Dainik GS Quiz in Hindi – January 23, 2026

Dainik GS Quiz (23 January 2026)
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    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 22 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय” उन समाजों के जीवन की पड़ताल करता है जो वर्ण-आधारित सामाजिक व्यवस्था से बाहर थे और मध्यकाल के दौरान बसे हुए राज्यों के साथ उनके संबंधों का वर्णन करता है।

    उपमहाद्वीप के कई समाज ब्राह्मणों द्वारा निर्धारित सामाजिक नियमों और कर्मकांडों का पालन नहीं करते थे।

    • परिभाषा: इन समाजों को अक्सर ‘जनजाति’ कहा जाता है।
    • सामाजिक संरचना: जनजातीय सदस्य नातेदारी (Kinship) के बंधनों से जुड़े होते थे। उनमें अमीर-गरीब का कोई बड़ा भेदभाव नहीं था।
    • आजीविका: कई जनजातियाँ खेती से अपनी आजीविका प्राप्त करती थीं। कुछ शिकारी-संग्राहक या पशुपालक थे। वे अपने निवास क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का पूरा उपयोग करते थे।
    • क्षेत्र: जनजातियाँ अक्सर जमीन और चरागाहों पर संयुक्त रूप से नियंत्रण रखती थीं और अपने नियमों के अनुसार उन्हें परिवारों के बीच बांटती थीं।
    • संपर्क: जनजातीय और जाति-आधारित समाजों के बीच निरंतर संघर्ष और निर्भरता का संबंध था। इस रिश्ते ने धीरे-धीरे दोनों प्रकार के समाजों को बदलने का काम किया।

    उपमहाद्वीप के लगभग हर क्षेत्र में जनजातीय समुदाय पाए जाते थे।

    • शक्तिशाली जनजातियाँ: पंजाब में 13वीं और 14वीं शताब्दी में खोखर जनजाति प्रभावशाली थी; बाद में गक्खर अधिक महत्वपूर्ण हो गए।
    • मुल्तान और सिंध: यहाँ लंगाह और अरघुन जनजातियों का प्रभुत्व था।
    • उत्तर-पश्चिम: बलूची एक बड़ी और शक्तिशाली जनजाति थी, जो छोटे-छोटे कुलों में विभाजित थी।
    • उत्तर-पूर्व: इस सुदूर क्षेत्र में नागा, अहोम और कई अन्य जनजातियाँ रहती थीं।
    • मध्य और पश्चिमी भारत: भील इन क्षेत्रों में फैले हुए थे। गोंड जनजाति वर्तमान छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में पाई जाती थी।

    खानाबदोश पशुपालक अपने जानवरों के साथ लंबी दूरी तय करते थे।

    • विनिमय (Exchange): वे दूध और अन्य पशु उत्पादों पर जीवित रहते थे। वे खेती करने वाले लोगों के साथ अनाज, कपड़े और बर्तनों के बदले घी, ऊन आदि का विनिमय करते थे।
    • बंजारे: वे सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे। उनके कारवां को ‘तांडा’ कहा जाता था। सुल्तान अलाउद्दीन ख़लजी नगर के बाज़ारों तक अनाज पहुँचाने के लिए बंजारों का उपयोग करते थे। सम्राट जहाँगीर ने लिखा है कि बंजारे विभिन्न क्षेत्रों से अपने बैलों पर अनाज ढोकर शहरों में बेचते थे।
    • भ्रमणशील समूह: शिल्पकार और नर्तक जैसे अन्य समूह भी एक गाँव से दूसरे गाँव अपनी कला का प्रदर्शन करने के लिए यात्रा करते थे।

    जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था और समाज की ज़रूरतें बढ़ीं, नए कौशल वाले लोगों की आवश्यकता हुई।

    • जातियाँ: वर्णों के भीतर छोटी-छोटी ‘जातियाँ’ उभरीं। उदाहरण के लिए, ब्राह्मणों के बीच नई जातियाँ दिखाई दीं।
    • विशिष्ट समूह: कई जनजातियों को जाति-आधारित समाज में शामिल किया गया और उन्हें जातियों का दर्जा दिया गया। लोहार, बढ़ई और राजमिस्त्री जैसे विशिष्ट शिल्पकारों को भी ब्राह्मणों द्वारा अलग जातियों के रूप में मान्यता दी गई।
    • राजपूत कुल: क्षत्रियों के बीच नए राजपूत कुल (जैसे—हुण, चंदेल, चालुक्य) शक्तिशाली हुए। उन्होंने धीरे-धीरे पुराने शासकों की जगह ले ली और शक्तिशाली राज्यों की स्थापना की।

    यह अध्याय दो प्रमुख जनजातीय समूहों के इतिहास पर विस्तार से प्रकाश डालता है जिन्होंने अपने राज्य स्थापित किए।

    • निवास: वे ‘गोंडवाना’ नामक विशाल वन क्षेत्र में रहते थे और स्थानांतरीय कृषि (Shifting cultivation) करते थे।
    • प्रशासन: गोंड राज्य ‘गढ़ों’ में विभाजित था। प्रत्येक गढ़ पर एक विशेष गोंड कुल का नियंत्रण होता था। गढ़ आगे ‘चैरासी’ (84 गाँवों की इकाई) में विभाजित थे, जो फिर ‘बरहोत’ (12 गाँवों की इकाई) में बंटे थे।
    • सामाजिक परिवर्तन: बड़े राज्यों के उदय ने गोंड समाज की प्रकृति को बदल दिया। उनका समानता वाला समाज धीरे-धीरे असमान सामाजिक वर्गों में बंट गया। ब्राह्मणों ने गोंड राजाओं से भूमि अनुदान प्राप्त किया और अधिक प्रभावशाली हो गए।
    • प्रवास: अहोम लोग 13वीं शताब्दी में वर्तमान म्यांमार से आकर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे।
    • राज्य निर्माण: उन्होंने ‘भूँइया’ (ज़मींदार) की पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को दबाकर एक नया राज्य बनाया। उन्होंने 1530 के दशक में ही आग्नेयास्त्रों (Firearms) का प्रयोग शुरू कर दिया था।
    • जबरन श्रम (Paiks): अहोम राज्य जबरन श्रम पर निर्भर था। राज्य के लिए काम करने के लिए मजबूर किए गए लोगों को ‘पाइक’ कहा जाता था।
    • कुल (Khel): अहोम समाज कुलों या ‘खेल’ में विभाजित था। एक ‘खेल’ अक्सर कई गाँवों को नियंत्रित करता था।
    • धर्म: मूल रूप से अहोम अपने जनजातीय देवताओं की पूजा करते थे, लेकिन 18वीं शताब्दी के दौरान हिंदू धर्म मुख्य धर्म बन गया। फिर भी, अहोम राजाओं ने हिंदू धर्म अपनाने के बाद भी अपनी पारंपरिक मान्यताओं को पूरी तरह नहीं छोड़ा।
    1. कुल (Clan): उन परिवारों का समूह जो एक ही पूर्वज के वंशज होने का दावा करते हैं।
    2. तांडा (Tanda): बंजारों का कारवां।
    3. पाइक (Paik): अहोम राज्य के वे लोग जिनसे जबरन श्रम कराया जाता था।
    4. स्थानांतरीय कृषि: जंगल को जलाकर साफ करना और वहां खेती करना, फिर कुछ वर्षों बाद नई जगह पर जाना।

    🏹 जनजातियाँ, खानाबदोश और बसे समुदाय

    🌿 जनजातीय समाज
    ये समाज नातेदारी (Kinship) के बंधन से जुड़े थे और वर्ण-आधारित व्यवस्था से बाहर रहते थे। उन्होंने संसाधनों पर संयुक्त रूप से नियंत्रण रखा और अपनी जरूरतों के लिए बसे हुए राज्यों के साथ व्यापार व संघर्ष किया।
    🐂 खानाबदोश व्यापारी
    चरवाहे अनाज और कपड़ों के बदले घी व दूध जैसे उत्पादों का विनिमय करते थे। बंजारा सबसे महत्वपूर्ण व्यापारी-खानाबदोश थे; उनके कारवां को टांडा (Tanda) कहा जाता था, जिसका उपयोग सुल्तान बाजारों तक अनाज पहुँचाने के लिए करते थे।
    🌳 गोंड साम्राज्य
    गोंडवाना के जंगलों में रहने वाले लोग जो स्थानांतरीय कृषि करते थे। उनका राज्य गढ़ों में विभाजित था, जिन्हें आगे 84 गाँवों की इकाइयों चौरासी में बांटा गया था। रानी दुर्गावती यहाँ की प्रसिद्ध शासिका थीं।
    🚣 अहोम समाज
    म्यांमार से आकर ब्रह्मपुत्र घाटी में बसे योद्धा। उन्होंने पाइक (Paik) नामक जबरन श्रम प्रणाली का उपयोग कर शक्तिशाली राज्य बनाया। उनका समाज खेल (Khels) नामक कुलों में विभाजित था, जो कई गाँवों को नियंत्रित करते थे।
    सामाजिक परिवर्तन जैसे-जैसे जनजातीय राज्य बड़े हुए, वे वर्ण व्यवस्था की ओर झुके; ब्राह्मणों को भूमि अनुदान मिले और समाज ऊँच-नीच वाले वर्गों में बंटने लगा, जिससे जनजातियों का सामाजिक स्वरूप बदल गया।
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    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-7 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय

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    राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) राज्य के लिए ‘अनुदेशों के साधन’ (Instrument of Instructions) हैं। ये गैर-न्यायिक (अदालत द्वारा लागू नहीं कराए जा सकते) हैं, लेकिन देश के शासन में मूलभूत महत्व रखते हैं।

    यह स्पष्ट करता है कि भाग IV के लिए “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग III (मौलिक अधिकार) के अनुच्छेद 12 में दिया गया है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारें, संसद, विधानमंडल और सभी स्थानीय अधिकारी शामिल हैं।

    यह DPSP की कानूनी प्रकृति को परिभाषित करता है:

    1. ये सिद्धांत किसी भी अदालत द्वारा लागू करने योग्य नहीं हैं (गैर-न्यायिक)।
    2. इसके बावजूद, ये देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाते समय इन्हें लागू करना राज्य का कर्तव्य है।
    • अनुच्छेद 38: सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करना
      • 38(1): राज्य लोक कल्याण की वृद्धि के लिए ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जहाँ सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित हो।
      • 38(2): (44वें संशोधन द्वारा) राज्य आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानता को कम करने का प्रयास करेगा।
    • अनुच्छेद 39: राज्य द्वारा अनुसरण की जाने वाली नीति के सिद्धांत
      • (a) सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन का अधिकार।
      • (b) समुदाय के भौतिक संसाधनों का उचित वितरण।
      • (c) धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण रोकना।
      • (d) पुरुषों और महिलाओं के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन
      • (e) श्रमिकों के स्वास्थ्य और बच्चों की सुरक्षा।
      • (f) बच्चों को गरिमापूर्ण वातावरण में विकास के अवसर (42वें संशोधन द्वारा)।
    • अनुच्छेद 39A: समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता
      • (42वें संशोधन द्वारा) गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करना ताकि आर्थिक तंगी के कारण कोई न्याय से वंचित न रहे।
    • अनुच्छेद 41: काम, शिक्षा और लोक सहायता का अधिकार
      • बेकारी, बुढ़ापे, बीमारी और निशक्तता की स्थिति में काम, शिक्षा और सरकारी सहायता पाने का अधिकार।
    • अनुच्छेद 42: काम की न्यायसंगत दशाएं और मातृत्व सहायता
      • कार्यस्थल पर मानवीय वातावरण और महिला कर्मचारियों के लिए मातृत्व अवकाश की व्यवस्था।
    • अनुच्छेद 43: निर्वाह मजदूरी (Living Wage)
      • सभी श्रमिकों के लिए उचित मजदूरी और सभ्य जीवन स्तर सुनिश्चित करना। ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देना।
    • अनुच्छेद 43A: प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
      • (42वें संशोधन द्वारा) उद्योगों के प्रबंधन में मजदूरों की भूमिका सुनिश्चित करना।
    • अनुच्छेद 40: ग्राम पंचायतों का संगठन
      • ग्राम पंचायतों का गठन करना और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में शक्ति प्रदान करना।
    • अनुच्छेद 43B: सहकारी समितियों को बढ़ावा देना
      • (97वें संशोधन, 2011 द्वारा) सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन और लोकतांत्रिक नियंत्रण को बढ़ावा देना।
    • अनुच्छेद 46: SC, ST और कमजोर वर्गों के हितों का संरक्षण
      • अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देना और सामाजिक अन्याय से रक्षा करना।
    • अनुच्छेद 47: पोषण स्तर, जीवन स्तर और नशाबंदी
      • पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करना। स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं पर प्रतिबंध लगाना।
    • अनुच्छेद 48: कृषि और पशुपालन का संगठन
      • कृषि को वैज्ञानिक बनाना। गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध पर रोक लगाना।
    • अनुच्छेद 44: समान नागरिक संहिता (UCC)
      • पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने का प्रयास करना।
    • अनुच्छेद 45: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल (0–6 वर्ष)
      • छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए शिक्षा और देखभाल का प्रावधान।
    • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण
      • (42वें संशोधन द्वारा) पर्यावरण की रक्षा करना और वनों व वन्यजीवों को सुरक्षित रखना।
    • अनुच्छेद 49: राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण
      • ऐतिहासिक इमारतों और कलात्मक वस्तुओं को विनाश या चोरी से बचाना।
    • अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
      • न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना।
    • अनुच्छेद 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा
      • विश्व शांति को बढ़ावा देना, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंध बनाए रखना और अंतर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करना।
    विशेषतामौलिक अधिकार (भाग III)नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
    प्रकृतिनकारात्मक (राज्य को कुछ करने से रोकना)सकारात्मक (राज्य को कुछ करने का निर्देश)
    न्यायिकताअदालत द्वारा प्रवर्तनीय (वाद-योग्य)अदालत द्वारा गैर-प्रवर्तनीय (अवाद-योग्य)
    उद्देश्यराजनीतिक लोकतंत्र की स्थापनासामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना
    निलंबनआपातकाल के दौरान निलंबित हो सकते हैंकभी निलंबित नहीं होते; केवल लागू किए जाते हैं
    अनुच्छेदकीवर्ड (Hindi)याद रखने का तरीका (Trick)
    36परिभाषाअनुच्छेद 12 के समान “राज्य”।
    37अवाद-योग्ययह केवल शासन का आधार है।
    38लोक कल्याणन्याय (सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक)।
    39आजीविका/वेतनसमान काम – समान वेतन।
    39Aमुफ्त कानूनी सहायता‘A’ से ‘Aid’ (गरीबों को सहायता)।
    40पंचायतगांधी जी के ग्राम स्वराज का सपना।
    41काम/शिक्षाबुढ़ापे/बेकारी में सहायता।
    42मातृत्व सहायतामहिलाओं के लिए कार्यस्थल पर छूट।
    43मजदूरीकम से कम इतनी मजदूरी कि सम्मान से जी सकें।
    43Bसहकारी समिति‘B’ से ‘Business’ (Co-operatives)।
    44UCC4 और 4 समान हैं = समान नागरिक संहिता।
    45शिशु शिक्षा6 साल से छोटे बच्चों के लिए आंगनवाड़ी।
    46SC / STपिछड़े वर्गों का उत्थान।
    47स्वास्थ्य/नशाबंदीशराब बंदी (Public Health)।
    48कृषि/गोहत्यावैज्ञानिक खेती और गाय की रक्षा।
    48Aपर्यावरण‘A’ से ‘Air’ (पर्यावरण की रक्षा)।
    49स्मारकऐतिहासिक इमारतों की रक्षा।
    50पृथक्करण50-50 बंटवारा (न्यायपालिका vs कार्यपालिका)।
    51शांतिअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शांति।
    1. समाजवादी (Socialistic): 38, 39, 39A, 41, 42, 43, 43A, 47.
    2. गांधीवादी (Gandhian): 40, 43, 43B, 46, 47, 48.
    3. उदारवादी (Liberal): 44, 45, 48, 48A, 49, 50, 51.
    • अनुच्छेद 39A: NALSA (विधिक सेवा प्राधिकरण) का गठन।
    • अनुच्छेद 40: 73वां संविधान संशोधन (पंचायती राज)।
    • अनुच्छेद 41: मनरेगा (MGNREGA) योजना।
    • अनुच्छेद 45: शिक्षा का अधिकार (RTE) और 86वां संशोधन।
    • अनुच्छेद 47: गुजरात और बिहार में शराब बंदी।

