IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 26 जनवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन” 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के पतन और उसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं के नाटकीय पुनर्गठन का वर्णन करता है।

मुगल साम्राज्य को कई कारकों के संयोजन का सामना करना पड़ा जिससे उसका पतन हुआ:

  • उत्तराधिकार और दक्कन का युद्ध: औरंगजेब ने दक्कन में लंबी लड़ाइयाँ लड़ीं, जिससे साम्राज्य के सैन्य और वित्तीय संसाधन समाप्त हो गए।
  • प्रशासनिक गिरावट: शाही प्रशासन की कार्यक्षमता बिगड़ गई, जिससे बाद के मुगल सम्राटों के लिए अपने शक्तिशाली मनसबदारों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया।
  • विद्रोह: उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में किसानों और जमींदारों के विद्रोहों ने दबाव बढ़ा दिया। ये विद्रोह अक्सर उच्च करों के बोझ के कारण होते थे।
  • विदेशी आक्रमण: ईरान के शासक नादिर शाह ने 1739 में दिल्ली पर आक्रमण किया और शहर को जमकर लूटा। इसके बाद अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने 1748 और 1761 के बीच पाँच बार आक्रमण किए।

अठारहवीं शताब्दी के दौरान, मुगल साम्राज्य धीरे-धीरे कई स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों में बिखर गया। इन राज्यों को तीन समूहों में बांटा जा सकता है:

  • पुरानी मुगल रियासतें (Old Mughal Provinces): अवध, बंगाल और हैदराबाद जैसे राज्य अत्यंत शक्तिशाली और काफी स्वतंत्र थे, लेकिन इनके शासकों ने मुगल सम्राट के साथ औपचारिक संबंध नहीं तोड़े।
    • हैदराबाद: इसकी स्थापना निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह ने की थी। उसने उत्तर भारत से कुशल सैनिकों और प्रशासकों को लाकर और इजारेदारी (Ijaradari) प्रथा अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की।
    • अवध: बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान को 1722 में सूबेदार नियुक्त किया गया था। उसने जागीरदारों की संख्या कम करके और रिक्त पदों पर अपने वफादार नौकरों को नियुक्त करके मुगल प्रभाव को कम करने की कोशिश की।
    • बंगाल: मुर्शिद कुली खान के नेतृत्व में बंगाल धीरे-धीरे दिल्ली के नियंत्रण से अलग हो गया। उसने सभी मुगल जागीरदारों को उड़ीसा स्थानांतरित कर दिया और बंगाल के राजस्व का बड़े पैमाने पर पुनर्मूल्यांकन करने का आदेश दिया।
  • राजपूतों के वतन (Vatans of the Rajputs): कई राजपूत राजाओं (विशेषकर अंबर और जोधपुर के) ने मुगलों के अधीन विशिष्ट सेवाएँ दी थीं। उन्हें अपनी ‘वतन जागीर’ में काफी स्वायत्तता प्राप्त थी। अठारहवीं शताब्दी में, इन शासकों ने आसपास के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास किया।
  • मराठों, सिखों और जाटों के राज्य: इन समूहों ने एक लंबे सशस्त्र संघर्ष के बाद मुगलों से अपनी स्वतंत्रता छीन ली थी।

सिखों के एक राजनीतिक समुदाय के रूप में संगठित होने से पंजाब में क्षेत्रीय राज्य निर्माण में मदद मिली।

  • गुरु गोविंद सिंह: दसवें गुरु ने राजपूत और मुगल शासकों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं और 1699 में ‘खालसा’ की स्थापना की।
  • बंदा बहादुर: उनके नेतृत्व में खालसा ने मुगल सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया, गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह के नाम पर सिक्के जारी करके अपने संप्रभु शासन की घोषणा की और अपना प्रशासन स्थापित किया।
  • मिसल (Misls): अठारहवीं शताब्दी में सिखों ने खुद को कई जत्थों और बाद में ‘मिसलों’ में संगठित किया। उनकी संयुक्त सेना को ‘दल खालसा’ के नाम से जाना जाता था।

मुगल शासन के निरंतर विरोध से उत्पन्न होने वाला मराठा राज्य एक और शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य था।

  • शिवाजी: उन्होंने शक्तिशाली योद्धा परिवारों (देशमुखों) और अत्यधिक गतिशील कृषक-पशुपालकों (कुनबियों) के सहयोग से एक स्थिर राज्य की स्थापना की।
  • पेशवा: शिवाजी की मृत्यु के बाद, मराठा राज्य की प्रभावी शक्ति चितपावन ब्राह्मणों के एक परिवार के हाथ में रही, जिन्होंने शिवाजी के उत्तराधिकारियों की सेवा ‘पेशवा’ (प्रधानमंत्री) के रूप में की।
  • विस्तार: 1720 और 1761 के बीच मराठा साम्राज्य का विस्तार हुआ। उन्होंने मुगलों से मालवा और गुजरात छीन लिया और राजस्थान, बंगाल तथा उड़ीसा पर छापे मारे।
  • राजस्व: वे उन क्षेत्रों से चौथ (भू-राजस्व का 25%) और सरदेशमुखी (9-10%) वसूलते थे जो उनके सीधे नियंत्रण में नहीं थे।

अन्य राज्यों की तरह, जाटों ने सत्रहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के दौरान अपनी शक्ति संगठित की।

  • चूड़ामन: उनके नेतृत्व में जाटों ने दिल्ली के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया।
  • सूरज मल: उनके अधीन भरतपुर का राज्य एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।
  1. इजारेदारी: राजस्व वसूली के लिए ठेकेदारी की प्रथा।
  2. चौथ: मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से वसूला जाने वाला कर (उपज का 1/4 हिस्सा)।
  3. सरदेशमुखी: मुख्य राजस्व अधिकारी होने के नाते वसूला जाने वाला अतिरिक्त कर (9-10%)।
  4. खालसा: सिखों का सैन्य दल।
  5. तकरीबन: लगभग (इतिहास की तिथियों के संदर्भ में प्रयोग)।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-7
अध्याय – 10

अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन

साम्राज्य का संकट
दक्कन के युद्ध: औरंगज़ेब के लंबे संघर्ष ने राजकोष को खाली कर दिया और सैन्य प्रशासन को कमजोर कर दिया।
आक्रमण: नादिर शाह (1739) और अहमद शाह अब्दाली ने मुगल सिंहासन की प्रतिष्ठा को चकनाचूर कर दिया।
नई व्यवस्थाएँ
इजारादारी: राजस्व वसूली का ठेका देना सामान्य हो गया क्योंकि राज्य को तत्काल नकदी की आवश्यकता थी।
क्षेत्रीय पहचान: गवर्नरों (सूबेदारों) ने अपनी शक्ति को मजबूत किया और व्यवहार में वे स्वतंत्र शासक बन गए।
स्वतंत्र राज्यों का उदय
हैदराबाद: इसकी स्थापना आसफ़ जाह द्वारा की गई थी। वह उत्तर से कुशल सैनिकों को लाया और दिल्ली के हस्तक्षेप के बिना स्वतंत्र रूप से शासन किया।
अवध: बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान ने समृद्ध जलोढ़ मैदानों का प्रबंधन किया और मुगल-नियुक्त जागीरदारों की संख्या कम कर दी।
बंगाल: मुर्शिद कुली खान के नेतृत्व में राज्य स्वायत्त हो गया और राजस्व का संग्रह अत्यंत कड़ाई से नकद में किया जाने लगा।
मराठा: पेशवाओं के अधीन उन्होंने एक ऐसी सैन्य प्रणाली विकसित की जो छापामार युद्ध के माध्यम से मुगल किलों को चकमा दे देती थी।

चौथ

मराठों द्वारा गैर-मराठा क्षेत्रों से मांगे जाने वाले भू-राजस्व का 25 प्रतिशत हिस्सा।

खालसा

सिखों की संप्रभु संस्था, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने एक राज्य शक्ति में बदल दिया था।

जाट

समृद्ध कृषक जिन्होंने सूरज मल के नेतृत्व में भरतपुर में एक मजबूत राज्य का निर्माण किया था।

एक युग का अंत
18वीं शताब्दी केवल “पतन” का काल नहीं थी, बल्कि एक गतिशील संक्रमण थी। जहाँ एक ओर मुगल छत्रछाया सिमट रही थी, वहीं दूसरी ओर जीवंत क्षेत्रीय संस्कृतियों और प्रशासनिक नवाचारों का उदय हुआ, जिसने आधुनिक भारत के विविध राजनीतिक परिदृश्य का मार्ग प्रशस्त किया।
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कक्षा-7 इतिहास अध्याय-10 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन

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राष्ट्रपति भारतीय संघ का सर्वोच्च प्रमुख होता है। यद्यपि उनका पद “नाममात्र” का होता है, लेकिन देश के शासन के लिए उनकी इन शक्तियों का कानूनी महत्व बहुत अधिक है।

भारत सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।

राष्ट्रपति देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारियों की नियुक्ति करता है:

  • प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री (प्रधानमंत्री की सलाह पर)।
  • भारत के महान्यायवादी (Attorney General) – राष्ट्रपति उनके वेतन और कार्यकाल का निर्धारण भी करते हैं।
  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त, तथा UPSC के अध्यक्ष व सदस्य।
  • राज्यों के राज्यपाल (Governors)।
  • अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council): केंद्र-राज्य और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए इसकी नियुक्ति।
  • राष्ट्रपति किसी भी क्षेत्र को ‘अनुसूचित क्षेत्र’ घोषित कर सकता है और उसे अनुसूचित क्षेत्रों व जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं।
  • वह प्रधानमंत्री से किसी भी ऐसे मामले पर निर्णय मंत्रिपरिषद के विचारार्थ प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है, जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो लेकिन परिषद ने विचार न किया हो।

राष्ट्रपति संसद का एक अभिन्न अंग होता है। इस कारण उसे विधायी प्रक्रिया से संबंधित कई शक्तियाँ प्राप्त हैं:

  • सत्र बुलाना और सत्रावसान (Summoning & Proroguing): वह संसद के सत्र को बुला सकता है या उसका सत्रावसान कर सकता है तथा लोकसभा को भंग कर सकता है।
  • संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108): किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध (Deadlock) होने की स्थिति में वह संयुक्त बैठक बुला सकता है।
  • मनोनयन (Nominations): वह राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करता है (साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों से)।
  • पूर्व सिफारिश: कुछ विधेयकों को उनकी पूर्व सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता (जैसे—धन विधेयक, या राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन से संबंधित विधेयक)।

जब संसद द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 111 के तहत उनके पास तीन विकल्प होते हैं:

  1. आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto): “नहीं” कहने की शक्ति। वह विधेयक पर अपनी सहमति सुरक्षित रख लेता है, जिससे विधेयक समाप्त हो जाता है और कानून नहीं बन पाता।
    • उपयोग: आमतौर पर गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों या तब किया जाता है जब सहमति देने से पहले मंत्रिमंडल इस्तीफा दे दे।
  2. निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): “पुनर्विचार” के लिए कहने की शक्ति। वह विधेयक को संसद को वापस भेज देता है।
    • शर्त: यदि संसद उस विधेयक को दोबारा (संशोधन के साथ या बिना) पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजती है, तो राष्ट्रपति को अपनी सहमति देनी ही पड़ती है।
    • नोट: वह ‘धन विधेयक’ के लिए इसका उपयोग नहीं कर सकता।
  3. पॉकेट वीटो (Pocket Veto): “मौन” रहने की शक्ति। वह विधेयक पर न तो सहमति देता है, न उसे अस्वीकार करता है और न ही वापस भेजता है, बल्कि उसे अनिश्चित काल के लिए लंबित रखता है।
    • परीक्षा तथ्य: भारतीय राष्ट्रपति की ‘जेब’ (Pocket) अमेरिकी राष्ट्रपति से बड़ी है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति को 10 दिनों के भीतर विधेयक वापस करना होता है, जबकि भारतीय संविधान में ऐसी कोई समय सीमा नहीं है।

यह राष्ट्रपति की सबसे महत्वपूर्ण विधायी शक्ति है, जो उसे तब कानून बनाने की अनुमति देती है जब संसद सत्र में न हो।

  • समय: इसे केवल तभी जारी किया जा सकता है जब संसद का कोई एक सदन (या दोनों) सत्र में न हो।
  • आवश्यकता: राष्ट्रपति को संतुष्ट होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं जिनमें तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक है।
  • प्रभाव: अध्यादेश का वही बल और प्रभाव होता है जो संसद के अधिनियम का होता है, लेकिन यह एक अस्थायी कानून है।
  • संसद के पुन: सत्र शुरू होने पर अध्यादेश को दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना चाहिए।
  • 6 सप्ताह का नियम: यदि संसद इसे अनुमोदित कर देती है, तो यह अधिनियम बन जाता है। यदि कोई कार्रवाई नहीं की जाती, तो संसद की बैठक शुरू होने के 6 सप्ताह बाद यह समाप्त हो जाता है।
  • अधिकतम अवधि: चूँकि संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने हो सकता है, इसलिए किसी अध्यादेश का अधिकतम जीवन 6 महीने और 6 सप्ताह हो सकता है।
शक्ति का प्रकारअनुच्छेदमुख्य शासनादेशकार्यान्वयन विवरण
वीटो शक्ति111विधेयकों पर सहमतिआत्यंतिक, निलंबनकारी या पॉकेट।
अध्यादेश123कानून बनाने की शक्ति6 महीने + 6 सप्ताह तक वैध।
संयुक्त बैठक108गतिरोध सुलझानाराष्ट्रपति बुलाता है, अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है।
क्षमादान72न्यायिक राहतमृत्युदंड तक को क्षमा कर सकते हैं।

