अध्याय 2, “व्यापार से साम्राज्य तक“, बताता है कि कैसे इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक छोटे व्यापारिक निकाय से भारत में प्रमुख राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गई।

  • शक्ति का शून्य होना: 1707 में अंतिम शक्तिशाली मुगल शासक औरंगजेब की मृत्यु के बाद, विभिन्न मुगल गवर्नरों (सूबेदारों) और बड़े जमींदारों ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और अपने क्षेत्रीय राज्य स्थापित कर लिए।
  • प्रतीकात्मक महत्व: हालाँकि दिल्ली अब एक प्रभावी केंद्र के रूप में नहीं रही, लेकिन मुगल सम्राटों का प्रतीकात्मक महत्व बना रहा। उदाहरण के लिए, 1857 के विद्रोह के समय विद्रोहियों ने बहादुर शाह जफ़र को ही अपना स्वाभाविक नेता माना था।
  • रॉयल चार्टर (1600): 1600 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम से एक ‘इजाज़तनामा’ (चार्टर) प्राप्त किया, जिसने कंपनी को पूर्व के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दे दिया। इसका अर्थ था कि इंग्लैंड की कोई अन्य व्यापारिक कंपनी इसके साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती थी।
  • वाणिज्यिक नीति (Mercantilism): कंपनी का व्यावसायिक मॉडल भारत से कम कीमत पर सामान खरीदना और उन्हें यूरोप में ऊँची कीमतों पर बेचना था।
  • व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता: अंग्रेजों को अन्य यूरोपीय शक्तियों—पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसी से कड़ी टक्कर मिली। सभी कंपनियाँ भारत के उच्च गुणवत्ता वाले सूती कपड़े, रेशम और मसालों (काली मिर्च, लौंग, इलायची और दालचीनी) को खरीदना चाहती थीं।
  • किलेबंदी और संघर्ष: प्रतिस्पर्धा के कारण इन कंपनियों के बीच “व्यापारिक युद्ध” शुरू हो गए। वे एक-दूसरे के जहाज डुबो देते और अपने व्यापारिक केंद्रों की किलेबंदी करते थे, जिससे स्थानीय भारतीय शासकों के साथ उनका टकराव होने लगा।
  • पहली फैक्ट्री: अंग्रेजों की पहली व्यापारिक फैक्ट्री 1651 में हुगली नदी के तट पर स्थापित की गई।
  • जमींदारी अधिकार: 1696 तक कंपनी ने अपनी बस्ती के चारों ओर एक किला बनाना शुरू कर दिया और मुगल अधिकारियों को रिश्वत देकर तीन गाँवों की जमींदारी हासिल कर ली, जिनमें से एक ‘कालिकाता’ (बाद में कोलकाता) था।
  • शुल्क मुक्त व्यापार: कंपनी ने सम्राट औरंगजेब को एक ‘फरमान’ जारी करने के लिए मना लिया, जिसने कंपनी को बिना शुल्क चुकाए व्यापार करने का अधिकार दिया। हालाँकि, कंपनी के अधिकारी अपने निजी व्यापार के लिए भी इसका उपयोग करने लगे और कर नहीं चुकाते थे, जिससे बंगाल के राजस्व को भारी नुकसान हुआ।
  • नवाबों के साथ टकराव: औरंगजेब की मृत्यु के बाद, बंगाल के नवाबों (मुर्शिद कुली खान, अलीवर्दी खान और सिराजुद्दौला) ने कंपनी को रियायतें देने से मना कर दिया, बड़ी भेंट माँगी और किलेबंदी बढ़ाने पर रोक लगा दी।
  • प्लासी का युद्ध (1757): यह भारत में कंपनी की पहली बड़ी जीत थी। रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला के खिलाफ कंपनी की सेना का नेतृत्व किया। नवाब की हार का मुख्य कारण उनके सेनापति मीर जाफर की गद्दारी थी, जिसे अंग्रेजों ने नवाब बनाने का वादा किया था।