    📜 राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV)

    ⚖️ DPSP की प्रकृति (36-37)
    ये ‘निर्देशों के साधन’ हैं और गैर-न्यायोचित हैं। अनु. 37 के अनुसार ये देश के शासन में मूलभूत हैं। इनका लक्ष्य सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र है।
    💰 समाजवादी लक्ष्य (38-39)
    38: न्याय द्वारा कल्याण। 39: संसाधनों का उचित वितरण, समान वेतन और धन के संकेंद्रण पर रोक।
    ⚖️ विधिक सहायता और कार्य (39A-42)
    39A: मुफ्त कानूनी सहायता। 41: काम और शिक्षा का अधिकार। 42: मानवीय कार्य दशाएं और प्रसूति सहायता
    🏘️ गांधीवादी सिद्धांत (40-47)
    40: ग्राम पंचायत। 43B: सहकारी समितियां। 46: SC/ST हित। 47: पोषण स्तर सुधार और शराबबंदी
    🌍 उदारवादी निर्देश (44-51)
    44: समान नागरिक संहिता। 48A: पर्यावरण रक्षा। 50: न्यायपालिका का पृथक्करण। 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति।
    🔄 FR बनाम DPSP
    FR: नकारात्मक / राजनीतिक लोकतंत्र / वाद-योग्य (Justiciable)।
    DPSP: सकारात्मक / सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र / गैर-वादयोग्य।
    विचारधाराएं
    समाजवादी: 38, 39, 39A, 41, 42, 43, 43A गांधीवादी: 40, 43, 43B, 46, 47, 48 उदारवादी: 44, 45, 48A, 49, 50, 51

    🧠 5-मिनट मेमोरी टेबल

    अनुच्छेद कीवर्ड याद करने की ट्रिक (Trick)
    39Aकानूनी सहायताA = Aid (गरीबों के लिए ‘सहायता’)
    40पंचायतगांधीजी का ‘ग्राम’ विजन
    43BसहकारिताB = Business (सहकारी व्यापार)
    44समानता (UCC)4 और 4 ‘समान’ (Uniform) हैं
    45बच्चे (0-6)‘नन्हे-मुन्नों’ की शिक्षा
    48Aपर्यावरणA = Air / Animals (हवा और जीव)
    50पृथक्करण50-50 बंटवारा (न्यायपालिका/कार्यपालिका)
    51शांतिअंतिम लक्ष्य: ‘विश्व शांति’
    कार्यान्वयन
    अनु. 40 → 73वां संशोधन | अनु. 45 → शिक्षा का अधिकार | अनु. 39A → NALSA | अनु. 47 → शराबबंदी

    यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (22 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

    • संदर्भ: मतदाता सूचियों के “विशेष गहन पुनरीक्षण” (SIR) पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ और निर्वाचन आयोग की विवेकाधीन शक्तियों की सीमाएँ।
    • मुख्य बिंदु:
      • न्यायिक निरीक्षण: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि निर्वाचन आयोग के पास जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) के तहत “व्यापक विवेकाधिकार” हैं, लेकिन यह स्थापित मानदंडों से हटने के लिए “अनियंत्रित शक्ति” प्रदान नहीं करता है।
      • प्रक्रियात्मक पवित्रता: पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 से किसी भी प्रकार के विचलन के पीछे ऐसे कारण होने चाहिए जो “निष्पक्ष, पारदर्शी और रिकॉर्डेड” हों।
      • “तनाव और दबाव” का कारक: न्यायालय ने उन लाखों नागरिकों—जिनमें बुजुर्ग और दिव्यांग व्यक्ति भी शामिल हैं—को होने वाले “अत्यधिक तनाव” को रेखांकित किया, जिन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए भौतिक सुनवाइयों (Physical hearings) में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
      • मतदाता संरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा कोई भी पुनरीक्षण जो वास्तविक मतदाताओं को “नए” मतदाताओं (फॉर्म 6) के रूप में फिर से आवेदन करने के लिए मजबूर करता है, उनके मताधिकार का उल्लंघन है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • तार्किकता का सिद्धांत (Doctrine of Reasonableness): संपादकीय नोट करता है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस सिद्धांत को लागू किया है कि सभी प्रशासनिक विवेकाधिकारों का प्रयोग तर्कसंगत रूप से और सार्वजनिक हित में किया जाना चाहिए।
      • व्यवस्थागत बोझ (Systemic Burden): निर्वाचन आयोग के इस तर्क को खारिज कर दिया गया कि वह SIR के दौरान सामान्य प्रक्रियाओं से “मुक्त” (Unshackled) है; यह पुनः पुष्टि करता है कि “विवेकाधिकार के शासन” के ऊपर “कानून का शासन” (Rule of law) सर्वोपरि है।
      • बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने का प्रभाव: लगभग 6.5 करोड़ नामों को हटाए जाने के साथ, न्यायालय का हस्तक्षेप उन मतदाताओं के लिए “नागरिक मृत्यु” (Civil death) को रोकने का प्रयास करता है जो दशकों से मतदान कर रहे हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव)।

    • संदर्भ: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर “बातचीत” की मांग और डेनमार्क पर भारी टैरिफ का थोपा जाना।
    • मुख्य बिंदु:
      • आर्थिक दबाव (Economic Coercion): अमेरिका ने इस स्वायत्त क्षेत्र की बिक्री के लिए दबाव बनाने हेतु लेगो (LEGO) और दवाओं सहित डेनिश सामानों पर 25% टैरिफ लगा दिया है।
      • आर्कटिक रणनीति: यह मांग “रणनीतिक गहराई” (Strategic depth) और दुर्लभ मृदा तत्वों (REE) जैसे विशाल अप्रयुक्त खनिज संसाधनों तक पहुंच की आवश्यकता से प्रेरित है, जो हाई-टेक उद्योगों के लिए अनिवार्य हैं।
      • “बल प्रयोग नहीं” का दावा: ट्रम्प ने कहा कि वह सैन्य बल का उपयोग नहीं करेंगे, लेकिन उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ऐतिहासिक “असंतुलन” को ठीक करने के लिए “आर्थिक शक्ति” का उपयोग किया जाएगा।
      • यूरोपीय प्रतिक्रिया: डेनमार्क और यूरोपीय संघ ने इस मांग को “बेतुका” बताया है, जिससे नाटो (NATO) गठबंधन के भीतर एक राजनयिक गतिरोध पैदा हो गया है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • मोनरो सिद्धांत का पुनर्जन्म (Monroe Doctrine Reborn): इसे “डोनरो डॉक्ट्रिन” (Donroe Doctrine) के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है, जहाँ अमेरिका आर्कटिक सहित पूरे पश्चिमी गोलार्ध पर अपने विशेष प्रभाव का दावा करता है।
      • ग्रीनलैंडवासियों पर प्रभाव: ग्रीनलैंड के 57,000 निवासियों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने ‘आत्मनिर्णय के अधिकार’ (Right to self-determination) पर जोर दिया है।
      • वैश्विक व्यवस्था में बदलाव: संपादकीय सुझाव देता है कि यह नियमों पर आधारित व्यवस्था से “लेनदेन वाली व्यवस्था” (Transactional order) की ओर संक्रमण का प्रतीक है, जहाँ संप्रभुता को एक व्यापारिक संपत्ति (Tradeable asset) माना जा रहा है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; न्यायपालिका; मौलिक अधिकार)।

    • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट का राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को तीन महीने के भीतर पुलिस मीडिया ब्रीफिंग पर एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश।
    • मुख्य बिंदु:
      • निर्दोषता का अनुमान (Presumption of Innocence): न्यायालय ने कहा कि पुलिस द्वारा समय से पहले की गई मीडिया ब्रीफिंग अक्सर “मीडिया ट्रायल” का कारण बनती है, जो अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन करती है।
      • निजता और गरिमा: अभियुक्तों की सार्वजनिक परेड करना या जांच के संवेदनशील विवरणों का खुलासा करना अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
      • बलों का संवेदीकरण: नीति में पुलिस अधिकारियों के लिए यह प्रशिक्षण शामिल होना चाहिए कि जांच या पीड़ित के अधिकारों से समझौता किए बिना कौन सी जानकारी साझा की जा सकती है।
      • पीड़ित संरक्षण: यौन अपराधों और नाबालिगों से जुड़े मामलों में पीड़ितों की पहचान की रक्षा करने पर विशेष जोर दिया गया है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • “ब्रेकिंग न्यूज़” का नियमन: संपादकीय का तर्क है कि मीडिया में “पुलिस की वाहवाही” (Police glory) की तलाश अक्सर न्याय की विफलता (Miscarriage of justice) का कारण बनती है।
      • संतुलित प्रकटीकरण (Balanced Disclosure): प्रस्तावित नीति का उद्देश्य “जनता के जानने के अधिकार” और “अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार” के बीच संतुलन बनाना है।
      • जवाबदेही: राज्य के पुलिस महानिदेशकों (DGP) को किसी भी अनधिकृत लीक या ब्रीफिंग के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा जो न्यायिक कार्यवाही को खतरे में डालते हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन)।

    • संदर्भ: ‘नेचर’ (Nature) पत्रिका के एक हालिया अध्ययन में अत्यधिक भूजल दोहन और शहरीकरण के कारण भारतीय डेल्टाओं को उच्च जोखिम में बताया गया है।
    • मुख्य बिंदु:
      • धंसने की दर (Subsidence Rates): मानवीय हस्तक्षेपों ने डेल्टाओं के धंसने की प्रक्रिया को तेज़ कर दिया है, जिससे एक क्रमिक भूगर्भीय प्रक्रिया एक तत्काल संकट में बदल गई है।
      • संवेदनशील क्षेत्र: गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी डेल्टा विशेष रूप से भूजल की कमी से प्रभावित हैं, जबकि ब्राह्मणी डेल्टा तीव्र शहरीकरण का सामना कर रहा है।
      • “तैयारी रहित गोताखोर” (The Unprepared Diver): गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा “अप्रत्यक्ष खतरे” से “तैयारी रहित गोताखोर” की स्थिति में आ गया है, जिसका अर्थ है कि जोखिम बढ़ गए हैं जबकि संस्थागत क्षमता स्थिर है।
      • बंदरगाहों पर प्रभाव: डूबते डेल्टा परिवहन नेटवर्क और बंदरगाहों सहित महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे के लिए खतरा पैदा करते हैं, जो भारत के व्यापार के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • संस्थागत पिछड़ापन (Institutional Lag): अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि इन क्षेत्रों में उच्च जनसंख्या घनत्व के बावजूद, नीतिगत प्रतिक्रियाएं सक्रिय (Proactive) होने के बजाय केवल प्रतिक्रियात्मक (Reactive) बनी हुई हैं।
      • समेकन और विवर्तनिकी (Compaction and Tectonics): हालांकि प्राकृतिक जमाव होता है, लेकिन पानी और हाइड्रोकार्बन निकालने से वह “पोर प्रेशर” (Pore pressure) खत्म हो जाता है जो जमीन को सहारा देता है, जिससे जमीन तेजी से धंसती है।
      • खाद्य सुरक्षा: जैसे-जैसे डेल्टा डूबते हैं, खारे पानी का प्रवेश कृषि भूमि को बर्बाद कर देता है, जिससे पलायन और संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; FDI नीति)।