हमेशा याद रखें कि राष्ट्रपति अपनी वीटो शक्ति या अध्यादेश शक्ति का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। (42वें और 44वें संशोधन के अनुसार)।

संवैधानिक प्रमुख   •   कार्यपालिका
संघीय प्रशासन

राष्ट्रपति की शक्तियाँ

कार्यकारी भूमिका
भारत सरकार के सभी औपचारिक कार्यकारी कार्य राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
नियुक्तियाँ
वे प्रधानमंत्री, महान्यायावादी (AG), CAG और राज्यों के राज्यपालों की नियुक्ति करते हैं।
विधायी अधिकार
संसद: वे संसद के अभिन्न अंग हैं; सदनों को आहूत/सत्रावसान कर सकते हैं और लोकसभा को भंग कर सकते हैं।
संयुक्त बैठक: सदनों के बीच गतिरोध को दूर करने के लिए संयुक्त अधिवेशन (अनुच्छेद 108) बुला सकते हैं।
अध्यादेश (अनुच्छेद 123)
संसद का सत्र न होने पर अध्यादेश जारी कर सकते हैं। इसे पुन: बैठक के 6 सप्ताह के भीतर अनुमोदित होना अनिवार्य है।

आत्यंतिक वीटो

सहमति रोकने की शक्ति; विधेयक तुरंत समाप्त हो जाता है और कानून नहीं बन पाता।

निलंबनकारी वीटो

विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस करना। यदि पुन: पारित हो जाए, तो सहमति अनिवार्य है।

पॉकेट वीटो

विधेयक को अनिश्चित काल के लिए लंबित रखना। संविधान में इसकी कोई समय सीमा तय नहीं है।

संवैधानिक
सार
राष्ट्रपति भारतीय राज्य के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। हालांकि वास्तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित होती है, लेकिन राष्ट्रपति का पद गरिमा और निरंतरता का प्रतीक है, जो संकट के समय राष्ट्र के संरक्षक के रूप में कार्य करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (26 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारतीय संविधान; संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारतीय संघवाद के स्वास्थ्य का विश्लेषण, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित किया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • राजकोषीय केंद्रीकरण (Fiscal Centralization): संपादकीय नोट करता है कि केंद्र द्वारा ‘उपकर’ (Cess) और ‘अधिभार’ (Surcharge) के बढ़ते उपयोग के माध्यम से विभाज्य कर पूल में राज्यों की हिस्सेदारी प्रभावी रूप से कम हो रही है।
    • राज्यपाल की भूमिका: केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों द्वारा संवैधानिक सेतु के बजाय “राजनीतिक एजेंट” के रूप में कार्य करने से कार्यपालिका के संबंधों में तनाव आया है।
    • विधायी अतिक्रमण: राज्य सूची के विषयों (जैसे कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा) में केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से बढ़ते हस्तक्षेप ने “एकात्मक झुकाव” (Unitary bias) की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
    • भाषा और पहचान: ‘हिंदी थोपने’ की बहस और 2027 के बाद होने वाला परिसीमन अभ्यास क्षेत्रीय उप-राष्ट्रवाद के लिए संभावित ‘फ्लैशप्वाइंट’ के रूप में उभर रहे हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारतीय संघवाद की प्रकृति”, “संवैधानिक पदाधिकारियों की भूमिका” और “राजकोषीय संघवाद” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद: विश्लेषण का तर्क है कि जहाँ “प्रतिस्पर्धी संघवाद” ने व्यापार करने में आसानी (Ease of doing business) में सुधार किया है, वहीं इसने सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में “सहकारी संघवाद” को कमजोर किया है।
    • स्वायत्तता का क्षरण: राज्यों की उधारी सीमाओं पर केंद्रीय शर्तों को थोपना राज्य के वित्तीय प्रबंधन में “पिछले दरवाजे से प्रवेश” के रूप में वर्णित किया गया है।
    • आगे की राह: संपादकीय विश्वास बहाल करने के लिए अंतर-राज्य परिषद को पुनर्जीवित करने और राज्यपालों की नियुक्ति पर सरकारिया आयोग की सिफारिशों को अपनाने का सुझाव देता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (न्यायपालिका; शासन के महत्वपूर्ण पहलू; जवाबदेही)।

  • संदर्भ: न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना उच्च न्यायपालिका के भीतर कदाचार के आरोपों को संबोधित करने के लिए एक औपचारिक तंत्र की आवश्यकता पर चर्चा।
  • मुख्य बिंदु:
    • इन-हाउस प्रक्रिया की सीमाएँ: न्यायाधीशों की जांच के लिए वर्तमान “इन-हाउस” तंत्र की पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास की कमी के लिए आलोचना की जाती है।
    • महाभियोग की बाधाएं: महाभियोग (Impeachment) की संवैधानिक प्रक्रिया को इसकी अत्यधिक राजनीतिक प्रकृति और कठोर आवश्यकताओं के कारण “व्यावहारिक रूप से असंभव” बताया गया है।
    • ‘अंकल जज’ सिंड्रोम: संपादकीय न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद (Nepotism) और इसके परिणामस्वरूप “कॉलेजियम बनाम सरकार” के गतिरोध पर चिंता व्यक्त करता है।
    • न्यायिक मानक विधेयक: न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों के निपटान के लिए ‘न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक’ के समान एक वैधानिक ढांचे की फिर से मांग की गई है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता” और “चेक्स एंड बैलेंसेज” (नियंत्रण और संतुलन)।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • पारदर्शिता बनाम स्वतंत्रता: लेख का तर्क है कि जवाबदेही स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं है; बल्कि, “बंद कमरे” वाला दृष्टिकोण अक्सर कार्यपालिका के हस्तक्षेप को आमंत्रित करता है।
    • आचार संहिता: कानूनी आवश्यकताओं से परे, संपादकीय सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरियों और सार्वजनिक व्यस्तताओं के संबंध में एक कड़ाई से लागू नैतिक संहिता की आवश्यकता पर जोर देता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी; आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)।

  • संदर्भ: नासा (NASA) द्वारा ‘ExoMiner++’ जारी करना, जो कि केपलर और TESS मिशन डेटा से ‘एक्सोप्लैनेट’ (सौर मंडल के बाहर के ग्रह) के उम्मीदवारों को सत्यापित करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक ओपन-सोर्स AI मॉडल है।
  • मुख्य बिंदु:
    • संकेतों में अंतर: AI मॉडल वास्तविक ‘ग्रहीय पारगमन’ (किसी तारे की चमक में गिरावट) को बाइनरी सितारों या बैकग्राउंड शोर जैसे झूठे संकेतों से अलग करने में मदद करता है।
    • व्याख्यात्मक AI (Explainable AI): “ब्लैक-बॉक्स” मॉडल के विपरीत, ExoMiner++ खगोलविदों को एक स्कोर और यह जानकारी प्रदान करता है कि उसने किसी सिग्नल को ग्रह के रूप में क्यों वर्गीकृत किया।
    • सफलता: इस मॉडल ने केपलर डेटा से 370 नए एक्सोप्लैनेट को पहले ही सत्यापित कर दिया है जो संदिग्ध संकेतों के कारण “वैज्ञानिक अधर” में फंसे हुए थे।
    • TESS और भविष्य: उपकरण ने TESS डेटा में 7,000 संभावित उम्मीदवारों की पहचान की है और भविष्य के नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप के लिए इसके महत्वपूर्ण होने की उम्मीद है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतरिक्ष अन्वेषण में AI के अनुप्रयोग”, “विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग” और “खगोल विज्ञान में वर्तमान विकास”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • डेटा का लोकतंत्रीकरण: सॉफ्टवेयर को गिटहब (GitHub) पर ओपन-सोर्स बनाकर, नासा वैश्विक शोधकर्ताओं को एल्गोरिदम को परिष्कृत करने और उन्हें विभिन्न डेटासेट पर लागू करने की अनुमति दे रहा है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे)।

  • संदर्भ: भारत की बदलती सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया की समीक्षा, क्योंकि डेंगू शहरी केंद्रों में एक मौसमी प्रकोप से बदलकर साल भर रहने वाले “स्थानिक खतरे” (Endemic threat) में बदल रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • वायरस की निरंतरता: वर्षा के बदलते पैटर्न और तेजी से अनियोजित शहरीकरण ने ‘एडिस एजिप्टी’ मच्छर के लिए स्थायी प्रजनन स्थल बना दिए हैं।
    • स्ट्रेन विविधता: डेंगू के सभी चार सीरोटाइप (DENV-1 से 4) का एक साथ प्रसार एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट के कारण ‘गंभीर डेंगू’ के जोखिम को बढ़ाता है।
    • टीकाकरण की बाधाएं: यद्यपि वैश्विक स्तर पर ‘क्यूडेंगा’ (Qdenga) जैसे टीके मौजूद हैं, भारत की विशिष्ट सीरोटाइप स्थिति के लिए स्थानीय नैदानिक परीक्षणों और एक सतर्क रोलआउट रणनीति की आवश्यकता है।
    • सामुदायिक उदासीनता: संपादकीय नोट करता है कि जल-निकासी (ठहरे हुए पानी को हटाना) सरकारी दृष्टिकोण के रूप में विफल रहा है, इसके लिए अब एक “जन आंदोलन” की आवश्यकता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन”, “शहरी नियोजन और स्वास्थ्य” और “महामारी विज्ञान के रुझान”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जीनोम अनुक्रमण: लेख विभिन्न स्ट्रेन की घातकता को ट्रैक करने और भविष्य के प्रसार पैटर्न की भविष्यवाणी करने के लिए जीनोमिक निगरानी बढ़ाने की वकालत करता है।
    • एकीकृत वाहक प्रबंधन: फॉगिंग (जो काफी हद तक दिखावटी है) से आगे बढ़ते हुए, ध्यान ‘वोल्बाचिया’ (Wolbachia) बैक्टीरिया से संक्रमित मच्छरों जैसे जैविक नियंत्रणों पर केंद्रित होना चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; गरीबी और विकास संबंधी मुद्दे)।

  • संदर्भ: हालिया FMCG बिक्री आंकड़ों का विश्लेषण जो लंबे समय के ठहराव के बाद ग्रामीण मांग में सुधार के संकेत दे रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • वॉल्यूम ग्रोथ: दो वर्षों में पहली बार ग्रामीण बाजारों ने वॉल्यूम ग्रोथ (बिक्री की मात्रा) में शहरी बाजारों को पीछे छोड़ दिया है, जिसका मुख्य कारण छोटे और सस्ते पैकेट (Lower-unit-price packs) हैं।
    • मजदूरी का अंतराल: वॉल्यूम में वृद्धि के बावजूद, वास्तविक ग्रामीण मजदूरी (महंगाई के लिए समायोजित) लगभग स्थिर बनी हुई है, जिससे पता चलता है कि खपत बढ़ती अमीरी के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।
    • मानसून का प्रभाव: यह सुधार “सामान्य” मानसून के पूर्वानुमान पर निर्भर है, जो कृषि आय को स्थिर करता है और खाद्य मुद्रास्फीति को कम करता है।
    • FMCG रणनीति: कंपनियां अब ग्रामीण मध्यम वर्ग की मांग को पकड़ने के लिए “ब्रिज पैक्स” (मध्यम आकार के उत्पादों) पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “ग्रामीण-शहरी आर्थिक विभाजन”, “उपभोग पैटर्न” और “FMCG क्षेत्र एक आर्थिक संकेतक के रूप में”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • K-आकार की रिकवरी: डेटा शहरी क्षेत्रों में प्रीमियम खपत और ग्रामीण क्षेत्रों में मूल्य-आधारित खपत के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है, जो बताता है कि सुधार सभी आय स्तरों पर समान नहीं है।
    • सुरक्षा के रूप में मनरेगा: संपादकीय जोर देता है कि निजी निवेश बढ़ने तक इस उपभोग की गति को बनाए रखने के लिए ग्रामीण रोजगार योजनाओं (MGNREGA) पर निरंतर सरकारी खर्च महत्वपूर्ण है।

संपादकीय विश्लेषण

02 जनवरी, 2026
GS-3 विज्ञान एवं तकनीक AI: नासा का ExoMiner++

ओपन-सोर्स AI ने 370 नए एक्सोप्लैनेट्स की पुष्टि की। ग्रहीय पारगमन और बैकग्राउंड शोर के बीच अंतर करने के लिए ‘एक्सप्लेनेबल AI’ की ओर बदलाव।

GS-2 स्वास्थ्य डेंगू की व्यापकता

डेंगू अब साल भर रहने वाला खतरा बन गया है। 4 सेरोटाइप के एक साथ सक्रिय होने से जोखिम चरम पर है। अब ध्यान ‘वोल्बाचिया’ जैसे जैविक नियंत्रणों पर होना चाहिए।

