Dainik CSAT Quiz in Hindi – February 9, 2026

Dainik CSAT Quiz (9 February 2026)
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          IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 7 फ़रवरी 2026 (Hindi)

          यह अध्याय “राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन : 1870 के दशक से 1947 तक” संगठित राष्ट्रवाद के उदय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन की त्रासदी तक के भारतीय संघर्ष का व्यापक इतिहास प्रस्तुत करता है।

          1870 और 1880 के दशक तक भारतीयों के बीच एक नई राजनीतिक चेतना पैदा हो चुकी थी। लोग यह महसूस करने लगे थे कि भारत के संसाधनों और यहाँ के लोगों के जीवन पर अंग्रेजों का नियंत्रण है। जब तक यह नियंत्रण खत्म नहीं होता, भारत यहाँ के लोगों का नहीं हो सकता।

          • प्रारंभिक संस्थाएँ: 1850 के बाद कई राजनीतिक संगठन अस्तित्व में आए, जैसे— पुणे सार्वजनिक सभा, इंडियन एसोसिएशन, मद्रास महाजन सभा और बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन। इनका नेतृत्व मुख्य रूप से अंग्रेजी शिक्षित पेशेवरों (जैसे वकील) द्वारा किया गया।
          • कांग्रेस की स्थापना: ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना दिसंबर 1885 में बंबई (मुंबई) में हुई। इसमें देशभर के 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
          • प्रारंभिक नेतृत्व: शुरुआती नेताओं में दादाभाई नौरोजी (जिन्हें ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है), फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और रोमेश चंद्र दत्त शामिल थे। नौरोजी उस समय लंदन में रहते थे और ब्रिटिश संसद के सदस्य भी थे।
          • नरमपंथी मांगें (Moderates): अपने पहले बीस वर्षों में कांग्रेस “नरमपंथी” रही। उन्होंने सरकार में भारतीयों को अधिक जगह देने, विधान परिषदों को अधिक शक्तिशाली बनाने और सिविल सेवा परीक्षा भारत में भी आयोजित करने की मांग की। उन्होंने भेदभावपूर्ण ‘आर्म्स एक्ट’ को निरस्त करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी मांग की।
          • कट्टरपंथी नेता: 1890 के दशक तक विपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) जैसे नेताओं ने नरमपंथियों की “प्रार्थना की राजनीति” की आलोचना शुरू कर दी। उन्होंने आत्मनिर्भरता और रचनात्मक कार्यों पर जोर दिया।
          • तिलक का नारा: तिलक ने प्रसिद्ध नारा दिया— “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा!”
          • बंगाल विभाजन (1905): वायसराय कर्जन ने “प्रशासनिक सुविधा” का बहाना बनाकर बंगाल का विभाजन कर दिया। वास्तविक उद्देश्य बंगाली राजनेताओं के प्रभाव को कम करना और जनता को बांटना था।
          • स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: इस विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। इसने ब्रिटिश शासन का विरोध किया, भारतीय शिक्षा और उद्योगों को बढ़ावा दिया और ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार का आह्वान किया।

          महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, जहाँ उन्होंने नस्लभेदी प्रतिबंधों के खिलाफ अहिंसक आंदोलनों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था।

          • प्रारंभिक अभियान: भारत आने के बाद पहले साल गांधीजी ने पूरे देश का दौरा किया। बाद में उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद के स्थानीय आंदोलनों का नेतृत्व किया।
          • रौलट एक्ट (1919): इस कानून के जरिए सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने की शक्ति मिल गई।
          • सत्याग्रह: गांधीजी ने इस कानून के खिलाफ ‘अपमान और प्रार्थना’ दिवस और हड़ताल का आह्वान किया। यह अंग्रेजों के खिलाफ पहला अखिल भारतीय संघर्ष था।
          • जलियाँवाला बाग हत्याकांड: बैसाखी के दिन अमृतसर में जनरल डायर द्वारा किए गए नरसंहार के खिलाफ पूरे देश में आक्रोश फैल गया। इसके विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि वापस कर दी।
          • खिलाफत आंदोलन: मोहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में तुर्की के खलीफा के सम्मान की रक्षा के लिए यह आंदोलन शुरू हुआ।
          • असहयोग आंदोलन (1920): गांधीजी ने खिलाफत और स्वराज की मांग को जोड़कर एक विशाल आंदोलन शुरू किया। भारतीयों ने सरकारी स्कूलों, अदालतों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया।
          • आंदोलन का अंत: 1922 में चौरी-चौरा की घटना (जहाँ भीड़ ने एक पुलिस थाने को जला दिया था और 22 पुलिसकर्मी मारे गए थे) के बाद गांधीजी ने अचानक आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे हिंसा के सख्त खिलाफ थे।

          1920 के दशक के मध्य के बाद, गाँवों में रचनात्मक कार्यों और नए राजनीतिक बदलावों के कारण राष्ट्रीय आंदोलन को और गति मिली।

          • साइमन कमीशन (1927): भारत के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने के लिए इंग्लैंड से एक आयोग भेजा गया, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे भारत में इसका विरोध “साइमन गो बैक” के नारों के साथ हुआ।
          • पूर्ण स्वराज (1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित किया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
          • नमक मार्च (1930): गांधीजी ने साबरमती से दांडी तक की यात्रा की ताकि नमक कानून को तोड़ा जा सके। नमक पर राज्य का एकाधिकार था और एक बुनियादी ज़रूरत पर टैक्स लगाना गांधीजी को अन्यायपूर्ण लगा।
          • 1935 का अधिनियम: भारत सरकार अधिनियम 1935 ने ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ प्रदान की। 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रांतों में सरकार बनाई।

          संघर्ष का अंतिम चरण द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ।

          • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया। अंग्रेजों ने भीषण दमन किया, हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया, लेकिन विद्रोह पूरे देश में फैल गया।
          • आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA): सुभाष चंद्र बोस ने बाहरी सहायता से भारत को स्वतंत्र कराने के लिए आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की।
          • वार्ता का दौर: युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ बातचीत शुरू की। लेकिन लीग मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग पर अड़ी रही।

          स्वतंत्रता की खुशी देश के विभाजन की हिंसा के कारण फीकी पड़ गई।

          • कूटनीति की विफलता: 1946 का ‘कैबिनेट मिशन’ एक एकीकृत भारत के ढांचे पर सहमति बनाने में विफल रहा। इसके बाद मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ (Direct Action Day) का आह्वान किया।
          • विभाजन (1947): अंततः भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन देश भारत और पाकिस्तान में बंट गया।
          • मानवीय क्षति: विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। हज़ारों महिलाओं को अकल्पनीय अत्याचारों का सामना करना पड़ा।
          1. 1885: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना।
          2. 1905: बंगाल का विभाजन।
          3. 1915: गांधीजी का भारत आगमन।
          4. 1919: रौलट सत्याग्रह और जलियाँवाला बाग।
          5. 1930: दांडी यात्रा (सविनय अवज्ञा आंदोलन)।
          6. 1942: भारत छोड़ो आंदोलन।
          7. 1947: भारत की स्वतंत्रता और विभाजन।
          NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
          अध्याय – 11

          राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन: 1870 के दशक से 1947 तक

          उदय
          1885: 72 प्रतिनिधियों के साथ बॉम्बे में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन; प्रारंभिक नेतृत्व ‘मध्यमार्गी’ था।
          गरम दल: लाल-बाल-पाल ने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया; तिलक ने नारा दिया, “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!”
          स्वदेशी
          1905: बंगाल के विभाजन ने स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया, जिसने ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की वकालत की।
          गांधीवादी युग और स्वतंत्रता का मार्ग
          आगमन (1915): गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे; रॉलेट सत्याग्रह (1919) के रूप में पहले अखिल भारतीय संघर्ष का नेतृत्व किया।
          असहयोग: गांधी ने खिलाफत और स्वराज की मांगों को मिलाया (1920) लेकिन चौरी-चौरा की घटना (1922) के बाद इसे वापस ले लिया।
          सविनय अवज्ञा: नेहरू (1929) के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रखा गया। 1930 में गांधी ने दांडी में नमक कानून तोड़ा।
          भारत छोड़ो (1942): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान “करो या मरो” के नारे के साथ शुरू हुआ, जिससे व्यापक जन-आंदोलन हुआ।
          विभाजन (1947): स्वतंत्रता प्राप्त हुई लेकिन यह विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी के साथ आई।

          रॉलेट एक्ट

          1919 का ‘काला कानून’ जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया।

          दांडी मार्च

          एक बुनियादी जरूरत पर राज्य के एकाधिकार को तोड़ने के लिए दांडी तक 240 मील की यात्रा।

          आज़ाद हिंद फ़ौज

          सुभाष चंद्र बोस द्वारा फिर से संगठित की गई भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA)।

          राष्ट्र की आत्मा
          राष्ट्रीय आंदोलन जनचेतना की एक यात्रा थी। इसने औपनिवेशिक प्रांतों के समूह को एक एकीकृत राष्ट्र में बदल दिया, जिसने अहिंसा और निरंतर संघर्ष के माध्यम से आत्मनिर्णय के अपने अधिकार को पुनः प्राप्त किया।

          संसदीय समितियाँ संसद की “आँख और कान” कहलाती हैं। चूंकि संसद एक विशाल निकाय है और उसके पास समय सीमित होता है, इसलिए वह प्रत्येक विधायी और कार्यकारी कार्रवाई की विस्तार से जाँच नहीं कर सकती। यह कार्य समितियों को सौंपा जाता है, जो दलीय राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष रूप से कार्य करती हैं।

          समितियाँ दो प्रकार की होती हैं:

          1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees): ये स्थायी प्रकृति की होती हैं और प्रत्येक वर्ष पुनर्गठित की जाती हैं।
          2. तदर्थ समितियाँ (Ad Hoc Committees): ये अस्थायी होती हैं, जिन्हें किसी विशिष्ट कार्य के लिए बनाया जाता है और कार्य पूरा होने पर इन्हें भंग कर दिया जाता है।

          यह अनुभाग परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

          • स्थापना: पहली बार 1921 में (भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत) गठित की गई।
          • संरचना: इसमें कुल 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)।
          • कार्यकाल: 1 वर्ष।
          • भूमिका: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के ऑडिट रिपोर्टों की जाँच करना।
          • मुख्य विशेषता: कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता। 1967 से यह परंपरा रही है कि इस समिति का अध्यक्ष आमतौर पर विपक्ष से होता है।
          • याद रखने की ट्रिक: इसे प्राकलन समिति की “जुड़वां बहन” कहा जाता है।
          • स्थापना: जॉन मथाई की सिफारिश पर (1950)।
          • संरचना: इसमें कुल 30 सदस्य होते हैं (सभी 30 सदस्य केवल लोकसभा से होते हैं)।
          • विशेष नोट: इसमें राज्यसभा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता।
          • भूमिका: सार्वजनिक व्यय में ‘मितव्ययिता’ (Economy) के सुझाव देना। इसे अक्सर ‘सतत मितव्ययिता समिति’ (Continuous Economy Committee) कहा जाता है।
          • मुख्य विशेषता: यह संसद की सबसे बड़ी समिति है।
          • स्थापना: कृष्णा मेनन समिति की सिफारिश पर (1964)।
          • संरचना: इसमें 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)।
          • भूमिका: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) की रिपोर्ट और खातों की जाँच करना।
          • कुल संख्या: वर्तमान में ऐसी 24 समितियाँ हैं।
          • संरचना: प्रत्येक समिति में 31 सदस्य होते हैं (21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से)।
          • भूमिका: इनका मुख्य कार्य कार्यपालिका की संसद के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से लोकसभा में मतदान से पहले ‘अनुदान की माँगों’ की विस्तृत जाँच करना।
          समितिउद्देश्य
          कार्य सलाहकार समिति (Business Advisory Committee)सदन के कार्यक्रम और समय-सारणी को विनियमित करती है।
          अधीनस्थ विधान संबंधी समिति (Subordinate Legislation)यह जाँच करती है कि कार्यपालिका अपनी “नियम और उपविधि” बनाने की शक्ति का प्रयोग संसद द्वारा दी गई सीमाओं के भीतर कर रही है या नहीं।
          आचार समिति (Ethics Committee)सदस्यों के दुर्व्यवहार के मामलों की जाँच करके अनुशासन और मर्यादा बनाए रखती है।
          विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee)सदन या उसके सदस्यों के “विशेषाधिकार हनन” के मामलों की जाँच करती है।
          विशेषतालोक लेखा समिति (PAC)प्राकलन समितिसार्वजनिक उपक्रम समिति
          सदस्य संख्या22 (15 LS + 7 RS)30 (केवल लोकसभा)22 (15 LS + 7 RS)
          अध्यक्षआमतौर पर विपक्ष सेआमतौर पर सत्ता पक्ष सेलोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त
          मुख्य कार्यखर्च होने के बाद जाँच (Post-mortem)कार्यक्षमता और बचत के सुझाव देनाPSUs का ऑडिट करना
          CAG से संबंधCAG के साथ मिलकर कार्य करती हैकोई प्रत्यक्ष संबंध नहींPSUs पर CAG की रिपोर्ट जाँचती है

          हमेशा याद रखें कि प्राकलन समिति ही एकमात्र ऐसी वित्तीय समिति है जिसमें राज्यसभा का कोई भी सदस्य शामिल नहीं होता है। इसके अलावा, इन तीनों वित्तीय समितियों में किसी भी मंत्री को सदस्य के रूप में नहीं चुना जा सकता।

          संसदीय निगरानी • “आँख और कान”
          स्थायी और वित्तीय समितियाँ

          लोकतंत्र के समीक्षक

          लोक लेखा समिति (PAC)
          1921 में स्थापित। 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा)। CAG रिपोर्टों की जाँच करके व्यय की “शव-परीक्षा” (post-mortem) करती है।
          विभागीय समितियाँ (DRSCs)
          31 सदस्यों वाली 24 विभागीय समितियाँ (21 लोकसभा, 10 राज्यसभा)। अनुदानों की जाँच के माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं।
          प्राकलन समिति (1950)
          संरचना: 30 सदस्य, सभी केवल लोकसभा से। यह सबसे बड़ी संसदीय समिति है।
          उद्देश्य: इसे ‘सतत मितव्ययिता समिति’ के रूप में जाना जाता है; यह सार्वजनिक व्यय में दक्षता और बचत के सुझाव देती है।
          सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU)
          संरचना: 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा)। दक्षता सुनिश्चित करने के लिए PSUs के खातों और संबंधित CAG रिपोर्टों की जाँच करती है।

          कार्य मंत्रणा समिति

          सदन के कार्यक्रम और समय सारणी को विनियमित करती है। इसकी अध्यक्षता अध्यक्ष/सभापति करते हैं।

          अधीनस्थ विधान

          यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका संसद द्वारा सौंपे गए अधिकारों की सीमा के भीतर ही नियम और उपनियम बनाए।

          आचार एवं विशेषाधिकार

          सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए सदस्यों के दुराचार और “विशेषाधिकार हनन” के मामलों की जाँच करती है।

          गैर-पक्षपाती
          ढाल
          संसदीय समितियाँ एक ‘लघु-संसद’ के रूप में कार्य करती हैं जहाँ सदस्य दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करते हैं। विशेष रूप से, एक मंत्री को PAC, प्राकलन या COPU में नहीं चुना जा सकता। 1967 से, PAC का अध्यक्ष पारंपरिक रूप से विपक्ष से होता है, जो सरकार के वित्तीय निर्णयों का निष्पक्ष ऑडिट सुनिश्चित करता है।

          यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (7 फ़रवरी, 2026) दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

          • संदर्भ: 5 फरवरी को मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स में एक अवैध ‘रैट-होल’ कोयला खदान में हुए विस्फोट में कम से कम 18 श्रमिकों की मृत्यु हो गई (बाद में यह संख्या बढ़कर 25 हो गई)। यह घटना शासन की विफलता और न्यायिक प्रतिबंधों के निष्प्रभावी होने को उजागर करती है।
          • मुख्य बिंदु:
            • प्रणालीगत विफलता: यह त्रासदी इस बात की “कठोर याद दिलाती है” कि अदालती निगरानी (जैसे 2014 का नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) प्रतिबंध) प्रभावी राज्य शासन का विकल्प नहीं हो सकती।
            • परिचालन संबंधी मानदंड: रैट-होल खनन इसलिए जारी है क्योंकि इसमें न्यूनतम निवेश की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें इंजीनियर द्वारा निर्मित छत और दीवारों की सुरक्षा का अभाव होता है, जिससे खदान धंसने की घटनाएं बार-बार होती हैं।
            • जवाबदेही का अभाव: भूमि के स्वामित्व का विखंडन और निजी मालिकाना हक खदान संचालकों को श्रमिकों को औपचारिक रिकॉर्ड से बाहर रखने और दुर्घटनाओं की कम रिपोर्टिंग करने की अनुमति देते हैं।
            • आपूर्ति श्रृंखला की सफाई (Laundering): अवैध कोयले को बिचौलियों के माध्यम से वैध बाजारों में आसानी से मिला दिया जाता है, जिससे नीलामी वाले कोयले और अवैध कोयले के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरणीय शासन”, “पूर्वोत्तर भारत की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां” और “सतत खनन नीति” के लिए अनिवार्य।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • निवारक के रूप में तकनीक: संपादकीय अवैध परिवहन की लागत बढ़ाने के लिए कोयला ले जाने वाले वाहनों के लिए अनिवार्य GPS ट्रैकिंग, ड्रोन गश्त और उपग्रह चित्रों के उपयोग की वकालत करता है।
            • विकल्पों की आवश्यकता: विकल्प प्रदान किए बिना प्रतिबंध अक्सर विफल हो जाते हैं; राज्य को खनन क्षेत्र के मजदूरों को खपाने के लिए बागवानी, पर्यटन और लघु विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए ऋण और बाजार संपर्क प्रदान करना चाहिए।
            • प्रशासनिक सुधार: स्थानीय संरक्षण (Patronage) का मुकाबला करने के लिए, संपादकीय संवेदनशील जिलों में प्रशासनिक पदों के रोटेशन और सामुदायिक निगरानी को प्रोत्साहित करने के लिए स्थानीय निकायों के साथ जुर्माने की राशि साझा करने का सुझाव देता है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; जलवायु परिवर्तन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

          • संदर्भ: COP30 के बाद वैश्विक जलवायु वार्ताओं में आई संरचनात्मक गिरावट का एक आलोचनात्मक विश्लेषण, जहाँ प्रक्रियाएं तो बढ़ी हैं लेकिन वास्तविक कार्रवाई रुक गई है।
          • मुख्य बिंदु:
            • विज्ञान की राजनीति: वैज्ञानिकों की निश्चितता का उपयोग राजनेताओं द्वारा देरी को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है, यह तर्क देते हुए कि निर्णायक कार्रवाई का समय “अभी नहीं आया है।”
            • “ग्लोबल मुतिराओ” (Global Mutirão) पैकेज: COP30 ने सहयोग पर जोर देने वाला एक पैकेज प्रदान किया, लेकिन इसके उपाय काफी हद तक स्वैच्छिक हैं, जो “समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” (CBDR) के सिद्धांत को कमजोर करते हैं।
            • वित्त का अंतराल: विकासशील देशों के लिए वर्तमान जलवायु वित्त प्रवाह प्रति वर्ष 400 अरब डॉलर से कम है, जबकि वास्तविक आवश्यकता 2.4 ट्रिलियन से 3 ट्रिलियन डॉलर के बीच है।
            • बाजार की अवसरवादिता: सरकारी कार्रवाई के अभाव में, बाजार दीर्घकालिक पर्यावरणीय परिणामों के बजाय अल्पकालिक लाभ के आधार पर जलवायु अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं।
          • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक पर्यावरणीय राजनीति”, “UNFCCC और COP के परिणाम” तथा “जलवायु वित्त” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • सार्वभौमिक वैधता: अपनी कमियों के बावजूद, UNFCCC समन्वित कार्रवाई के लिए एकमात्र सार्वभौमिक रूप से वैध मंच बना हुआ है; G-20 या BRICS जैसे विकल्पों में आवश्यक कानूनी ढांचे का अभाव है।
            • अनुकूलन (Adaptation) में ठहराव: हालांकि COP30 ने अनुकूलन वित्त को “तिगुना” करने का संकल्प लिया, लेकिन आधार वर्ष या बाध्यकारी स्रोतों की कमी के कारण यह वादा केवल एक आकांक्षा बनकर रह गया है।
            • संरचनात्मक विचलन: संपादकीय एक “शून्यता” की चेतावनी देता है जहाँ राष्ट्रीय हित वैश्विक तात्कालिकता पर हावी हो रहे हैं। लेख नोट करता है कि व्यक्ति बातचीत के मंच से तो बाहर निकल सकता है (hop off), लेकिन इस ग्रह से बाहर नहीं निकल सकता।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

          • संदर्भ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल ही में संपन्न व्यापार समझौते का विश्लेषण, जो केवल वाणिज्यिक हितों से हटकर एक व्यापक रणनीतिक पुनर्गठन का संकेत देता है।
          • मुख्य बिंदु:
            • भू-राजनीतिक झुकाव: “डोनरो डॉक्ट्रिन” (अमेरिकी वाणिज्यिक आक्रामकता) और चीन व रूस के खतरों से प्रेरित यह सौदा एक संघर्षपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थिर करने का लक्ष्य रखता है।
            • शिखर सम्मेलन कूटनीति: इस सफलता का श्रेय 10 वर्षों के उच्च-स्तरीय जुड़ाव और स्पष्ट विचारों के आदान-प्रदान को दिया जाता है जिसने नई दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच आपसी विश्वास पैदा किया।
            • रणनीतिक बहुध्रुवीयता: यह साझेदारी बहुध्रुवीयता को व्यावहारिक अर्थ देने का एक “दुर्लभ अवसर” प्रदान करती है, जो विकास और सुरक्षा के लिए एक लोकतांत्रिक विकल्प पेश करती है।
            • आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन: सेमीकंडक्टर, एआई (AI) और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर सहयोग का उद्देश्य आपसी कमजोरियों को कम करना है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ संबंध”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “वैश्विक मूल्य श्रृंखला” के लिए अनिवार्य।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • टैरिफ से परे: यदि यह समझौता केवल बाजार पहुंच तक सीमित रहता है, तो यह केवल सामरिक (Tactical) बनकर रह जाएगा; इसे रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और गतिशीलता के क्षेत्रों में और अधिक विस्तार देने की आवश्यकता है।
            • समुद्री स्थिरता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास और सूचना साझा करने के बढ़ते अवसर मौजूद हैं।
            • सामाजिक गहराई: छात्रों और शोधकर्ताओं की आवाजाही के माध्यम से राजनीतिक तालमेल को सामाजिक गहराई में बदलने के लिए वीजा और पेशेवर मान्यता संबंधी विवादों को हल किया जाना चाहिए।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत और इसके पड़ोसी; क्षेत्रीय नीतियों का प्रभाव)।