    • संदर्भ: भारत द्वारा चीनी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) पर कुछ प्रतिबंधों को हटाने पर विचार और इसके संभावित आर्थिक परिणाम।
    • मुख्य बिंदु:
      • गलवान के बाद की नीति: 2020 से, ‘प्रेस नोट 3’ के तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले FDI के लिए सरकारी मंजूरी अनिवार्य कर दी गई है।
      • विनिर्माण अंतराल: “चीन प्लस वन” रणनीति के बावजूद, भारतीय निर्माता अभी भी चीनी पुर्जों पर बहुत अधिक निर्भर हैं, जिससे स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए निवेश मानदंडों में ढील देने की मांग उठी है।
      • चीनी अनिच्छा: विश्लेषण में सवाल उठाया गया है कि क्या चीन “विश्वास की कमी” और भारत में चीनी टेक फर्मों पर हालिया टैक्स छापों को देखते हुए निवेश करना चाहेगा।
      • व्यापार असंतुलन: चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा एक संरचनात्मक चिंता बना हुआ है, और FDI को व्यापार को स्थानीय उत्पादन में बदलने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • सुरक्षा बनाम विकास: संपादकीय राष्ट्रीय सुरक्षा (महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी प्रभाव से बचने) और इलेक्ट्रॉनिक्स व ईवी (EV) क्षेत्रों में पूंजी और तकनीक की आवश्यकता के बीच के तनाव का विश्लेषण करता है।
      • रणनीतिक लाभ: FDI में ढील देकर, भारत उन वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में एकीकृत होना चाहता है जो वर्तमान में चीनी फर्मों के प्रभुत्व में हैं।
      • पारस्परिकता (Reciprocity): मानदंडों में कोई भी ढील पूरी तरह से नीति पलटने के बजाय संतुलित और क्षेत्र-विशिष्ट (Sectoral) होने की संभावना है।

    संपादकीय विश्लेषण

    22 जनवरी, 2026
    GS-2 राजव्यवस्था
    ⚖️ मतदाता सूची (SIR): अनियंत्रित शक्ति पर रोक
    सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया कि चुनाव आयोग का “व्यापक विवेक” अनियंत्रित शक्ति नहीं है। मुख्य सुरक्षा कवच: 1960 के नियमों से कोई भी विचलन निष्पक्ष और पारदर्शी होना चाहिए। वास्तविक मतदाताओं को फॉर्म 6 के माध्यम से फिर से आवेदन करने के लिए मजबूर करना मताधिकार का उल्लंघन है।
    GS-2 अंत. संबंध
    🌎 ग्रीनलैंड और ‘लेन-देन’ वाली कूटनीति
    अमेरिका ने ग्रीनलैंड के लिए बातचीत हेतु डेनमार्क पर 25% टैरिफ लगाया। सामरिक लक्ष्य: दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earths) और आर्कटिक की गहराई तक पहुँच। परिणाम: नियम-आधारित व्यवस्था से हटकर अब संप्रभुता को एक ‘व्यापारिक वस्तु’ के रूप में देखा जा रहा है।
    GS-2 शासन
    🚔 पुलिस ब्रीफिंग: मीडिया ट्रायल का अंत
    SC ने राज्यों को 3 महीने के भीतर मीडिया ब्रीफिंग पर नीति बनाने का निर्देश दिया। फोकस: निर्दोषता की उपधारणा और अनुच्छेद 21 की रक्षा। जांच विवरणों का समय से पूर्व खुलासा अभियुक्त के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना गया है।
    GS-3 पर्यावरण
    🌊 डूबते डेल्टा: भूजल दोहन का संकट
    ‘नेचर’ (Nature) अध्ययन ने भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण गंगा-ब्रह्मपुत्र और कावेरी को उच्च जोखिम में पाया। खतरा: जमीन का तेजी से धंसाव (Subsidence), जिससे लवणीय जल का प्रवेश बढ़ेगा और कृषि भूमि व बंदरगाह बुनियादी ढांचे का नुकसान होगा।
    GS-3 अर्थव्यवस्था
    🇨🇳 चीनी निवेश (FDI) प्रतिबंधों का पुनर्मूल्यांकन
    भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और ईवी क्षेत्र में विनिर्माण अंतराल को पाटने के लिए ‘प्रेस नोट 3’ में ढील देने पर विचार कर रहा है। रणनीतिक दुविधा: राष्ट्रीय सुरक्षा और पूंजी की आवश्यकता के बीच संतुलन। मुद्दा: ‘चीन प्लस वन’ के बावजूद संरचनात्मक व्यापार घाटा ऊँचा बना हुआ है।

    यहाँ भारत की प्रमुख घाटियों (Valleys) और कैन्यन (Canyons) का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए घाटियाँ एक महत्वपूर्ण विषय हैं क्योंकि ये भौतिक भूगोल, जलवायु और मानव बस्तियों के पैटर्न को जोड़ती हैं।

    ये घाटियाँ विवर्तनिक गतिविधियों (Tectonic activity) और हिमनद अपरदन (Glacial erosion) द्वारा बनी हैं। ये अक्सर कृषि और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र होती हैं।

    • कश्मीर घाटी (जम्मू-कश्मीर): यह वृहद हिमालय और पीर पंजाल श्रेणी के बीच स्थित है। यह अपनी ‘करेवा’ (Karewa) मिट्टी की संरचनाओं के लिए प्रसिद्ध है, जो केसर (Saffron) की खेती के लिए अनिवार्य हैं।
    • कुल्लू घाटी (हिमाचल प्रदेश): इसे “देवताओं की घाटी” के रूप में जाना जाता है। यह पीर पंजाल और धौलाधार श्रेणियों के बीच स्थित है।
    • स्पीति घाटी (हिमाचल प्रदेश): यह एक उच्च-ऊँचाई वाली शीत मरुस्थल घाटी है। यह बौद्ध संस्कृति और ट्रेकिंग के लिए एक प्रमुख केंद्र है।
    • दून घाटी (उत्तराखंड): यह लघु हिमालय और शिवालिक के बीच स्थित एक अनुदैर्ध्य (Longitudinal) घाटी है। प्रसिद्ध शहर देहरादून यहीं स्थित है।
    • युमथांग घाटी (सिक्किम): इसे अक्सर “पूर्व की फूलों की घाटी” कहा जाता है। यह तिब्बती सीमा के पास बहुत अधिक ऊँचाई पर स्थित है।

    ये घाटियाँ आमतौर पर हिमालयी घाटियों से पुरानी हैं और यहाँ अक्सर घने उष्णकटिबंधीय वन या विशिष्ट नदी अपरदन देखा जाता है।

    घाटी का नामराज्यमहत्व
    शांत घाटी (Silent Valley)केरलनीलगिरी पहाड़ियों में स्थित; अपनी दुर्लभ जैव विविधता और उष्णकटिबंधीय सदाबहार वनों के लिए प्रसिद्ध।
    अराकू घाटी (Araku Valley)आंध्र प्रदेशपूर्वी घाट में स्थित; अपनी कॉफी के बागानों और जनजातीय संस्कृति के लिए जानी जाती है।
    कंबम घाटी (Kambam Valley)तमिलनाडुथेनी पहाड़ियों और पश्चिमी घाट के बीच स्थित एक उपजाऊ घाटी।
    जुकोऊ घाटी (Dzukou Valley)नागालैंड/मणिपुरअपनी मौसमी फूलों और विशिष्ट बाँस की प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध।
    • स्थान: आंध्र प्रदेश (कडपा जिला)।
    • निर्माण: यह पेन्नार नदी द्वारा एरामला पहाड़ियों को काटकर बनाया गया है।
    • मैपिंग पॉइंट: भौतिक मानचित्र पर इसे दक्कन के पठार के पूर्वी भाग में चिह्नित करें। यह प्रायद्वीपीय क्षेत्र में एक गहरे ‘गॉर्ज’ या ‘कैन्यन’ का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।
    • सिंधु गॉर्ज (Indus Gorge): गिलगित के पास जहाँ सिंधु नदी हिमालय को काटती है; यह दुनिया के सबसे गहरे गॉर्ज में से एक है।
    • ब्रह्मपुत्र (दिहांग) गॉर्ज: वह स्थान जहाँ ब्रह्मपुत्र नदी पूर्वी हिमालय को काटकर भारत में प्रवेश करती है।
    • सतलुज गॉर्ज: शिपकी ला दर्रे के पास स्थित, जहाँ सतलुज नदी तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है।
    विशेषता का प्रकारमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
    केसर का केंद्रकश्मीर घाटीपीर पंजाल और हिमाद्रि के बीच
    अनुदैर्ध्य घाटीदेहरादून (दून)शिवालिक और हिमाचल (लघु हिमालय) के बीच
    जैव विविधता हॉटस्पॉटशांत घाटी (Silent Valley)पलक्कड़, केरल
    प्रायद्वीपीय कैन्यनगंडिकोटापेन्नार नदी, आंध्र प्रदेश

    घाटियों को याद रखने के लिए उन्हें उन दो पर्वत श्रेणियों के साथ जोड़कर देखें जिनके बीच वे स्थित हैं। उदाहरण के लिए, कुल्लू घाटी धौलाधार और पीर पंजाल के बीच है। मानचित्र पर इन पर्वत श्रेणियों को पहले चिह्नित करना घाटी की स्थिति को सटीक बनाता है।

    घाटी प्रणालियाँ (Valley Systems)

    उत्तरी पर्वत श्रेणियाँ
    🏔️ हिमालयी वलित घाटियाँ
    विवर्तनिक और हिमनद चमत्कार जैसे कश्मीर घाटी (केसर के लिए प्रसिद्ध ‘करेवा’ मिट्टी के लिए विख्यात) और शिवालिक व लघु हिमालय के बीच स्थित लंबवत देहरादून जैसी ‘दून’ घाटियाँ।
    अभ्यास: हिमाचल प्रदेश में स्पीति घाटी को खोजें और इसे उच्च तुंगता वाले शीत मरुस्थल के रूप में पहचानें।
    प्रायद्वीपीय दक्षिण
    🌲 उष्णकटिबंधीय और पठारी घाटियाँ
    प्राचीन प्रणालियाँ जैसे शांत घाटी (Silent Valley), जो नीलगिरी का जैव विविधता हॉटस्पॉट है, और पूर्वी घाट में स्थित अराकू घाटी, जो अपनी जनजातीय संस्कृति और कॉफी के लिए जानी जाती है।
    अभ्यास: आंध्र प्रदेश में अराकू घाटी को खोजें और पूर्वी घाट के सापेक्ष इसकी स्थिति को नोट करें।
    गार्ज एवं कैनियन
    🏜️ भारत का ‘ग्रैंड कैनियन’
    एर्रामला पहाड़ियों के बीच पेन्नार नदी द्वारा निर्मित गंडिकोटा कैनियन दक्कन के पठार में नदी अपरदन (Riverine Erosion) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
    अभ्यास: पेन्नार नदी के मार्ग को ट्रेस करते हुए आंध्र प्रदेश के कडप्पा जिले में गंडिकोटा को लोकेट करें।
    मैपिंग चेकलिस्ट
    प्रकार मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
    केसर का केंद्रकश्मीर घाटीपीर पंजाल और हिमाद्रि के बीच
    लंबवत घाटीदेहरादून (दून)शिवालिक और हिमाचल के बीच
    जैव विविधता हॉटस्पॉटशांत घाटी (Silent Valley)पालक्कड़, केरल
    प्रायद्वीपीय कैनियनगंडिकोटापेन्नार नदी, आंध्र प्रदेश

    Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 22, 2026

    Dainik CSAT Quiz (22 January 2026)
    दैनिक CSAT क्विज़

    दैनिक CSAT क्विज़

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      Dainik GS Quiz in Hindi – January 22, 2026

      Dainik GS Quiz (22 January 2026)
      दैनिक GS क्विज़

      दैनिक GS क्विज़

      8:00

      लोड हो रहा है…

        IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 21 जनवरी 2026 (Hindi)

        यह अध्याय “नगर, व्यापारी और शिल्पीजन” मध्यकालीन भारत के विभिन्न प्रकार के शहरों, व्यापार के जीवंत नेटवर्क और शिल्प उत्पादन के केंद्रों की व्याख्या करता है।

        मध्यकालीन नगर अक्सर एक साथ कई कार्य करते थे, जैसे वे प्रशासनिक, धार्मिक और आर्थिक केंद्र हो सकते थे।

        • प्रशासनिक केंद्र: तंजावुर जैसे नगर, जो चोलों की राजधानी थी, शासन के मुख्य केंद्र थे। यहाँ राजा आदेश जारी करते थे और अधिकारी राज्य का प्रबंधन करते थे।
        • मंदिर नगर: ये तीर्थयात्रा और धार्मिक गतिविधियों के केंद्र थे। उदाहरण के लिए—तंजावुर (राजराजेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध) और मदुरै।
        • वाणिज्यिक नगर और बंदरगाह: ये व्यापार और वाणिज्य पर केंद्रित थे। सूरत, हम्पी और मसूलीपट्टनम इसके प्रमुख उदाहरण थे।

