस्फीयर का हिस्सा; हाथियों का घनत्व
    पेरियारकेरलकृत्रिम झील के चारों ओर स्थित बाघ अभयारण्य
    शांत घाटी (Silent Valley)केरलउष्णकटिबंधीय सदाबहार; शेर जैसी पूंछ वाला बंदर
    त्वरित मानचित्रण चेकलिस्ट
    श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
    सबसे बड़ा उद्यानहेमिस नेशनल पार्कलद्दाख (उच्च तुंगता)
    एकमात्र तैरता उद्यानकेइबुल लामजाओमणिपुर (लोकतक झील)
    शेरों का प्राकृतिक आवासगीर नेशनल पार्कगुजरात (सौराष्ट्र)
    गैंडों का गढ़काजीरंगा नेशनल पार्कअसम (ब्रह्मपुत्र तट)

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 22 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय” उन समाजों के जीवन की पड़ताल करता है जो वर्ण-आधारित सामाजिक व्यवस्था से बाहर थे और मध्यकाल के दौरान बसे हुए राज्यों के साथ उनके संबंधों का वर्णन करता है।

    उपमहाद्वीप के कई समाज ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित सामाजिक नियमों और कर्मकांडों का पालन नहीं करते थे।

    • परिभाषा: इन समाजों को अक्सर ‘जनजाति’ कहा जाता है।
    • सामाजिक संरचना: जनजातीय सदस्य नातेदारी (Kinship) के बंधनों से जुड़े होते थे। उनमें अमीर-गरीब का कोई बड़ा भेदभाव नहीं था।
    • आजीविका: कई जनजातियाँ खेती से अपनी आजीविका प्राप्त करती थीं। कुछ शिकारी-संग्राहक या पशुपालक थे। वे अपने निवास क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग करते थे।
    • क्षेत्र: जनजातियाँ अक्सर जमीन और चरागाहों पर संयुक्त रूप से नियंत्रण रखती थीं और अपने नियमों के अनुसार उन्हें परिवारों के बीच बांटती थीं।
    • संपर्क: जनजातीय और जाति-आधारित समाजों के बीच निरंतर संघर्ष और निर्भरता का संबंध था। इस रिश्ते ने धीरे-धीरे दोनों प्रकार के समाजों को बदलने का काम किया।

    उपमहाद्वीप के लगभग हर क्षेत्र में जनजातीय समुदाय पाए जाते थे।

    • शक्तिशाली जनजातियाँ: पंजाब में 13वीं और 14वीं शताब्दी में खोखर जनजाति प्रभावशाली थी; बाद में गक्खर अधिक महत्वपूर्ण हो गए।
    • मुल्तान और सिंध: यहाँ लंगाह और अरघुन जनजातियों का प्रभुत्व था।
    • उत्तर-पश्चिम: बलूची एक बड़ी और शक्तिशाली जनजाति थी, जो छोटे-छोटे कुलों में विभाजित थी।
    • उत्तर-पूर्व: इस सुदूर क्षेत्र में नागा, अहोम और कई अन्य जनजातियाँ रहती थीं।
    • मध्य और पश्चिमी भारत: भील इन क्षेत्रों में फैले हुए थे। गोंड जनजाति वर्तमान छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में पाई जाती थी।

    खानाबदोश पशुपालक अपने जानवरों के साथ लंबी दूरी तय करते थे।

    • विनिमय (Exchange): वे दूध और अन्य पशु उत्पादों पर जीवित रहते थे। वे खेती करने वाले लोगों के साथ अनाज, कपड़े और बर्तनों के बदले घी, ऊन आदि का विनिमय करते थे।
    • बंजारे: वे सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे। उनके कारवां को ‘तांडा’ कहा जाता था। सुल्तान अलाउद्दीन ख़लजी नगर के बाज़ारों तक अनाज पहुँचाने के लिए बंजारों का उपयोग करते थे। सम्राट जहाँगीर ने लिखा है कि बंजारे विभिन्न क्षेत्रों से अपने बैलों पर अनाज ढोकर शहरों में बेचते थे।
    • भ्रमणशील समूह: शिल्पकार और नर्तक जैसे अन्य समूह भी एक गाँव से दूसरे गाँव अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए यात्रा करते थे।

    जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था और समाज की ज़रूरतें बढ़ीं, नए कौशल वाले लोगों की आवश्यकता हुई।

    • जातियाँ: वर्णों के भीतर छोटी-छोटी ‘जातियाँ’ उभरीं। उदाहरण के लिए, ब्राह्मणों के बीच नई जातियाँ दिखाई दीं।
    • विशिष्ट समूह: कई जनजातियों को जाति-आधारित समाज में शामिल किया गया और उन्हें जातियों का दर्जा दिया गया। लोहार, बढ़ई और राजमिस्त्री जैसे विशिष्ट शिल्पकारों को भी ब्राह्मणों द्वारा अलग जातियों के रूप में मान्यता दी गई।
    • राजपूत कुल: क्षत्रियों के बीच नए राजपूत कुल (जैसे—हुण, चंदेल, चालुक्य) शक्तिशाली हुए। उन्होंने धीरे-धीरे पुराने शासकों की जगह ले ली और शक्तिशाली राज्यों की स्थापना की।

    यह अध्याय दो प्रमुख जनजातीय समूहों के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डालता है जिन्होंने अपने राज्य स्थापित किए।

    • निवास: वे ‘गोंडवाना’ नामक विशाल वन क्षेत्र में रहते थे और स्थानांतरीय कृषि (Shifting cultivation) करते थे।
    • प्रशासन: गोंड राज्य ‘गढ़ों’ में विभाजित था। प्रत्येक गढ़ पर एक विशेष गोंड कुल का नियंत्रण होता था। गढ़ आगे ‘चैरासी’ (84 गाँवों की इकाई) में विभाजित थे, जो फिर ‘बरहोत’ (12 गाँवों की इकाई) में बंटे थे।
    • सामाजिक परिवर्तन: बड़े राज्यों के उदय ने गोंड समाज की प्रकृति को बदल दिया। उनका समानता वाला समाज धीरे-धीरे असमान सामाजिक वर्गों में बंट गया। ब्राह्मणों ने गोंड राजाओं से भूमि अनुदान प्राप्त किया और अधिक प्रभावशाली हो गए।
    • प्रवास: अहोम लोग 13वीं शताब्दी में वर्तमान म्यांमार से आकर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे।
    • राज्य निर्माण: उन्होंने ‘भूँइया’ (ज़मींदार) की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को दबाकर एक नया राज्य बनाया। उन्होंने 1530 के दशक में ही आग्नेयास्त्रों (Firearms) का प्रयोग शुरू कर दिया था।
    • जबरन श्रम (Paiks): अहोम राज्य जबरन श्रम पर निर्भर था। राज्य के लिए काम करने के लिए मजबूर किए गए लोगों को ‘पाइक’ कहा जाता था।
    • कुल (Khel): अहोम समाज कुलों या ‘खेल’ में विभाजित था। एक ‘खेल’ अक्सर कई गाँवों को नियंत्रित करता था।
    • धर्म: मूल रूप से अहोम अपने जनजातीय देवताओं की पूजा करते थे, लेकिन 18वीं शताब्दी के दौरान हिंदू धर्म मुख्य धर्म बन गया। फिर भी, अहोम राजाओं ने हिंदू धर्म अपनाने के बाद भी अपनी पारंपरिक मान्यताओं को पूरी तरह नहीं छोड़ा।
    1. कुल (Clan): उन परिवारों का समूह जो एक ही पूर्वज के वंशज होने का दावा करते हैं।
    2. तांडा (Tanda): बंजारों का कारवां।
    3. पाइक (Paik): अहोम राज्य के वे लोग जिनसे जबरन श्रम कराया जाता था।
    4. स्थानांतरीय कृषि: जंगल को जलाकर साफ करना और वहां खेती करना, फिर कुछ वर्षों बाद नई जगह पर जाना।