  • कठपुतली शासक: प्लासी के बाद अंग्रेजों ने व्यापारिक लाभ सुनिश्चित करने के लिए मीर जाफर और बाद में मीर कासिम जैसे “कठपुतली” नवाबों को गद्दी पर बैठाया।
  • बक्सर का युद्ध (1764): जब मीर कासिम ने कंपनी के हस्तक्षेप का विरोध किया, तो उसे बक्सर के युद्ध में हराया गया। इसके बाद कंपनी ने निर्णय लिया कि “अब हमें खुद ही नवाब बनना होगा।”
  • दीवानी अधिकार (1765): 1765 में मुगल सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल प्रांत का ‘दीवान’ नियुक्त किया। इससे कंपनी को बंगाल के विशाल राजस्व संसाधनों पर नियंत्रण मिल गया, जिसका उपयोग वे अपने व्यापार और सेना के खर्च के लिए करने लगे।
  • रेजिडेंट प्रणाली: सीधे सैन्य हमलों के बजाय, कंपनी ने भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए ‘रेजिडेंट’ नामक राजनीतिक और व्यावसायिक एजेंटों की नियुक्ति की।
  • सहायक संधि (Subsidiary Alliance): रिचर्ड वेलेज़ली द्वारा शुरू की गई इस नीति के तहत, भारतीय राजाओं को अपनी स्वतंत्र सेना रखने की अनुमति नहीं थी। उन्हें कंपनी की “सहायक सेना” के रखरखाव का खर्च उठाना पड़ता था। भुगतान न करने पर उनका इलाका छीन लिया जाता था।
  • टीपू सुल्तान (मैसूर का शेर): हैदर अली और टीपू सुल्तान के नेतृत्व में मैसूर बहुत शक्तिशाली हो गया था। टीपू ने अपने बंदरगाहों से चंदन और मसालों के निर्यात को रोक दिया। अंग्रेजों के साथ चार युद्ध हुए और अंततः 1799 में अपनी राजधानी श्रीरंगपट्टनम की रक्षा करते हुए टीपू सुल्तान मारे गए।
  • मराठों से युद्ध: अंग्रेजों ने युद्धों की एक श्रृंखला के माध्यम से मराठों को कमजोर किया। तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध (1817-19) ने मराठा शक्ति को पूरी तरह कुचल दिया और पेशवा के पद को समाप्त कर दिया।
  • विलय की नीति (Doctrine of Lapse): लॉर्ड डलहौजी द्वारा शुरू की गई इस नीति के अनुसार, यदि किसी भारतीय शासक की मृत्यु बिना किसी पुरुष उत्तराधिकारी के होती थी, तो उसका राज्य कंपनी के क्षेत्र का हिस्सा बन जाता था। इसी तरह सतारा, संबलपुर, उदयपुर और अंत में अवध का विलय किया गया।
  • प्रेसिडेंसी: अंग्रेजों ने अपने क्षेत्रों को तीन प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया, जिन्हें ‘प्रेसिडेंसी’ कहा जाता था: बंगाल, मद्रास और बंबई। प्रत्येक का शासन एक गवर्नर द्वारा चलाया जाता था।
  • न्याय व्यवस्था: 1772 से एक नई न्याय प्रणाली स्थापित की गई, जिसके तहत प्रत्येक जिले में दो अदालतें बनाई गईं: एक फौजदारी अदालत (Criminal Court) और एक दीवानी अदालत (Civil Court)।
  • कलेक्टर: जिले का मुख्य अधिकारी ‘कलेक्टर’ होता था, जिसका मुख्य कार्य राजस्व एकत्र करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।
  • कंपनी की सेना: अंग्रेजों ने भारतीय किसानों को प्रशिक्षित करके एक पेशेवर पैदल सेना तैयार की, जिन्हें ‘सिपाही’ (Sepoy) कहा जाता था। युद्ध की तकनीक बदलने के साथ, घुड़सवारों का महत्व कम हो गया और मस्कट व मैचलॉक (बंदूकें) से लैस पैदल सेना का महत्व बढ़ गया।