        मंदिर मध्यकालीन अर्थव्यवस्था और समाज के केंद्र में थे।

        • आर्थिक केंद्र: शासक अपनी भक्ति प्रदर्शित करने के लिए मंदिर बनवाते थे और उन्हें भूमि तथा धन दान करते थे। इससे प्राप्त धन का उपयोग भव्य अनुष्ठानों और व्यापार में किया जाता था।
        • शहरीकरण: मंदिरों की जरूरतों को पूरा करने के लिए पुजारी, कामगार और व्यापारी मंदिरों के पास बस गए, जिससे ‘मंदिर नगरों’ का विकास हुआ।
        • तीर्थ केंद्र: उत्तर प्रदेश में वृंदावन और तमिलनाडु में तिरुवनमलाई जैसे स्थान भी धीरे-धीरे व्यस्त नगरों के रूप में विकसित हुए।

        आठवीं शताब्दी से उपमहाद्वीप में कई छोटे नगरों का उदय हुआ, जो संभवतः बड़े गाँवों से निकले थे।

        • मंडपिका: ये वे बाज़ार थे (जिन्हें बाद में ‘मंडी’ कहा गया) जहाँ आस-पास के गाँव के लोग अपनी उपज बेचने लाते थे।
        • हट्ट: ये बाज़ार की गलियाँ थीं (जिन्हें बाद में ‘हाट’ कहा गया) जहाँ दुकानों की कतारें होती थीं।
        • शिल्पियों के मोहल्ले: कुम्हारों, तेल निकालने वालों और लोहारों जैसे विभिन्न शिल्पकारों के लिए अलग-अलग गलियाँ निर्धारित थीं।

        व्यापार विभिन्न समूहों द्वारा किया जाता था, जिनमें स्थानीय फेरीवालों से लेकर शक्तिशाली व्यापारी संघ (Guilds) शामिल थे।

        • काफिले और संघ: अपने हितों की रक्षा के लिए व्यापारी काफिलों में यात्रा करते थे और संघ (गिलड्स) बनाते थे। दक्षिण भारत में ‘मणिग्रामम्’ और ‘नानादेशी’ सबसे प्रसिद्ध व्यापारिक संघ थे।
        • वैश्विक संपर्क: चेट्टियार और मारवाड़ी ओसवाल जैसे व्यापारियों ने लाल सागर, फारस की खाड़ी, पूर्वी अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ व्यापक व्यापार किया।
        • प्रमुख वस्तुएं: भारत मसालों, सूती कपड़ों और नील का निर्यात करता था, जबकि सोने, हाथीदांत और घोड़ों का आयात किया जाता था।

        मध्यकालीन नगर विशिष्ट शिल्प उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थे।

        • बिदरी: बीदर के शिल्पकार तांबे और चाँदी में जड़ाई के काम के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि इस शिल्प का नाम ही ‘बिदरी’ पड़ गया।
        • विश्वकर्मा समुदाय: इसमें सुनार, कशेरे (लोहार), बढ़ई और राजमिस्त्री शामिल थे। ये मंदिरों और महलों के निर्माण के लिए अनिवार्य थे।
        • वस्त्र उत्पादन: सालियार या कैक्कोलार जैसे बुनकर समुदाय समृद्ध हो गए और उन्होंने मंदिरों को भारी दान दिया। कपास को साफ करना, कातना और रंगना भी स्वतंत्र शिल्प बन गए थे।
        • हम्पी: कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों की घाटी में स्थित यह विजयनगर साम्राज्य का केंद्र था। यह अपनी विशिष्ट किलेबंदी और भव्य वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था। 1565 में दक्कनी सुल्तानों द्वारा विजयनगर की हार के बाद इसका पतन हो गया।
        • सूरत: इसे “पश्चिम का प्रवेश द्वार” कहा जाता था क्योंकि यहाँ से मक्का के लिए जहाज रवाना होते थे। यह जरी के काम (गोल्ड लेस) वाले वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध था।
        • मसूलीपट्टनम (मछलीपट्टनम): कृष्णा नदी के डेल्टा पर स्थित यह नगर 17वीं शताब्दी में डच, ब्रिटिश और फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों के बीच व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया।

        16वीं और 17वीं शताब्दी में यूरोपीय कंपनियों के आगमन ने व्यापार का परिदृश्य बदल दिया।

        • बंदरगाहों की ओर झुकाव: व्यापार बंबई (मुंबई), कलकत्ता (कोलकाता) और मद्रास (चेन्नई) जैसे यूरोपीय शहरों की ओर स्थानांतरित हो गया।
        • ब्लैक टाउंस: यूरोपीय लोगों ने इन शहरों में किलेबंदी की और भारतीय व्यापारियों व शिल्पकारों को ‘ब्लैक टाउंस’ (भारतीयों के लिए सुरक्षित क्षेत्र) में रहने के लिए मजबूर किया।
        • स्वतंत्रता की हानि: भारतीय बुनकर अब यूरोपीय एजेंटों से पेशगी (Advances) लेकर काम करने लगे, जिससे उनकी अपनी पसंद के डिजाइन बनाने की रचनात्मक स्वतंत्रता खत्म हो गई।
        1. मंडपिका: मंडी।
        2. हट्ट: हाट (बाजार)।
        3. गिल्ड (Guild): व्यापारियों का संघ।
        4. बिदरी: चांदी की जड़ाई वाला शिल्प।
        5. एम्पोरियम (Emporium): एक ऐसा स्थान जहाँ विभिन्न प्रकार की वस्तुएं खरीदी और बेची जाती हैं।

        🏺 नगर, व्यापारी और शिल्पीजन

        🏙️ शहरी केंद्र
        मध्यकालीन नगर बहुआयामी थे: प्रशासनिक (तंजावुर), मंदिर नगर (मदुरै) या पत्तन (सूरत)। मंदिर नगरों ने शहरीकरण को गति दी क्योंकि तीर्थयात्रियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए कारीगर और व्यापारी वहां बस गए।
        🤝 बाज़ार और संघ
        गाँव वाले अपना सामान मण्डपिका (मंडी) में बेचते थे और हट्ट (हाट) में खरीदारी करते थे। बड़े व्यापारियों ने दूर-दराज के व्यापार के लिए मणिग्रामम और नानादेशी जैसे शक्तिशाली ‘गिल्ड’ (संघ) बनाए।
        ⚒️ विशिष्ट हस्तशिल्प
        बीदर के शिल्पकारों की चांदी की जड़ाई इतनी प्रसिद्ध थी कि इसे बीदरी कहा जाने लगा। विश्वकर्मा समुदाय मंदिरों का निर्माण करता था, जबकि सलियार जैसे बुनकर संपन्न और प्रभावशाली दानदाता बन गए।
        ⚓ ऐतिहासिक पत्तन
        हम्पी विजयनगर का वास्तुशिल्प गौरव था। सूरत ज़री के कपड़ों के लिए प्रसिद्ध “पश्चिम का द्वार” था। मसूलीपट्टनम कृष्णा डेल्टा पर स्थित एक महत्वपूर्ण और विवादित बंदरगाह था।
        यूरोपीय प्रभाव 17वीं सदी में व्यापार यूरोपीय कंपनियों के नियंत्रण वाले ‘ब्लैक टाउन्स’ (बंबई, मद्रास, कलकत्ता) की ओर बढ़ गया, जहाँ भारतीय बुनकर अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता खो बैठे।
        📂

        कक्षा-7 इतिहास अध्याय-6 PDF

        सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नगर, व्यापारी और शिल्पीजन

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        राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (DPSP) के निष्कर्ष के तौर पर, अनुच्छेद 46 से 51 तक हाशिए पर पड़े समुदायों के उत्थान से लेकर पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक शांति की प्राप्ति तक, व्यापक जिम्मेदारियों को समाहित करते हैं। इन्हें अक्सर गांधीवादी, समाजवादी और उदार-बौद्धिक सिद्धांतों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

        उत्थान, पर्यावरण और वैश्विक शांति: अनुच्छेद 46–51
        ये अंतिम अनुच्छेद राष्ट्रीय समाज कल्याण से लेकर एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में भारत की भूमिका तक के बदलाव को दर्शाते हैं।

        यह अनुच्छेद “सामाजिक न्याय” और शोषण को रोकने के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश है।

        • शासनादेश: राज्य जनता के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को विशेष सावधानी के साथ बढ़ावा देगा।
        • संरक्षण: यह राज्य को इन समुदायों को सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचाने का निर्देश देता है।
        • कार्यान्वयन: यह लेख विभिन्न आरक्षण नीतियों और SC/ST छात्रों के लिए प्री-मैट्रिक/पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं का आधार है।

        यह अनुच्छेद सार्वजनिक स्वास्थ्य को सामाजिक नैतिकता से जोड़ता है।

        • शासनादेश: राज्य अपने लोगों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाने और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सुधार को अपने प्राथमिक कर्तव्यों में मानेगा।
        • निषेध (Prohibition): विशेष रूप से, राज्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं (औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर) के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का प्रयास करेगा।
        • कार्यान्वयन: बिहार और गुजरात जैसे राज्यों ने शराब बंदी को सही ठहराने के लिए इसी अनुच्छेद का सहारा लिया है। ‘पोषण अभियान’ जैसे राष्ट्रीय मिशन भी यहीं से प्रेरित हैं।
        • शासनादेश: राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा।
        • पशु संरक्षण: यह राज्य को नस्लों के संरक्षण और सुधार के लिए कदम उठाने और गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं के वध पर रोक लगाने का निर्देश देता है।
        • कार्यान्वयन: गोहत्या के संबंध में विभिन्न राज्यों के कानून और “हरित क्रांति” की शुरुआत इसी निर्देश के अनुरूप है।
        • उत्पत्ति: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया।
        • शासनादेश: राज्य पर्यावरण के संरक्षण और सुधार का तथा देश के वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।
        • कार्यान्वयन: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (1972) और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम (1986) इसी निर्देश को पूरा करने के लिए बनाए गए थे।
        • शासनादेश: संसद द्वारा राष्ट्रीय महत्व के घोषित किए गए प्रत्येक स्मारक, स्थान या कलात्मक या ऐतिहासिक रुचि की वस्तु को विरूपण, विनाश, हटाने या निर्यात से बचाना राज्य का दायित्व होगा।
        • कार्यान्वयन: इसका प्रबंधन मुख्य रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किया जाता है।
        • शासनादेश: राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए राज्य कदम उठाएगा।
        • उद्देश्य: न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करना और कार्यपालिका को कानूनी परिणामों को प्रभावित करने से रोकना।
        • कार्यान्वयन: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC), 1973 द्वारा इसे पूर्ण रूप से लागू किया गया।

        यह अनुच्छेद भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों को निर्धारित करता है। राज्य निम्नलिखित के लिए प्रयास करेगा:

        1. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना।
        2. राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानजनक संबंध बनाए रखना।
        3. अंतरराष्ट्रीय कानून और संधि दायित्वों के प्रति सम्मान बढ़ाना।
        4. अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता (Arbitration) द्वारा निपटाने के लिए प्रोत्साहित करना।
        अनुच्छेदश्रेणीमुख्य शब्दकार्यान्वयन का उदाहरण
        46समाजवादीSC/ST के हितआरक्षण / छात्रवृत्ति
        47गांधीवादीजन स्वास्थ्य और नशाबंदीमिड-डे मील / शराब बंदी
        48गांधीवादीवैज्ञानिक कृषिपशुपालन योजनाएं
        48Aउदारवादीपर्यावरण और वन्यजीववन संरक्षण अधिनियम
        49उदारवादीस्मारक संरक्षणASI द्वारा संरक्षण
        50उदारवादीशक्तियों का पृथक्करणस्वतंत्र न्यायपालिका
        51उदारवादीअंतरराष्ट्रीय शांति“पंचशील” / विदेश नीति

        🌍 उत्थान और वैश्विक शांति

        ✊ अनु. 46: SC, ST और कमजोर वर्ग
        राज्य समाज के कमजोर वर्गों, विशेष रूप से SC और ST के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देगा और उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाएगा।
        🍎 अनु. 47: स्वास्थ्य और निषेध
        लोगों के पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाना राज्य का कर्तव्य है। यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देता है (जैसे बिहार/गुजरात में शराबबंदी)।
        🐾 अनु. 48 और 48A: पर्यावरण
        48: कृषि का वैज्ञानिक संगठन और गोवध पर रोक48A: (42वां संशोधन) वनों, वन्यजीवों की रक्षा और पर्यावरण में सुधार करना।
        🏛️ अनु. 49 और 50: राजकीय ढांचा
        49: राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों और स्थानों का संरक्षण। 50: न्यायिक स्वतंत्रता के लिए राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करना।
        🕊️ अनु. 51: अंतर्राष्ट्रीय शांति
        भारत की विदेश नीति का संवैधानिक आधार। अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना, राष्ट्रों के बीच न्यायपूर्ण संबंध बनाए रखना और अंतर्राष्ट्रीय कानून के प्रति सम्मान बढ़ाना।
        अनुच्छेद श्रेणी मुख्य विषय कार्यान्वयन
        46समाजवादीSC/ST हितआरक्षण / छात्रवृत्ति
        47गांधीवादीसार्वजनिक स्वास्थ्यपोषण अभियान / शराबबंदी
        48Aउदारवादीपर्यावरणवन्यजीव संरक्षण अधिनियम
        50उदारवादीन्यायिक स्वतंत्रताCrPC (1973) द्वारा पृथक्करण
        51उदारवादीवैश्विक शांतिपंचशील / अंतर्राष्ट्रीय संधि
        विशेष तथ्य अनुच्छेद 51 अद्वितीय है क्योंकि यह राज्य को अपनी सीमाओं से परे देखने का निर्देश देता है, जो भारत को विश्व स्तर पर न्यायपूर्ण संबंधों के समर्थक के रूप में स्थापित करता है।

        यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (21 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।

        • संदर्भ: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया और इसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने का आलोचनात्मक विश्लेषण।
        • मुख्य बिंदु:
          • आक्रामक कटौती: तमिलनाडु जैसे राज्यों में कुछ बूथों पर इतनी आक्रामक तरीके से नाम हटाए गए हैं कि 2024 के वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से गायब हो गए हैं।
          • लिंग भेद: बिहार के आंकड़ों में पुरुषों की तुलना में महिला मतदाताओं के नाम असमान रूप से अधिक हटाए गए हैं, जो प्रक्रिया की खामियों को दर्शाता है।
          • आंकड़ों में विसंगति: उत्तर प्रदेश में, राज्य चुनाव आयोग द्वारा गिने गए केवल ग्रामीण मतदाताओं की संख्या, ECI द्वारा पूरे राज्य के लिए जारी किए गए ड्राफ्ट रोल की संख्या से अधिक है।
          • तर्कहीन पुन: पंजीकरण: ECI का यह कहना कि गलत तरीके से हटाए गए मतदाता “नए” (फॉर्म 6) के रूप में पंजीकरण करें, मूल गलतियों की जांच को रोकता है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “चुनावी अखंडता”, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” और “निर्वाचन आयोग की भूमिका”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • न्यायिक हस्तक्षेप: पश्चिम बंगाल और बिहार में लाखों लोगों को मिल रहे ‘वेरिफिकेशन नोटिस’ के तनाव को कम करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को नए दिशा-निर्देश जारी करने पड़े हैं।
          • सिस्टम की खराबी: शिकायतें मुख्य रूप से 2002 की ‘मैपिंग लिस्ट’ और एड-हॉक सॉफ्टवेयर की त्रुटियों से उत्पन्न हुई हैं, जिसने वास्तविक नागरिकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; द्विपक्षीय संबंध; भारत के हितों पर क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव)।

        • संदर्भ: संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (MbZ) की दिल्ली यात्रा और भारत-UAE रणनीतिक रक्षा साझेदारी की घोषणा।
        • मुख्य बिंदु:
          • रक्षा मील का पत्थर: दोनों देश एक “रणनीतिक रक्षा साझेदारी” के लिए रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे, जो अपनी तरह का पहला समझौता है।
          • आर्थिक समझौते: द्विपक्षीय व्यापार को $200 बिलियन तक दोगुना करने की प्रतिबद्धता, $3 बिलियन का LNG सौदा और गुजरात में भारी निवेश।
          • क्षेत्रीय तनाव: यह यात्रा खाड़ी में UAE और सऊदी अरब के बीच बढ़ते सत्ता संघर्ष (विशेष रूप से सूडान को लेकर) के बीच हुई है।
          • कनेक्टिविटी जोखिम: क्षेत्रीय अस्थिरता भारत की चाबहार पोर्ट और ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) जैसी योजनाओं को खतरे में डालती है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “ऊर्जा सुरक्षा”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • प्रवासी भारतीय: खाड़ी क्षेत्र में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता भारत की घरेलू प्राथमिकता बन जाती है।
          • संतुलन की कला: प्रस्तावित रक्षा समझौता अन्य क्षेत्रीय गठबंधनों के खिलाफ नहीं दिखना चाहिए, इसलिए भारत को बहुत सावधानी से संतुलन बनाना होगा।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।

        • संदर्भ: एम.के. नारायणन द्वारा ट्रम्प प्रशासन के तहत ‘मोनरो डॉक्ट्रिन’ (Monroe Doctrine) के पुनरुद्धार और इसके वैश्विक प्रभावों का विश्लेषण।
        • मुख्य बिंदु:
          • मादुरो ऑपरेशन: अमेरिकी सेना द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी को आधुनिक “मोनरो डॉक्ट्रिन” के रूप में देखा जा रहा है।
          • संप्रभुता का उल्लंघन: यह ऑपरेशन अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन करते हुए पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी वर्चस्व को फिर से स्थापित करने की रणनीति है।
          • वैश्विक जोखिम: विश्व स्तर पर विरोध की कमी यह संकेत देती है कि 1945 के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था दम तोड़ रही है, जिससे चीन या रूस जैसे देशों को भी ऐसी एकपक्षीय कार्रवाइयों के लिए बढ़ावा मिल सकता है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक सुरक्षा रुझान”, “भारत-अमेरिका संबंध” और “रणनीतिक स्थिरता”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • भारत पर प्रभाव: भारत एक दोराहे पर खड़ा है; अधिकांश मामलों में अमेरिका का साथ देने के बावजूद, उसे रूसी तेल आयात करने पर ट्रम्प की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
          • क्षेत्रीय अलगाव: भारत-अमेरिका संबंधों में बढ़ती “ठंडक” के कारण भारत पश्चिम एशिया जैसे संघर्ष क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अलग-थलग पड़ सकता है।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बुनियादी ढांचा; ऊर्जा संक्रमण; पर्यावरण)।

        • संदर्भ: इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) की ओर वैश्विक बदलाव तांबे की आपूर्ति में भारी कमी के कारण एक संरचनात्मक बाधा का सामना कर रहा है।
        • मुख्य बिंदु:
          • बढ़ती मांग: वैश्विक EV बिक्री 2015 में 5.5 लाख से बढ़कर 2025 में 2 करोड़ हो गई, जिससे तांबे की खपत 27.5 हजार टन से बढ़कर 12.8 करोड़ टन से अधिक हो गई है।
          • संसाधन घाटा: 2026 तक मांग 3 करोड़ टन तक पहुँचने का अनुमान है, जबकि आपूर्ति केवल 2.8 करोड़ टन रहने की संभावना है।
          • आपूर्ति बाधाएं: अयस्क की गिरती गुणवत्ता, पर्यावरण संबंधी विरोध और नई खदानों के विकास में लगने वाला लंबा समय (10-15 वर्ष) मुख्य कारण हैं।
          • चीन का दबदबा: चीन वैश्विक बैटरी सेल उत्पादन के 70% हिस्से को नियंत्रित करता है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “ऊर्जा संक्रमण रणनीति”, “महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा” और “औद्योगिक नीति”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • संरचनात्मक बाधा: इलेक्ट्रिक वाहनों को पारंपरिक वाहनों की तुलना में चार से पांच गुना अधिक तांबे की आवश्यकता होती है, और वर्तमान में इसका कोई व्यवहार्य विकल्प नहीं है।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े समूह और विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव)।

        • संदर्भ: अमेरिका के नेतृत्व वाली “पैक्स सिलिका” पहल का विश्लेषण, जिसका उद्देश्य वैश्विक सेमीकंडक्टर और AI आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करना है।
        • मुख्य बिंदु:
          • पहल का लक्ष्य: जबरन निर्भरता को कम करना और समान विचारधारा वाले देशों के बीच विश्वसनीय डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार करना।
          • भू-राजनीतिक प्रतिक्रिया: यह पहल दुर्लभ मृदा तत्वों (REEs) में चीन के प्रभुत्व और उसके द्वारा संसाधनों को राजनीतिक हथियार के रूप में उपयोग करने की प्रतिक्रिया है।
          • भारत का निमंत्रण: शुरुआती शिखर सम्मेलन में न बुलाए जाने के बाद, अब अमेरिका ने भारत को जल्द ही इसमें शामिल होने के लिए आमंत्रित करने की बात कही है।
          • भारत की ताकत: भारत के पास मजबूत डिजिटल बुनियादी ढांचा, तेजी से बढ़ता AI बाजार और इंजीनियरों का एक विशाल पूल है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “तकनीकी संप्रभुता”, “महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा” और “भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • दोहरी आपूर्ति श्रृंखला: भविष्य में दो प्रमुख आपूर्ति श्रृंखलाएं उभर सकती हैं—एक चीन के नेतृत्व में और दूसरी ‘पैक्स सिलिका’ के नेतृत्व में। देशों को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए सावधानी से चयन करना होगा।
          • घरेलू हितों की रक्षा: भारत को अपने उभरते सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए सब्सिडी और नियमों में विशेष छूट की आवश्यकता होगी, जो वाशिंगटन की वर्तमान नीतियों के साथ टकरा सकता है।

        संपादकीय विश्लेषण

        21 जनवरी, 2026
        GS-2 राजव्यवस्था
        ⚖️ चुनावी SIR: विलोपन का जाल
        विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में व्यापक विसंगतियां: बिहार में महिलाओं के नाम हटाने का अनुपात असंतुलित है, जबकि यूपी का ग्रामीण डेटा चुनाव आयोग के ड्राफ्ट रोल का विरोध करता है। आलोचना: गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के लिए फॉर्म 6 (नया पंजीकरण) पर जोर देना त्रुटियों के ऑडिट को रोकता है।
        GS-2 अंत. संबंध
        🛡️ भारत-यूएई: रणनीतिक रक्षा मील का पत्थर
        रणनीतिक रक्षा साझेदारी के ढांचे की घोषणा—खाड़ी क्षेत्र में भारत के लिए पहली ऐसी पहल। आर्थिक लक्ष्य: द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर $200 बिलियन तक पहुँचाना। चुनौती: ऊर्जा हितों और 1 करोड़ प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए सऊदी-यूएई मतभेदों के बीच संतुलन बनाना।
        GS-2 अंत. संबंध
        🌎 “डोनरो” (Donroe) सिद्धांत और संप्रभुता
        वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो की हिरासत मुनरो सिद्धांत (Monroe Doctrine) के पुनरुत्थान का संकेत है। प्रभाव: 1945 के बाद की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए खतरा। भारत के लिए परिणाम: संघर्ष क्षेत्रों में सापेक्ष रणनीतिक अलगाव और रूसी तेल आयात को लेकर अमेरिकी दबाव में वृद्धि।
        GS-3 अर्थव्यवस्था
        🔋 ईवी तांबा संकट (Copper Crunch)
        इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) को पारंपरिक वाहनों की तुलना में 4-5 गुना अधिक तांबे की आवश्यकता होती है। कमी: 30 मिलियन टन मांग के मुकाबले आपूर्ति केवल 28 मिलियन टन रहने का अनुमान। दबदबा: चीन वैश्विक बैटरी सेल उत्पादन के 70% को नियंत्रित करता है, जिससे वह हरित संक्रमण पर नियंत्रण रखता है।
        GS-2 अंत. संबंध
        💻 पैक्स सिलिका: हाई-टेक संप्रभुता
        सेमीकंडक्टर और एआई आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए अमेरिकी नेतृत्व वाली पहल। चीन के दुर्लभ मृदा तत्वों (REE) पर वर्चस्व का जवाब। अवसर: भारत के इंजीनियरों का विशाल पूल और बदलते वीजा नियमों के कारण घर लौट रहे विशेषज्ञ भारत को विश्वसनीय डिजिटल हब के रूप में स्थापित कर सकते हैं।
        त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):फॉर्म 6: मतदाता सूची में नए पंजीकरण के लिए उपयोग किया जाता है। • पैक्स सिलिका (Pax Silica): रणनीतिक हाई-टेक रिस्क-कम करने वाला क्लब। • मुनरो सिद्धांत: 1823 की अमेरिकी नीति जो अमेरिका में यूरोपीय उपनिवेशवाद का विरोध करती थी।

        यहाँ रणनीतिक हिमनदों (Glaciers)ऊँची चोटियों और हिमनद झीलों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है, जो उत्तर भारत के पर्यावरणीय और सुरक्षा मानचित्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं:

        हिमनद भारत के “जल मीनार” (Water Towers) हैं, जो सदानीरा (बारहमासी) नदी प्रणालियों को पोषित करते हैं। मानचित्र पर ये मुख्य रूप से ट्रांस-हिमालयी और वृहद हिमालयी क्षेत्रों में केंद्रित हैं।

        • सियाचिन हिमनद (कराकोरम श्रेणी): भारत का सबसे लंबा हिमनद (लगभग 76 किमी)। यह नुब्रा नदी का स्रोत है।
        • गंगोत्री हिमनद (उत्तराखंड): हिमालय के सबसे बड़े हिमनदों में से एक; गंगा (भागीरथी) का प्राथमिक स्रोत।
        • यमुनोत्री हिमनद (उत्तराखंड): बंदरपूंछ चोटी पर स्थित; यमुना नदी का स्रोत।
        • जेमू हिमनद (सिक्किम): पूर्वी हिमालय का सबसे बड़ा हिमनद, जो कंचनजंगा के आधार पर स्थित है; यह तीस्ता नदी को जल प्रदान करता है।
        • बियाफो और बाल्टोरो हिमनद: कराकोरम क्षेत्र में स्थित; सिंधु नदी प्रणाली के जल स्तर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण।

        सटीक मानचित्रण के लिए यह समझना आवश्यक है कि ये चोटियाँ किस पर्वत श्रेणी का हिस्सा हैं।