    🏹 जनजातियाँ, खानाबदोश और बसे समुदाय

    🌿 जनजातीय समाज
    ये समाज नातेदारी (Kinship) के बंधन से जुड़े थे और वर्ण-आधारित व्यवस्था से बाहर रहते थे। उन्होंने संसाधनों पर संयुक्त रूप से नियंत्रण रखा और अपनी जरूरतों के लिए बसे हुए राज्यों के साथ व्यापार व संघर्ष किया।
    🐂 खानाबदोश व्यापारी
    चरवाहे अनाज और कपड़ों के बदले घी व दूध जैसे उत्पादों का विनिमय करते थे। बंजारा सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे; उनके कारवां को टांडा (Tanda) कहा जाता था, जिसका उपयोग सुल्तान बाजारों तक अनाज पहुँचाने के लिए करते थे।
    🌳 गोंड साम्राज्य
    गोंडवाना के जंगलों में रहने वाले लोग जो स्थानांतरीय कृषि करते थे। उनका राज्य गढ़ों में विभाजित था, जिन्हें आगे 84 गाँवों की इकाइयों चौरासी में बांटा गया था। रानी दुर्गावती यहाँ की प्रसिद्ध शासिका थीं।
    🚣 अहोम समाज
    म्यांमार से आकर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे योद्धा। उन्होंने पाइक (Paik) नामक जबरन श्रम प्रणाली का उपयोग कर शक्तिशाली राज्य बनाया। उनका समाज खेल (Khels) नामक कुलों में विभाजित था, जो कई गाँवों को नियंत्रित करते थे।
    सामाजिक परिवर्तन जैसे-जैसे जनजातीय राज्य बड़े हुए, वे वर्ण व्यवस्था की ओर झुके; ब्राह्मणों को भूमि अनुदान मिले और समाज ऊँच-नीच वाले वर्गों में बंटने लगा, जिससे जनजातियों का सामाजिक स्वरूप बदल गया।
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    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-7 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय

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    राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) राज्य के लिए ‘अनुदेशों के साधन’ (Instrument of Instructions) हैं। ये गैर-न्यायिक (अदालत द्वारा लागू नहीं कराए जा सकते) हैं, लेकिन देश के शासन में मूलभूत महत्व रखते हैं।

    यह स्पष्ट करता है कि भाग IV के लिए “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग III (मौलिक अधिकार) के अनुच्छेद 12 में दिया गया है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारें, संसद, विधानमंडल और सभी स्थानीय अधिकारी शामिल हैं।

    यह DPSP की कानूनी प्रकृति को परिभाषित करता है:

    1. ये सिद्धांत किसी भी अदालत द्वारा लागू करने योग्य नहीं हैं (गैर-न्यायिक)।
    2. इसके बावजूद, ये देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।
    • अनुच्छेद 38: सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करना
      • 38(1): राज्य लोक कल्याण की वृद्धि के लिए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जहाँ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित हो।
      • 38(2): (44वें संशोधन द्वारा) राज्य आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को कम करने का प्रयास करेगा।
    • अनुच्छेद 39: राज्य द्वारा अनुसरण की जाने वाली नीति के सिद्धांत
      • (a) सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन का अधिकार।
      • (b) समुदाय के भौतिक संसाधनों का उचित वितरण।
      • (c) धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण रोकना।
      • (d) पुरुषों और महिलाओं के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन
      • (e) श्रमिकों के स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा।
      • (f) बच्चों को गरिमापूर्ण वातावरण में विकास के अवसर (42वें संशोधन द्वारा)।
    • अनुच्छेद 39A: समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता
      • (42वें संशोधन द्वारा) गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना ताकि आर्थिक तंगी के कारण कोई न्याय से वंचित न रहे।
    • अनुच्छेद 41: काम, शिक्षा और लोक सहायता का अधिकार
      • बेकारी, बुढ़ापे, बीमारी और निशक्तता की स्थिति में काम, शिक्षा और सरकारी सहायता पाने का अधिकार।
    • अनुच्छेद 42: काम की न्यायसंगत दशाएं और मातृत्व सहायता
      • कार्यस्थल पर मानवीय वातावरण और महिला कर्मचारियों के लिए मातृत्व अवकाश की व्यवस्था।
    • अनुच्छेद 43: निर्वाह मजदूरी (Living Wage)
      • सभी श्रमिकों के लिए उचित मजदूरी और सभ्य जीवन स्तर सुनिश्चित करना। ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना।
    • अनुच्छेद 43A: प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
      • (42वें संशोधन द्वारा) उद्योगों के प्रबंधन में मजदूरों की भूमिका सुनिश्चित करना।
    • अनुच्छेद 40: ग्राम पंचायतों का संगठन
      • ग्राम पंचायतों का गठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में शक्ति प्रदान करना।
    • अनुच्छेद 43B: सहकारी समितियों को बढ़ावा देना
      • (97वें संशोधन, 2011 द्वारा) सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन और लोकतांत्रिक नियंत्रण को बढ़ावा देना।
    • अनुच्छेद 46: SC, ST और कमजोर वर्गों के हितों का संरक्षण
      • अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना और सामाजिक अन्याय से रक्षा करना।
    • अनुच्छेद 47: पोषण स्तर, जीवन स्तर और नशाबंदी
      • पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं पर प्रतिबंध लगाना।
    • अनुच्छेद 48: कृषि और पशुपालन का संगठन
      • कृषि को वैज्ञानिक बनाना। गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाना।
    • अनुच्छेद 44: समान नागरिक संहिता (UCC)
      • पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने का प्रयास करना।
    • अनुच्छेद 45: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल (0–6 वर्ष)
      • छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए शिक्षा और देखभाल का प्रावधान।
    • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण
      • (42वें संशोधन द्वारा) पर्यावरण की रक्षा करना और वनों व वन्यजीवों को सुरक्षित रखना।
    • अनुच्छेद 49: राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण
      • ऐतिहासिक इमारतों और कलात्मक वस्तुओं को विनाश या चोरी से बचाना।
    • अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
      • न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना।
    • अनुच्छेद 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
      • विश्व शांति को बढ़ावा देना, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंध बनाए रखना और अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करना।
    विशेषतामौलिक अधिकार (भाग III)नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
    प्रकृतिनकारात्मक (राज्य को कुछ करने से रोकना)सकारात्मक (राज्य को कुछ करने का निर्देश)
    न्यायिकताअदालत द्वारा प्रवर्तनीय (वाद-योग्य)अदालत द्वारा गैर-प्रवर्तनीय (अवाद-योग्य)
    उद्देश्यराजनीतिक लोकतंत्र की स्थापनासामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना
    निलंबनआपातकाल के दौरान निलंबित हो सकते हैंकभी निलंबित नहीं होते; केवल लागू किए जाते हैं
    अनुच्छेदकीवर्ड (Hindi)याद रखने का तरीका (Trick)
    36परिभाषाअनुच्छेद 12 के समान “राज्य”।
    37अवाद-योग्ययह केवल शासन का आधार है।
    38लोक कल्याणन्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक)।
    39आजीविका/वेतनसमान काम – समान वेतन।
    39Aमुफ्त कानूनी सहायता‘A’ से ‘Aid’ (गरीबों को सहायता)।
    40पंचायतगांधी जी के ग्राम स्वराज का सपना।
    41काम/शिक्षाबुढ़ापे/बेकारी में सहायता।
    42मातृत्व सहायतामहिलाओं के लिए कार्यस्थल पर छूट।
    43मजदूरीकम से कम इतनी मजदूरी कि सम्मान से जी सकें।
    43Bसहकारी समिति‘B’ से ‘Business’ (Co-operatives)।
    44UCC4 और 4 समान हैं = समान नागरिक संहिता।
    45शिशु शिक्षा6 साल से छोटे बच्चों के लिए आंगनवाड़ी।
    46SC / STपिछड़े वर्गों का उत्थान।
    47स्वास्थ्य/नशाबंदीशराब बंदी (Public Health)।
    48कृषि/गोहत्यावैज्ञानिक खेती और गाय की रक्षा।
    48Aपर्यावरण‘A’ से ‘Air’ (पर्यावरण की रक्षा)।
    49स्मारकऐतिहासिक इमारतों की रक्षा।
    50पृथक्करण50-50 बंटवारा (न्यायपालिका vs कार्यपालिका)।
    51शांतिअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति।
    1. समाजवादी (Socialistic): 38, 39, 39A, 41, 42, 43, 43A, 47.
    2. गांधीवादी (Gandhian): 40, 43, 43B, 46, 47, 48.
    3. उदारवादी (Liberal): 44, 45, 48, 48A, 49, 50, 51.
    • अनुच्छेद 39A: NALSA (विधिक सेवा प्राधिकरण) का गठन।
    • अनुच्छेद 40: 73वां संविधान संशोधन (पंचायती राज)।
    • अनुच्छेद 41: मनरेगा (MGNREGA) योजना।
    • अनुच्छेद 45: शिक्षा का अधिकार (RTE) और 86वां संशोधन।
    • अनुच्छेद 47: गुजरात और बिहार में शराब बंदी।

    📜 राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV)