निष्कर्ष: इस प्रकार, एक व्यापारिक कंपनी के रूप में आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी कूटनीति, व्यापारिक नीतियों और सैन्य शक्ति के बल पर पूरे भारत को अपने नियंत्रण में ले लिया।

NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 2

व्यापार से साम्राज्य तक

सत्ता का शून्य
1707 के बाद: औरंगजेब के बाद, क्षेत्रीय नवाबों और ज़मींदारों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित किए।
वाणिज्यिकवाद: कंपनी का मॉडल भारतीय सामान सस्ते में खरीदने और यूरोप में ऊंचे मुनाफे पर बेचने पर आधारित था।
शुरुआती घर्षण
शुल्क मुक्त व्यापार: शाही फरमानों के दुरुपयोग से बंगाल के नवाबों को भारी राजस्व हानि हुई।
किलाबंदी: व्यापारिक प्रतिद्वंद्विता के कारण कंपनी ने अपनी चौकियों को सशस्त्र बनाया, जिससे स्थानीय शासकों के साथ संघर्ष हुआ।
विस्तार और विजय
प्लासी का युद्ध (1757): प्रमुख निर्णायक मोड़; मीर जाफर के विश्वासघात के बाद सिराजुद्दौला की हार हुई।
बक्सर का युद्ध (1764): इसके कारण 1765 में दीवानी अधिकार मिले, जिससे कंपनी को बंगाल का विशाल भू-राजस्व इकट्ठा करने की अनुमति मिली।
सहायक संधि: राज्यों को ब्रिटिश सेना के रख-रखाव के लिए भुगतान करने को मजबूर किया गया; विफल होने पर क्षेत्र कंपनी को सौंपना पड़ता था।
टीपू सुल्तान: ‘मैसूर के शेर’ ने 1799 में वीरगति प्राप्त करने से पहले ब्रिटिश व्यापारिक एकाधिकार को रोकने के लिए चार युद्ध लड़े।
विलय नीति (Doctrine of Lapse): डलहौजी की नीति जिसके तहत यदि कोई शासक बिना पुरुष उत्तराधिकारी के मर जाता, तो उसका राज्य (जैसे अवध) हड़प लिया जाता था।

फरमान

एक शाही आदेश, जैसे कि शुल्क मुक्त व्यापार अधिकार प्रदान करने वाला आदेश।

रेजीडेंट

भारतीय दरबारों में तैनात राजनीतिक एजेंट जो राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते थे।

सिपाही

पेशेवर पैदल सेना (Sepoys) के रूप में भर्ती और प्रशिक्षित किए गए भारतीय किसान।

कंपनी से राज्य तक
ईस्ट इंडिया कंपनी की यात्रा एक अनूठा ऐतिहासिक बदलाव था जहाँ एक व्यापारिक संस्था ने सैन्य तकनीक और राजनीतिक हेरफेर का उपयोग करके एक उपमहाद्वीप का संप्रभु स्वामी बनने का सफर तय किया।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-2 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: व्यापार से साम्राज्य तक

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उपराष्ट्रपति का पद देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है। भारत में यह पद अमेरिकी उपराष्ट्रपति की तर्ज पर बनाया गया है, जो राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में “स्टैंडबाय” (विकल्प) के रूप में कार्य करता है।

  • अनुच्छेद 63: इसमें कहा गया है कि “भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।”
  • दोहरी भूमिका: उपराष्ट्रपति दो क्षमताओं में कार्य करता है:
    1. राज्यसभा के पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) के रूप में।
    2. राष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में।

राष्ट्रपति की तरह उपराष्ट्रपति भी जनता द्वारा सीधे नहीं, बल्कि एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है।

  • इसमें संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं।
  1. इसमें संसद के मनोनीत सदस्य भी भाग लेते हैं।
  2. इसमें राज्यों की विधानसभाओं के सदस्य (विधायक/MLAs) शामिल नहीं होते।
  • आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) द्वारा।
  • मतदान गुप्त मतदान के माध्यम से होता है।

उपराष्ट्रपति पद के लिए पात्र होने के लिए व्यक्ति को:

  1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर लेनी चाहिए।
  3. राज्यसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए योग्य होना चाहिए। (ध्यान दें: राष्ट्रपति के लिए लोकसभा की योग्यता अनिवार्य है)।
  4. केंद्र, राज्य या किसी स्थानीय प्राधिकरण के अधीन किसी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए।
  • कार्यकाल: पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष
  • त्यागपत्र: वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
  • हटाने की प्रक्रिया: उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए औपचारिक “महाभियोग” की आवश्यकता नहीं होती।
    • हटाने का प्रस्ताव केवल राज्यसभा में ही पेश किया जा सकता है।
    • इसे राज्यसभा द्वारा प्रभावी बहुमत (Effective Majority) से पारित किया जाना चाहिए और लोकसभा द्वारा साधारण बहुमत से सहमति दी जानी चाहिए।
    • प्रस्ताव लाने से पहले 14 दिन का नोटिस देना अनिवार्य है।

उपराष्ट्रपति की दो मुख्य कार्यात्मक भूमिकाएँ हैं:

  • उनकी शक्तियाँ और कार्य लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) के समान होते हैं।
  • वह सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता करते हैं और सदन की गरिमा व व्यवस्था बनाए रखते हैं।
  • निर्णायक मत (Casting Vote): वह सामान्यतः मतदान नहीं करते, लेकिन मत बराबर होने की स्थिति में वह निर्णायक मत दे सकते हैं।
  • राष्ट्रपति की मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने की स्थिति में वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।
  • जब वह राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं, तो वे राज्यसभा के सभापति के कर्तव्यों का पालन नहीं करते (उस समय उपसभापति यह कार्य संभालते हैं)।
  • इस अवधि के दौरान उन्हें राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और वेतन-भत्ते प्राप्त होते हैं।
अनुच्छेदकीवर्डमुख्य प्रावधान
63पदभारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।
64सभापतिवह राज्यसभा का पदेन सभापति होगा।
65स्टैंडबायराष्ट्रपति की अनुपस्थिति में कार्यवाहक राष्ट्रपति।
66चुनावसंसद के सभी सदस्य (निर्वाचित + मनोनीत) वोट देते हैं।
67कार्यकाल5 वर्ष का कार्यकाल और पद से हटाने की प्रक्रिया।
69शपथराष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा दिलाई जाती है।
71विवादउपराष्ट्रपति चुनाव से जुड़े विवादों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट करेगा।

हमेशा याद रखें कि उपराष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति तो होता है, लेकिन वह राज्यसभा का सदस्य नहीं होता। इसीलिए वह पहली बार में वोट नहीं दे सकता।

संवैधानिक पद • अनु. 63-71
भारत के उपराष्ट्रपति

निर्वाचन, भूमिका और पदच्युति

पात्रता
भारत का नागरिक होना चाहिए, आयु 35+ वर्ष, और राज्यसभा सदस्य निर्वाचित होने के लिए पात्र होना चाहिए।
दोहरी भूमिका
राज्यसभा के पदेन सभापति के रूप में और ‘स्टैंडबाय’ कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।
निर्वाचन (अनु. 66)
निर्वाचक मंडल: इसमें संसद के सभी सदस्य (निर्वाचित और मनोनीत दोनों) शामिल होते हैं। राष्ट्रपति के विपरीत, राज्यों के विधायक (MLAs) इसमें शामिल नहीं होते हैं।
प्रक्रिया: गुप्त मतदान के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत पद्धति
पदच्युति प्रक्रिया (अनु. 67)
प्रस्ताव अनिवार्य रूप से राज्यसभा (प्रभावी बहुमत) में शुरू होना चाहिए और 14 दिनों के नोटिस के बाद लोकसभा (साधारण बहुमत) द्वारा सहमत होना चाहिए।

सभापति की शक्तियाँ

कार्यवाही की अध्यक्षता करना, मर्यादा बनाए रखना, और मत बराबर होने की स्थिति में निर्णायक मत (Casting Vote) का प्रयोग करना।

कार्यवाहक राष्ट्रपति

रिक्तियों के दौरान, राष्ट्रपति की सभी शक्तियों और उपलब्धियों का आनंद लेते हैं; इस अवधि में सभापति के कर्तव्यों को त्याग देते हैं।

निर्वाचन विवाद

अनु. 71 के तहत, उपराष्ट्रपति चुनावों के संबंध में सभी विवादों की जांच और निर्णय उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है।