GS-3 अर्थव्यवस्था ग्रामीण उपभोग की नब्ज

ग्रामीण विकास शहरी क्षेत्रों से आगे है; हालाँकि, वास्तविक मजदूरी स्थिर बनी हुई है, जो दर्शाती है कि उपभोग धन के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।

संघवाद: राज्यपालों पर सरकारिया आयोग की सिफारिशें संवैधानिक विश्वास बहाल करने का महत्वपूर्ण मार्ग बनी हुई हैं।
स्पेस टेक: नैन्सी ग्रेस रोमन टेलीस्कोप डेटा में 7,000+ उम्मीदवारों की खोज के लिए ExoMiner++ महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था: MGNREGA ‘K-आकार की रिकवरी’ के बीच उपभोग को बनाए रखने में एक महत्वपूर्ण बफर के रूप में कार्य करता है।
न्यायपालिका: न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरियों हेतु स्पष्ट आचार संहिता की आवश्यकता है।
GS-4
कर्तव्य की नैतिकता
जवाबदेही बनाम स्वतंत्रता: पारदर्शिता स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं है। ‘बंद दरवाजे’ वाला दृष्टिकोण हस्तक्षेप को आमंत्रित करता है, जबकि सार्वजनिक व्यस्तताओं के संबंध में लागू नैतिक संहिता ‘न्याय के संरक्षकों’ की अखंडता को बनाए रखती है।

यहाँ भारत के प्रमुख ऊर्जा संसाधनों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। यह UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि यह भारत की आर्थिक और औद्योगिक नींव को समझने के लिए अनिवार्य है।

भारत में कोयला मुख्य रूप से गोंडवाना (Gondwana) और टर्शियरी (Tertiary) चट्टानों में पाया जाता है। मानचित्रण के लिए पूर्वी और मध्य भारत की “कोयला पेटियों” पर ध्यान केंद्रित करें।

  • गोंडवाना कोयला (98% भंडार): यह दामोदर, महानदी, सोन और गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है।
    • झरिया (झारखंड): भारत का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र; उच्च गुणवत्ता वाले ‘कोकिंग कोल’ के लिए प्रसिद्ध।
    • रानीगंज (पश्चिम बंगाल): भारत में खोली गई पहली कोयला खदान।
    • बोकारो और गिरिडीह (झारखंड): इस्पात उद्योग के लिए प्रमुख केंद्र।
    • कोरबा (छत्तीसगढ़): एक विशाल ‘ओपन-कास्ट’ (खुली खदान) खनन केंद्र।
    • सिंगरेनी (तेलंगाना): देश के दक्षिणी भाग का एकमात्र प्रमुख कोयला क्षेत्र।
  • टर्शियरी कोयला (लिग्नाइट):
    • नेवेली (तमिलनाडु): भारत में लिग्नाइट (भूरा कोयला) का सबसे महत्वपूर्ण भंडार।

पेट्रोलियम का मानचित्रण तटीय और उत्तरी क्षेत्रों की अवसादी चट्टानों (Sedimentary rocks) में स्थित ‘अपतटीय’ और ‘स्थलीय’ बेसिनों को कवर करता है।

  • पश्चिमी अपतटीय (Western Offshore):
    • मुंबई हाई: अरब सागर में स्थित भारत का सबसे बड़ा पेट्रोलियम क्षेत्र।
    • बसीन (Bassein): मुंबई हाई के दक्षिण में स्थित, प्राकृतिक गैस के लिए प्रसिद्ध।
  • पूर्वी स्थलीय/अपतटीय (Eastern Onshore/Offshore):
    • डिगबोई (असम): भारत का सबसे पुराना तेल कुआं (19वीं शताब्दी में खोदा गया)।
    • नहरकटिया और मोरन-हुग्रीजन (असम): उत्तर-पूर्व के अन्य प्रमुख तेल क्षेत्र।
    • KG बेसिन (कृष्णा-गोदावरी): बंगाल की खाड़ी में स्थित एक प्रमुख गहरा जल गैस भंडार।
  • उत्तर-पश्चिमी स्थलीय (North-Western Onshore):
    • अंकलेश्वर और कलोल (गुजरात): खंभात (Cambay) बेसिन के प्रमुख क्षेत्र।
    • बाड़मेर बेसिन (राजस्थान): यहाँ ‘मंगला’ तेल क्षेत्र स्थित है, जो भारत की सबसे बड़ी स्थलीय खोजों में से एक है।

परमाणु ऊर्जा का मानचित्रण आपके 2026 की तैयारी के “विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी” और “पर्यावरण” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।

संयंत्र का नामराज्यमहत्व
नरोराउत्तर प्रदेशगंगा नदी के पास उपजाऊ गंगा के मैदानों में स्थित।
रावतभाटाराजस्थानचंबल नदी पर राणा प्रताप सागर बांध के पास स्थित।
काकरापारगुजरातसूरत के पास औद्योगिक पट्टी में स्थित।
तारापुरमहाराष्ट्रभारत का पहला व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा केंद्र (1969 में स्थापित)।
कैगाकर्नाटकपश्चिमी घाट में स्थित; दक्षिणी ग्रिड के लिए महत्वपूर्ण।
कलपक्कम (MAPS)तमिलनाडुभारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी परमाणु ऊर्जा केंद्र।
कुडनकुलमतमिलनाडुभारत का सबसे बड़ी क्षमता वाला परमाणु संयंत्र (VVER रिएक्टर)।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे बड़ा कोयला क्षेत्रझरियाझारखंड
सबसे पुराना तेल क्षेत्रडिगबोईअसम
पहला परमाणु संयंत्रतारापुरमहाराष्ट्र
सबसे बड़ा परमाणु संयंत्रकुडनकुलमतमिलनाडु

ऊर्जा संसाधनों को याद रखने के लिए उन्हें प्रमुख औद्योगिक गलियारों (Industrial Corridors) के साथ जोड़कर देखें। उदाहरण के लिए, झारखंड-छत्तीसगढ़ बेल्ट भारत के ‘लौह-इस्पात’ उद्योग को ऊर्जा प्रदान करती है। मानचित्र पर इन केंद्रों की उत्तर-से-दक्षिण स्थिति को जरूर चिह्नित करें।

मानचित्रण विवरण

भारत के ऊर्जा संसाधन
कोयला क्षेत्र काला सोना

गोंडवाना संरचनाओं में केंद्रित। झरिया (JH) सबसे बड़ा क्षेत्र है; सिंगरेनी दक्षिण का एकमात्र प्रमुख क्षेत्र है।

पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन बेसिन

मुंबई हाई सबसे बड़ा क्षेत्र बना हुआ है; डिगबोई (AS) सबसे पुराना सक्रिय कुआँ है।

परमाणु ऊर्जा
रणनीतिक संयंत्र स्थल

प्रमुख स्थलों में तारापुर (MH), भारत का पहला स्टेशन, और कुडनकुलम (TN), उच्चतम क्षमता वाला संयंत्र शामिल हैं। नरौरा गंगा के मैदानों में एक प्रमुख उत्तरी केंद्र है।

अपतटीय एवं ऑनशोर बेसिन
प्राकृतिक गैस और ऑनशोर खोजें

KG बेसिन एक प्रमुख गहरे पानी का गैस भंडार है। ऑनशोर में, बाड़मेर बेसिन (RJ) मंगला क्षेत्र का घर है, जबकि अंकलेश्वर गुजरात में एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र के रूप में कार्य करता है।

टर्शियरी लिग्नाइट

सबसे महत्वपूर्ण भूरा कोयला (लिग्नाइट) भंडार नेवेली (तमिलनाडु) में स्थित है, जो दक्षिणी पावर ग्रिड के लिए आवश्यक है।

कोयला बेल्ट दामोदर और महानदी घाटियों का पता लगाएं।
हाइड्रोकार्बन खंभात बेसिन और डिगबोई को चिह्नित करें।
परमाणु ग्रिड कैगा (KT) और रावतभाटा (RJ) की पहचान करें।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: औद्योगिक विश्लेषण के लिए गोंडवाना कोयले और तटीय पेट्रोलियम बेसिन की भौगोलिक एकाग्रता को समझना आवश्यक है। भारत के ऊर्जा केंद्र की कल्पना करने के लिए मुंबई हाई-बसीन अक्ष को लोकेट करें।

Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 26, 2026

Dainik CSAT Quiz (26 January 2026)
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    Dainik GS Quiz in Hindi – January 26, 2026

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      Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 25, 2026

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          IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 24 जनवरी 2026 (Hindi)

          यह अध्याय “क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण“बताता है कि कैसे स्थानीय परंपराओं और उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों के विचारों के मेल-जोल से क्षेत्रीय पहचान विकसित हुई, जिसने अनूठी भाषाओं, कला रूपों और धार्मिक पद्धतियों को जन्म दिया।

          भाषा और क्षेत्र के बीच का संबंध लोगों का वर्णन करने का एक प्राथमिक तरीका है।

          • चेर शासक: नौवीं शताब्दी में वर्तमान केरल में स्थापित ‘महोदयपुरम्’ के चेर राज्य ने अपने अभिलेखों में मलयालम भाषा और लिपि का प्रयोग किया।
          • संस्कृत का प्रभाव: क्षेत्रीय भाषा का उपयोग करने के बावजूद, चेर शासकों ने संस्कृत परंपराओं से भी बहुत कुछ लिया। मलयालम के शुरुआती साहित्यिक कार्य (12वीं शताब्दी) संस्कृत के ऋणी थे।
          • मणिप्रवालम्: 14वीं शताब्दी का एक ग्रंथ, ‘लीलातिलकम’, ‘मणिप्रवालम्’ शैली में लिखा गया था। इसका शाब्दिक अर्थ है “हीरा और मूंगा”, जो दो भाषाओं—संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ प्रयोग को दर्शाता है।

          अन्य क्षेत्रों में, क्षेत्रीय संस्कृतियाँ धार्मिक परंपराओं के इर्द-गिर्द विकसित हुईं।

          • जगन्नाथ संप्रदाय: उड़ीसा के पुरी में, स्थानीय देवता को विष्णु का स्वरूप माना गया। आज भी स्थानीय जनजातीय लोग देवता की लकड़ी की प्रतिमा बनाते हैं।
          • राजनीतिक संरक्षण: 12वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजा अनंतवर्मन ने जगन्नाथ के लिए एक मंदिर बनवाया। बाद में, राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना राज्य देवता को अर्पित कर दिया और खुद को ईश्वर का “प्रतिनिधि” घोषित किया।
          • विजय और नियंत्रण: जैसे-जैसे मंदिर तीर्थयात्रा का केंद्र बना, इसका सामाजिक और राजनीतिक महत्व बढ़ गया। मुगलों, मराठों और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस मंदिर पर नियंत्रण करने की कोशिश की ताकि उनका शासन स्थानीय लोगों को स्वीकार्य हो सके।

          19वीं शताब्दी में, अंग्रेजों ने वर्तमान राजस्थान के क्षेत्र को ‘राजपूताना’ कहा।

          • शूरवीर आदर्श: ये अक्सर राजपूतों से जुड़े थे, जो हार स्वीकार करने के बजाय युद्ध के मैदान में मृत्यु को चुनना पसंद करते थे।
          • चारण-भाट (Minstrels): राजपूत नायकों की कहानियों को कविताओं और गीतों में दर्ज किया गया, जिन्हें चारण-भाटों द्वारा गाया जाता था। इन यादों को इसलिए सुरक्षित रखा गया ताकि दूसरे लोग भी उनके उदाहरण का अनुसरण करने के लिए प्रेरित हों।
          • सती प्रथा: महिलाएँ भी इन वीरतापूर्ण कहानियों का हिस्सा थीं। कभी-कभी वे सती प्रथा के माध्यम से अपने मृतक पतियों के साथ चिता पर आत्मदाह कर लेती थीं।

          विभिन्न क्षेत्रों में अनूठे नृत्य रूप विकसित हुए जिनकी जड़ें अक्सर धार्मिक थीं।

          • उत्पत्ति: कथक की शुरुआत उत्तर भारत के मंदिरों में ‘कथा’ (कहानी) सुनाने वाली एक जाति से हुई, जो इशारों और गानों के साथ प्रदर्शन करते थे।
          • विकास: भक्ति आंदोलन के प्रसार के साथ, कथक एक विशिष्ट नृत्य शैली के रूप में विकसित हुआ, जिसमें राधा और कृष्ण की कहानियों (रासलीला) को शामिल किया गया।
          • संरक्षण: मुगल सम्राटों के शासन में यह दरबार में प्रदर्शित किया जाने लगा और इसने अपने वर्तमान स्वरूप—तेज पद-संचालन और विस्तृत वेशभूषा—को प्राप्त किया। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण में यह कला बहुत फली-फूली।
          • शास्त्रीय दर्जा: हालांकि ब्रिटिश शासकों ने इसे नापसंद किया, लेकिन यह जीवित रहा और इसे भारत के छह “शास्त्रीय” नृत्यों में से एक के रूप में मान्यता मिली।

          एक अन्य क्षेत्रीय परंपरा लघुचित्रकला की थी—छोटे आकार के चित्र जो आमतौर पर कपड़े या कागज पर जलरंगों (Watercolors) से बनाए जाते थे।