          • संदर्भ: जनवरी 2026 के अंत में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा किए गए समन्वित हमले पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत में हिंसा के गहरे होते चक्र पर जोर देते हैं।
          • मुख्य बिंदु:
            • गहराता अलगाव: राज्य की दमनकारी कार्रवाई और उग्रवाद विरोधी अभियान, जिनमें जबरन गायब करना (Enforced disappearances) और न्यायेतर हत्याएं शामिल हैं, ने उसी उग्रवाद को बढ़ावा दिया है जिसे वे कुचलना चाहते हैं।
            • संसाधन संघर्ष: बलूच राष्ट्रवादियों का तर्क है कि 60 अरब डॉलर की CPEC जैसी परियोजनाएं न्यूनतम पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों के लिए सीमित आर्थिक लाभ के साथ आगे बढ़ रही हैं।
            • भारत का डर (Bogey): बिना किसी सत्यापन योग्य साक्ष्य के अशांति के लिए बार-बार भारत को दोषी ठहराने की इस्लामाबाद की प्रवृत्ति को एक ऐसी कहानी के रूप में वर्णित किया गया है जो आवश्यक आत्मनिरीक्षण से बचती है।
            • आतंकवादी पुनर्गठन: अफगान सीमा पर बिगड़ती स्थितियों ने बलूच विद्रोहियों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अपने अभियानों को तेज़ करने की अनुमति दी है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “पड़ोसी देशों की गतिशीलता”, “क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना” और “मानवाधिकार” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • प्रतिक्रियात्मक प्रतिशोध: संपादकीय नोट करता है कि सैन्य कार्रवाइयों के माध्यम से विद्रोहियों को मारना राजनीतिक समाधान के बिना स्थायी सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं होगा।
            • स्थिरता का मार्ग: शांति के लिए आर्थिक बहिष्कार की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को दूर करने और विद्रोही समूहों के साथ भी संवाद के रास्ते खोलने की आवश्यकता है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन; कल्याणकारी योजनाएं; शासन के महत्वपूर्ण पहलू) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

          • संदर्भ: तेलंगाना का एक दुखद मामला जहाँ एक पिता ने कथित तौर पर अपनी बेटी की हत्या कर दी ताकि वह महाराष्ट्र के “दो बच्चों के नियम” को दरकिनार कर सके और उसकी पत्नी स्थानीय चुनाव लड़ सके।
          • मुख्य बिंदु:
            • दो बच्चों का नियम: 1990 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण उपाय के रूप में कई राज्यों द्वारा लागू किया गया यह नियम दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करता है।
            • विकृत प्रोत्साहन: यह मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे कड़े पात्रता मानदंड एक परिवार के कमजोर सदस्यों के लिए चरम और अनपेक्षित परिणाम पैदा कर सकते हैं।
            • संस्थागत बाधाएं: आरोपी ने शुरू में नियम से बचने के लिए अपने बेटे को गोद देने का प्रयास किया था, लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड इसमें बाधा बन गए।
          • UPSC प्रासंगिकता: “जनसंख्या नीति के प्रभाव”, “पंचायती राज शासन” और “सार्वजनिक जीवन में नैतिकता” के लिए अनिवार्य।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • सुनियोजित प्रकृति: जांच से पता चला कि हत्या की योजना सावधानीपूर्वक बनाई गई थी, जिसमें आरोपी ने अपनी पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढंका था और ट्रैकिंग से बचने के लिए अपना फोन पीछे छोड़ दिया था।
            • जवाबदेही बनाम अधिकार: हालांकि इस नियम का उद्देश्य जनप्रतिनिधियों के बीच जिम्मेदारी सुनिश्चित करना था, यह रिपोर्ट बताती है कि जब राजनीतिक महत्वाकांक्षा कानूनी बाधाओं से टकराती है, तो यह सामाजिक विकृतियों का कारण बन सकती है।

          संपादकीय विश्लेषण

          07 फरवरी, 2026
          GS-3 पर्यावरण जलवायु शासन का शून्य

          वित्त अंतराल $2.4 ट्रिलियन से अधिक। जहाँ COP प्रक्रियाएँ बढ़ रही हैं, वहीं राष्ट्रीय हितों के वैश्विक तत्परता पर हावी होने से वास्तविक कार्रवाई रुकी हुई है।

          GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध भारत-EU: रणनीतिक महत्वपूर्ण मोड़

          डोनरो सिद्धांत (Donroe Doctrine) का एक रणनीतिक विकल्प। इस समझौते का लक्ष्य सेमीकंडक्टर, AI और समुद्री क्षेत्र के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करना है।

          GS-2 शासन / सामाजिक दो-बच्चा मानदंड की विकृति

          तेलंगाना त्रासदी रेखांकित करती है कि स्थानीय चुनावों के लिए कड़ी पात्रता कैसे सुभेद्य परिवारों के लिए अत्यधिक और अनपेक्षित सामाजिक विकृतियाँ पैदा करती है।

          शासन: उत्तर-पूर्व भारत में अवैध कोयला परिवहन की लागत बढ़ाने के लिए GPS ट्रैकिंग और ड्रोन गश्त को बढ़ाना अनिवार्य है।
          पर्यावरण: देरी के बावजूद UNFCCC एकमात्र सार्वभौमिक रूप से वैध मंच है; “कोई भी इस ग्रह से बाहर नहीं कूद सकता।”
          कूटनीति: भारत-यूरोपीय संघ के राजनीतिक तालमेल को सामाजिक गहराई में बदलने के लिए वीजा और पेशेवर पहचान के मुद्दों को हल करना होगा।
          सामाजिक: जनसंख्या नियंत्रण नियम बुनियादी नैतिकता और मौलिक अधिकारों की कीमत पर स्थानीय लोकतंत्र में बाधक नहीं बनने चाहिए।
          GS-4
          विकृत प्रोत्साहन
          जवाबदेही बनाम मानवता: तेलंगाना का मामला एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए कानूनी बाधाएं नैतिक तर्क के पतन का कारण बन सकती हैं। जब नीति डिजाइन मानवीय हताशा को समझने में विफल रहता है, तो वह जीवन की पवित्रता का उल्लंघन करने वाले विकृत प्रोत्साहनों को संस्थागत बनाने का जोखिम उठाता है।

          यहाँ राजनयिक मानचित्रणनई समुद्री प्रजातियों की खोज और रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

          7 फरवरी, 2026 की एक बड़ी राजनयिक घटना में “मानचित्रों के माध्यम से एक संदेश” दिया गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के साथ एक मानचित्र जारी किया, जिसके महत्वपूर्ण क्षेत्रीय निहितार्थ हैं।

          • रणनीतिक बदलाव: आधिकारिक अमेरिकी मानचित्र में संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को भारत के हिस्से के रूप में दर्शाया गया है।
          • मानचित्रण का महत्व: यह विवादित क्षेत्रों के लिए ‘डॉटेड लाइन्स’ (बिंदुदार रेखाओं) या टिप्पणियों का उपयोग करने की दीर्घकालिक अमेरिकी प्रथा से एक बड़ा विचलन है। इसे भारत के 1994 के संसदीय प्रस्ताव के अनुरूप एक “प्रतीकात्मक राजनयिक संकेत” के रूप में देखा जा रहा है।
          • मुख्य बिंदु: मानचित्र पर अक्साई चिन (उत्तर-पूर्वी लद्दाख) और PoK की स्थिति पहचानें—ध्यान दें कि पहली बार किसी बड़े अमेरिकी नीति दस्तावेज में इन्हें अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है।

          भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के शोधकर्ताओं ने बंगाल की खाड़ी के पारिस्थितिकी तंत्र में समुद्री कीड़ों (Polychaetes) की दो नई प्रजातियों का पता लगाया है।