    ⚖️ DPSP की प्रकृति (36-37)
    ये ‘निर्देशों के साधन’ हैं और गैर-न्यायोचित हैं। अनु. 37 के अनुसार ये देश के शासन में मूलभूत हैं। इनका लक्ष्य सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र है।
    💰 समाजवादी लक्ष्य (38-39)
    38: न्याय द्वारा कल्याण। 39: संसाधनों का उचित वितरण, समान वेतन और धन के संकेंद्रण पर रोक।
    ⚖️ विधिक सहायता और कार्य (39A-42)
    39A: मुफ्त कानूनी सहायता। 41: काम और शिक्षा का अधिकार। 42: मानवीय कार्य दशाएं और प्रसूति सहायता
    🏘️ गांधीवादी सिद्धांत (40-47)
    40: ग्राम पंचायत। 43B: सहकारी समितियां। 46: SC/ST हित। 47: पोषण स्तर सुधार और शराबबंदी
    🌍 उदारवादी निर्देश (44-51)
    44: समान नागरिक संहिता। 48A: पर्यावरण रक्षा। 50: न्यायपालिका का पृथक्करण। 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति।
    🔄 FR बनाम DPSP
    FR: नकारात्मक / राजनीतिक लोकतंत्र / वाद-योग्य (Justiciable)।
    DPSP: सकारात्मक / सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र / गैर-वादयोग्य।
    विचारधाराएं
    समाजवादी: 38, 39, 39A, 41, 42, 43, 43A गांधीवादी: 40, 43, 43B, 46, 47, 48 उदारवादी: 44, 45, 48A, 49, 50, 51

    🧠 5-मिनट मेमोरी टेबल

    अनुच्छेद कीवर्ड याद करने की ट्रिक (Trick)
    39Aकानूनी सहायताA = Aid (गरीबों के लिए ‘सहायता’)
    40पंचायतगांधीजी का ‘ग्राम’ विजन
    43BसहकारिताB = Business (सहकारी व्यापार)
    44समानता (UCC)4 और 4 ‘समान’ (Uniform) हैं
    45बच्चे (0-6)‘नन्हे-मुन्नों’ की शिक्षा
    48Aपर्यावरणA = Air / Animals (हवा और जीव)
    50पृथक्करण50-50 बंटवारा (न्यायपालिका/कार्यपालिका)
    51शांतिअंतिम लक्ष्य: ‘विश्व शांति’
    कार्यान्वयन
    अनु. 40 → 73वां संशोधन | अनु. 45 → शिक्षा का अधिकार | अनु. 39A → NALSA | अनु. 47 → शराबबंदी

    यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (22 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

    • संदर्भ: मतदाता सूचियों के “विशेष गहन पुनरीक्षण” (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ और निर्वाचन आयोग की विवेकाधीन शक्तियों की सीमाएँ।
    • मुख्य बिंदु:
      • न्यायिक निरीक्षण: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि निर्वाचन आयोग के पास जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के तहत “व्यापक विवेकाधिकार” हैं, लेकिन यह स्थापित मानदंडों से हटने के लिए “अनियंत्रित शक्ति” प्रदान नहीं करता है।
      • प्रक्रियात्मक पवित्रता: पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 से किसी भी प्रकार के विचलन के पीछे ऐसे कारण होने चाहिए जो “निष्पक्ष, पारदर्शी और रिकॉर्डेड” हों।
      • “तनाव और दबाव” का कारक: न्यायालय ने उन लाखों नागरिकों—जिनमें बुजुर्ग और दिव्यांग व्यक्ति भी शामिल हैं—को होने वाले “अत्यधिक तनाव” को रेखांकित किया, जिन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए भौतिक सुनवाइयों (Physical hearings) में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
      • मतदाता संरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा कोई भी पुनरीक्षण जो वास्तविक मतदाताओं को “नए” मतदाताओं (फॉर्म 6) के रूप में फिर से आवेदन करने के लिए मजबूर करता है, उनके मताधिकार का उल्लंघन है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • तार्किकता का सिद्धांत (Doctrine of Reasonableness): संपादकीय नोट करता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू किया है कि सभी प्रशासनिक विवेकाधिकारों का प्रयोग तर्कसंगत रूप से और सार्वजनिक हित में किया जाना चाहिए।
      • व्यवस्थागत बोझ (Systemic Burden): निर्वाचन आयोग के इस तर्क को खारिज कर दिया गया कि वह SIR के दौरान सामान्य प्रक्रियाओं से “मुक्त” (Unshackled) है; यह पुनः पुष्टि करता है कि “विवेकाधिकार के शासन” के ऊपर “कानून का शासन” (Rule of law) सर्वोपरि है।
      • बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का प्रभाव: लगभग 6.5 करोड़ नामों को हटाए जाने के साथ, न्यायालय का हस्तक्षेप उन मतदाताओं के लिए “नागरिक मृत्यु” (Civil death) को रोकने का प्रयास करता है जो दशकों से मतदान कर रहे हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव)।

    • संदर्भ: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर “बातचीत” की मांग और डेनमार्क पर भारी टैरिफ का थोपा जाना।
    • मुख्य बिंदु:
      • आर्थिक दबाव (Economic Coercion): अमेरिका ने इस स्वायत्त क्षेत्र की बिक्री के लिए दबाव बनाने हेतु लेगो (LEGO) और दवाओं सहित डेनिश सामानों पर 25% टैरिफ लगा दिया है।
      • आर्कटिक रणनीति: यह मांग “रणनीतिक गहराई” (Strategic depth) और दुर्लभ मृदा तत्वों (REE) जैसे विशाल अप्रयुक्त खनिज संसाधनों तक पहुंच की आवश्यकता से प्रेरित है, जो हाई-टेक उद्योगों के लिए अनिवार्य हैं।
      • “बल प्रयोग नहीं” का दावा: ट्रम्प ने कहा कि वह सैन्य बल का उपयोग नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐतिहासिक “असंतुलन” को ठीक करने के लिए “आर्थिक शक्ति” का उपयोग किया जाएगा।
      • यूरोपीय प्रतिक्रिया: डेनमार्क और यूरोपीय संघ ने इस मांग को “बेतुका” बताया है, जिससे नाटो (NATO) गठबंधन के भीतर एक राजनयिक गतिरोध पैदा हो गया है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • मोनरो सिद्धांत का पुनर्जन्म (Monroe Doctrine Reborn): इसे “डोनरो डॉक्ट्रिन” (Donroe Doctrine) के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ अमेरिका आर्कटिक सहित पूरे पश्चिमी गोलार्ध पर अपने विशेष प्रभाव का दावा करता है।
      • ग्रीनलैंडवासियों पर प्रभाव: ग्रीनलैंड के 57,000 निवासियों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ (Right to self-determination) पर जोर दिया है।
      • वैश्विक व्यवस्था में बदलाव: संपादकीय सुझाव देता है कि यह नियमों पर आधारित व्यवस्था से “लेनदेन वाली व्यवस्था” (Transactional order) की ओर संक्रमण का प्रतीक है, जहाँ संप्रभुता को एक व्यापारिक संपत्ति (Tradeable asset) माना जा रहा है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; न्यायपालिका; मौलिक अधिकार)।

    • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश।
    • मुख्य बिंदु:
      • निर्दोषता का अनुमान (Presumption of Innocence): न्यायालय ने कहा कि पुलिस द्वारा समय से पहले की गई मीडिया ब्रीफिंग अक्सर “मीडिया ट्रायल” का कारण बनती है, जो अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन करती है।
      • निजता और गरिमा: अभियुक्तों की सार्वजनिक परेड करना या जांच के संवेदनशील विवरणों का खुलासा करना अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
      • बलों का संवेदीकरण: नीति में पुलिस अधिकारियों के लिए यह प्रशिक्षण शामिल होना चाहिए कि जांच या पीड़ित के अधिकारों से समझौता किए बिना कौन सी जानकारी साझा की जा सकती है।
      • पीड़ित संरक्षण: यौन अपराधों और नाबालिगों से जुड़े मामलों में पीड़ितों की पहचान की रक्षा करने पर विशेष जोर दिया गया है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • “ब्रेकिंग न्यूज़” का नियमन: संपादकीय का तर्क है कि मीडिया में “पुलिस की वाहवाही” (Police glory) की तलाश अक्सर न्याय की विफलता (Miscarriage of justice) का कारण बनती है।
      • संतुलित प्रकटीकरण (Balanced Disclosure): प्रस्तावित नीति का उद्देश्य “जनता के जानने के अधिकार” और “अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार” के बीच संतुलन बनाना है।
      • जवाबदेही: राज्य के पुलिस महानिदेशकों (DGP) को किसी भी अनधिकृत लीक या ब्रीफिंग के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा जो न्यायिक कार्यवाही को खतरे में डालते हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन)।