          • मुगल प्रभाव: मुगल सम्राटों ने अत्यधिक कुशल चित्रकारों को संरक्षण दिया जो ऐतिहासिक वृत्तांतों और कविता वाली पांडुलिपियों को चित्रित करते थे।
          • क्षेत्रीय शैलियाँ: मुगल साम्राज्य के पतन के साथ, चित्रकार दक्कन और राजस्थान के राजपूत दरबारों जैसे क्षेत्रीय न्यायालयों में चले गए। उन्होंने पौराणिक कथाओं और कविता के विषयों पर आधारित विशिष्ट शैलियाँ विकसित कीं।
          • बसोहली और कांगड़ा: हिमालय की तलहटी (हिमाचल प्रदेश) में, ‘बसोहली’ नामक एक साहसी शैली विकसित हुई। बाद में, वैष्णव परंपराओं से प्रेरित ‘कांगड़ा शैली’ उभरी, जिसकी विशेषता कोमल रंग और काव्यात्मक विषय थे।

          बंगाली भाषा का विकास भाषाओं के जटिल मिश्रण को दर्शाता है।

          • भाषा: हालाँकि बंगाली संस्कृत से निकली है, लेकिन यह विकास के कई चरणों से गुज़री। फारसी, यूरोपीय और जनजातीय भाषाओं के शब्दों का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक बंगाली का हिस्सा बन गया।
          • साहित्य: शुरुआती बंगाली साहित्य में संस्कृत महाकाव्यों के अनुवाद और ‘नाथ’ साहित्य (जैसे मयनामती और गोपी चंद्र के गीत) शामिल हैं।
          • पीर और मंदिर: 16वीं शताब्दी से लोग दक्षिण-पूर्वी बंगाल में बसने लगे। समुदाय के नेताओं, जिन्हें अक्सर ‘पीर’ (आध्यात्मिक मार्गदर्शक) कहा जाता था, ने स्थिरता प्रदान की। बंगाल में मिट्टी और ईंटों के कई ‘टेराकोटा’ मंदिर बनाए गए।
          • भोजन के रूप में मछली: क्षेत्रीय संस्कृतियाँ अक्सर खान-पान की आदतों से प्रभावित होती हैं। चूंकि बंगाल एक नदीय मैदान है, इसलिए मछली और चावल मुख्य आहार बन गए। दिलचस्प बात यह है कि बंगाल में ब्राह्मणों को कुछ किस्मों की मछली खाने की अनुमति थी, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और मंदिरों की दीवारों पर मिलता है।
          1. मणिप्रवालम्: संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा के मेल वाली शैली।
          2. पीर: फारसी शब्द जिसका अर्थ ‘आध्यात्मिक मार्गदर्शक’ है।
          3. टेराकोटा: पकी हुई मिट्टी।
          4. चारण-भाट: वे लोग जो नायकों की प्रशंसा में गीत गाते थे।

          🎨 क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण

          🗣️ भाषा और क्षेत्र
          केरल की मलयालम भाषा 9वीं शताब्दी में उभरी। संस्कृत के साथ इसके मेल से मणिप्रवालम (हीरा और मूंगा) शैली का जन्म हुआ। क्षेत्रीय साहित्य अक्सर ऐसी ही भाषाई मिलावट से विकसित हुआ।
          🕍 धार्मिक संप्रदाय
          पुरी (ओडिशा) का जगन्नाथ संप्रदाय एक स्थानीय देवता को विष्णु का रूप मानने से विकसित हुआ। राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना पूरा राज्य देवता को अर्पित कर मंदिर को राजनीतिक केंद्र बना दिया।
          💃 नृत्य और वीरता
          कथक उत्तर भारतीय कथावाचकों से विकसित होकर वाजिद अली शाह के संरक्षण में शास्त्रीय नृत्य बना। वहीं, राजपूतों की वीरता को ‘चारण-भाटों’ ने गीतों के माध्यम से अमर कर दिया।
          🖌️ लघुचित्र (Miniature)
          क्षेत्रीय दरबारों में छोटी पेंटिंग्स फली-फूलीं। जहाँ बसोहली शैली साहसी थी, वहीं कांगड़ा शैली ने कोमल रंगों और वैष्णव परंपराओं के काव्यमय चित्रण से अपनी अलग पहचान बनाई।
          बंगाल का उदाहरण बंगाली संस्कृति में गहरा मिश्रण दिखता है; सामुदायिक नेता जिन्हें ‘पीर’ कहा जाता था, उन्होंने स्थिरता दी। यहाँ के टेराकोटा मंदिर और मछली खाने की परंपरा स्थानीय भूगोल का प्रभाव दर्शाती है।
          📂

          कक्षा-7 इतिहास अध्याय-2 PDF

          सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नये राजा और उनके राज्य

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          राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का प्रमुख होता है। जहाँ प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख (De Facto) होता है, वहीं राष्ट्रपति औपचारिक या नाममात्र का प्रमुख (De Jure) होता है।

          यह अनुच्छेद पद की स्थापना करता है। यह स्पष्ट कहता है: “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”

          • संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित होंगी।
          • वह इन शक्तियों का प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों (मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करेगा।
          • वह भारत के रक्षा बलों का सर्वोच्च सेनापति (Supreme Commander) होता है।

          नोट: राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यकारी (कानूनी रूप से प्रमुख) होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी (वास्तविक रूप से प्रमुख) होता है।

          राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) के सदस्यों द्वारा किया जाता है।

          1. संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य
          2. राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य
          3. केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (70वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया)।

          महत्वपूर्ण नोट: संसद और विधानसभाओं के मनोनीत (Nominated) सदस्य चुनाव में भाग नहीं लेते हैं।

          चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote – STV) के माध्यम से होता है। मतदान गुप्त मतदान (Secret Ballot) द्वारा किया जाता है।

          • एक विधायक (MLA) के मत का मूल्य: Value=Total Population of StateTotal Elected Members of State Legislative Assembly×11000
          • एक सांसद (MP) के मत का मूल्य: Value=Total Value of Votes of all MLAs of all StatesTotal Elected Members of Parliament
          • राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है।
          • वह उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप सकता है।
          • संविधान के उल्लंघन के लिए उसे महाभियोग (Impeachment) द्वारा हटाया जा सकता है।

          भारत का राष्ट्रपति कितनी भी बार पुनर्निर्वाचित हो सकता है (अमेरिका में अधिकतम दो बार की सीमा है)।

          राष्ट्रपति चुने जाने के लिए व्यक्ति को:

          1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
          2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर लेनी चाहिए।
          3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए योग्य होना चाहिए।
          4. केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के तहत किसी लाभ के पद (Office of Profit) पर नहीं होना चाहिए।
          • वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति निर्वाचित होता है, तो पद ग्रहण की तारीख से उसकी वह सीट रिक्त मानी जाएगी।
          • उसके कार्यकाल के दौरान उसकी उपलब्धियों और भत्तों को कम नहीं किया जा सकता।
          • वह बिना किराया दिए आधिकारिक निवास (राष्ट्रपति भवन) के उपयोग का हकदार होगा।
          • राष्ट्रपति को शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) दिलाते हैं। उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।
          • राष्ट्रपति “संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण” करने की शपथ लेता है।

          यह राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया है।

          • आधार: केवल “संविधान का उल्लंघन”
          • प्रक्रिया:
            1. 14 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य है।
            2. आरोप पत्र पर उस सदन के कम से कम 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
            3. प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्यता के 2/3 बहुमत से पारित होना चाहिए।
            4. दूसरा सदन आरोपों की जाँच करता है; यदि वह भी 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देता है, तो राष्ट्रपति को पद छोड़ना पड़ता है।
          • कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए राष्ट्रपति का चुनाव करा लेना चाहिए।
          • यदि रिक्ति मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने के कारण हुई है, तो चुनाव 6 महीने के भीतर होने चाहिए। इस अंतराल में उपराष्ट्रपति ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के रूप में कार्य करता है।
          अनुच्छेदकीवर्डयाद रखने की ट्रिक
          52पदभारत का एक राष्ट्रपति होगा।
          54निर्वाचनकौन वोट देगा (निर्वाचक मंडल)।
          56कार्यकाल5 वर्ष की अवधि।
          58योग्यताएं35 वर्ष + लोकसभा की योग्यता।
          60शपथCJI द्वारा दिलाई जाती है।
          61महाभियोगहटाने की प्रक्रिया (2/3 बहुमत)।
          62रिक्ति6 महीने के भीतर चुनाव अनिवार्य।

          🏛️ भारत का राष्ट्रपति (अनुच्छेद 52–62)

          👑 कार्यकारी प्रमुख (52-53)
          राष्ट्रपति भारत का राज्य प्रमुख और रक्षा बलों का सर्वोच्च सेनापति होता है। वह नाममात्र का प्रमुख (De Jure) है। संघ की सभी कार्यकारी शक्तियाँ उसमें निहित होती हैं।
          🗳️ निर्वाचक मंडल (54)
          संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य + राज्यों की विधानसभाओं (दिल्ली, पुडुचेरी और J&K सहित) के निर्वाचित सदस्य। मनोनीत सदस्य मतदान नहीं कर सकते।
          📜 योग्यताएं (58)
          वह भारत का नागरिक हो, न्यूनतम आयु 35 वर्ष हो, और लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो। वह किसी ‘लाभ के पद’ पर न हो।
          ⚖️ महाभियोग (61)
          हटाने का एकमात्र आधार: “संविधान का अतिक्रमण”। 14 दिन का नोटिस, 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर और दोनों सदनों में कुल सदस्यता के 2/3 बहुमत की आवश्यकता।
          📊 मतों का मूल्य (अनुच्छेद 55)
          चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व और एकल संक्रमणीय मत प्रणाली द्वारा होता है।
          विधायक (MLA) के मत का मूल्य = [राज्य की कुल जनसंख्या / निर्वाचित विधायकों की कुल संख्या] × [1/1000]
          सांसद (MP) के मत का मूल्य = [सभी राज्यों के विधायकों के मतों का कुल मूल्य / निर्वाचित सांसदों की कुल संख्या]
          ✍️ शपथ और रिक्ति (60-62)
          शथप: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा दिलाई जाती है। रिक्ति: चुनाव 6 महीने के भीतर होने चाहिए; तब तक उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करते हैं।
          ⏳ पदावधि (56-57)
          कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। वह कितनी भी बार पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र है। राष्ट्रपति अपना इस्तीफा उपराष्ट्रपति को संबोधित करते हैं।
          त्वरित सारांश
          54: निर्वाचन | 56: कार्यकाल | 58: योग्यता (35 वर्ष) | 60: शपथ (CJI) | 61: महाभियोग

          यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (24 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

          पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; संवैधानिक समायोजन; संघवाद; क्षेत्रीय संतुलन)।

          • संदर्भ: जनगणना 2027 के बाद होने वाले आगामी परिसीमन (Delimitation) अभ्यास का विश्लेषण, जो स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पुनर्गठन होगा।
          • मुख्य बिंदु:
            • संवैधानिक रोक (Freeze): जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले राज्यों को दंडित होने से बचाने के लिए 1976 से लोकसभा सीटों के वितरण को 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर रोक दिया गया है।
            • प्रजनन दर में अंतर: उत्तर भारत के राज्यों (यूपी, बिहार) में जनसंख्या वृद्धि जारी है, जबकि दक्षिण और पश्चिम के राज्यों ने प्रजनन दर में भारी कमी हासिल की है।
            • अनुमानित आंकड़े: 888 सदस्यों वाली विस्तारित लोकसभा में, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 151 और बिहार की 40 से बढ़कर 82 हो सकती हैं, जो सदन की कुल संख्या का 26% से अधिक होगा।
            • सापेक्ष प्रभाव में गिरावट: यद्यपि तमिलनाडु (39 से 53) और केरल (20 से 23) जैसे राज्यों की सीटों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन कुल सदन में उनकी प्रतिशत हिस्सेदारी काफी कम हो जाएगी।
          • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद की चुनौतियां”, “चुनावी प्रतिनिधित्व” और “शासन पर जनसंख्या नीति के प्रभाव”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • नैतिक विरोधाभास: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, सुशासन (जनसंख्या नियंत्रण) के लिए राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नुकसान के रूप में सजा क्यों मिलनी चाहिए?
            • भारित फॉर्मूला (Weighted Formula): एक प्रस्तावित समाधान ऐसा फॉर्मूला है जिसमें 80% महत्व जनसंख्या को और 20% विकास संकेतकों (साक्षरता, स्वास्थ्य) को दिया जाए।
            • राज्यसभा का सुदृढ़ीकरण: संघीय संतुलन बहाल करने के लिए राज्यसभा में अधिवास (Domicile) आवश्यकताओं को फिर से लागू करने और राज्यों के स्तर (बड़े, मध्यम, छोटे) के अनुसार प्रतिनिधित्व देने के सुझाव दिए गए हैं।

          पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध; रणनीतिक स्वायत्तता)।

          • संदर्भ: गणतंत्र दिवस और 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली में यूरोपीय संघ (EU) के नेतृत्व की आगामी यात्रा की तैयारी।
          • मुख्य बिंदु:
            • भू-राजनीतिक बीमा: 2007 से बातचीत के अधीन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब वैश्विक अनिश्चितता (अमेरिकी टैरिफ और चीन की आक्रामकता) के खिलाफ एक ‘बीमा पॉलिसी’ के रूप में देखा जा रहा है।
            • जलवायु इक्विटी मुद्दे: एक प्रमुख बाधा यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) है, जिसे भारत एक ‘गैर-टैरिफ बाधा’ मानता है जो निर्यात पर 20%-35% शुल्क लगा सकता है।
            • रक्षा साझेदारी: व्यापार के अलावा, एक प्रस्तावित सुरक्षा और रक्षा साझेदारी यूरोपीय संघ को भारत के बाजार तक और भारत को यूरोपीय उच्च तकनीक तक पहुंच प्रदान करेगी।
            • रणनीतिक स्वायत्तता: दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि संप्रभु विकल्प स्वतंत्र रहने चाहिए, जिसमें वाशिंगटन, मास्को या बीजिंग का ‘वीटो’ न हो।
          • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक संबंध”, “जलवायु वित्त/व्यापार नीति” और “वैश्विक बहुपक्षवाद”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • सह-उत्पादन के अवसर: भारत के लिए, यह साझेदारी हिंद महासागर में संयुक्त सैन्य अभ्यास और सह-उत्पादन के अवसर खोलकर ‘मेक इन इंडिया’ को पूरक बनाती है।
            • बहुध्रुवीय व्यवस्था: इस गठबंधन का उद्देश्य बहुपक्षवाद का एक नया अध्याय सह-निर्मित करना है जो लचीला और न्यायसंगत हो।

          पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य का विकास और प्रबंधन; गरीबी और भूख से संबंधित मुद्दे)।

          • संदर्भ: पश्चिम बंगाल में आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा मासिक वेतन ₹15,000 करने की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन।
          • मुख्य बिंदु:
            • दर्जे से वंचित: क्रमिक सरकारों ने श्रम कानूनों और स्थायी कर्मचारी लाभों से बचने के लिए इन आवश्यक श्रमिकों को ‘स्वयंसेवक’ (Volunteers) या ‘कार्यकर्ता’ (Activists) के रूप में वर्गीकृत किया है।
            • बजटीय कटौती: 2015 में ICDS बजट में कटौती की गई और 2018 में केंद्र ने कार्यकर्ताओं के वेतन में अपने योगदान को स्थिर (Freeze) कर दिया।
            • अंतर-राज्यीय असमानता: केंद्र के मानदेय में वृद्धि न होने के कारण, धनी राज्यों ने अपने बजट से अतिरिक्त भुगतान किया, जिससे वेतन में क्षेत्रीय असमानता पैदा हो गई है।
            • कानूनी वर्गीकरण: संपादकीय न्यूनतम मजदूरी और पेंशन सुनिश्चित करने के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ के तहत उन्हें ‘वैधानिक कर्मचारी’ के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने की मांग करता है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा”, “श्रम कानून सुधार” और “कल्याणकारी शासन”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • सामाजिक अनुबंध का उल्लंघन: राज्य ने अपने सबसे कमजोर श्रमिकों के साथ सामाजिक अनुबंध को तोड़ दिया है।
            • शोषणकारी ढांचा: मुख्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए इन पर निर्भर रहना और उन्हें उचित हक न देना जानबूझकर किया गया शोषण है।

          पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; राज्यपाल की भूमिका; केंद्र-राज्य संबंध)।

          • संदर्भ: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्षी शासित राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधानसभा से बहिर्गमन (Walkout) और नीतिगत भाषणों के चुनिंदा अंशों को पढ़ना।
          • मुख्य बिंदु:
            • अनुच्छेद 176 (1) का अधिदेश: संविधान निर्दिष्ट करता है कि राज्यपाल विधानमंडल को संबोधित “करेगा” (Shall); इसे एक कार्यकारी कार्य माना जाता है।
            • सीमित विवेकाधिकार: उच्चतम न्यायालय (जैसे नबाम रेबिया मामला) ने माना है कि राज्यपाल के पास पैराग्राफ छोड़ने या सरकारी नीति की आलोचना करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है।
            • सहायता और सलाह: राज्यपाल का भाषण राज्य मंत्रिमंडल की नीति को दर्शाता है, और राज्यपाल संवैधानिक रूप से उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य हैं।
          • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद विवाद”, “संवैधानिक पदाधिकारी” और “केंद्र-राज्य घर्षण”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • लोकतंत्र का प्रतीक: संबोधन जनता की निर्वाचित सरकार के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है; इसमें व्यवधान डालना “कर्तव्य से विमुख होना” माना जाता है।
            • संस्थागत पुनर्परिभाषा: राज्यपाल के पद की गरिमा को दलीय राजनीति से ऊपर बनाए रखने के लिए इस भूमिका को फिर से परिभाषित करने की मांग बढ़ रही है।

          पाठ्यक्रम: GS पेपर 1 (सामाजिक मुद्दे; प्रौद्योगिकी का प्रभाव) और GS पेपर 2 (शासन; नैतिकता)।

          • संदर्भ: केरल की एक दुखद घटना जहाँ एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में छेड़छाड़ का आरोप लगने के बाद आत्महत्या कर ली।
          • मुख्य बिंदु:
            • तत्काल न्याय: यह प्रकरण उजागर करता है कि कैसे सोशल मीडिया एक “युद्धक्षेत्र” बन गया है जहाँ जनमत न्यायाधीश और जूरी की भूमिका निभाता है।
            • पुलिस जाँच: बाद में सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयानों की समीक्षा में व्यक्ति के व्यवहार में “कुछ भी असामान्य या आपत्तिजनक नहीं” पाया गया।
            • कानूनी ग्रे ज़ोन: साइबर अपराध जांचकर्ताओं का कहना है कि बिना सहमति के सार्वजनिक स्थानों पर वीडियो बनाना और सार्वजनिक अपमान के लिए उनका उपयोग करना व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल नैतिकता”, “साइबर अपराध और कानून” और “डिजिटल युग में सामाजिक अनुबंध”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • विनाशकारी शक्ति: यह मामला “त्वरित और लापरवाह रील्स” के दौर में जवाबदेही, सहानुभूति और झूठे आरोपों के जोखिम पर असहज सवाल उठाता है।
            • सामान्यीकृत आघात: मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि सार्वजनिक अपमान के कारण मानसिक आघात के जवाब में जीवन समाप्त करना सामान्य होता जा रहा है।

          संपादकीय विश्लेषण

          24 जनवरी, 2026
          GS-2 राजव्यवस्था
          🗳️ परिसीमन: संघीय विरोधाभास
          2027 की जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन में यूपी की सीटें बढ़कर 151 हो सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों का प्रभाव कम होगा। मुद्दा: जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से दंडित करना। समाधान: जनसंख्या के साथ सुशासन (स्वास्थ्य/शिक्षा) को भी महत्व देना।
          GS-2 अंत. संबंध
          🌍 भारत-ईयू: रणनीतिक जोखिम निवारण
          वैश्विक अस्थिरता के बीच FTA “भू-राजनीतिक बीमा” का कार्य करेगा। मुख्य बाधा: ईयू का कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) जो भारतीय निर्यात पर 20-35% शुल्क लगाएगा। लक्ष्य: रक्षा साझेदारी के माध्यम से भारत को उच्च-तकनीक (High-tech) तक पहुंच प्रदान करना।
          GS-2 सामाजिक
          🏥 आशा (ASHA) कार्यकर्ता: गरिमा का अधिकार
          ₹15,000 मासिक वेतन के लिए विरोध “स्वयंसेवक” दर्जे की कानूनी खामी को उजागर करता है। आलोचना: श्रम कानूनों से बचने के लिए आवश्यक स्वास्थ्य कर्मियों को केवल कार्यकर्ता मानना। आवश्यकता: न्यूनतम वेतन हेतु सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत इनका वैधानिक वर्गीकरण।
          GS-2 राजव्यवस्था
          🏛️ राज्यपाल: संवैधानिक सीमाएं
          राज्यपालों द्वारा नीतिगत संबोधनों के अंशों को चयनात्मक रूप से पढ़ना अनुच्छेद 176(1) का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट (नबाम रेबिया) के अनुसार: राज्यपाल के पास कैबिनेट द्वारा अनुमोदित भाषण को अपनी इच्छा से बदलने का विवेक नहीं है।
          GS-1 समाज
          📱 सोशल मीडिया ट्रायल और भीड़ न्याय
          केरल की हालिया त्रासदी “त्वरित न्याय” के जोखिम को दर्शाती है। बिना संदर्भ के वायरल क्लिप्स के आधार पर ‘डिजिटल शेमिंग’ करना समाज में जज और जूरी की भूमिका ले रहा है। नैतिकता: अपमान के लिए बिना सहमति वीडियो बनाना अनुच्छेद 21 और निर्दोषता की उपधारणा का हनन है।
          त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):1971 जनगणना: वर्तमान लोकसभा सीटों का आधार (2026 के बाद पहली जनगणना तक स्थिर)। • CBAM: कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म – ईयू का प्रस्तावित जलवायु टैरिफ। • शमशेर सिंह केस: 1974 का फैसला जो राज्यपाल की शक्तियों को कैबिनेट की सलाह तक सीमित करता है।

          यहाँ भारत के प्रमुख समुद्री बंदरगाहों और रणनीतिक समुद्री मार्गों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। ये विषय UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये आर्थिक भूगोल को भू-राजनीतिक रणनीति (जैसे SAGAR पहल और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स) के साथ जोड़ते हैं।

          पश्चिमी तट अपनी प्राकृतिक बंदरगाह संरचनाओं के लिए जाना जाता है और यह मध्य पूर्व तथा यूरोप के साथ व्यापार का प्रवेश द्वार है।

          • कांडला (दीनदयाल बंदरगाह), गुजरात: यह एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal port) है और पेट्रोलियम व उर्वरक आयात का मुख्य केंद्र है। यह उत्तर-पश्चिमी भारत के औद्योगिक क्षेत्रों की सेवा करता है।
          • मुंबई बंदरगाह, महाराष्ट्र: भारत का सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त प्राकृतिक बंदरगाह
          • जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT), महाराष्ट्र: इसे ‘न्हावा शेवा’ के नाम से भी जाना जाता है; यह भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह है, जिसे मुंबई बंदरगाह के दबाव को कम करने के लिए विकसित किया गया था।
          • मर्मगाओ, गोवा: भारत का प्रमुख लौह अयस्क निर्यातक बंदरगाह।
          • न्यू मंगलुरु, कर्नाटक: कुद्रेमुख की खानों से लौह अयस्क के निर्यात का प्रबंधन करता है।
          • कोच्चि, केरल: यह विंलिंगडन द्वीप (Willingdon Island) पर वेम्बनाड झील के मुहाने पर स्थित है।

          पूर्वी तट डेल्टा संरचनाओं के लिए जाना जाता है और यह दक्षिण-पूर्व एशिया और सुदूर पूर्व के देशों के साथ व्यापार का प्रवेश द्वार है।

          • तूतूकोरिन (V.O. चिदंबरनार), तमिलनाडु: श्रीलंका और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों के लिए विभिन्न प्रकार के माल का प्रबंधन करता है।
          • चेन्नई, तमिलनाडु: पूर्वी तट के सबसे पुराने कृत्रिम बंदरगाहों में से एक।
          • एन्नौर (कामराजार बंदरगाह), तमिलनाडु: भारत का पहला कॉर्पोरेट बंदरगाह, जो चेन्नई के उत्तर में स्थित है।
          • विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश: भारत का सबसे गहरा स्थलसीमा से घिरा (Landlocked) और सुरक्षित बंदरगाह; जापान को लौह अयस्क निर्यात का मुख्य केंद्र।
          • पारादीप, ओडिशा: महानदी डेल्टा में स्थित; लौह अयस्क और कोयले के निर्यात में विशेषज्ञता।
          • कोलकाता-हल्दिया, पश्चिम बंगाल: यह हुगली नदी पर स्थित एक नदीय बंदरगाह (Riverine port) है। हल्दिया को भारी माल के प्रबंधन के लिए कोलकाता के एक सहायक बंदरगाह के रूप में विकसित किया गया था।

          इनका मानचित्रण “आंतरिक सुरक्षा” और “अंतर्राष्ट्रीय संबंध” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।

          विशेषता (Feature)सामरिक महत्व (Strategic Importance)मानचित्र की स्थिति (Mapping Location)
          6 डिग्री चैनलग्रेट निकोबार को सुमात्रा (इंडोनेशिया) से अलग करता है।इंदिरा पॉइंट के दक्षिण में
          पाक जलडमरूमध्यबंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी से जोड़ता है।तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच
          10 डिग्री चैनलअंडमान द्वीप समूह को निकोबार समूह से अलग करता है।10° उत्तरी अक्षांश रेखा
          9 डिग्री चैनलमिनिकॉय द्वीप को मुख्य लक्षद्वीप से अलग करता है।9° उत्तरी अक्षांश रेखा
          • NW-1: गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली (प्रयागराज से हल्दिया)।
          • NW-2: ब्रह्मपुत्र नदी (सादिया से धुबरी)।
          • NW-3: केरल में पश्चिमी तट नहर (कोट्टापुरम से कोल्लम)।
          श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
          सबसे गहरा बंदरगाहविशाखापत्तनमआंध्र प्रदेश
          पहला कॉर्पोरेट बंदरगाहएन्नौरतमिलनाडु
          सबसे बड़ा कंटेनर पोर्टJNPT (न्हावा शेवा)महाराष्ट्र
          नदीय बंदरगाहकोलकातापश्चिम बंगाल