          • स्थान: पश्चिम बंगाल तट के कीचड़ के मैदान (Mudflats) और मैंग्रोव क्षेत्र।
          • प्रजातियों के नाम:
            1. Namalycastis solenotognatha (इसकी विशिष्ट जबड़े की संरचना के आधार पर नाम)।
            2. Nereis dhritiae (ZSI की पहली महिला निदेशक, धृति बनर्जी के नाम पर)।
          • पारिस्थितिक महत्व: ये प्रजातियाँ अत्यधिक सल्फाइड युक्त और प्रदूषित वातावरण के अनुकूल हैं। ये सुंदरवन और आसपास के कीचड़ के मैदानों के स्वास्थ्य के ‘सूचक’ (Indicators) के रूप में कार्य करती हैं।

          महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र में ‘ट्रैपडोर स्पाइडर’ (Trapdoor Spider) की एक नई प्रजाति दर्ज की गई है।

          • स्थान: कोल्हापुर जिला, महाराष्ट्र।
          • मानचित्रण संदर्भ: ट्रैपडोर मकड़ियाँ अद्वितीय हैं क्योंकि वे मिट्टी और रेशम से बने “ट्रैपडोर” (गुप्त द्वार) वाले बिलों में रहती हैं। यह खोज उत्तरी पश्चिमी घाट के जैव विविधता मानचित्रण में एक नया अध्याय जोड़ती है, जो क्षेत्र अपनी उच्च ‘स्थानिकता’ (Endemism) के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है।

          7 फरवरी को मिली रिपोर्टों के अनुसार, भारत के “रणनीतिक सुरंग मानचित्र” (Strategic Tunnel Map) में तेजी से प्रगति हो रही है।

          • शिंकु ला सुरंग (Shinku La Tunnel): यह हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ती है। पूरा होने पर, यह 15,800 फीट की ऊंचाई के साथ दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग होगी।
          • सेला सुरंग (Sela Tunnel): यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है। यह उच्च-ऊंचाई वाले सेला दर्रे को बायपास करती है जो अक्सर बर्फबारी के कारण बंद रहता है।
          श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
          क्षेत्रीय मानचित्रअविभाजित J&K/लद्दाखभारत-अमेरिका व्यापार ढांचा मानचित्र
          समुद्री खोजNereis dhritiaeपश्चिम बंगाल के कीचड़ के मैदान
          दक्कन की खोजट्रैपडोर मकड़ीकोल्हापुर, महाराष्ट्र
          रणनीतिक सीमातवांग कनेक्टिविटीसेला सुरंग, अरुणाचल प्रदेश

          भारत-अमेरिका व्यापार मानचित्र की नई सीमाओं को चिह्नित करते समय सियाचिन हिमनद और गिलगित-बाल्टिस्तान के क्षेत्रों को विशेष रूप से देखें। यह मानचित्र केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता के अंतरराष्ट्रीय समर्थन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

          मानचित्रण विवरण

          मानचित्रण कूटनीति एवं जैव विविधता
          संप्रभु संरेखण अविभाजित जम्मू-कश्मीर व्यापार मानचित्र

          आधिकारिक USTR मानचित्र जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाता है—एक प्रमुख कूटनीतिक बदलाव।

          दक्कन स्थानिकता (Endemism) मकड़ी की खोज

          महाराष्ट्र में “ट्रैपडोर स्पाइडर” की एक नई प्रजाति, टाइटनिडियोप्स कोल्हापुरेंसिस, दर्ज की गई, जो उत्तरी पश्चिमी घाट के जैव विविधता मानचित्र को समृद्ध करती है।

          समुद्री भूगोल
          मडफ्लैट्स के जैव-योद्धा

          पश्चिम बंगाल में समुद्री कीड़ों की दो नई प्रजातियों, जिनमें नेरेस धृतिया (Nereis dhritiae) शामिल है, की पहचान की गई। सल्फाइड-युक्त प्रदूषित वातावरण के अनुकूल, ये महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र संकेतकों के रूप में कार्य करते हैं।

          रणनीतिक सीमा ग्रिड
          उच्च-ऊंचाई वाली सुरंगें

          लाहौल को ज़ांस्कर से जोड़ने वाली शिंकू ला (15,800 फीट) और अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक 365 दिन हर मौसम में पहुँच प्रदान करने वाली सेला सुरंग का मानचित्रण।

          बंगाल की खाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र

          सुंदरबन मडफ्लैट्स में नए पॉलीकीट्स की खोज लचीले जैविक मोर्चों के रूप में मैंग्रोव के मानचित्रण के महत्व को पुख्ता करती है।

          क्षेत्रीय अविभाजित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।
          समुद्री पश्चिम बंगाल मैंग्रोव मडफ्लैट्स।
          रणनीतिक सेला सुरंग (तवांग पहुँच)।
          एटलस रणनीति
          स्थानिक आधार: अमेरिकी व्यापार दस्तावेजों में मानचित्रण परिवर्तन एक प्रमुख भू-राजनीतिक धुरी का संकेत देता है। साथ ही, कोल्हापुर में ट्रैपडोर मकड़ियों का दस्तावेजीकरण दक्कन के पठार की अमानचित्रित सूक्ष्म-स्थानिकता (micro-endemism) को उजागर करता है।

          IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 6 फ़रवरी 2026 (Hindi)

          यह अध्याय “दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया” बताता है कि औपनिवेशिक काल के दौरान नई पश्चिमी शैलियों, तकनीकों और विषयों के आगमन ने भारत की कला और वास्तुकला को कैसे बदल दिया।

          अठारहवीं शताब्दी में, यूरोपीय कलाकारों का एक तांता भारत आया, जो अपने साथ तैल चित्र (Oil Painting) की तकनीक और यथार्थवाद (Realism) की अवधारणा लेकर आए। इससे वे ऐसे चित्र बनाने में सक्षम हुए जो बिल्कुल असली और जीवंत दिखते थे।

          • चित्रकला की इस शैली में भारत को एक विचित्र, ऊबड़-खाबड़ और अनगढ़ भूमि के रूप में दिखाया गया जिसे अभी ब्रिटिश शासन द्वारा “सभ्य” बनाया जाना बाकी था।
          • थॉमस डैनियल और उनके भतीजे विलियम डैनियल इस परंपरा के सबसे प्रसिद्ध परिदृश्य कलाकार थे।
          • उनके काम में अक्सर पारंपरिक भारत की छवियों (जैसे खंडहर) की तुलना ब्रिटिश “आधुनिकीकरण” के प्रतीकों (जैसे नई इमारतें और बेहतर परिवहन) के साथ की जाती थी।
          • ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय राजघरानों के लिए अपनी धन-दौलत, प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शित करने हेतु व्यक्तिचित्र (पोर्ट्रेट) बनवाना एक लोकप्रिय तरीका था।
          • भारतीय लघुचित्र परंपरा के विपरीत, ये पोर्ट्रेट आमतौर पर आदमकद (Life-size) तैल चित्र होते थे।
          • भारतीय शासकों, जैसे अवध के नवाब, ने जोहान जोफ़नी जैसे यूरोपीय चित्रकारों को औपनिवेशिक परिवेश में अपना चित्र बनाने के लिए नियुक्त किया ताकि वे ब्रिटिश शक्ति के साथ अपने जुड़ाव पर जोर दे सकें।
          • इस विधा में ब्रिटिश सैन्य विजय के विभिन्न प्रकरणों को नाटकीय रूप से चित्रित किया जाता था।
          • ये चित्र साम्राज्यवादी प्रचार (Propaganda) का काम करते थे, जो अंग्रेजों को अजेय और सर्वशक्तिमान के रूप में दिखाते थे।
          • मैसूर के टीपू सुल्तान की हार को दर्शाने वाले चित्रों की श्रृंखला इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जिन्हें ब्रिटिश विजय का जश्न मनाने के लिए लंदन में प्रदर्शित किया गया था।