कानूनी
तथ्य
उपराष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष होता है (अनु. 67)। पद पर रहते हुए वे कोई लाभ का पद धारण नहीं कर सकते। पदभार ग्रहण करने पर, शपथ (अनु. 69) विशेष रूप से राष्ट्रपति या उनके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा दिलाई जाती है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (28 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बाहरी क्षेत्र; विनिमय दर प्रबंधन) और GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: पूर्व आरबीआई गवर्नर सी. रंगराजन ने अप्रैल 2025 से रुपये के मूल्य में आई 6% की गिरावट का विश्लेषण किया है, जिसका मुख्य कारण आर्थिक के बजाय राजनयिक कारकों को बताया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • पूंजी का बहिर्वाह (Capital Outflow): पिछले संकटों के विपरीत, वर्तमान गिरावट $3,900 मिलियन के शुद्ध पूंजी बहिर्वाह के कारण है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में $10,615 मिलियन का निवेश आया था।
    • अमेरिकी टैरिफ दबाव: ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारतीय निर्यात पर 50% शुल्क और ईरान के साथ व्यापार करने पर 25% अतिरिक्त शुल्क की धमकी से बाजार में डर पैदा हो गया है।
    • अवमूल्यन (Devaluation) समाधान नहीं: भारत के निर्यात में आयातित वस्तुओं का हिस्सा बढ़ रहा है, इसलिए रुपये के अवमूल्यन से अब उतना लाभ नहीं होता, बल्कि यह कच्चे तेल के आयात को महंगा बनाकर मुद्रास्फीति (महंगाई) को बढ़ाता है।
    • कूटनीति की ओर बदलाव: चूंकि इस बार अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि जैसे कोई स्पष्ट आर्थिक कारण नहीं हैं, इसलिए समाधान अब आर्थिक क्षेत्र से हटकर राजनयिक मंच पर आ गया है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • अस्थिरता की नई परिभाषा: संपादकीय का तर्क है कि आरबीआई को यह स्पष्ट करना चाहिए कि “अस्थिरता कम करने” का अर्थ केवल उतार-चढ़ाव को रोकना नहीं, बल्कि एक स्थिर गिरावट को भी नियंत्रित करना है।
    • भू-राजनीतिक शस्त्रीकरण: चूंकि टैरिफ का उपयोग भू-राजनीतिक कारणों से किया जा रहा है, इसलिए भारत को पूंजी प्रवाह को स्थिर करने के लिए अमेरिका के साथ राजनयिक समझ विकसित करनी होगी।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) का निष्कर्ष और “2030 के लिए व्यापक रणनीतिक एजेंडा” का शुभारंभ।
  • मुख्य बिंदु:
    • आपूर्ति श्रृंखला से आगे: यह समझौता “विषम एकीकरण” (Heterogeneous integration – उन्नत सेमीकंडक्टर पैकेजिंग) और चिप डिजाइन में संयुक्त अनुसंधान और विकास (R&D) पर केंद्रित है।
    • AI सुरक्षा समन्वय: यह सुरक्षित और मानव-केंद्रित AI मॉडल विकसित करने के लिए यूरोपीय AI कार्यालय को भारत के राष्ट्रीय AI मिशन से जोड़ता है।
    • ब्लू वैलीज़ (Blue Valleys): ऐसे नियामक क्षेत्रों का निर्माण जहाँ भारतीय मानक यूरोपीय मानकों के अनुरूप होंगे, जिससे भारतीय पुर्जे बिना नई प्रमाणपत्र प्रक्रिया के यूरोपीय आपूर्ति श्रृंखला में शामिल हो सकेंगे।
    • वित्तीय एकीकरण: भारत “क्षितिज यूरोप” (Horizon Europe) के साथ जुड़ने की संभावना तलाशेगा, जिससे भारतीय चिप स्टार्टअप्स को यूरोपीय संघ के €95.5-बिलियन के शोध बजट तक पहुंच मिल सकेगी।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • डिजाइनर बनाम भौतिक पूंजी: यह समझौता भारत की डिजाइन प्रतिभा (दुनिया का 20% हिस्सा) को यूरोप के भौतिक अनुसंधान बुनियादी ढांचे (IMEC/Fraunhofer) के साथ जोड़ता है ताकि अमेरिकी बौद्धिक संपदा पर निर्भरता कम हो सके।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; औद्योगिक नीति; विनिर्माण क्षेत्र)।

  • संदर्भ: एक विश्लेषण कि क्यों केवल पूंजीगत सहायता बैटरी सेल और सौर विनिर्माण के लिए एक मजबूत घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में विफल हो रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • अपस्ट्रीम अड़चनें (Upstream Bottlenecks): जहाँ असेंबली (Downstream) का लक्ष्य 56% पूरा हो गया है, वहीं पॉलीसिल्कन और वेफर विनिर्माण (Upstream) जैसे महत्वपूर्ण खंड अपने लक्ष्य का केवल 14% और 10% ही हासिल कर पाए हैं।
    • बैटरी उत्पादन की धीमी गति: ₹18,000 करोड़ के परिव्यय के बावजूद, लक्षित 50 GWh क्षमता में से केवल 2.8% (1.4 GWh) ही चालू हो पाई है।
    • वीजा मुद्दे: इन उच्च विशिष्ट सुविधाओं को स्थापित करने के लिए आवश्यक चीनी तकनीकी विशेषज्ञों को वीजा जारी करने में सरकार की हिचकिचाहट एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
    • सख्त समय सीमा: कई कंपनियों को समय सीमा चूकने पर भारी जुर्माने का सामना करना पड़ रहा है, जो नीतिगत महत्वाकांक्षा और जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को दर्शाता है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • मानदंडों पर पुनर्विचार: संपादकीय सुझाव देता है कि PLI योजना में सफल क्रियान्वयन के लिए कंपनियों की ‘नेट वर्थ’ के बजाय उनकी “विशेषज्ञता और तकनीकी जानकारी” (Technical know-how) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार; श्रम सुधार) और GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय)।