    • संदर्भ: ‘नेचर’ (Nature) पत्रिका के एक हालिया अध्ययन में अत्यधिक भूजल दोहन और शहरीकरण के कारण भारतीय डेल्टाओं को उच्च जोखिम में बताया गया है।
    • मुख्य बिंदु:
      • धंसने की दर (Subsidence Rates): मानवीय हस्तक्षेपों ने डेल्टाओं के धंसने की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया है, जिससे एक क्रमिक भूगर्भीय प्रक्रिया एक तत्काल संकट में बदल गई है।
      • संवेदनशील क्षेत्र: गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी डेल्टा विशेष रूप से भूजल की कमी से प्रभावित हैं, जबकि ब्राह्मणी डेल्टा तीव्र शहरीकरण का सामना कर रहा है।
      • “तैयारी रहित गोताखोर” (The Unprepared Diver): गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा “अप्रत्यक्ष खतरे” से “तैयारी रहित गोताखोर” की स्थिति में आ गया है, जिसका अर्थ है कि जोखिम बढ़ गए हैं जबकि संस्थागत क्षमता स्थिर है।
      • बंदरगाहों पर प्रभाव: डूबते डेल्टा परिवहन नेटवर्क और बंदरगाहों सहित महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए खतरा पैदा करते हैं, जो भारत के व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • संस्थागत पिछड़ापन (Institutional Lag): अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि इन क्षेत्रों में उच्च जनसंख्या घनत्व के बावजूद, नीतिगत प्रतिक्रियाएं सक्रिय (Proactive) होने के बजाय केवल प्रतिक्रियात्मक (Reactive) बनी हुई हैं।
      • समेकन और विवर्तनिकी (Compaction and Tectonics): हालांकि प्राकृतिक जमाव होता है, लेकिन पानी और हाइड्रोकार्बन निकालने से वह “पोर प्रेशर” (Pore pressure) खत्म हो जाता है जो जमीन को सहारा देता है, जिससे जमीन तेजी से धंसती है।
      • खाद्य सुरक्षा: जैसे-जैसे डेल्टा डूबते हैं, खारे पानी का प्रवेश कृषि भूमि को बर्बाद कर देता है, जिससे पलायन और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; FDI नीति)।

    • संदर्भ: भारत द्वारा चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कुछ प्रतिबंधों को हटाने पर विचार और इसके संभावित आर्थिक परिणाम।
    • मुख्य बिंदु:
      • गलवान के बाद की नीति: 2020 से, ‘प्रेस नोट 3’ के तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले FDI के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
      • विनिर्माण अंतराल: “चीन प्लस वन” रणनीति के बावजूद, भारतीय निर्माता अभी भी चीनी पुर्जों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जिससे स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए निवेश मानदंडों में ढील देने की मांग उठी है।
      • चीनी अनिच्छा: विश्लेषण में सवाल उठाया गया है कि क्या चीन “विश्वास की कमी” और भारत में चीनी टेक फर्मों पर हालिया टैक्स छापों को देखते हुए निवेश करना चाहेगा।
      • व्यापार असंतुलन: चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा एक संरचनात्मक चिंता बना हुआ है, और FDI को व्यापार को स्थानीय उत्पादन में बदलने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • सुरक्षा बनाम विकास: संपादकीय राष्ट्रीय सुरक्षा (महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी प्रभाव से बचने) और इलेक्ट्रॉनिक्स व ईवी (EV) क्षेत्रों में पूंजी और तकनीक की आवश्यकता के बीच के तनाव का विश्लेषण करता है।
      • रणनीतिक लाभ: FDI में ढील देकर, भारत उन वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में एकीकृत होना चाहता है जो वर्तमान में चीनी फर्मों के प्रभुत्व में हैं।
      • पारस्परिकता (Reciprocity): मानदंडों में कोई भी ढील पूरी तरह से नीति पलटने के बजाय संतुलित और क्षेत्र-विशिष्ट (Sectoral) होने की संभावना है।

    संपादकीय विश्लेषण

    22 जनवरी, 2026
    GS-2 राजव्यवस्था
    ⚖️ मतदाता सूची (SIR): अनियंत्रित शक्ति पर रोक
    सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि चुनाव आयोग का “व्यापक विवेक” अनियंत्रित शक्ति नहीं है। मुख्य सुरक्षा कवच: 1960 के नियमों से कोई भी विचलन निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। वास्तविक मतदाताओं को फॉर्म 6 के माध्यम से फिर से आवेदन करने के लिए मजबूर करना मताधिकार का उल्लंघन है।
    GS-2 अंत. संबंध
    🌎 ग्रीनलैंड और ‘लेन-देन’ वाली कूटनीति
    अमेरिका ने ग्रीनलैंड के लिए बातचीत हेतु डेनमार्क पर 25% टैरिफ लगाया। सामरिक लक्ष्य: दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earths) और आर्कटिक की गहराई तक पहुँच। परिणाम: नियम-आधारित व्यवस्था से हटकर अब संप्रभुता को एक ‘व्यापारिक वस्तु’ के रूप में देखा जा रहा है।
    GS-2 शासन
    🚔 पुलिस ब्रीफिंग: मीडिया ट्रायल का अंत
    SC ने राज्यों को 3 महीने के भीतर मीडिया ब्रीफिंग पर नीति बनाने का निर्देश दिया। फोकस: निर्दोषता की उपधारणा और अनुच्छेद 21 की रक्षा। जांच विवरणों का समय से पूर्व खुलासा अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना गया है।
    GS-3 पर्यावरण
    🌊 डूबते डेल्टा: भूजल दोहन का संकट
    ‘नेचर’ (Nature) अध्ययन ने भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी को उच्च जोखिम में पाया। खतरा: जमीन का तेजी से धंसाव (Subsidence), जिससे लवणीय जल का प्रवेश बढ़ेगा और कृषि भूमि व बंदरगाह बुनियादी ढांचे का नुकसान होगा।
    GS-3 अर्थव्यवस्था
    🇨🇳 चीनी निवेश (FDI) प्रतिबंधों का पुनर्मूल्यांकन
    भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और ईवी क्षेत्र में विनिर्माण अंतराल को पाटने के लिए ‘प्रेस नोट 3’ में ढील देने पर विचार कर रहा है। रणनीतिक दुविधा: राष्ट्रीय सुरक्षा और पूंजी की आवश्यकता के बीच संतुलन। मुद्दा: ‘चीन प्लस वन’ के बावजूद संरचनात्मक व्यापार घाटा ऊँचा बना हुआ है।

    यहाँ भारत की प्रमुख घाटियों (Valleys) और कैन्यन (Canyons) का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए घाटियाँ एक महत्वपूर्ण विषय हैं क्योंकि ये भौतिक भूगोल, जलवायु और मानव बस्तियों के पैटर्न को जोड़ती हैं।

    ये घाटियाँ विवर्तनिक गतिविधियों (Tectonic activity) और हिमनद अपरदन (Glacial erosion) द्वारा बनी हैं। ये अक्सर कृषि और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र होती हैं।

    • कश्मीर घाटी (जम्मू-कश्मीर): यह वृहद हिमालय और पीर पंजाल श्रेणी के बीच स्थित है। यह अपनी ‘करेवा’ (Karewa) मिट्टी की संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है, जो केसर (Saffron) की खेती के लिए अनिवार्य हैं।
    • कुल्लू घाटी (हिमाचल प्रदेश): इसे “देवताओं की घाटी” के रूप में जाना जाता है। यह पीर पंजाल और धौलाधार श्रेणियों के बीच स्थित है।
    • स्पीति घाटी (हिमाचल प्रदेश): यह एक उच्च-ऊँचाई वाली शीत मरुस्थल घाटी है। यह बौद्ध संस्कृति और ट्रेकिंग के लिए एक प्रमुख केंद्र है।
    • दून घाटी (उत्तराखंड): यह लघु हिमालय और शिवालिक के बीच स्थित एक अनुदैर्ध्य (Longitudinal) घाटी है। प्रसिद्ध शहर देहरादून यहीं स्थित है।
    • युमथांग घाटी (सिक्किम): इसे अक्सर “पूर्व की फूलों की घाटी” कहा जाता है। यह तिब्बती सीमा के पास बहुत अधिक ऊँचाई पर स्थित है।

    ये घाटियाँ आमतौर पर हिमालयी घाटियों से पुरानी हैं और यहाँ अक्सर घने उष्णकटिबंधीय वन या विशिष्ट नदी अपरदन देखा जाता है।