          ब्रिटिश सत्ता के उदय ने पारंपरिक दरबारी चित्रकारों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया, जिससे उनके संरक्षण और शैली में बदलाव आया।

          • पारंपरिक संरक्षण का पतन: जैसे-जैसे स्थानीय शासकों ने शक्ति खोई, मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रीय दरबारों के कलाकारों ने यूरोपीय तकनीकों, जैसे परिप्रेक्ष्य (Perspective) और प्रकाश के उपयोग को अपनाना शुरू कर दिया।
          • कंपनी पेंटिंग्स: कई कलाकारों ने सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के लिए काम करना शुरू किया।
            • उन्होंने “कंपनी पेंटिंग्स” तैयार कीं—जिनमें भारतीय पौधों, जानवरों, त्योहारों और व्यवसायों के चित्र थे। अंग्रेज इन्हें एक “अजीबोगरीब” (Exotic) उपनिवेश के दस्तावेज़ और स्मारिका के रूप में इकट्ठा करते थे।

          उन्नीसवीं शताब्दी में, कलकत्ता जैसे बढ़ते शहरों में एक व्यापक दर्शक वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए लोकप्रिय कला का एक नया रूप उभरा।

          • कालीघाट चित्रकला: कलकत्ता के कालीघाट मंदिर में, पारंपरिक पटुआ (स्क्रॉल पेंटर्स) ने गहरे रंगों और मोटी रेखाओं का उपयोग करके एक नई शैली विकसित की।
          • सामाजिक व्यंग्य: उन्नीसवीं सदी के अंत तक, इन कलाकारों ने उन “बाबूओं” (पश्चिमी रंग में रंगे भारतीयों) का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया जो ब्रिटिश तौर-तरीकों और जीवनशैली की नकल करते थे।
          • छापाखाना (The Printing Press): लकड़ी के ब्लॉक और लिथोग्राफिक प्रिंटिंग की शुरुआत ने इन चित्रों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की अनुमति दी, जिससे ये गरीबों के लिए भी सुलभ और सस्ते हो गए।
          • फोटोग्राफी: उन्नीसवीं सदी के मध्य में फोटोग्राफी का आगमन हुआ। अंग्रेजों ने इसका उपयोग भारतीय वास्तुकला और 1857 के विद्रोह के बाद के दृश्यों को दर्ज करने के लिए किया।

          जैसे-जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन ने गति पकड़ी, कलाकारों ने एक ऐसी शैली की तलाश की जो पश्चिमी यथार्थवाद की नकल के बजाय वास्तव में “भारतीय” हो।

          • राजा रवि वर्मा: वे पश्चिमी तैल चित्र तकनीकों को भारतीय पौराणिक और महाकाव्य विषयों के साथ जोड़ने वाले पहले लोगों में से थे। उनके चित्रों के प्रिंट अत्यधिक लोकप्रिय हुए और पूरे भारत के घरों में पाए जाने लगे।
          • अवनिंद्रनाथ टैगोर: उन्होंने रवि वर्मा के पश्चिमी यथार्थवाद को “भौतिकवादी” कहकर खारिज कर दिया।
            • अपने अनुयायियों के साथ, उन्होंने प्रेरणा के लिए अजंता की गुफाओं और मुगल लघुचित्रों की ओर रुख किया। उन्होंने एक आध्यात्मिक और धुंधली शैली बनाई जिसे ‘बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट’ के रूप में जाना गया।

          औपनिवेशिक भारत में वास्तुकला का उपयोग ब्रिटिश सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभुत्व को भौतिक रूप से व्यक्त करने के लिए किया गया था।

          • बंबई का कायाकल्प: उन्नीसवीं सदी के मध्य में, बंबई को ‘गॉथिक रिवाइवल’ (Gothic Revival) जैसी यूरोपीय शैलियों का उपयोग करके पुनर्निर्मित किया गया, जिसकी विशेषता नुकीले मेहराब और पत्थर की नक्काशी थी।
          • विक्टोरिया टर्मिनस: यह रेलवे स्टेशन गॉथिक शैली का एक मील का पत्थर है, जिसे यूरोपीय गिरजाघर (Cathedral) जैसा दिखने के लिए डिजाइन किया गया था।
          • इंडो-सारसेनिक शैली: बाद में, अंग्रेजों ने अपनी इमारतों में गुंबद और मीनार जैसे भारतीय तत्वों को शामिल करना शुरू किया ताकि वे खुद को मुगल सम्राटों के वैध उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर सकें।
          1. यथार्थवाद (Realism): ऐसी शैली जो चीजों को वैसा ही दिखाती है जैसी वे वास्तव में दिखती हैं।
          2. परिप्रेक्ष्य (Perspective): चित्रकला की वह तकनीक जिससे दूर की चीजें छोटी और पास की चीजें बड़ी दिखाई देती हैं, जिससे गहराई का भ्रम पैदा होता है।
          3. पटुआ: कपड़े या कागज के लंबे रोल पर पेंटिंग करने वाले पारंपरिक कलाकार।
          4. इंडो-सारसेनिक: एक स्थापत्य शैली जिसमें भारतीय और यूरोपीय दोनों तत्व शामिल होते हैं।
          NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
          अध्याय – 10

          दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया

          शाही सौंदर्यशास्त्र
          पिक्चरस्क (मनोरम): डेनियल्स जैसे यूरोपीय कलाकारों ने भारत को एक ऊबड़-खाबड़, “अनगढ़” भूमि के रूप में चित्रित किया जो ब्रिटिश सभ्यता की प्रतीक्षा कर रही थी।
          रूप-चित्रण: ब्रिटिश अधिकारियों और नवाबों द्वारा अधिकार और धन की छवि प्रदर्शित करने के लिए आदमकद तेल चित्रों का उपयोग किया गया।
          कंपनी चित्रकला
          साम्राज्य के स्मृति चिह्न: स्थानीय कलाकारों ने कंपनी अधिकारियों के लिए भारतीय वनस्पतियों, जीवों और त्योहारों को चित्रित करने के लिए परिप्रेक्ष्य और प्रकाश की तकनीक को अपनाया।
          राष्ट्रवाद और लोकप्रिय कला
          कालीघाट कला: कलकत्ता के पारंपरिक पटुआ कलाकारों ने एक जीवंत शैली विकसित की, जिसने पश्चिमी जीवनशैली की नकल करने वाले “बाबुओं” पर व्यंग्य किया।
          राजा रवि वर्मा: उन्होंने पश्चिमी यथार्थवाद और तेल तकनीक को भारतीय पौराणिक कथाओं के साथ जोड़ा, जिससे चित्र हर घर तक सुलभ हो गए।
          बंगाल स्कूल: अवनिंद्रनाथ टैगोर ने पश्चिमी यथार्थवाद को त्याग कर अजंता के भित्ति चित्रों और मुगल लघुचित्रों से प्रेरित एक आध्यात्मिक शैली को अपनाया।
          औपनिवेशिक वास्तुकला: विक्टोरिया टर्मिनस (गोथिक पुनरुत्थान) जैसी इमारतों में ब्रिटिश प्रभुत्व को भौतिक रूप से स्थापित करने के लिए पत्थर और गुंबदों का उपयोग किया गया।
          फोटोग्राफी: वास्तुकला और 1857 के विद्रोह के भयानक परिणामों को दर्ज करने के लिए 19वीं सदी के मध्य में इसका आगमन हुआ।

          यथार्थवाद

          पेंटिंग की एक शैली जिसका उद्देश्य लोगों और प्रकृति का जीवंत और सटीक चित्रण करना था।

          गोथिक पुनरुत्थान

          नुकीले मेहराबों वाली वास्तुशिल्प शैली, जिससे इमारतें यूरोपीय गिरजाघरों जैसी दिखती थीं।