          पश्चिमी और पूर्वी तट के बंदरगाहों को उनके उत्तर-से-दक्षिण क्रम में याद रखें। उदाहरण के लिए, पश्चिम में: कांडला → मुंबई → मर्मगाओ → मंगलुरु → कोच्चि। परीक्षाओं में अक्सर इनका सही भौगोलिक क्रम पूछा जाता है।

          समुद्री प्रवेश द्वार (Maritime Gateways)

          पश्चिमी तटरेखा
          ⚓ अरब सागर के बंदरगाह
          प्राकृतिक बंदरगाहों की प्रधानता वाला यह तट कांडला (ज्वारीय हब), मुंबई (सबसे व्यस्त प्राकृतिक पत्तन), और JNPT—भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह समेटे हुए है।
          अभ्यास: कोच्चि में विलिंगडन द्वीप को खोजें और न्यू मंगलौर तक कुद्रेमुख लौह अयस्क मार्ग की पहचान करें।
          पूर्वी तटरेखा
          🚢 डेल्टा क्षेत्र के प्रवेश द्वार
          दक्षिण-पूर्वी एशिया का प्रवेश द्वार, जिसमें कोलकाता-हल्दिया का नदीय बंदरगाह, चेन्नई का कृत्रिम बंदरगाह, और विशाखापत्तनम—भारत का सबसे गहरा भू-आबद्ध बंदरगाह शामिल है।
          अभ्यास: पारादीप को खोजने के लिए महानदी डेल्टा का पता लगाएं और भारत के पहले कॉर्पोरेट बंदरगाह, एन्नोर की पहचान करें।
          भू-राजनीति
          🌊 रणनीतिक चोक पॉइंट्स
          राष्ट्रीय सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग, जिसमें समुद्री चैनल और पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) शामिल हैं।
          विशेषता रणनीतिक महत्व स्थान
          6° चैनलनिकोबार को सुमात्रा से अलग करता हैइंदिरा पॉइंट के दक्षिण में
          पाक जलडमरूमध्यबंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी से जोड़ता हैतमिलनाडु और श्रीलंका के बीच
          10° चैनलअंडमान को निकोबार से अलग करता है10° उत्तरी अक्षांश
          अभ्यास: प्रयागराज से हल्दिया बंदरगाह तक राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (NW-1) के मार्ग को ट्रेस करें।
          समुद्री मैपिंग चेकलिस्ट
          श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
          सबसे गहरा बंदरगाहविशाखापत्तनमआंध्र प्रदेश
          कॉर्पोरेट बंदरगाहएन्नोर (कामराजर)तमिलनाडु
          सबसे बड़ा कंटेनर हबJNPT (न्हावा शेवा)महाराष्ट्र
          नदीय बंदरगाहकोलकाता बंदरगाहहुगली नदी, प. बंगाल

          Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 24, 2026

          Dainik CSAT Quiz (24 January 2026)
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            Dainik GS Quiz in Hindi – January 24, 2026

            Dainik GS Quiz (24 January 2026)
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              Dainik CSAT Quiz in Hindi – January 23, 2026

              Dainik CSAT Quiz (23 January 2026)
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                IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 23 जनवरी 2026 (Hindi)

                यह अध्याय “ईश्वर से अनुराग” आठवीं शताब्दी के बाद से विकसित हुए विभिन्न भक्ति और सूफी आंदोलनों की व्याख्या करता है, जिन्होंने ईश्वर के प्रति प्रेम और सामाजिक भेदभाव के त्याग पर जोर दिया।

                बड़े राज्यों के उदय से पहले लोग स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते थे। जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़े, नए विचार पैदा हुए:

                • पुनर्जन्म का चक्र: यह विश्वास व्यापक हो गया कि सभी जीव अपने अच्छे और बुरे कर्मों के आधार पर जन्म और पुनर्जन्म के चक्रों से गुजरते हैं।
                • सामाजिक असमानता: यह विचार कि सामाजिक विशेषाधिकार किसी “कुलीन” परिवार या “ऊँची” जाति में जन्म लेने से मिलते हैं, बहुत प्रबल हो गया।
                • व्यक्तिगत भक्ति: कई लोग सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए बुद्ध या जैनों की शिक्षाओं की ओर मुड़े। अन्य लोग ‘भक्ति’ के विचार से आकर्षित हुए, जिसमें एक परमेश्वर तक प्रेम और समर्पण के माध्यम से पहुँचा जा सकता था। यह विचार ‘भगवद्गीता’ में लोकप्रिय हुआ।

                सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच, दक्षिण में नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व नयनारों और अलवारों ने किया।

                • संत: नयनार (शिव के भक्त) और अलवार (विष्णु के भक्त) सभी जातियों से आए थे, जिनमें पुलैयार और पनार जैसी “अस्पृश्य” मानी जाने वाली जातियों के लोग भी शामिल थे।
                • दर्शन: उन्होंने मुक्ति के मार्ग के रूप में शिव या विष्णु के प्रति गहरे प्रेम का उपदेश दिया। वे विभिन्न गाँवों में घूमते थे और स्थानीय मंदिरों में स्थापित देवताओं की प्रशंसा में सुंदर कविताएँ रचते थे।
                • मंदिर निर्माण: दसवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच, चोल और पांड्य राजाओं ने उन धार्मिक स्थलों पर भव्य मंदिर बनवाए जहाँ इन संत-कवियों ने यात्रा की थी, जिससे भक्ति परंपरा और मंदिर पूजा के बीच संबंध मजबूत हुए।
                • शंकर (8वीं शताब्दी): केरल में जन्मे शंकर ‘अद्वैतवाद’ के समर्थक थे। इसके अनुसार जीवात्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं। उन्होंने सिखाया कि संसार एक ‘माया’ (भ्रम) है और उन्होंने ज्ञान के लिए संन्यास का मार्ग अपनाने का उपदेश दिया।
                • रामानुज (11वीं शताब्दी): तमिलनाडु में जन्मे रामानुज अलवार संतों से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार मुक्ति प्राप्त करने का सबसे अच्छा साधन विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति भाव रखना है। उन्होंने ‘विशिष्टाद्वैत’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार आत्मा, परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलग सत्ता बनाए रखती है।

                वीरशैव आंदोलन की शुरुआत बसवन्ना और उनके साथियों (अल्लम प्रभु और अक्कमहादेवी) ने 12वीं शताब्दी के मध्य में कर्नाटक में की थी।

                • मान्यताएँ: उन्होंने सभी मनुष्यों की समानता के लिए और जाति व महिलाओं के प्रति व्यवहार के बारे में ब्राह्मणवादी विचारों के विरुद्ध तर्क दिया।
                • कर्मकांड: वे सभी प्रकार के कर्मकांडों और मूर्ति पूजा के विरोधी थे।

                तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संत-कवियों तथा सखूबाई जैसी महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

                • विट्ठल भक्ति: यह परंपरा पंढरपुर में भगवान विट्ठल (विष्णु का एक रूप) की पूजा पर केंद्रित थी।
                • कर्मकांडों का त्याग: इन संतों ने सभी प्रकार के कर्मकांडों, पवित्रता के बाहरी प्रदर्शन और जन्म पर आधारित सामाजिक अंतरों को खारिज कर दिया। उन्होंने अपने परिवारों के साथ रहने, रोजी-रोटी कमाने और जरूरतमंद साथी मनुष्यों की सेवा करने को प्राथमिकता दी।

                इस काल में कई धार्मिक समूहों ने पारंपरिक धर्म और सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की।

                • मुक्ति का मार्ग: उन्होंने संसार का त्याग करने (संन्यास) की वकालत की और माना कि निराकार परम सत्य का चिंतन और ध्यान ही मुक्ति का मार्ग है।
                • अभ्यास: इसके लिए उन्होंने योगासन, प्राणायाम और ध्यान जैसी क्रियाओं के माध्यम से मन और शरीर को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया।

                सूफी मुसलमान रहस्यवादी थे। उन्होंने बाहरी धार्मिकता को खारिज कर दिया और ईश्वर के प्रति प्रेम व भक्ति तथा सभी मनुष्यों के प्रति दया भाव पर बल दिया।

                • ईश्वर से मिलन: सूफियों का मानना था कि दुनिया को देखने के लिए दिल को प्रशिक्षित किया जा सकता है। उन्होंने ज़िक्र (नाम का जाप), चिंतन और समा (गाना) जैसे प्रशिक्षण के विस्तृत तरीके विकसित किए।
                • सिलसिले: सूफी गुरुओं की वंशावली को सिलसिला कहा जाता था। भारत में चिश्ती सिलसिला सबसे प्रभावशाली था, जिसमें ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया जैसे महान शिक्षक हुए।

                तेरहवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की एक शक्तिशाली लहर आई।

                • कबीर: सबसे प्रभावशाली संतों में से एक, उनका पालन-पोषण वाराणसी के एक मुस्लिम बुनकर (जुलाहा) परिवार में हुआ था। उनके विचार ‘साखी’ और ‘पद’ नामक छंदों के संग्रह में मिलते हैं। वे निराकार परमेश्वर में विश्वास करते थे और उन्होंने जाति व्यवस्था व बाहरी पूजा के सभी रूपों को खारिज कर दिया।
                • बाबा गुरु नानक (1469–1539): उन्होंने करतारपुर में एक केंद्र स्थापित किया। उनकी शिक्षाओं ने एक ईश्वर की उपासना और ईमानदारी से जीवन जीने पर जोर दिया। उन्होंने अपनी शिक्षाओं के सार के लिए नाम, दान और इस्रान शब्दों का प्रयोग किया। उनके भजनों को ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित किया गया है।
                • मीराबाई: मेवाड़ के राजघराने की एक राजपूत राजकुमारी, वे ‘अस्पृश्य’ मानी जाने वाली जाति के संत रविदास की शिष्या बनीं। उनके गीतों ने “ऊँची” जातियों के मानदंडों को खुली चुनौती दी और वे आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हुए।
                1. अद्वैतवाद: जीवात्मा और परमात्मा के एक होने का सिद्धांत।
                2. विशिष्टाद्वैत: आत्मा के परमात्मा से मिलने के बाद भी अपनी पहचान बनाए रखने का सिद्धांत।
                3. खानकाह: सूफी संस्था जहाँ सूफी संत अक्सर रहते थे और चर्चा करते थे।
                4. तांडा: बंजारों का समूह।

                🪕 ईश्वर से अनुराग

                🕉️ दक्षिण में भक्ति
                इसका नेतृत्व नयनारों (शिव भक्त) और अलवारों (विष्णु भक्त) ने किया, जिन्होंने जातिवाद को नकारा। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद (परमात्मा से एकता) और रामानुज ने भक्ति को मोक्ष का मार्ग बताया।
                🕌 सूफ़ी रहस्यवाद
                सूफ़ी संतों ने ईश्वर के प्रति प्रेम और दया पर जोर दिया। वे ज़िक्र (नाम का जाप) और समा (गायन) का उपयोग करते थे। निज़ामुद्दीन औलिया जैसे संतों के कारण चिश्ती सिलसिला भारत में अत्यधिक प्रभावी हुआ।
                🧘 विद्रोही विचारक
                कर्नाटक के वीरशैवों ने समानता के लिए संघर्ष किया। नाथपंथी और योगियों जैसे समूहों ने संसार का त्याग कर योगासनों और प्राणायाम के माध्यम से निराकार परम सत्य के ध्यान की वकालत की।
                📖 उत्तर भारत के संत
                कबीर ने बाहरी आडंबरों को ठुकराया। बाबा गुरु नानक ने करतारपुर केंद्र बनाया और ‘नाम, दान और इस्रान’ की शिक्षा दी। राजपूत राजकुमारी मीराबाई ने अपने भजनों से उच्च जातियों के नियमों को चुनौती दी।
                साझा संदेश मध्यकालीन संतों ने कर्मकांडों और सामाजिक भेदभाव को त्याग कर साधारण लोगों के बीच रहने और क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी भक्ति व्यक्त करने को प्राथमिकता दी।
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                कक्षा-7 इतिहास अध्याय-8 PDF

                सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: ईश्वर से अनुराग

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                यहाँ भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) के अंतर्गत मौलिक अधिकार (FR) एवं नीति निदेशक तत्वों (DPSP) की तुलना और मौलिक कर्तव्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

                संविधान के भाग III (FR) और भाग IV (DPSP) के बीच का संबंध समय के साथ उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है। जहाँ मौलिक अधिकार व्यक्तिगत और वाद-योग्य हैं, वहीं DPSP समाजवादी और अवाद-योग्य हैं।