    घाटी का नामराज्यमहत्व
    शांत घाटी (Silent Valley)केरलनीलगिरी पहाड़ियों में स्थित; अपनी दुर्लभ जैव विविधता और उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के लिए प्रसिद्ध।
    अराकू घाटी (Araku Valley)आंध्र प्रदेशपूर्वी घाट में स्थित; अपनी कॉफी के बागानों और जनजातीय संस्कृति के लिए जानी जाती है।
    कंबम घाटी (Kambam Valley)तमिलनाडुथेनी पहाड़ियों और पश्चिमी घाट के बीच स्थित एक उपजाऊ घाटी।
    जुकोऊ घाटी (Dzukou Valley)नागालैंड/मणिपुरअपनी मौसमी फूलों और विशिष्ट बाँस की प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध।
    • स्थान: आंध्र प्रदेश (कडपा जिला)।
    • निर्माण: यह पेन्नार नदी द्वारा एरामला पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है।
    • मैपिंग पॉइंट: भौतिक मानचित्र पर इसे दक्कन के पठार के पूर्वी भाग में चिह्नित करें। यह प्रायद्वीपीय क्षेत्र में एक गहरे ‘गॉर्ज’ या ‘कैन्यन’ का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।
    • सिंधु गॉर्ज (Indus Gorge): गिलगित के पास जहाँ सिंधु नदी हिमालय को काटती है; यह दुनिया के सबसे गहरे गॉर्ज में से एक है।
    • ब्रह्मपुत्र (दिहांग) गॉर्ज: वह स्थान जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी पूर्वी हिमालय को काटकर भारत में प्रवेश करती है।
    • सतलुज गॉर्ज: शिपकी ला दर्रे के पास स्थित, जहाँ सतलुज नदी तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है।
    विशेषता का प्रकारमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
    केसर का केंद्रकश्मीर घाटीपीर पंजाल और हिमाद्रि के बीच
    अनुदैर्ध्य घाटीदेहरादून (दून)शिवालिक और हिमाचल (लघु हिमालय) के बीच
    जैव विविधता हॉटस्पॉटशांत घाटी (Silent Valley)पलक्कड़, केरल
    प्रायद्वीपीय कैन्यनगंडिकोटापेन्नार नदी, आंध्र प्रदेश

    घाटियों को याद रखने के लिए उन्हें उन दो पर्वत श्रेणियों के साथ जोड़कर देखें जिनके बीच वे स्थित हैं। उदाहरण के लिए, कुल्लू घाटी धौलाधार और पीर पंजाल के बीच है। मानचित्र पर इन पर्वत श्रेणियों को पहले चिह्नित करना घाटी की स्थिति को सटीक बनाता है।

    घाटी प्रणालियाँ (Valley Systems)

    उत्तरी पर्वत श्रेणियाँ
    🏔️ हिमालयी वलित घाटियाँ
    विवर्तनिक और हिमनद चमत्कार जैसे कश्मीर घाटी (केसर के लिए प्रसिद्ध ‘करेवा’ मिट्टी के लिए विख्यात) और शिवालिक व लघु हिमालय के बीच स्थित लंबवत देहरादून जैसी ‘दून’ घाटियाँ।
    अभ्यास: हिमाचल प्रदेश में स्पीति घाटी को खोजें और इसे उच्च तुंगता वाले शीत मरुस्थल के रूप में पहचानें।
    प्रायद्वीपीय दक्षिण
    🌲 उष्णकटिबंधीय और पठारी घाटियाँ
    प्राचीन प्रणालियाँ जैसे शांत घाटी (Silent Valley), जो नीलगिरी का जैव विविधता हॉटस्पॉट है, और पूर्वी घाट में स्थित अराकू घाटी, जो अपनी जनजातीय संस्कृति और कॉफी के लिए जानी जाती है।
    अभ्यास: आंध्र प्रदेश में अराकू घाटी को खोजें और पूर्वी घाट के सापेक्ष इसकी स्थिति को नोट करें।
    गार्ज एवं कैनियन
    🏜️ भारत का ‘ग्रैंड कैनियन’
    एर्रामला पहाड़ियों के बीच पेन्नार नदी द्वारा निर्मित गंडिकोटा कैनियन दक्कन के पठार में नदी अपरदन (Riverine Erosion) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
    अभ्यास: पेन्नार नदी के मार्ग को ट्रेस करते हुए आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में गंडिकोटा को लोकेट करें।
    मैपिंग चेकलिस्ट
    प्रकार मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
    केसर का केंद्रकश्मीर घाटीपीर पंजाल और हिमाद्रि के बीच
    लंबवत घाटीदेहरादून (दून)शिवालिक और हिमाचल के बीच
    जैव विविधता हॉटस्पॉटशांत घाटी (Silent Valley)पालक्कड़, केरल
    प्रायद्वीपीय कैनियनगंडिकोटापेन्नार नदी, आंध्र प्रदेश

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 21 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “नगर, व्यापारी और शिल्पीजन” मध्यकालीन भारत के विभिन्न प्रकार के शहरों, व्यापार के जीवंत नेटवर्क और शिल्प उत्पादन के केंद्रों की व्याख्या करता है।

    मध्यकालीन नगर अक्सर एक साथ कई कार्य करते थे, जैसे वे प्रशासनिक, धार्मिक और आर्थिक केंद्र हो सकते थे।

    • प्रशासनिक केंद्र: तंजावुर जैसे नगर, जो चोलों की राजधानी थी, शासन के मुख्य केंद्र थे। यहाँ राजा आदेश जारी करते थे और अधिकारी राज्य का प्रबंधन करते थे।
    • मंदिर नगर: ये तीर्थयात्रा और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र थे। उदाहरण के लिए—तंजावुर (राजराजेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध) और मदुरै।
    • वाणिज्यिक नगर और बंदरगाह: ये व्यापार और वाणिज्य पर केंद्रित थे। सूरत, हम्पी और मसूलीपट्टनम इसके प्रमुख उदाहरण थे।

    मंदिर मध्यकालीन अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र में थे।

    • आर्थिक केंद्र: शासक अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए मंदिर बनवाते थे और उन्हें भूमि तथा धन दान करते थे। इससे प्राप्त धन का उपयोग भव्य अनुष्ठानों और व्यापार में किया जाता था।
    • शहरीकरण: मंदिरों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पुजारी, कामगार और व्यापारी मंदिरों के पास बस गए, जिससे ‘मंदिर नगरों’ का विकास हुआ।
    • तीर्थ केंद्र: उत्तर प्रदेश में वृंदावन और तमिलनाडु में तिरुवनमलाई जैसे स्थान भी धीरे-धीरे व्यस्त नगरों के रूप में विकसित हुए।

    आठवीं शताब्दी से उपमहाद्वीप में कई छोटे नगरों का उदय हुआ, जो संभवतः बड़े गाँवों से निकले थे।

    • मंडपिका: ये वे बाज़ार थे (जिन्हें बाद में ‘मंडी’ कहा गया) जहाँ आस-पास के गाँव के लोग अपनी उपज बेचने लाते थे।
    • हट्ट: ये बाज़ार की गलियाँ थीं (जिन्हें बाद में ‘हाट’ कहा गया) जहाँ दुकानों की कतारें होती थीं।
    • शिल्पियों के मोहल्ले: कुम्हारों, तेल निकालने वालों और लोहारों जैसे विभिन्न शिल्पकारों के लिए अलग-अलग गलियाँ निर्धारित थीं।

    व्यापार विभिन्न समूहों द्वारा किया जाता था, जिनमें स्थानीय फेरीवालों से लेकर शक्तिशाली व्यापारी संघ (Guilds) शामिल थे।

    • काफिले और संघ: अपने हितों की रक्षा के लिए व्यापारी काफिलों में यात्रा करते थे और संघ (गिलड्स) बनाते थे। दक्षिण भारत में ‘मणिग्रामम्’ और ‘नानादेशी’ सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक संघ थे।
    • वैश्विक संपर्क: चेट्टियार और मारवाड़ी ओसवाल जैसे व्यापारियों ने लाल सागर, फारस की खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ व्यापक व्यापार किया।
    • प्रमुख वस्तुएं: भारत मसालों, सूती कपड़ों और नील का निर्यात करता था, जबकि सोने, हाथीदांत और घोड़ों का आयात किया जाता था।

    मध्यकालीन नगर विशिष्ट शिल्प उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थे।

    • बिदरी: बीदर के शिल्पकार तांबे और चाँदी में जड़ाई के काम के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि इस शिल्प का नाम ही ‘बिदरी’ पड़ गया।
    • विश्वकर्मा समुदाय: इसमें सुनार, कशेरे (लोहार), बढ़ई और राजमिस्त्री शामिल थे। ये मंदिरों और महलों के निर्माण के लिए अनिवार्य थे।
    • वस्त्र उत्पादन: सालियार या कैक्कोलार जैसे बुनकर समुदाय समृद्ध हो गए और उन्होंने मंदिरों को भारी दान दिया। कपास को साफ करना, कातना और रंगना भी स्वतंत्र शिल्प बन गए थे।
    • हम्पी: कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों की घाटी में स्थित यह विजयनगर साम्राज्य का केंद्र था। यह अपनी विशिष्ट किलेबंदी और भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था। 1565 में दक्कनी सुल्तानों द्वारा विजयनगर की हार के बाद इसका पतन हो गया।
    • सूरत: इसे “पश्चिम का प्रवेश द्वार” कहा जाता था क्योंकि यहाँ से मक्का के लिए जहाज रवाना होते थे। यह जरी के काम (गोल्ड लेस) वाले वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।
    • मसूलीपट्टनम (मछलीपट्टनम): कृष्णा नदी के डेल्टा पर स्थित यह नगर 17वीं शताब्दी में डच, ब्रिटिश और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया।

    16वीं और 17वीं शताब्दी में यूरोपीय कंपनियों के आगमन ने व्यापार का परिदृश्य बदल दिया।