          लिथोग्राफी

          एक मुद्रण प्रक्रिया जिसने आम जनता के लिए सस्ते चित्रों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की अनुमति दी।

          सत्ता का
          कैनवास
          दृश्य कलाएँ पहचान का एक युद्धक्षेत्र थीं। शाही प्रचार चित्रों से लेकर बंगाल स्कूल की आध्यात्मिक धुंध तक, कला का उपयोग या तो औपनिवेशिक शासन को उचित ठहराने के लिए किया गया या स्वतंत्रता चाहने वाले राष्ट्र की आत्मा को पुनः प्राप्त करने के लिए।

          भारतीय संविधान में “बजट” शब्द का कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय, अनुच्छेद 112 में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ (Annual Financial Statement) कहा गया है। यह संसद की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय घटना है, क्योंकि भारत की संचित निधि से कोई भी धन संसदीय स्वीकृति के बिना नहीं निकाला जा सकता।

          बजट एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के लिए भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण होता है।

          • अनुच्छेद 112: राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ रखवाएगा।
          • पूर्व सिफारिश: बजट केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के साथ ही लोकसभा में पेश किया जाता है।
          • कानून के बिना कोई कर नहीं: विधि के प्राधिकार के बिना न तो कोई कर लगाया जाएगा और न ही एकत्र किया जाएगा (अनुच्छेद 265)।
          • व्यय का पृथक्करण: बजट में राजस्व खाते (Revenue account) पर होने वाले व्यय को अन्य व्यय से अलग दिखाना अनिवार्य है।

          बजट में दो प्रकार के व्यय शामिल होते हैं:

          1. भारत की संचित निधि पर ‘भारित’ व्यय (Expenditure Charged): इन पर संसद में मतदान नहीं होता (केवल चर्चा की जा सकती है)।
            • उदाहरण: राष्ट्रपति, राज्यसभा के सभापति, लोकसभा अध्यक्ष, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और CAG के वेतन व भत्ते; सरकार के ऋण भार।
          2. संचित निधि से ‘किए जाने वाले’ व्यय (Expenditure Made/Voted): इन पर संसद में मतदान होता है और इन्हें ‘अनुदान की मांगों’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

          बजट को कानून बनने के लिए इन विशिष्ट चरणों से गुजरना पड़ता है:

          1. बजट का प्रस्तुतीकरण: वित्त मंत्री द्वारा ‘बजट भाषण’ के साथ बजट पेश किया जाता है। (2017 से रेल बजट को आम बजट में मिला दिया गया है)।
          2. सामान्य चर्चा: प्रस्तुति के कुछ दिनों बाद, दोनों सदन बजट पर समग्र रूप से चर्चा करते हैं। इस चरण में कोई प्रस्ताव पेश नहीं किया जाता।
          3. विभागीय समितियों द्वारा जाँच: सामान्य चर्चा के बाद संसद 3-4 सप्ताह के लिए स्थगित हो जाती है। इस दौरान 24 विभागीय स्थायी समितियाँ अनुदान की माँगों की विस्तार से जाँच करती हैं।
          4. अनुदान की माँगों पर मतदान: लोकसभा अनुदान की माँगों पर मतदान करती है। (नोट: राज्यसभा को मांगों पर मतदान करने की कोई शक्ति नहीं है)। इसी चरण में ‘कटौती प्रस्ताव’ (Cut Motions) पेश किए जा सकते हैं:
            • नीतिगत कटौती (Policy Cut): मांग की राशि को घटाकर 1 रुपया करना (नीति की अस्वीकृति)।
            • आर्थिक कटौती (Economy Cut): मांग की राशि को एक विशिष्ट सीमा तक कम करना।
            • सांकेतिक कटौती (Token Cut): मांग की राशि में से 100 रुपये कम करना (विशिष्ट शिकायत दर्ज करना)।
          5. विनियोग विधेयक पारित करना (अनुच्छेद 114): यह विधेयक संचित निधि से धन निकालने को कानूनी मान्यता देता है। इस विधेयक में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
          6. वित्त विधेयक पारित करना (अनुच्छेद 117): यह विधेयक बजट के आय पक्ष (कराधान प्रस्तावों) को कानूनी रूप देता है।

          कभी-कभी सरकार को नियमित बजट चक्र के बाहर धन की आवश्यकता होती है:

          • लेखा अनुदान (Vote on Account – अनुच्छेद 116): चूंकि बजट प्रक्रिया में समय लगता है, इसलिए लोकसभा 2 महीने के लिए सरकार चलाने हेतु कुल अनुमान का 1/6 हिस्सा अग्रिम रूप से देती है।
          • अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant – अनुच्छेद 115): जब किसी सेवा के लिए स्वीकृत राशि उस वर्ष के लिए अपर्याप्त पाई जाती है।
          • अतिरिक्त अनुदान (Excess Grant – अनुच्छेद 115): जब स्वीकृत राशि से अधिक धन खर्च हो जाता है। इसे लोकसभा में लाने से पहले लोक लेखा समिति (PAC) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
          • प्रत्ययानुदान (Vote of Credit – अनुच्छेद 116): राष्ट्रीय आपातकाल (जैसे युद्ध) के कारण किसी अप्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए दिया गया ‘ब्लैंक चेक’।
          1. भारत की संचित निधि (Consolidated Fund – अनुच्छेद 266): सरकार को प्राप्त होने वाला सारा राजस्व, ऋण और ऋण की वसूली इसी में जमा होती है। संसद की अनुमति के बिना यहाँ से पैसा नहीं निकाला जा सकता।
          2. भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund – अनुच्छेद 267): यह राष्ट्रपति के अधिकार में होती है। इसका उपयोग अप्रत्याशित खर्चों के लिए किया जाता है, जिसके लिए बाद में संसद की मंजूरी ली जाती है।
          3. भारत का लोक लेखा (Public Account – अनुच्छेद 266): इसमें भविष्य निधि (PF), बचत जमा आदि का पैसा होता है। इसके भुगतान के लिए संसदीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती (यह कार्यकारी प्रक्रिया है)।
          शब्दअनुच्छेदउद्देश्य
          वार्षिक वित्तीय विवरण112मुख्य बजट दस्तावेज।
          विनियोग विधेयक114धन निकालने का कानूनी अधिकार।
          वित्त विधेयक117कर लगाने और एकत्र करने का अधिकार।
          लेखा अनुदान1162 महीने के लिए अग्रिम धन।
          अनुपूरक अनुदान115स्वीकृत राशि कम पड़ने पर अतिरिक्त धन।
          संचित निधि266सरकार का मुख्य खजाना।

          याद रखें कि ‘गिलोटिन’ (Guillotine) वह प्रक्रिया है जिसमें अनुदान की मांगों के लिए आवंटित समय समाप्त होने पर, शेष सभी मांगों को बिना चर्चा के सीधे मतदान के लिए रख दिया जाता है। यह बजट सत्र के अंतिम दिनों में होता है।

          वार्षिक वित्तीय विवरण • अनु. 112
          सार्वजनिक वित्त और बजट

          केंद्रीय बजट

          अनुच्छेद 112
          इसे वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में संदर्भित किया जाता है। यह वित्तीय वर्ष के लिए अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण है।
          भारित व्यय
          गैर-मतदेय व्यय (जैसे, राष्ट्रपति/न्यायाधीशों के वेतन)। इस पर चर्चा की अनुमति है लेकिन मतदान नहीं होता है।
          बजट पारित होने के चरण
          1. प्रस्तुतिकरण: लोकसभा में वित्त मंत्री द्वारा।
          2. सामान्य चर्चा: दोनों सदन कुल आंकड़ों पर चर्चा करते हैं।
          3. जांच: 24 विभागीय समितियां अनुदान मांगों की जांच करती हैं।
          4. मतदान: केवल लोकसभा में किया जाता है।
          5. विनियोग विधेयक (अनु. 114): संचित निधि से निकासी को कानूनी रूप देता है।
          6. वित्त विधेयक (अनु. 117): कराधान प्रस्तावों को कानूनी रूप देता है।
          विशेष अनुदान (अनु. 115-116)
          लेखानुदान: 2 महीने के लिए 1/6 हिस्सा अग्रिम अनुदान।
          अनुपूरक: वर्तमान सेवा के लिए अतिरिक्त धनराशि।
          प्रत्ययानुदान: राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए ‘ब्लैंक चेक’।