        चोटीऊँचाई (लगभग)श्रेणी/क्षेत्रमहत्व
        K2 (गॉडविन-ऑस्टिन)8,611 मीटरकराकोरम (लद्दाख)भारत की सबसे ऊँची चोटी (और दुनिया की दूसरी)।
        कंचनजंगा8,586 मीटरपूर्वी हिमालय (सिक्किम)भारत में स्थित हिमालय की सबसे ऊँची चोटी।
        नंदा देवी7,816 मीटरगढ़वाल हिमालय (UK)पूरी तरह से भारत के भीतर स्थित सबसे ऊँची चोटी।
        नामचा बरवा7,782 मीटरपूर्वी हिमालयवह स्थान जहाँ से ब्रह्मपुत्र भारत में “यू-टर्न” लेती है।
        अनाइमुडी2,695 मीटरपश्चिमी घाट (केरल)प्रायद्वीपीय भारत की सबसे ऊँची चोटी।

        ये झीलें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील हैं और अक्सर रणनीतिक सीमा चिह्नों के रूप में कार्य करती हैं।

        • पैंगोंग त्सो (लद्दाख): एक उच्च-ऊँचाई वाली अंतःस्थलीय (Endorheic) झील, जो अपने रंग बदलते पानी के लिए प्रसिद्ध है; यह वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) द्वारा विभाजित है।
        • त्सो मोरीरी (लद्दाख): ताजे पानी की एक बड़ी उच्च-ऊँचाई वाली झील और एक घोषित रामसर स्थल
        • गुरुडोंगमार झील (सिक्किम): दुनिया की सबसे ऊँची झीलों में से एक; बौद्धों, सिखों और हिंदुओं के लिए पवित्र।
        • रूपकुंड (उत्तराखंड): इसे “कंकाल झील” के रूप में जाना जाता है, जो त्रिशूल पर्वत समूह की गोद में स्थित है।
        • चोलामू झील (सिक्किम): इसे अक्सर भारत की सबसे ऊँची झील माना जाता है, जो तिब्बती सीमा के पास स्थित है।
        विशेषतामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
        सबसे लंबा हिमनदसियाचिननुब्रा घाटी, लद्दाख
        तीस्ता का स्रोतजेमू हिमनदउत्तरी सिक्किम
        दक्षिण भारत की सर्वोच्च चोटीअनाइमुडीइराविकुलम, केरल
        रणनीतिक जल निकायपैंगोंग त्सोपूर्वी लद्दाख

        मानचित्र पर सियाचिन की स्थिति को ‘NJ9842’ बिंदु के उत्तर में देखें। झीलों को याद रखने के लिए उन्हें उनके संबंधित राज्यों (जैसे ‘त्सो’ शब्द वाली झीलें अक्सर लद्दाख/तिब्बत क्षेत्र में होती हैं) के साथ जोड़ें।

        हिमशिखरों की दुनिया

        हिमंडल (Cryosphere)
        ❄️ रणनीतिक हिमनद
        भारत के “जल मीनारों” में सियाचिन (76 किमी, नुब्रा का स्रोत) और गंगोत्री (भागीरथी का स्रोत) प्रमुख हैं। पूर्व में, कंचनजंगा के आधार पर स्थित जेमू हिमनद तीस्ता नदी को जल प्रदान करता है।
        अभ्यास: काराकोरम श्रेणी में सियाचिन हिमनद को खोजें और उसके नीचे स्थित रणनीतिक नुब्रा घाटी की पहचान करें।
        स्थलाकृति
        🏔️ उच्च तुंगता शिखर
        काराकोरम के विशालकाय K2 से लेकर पूर्णतः भारतीय क्षेत्र में स्थित नंदा देवी तक। नामचा बरवा जैसे रणनीतिक शिखर उस स्थान को चिह्नित करते हैं जहाँ से ब्रह्मपुत्र एक विशाल मोड़ लेकर भारत में प्रवेश करती है।
        शिखर ऊँचाई श्रेणी/क्षेत्र विशेष महत्व
        K28,611 मी.काराकोरम (लद्दाख)भारत का सर्वोच्च बिंदु
        कंचनजंगा8,586 मी.पूर्वी हिमालयभारत में स्थित सबसे ऊँचा हिमालयी शिखर
        नंदा देवी7,816 मी.गढ़वाल (उत्तराखंड)पूरी तरह से भारतीय सीमा के भीतर स्थित
        अनाइमुडी2,695 मी.पश्चिमी घाट (केरल)प्रायद्वीपीय भारत का सर्वोच्च शिखर
        झील विज्ञान
        💧 प्रहरी झीलें
        पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पैंगोंग त्सो (वास्तविक नियंत्रण रेखा द्वारा विभाजित) और गुरुडोंगमार (सिक्किम) जैसी झीलें उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सीमा प्रहरी और जैविक सूचक का कार्य करती हैं।
        अभ्यास: पूर्वी लद्दाख में पैंगोंग त्सो के पानी से होकर गुजरने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) को मानचित्र पर ट्रेस करें।
        मैपिंग सारांश चेकलिस्ट
        विशेषता मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
        सबसे लंबा हिमनदसियाचिन हिमनदनुब्रा घाटी, लद्दाख
        तीस्ता का स्रोतजेमू हिमनदउत्तरी सिक्किम
        दक्षिण का सर्वोच्चअनाइमुडीअनामलाई पहाड़ियाँ, केरल
        रणनीतिक जल निकायपैंगोंग त्सोपूर्वी लद्दाख (सीमा क्षेत्र)

        IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 20 जनवरी 2026 (Hindi)

        यह अध्याय “शासक और इमारतें” आठवीं और अठारहवीं शताब्दी के बीच की वास्तुकला संबंधी उपलब्धियों की व्याख्या करता है और बताता है कि कैसे राजाओं ने निर्माण के माध्यम से अपनी शक्ति, भक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव को प्रदर्शित किया।

        इस अवधि के दौरान, राजाओं और उनके अधिकारियों ने दो प्रकार की संरचनाओं का निर्माण किया:

        • किले, महल और मकबरे: ये सुरक्षित, संरक्षित और इस दुनिया तथा अगली दुनिया में शासकों के आराम के लिए भव्य स्थान थे।
        • सार्वजनिक गतिविधियाँ: इनमें मंदिर, मस्जिद, हौज (तलाब), कुएँ, सराय और बाज़ार शामिल थे। राजाओं ने अपनी प्रजा के आराम और उपयोग के लिए इनका निर्माण किया ताकि वे जनता की प्रशंसा और स्नेह प्राप्त कर सकें।

        इन इमारतों के निर्माण में लगने वाली सटीकता (जैसे कुतुब मीनार की घुमावदार सतह पर अभिलेख लिखना) शिल्पकारों के उच्च स्तर के कौशल को दर्शाती है।

        • अनुप्रस्थ टोडा निर्माण (Trabeate Principle): आठवीं और तेरहवीं शताब्दी के बीच, वास्तुकारों ने इस शैली का उपयोग किया, जहाँ दो खड़े खंभों के ऊपर एक क्षैतिज शहतीर (Horizontal beam) रखकर छत, दरवाजे और खिड़कियाँ बनाई जाती थीं।
        • चापाकार शैली (Arcuate Principle): बारहवीं शताब्दी से दो प्रमुख तकनीकी विकास हुए:
          1. दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर के ढांचे का भार कभी-कभी मेहराबों (Arches) द्वारा उठाया जाता था।
          2. निर्माण में चूना पत्थर सीमेंट का प्रयोग बढ़ गया, जो पत्थर के टुकड़ों के साथ मिलकर उच्च गुणवत्ता वाला कंक्रीट बन जाता था। इससे विशाल संरचनाओं का निर्माण आसान और तेज़ हो गया।

        मंदिरों और मस्जिदों का निर्माण बहुत खूबसूरती से किया गया था क्योंकि वे उपासना के स्थल थे और संरक्षक की शक्ति, धन तथा भक्ति को प्रदर्शित करने के लिए थे।

        • प्रतीक के रूप में मंदिर: एक राजा अक्सर अपने नाम पर ही मंदिर का नाम रखता था (जैसे—राजा राजराजदेव ने अपने देवता ‘राजराजेश्वरम्’ की पूजा के लिए ‘राजराजेश्वर’ मंदिर बनवाया) ताकि वह स्वयं ईश्वर जैसा दिखे।
        • सबसे बड़े मंदिर: ये आमतौर पर राजाओं द्वारा बनाए गए थे, जबकि मंदिर के अन्य छोटे देवता राजा के सहयोगियों और अधीनस्थों के देवी-देवता थे।
        • मस्जिद और सुल्तान: हालाँकि मुस्लिम सुल्तान खुद को भगवान का अवतार नहीं मानते थे, लेकिन फारसी दरबारी इतिहास में सुल्तान का वर्णन ‘अल्लाह की परछाई’ (Shadow of God) के रूप में किया गया है।
        • जल का महत्व: शासक अक्सर जनता को पानी उपलब्ध कराने के लिए टैंक और जलाशय बनवाते थे, जैसे इल्तुतमिश का ‘हौज-ए-सुलतानी’ (राजा का जलाशय)।

        चूँकि राजाओं ने अपनी भक्ति और शक्ति दिखाने के लिए मंदिर बनवाए थे, इसलिए आक्रमणों के दौरान वे अक्सर मुख्य निशाना बनते थे।

        • जब शासक एक-दूसरे के राज्यों पर आक्रमण करते थे, तो वे धन और प्रतिष्ठा लूटने के लिए अक्सर इन इमारतों को निशाना बनाते थे।
        • उदाहरण के लिए, चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने पराजित शासकों से जब्त की गई मूर्तियों से अपना मंदिर भर दिया था, और सुल्तान महमूद गजनवी ने अपने अभियानों के दौरान सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था।

        मुगलों ने विभिन्न शैलियों को मिलाकर वास्तुकला को और अधिक जटिल बना दिया।

        • चारबाग (Chahar Bagh): बाबर को औपचारिक बागों का शौक था, जो आयताकार घेरों में स्थित थे और कृत्रिम नहरों द्वारा चार भागों में विभाजित थे। इस विन्यास को ‘चारबाग’ कहा जाता था।
        • पितरा दूरा (Pietra Dura): शाहजहाँ के शासनकाल में, दिल्ली के दीवान-ए-आम में सिंहासन के पीछे ‘पितरा दूरा’ जड़ाऊ काम (संगमरमर या बलुआ पत्थर पर नक्काशी करके उसमें कीमती रंगीन पत्थर जड़ना) की एक श्रृंखला का उपयोग किया गया था।
        • ताजमहल: शाहजहाँ ने ताजमहल के विन्यास के लिए ‘तटवर्ती बाग’ (River-front garden) की योजना अपनाई, जहाँ सफेद संगमरमर का मकबरा यमुना नदी के तट पर एक चबूतरे पर बनाया गया था और बाग इसके दक्षिण में था।

        जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़े, वास्तुकला की शैलियों का आदान-प्रदान हुआ।

        • विजयनगर में, राजाओं के गजशालाओं (हाथी-अस्तबल) पर बीजापुर और गोलकुंडा जैसे पड़ोसी सुल्तानों की वास्तुकला शैली का गहरा प्रभाव था।
        • वृंदावन में मंदिरों की निर्माण शैली फतेहपुर सीकरी के मुगल महलों से बहुत मिलती-जुलती थी।
        • मुगल शासक क्षेत्रीय शैलियों को अपनी वास्तुकला में अपनाने में बहुत कुशल थे, जैसे बंगाल का ‘बांग्ला गुंबद’
        1. शिखर: मंदिर के गर्भगृह के ऊपर की ऊँची मीनार।
        2. मंडप: मंदिर का वह स्थान जहाँ लोग इकट्ठा होते थे।
        3. मेहराब: दरवाजे या खिड़की के ऊपर का धनुषाकार हिस्सा।
        4. पितरा दूरा: संगमरमर पर कीमती पत्थरों की नक्काशी।

        🏛️ शासक और इमारतें (8वीं-18वीं शताब्दी)

        🏗️ अभियांत्रिकी कौशल
        वास्तुकला की अनुप्रस्थ टोडा (Trabeate) शैली से चापाकार (Arcuate) शैली की ओर बदलाव आया, जहाँ मेहराबों पर भार डाला जाता था। चूना पत्थर सीमेंट के बढ़ते प्रयोग ने विशाल संरचनाओं का निर्माण आसान कर दिया।
        🕌 सत्ता के प्रतीक
        मंदिर राजा की शक्ति और धन का प्रदर्शन थे। मुस्लिम सुल्तानों ने स्वयं को भगवान का अवतार नहीं कहा, लेकिन उन्हें फारसी तवारीख़ में ‘ईश्वर की छाया’ के रूप में वर्णित किया गया। जनता का समर्थन पाने के लिए राजाओं ने हौज़ (जलाशय) बनवाए।
        🌸 मुगल नवाचार
        मुगलों ने चारबाग़ (बगीचे के चार समान हिस्से) की परंपरा शुरू की। शाहजहाँ ने संगमरमर पर रत्नों की जड़ाई की पितरा-दूरा (Pietra Dura) तकनीक और ताजमहल जैसे तट-वर्तीय बाग शैली को लोकप्रिय बनाया।
        🔄 सांस्कृतिक आदान-प्रदान
        विभिन्न क्षेत्रों की शैलियाँ आपस में मिलीं: विजयनगर की गजशालाओं पर सल्तनत शैली का प्रभाव था, जबकि मुगलों ने बंगाल की बाँगला गुम्बद शैली को अपनाया। वृन्दावन के मंदिरों का वास्तुशिल्प फ़तेहपुर सीकरी के महलों जैसा था।
        युद्ध नीति चूँकि मंदिर शक्ति और अपार धन के प्रतीक थे, इसलिए जब एक राजा दूसरे के राज्य पर आक्रमण करता था, तो वे इन मंदिरों को प्राथमिक लक्ष्य बनाते थे।
        📂