    • बंदरगाहों की ओर झुकाव: व्यापार बंबई (मुंबई), कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) जैसे यूरोपीय शहरों की ओर स्थानांतरित हो गया।
    • ब्लैक टाउंस: यूरोपीय लोगों ने इन शहरों में किलेबंदी की और भारतीय व्यापारियों व शिल्पकारों को ‘ब्लैक टाउंस’ (भारतीयों के लिए सुरक्षित क्षेत्र) में रहने के लिए मजबूर किया।
    • स्वतंत्रता की हानि: भारतीय बुनकर अब यूरोपीय एजेंटों से पेशगी (Advances) लेकर काम करने लगे, जिससे उनकी अपनी पसंद के डिजाइन बनाने की रचनात्मक स्वतंत्रता खत्म हो गई।
    1. मंडपिका: मंडी।
    2. हट्ट: हाट (बाजार)।
    3. गिल्ड (Guild): व्यापारियों का संघ।
    4. बिदरी: चांदी की जड़ाई वाला शिल्प।
    5. एम्पोरियम (Emporium): एक ऐसा स्थान जहाँ विभिन्न प्रकार की वस्तुएं खरीदी और बेची जाती हैं।

    🏺 नगर, व्यापारी और शिल्पीजन

    🏙️ शहरी केंद्र
    मध्यकालीन नगर बहुआयामी थे: प्रशासनिक (तंजावुर), मंदिर नगर (मदुरै) या पत्तन (सूरत)। मंदिर नगरों ने शहरीकरण को गति दी क्योंकि तीर्थयात्रियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कारीगर और व्यापारी वहां बस गए।
    🤝 बाज़ार और संघ
    गाँव वाले अपना सामान मण्डपिका (मंडी) में बेचते थे और हट्ट (हाट) में खरीदारी करते थे। बड़े व्यापारियों ने दूर-दराज के व्यापार के लिए मणिग्रामम और नानादेशी जैसे शक्तिशाली ‘गिल्ड’ (संघ) बनाए।
    ⚒️ विशिष्ट हस्तशिल्प
    बीदर के शिल्पकारों की चांदी की जड़ाई इतनी प्रसिद्ध थी कि इसे बीदरी कहा जाने लगा। विश्वकर्मा समुदाय मंदिरों का निर्माण करता था, जबकि सलियार जैसे बुनकर संपन्न और प्रभावशाली दानदाता बन गए।
    ⚓ ऐतिहासिक पत्तन
    हम्पी विजयनगर का वास्तुशिल्प गौरव था। सूरत ज़री के कपड़ों के लिए प्रसिद्ध “पश्चिम का द्वार” था। मसूलीपट्टनम कृष्णा डेल्टा पर स्थित एक महत्वपूर्ण और विवादित बंदरगाह था।
    यूरोपीय प्रभाव 17वीं सदी में व्यापार यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण वाले ‘ब्लैक टाउन्स’ (बंबई, मद्रास, कलकत्ता) की ओर बढ़ गया, जहाँ भारतीय बुनकर अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता खो बैठे।
    📂

    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-6 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नगर, व्यापारी और शिल्पीजन

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    राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के निष्कर्ष के तौर पर, अनुच्छेद 46 से 51 तक हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान से लेकर पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक शांति की प्राप्ति तक, व्यापक जिम्मेदारियों को समाहित करते हैं। इन्हें अक्सर गांधीवादी, समाजवादी और उदार-बौद्धिक सिद्धांतों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

    उत्थान, पर्यावरण और वैश्विक शांति: अनुच्छेद 46–51
    ये अंतिम अनुच्छेद राष्ट्रीय समाज कल्याण से लेकर एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की भूमिका तक के बदलाव को दर्शाते हैं।

    यह अनुच्छेद “सामाजिक न्याय” और शोषण को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश है।

    • शासनादेश: राज्य जनता के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को विशेष सावधानी के साथ बढ़ावा देगा।
    • संरक्षण: यह राज्य को इन समुदायों को सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचाने का निर्देश देता है।
    • कार्यान्वयन: यह लेख विभिन्न आरक्षण नीतियों और SC/ST छात्रों के लिए प्री-मैट्रिक/पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं का आधार है।

    यह अनुच्छेद सार्वजनिक स्वास्थ्य को सामाजिक नैतिकता से जोड़ता है।

    • शासनादेश: राज्य अपने लोगों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा।
    • निषेध (Prohibition): विशेष रूप से, राज्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं (औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर) के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करेगा।
    • कार्यान्वयन: बिहार और गुजरात जैसे राज्यों ने शराब बंदी को सही ठहराने के लिए इसी अनुच्छेद का सहारा लिया है। ‘पोषण अभियान’ जैसे राष्ट्रीय मिशन भी यहीं से प्रेरित हैं।
    • शासनादेश: राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा।
    • पशु संरक्षण: यह राज्य को नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाने और गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं के वध पर रोक लगाने का निर्देश देता है।
    • कार्यान्वयन: गोहत्या के संबंध में विभिन्न राज्यों के कानून और “हरित क्रांति” की शुरुआत इसी निर्देश के अनुरूप है।
    • उत्पत्ति: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया।
    • शासनादेश: राज्य पर्यावरण के संरक्षण और सुधार का तथा देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
    • कार्यान्वयन: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) इसी निर्देश को पूरा करने के लिए बनाए गए थे।
    • शासनादेश: संसद द्वारा राष्ट्रीय महत्व के घोषित किए गए प्रत्येक स्मारक, स्थान या कलात्मक या ऐतिहासिक रुचि की वस्तु को विरूपण, विनाश, हटाने या निर्यात से बचाना राज्य का दायित्व होगा।
    • कार्यान्वयन: इसका प्रबंधन मुख्य रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किया जाता है।
    • शासनादेश: राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए राज्य कदम उठाएगा।
    • उद्देश्य: न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना और कार्यपालिका को कानूनी परिणामों को प्रभावित करने से रोकना।
    • कार्यान्वयन: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 द्वारा इसे पूर्ण रूप से लागू किया गया।

    यह अनुच्छेद भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को निर्धारित करता है। राज्य निम्नलिखित के लिए प्रयास करेगा:

    1. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना।
    2. राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानजनक संबंध बनाए रखना।
    3. अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि दायित्वों के प्रति सम्मान बढ़ाना।
    4. अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता (Arbitration) द्वारा निपटाने के लिए प्रोत्साहित करना।
    अनुच्छेदश्रेणीमुख्य शब्दकार्यान्वयन का उदाहरण
    46समाजवादीSC/ST के हितआरक्षण / छात्रवृत्ति
    47गांधीवादीजन स्वास्थ्य और नशाबंदीमिड-डे मील / शराब बंदी
    48गांधीवादीवैज्ञानिक कृषिपशुपालन योजनाएं
    48Aउदारवादीपर्यावरण और वन्यजीववन संरक्षण अधिनियम
    49उदारवादीस्मारक संरक्षणASI द्वारा संरक्षण
    50उदारवादीशक्तियों का पृथक्करणस्वतंत्र न्यायपालिका
    51उदारवादीअंतरराष्ट्रीय शांति“पंचशील” / विदेश नीति

    🌍 उत्थान और वैश्विक शांति

    ✊ अनु. 46: SC, ST और कमजोर वर्ग
    राज्य समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से SC और ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा और उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाएगा।
    🍎 अनु. 47: स्वास्थ्य और निषेध
    लोगों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाना राज्य का कर्तव्य है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देता है (जैसे बिहार/गुजरात में शराबबंदी)।
    🐾 अनु. 48 और 48A: पर्यावरण
    48: कृषि का वैज्ञानिक संगठन और गोवध पर रोक48A: (42वां संशोधन) वनों, वन्यजीवों की रक्षा और पर्यावरण में सुधार करना।
    🏛️ अनु. 49 और 50: राजकीय ढांचा
    49: राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों और स्थानों का संरक्षण। 50: न्यायिक स्वतंत्रता के लिए राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना।
    🕊️ अनु. 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति
    भारत की विदेश नीति का संवैधानिक आधार। अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंध बनाए रखना और अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति सम्मान बढ़ाना।
    अनुच्छेद श्रेणी मुख्य विषय कार्यान्वयन
    46समाजवादीSC/ST हितआरक्षण / छात्रवृत्ति
    47गांधीवादीसार्वजनिक स्वास्थ्यपोषण अभियान / शराबबंदी
    48Aउदारवादीपर्यावरणवन्यजीव संरक्षण अधिनियम
    50उदारवादीन्यायिक स्वतंत्रताCrPC (1973) द्वारा पृथक्करण
    51उदारवादीवैश्विक शांतिपंचशील / अंतर्राष्ट्रीय संधि
    विशेष तथ्य अनुच्छेद 51 अद्वितीय है क्योंकि यह राज्य को अपनी सीमाओं से परे देखने का निर्देश देता है, जो भारत को विश्व स्तर पर न्यायपूर्ण संबंधों के समर्थक के रूप में स्थापित करता है।

    यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (21 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।

    • संदर्भ: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया और इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आलोचनात्मक विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • आक्रामक कटौती: तमिलनाडु जैसे राज्यों में कुछ बूथों पर इतनी आक्रामक तरीके से नाम हटाए गए हैं कि 2024 के वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से गायब हो गए हैं।
      • लिंग भेद: बिहार के आंकड़ों में पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं के नाम असमान रूप से अधिक हटाए गए हैं, जो प्रक्रिया की खामियों को दर्शाता है।
      • आंकड़ों में विसंगति: उत्तर प्रदेश में, राज्य चुनाव आयोग द्वारा गिने गए केवल ग्रामीण मतदाताओं की संख्या, ECI द्वारा पूरे राज्य के लिए जारी किए गए ड्राफ्ट रोल की संख्या से अधिक है।
      • तर्कहीन पुन: पंजीकरण: ECI का यह कहना कि गलत तरीके से हटाए गए मतदाता “नए” (फॉर्म 6) के रूप में पंजीकरण करें, मूल गलतियों की जांच को रोकता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “चुनावी अखंडता”, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” और “निर्वाचन आयोग की भूमिका”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • न्यायिक हस्तक्षेप: पश्चिम बंगाल और बिहार में लाखों लोगों को मिल रहे ‘वेरिफिकेशन नोटिस’ के तनाव को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को नए दिशा-निर्देश जारी करने पड़े हैं।
      • सिस्टम की खराबी: शिकायतें मुख्य रूप से 2002 की ‘मैपिंग लिस्ट’ और एड-हॉक सॉफ्टवेयर की त्रुटियों से उत्पन्न हुई हैं, जिसने वास्तविक नागरिकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; द्विपक्षीय संबंध; भारत के हितों पर क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव)।

    • संदर्भ: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MbZ) की दिल्ली यात्रा और भारत-UAE रणनीतिक रक्षा साझेदारी की घोषणा।
    • मुख्य बिंदु:
      • रक्षा मील का पत्थर: दोनों देश एक “रणनीतिक रक्षा साझेदारी” के लिए रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे, जो अपनी तरह का पहला समझौता है।
      • आर्थिक समझौते: द्विपक्षीय व्यापार को $200 बिलियन तक दोगुना करने की प्रतिबद्धता, $3 बिलियन का LNG सौदा और गुजरात में भारी निवेश।
      • क्षेत्रीय तनाव: यह यात्रा खाड़ी में UAE और सऊदी अरब के बीच बढ़ते सत्ता संघर्ष (विशेष रूप से सूडान को लेकर) के बीच हुई है।
      • कनेक्टिविटी जोखिम: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की चाबहार पोर्ट और ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) जैसी योजनाओं को खतरे में डालती है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “ऊर्जा सुरक्षा”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • प्रवासी भारतीय: खाड़ी क्षेत्र में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता भारत की घरेलू प्राथमिकता बन जाती है।
      • संतुलन की कला: प्रस्तावित रक्षा समझौता अन्य क्षेत्रीय गठबंधनों के खिलाफ नहीं दिखना चाहिए, इसलिए भारत को बहुत सावधानी से संतुलन बनाना होगा।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।

    • संदर्भ: एम.के. नारायणन द्वारा ट्रम्प प्रशासन के तहत ‘मोनरो डॉक्ट्रिन’ (Monroe Doctrine) के पुनरुद्धार और इसके वैश्विक प्रभावों का विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • मादुरो ऑपरेशन: अमेरिकी सेना द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को आधुनिक “मोनरो डॉक्ट्रिन” के रूप में देखा जा रहा है।
      • संप्रभुता का उल्लंघन: यह ऑपरेशन अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को फिर से स्थापित करने की रणनीति है।
      • वैश्विक जोखिम: विश्व स्तर पर विरोध की कमी यह संकेत देती है कि 1945 के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दम तोड़ रही है, जिससे चीन या रूस जैसे देशों को भी ऐसी एकपक्षीय कार्रवाइयों के लिए बढ़ावा मिल सकता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक सुरक्षा रुझान”, “भारत-अमेरिका संबंध” और “रणनीतिक स्थिरता”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • भारत पर प्रभाव: भारत एक दोराहे पर खड़ा है; अधिकांश मामलों में अमेरिका का साथ देने के बावजूद, उसे रूसी तेल आयात करने पर ट्रम्प की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
      • क्षेत्रीय अलगाव: भारत-अमेरिका संबंधों में बढ़ती “ठंडक” के कारण भारत पश्चिम एशिया जैसे संघर्ष क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अलग-थलग पड़ सकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बुनियादी ढांचा; ऊर्जा संक्रमण; पर्यावरण)।

    • संदर्भ: इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर वैश्विक बदलाव तांबे की आपूर्ति में भारी कमी के कारण एक संरचनात्मक बाधा का सामना कर रहा है।
    • मुख्य बिंदु:
      • बढ़ती मांग: वैश्विक EV बिक्री 2015 में 5.5 लाख से बढ़कर 2025 में 2 करोड़ हो गई, जिससे तांबे की खपत 27.5 हजार टन से बढ़कर 12.8 करोड़ टन से अधिक हो गई है।
      • संसाधन घाटा: 2026 तक मांग 3 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि आपूर्ति केवल 2.8 करोड़ टन रहने की संभावना है।
      • आपूर्ति बाधाएं: अयस्क की गिरती गुणवत्ता, पर्यावरण संबंधी विरोध और नई खदानों के विकास में लगने वाला लंबा समय (10-15 वर्ष) मुख्य कारण हैं।
      • चीन का दबदबा: चीन वैश्विक बैटरी सेल उत्पादन के 70% हिस्से को नियंत्रित करता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “ऊर्जा संक्रमण रणनीति”, “महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा” और “औद्योगिक नीति”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • संरचनात्मक बाधा: इलेक्ट्रिक वाहनों को पारंपरिक वाहनों की तुलना में चार से पांच गुना अधिक तांबे की आवश्यकता होती है, और वर्तमान में इसका कोई व्यवहार्य विकल्प नहीं है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े समूह और विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव)।

    • संदर्भ: अमेरिका के नेतृत्व वाली “पैक्स सिलिका” पहल का विश्लेषण, जिसका उद्देश्य वैश्विक सेमीकंडक्टर और AI आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना है।
    • मुख्य बिंदु:
      • पहल का लक्ष्य: जबरन निर्भरता को कम करना और समान विचारधारा वाले देशों के बीच विश्वसनीय डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार करना।
      • भू-राजनीतिक प्रतिक्रिया: यह पहल दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) में चीन के प्रभुत्व और उसके द्वारा संसाधनों को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने की प्रतिक्रिया है।
      • भारत का निमंत्रण: शुरुआती शिखर सम्मेलन में न बुलाए जाने के बाद, अब अमेरिका ने भारत को जल्द ही इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित करने की बात कही है।
      • भारत की ताकत: भारत के पास मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचा, तेजी से बढ़ता AI बाजार और इंजीनियरों का एक विशाल पूल है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “तकनीकी संप्रभुता”, “महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा” और “भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • दोहरी आपूर्ति श्रृंखला: भविष्य में दो प्रमुख आपूर्ति श्रृंखलाएं उभर सकती हैं—एक चीन के नेतृत्व में और दूसरी ‘पैक्स सिलिका’ के नेतृत्व में। देशों को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए सावधानी से चयन करना होगा।
      • घरेलू हितों की रक्षा: भारत को अपने उभरते सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए सब्सिडी और नियमों में विशेष छूट की आवश्यकता होगी, जो वाशिंगटन की वर्तमान नीतियों के साथ टकरा सकता है।