  • संदर्भ: चार श्रम संहिताएं नवंबर 2025 में लागू हुईं, जिनका उद्देश्य 29 केंद्रीय कानूनों को एकीकृत करना और अनुपालन को सरल बनाना है।
  • मुख्य बिंदु:
    • युवा बेरोजगारी संकट: PLFS डेटा के अनुसार युवा बेरोजगारी 10.2% है, जिसमें भारी लैंगिक अंतर है—केवल 28.8% युवा महिलाएं श्रम शक्ति में शामिल हैं।
    • अनौपचारिकता का जाल: लगभग 90% युवा श्रमिक अनौपचारिक रूप से नियोजित हैं, और नियमित वेतन वाली नौकरियों में लगे 60.5% लोगों के पास सामाजिक सुरक्षा नहीं है।
    • सांविधिक न्यूनतम मजदूरी: राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम मजदूरी (Floor Wage) की शुरुआत से कम वेतन वाली शुरुआती नौकरियों में कमाई बढ़ने की उम्मीद है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • गिग वर्कर (Gig Worker) की मान्यता: पहली बार, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों (जिनकी संख्या 2029-30 तक 2.35 करोड़ होने का अनुमान है) को कानून में मान्यता दी गई है और उनके लिए सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का प्रावधान किया गया है।
    • अनुबंधात्मक असुरक्षा: 66.1% नियमित युवा श्रमिकों के पास कोई लिखित अनुबंध नहीं है, जो उन्हें नौकरी से अचानक निकाले जाने के प्रति संवेदनशील बनाता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; दक्षिण अमेरिकी भू-राजनीति)।

  • संदर्भ: वेनेजुएला में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के “खुले साम्राज्यवाद” की आलोचना, जिसमें नौसैनिक घेराबंदी और पूर्व राष्ट्राध्यक्ष की गिरफ्तारी शामिल है।
  • मुख्य बिंदु:
    • तेल पर नियंत्रण: संपादकीय का तर्क है कि अमेरिकी कार्रवाई लोकतंत्र के बारे में नहीं, बल्कि वेनेजुएला के विशाल तेल संसाधनों पर विशेष नियंत्रण सुरक्षित करने के बारे में है।
    • नव-औपनिवेशिक तर्क: वाशिंगटन का लक्ष्य मौजूदा सरकारी ढांचे पर कब्जा करना और उसके कार्यों को अपने अनुसार निर्देशित करना है, ताकि इराक जैसे सीधे कब्जे की लागत से बचा जा सके।
    • “डोनरो डॉक्ट्रिन” (Donroe Doctrine): इसे मोनरो सिद्धांत के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ यह एकपक्षीय कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय नियमों पर आधारित व्यवस्था की नींव को खतरे में डालती है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • दोहरे मानक: अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने यूक्रेनी संप्रभुता के उल्लंघन के लिए रूस की निंदा की, लेकिन पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी अतिक्रमण पर “मौन” बना हुआ है।
    • ग्लोबल साउथ (Global South) को खतरा: लेख चेतावनी देता है कि यदि इस मिसाल को चुनौती नहीं दी गई, तो ग्लोबल साउथ का कोई भी देश बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित नहीं रह पाएगा।

संपादकीय विश्लेषण

28 जनवरी, 2026
GS-2 IR / GS-3 तकनीक भारत-यूरोपीय संघ FTA: टेक 2030

सेमीकंडक्टर्स में हेटरोजीनियस इंटीग्रेशन की ओर बदलाव। भारतीय स्टार्टअप्स को €95.5-बिलियन के होराइजन यूरोप बजट तक संभावित पहुंच मिलेगी।