        कक्षा-7 इतिहास अध्याय-5 PDF

        सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: शासक और इमारतें

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        यहाँ भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) के भाग IV: राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद 42 से 45 का विस्तृत विश्लेषण हिंदी में दिया गया है। ये अनुच्छेद कार्यस्थल को मानवीय बनाने, जीवन स्तर को सम्मानजनक बनाने और शिक्षा की नींव को मजबूत करने पर केंद्रित हैं।

        मानवीय कल्याण और प्रारंभिक शिक्षा: अनुच्छेद 42–45
        इन निर्देशों का उद्देश्य केवल अस्तित्व बचाने और गरिमापूर्ण जीवन के बीच के अंतर को समाप्त करना है। ये राज्य को एक ऐसा वातावरण बनाने का निर्देश देते हैं जहाँ काम मानवीय हो और भविष्य (बच्चे) सुरक्षित हों।

        यह अनुच्छेद मानता है कि “काम का अधिकार” (अनुच्छेद 41) तब तक अर्थहीन है जब तक कि कार्य वातावरण दमनकारी या खतरनाक हो।

        • शासनादेश: राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाएं सुनिश्चित करने के लिए और मातृत्व सहायता (Maternity Relief) के लिए प्रावधान करेगा।
        • महत्व: यह इस बात पर जोर देता है कि श्रमिक केवल “उत्पादन के उपकरण” नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य और गरिमा के अधिकार रखने वाले इंसान हैं।
        • कार्यान्वयन:
          • मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (और 2017 संशोधन): गर्भवती महिला कर्मचारियों के लिए सवैतनिक अवकाश और लाभ प्रदान करता है।
          • कारखाना अधिनियम, 1948: कारखानों में श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण सुनिश्चित करता है।

        अनुच्छेद 43 “न्यूनतम मजदूरी” की अवधारणा से आगे बढ़कर “निर्वाह मजदूरी” की बात करता है।

        • शासनादेश: राज्य सभी श्रमिकों (कृषि, औद्योगिक या अन्य) के लिए एक निर्वाह मजदूरी और ऐसी कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा जो जीवन का एक सभ्य स्तर और अवकाश (Leisure) का पूर्ण आनंद सुनिश्चित करें।
        • कुटीर उद्योगों को बढ़ावा: यह विशेष रूप से राज्य को ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है (गांधीवादी सिद्धांत)।
        न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage) बनाम निर्वाह मजदूरी (Living Wage) में अंतर:
        1. न्यूनतम मजदूरी: केवल भोजन, कपड़े और आश्रय की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए।
        2. निर्वाह मजदूरी: बुनियादी जरूरतों के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को भी शामिल करती है।
        • उत्पत्ति: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया।
        • शासनादेश: राज्य किसी भी उद्योग में लगे उपक्रमों, प्रतिष्ठानों या अन्य संगठनों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा।
        • लक्ष्य: औद्योगिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना और मालिकों व मजदूरों के बीच की खाई को कम करना।
        • उत्पत्ति: 97वें संविधान संशोधन अधिनियम (2011) द्वारा जोड़ा गया।
        • शासनादेश: राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

        यह भारतीय संविधान के सबसे चर्चित और विवादित अनुच्छेदों में से एक है।

        • शासनादेश: राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
        • परिभाषा: UCC देश के प्रत्येक प्रमुख धार्मिक समुदाय के धर्मग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित ‘व्यक्तिगत कानूनों’ (Personal Laws) के स्थान पर हर नागरिक के लिए कानूनों का एक साझा सेट होगा।
        • दायरा: इसमें विवाह, तलाक, भरण-पोषण, विरासत और गोद लेने जैसे धर्मनिरपेक्ष मामले शामिल हैं।
        • वर्तमान स्थिति: गोवा में एक साझा पारिवारिक कानून (पुर्तगाली नागरिक संहिता) लागू है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर UCC अभी तक लागू नहीं हुआ है।

        इस अनुच्छेद को 86वें संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा महत्वपूर्ण रूप से बदला गया था।

        • मूल प्रावधान: सभी बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान था।
        • वर्तमान शासनादेश: राज्य सभी बच्चों के लिए, जब तक वे छह वर्ष की आयु पूरी नहीं कर लेते, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) प्रदान करने का प्रयास करेगा।
        • बदलाव का कारण: 86वें संशोधन के बाद, 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए “शिक्षा का अधिकार” एक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) बन गया। अब अनुच्छेद 45 केवल “प्री-स्कूल” या आंगनवाड़ी स्तर (0-6 वर्ष) पर केंद्रित है।
        अनुच्छेदप्रकृतिमुख्य केंद्रप्रमुख कानून/उदाहरण
        42समाजवादीमातृत्व सहायता और मानवीय कार्यमातृत्व लाभ अधिनियम
        43समाजवादी/गांधीवादीनिर्वाह मजदूरी और कुटीर उद्योगमनरेगा / खादी बोर्ड
        43Aसमाजवादीप्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारीट्रेड यूनियन अधिनियम
        43Bउदारवादीसहकारी समितियाँ97वां संशोधन
        44उदारवादीसमान नागरिक संहिता(वर्तमान में चर्चा का विषय)
        45उदारवादी0-6 वर्ष के बच्चों की शिक्षाICDS / आंगनवाड़ी

        🏢 मानव कल्याण और समान नागरिक संहिता

        🤰 अनु. 42: प्रसूति और मानवीय कार्य
        कार्य की न्यायसंगत और मानवीय दशाएं सुनिश्चित करना तथा मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना। इसके तहत श्रमिकों को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि इंसान समझा जाता है। (संदर्भ: मातृत्व लाभ अधिनियम)।
        🥖 अनु. 43: निर्वाह मजदूरी
        राज्य सभी श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी (बुनियादी जरूरतें + स्वास्थ्य/शिक्षा) सुनिश्चित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
        🤝 अनु. 43A और 43B: सहकारिता
        43A: उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी। 43B: सहकारी समितियों का स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज और लोकतांत्रिक नियंत्रण को बढ़ावा देना।
        ⚖️ अनु. 44: समान नागरिक संहिता
        राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा, जो विवाह, तलाक और विरासत के लिए धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों का स्थान लेगी।
        👶 अनु. 45: शैशवकाल की देखभाल (0–6 वर्ष)
        86वें संशोधन द्वारा संशोधित। जहाँ 6–14 वर्ष शिक्षा अब एक मूल अधिकार (अनु. 21A) है, वहीं अनुच्छेद 45 छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा पर केंद्रित है।
        अनुच्छेद प्रकृति मुख्य फोकस प्रमुख विधान/योजना
        42समाजवादीप्रसूति सहायतामातृत्व लाभ अधिनियम
        43गांधीवादीनिर्वाह मजदूरीमनरेगा / खादी बोर्ड
        43Aसमाजवादीप्रबंधन में भागीदारीट्रेड यूनियन अधिनियम
        44उदारवादीसमान नागरिक संहिता(विधिक चर्चा का विषय)
        45उदारवादी0–6 वर्ष की देखभालICDS / आंगनवाड़ी
        विधिक तथ्य “निर्वाह मजदूरी” (Living Wage) “न्यूनतम मजदूरी” (Minimum Wage) से श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा शामिल है, जो एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करती है।

        यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (20 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; शासन के महत्वपूर्ण पहलू; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएं)।

        • संदर्भ: महाराष्ट्र के हालिया नगर निगम चुनाव परिणामों का विश्लेषण, जो राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हैं।
        • मुख्य बिंदु:
          • भाजपा का चुनावी दबदबा: भाजपा पुणे, नागपुर और नासिक जैसे प्रमुख शहरों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसने 29 नगर निगमों की कुल 2,869 सीटों में से लगभग 1,425 सीटें जीती हैं।
          • पहचान की राजनीति का नया रूप: पार्टी ने मराठी क्षेत्रीयता (Nativism) और हिंदू सांप्रदायिकता को कुशलतापूर्वक मिलाकर बाल ठाकरे की विरासत को अपनाया है ताकि बदलते शहरी जनसांख्यिकी को साधा जा सके।
          • नेतृत्व का विकास: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वैचारिक अपेक्षाओं और शासन की जटिलताओं के बीच संतुलन बनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है।
          • पारंपरिक गुटों का पतन: पवार और ठाकरे परिवारों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। भाजपा-शिंदे गठबंधन ने बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) पर कब्जा कर लिया, जिस पर 25 साल से उद्धव ठाकरे का नियंत्रण था।
        • UPSC प्रासंगिकता: “क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय दल”, “चुनावी राजनीति और जनसांख्यिकी” और “भारत में वैचारिक विमर्श का विकास”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • जनसांख्यिकीय लाभ: भाजपा ने हिंदी भाषी मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रवासन (Migration) के कारण हुए जनसंख्या परिवर्तनों का उपयोग किया है, जिससे पारंपरिक क्षेत्रीय राजनीति कमजोर हुई है।
          • शिवसेना का संघर्ष: शिवसेना के विभिन्न गुट बदलती जनसंख्या के अनुसार खुद को ढालने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं।
          • समावेशिता का तर्क: लेख चेतावनी देता है कि क्षेत्रीयता के स्थान पर सांप्रदायिकता का आना राज्य के लिए आदर्श नहीं है; भाजपा को अपने लक्ष्यों के लिए अधिक समावेशी मंच का उपयोग करना चाहिए।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित/विकासशील देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

        • संदर्भ: यमन की सऊदी समर्थित सरकार और यूएई (UAE) समर्थित ‘दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद’ (STC) के बीच हालिया संघर्ष।
        • मुख्य बिंदु:
          • क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: इस संघर्ष ने सऊदी-यूएई तनाव को उजागर कर दिया है। रियाद ने अबू धाबी पर यमनी अलगाववादियों को हथियार देने का आरोप लगाया है।
          • हूथी की पकड़: जैसे-जैसे दक्षिण के गुट आपस में लड़ रहे हैं, उत्तर में हूथी मिलिशिया (अंसार अल्लाह) ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है।
          • मानवीय संकट: यमन दुनिया के सबसे खराब संकटों में से एक का सामना कर रहा है, जहाँ लाखों लोग अकाल की कगार पर हैं और अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है।
          • यूएई की वापसी: सऊदी अरब की फटकार के बाद, यूएई ने यमन से अपनी सेना वापस बुलाने की घोषणा की है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “छद्म युद्ध (Proxy Wars)” और “अंतर्राष्ट्रीय मानवीय संकट प्रबंधन”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • संघीय ढांचा समाधान: स्थायी शांति के लिए, संपादकीय सभी यमनी गुटों को एक संघीय शासन संरचना स्थापित करने की सलाह देता है।
          • सहयोग की आवश्यकता: लेख इस बात पर जोर देता है कि सऊदी अरब और यूएई को अपने पड़ोस में स्थिरता के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
          • वायु शक्ति का प्रभाव: सऊदी हवाई शक्ति सरकारी बलों को खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने में मदद करने के लिए महत्वपूर्ण रही है।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सांविधिक, नियामक और अर्ध-न्यायिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

        • संदर्भ: प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया जांच प्रणालियों की आलोचना और न्यायिक जांच से पहले छवि खराब करने वाले “मीडिया ट्रायल” की भूमिका।
        • मुख्य बिंदु:
          • तर्क का उलटफेर: PMLA (2002) के तहत, ED पर आरोप है कि वह किसी मूल अपराध (Scheduled Offence) को स्थापित किए बिना ही धन शोधन (Money Laundering) को एक स्वतंत्र अपराध की तरह मान रही है।
          • प्रक्रियात्मक अतिरेक: PMLA की धारा 50 के तहत, एजेंसी किसी को भी बुला सकती है और शपथ पर बयान दर्ज कर सकती है, जो जमानत के लिए ‘निर्दोषता के अनुमान’ (Presumption of Innocence) को उलट देता है।
          • न्यायिक हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट सहित कई अदालतों ने ED की जांच पर रोक लगाई है और कहा है कि एजेंसी “सभी सीमाएं पार कर रही है।”
          • संस्थागत अखंडता: रिश्वत लेते पकड़े गए ED अधिकारियों के मामलों ने एजेंसी की नैतिक साख को नुकसान पहुँचाया है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “जांच शक्तियों का दुरुपयोग”, “न्यायिक निरीक्षण” और “पत्रकारिता में नैतिकता”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • मीडिया की संलिप्तता: संपादकीय उन पत्रकारों की आलोचना करता है जो चुनिंदा ‘लीक’ के लिए माध्यम के रूप में कार्य करते हैं; “पत्रकारिता स्टेनोग्राफी नहीं है।”
          • संवैधानिक सुरक्षा: लेख का तर्क है कि केवल सख्त सीमाएं ही जांच प्राधिकरण को मनमानी सरकारी शक्ति बनने से रोक सकती हैं।
          • लोकतंत्र का स्वास्थ्य: झूठे या कमजोर मामले संस्थानों में जनता के विश्वास को खत्म करते हैं।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते)।