    संपादकीय विश्लेषण

    21 जनवरी, 2026
    GS-2 राजव्यवस्था
    ⚖️ चुनावी SIR: विलोपन का जाल
    विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में व्यापक विसंगतियां: बिहार में महिलाओं के नाम हटाने का अनुपात असंतुलित है, जबकि यूपी का ग्रामीण डेटा चुनाव आयोग के ड्राफ्ट रोल का विरोध करता है। आलोचना: गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 (नया पंजीकरण) पर जोर देना त्रुटियों के ऑडिट को रोकता है।
    GS-2 अंत. संबंध
    🛡️ भारत-यूएई: रणनीतिक रक्षा मील का पत्थर
    रणनीतिक रक्षा साझेदारी के ढांचे की घोषणा—खाड़ी क्षेत्र में भारत के लिए पहली ऐसी पहल। आर्थिक लक्ष्य: द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर $200 बिलियन तक पहुँचाना। चुनौती: ऊर्जा हितों और 1 करोड़ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सऊदी-यूएई मतभेदों के बीच संतुलन बनाना।
    GS-2 अंत. संबंध
    🌎 “डोनरो” (Donroe) सिद्धांत और संप्रभुता
    वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की हिरासत मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) के पुनरुत्थान का संकेत है। प्रभाव: 1945 के बाद की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा। भारत के लिए परिणाम: संघर्ष क्षेत्रों में सापेक्ष रणनीतिक अलगाव और रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिकी दबाव में वृद्धि।
    GS-3 अर्थव्यवस्था
    🔋 ईवी तांबा संकट (Copper Crunch)
    इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को पारंपरिक वाहनों की तुलना में 4-5 गुना अधिक तांबे की आवश्यकता होती है। कमी: 30 मिलियन टन मांग के मुकाबले आपूर्ति केवल 28 मिलियन टन रहने का अनुमान। दबदबा: चीन वैश्विक बैटरी सेल उत्पादन के 70% को नियंत्रित करता है, जिससे वह हरित संक्रमण पर नियंत्रण रखता है।
    GS-2 अंत. संबंध
    💻 पैक्स सिलिका: हाई-टेक संप्रभुता
    सेमीकंडक्टर और एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए अमेरिकी नेतृत्व वाली पहल। चीन के दुर्लभ मृदा तत्वों (REE) पर वर्चस्व का जवाब। अवसर: भारत के इंजीनियरों का विशाल पूल और बदलते वीजा नियमों के कारण घर लौट रहे विशेषज्ञ भारत को विश्वसनीय डिजिटल हब के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
    त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):फॉर्म 6: मतदाता सूची में नए पंजीकरण के लिए उपयोग किया जाता है। • पैक्स सिलिका (Pax Silica): रणनीतिक हाई-टेक रिस्क-कम करने वाला क्लब। • मुनरो सिद्धांत: 1823 की अमेरिकी नीति जो अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशवाद का विरोध करती थी।

    यहाँ रणनीतिक हिमनदों (Glaciers)ऊँची चोटियों और हिमनद झीलों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है, जो उत्तर भारत के पर्यावरणीय और सुरक्षा मानचित्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं:

    हिमनद भारत के “जल मीनार” (Water Towers) हैं, जो सदानीरा (बारहमासी) नदी प्रणालियों को पोषित करते हैं। मानचित्र पर ये मुख्य रूप से ट्रांस-हिमालयी और वृहद हिमालयी क्षेत्रों में केंद्रित हैं।

    • सियाचिन हिमनद (कराकोरम श्रेणी): भारत का सबसे लंबा हिमनद (लगभग 76 किमी)। यह नुब्रा नदी का स्रोत है।
    • गंगोत्री हिमनद (उत्तराखंड): हिमालय के सबसे बड़े हिमनदों में से एक; गंगा (भागीरथी) का प्राथमिक स्रोत।
    • यमुनोत्री हिमनद (उत्तराखंड): बंदरपूंछ चोटी पर स्थित; यमुना नदी का स्रोत।
    • जेमू हिमनद (सिक्किम): पूर्वी हिमालय का सबसे बड़ा हिमनद, जो कंचनजंगा के आधार पर स्थित है; यह तीस्ता नदी को जल प्रदान करता है।
    • बियाफो और बाल्टोरो हिमनद: कराकोरम क्षेत्र में स्थित; सिंधु नदी प्रणाली के जल स्तर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।

    सटीक मानचित्रण के लिए यह समझना आवश्यक है कि ये चोटियाँ किस पर्वत श्रेणी का हिस्सा हैं।

    चोटीऊँचाई (लगभग)श्रेणी/क्षेत्रमहत्व
    K2 (गॉडविन-ऑस्टिन)8,611 मीटरकराकोरम (लद्दाख)भारत की सबसे ऊँची चोटी (और दुनिया की दूसरी)।
    कंचनजंगा8,586 मीटरपूर्वी हिमालय (सिक्किम)भारत में स्थित हिमालय की सबसे ऊँची चोटी।
    नंदा देवी7,816 मीटरगढ़वाल हिमालय (UK)पूरी तरह से भारत के भीतर स्थित सबसे ऊँची चोटी।
    नामचा बरवा7,782 मीटरपूर्वी हिमालयवह स्थान जहाँ से ब्रह्मपुत्र भारत में “यू-टर्न” लेती है।
    अनाइमुडी2,695 मीटरपश्चिमी घाट (केरल)प्रायद्वीपीय भारत की सबसे ऊँची चोटी।

    ये झीलें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हैं और अक्सर रणनीतिक सीमा चिह्नों के रूप में कार्य करती हैं।

    • पैंगोंग त्सो (लद्दाख): एक उच्च-ऊँचाई वाली अंतःस्थलीय (Endorheic) झील, जो अपने रंग बदलते पानी के लिए प्रसिद्ध है; यह वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) द्वारा विभाजित है।
    • त्सो मोरीरी (लद्दाख): ताजे पानी की एक बड़ी उच्च-ऊँचाई वाली झील और एक घोषित रामसर स्थल
    • गुरुडोंगमार झील (सिक्किम): दुनिया की सबसे ऊँची झीलों में से एक; बौद्धों, सिखों और हिंदुओं के लिए पवित्र।
    • रूपकुंड (उत्तराखंड): इसे “कंकाल झील” के रूप में जाना जाता है, जो त्रिशूल पर्वत समूह की गोद में स्थित है।
    • चोलामू झील (सिक्किम): इसे अक्सर भारत की सबसे ऊँची झील माना जाता है, जो तिब्बती सीमा के पास स्थित है।
    विशेषतामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
    सबसे लंबा हिमनदसियाचिननुब्रा घाटी, लद्दाख
    तीस्ता का स्रोतजेमू हिमनदउत्तरी सिक्किम
    दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटीअनाइमुडीइराविकुलम, केरल
    रणनीतिक जल निकायपैंगोंग त्सोपूर्वी लद्दाख

    मानचित्र पर सियाचिन की स्थिति को ‘NJ9842’ बिंदु के उत्तर में देखें। झीलों को याद रखने के लिए उन्हें उनके संबंधित राज्यों (जैसे ‘त्सो’ शब्द वाली झीलें अक्सर लद्दाख/तिब्बत क्षेत्र में होती हैं) के साथ जोड़ें।

    हिमशिखरों की दुनिया

    हिमंडल (Cryosphere)
    ❄️ रणनीतिक हिमनद
    भारत के “जल मीनारों” में सियाचिन (76 किमी, नुब्रा का स्रोत) और गंगोत्री (भागीरथी का स्रोत) प्रमुख हैं। पूर्व में, कंचनजंगा के आधार पर स्थित जेमू हिमनद तीस्ता नदी को जल प्रदान करता है।
    अभ्यास: काराकोरम श्रेणी में सियाचिन हिमनद को खोजें और उसके नीचे स्थित रणनीतिक नुब्रा घाटी की पहचान करें।
    स्थलाकृति
    🏔️ उच्च तुंगता शिखर
    काराकोरम के विशालकाय K2 से लेकर पूर्णतः भारतीय क्षेत्र में स्थित नंदा देवी तक। नामचा बरवा जैसे रणनीतिक शिखर उस स्थान को चिह्नित करते हैं जहाँ से ब्रह्मपुत्र एक विशाल मोड़ लेकर भारत में प्रवेश करती है।
    शिखर ऊँचाई श्रेणी/क्षेत्र विशेष महत्व
    K28,611 मी.काराकोरम (लद्दाख)भारत का सर्वोच्च बिंदु
    कंचनजंगा8,586 मी.पूर्वी हिमालयभारत में स्थित सबसे ऊँचा हिमालयी शिखर
    नंदा देवी7,816 मी.गढ़वाल (उत्तराखंड)पूरी तरह से भारतीय सीमा के भीतर स्थित
    अनाइमुडी2,695 मी.पश्चिमी घाट (केरल)प्रायद्वीपीय भारत का सर्वोच्च शिखर
    झील विज्ञान
    💧 प्रहरी झीलें
    पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पैंगोंग त्सो (वास्तविक नियंत्रण रेखा द्वारा विभाजित) और गुरुडोंगमार (सिक्किम) जैसी झीलें उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सीमा प्रहरी और जैविक सूचक का कार्य करती हैं।
    अभ्यास: पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो के पानी से होकर गुजरने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को मानचित्र पर ट्रेस करें।
    मैपिंग सारांश चेकलिस्ट
    विशेषता मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
    सबसे लंबा हिमनदसियाचिन हिमनदनुब्रा घाटी, लद्दाख
    तीस्ता का स्रोतजेमू हिमनदउत्तरी सिक्किम
    दक्षिण का सर्वोच्चअनाइमुडीअनामलाई पहाड़ियाँ, केरल
    रणनीतिक जल निकायपैंगोंग त्सोपूर्वी लद्दाख (सीमा क्षेत्र)

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