                विशेषतामौलिक अधिकार (भाग III)नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
                प्रकृतिनकारात्मक (राज्य को कुछ करने से रोकना)।सकारात्मक (राज्य को कुछ करने का निर्देश देना)।
                न्यायिकतावाद-योग्य (अदालत द्वारा प्रवर्तनीय)।अवाद-योग्य (अदालत द्वारा अप्रवर्तनीय)।
                उद्देश्यराजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना।सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना।
                कानूनी स्थितिसामान्यतः DPSP से वरिष्ठ।सामान्यतः FR के अधीनस्थ (Subordinate)।
                1. चंपकम दोराईराजन मामला (1951): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं। यदि DPSP को लागू करने के लिए बनाया गया कोई कानून FR का उल्लंघन करता है, तो वह कानून शून्य होगा। DPSP को FR के “सहायक” के रूप में काम करना चाहिए।
                2. गोलकनाथ मामला (1967): कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार “पवित्र” हैं और DPSP के कार्यान्वयन के लिए उन्हें कम नहीं किया जा सकता।
                3. 25वाँ संशोधन अधिनियम (1971): संसद ने अनुच्छेद 31C पेश किया, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे अनुच्छेद 14 या 19 का उल्लंघन करते हैं।
                4. मिनर्वा मिल्स मामला (1980): सुप्रीम कोर्ट ने “सामंजस्य का सिद्धांत” (Doctrine of Harmony) स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान भाग III और भाग IV के बीच संतुलन की आधारशिला पर टिका है। एक को दूसरे पर पूर्ण प्राथमिकता देना संविधान की मूल संरचना को बिगाड़ देगा।

                मौलिक कर्तव्य मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे। इन्हें आपातकाल के दौरान नागरिकों को यह याद दिलाने के लिए जोड़ा गया था कि अधिकारों के साथ-साथ उनके कुछ कर्तव्य भी हैं।

                • संदर्भ: सरकार ने राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक कर्तव्यों पर सिफारिशें देने के लिए इस समिति का गठन किया।
                • परिणाम: इसकी सिफारिशों के आधार पर 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1976) पारित किया गया।
                • नया जोड़: संविधान में एक नया भाग IV-A और एक अकेला अनुच्छेद 51A जोड़ा गया।
                • स्रोत: यह पूर्व सोवियत संघ (USSR – अब रूस) के संविधान से प्रेरित है।

                मूल रूप से 10 कर्तव्य थे; 11वाँ बाद में जोड़ा गया।

                1. संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना।
                2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखना और उनका पालन करना।
                3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना और उसे अक्षुण्ण रखना।
                4. देश की रक्षा करना और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना।
                5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करना; महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना।
                6. हमारी सामासिक संस्कृति (Composite Culture) की समृद्ध विरासत का महत्व समझना और उसका परिरक्षण करना।
                7. प्राकृतिक पर्यावरण (वन, झील, नदी और वन्यजीव) की रक्षा करना और उसका संवर्धन करना।
                8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना।
                9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना और हिंसा से दूर रहना।
                10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना।
                11. 6 से 14 वर्ष तक की आयु के अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करना (इसे 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया)।
                कर्तव्य का केंद्रयाद रखने के लिए कीवर्ड
                ध्वज/गानसम्मान (Respect)
                स्वतंत्रता संग्रामआदर्श (Ideals)
                संप्रभुताएकता की रक्षा
                राष्ट्रीय सेवादेश की रक्षा
                भाईचारासमरसता
                संस्कृतिविरासत (Heritage)
                पर्यावरणवन्यजीव/नदियाँ
                विज्ञानवैज्ञानिक दृष्टिकोण
                संपत्तिसार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा
                उत्कृष्टतासर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
                बच्चों की शिक्षा6-14 वर्ष की आयु (86वां संशोधन)
                • अवाद-योग्य (Non-Justiciable): DPSP की तरह, मौलिक कर्तव्य भी कानून द्वारा तब तक लागू नहीं किए जा सकते जब तक कि संसद उनके लिए कोई विशेष कानून न बनाए (जैसे राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम)।
                • केवल नागरिकों के लिए: कुछ मौलिक अधिकारों के विपरीत (जो विदेशियों पर भी लागू होते हैं), मौलिक कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों के लिए हैं।

                ⚖️ FR और DPSP में संतुलन

                विशेषता मूल अधिकार (भाग III) निदेशक तत्व (भाग IV)
                प्रकृतिनकारात्मक (राज्य पर रोक)सकारात्मक (राज्य को निर्देश)
                न्यायिकतावाद-योग्य (अदालत द्वारा प्रवर्तनीय)गैर-वादयोग्य
                लक्ष्यराजनीतिक लोकतंत्रसामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र
                प्राथमिकतासामान्यतः उच्च और पवित्रमूल अधिकारों के पूरक
                📜 गोलकनाथ मामला (1967)
                सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूल अधिकार अलंघनीय हैं और निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए भी इनमें कटौती नहीं की जा सकती।
                🤝 मिनर्वा मिल्स (1980)
                कोर्ट ने सामंजस्य का सिद्धांत दिया। संविधान भाग III और भाग IV के बीच संतुलन की बुनियाद पर खड़ा है।
                विधिक तथ्य अनुच्छेद 31C के अनुसार, अनु. 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कानून अनु. 14 या 19 का उल्लंघन होने पर भी मान्य होंगे।

                🇮🇳 मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A)

                ✍️ उत्पत्ति और स्रोत
                42वें संशोधन (1976) द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़े गए। ये पूर्व सोवियत संघ (USSR) से प्रेरित हैं। भाग IV-A बनाया गया।
                🛡️ दायरा और प्रकृति
                DPSP की तरह ये भी गैर-वादयोग्य हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात: ये केवल नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशियों पर नहीं।
                कर्तव्य का क्षेत्र मुख्य शब्द (Keyword) याद करने की ट्रिक
                ध्वज/राष्ट्रगानसम्मानसंवैधानिक प्रतीकों का आदर
                एकता/अखंडतासंप्रभुताभारत के मानचित्र की रक्षा
                भाईचारासमरसतास्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथा त्यागना
                पर्यावरणवन्यजीवझील, नदी और वनों का संरक्षण
                ज्ञानवैज्ञानिक दृष्टिकोणजांच और सुधार की भावना
                संपत्तिसार्वजनिक संपत्तिहिंसा से दूर रहना
                शिक्षा6–14 वर्ष आयु86वें संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया
                मुख्य नोट वर्तमान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं। 11वां कर्तव्य (शिक्षा का अवसर) शिक्षा के अधिकार (अनु. 21A) के साथ तालमेल के लिए जोड़ा गया था।

                यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (23 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

                पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

                • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने भारत निर्वाचन आयोग (EC) से सवाल किया है कि क्या मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के लिए “अवैध सीमा पार आप्रवासन” (Illegal cross-border immigration) को स्पष्ट रूप से कारण बताया गया था, जिसके कारण लगभग 6.5 करोड़ नाम हटा दिए गए।
                • मुख्य बिंदु:
                  • अस्पष्ट कारण: पीठ ने पाया कि SIR अधिसूचना में “बार-बार होने वाले प्रवास” (Frequent migration) को एक कारण बताया गया था, लेकिन 2003 के नागरिकता अधिनियम संशोधनों के तहत नागरिकता सत्यापन से जोड़ने वाला कोई “स्पष्ट उल्लेख” नहीं था।
                  • न्यायिक स्पष्टीकरण: कोर्ट ने एक स्पष्ट अंतर बताया: भारत के भीतर “प्रवास” (Migration) एक मौलिक स्वतंत्रता है और हमेशा वैध है, जबकि “अवैध आप्रवासन” (Illegal immigration) में अंतर-देशीय आवाजाही शामिल है।
                  • नागरिकों पर बोझ: कोर्ट ने उन लाखों लोगों (जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता और बुजुर्ग भी शामिल हैं) को होने वाले “अत्यधिक तनाव” को रेखांकित किया, जिन्हें अपनी पहचान साबित करने के लिए भौतिक सुनवाइयों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
                  • विवेकाधिकार की सीमाएँ: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि निर्वाचन आयोग के पास व्यापक विवेकाधिकार हैं, लेकिन वह निर्धारित मानदंडों से “पूरी तरह मुक्त” नहीं है और उसे निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए।
                • UPSC प्रासंगिकता: “निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ”, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” और “प्रशासनिक कार्यों की न्यायिक समीक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • अवैध प्रवासी की परिभाषा: 2003 में पेश की गई इस अवधारणा के अनुसार किसी मतदाता के माता-पिता दोनों का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है; आयोग का तर्क है कि अनुच्छेद 324 उन्हें इसे सत्यापित करने का अधिकार देता है।
                  • प्रक्रियात्मक सुधार: उत्तर प्रदेश के मतदाता अब निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर दस्तावेज अपलोड करके या अधिकृत प्रतिनिधियों के माध्यम से भौतिक सुनवाई से बच सकते हैं।
                  • मताधिकार की पवित्रता: संपादकीय चेतावनी देता है कि वास्तविक मतदाताओं को ‘फॉर्म 6’ (नए मतदाताओं के लिए) के माध्यम से फिर से पंजीकरण करने के लिए मजबूर करना तर्कहीन है और उनके मतदान के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

                पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

                • संदर्भ: भारत 2026 में अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) को एक एकीकृत जलवायु लचीलापन और हरित विकास रणनीति पर नेतृत्व करने का अवसर प्रदान करता है।
                • मुख्य बिंदु:
                  • बहुपक्षवाद को स्थिर करना: एक ऐसी दुनिया में जहाँ सहयोगी बहुपक्षवाद (जैसे अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का हटना) तनाव में है, भारत ब्रिक्स को जलवायु कार्रवाई के लिए एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
                  • भू-राजनीतिक संतुलन: भारत को ब्रिक्स की “पश्चिम-विरोधी” छवि और अमेरिका के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करनी होगी।
                  • साझा चिंताएँ: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता और तटीय जोखिम जैसे जलवायु प्रभाव ब्रिक्स के सभी सदस्यों (जैसे ब्राजील, रूस, भारत, चीन) के लिए साझा चुनौतियाँ हैं।
                  • विस्तार का प्रभाव: मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और यूएई के शामिल होने के बाद ब्रिक्स अब वैश्विक जीडीपी का 40% और वैश्विक व्यापार का 26% प्रतिनिधित्व करता है।
                • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु परिवर्तन में वैश्विक नेतृत्व”, “भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति” और “दक्षिण-दक्षिण सहयोग”।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • जलवायु वित्त: विश्लेषण में सुझाव दिया गया है कि वैश्विक जलवायु वित्त को गति देने के लिए विश्व बैंक और आईएमएफ प्रमुखों को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल किया जाना चाहिए।
                  • चीनी महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला: ब्रिक्स के भीतर एक मजबूत भारतीय हरित एजेंडा पर्यावरण नेतृत्व की वैश्विक दौड़ में चीन को संतुलित करने का काम करेगा।
                  • राजनयिक चतुराई: भारत को वैश्विक तेल भू-राजनीति और टैरिफ खतरों के बीच वाशिंगटन के साथ संबंधों को सुचारू रखते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ के हितों को आगे बढ़ाना होगा।

                पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; द्विपक्षीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव)।

                • संदर्भ: दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” (BoP) की उद्घाटन बैठक से भारत की अनुपस्थिति का विश्लेषण।
                • मुख्य बिंदु:
                  • BoP की संरचना: इस बोर्ड का लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरना है, जिसके अध्यक्ष ट्रंप हैं। इसमें गाजा संघर्ष को सुलझाने के लक्ष्य के बावजूद फिलिस्तीनी नेतृत्व को शामिल नहीं किया गया है।
                  • सदस्यता के स्तर: एक विवादास्पद “दो-स्तरीय” प्रणाली के तहत $1 बिलियन की “फीस” देकर स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव दिया गया है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है।
                  • क्षेत्रीय दबाव: पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई के इसमें शामिल होने से भारत पर भी भागीदारी का दबाव है, बावजूद इसके कि इसकी संरचना स्पष्ट नहीं है।
                  • कश्मीर का जोखिम: भारत के लिए एक बड़ा “खतरा” यह है कि ट्रंप कश्मीर विवाद को भी अपनी इस शांति योजना में शामिल कर सकते हैं।
                • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध”, “पश्चिम एशिया भू-राजनीति” और “बहुपक्षवाद की चुनौतियां” के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • रणनीतिक स्वायत्तता: संपादकीय सलाह देता है कि भारत को केवल “पीछे छूट जाने के डर” या अमेरिका की नाराजगी के डर से कार्य नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने भागीदारों से परामर्श करना चाहिए।
                  • संयुक्त राष्ट्र के समानांतर: जहाँ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गाजा प्रस्ताव के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है, BoP एकतरफा रूप से संयुक्त राष्ट्र के कार्यों को प्रतिस्थापित करता प्रतीत हो रहा है।

                पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन)।

                • संदर्भ: उत्तराखंड के पारिस्थितिक रूप से नाजुक और आपदा-प्रवण क्षेत्रों में चार धाम सड़क परियोजना के लिए लगभग 7,000 देवदार (Deodar) के पेड़ों को काटने के फैसले का आलोचनात्मक विश्लेषण।
                • मुख्य बिंदु:
                  • दोषपूर्ण मानक: यह परियोजना ‘डबल लेन विद पेव्ड शोल्डर’ (DL-PS) मानक का उपयोग करती है, जो अस्थिर ढलानों पर भी 12 मीटर की चौड़ाई अनिवार्य बनाती है, जहाँ बड़े निर्माण की मनाही होनी चाहिए।
                  • पारिस्थितिक क्षति: पेड़ों के नुकसान के अलावा, सड़क चौड़ी करने के कारण 700 किलोमीटर के दायरे में 800 से अधिक नए सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र बन गए हैं।
                  • जड़ प्रणाली के लाभ: देवदार के जंगल ढलानों को स्थिर करते हैं, भूस्खलन रोकते हैं और हिमस्खलन (Avalanches) के खिलाफ प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं।
                  • जल गुणवत्ता: ये जंगल अपनी लकड़ी और छाल में मौजूद सूक्ष्मजीव-रोधी गुणों के कारण गंगा के पानी की गुणवत्ता भी बनाए रखते हैं।
                • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)”, “सतत पर्वतीय विकास” और “हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSHE)”।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • नियमों का उल्लंघन: परियोजना का कार्यान्वयन इस बात का उदाहरण है कि निर्माण कैसे नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें व्यापक EIA की अनदेखी और खड़ी पहाड़ियों की कटाई शामिल है।
                  • जोखिमों में वृद्धि: जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्र वैश्विक औसत से 50% अधिक तेज़ी से गर्म हो रहे हैं, जो वनों की कटाई के साथ मिलकर विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन को बढ़ावा देता है।
                  • स्थानीय प्रतिक्रिया: बार-बार होने वाले भूस्खलन और क्षति के कारण स्थानीय लोग इस ‘ऑल-वेदर रोड’ को मज़ाक में “ऑल-पैदल” रोड कहने लगे हैं।

                पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; समावेशी विकास)।

                • संदर्भ: घरेलू वित्त आंकड़ों का विश्लेषण, जो बताता है कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता तेजी से ‘घरेलू कर्ज’ (Household Debt) पर निर्भर होती जा रही है।
                • मुख्य बिंदु:
                  • बढ़ता कर्ज: घरेलू कर्ज 2021 में जीडीपी के 36% से बढ़कर मार्च 2025 तक 41.3% हो गया है; हालाँकि यह अन्य देशों की तुलना में कम है, लेकिन यह घरेलू आय के तनाव को छिपा देता है।
                  • उपभोग के लिए कर्ज: क्रेडिट (कर्ज) का उपयोग तेजी से आय-व्यय के अंतर को पाटने के लिए किया जा रहा है, न कि संपत्ति निर्माण के लिए। यह स्थिर वास्तविक आय वृद्धि का विकल्प बनता जा रहा है।
                  • बचत में कमी: शुद्ध वित्तीय बचत में भारी उतार-चढ़ाव आया है, जो इंगित करता है कि बचत का एक बड़ा हिस्सा नए कर्ज को चुकाने में जा रहा है।
                  • जोखिम का हस्तांतरण: राजकोषीय नीतियां जो पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देती हैं और राजस्व व्यय को सीमित करती हैं, वे अनजाने में आर्थिक जोखिम को राज्य से हटाकर परिवारों पर स्थानांतरित कर रही हैं।
                • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय नीति”, “मौद्रिक नीति का संचरण” और “समाज कल्याण अर्थशास्त्र” के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • संवेदनशील समूह: कम आय वाले समूहों के लिए रोजगार के अवसरों की कमी और आय में वृद्धि न होना, मध्यम ऋण स्तर को भी भेद्यता (Vulnerability) का एक बड़ा स्रोत बना देता है।
                  • बजट 2026 का कार्य: आगामी बजट के लिए मुख्य कार्य लोगों की ‘खर्च करने योग्य आय’ (Disposable Income) बढ़ाकर और श्रम-प्रधान रोजगार पैदा करके संतुलन बहाल करना है।

                संपादकीय विश्लेषण

                23 जनवरी, 2026
                GS-2 राजव्यवस्था
                🗳️ चुनाव आयोग पर SC: विवेक बनाम संवैधानिक स्वतंत्रता
                सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से SIR के दौरान 6.5 करोड़ नामों के विलोपन पर सवाल किए। पीठ ने “आंतरिक प्रवासन” (वैध) और “अवैध आप्रवासन” के बीच अंतर स्पष्ट किया। आलोचना: वास्तविक मतदाताओं को “अत्यधिक दबाव” में नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करना मताधिकार की पवित्रता का उल्लंघन है।
                GS-2 अंत. संबंध
                🌍 ब्रिक्स 2026: भारत का हरित नेतृत्व
                भारत 2026 में ब्रिक्स की मेजबानी के लिए तैयार है, जो वैश्विक GDP के 40% का प्रतिनिधित्व करता है। रणनीति: NDB के माध्यम से जलवायु वित्त और ग्लोबल साउथ के लचीलेपन के लिए ब्रिक्स को एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित करना, जबकि अमेरिकी टैरिफ खतरों व चीनी महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना।
                GS-2 अंत. संबंध
                🏳️ बोर्ड ऑफ पीस: $1 बिलियन की सदस्यता
                दावोस में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिद्वंद्वी के रूप में ट्रम्प के “बोर्ड ऑफ पीस” (BoP) का परिचय, जहाँ स्थायी सीटों के लिए $1 बिलियन शुल्क का प्रस्ताव है। भारत के लिए जोखिम: BoP के जनादेश का कश्मीर विवाद तक विस्तार होने की संभावना, जो संयुक्त राष्ट्र के कार्यों को दरकिनार कर सकता है।
                GS-3 पर्यावरण
                🌲 हिमालयी पारिस्थितिकी विनाश: चारधाम की लागत
                सड़क चौड़ीकरण (DL-PS मानक) के लिए 7,000 देवदार के पेड़ों की कटाई को मंजूरी। पारिस्थितिक परिणाम: 800 सक्रिय भूस्खलन क्षेत्रों का निर्माण। आलोचना: बुनियादी ढांचा परियोजनाएं NMSHE (2014) के जनादेशों की अनदेखी कर रही हैं, जिससे “ऑल-वेदर सड़कें” असुरक्षित गलियारों में बदल रही हैं।
                GS-3 अर्थव्यवस्था
                📉 घरेलू ऋण: उपभोग का जाल
                घरेलू ऋण बढ़कर GDP का 41.3% हो गया है। चिंता: ऋण का उपयोग संपत्ति निर्माण के बजाय आय-व्यय के अंतर को पाटने के लिए किया जा रहा है। परिणाम: व्यापक आर्थिक जोखिम राज्य से परिवारों की ओर स्थानांतरित हो रहा है, जिससे वित्तीय बचत कम हो रही है।
                त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):DL-PS मानक: पेव्ड शोल्डर के साथ डबल लेन (12 मीटर चौड़ाई) – संवेदनशील हिमालयी ढलानों के लिए अनुपयुक्त। • धारा 21(3): लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम – चुनाव आयोग को विवेक प्रदान करता है, लेकिन यह कानून के शासन के अधीन है। • NMSHE: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन – वर्तमान पेड़ों की कटाई से इसे क्षति पहुँच रही है।

                यहाँ भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों (National Parks) और वन्यजीव अभयारण्यों का भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

                ये उद्यान उच्च-ऊंचाई वाली वनस्पतियों और ‘हिम तेंदुआ’ (Snow Leopard) व ‘कस्तूरी मृग’ (Musk Deer) जैसे जीवों के लिए जाने जाते हैं।

                • दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान (जम्मू-कश्मीर): यह ‘हंगुल’ (कश्मीरी स्टैग) के लिए प्रसिद्ध है।
                • हेमिस राष्ट्रीय उद्यान (लद्दाख): यह भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है और हिम तेंदुओं का वैश्विक गढ़ माना जाता है।
                • फूलों की घाटी और नंदा देवी (उत्तराखंड): यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, जो अपने अल्पाइन घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध हैं।
                • जिम कॉर्बेट (उत्तराखंड): यह भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान है, जो शिवालिक की तलहटी में स्थित है।
                • ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (हिमाचल प्रदेश): यह ‘वेस्टर्न ट्रैगोपन’ और ‘हिमालयी तहर’ के लिए जाना जाता है।

                यहाँ का ध्यान शुष्क पर्णपाती वनों और रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के अनुकूल प्रजातियों पर होता है।

                • गिर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात): यह एशियाई शेरों (Asiatic Lion) का दुनिया में एकमात्र प्राकृतिक आवास है।
                • डेजर्ट नेशनल पार्क (राजस्थान): यह ‘गोडावण’ (Great Indian Bustard) के अंतिम बचे हुए घरों में से एक है।
                • रणथंभौर और सरिस्का (राजस्थान): अरावली और विंध्य श्रेणियों में स्थित प्रमुख बाघ अभयारण्य (Tiger Reserves)।
                • समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (कच्छ की खाड़ी): यह भारत का पहला समुद्री पार्क है, जो प्रवाल भित्तियों (Corals) और ‘डगोंग’ (समुद्री गाय) के लिए प्रसिद्ध है।

                ये क्षेत्र “महा-शाकाहारी” (Mega-herbivore) संरक्षण और उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के मानचित्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं।

                • काजीरंगा (असम): ‘एक सींग वाले गेंडे’ के लिए विश्व प्रसिद्ध।
                • मानस (असम): भूटान की सीमा पर स्थित एक बाघ अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।
                • केइबुल लामजाओ (मणिपुर): यह दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है (लोकटक झील पर स्थित), जो ‘संगाई’ (ब्रो-एंटलर्ड हिरण) का घर है।
                • नामदफा (अरुणाचल प्रदेश): यह एकमात्र ऐसा पार्क है जहाँ बड़ी बिल्ली की चार प्रजातियाँ (बाघ, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और क्लाउडेड तेंदुआ) पाई जाती हैं।
                • सुंदरवन (पश्चिम बंगाल): दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन; रॉयल बंगाल टाइगर के लिए प्रसिद्ध।

                ये उद्यान पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार में हाथी और बाघ संरक्षण के मुख्य केंद्र हैं।

                उद्यान का नामराज्यमुख्य मैपिंग विशेषता
                कान्हा और बांधवगढ़मध्य प्रदेश“टाइगर स्टेट” का हृदय स्थल; कान्हा ‘बारहसिंगा’ के लिए प्रसिद्ध है।
                बांदीपुर और नागरहोलकर्नाटकनीलगिरी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का हिस्सा; यहाँ हाथियों का उच्च घनत्व है।
                पेरियारकेरलएक कृत्रिम झील के चारों ओर स्थित हाथी और बाघ अभयारण्य।
                शांत घाटी (Silent Valley)केरलनीलगिरी में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन; ‘शेर जैसी पूंछ वाले मकाक’ का घर।
                श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
                सबसे बड़ा उद्यानहेमिसलद्दाख
                एकमात्र तैरता उद्यानकेइबुल लामजाओमणिपुर
                शेरों का प्राकृतिक आवासगिरगुजरात
                गेंडे का गढ़काजीरंगाअसम

                परीक्षा में अक्सर इन उद्यानों को उत्तर से दक्षिण या पूर्व से पश्चिम के क्रम में लगाने के लिए पूछा जाता है। मानचित्र पर इनकी सापेक्ष स्थिति को ध्यान से देखें (जैसे: जिम कॉर्बेट उत्तर में है और पेरियार दक्षिण में)।

                वन्यजीव परिदृश्य (Wildlife Horizons)

                हिमालयी क्षेत्र
                🏔️ उच्च तुंगता शरणस्थल
                लद्दाख के हेमिस (भारत का सबसे बड़ा पार्क) से लेकर फूलों की घाटी तक विस्तृत। ये क्षेत्र हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग और हिमालयी तहर का संरक्षण करते हैं।
                अभ्यास: जम्मू-कश्मीर में दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान को खोजें और इसे लुप्तप्राय ‘हंगुल’ के मुख्य आवास के रूप में पहचानें।
                शुष्क एवं समुद्री
                🦁 शुष्क पर्णपाती गढ़
                अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र; जैसे गीर (एशियाई शेरों का अंतिम निवास) और मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान, जो ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोडावण) का घर है।
                अभ्यास: कच्छ की खाड़ी में समुद्री राष्ट्रीय उद्यान खोजें—जो भारत का पहला समर्पित समुद्री अभयारण्य है।
                पूर्वी वर्षा-पट्टी
                🦏 मेगा-शाकाहारी हब
                महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि और वर्षावन; जिनमें काजीरंगा (एक सींग वाला गैंडा) और केइबुल लामजाओ—लोकतक झील पर स्थित विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान शामिल है।
                अभ्यास: पश्चिम बंगाल डेल्टा में सुंदरबन को लोकेट करें, जो बाघों के लिए विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है।
                दक्षिण एवं मध्य भारत के रत्न
                उद्यान का नाम राज्य मुख्य मैपिंग विशेषता
                कान्हा एवं बांधवगढ़म.प्र.बाघ हृदयस्थल; ‘बारहसिंगा’ के लिए प्रसिद्ध
                बांदीपुर एवं नागरहोलकर्नाटकनीलगिरि बायोस्फीयर का हिस्सा; हाथियों का घनत्व
                पेरियारकेरलकृत्रिम झील के चारों ओर स्थित बाघ अभयारण्य
                शांत घाटी (Silent Valley)केरलउष्णकटिबंधीय सदाबहार; शेर जैसी पूंछ वाला बंदर
                त्वरित मानचित्रण चेकलिस्ट
                श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
                सबसे बड़ा उद्यानहेमिस नेशनल पार्कलद्दाख (उच्च तुंगता)
                एकमात्र तैरता उद्यानकेइबुल लामजाओमणिपुर (लोकतक झील)
                शेरों का प्राकृतिक आवासगीर नेशनल पार्कगुजरात (सौराष्ट्र)
                गैंडों का गढ़काजीरंगा नेशनल पार्कअसम (ब्रह्मपुत्र तट)

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