        • संदर्भ: “डिप्लोमैटिक व्हाइट स्पेस” (राजनयिक रिक्त स्थान)—वैश्विक नेतृत्व में वे अंतराल जहाँ बड़ी शक्तियाँ आपस में भिड़ी हुई हैं—उनमें नेतृत्व करने के भारत के अवसरों की तलाश।
        • मुख्य बिंदु:
          • भारत-यूरोपीय संघ FTA: 2026 के गणतंत्र दिवस परेड में यूरोपीय संघ के नेतृत्व की उपस्थिति भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते के लिए एक बड़ा संकेत है।
          • ब्रिक्स (BRICS) का संचालन: 2026 के अध्यक्ष के रूप में, भारत को इस समूह को पश्चिम-विरोधी बयानबाजी से हटाकर ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ के माध्यम से व्यावहारिक परिणामों की ओर ले जाना चाहिए।
          • क्वाड (Quad) की उपयोगिता: भारत क्वाड को हिंद महासागर के देशों के लिए उपयोगी बना सकता है, अपनी समुद्री डोमेन जागरूकता क्षमताओं को सेवाओं में बदलकर।
          • नए गठबंधन: भारत को “पैक्स सिलिका” (Pax Silica – अमेरिका के नेतृत्व वाला AI और सेमीकंडक्टर क्लब) में शामिल होने का निमंत्रण मिलना छोटे, कार्यात्मक राजनयिक गठबंधनों की ओर झुकाव को दर्शाता है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “भारत का वैश्विक नेतृत्व”, “बहु-संरेखण रणनीति (Multi-alignment)” और “बहुपक्षवाद का भविष्य”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • छोटे मंच, बड़े लाभ: संपादकीय का सुझाव है कि विभाजित दुनिया में परिणाम संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े मंचों के बजाय छोटे गठबंधनों से निकल रहे हैं।
          • रणनीतिक संतुलन: भारत की 2026 की गति ‘व्हाइट स्पेस’ को वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं (जैसे AI मानक और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा) के लिए कार्य तंत्र में बदलने से आएगी।

        पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।

        • संदर्भ: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और बिना दस्तावेजों वाले आव्रजन के मुद्दे का विश्लेषण।
        • मुख्य बिंदु:
          • मतदाता सूची पुनरीक्षण: विवादों के बावजूद, यह “अत्यधिक महसूस” किया जा रहा है कि मृत और नकली नामों को हटाने के लिए मतदाता सूची का पुनरीक्षण आवश्यक है।
          • सार्वजनिक चिंता: संपादकीय नोट करता है कि सबूतों के बावजूद अवैध प्रवासियों के मुद्दे को पूरी तरह नकारना राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंतित जनता के एक वर्ग को नाराज करता है।
          • संस्थागत विफलता: SIR 2.0 ने ECINet डिजिटल बुनियादी ढांचे का पूरी तरह उपयोग करने के बजाय कागजी फॉर्मों और भौतिक सुनवाइयों (नोबेल पुरस्कार विजेताओं को भी बुलाने) पर भरोसा किया।
          • चुनावी अखंडता: इस अभ्यास में लगभग 6.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे विपक्ष ने “वोट चोरी” के आरोप लगाए।
        • UPSC प्रासंगिकता: “मतदाता सूची की अखंडता”, “आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां” और “नागरिकता की राजनीति”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • सटीक संवाद: एक बुद्धिमानी भरा रास्ता यह होगा कि बयानबाजी के बजाय कानूनी कार्य प्राधिकरणों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित बातचीत की जाए।
          • डिजिटल-प्रथम समाधान: लेख ऑनलाइन दस्तावेज़ अपलोड और बैकएंड सत्यापन पर आधारित प्रणाली की वकालत करता है ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष और मानवीय हो सके।
          • भरोसे की रक्षा: चुनावी सुधार समावेश और डिजिटल उपकरणों के जिम्मेदार उपयोग के माध्यम से ही सफल होते हैं।

        संपादकीय विश्लेषण

        20 जनवरी, 2026
        GS-2 राजव्यवस्था
        🗳️ महाराष्ट्र: क्षेत्रीय ‘भगवा’ बदलाव
        नगरपालिका चुनावों में भाजपा ने 2,869 में से 1,425 सीटें जीतकर पारंपरिक क्षेत्रीय दलों को विस्थापित किया। मुख्य रणनीति: बदलती शहरी जनसांख्यिकी को लुभाने के लिए मराठी भूमिपुत्रवाद (Nativism) और सांप्रदायिकता का मिश्रण। भाजपा-शिंदे गठबंधन ने BMC पर 25 साल पुराने ठाकरे दबदबे को समाप्त कर दिया।
        GS-2 अंत. संबंध
        🇾🇪 विभाजित यमन: सऊदी-यूएई प्रतिद्वंद्विता
        अलगाववादियों को हथियार हस्तांतरण पर रियाद की फटकार के बाद यूएई द्वारा सेना वापस बुलाने से भू-राजनीतिक दरारें गहरी हुईं। परिणाम: उत्तरी केंद्रों में हुथी विद्रोहियों का सुदृढ़ीकरण। समाधान: मानवीय संकट से जूझ रहे इस देश में स्थायी शांति के लिए एक संघीय ढांचा अनिवार्य है।
        GS-2 एजेंसियां
        ⚖️ ED और मीडिया ट्रायल की नैतिकता
        प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग को “अनुसूचित अपराध” से स्वतंत्र मानने की आलोचना। PMLA धारा 50 के तहत शपथ पर दिए गए बयान निर्दोषता की उपधारणा के सिद्धांत को उलट देते हैं। चेतावनी: चयनात्मक मीडिया लीक राज्य की मनमानी शक्ति के वाहक बन रहे हैं।
        GS-2 अंत. संबंध
        🌍 राजनयिक रिक्त स्थान: 2026 का दृष्टिकोण
        भारत नेतृत्व की कमियों को छोटे, कार्यात्मक गठबंधनों के माध्यम से भरने का लक्ष्य रखता है। मुख्य कदम: भारत-यूरोपीय संघ FTA को “जोखिम-निवारण समझौते” के रूप में देखना और पैक्स सिलिका (Pax Silica) (यूएस-नीत AI/सेमीकंडक्टर ब्लॉक) में शामिल होना। वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के लिए नए प्रबंध बनाना प्राथमिकता है।
        GS-2 शासन
        📜 चुनावी SIR: डिजिटल बनाम कागज़
        विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) 2.0 में 6.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने से “वोट चोरी” के आरोप लगे। आलोचना: त्रुटि-प्रवण कागजी फॉर्म और भौतिक सुनवाई पर निर्भरता के बजाय ECINet बुनियादी ढांचे की आवश्यकता। सुरक्षा पर बातचीत पारदर्शी होनी चाहिए, उपेक्षापूर्ण नहीं।

        यहाँ भारत के समुद्री भूगोल (Ocean Geography) और सामरिक समुद्री बिंदुओं का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

        सामरिक जलमार्ग और चैनल समुद्री व्यापार और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका मानचित्रण करते समय अक्षांश रेखाओं (Latitudes) का ध्यान रखना आवश्यक है।

        • 8 डिग्री चैनल (8 Degree Channel): यह लक्षद्वीप समूह (विशेषकर मिनिकॉय) को मालदीव से अलग करता है।
        • 9 डिग्री चैनल (9 Degree Channel): यह मिनिकॉय द्वीप को शेष लक्षद्वीप द्वीपसमूह से अलग करता है।
        • 10 डिग्री चैनल (10 Degree Channel): यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीपों को निकोबार द्वीपों से अलग करता है।
        • डंकन पैसेज (Duncan Passage): यह दक्षिण अंडमान और लिटिल अंडमान के बीच स्थित है।
        • पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait): भारत (तमिलनाडु) को श्रीलंका से अलग करने वाली पानी की एक संकरी पट्टी।
        • कोको चैनल (Coco Channel): अंडमान द्वीपों को म्यांमार के कोको द्वीपों से अलग करता है।

        भारत के पास एक विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) है जो समुद्री संसाधनों पर अधिकार प्रदान करता है।

        • महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf): तट से समुद्र की ओर फैला हुआ समुद्र तल का उथला हिस्सा।
        • EEZ की सीमा: आधार रेखा (Baseline) से 200 समुद्री मील (Nautical Miles) तक फैली होती है। भारत का EEZ लगभग 20.2 लाख वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करता है।
        • रणनीतिक नौसैनिक अड्डे:
          • पोर्ट ब्लेयर (अंडमान): भारत की एकमात्र ‘ट्राई-सर्विस कमांड’ (थल, जल और वायु सेना) का मुख्यालय।
          • कारवार (INS कदंब): पश्चिमी तट पर भारत के सबसे बड़े नौसैनिक अड्डों में से एक।
          • विशाखापत्तनम: पूर्वी नौसेना कमान का मुख्यालय।

        भारत की प्रवाल भित्तियों का मानचित्रण पारिस्थितिक और पर्यावरणीय भूगोल के लिए महत्वपूर्ण है।

        क्षेत्रभित्ति का प्रकारमहत्व
        लक्षद्वीपएटोल (Atolls)पूरी तरह से प्रवाल द्वीपों से निर्मित; अत्यधिक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र।
        मन्नार की खाड़ीतटीय भित्ति (Fringing)भारत और श्रीलंका के बीच स्थित; एक जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve)।
        अंडमान और निकोबारतटीय भित्ति (Fringing)भारत में सबसे व्यापक और विस्तृत प्रवाल भित्तियाँ।
        कच्छ की खाड़ीतटीय भित्ति (Fringing)भारत की सबसे उत्तरी प्रवाल भित्तियाँ; उथले पानी में पाई जाती हैं।

        ये विशेषताएँ भारतीय तटरेखा के आकार को परिभाषित करती हैं।

        • कच्छ की खाड़ी: गुजरात में स्थित; उच्च ज्वारीय ऊर्जा (Tidal energy) क्षमता के लिए जानी जाती है।
        • खंभात की खाड़ी: गुजरात में स्थित; प्रमुख अपतटीय तेल (Offshore oil) अन्वेषण स्थल।
        • मन्नार की खाड़ी: दक्षिण में स्थित; मोती निकालने और समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध।
        • बंगाल की खाड़ी: दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी, जो भारतीय मानसून को गहराई से प्रभावित करती है।
        श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
        सबसे दक्षिणी बिंदुइंदिरा पॉइंटग्रेट निकोबार द्वीप
        ट्राई-सर्विस बेसपोर्ट ब्लेयरदक्षिण अंडमान
        प्रवाल राजधानीकवरत्तीलक्षद्वीप
        आदम का पुलराम सेतुपम्बन द्वीप और मन्नार द्वीप के बीच

        UPSC के लिए पाक जलडमरूमध्य और मन्नार की खाड़ी की सापेक्ष स्थिति को ध्यान से देखें। पाक जलडमरूमध्य उत्तर में है, जबकि मन्नार की खाड़ी उसके दक्षिण में स्थित है।

        समुद्री परिदृश्य (Maritime Horizons)

        जलसंधियाँ एवं मार्ग
        🧭 रणनीतिक चैनल
        रणनीतिक अक्षांश रेखाएँ जैसे 8°, 9°, और 10° चैनल अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के गलियारों को परिभाषित करती हैं। वहीं, पाक जलडमरूमध्य और डंकन मार्ग महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट (अवरोध बिंदु) के रूप में कार्य करते हैं।
        अभ्यास: मानचित्र पर 10 डिग्री चैनल को खोजें और उन दो द्वीप समूहों की पहचान करें जिन्हें यह अलग करता है।
        सुरक्षा
        ⚓ नौसेना कमान केंद्र
        भारत की समुद्री रक्षा पोर्ट ब्लेयर (त्रि-सेवा कमान), कारवार (INS कदंब), और विशाखापत्तनम स्थित पूर्वी कमान पर आधारित है।
        अभ्यास: भारतीय तटरेखा से 200 समुद्री मील की ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र’ (EEZ) सीमा को ट्रेस करें।
        समुद्री जीव विज्ञान
        🐚 मूंगा (कोरल) संरचनाएं
        भारत की कोरल संपदा लक्षद्वीप के एटोल से लेकर अंडमान और मन्नार की खाड़ी की विस्तृत तटीय प्रवाल भित्तियों (Fringing Reefs) तक फैली हुई है।
        क्षेत्र रीफ का प्रकार महत्व
        लक्षद्वीपएटोल (Atolls)पूरी तरह से मूंगा द्वीप पारिस्थितिकी तंत्र
        मन्नार की खाड़ीतटीय (Fringing)समुद्री जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
        कच्छ की खाड़ीतटीय (Fringing)सबसे उत्तरी उथले पानी की भित्तियाँ
        तटीय आकृति
        🌊 खाड़ियाँ एवं ज्वारीय ऊर्जा
        भारत की तटरेखा कच्छ की खाड़ी (ज्वारीय क्षमता) और खंभात की खाड़ी (अपतटीय तेल) से कटी-फटी है, जो गुजरात के अद्वितीय समुद्री प्रोफाइल को परिभाषित करती है।
        अभ्यास: पंबन द्वीप और मन्नार द्वीप के बीच “आदम का पुल” (राम सेतु) के स्थान की पहचान करें।
        समुद्री मानचित्रण चेकलिस्ट
        श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
        सबसे दक्षिणी सिराइंदिरा पॉइंटग्रेट निकोबार द्वीप
        मूंगा राजधानीकवरत्तीलक्षद्वीप द्वीपसमूह
        त्रि-सेवा आधारपोर्ट ब्लेयरदक्षिण अंडमान द्वीप
        मोती की खेतीमन्नार की खाड़ीदक्षिणी तट (तमिलनाडु)

        Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 21, 2026

        Dainik CSAT Quiz (21 January 2026)
        दैनिक CSAT क्विज़

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          Dainik GS Quiz in Hindi – January 21, 2026

          Dainik GS Quiz (21 January 2026)
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            Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 20, 2026

            Dainik CSAT Quiz (20 January 2026)
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              Dainik GS Quiz (20 January 2026)
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