GS-3 उद्योग विनिर्माण PLI की चुनौतियां

अपस्ट्रीम वेफर विनिर्माण लक्ष्य का केवल 10%। केवल पूंजीगत सहायता बैटरी सेल में दशक भर पुराने R&D अंतर को पाट नहीं सकती।

GS-2 IR डोनरो सिद्धांत (Donroe Doctrine)

वेनेजुएला की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी का नग्न साम्राज्यवाद के रूप में विश्लेषण। लोकतांत्रिक स्थिरता के बजाय तेल संसाधनों पर नियंत्रण पर ध्यान।

अर्थव्यवस्था: भारत के निर्यात में उच्च आयात-सामग्री के कारण अवमूल्यन मुद्रास्फीति को बढ़ावा देता है; कूटनीति अब नया उपचार है।
तकनीकी कूटनीति: ‘ब्लू वैली’ नियामक क्षेत्र भारतीय घटकों को यूरोपीय संघ की आपूर्ति श्रृंखलाओं में निर्बाध रूप से प्रवेश करने की अनुमति देंगे।
श्रम: युवा रोजगार में अनौपचारिकता के जाल को सुलझाने के लिए निश्चित अवधि के श्रमिकों के लिए समानता अनिवार्य करना आवश्यक है।
ग्लोबल साउथ: पश्चिमी गोलार्ध में संप्रभुता का उल्लंघन नियम-आधारित व्यवस्था की नींव के लिए खतरा है।
GS-4
वैश्विक नैतिकता
यथार्थवाद बनाम संप्रभुता: व्यापार का हथियारकरण और नौसैनिक नाकेबंदी आत्मनिर्णय के अधिकार पर नैतिक प्रश्न उठाती है। हस्तक्षेपवाद पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी वैश्विक शासन में सार्वभौमिक नैतिक मानकों को अवैध बनाने का जोखिम पैदा करती है।

यहाँ भारत की प्रमुख मृदा (मिट्टी) के प्रकारों और कृषि पेटियों का विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। यह आपकी UPSC और राज्य PCS 2026 की तैयारी के लिए एक अनिवार्य विषय है, क्योंकि यह भूगोल और अर्थव्यवस्था के बीच के स्थानिक संबंध को दर्शाता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भारतीय मिट्टी को 8 प्रमुख समूहों में वर्गीकृत किया है। मानचित्रण के लिए इन शीर्ष 4 समूहों पर ध्यान केंद्रित करें, जो भारत की 80% से अधिक भूमि को कवर करते हैं।

मृदा का प्रकारभौगोलिक वितरणमानचित्रण मुख्य बिंदु
जलोढ़ मृदा (Alluvial Soil)उत्तरी मैदान (सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र) और तटीय डेल्टा।सबसे व्यापक (लगभग 43%); इसे खादर (नई जलोढ़) और भांगर (पुरानी जलोढ़) में विभाजित किया गया है।
काली मृदा (Black Soil)दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक के हिस्से)।इसे ‘रेगुर’ या ‘काली कपास मृदा’ भी कहा जाता है; यह लोहा, चूना और मैग्नीशियम से भरपूर होती है।
लाल और पीली मृदापूर्वी और दक्षिणी दक्कन पठार (ओडिशा, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु)।फेरिक ऑक्साइड के कारण इसका रंग लाल होता है; जलयोजित रूप (Hydrated form) में यह पीली दिखाई देती है।
लेटराइट मृदा (Laterite Soil)पश्चिमी और पूर्वी घाट की चोटियाँ (केरल, कर्नाटक, ओडिशा, असम की पहाड़ियाँ)।भारी वर्षा के कारण तीव्र निक्षालन (Leaching) से निर्मित; यह अम्लीय और मोटे दाने वाली होती है।

कृषि मानचित्रण यह पहचानता है कि मिट्टी और जलवायु के आधार पर प्राथमिक खाद्य और नकदी फसलें कहाँ केंद्रित हैं।

  • गेहूँ पेटी (उत्तर-पश्चिम):
    • प्रमुख राज्य: पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश।
    • मृदा फोकस: दोमट जलोढ़ मृदा (Loamy Alluvial Soil)।
  • चावल पेटी (पूर्व और दक्षिण):
    • प्रमुख राज्य: पश्चिम बंगाल (सबसे बड़ा उत्पादक), उत्तर प्रदेश, पंजाब और आंध्र प्रदेश।
    • मृदा फोकस: चीकायुक्त जलोढ़ मृदा (Clayey Alluvial Soil)।
  • कपास पेटी (काली मिट्टी का क्षेत्र):
    • प्रमुख राज्य: महाराष्ट्र, गुजरात और तेलंगाना।
    • मृदा फोकस: रेगुर (काली) मृदा।
  • गन्ना पेटी:
    • उत्तर भारत: उत्तर प्रदेश (सर्वाधिक क्षेत्रफल)।
    • दक्षिण भारत: महाराष्ट्र और कर्नाटक (समुद्री प्रभाव के कारण यहाँ प्रति हेक्टेयर पैदावार अधिक होती है)।
  • चाय (Tea): असम की पहाड़ियों (ब्रह्मपुत्र घाटी), दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल) और दक्षिण में नीलगिरी की पहाड़ियों में केंद्रित।
  • कॉफी (Coffee): लगभग पूरी तरह से कर्नाटक की पहाड़ियों (बाबाबूदन पहाड़ियों), केरल और तमिलनाडु में।
  • जूट (Jute): पश्चिम बंगाल का डेल्टा क्षेत्र (हुगली नदी बेल्ट) वैश्विक स्तर पर जूट उत्पादन में अग्रणी है।
फसल/मृदामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
कपास के लिए मृदादक्कन ट्रैपमहाराष्ट्र और गुजरात
चावल का केंद्रबंगाल डेल्टापश्चिम बंगाल
कॉफी की पहाड़ियाँबाबाबूदन पहाड़ियाँकर्नाटक
भारत का अन्न भंडारपंजाब और हरियाणाउत्तर-पश्चिमी मैदान

मिट्टी के वितरण को समझने के लिए इसे भारत के वर्षा मानचित्र (Rainfall Map) के साथ जोड़कर देखें। उदाहरण के लिए, जहाँ 200 सेमी से अधिक वर्षा होती है, वहाँ ‘लेटराइट’ मिट्टी मिलने की संभावना अधिक होती है, और जहाँ मध्यम वर्षा होती है, वहाँ ‘जलोढ़’ मिट्टी का विस्तार पाया जाता है।

मानचित्रण विवरण

मृदा और कृषि पेटियाँ
मृदा परिच्छेदिका ICAR वर्गीकरण

जलोढ़ (43%) उत्तरी मैदानों को कवर करती है। काली मृदा (रेगुर) दक्कन ट्रैप पर हावी है, जबकि लैटेराइट घाटों के शिखरों तक ही सीमित है।

वृक्षारोपण मानचित्र चाय, कॉफी और जूट

असम घाटी चाय में अग्रणी है; बाबाबुदन पहाड़ियाँ (KT) कॉफी के लिए; और हुगली डेल्टा वैश्विक जूट उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

प्रमुख फसल पेटियाँ
उत्तर-पश्चिम का अन्नागार

गेहूं की पेटी पूरे पंजाब और हरियाणा की दुमटी जलोढ़ मृदा पर पनपती है। इसके विपरीत, चावल की पेटी पश्चिम बंगाल और तटीय डेल्टाओं के मृण्मय जलोढ़ क्षेत्रों पर हावी है।

नकदी फसल गतिशीलता
कपास और गन्ना

कपास महाराष्ट्र और गुजरात की काली कपास मृदा में केंद्रित है। गन्ना दोहरे केंद्र प्रदर्शित करता है: उच्च रकबा वाले यूपी के मैदान और उच्च पैदावार वाला तटीय दक्षिण

लाल और पीली मृदा

पूर्वी दक्कन (ओडिशा/छत्तीसगढ़) में वितरित, जहाँ फेरिक ऑक्साइड की मात्रा परिदृश्य को अपना विशिष्ट लाल रंग देती है।

कपास केंद्र दक्कन ट्रैप (MH/GJ) को चिह्नित करें।
चावल केंद्र बंगाल डेल्टा (पश्चिम बंगाल) का पता लगाएं।
कॉफी पहाड़ियाँ बाबाबुदन पहाड़ियों (कर्नाटक) को लोकेट करें।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: उर्वरता के सूक्ष्म-मानचित्रण के लिए जलोढ़ मृदा में खादर-बांगर के अंतर को समझना महत्वपूर्ण है। ध्यान दें कि उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (Leaching) अम्लीय, मोटे दाने वाली लैटेराइट मृदा का निर्माण करता है।