          नीतिगत कटौती

          मांग को घटाकर 1 रुपया कर दिया जाता है; यह सरकार की नीति की पूर्ण अस्वीकृति को दर्शाता है।

          आर्थिक कटौती

          व्यय में मितव्ययिता सुनिश्चित करने के लिए मांग को एक विशिष्ट राशि से कम कर दिया जाता है।

          सांकेतिक कटौती

          मांग को 100 रुपये कम कर दिया जाता है; इसका उपयोग सरकार के खिलाफ विशिष्ट शिकायत व्यक्त करने के लिए होता है।

          कानूनी
          ढाल
          अनुच्छेद 265 के तहत, कानून के अधिकार के बिना कोई कर एकत्र नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, विनियोग विधेयक संचित निधि की एकमात्र कुंजी के रूप में कार्य करता है; इसके पारित हुए बिना, सरकार कानूनी रूप से एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती है, जो कार्यपालिका के खजाने पर पूर्ण संसदीय नियंत्रण सुनिश्चित करता है।

          यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (6 फ़रवरी, 2026) दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; पर्यावरण; बुनियादी ढांचा)।

          • संदर्भ: केंद्रीय बजट 2026-27 के जलवायु संबंधी दृष्टिकोण का विश्लेषण और यह परीक्षण कि क्या वित्तीय आवंटन भारत के घोषित लक्ष्यों के अनुरूप हैं।
          • मुख्य बिंदु:
            • CCUS का प्रायोगिक चरण: बजट में ‘कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज’ (CCUS) के लिए पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये के परिव्यय का प्रस्ताव दिया गया है, जो इन जटिल प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन चरण (Demonstration phase) में प्रवेश का संकेत देता है।
            • छत पर सौर ऊर्जा (Rooftop Solar) का विस्तार: ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ को बढ़ाकर 22,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जिसका लक्ष्य विकेंद्रीकृत प्रणालियों के माध्यम से भूमि के दबाव और घरेलू ऊर्जा लागत को कम करना है।
            • परमाणु और सौर पंप: लागत को कम करने के लिए परमाणु संयंत्र उपकरणों पर शून्य बुनियादी सीमा शुल्क को 2035 तक बढ़ा दिया गया है, जबकि ‘पीएम-कुसुम’ (सौर पंप) के लिए 5,000 करोड़ रुपये का आवंटन बरकरार रखा गया है।
            • हरित हाइड्रोजन का अंतराल: उच्च नीतिगत महत्वाकांक्षा के बावजूद, हरित हाइड्रोजन पर वास्तविक खर्च मामूली बना हुआ है, जो सरकार के इरादे और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच एक निरंतर अंतर को उजागर करता है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु वित्त”, “औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन” और “नवीकरणीय ऊर्जा नीति” से संबंधित विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • निर्यात प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) के लागू होने के साथ, स्टील और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों को कार्बन मुक्त बनाना अब केवल एक पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं बल्कि व्यापारिक अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है।
            • निजी पूंजी की अनिश्चितता: हालांकि कानूनी बदलाव अब परमाणु ऊर्जा में निजी भागीदारी की अनुमति देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सुरक्षा, दायित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं से घिरे इस क्षेत्र में निजी निवेश कितनी तेजी से आएगा।
            • संग्रहण की बाधाएं: संपादकीय का तर्क है कि हालांकि इरादा स्पष्ट है, लेकिन बजट वास्तविक आवंटन पर सतर्क रहता है, जिससे तीव्र डीकार्बोनाइजेशन के लिए आवश्यक निजी पूंजी जुटाने की भारत की क्षमता पर अनिश्चितता बनी रहती है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य; शासन; सरकारी बजट)।

          • संदर्भ: 2026 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में 10 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5 प्रतिशत के दीर्घकालिक लक्ष्य को पूरा करने में इसकी विफलता की समीक्षा।
          • मुख्य बिंदु:
            • बजटीय स्थिरता: कुल स्वास्थ्य आवंटन 1.05 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.26 प्रतिशत और कुल सरकारी खर्च का मात्र 1.9 प्रतिशत है।
            • बायोपार्मा शक्ति (SHAKTI) योजना: पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये की एक प्रमुख पहल, जिसे भारत को ‘बायोलॉजिक्स’ और ‘बायोसिमिलर्स’ के लिए वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदलने के लिए डिजाइन किया गया है।
            • वृद्धों की देखभाल (Geriatric Care) पर ध्यान: सरकार का लक्ष्य बुजुर्गों के लिए 1.5 लाख देखभाल कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना है, जो गिरती प्रजनन दर के कारण भारत के “वृद्ध राष्ट्र” (Grey Nation) की ओर बढ़ने की वास्तविकता को स्वीकार करता है।
            • किफायती उपचार के उपाय: मरीजों और उनके परिवारों पर वित्तीय बोझ कम करने के लिए कैंसर की 17 दवाओं और कई दुर्लभ बीमारियों के उपचार पर सीमा शुल्क माफ कर दिया गया है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा”, “भेषज (फार्मास्युटिकल) अनुसंधान एवं विकास” और “जनसांख्यिकीय बदलाव”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • प्रतिबद्धता का अंतराल: सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 प्रतिशत खर्च के लक्ष्य तक पहुँचने से सरकार के इनकार की आलोचना की है, जैसा कि मूल रूप से 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वादा किया गया था।
            • NHM फंडिंग की चिंता: उपयोग की उच्च दरों के बावजूद, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के वित्तपोषण में गिरावट देखी गई है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता के बारे में डर पैदा हो गया है।
            • संघीय असंतुलन: ऐसी चिंताएं बढ़ रही हैं कि जैसे-जैसे केंद्र स्वास्थ्य वित्तपोषण में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहा है, राजकोषीय हस्तांतरण से राष्ट्रीय सुधार के बजाय विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य परिणामों में असमानता पैदा हो सकती है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (न्यायपालिका)।

          • संदर्भ: एक कानूनी विद्वतापूर्ण आलोचना कि कैसे भारत की उच्च न्यायपालिका कथित तौर पर विकास के नाम पर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को “कमजोर” करने में सहायता कर रही है।
          • मुख्य बिंदु:
            • पूर्वव्यापी (Retrospective) मंजूरी: उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में अपने स्वयं के 2025 के निर्णय (वनशक्ति बनाम भारत संघ) को वापस ले लिया, जिसने पहले पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी पर प्रतिबंध लगा दिया था।
            • EIA का सरलीकरण: गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए, नीतिगत बदलाव अब स्थान और क्षेत्र के विशिष्ट विवरणों के बिना ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA) करने की अनुमति देते हैं।
            • अरावली की परिभाषा: न्यायालय ने अपने 2010 के रुख से हटते हुए एक ऐसी परिभाषा को स्वीकार किया है जो केवल 100 मीटर से ऊपर की चोटियों की रक्षा करती है, जिससे निचली पहाड़ियों के खनन और शोषण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
            • मैंग्रोव की हानि: न्यायिक अनुमति ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए 158 मैंग्रोव के विनाश की अनुमति दी, जो केवल प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) के “वादे” पर आधारित थी।
          • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)”, “न्यायिक समीक्षा” और “संवैधानिक जवाबदेही”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • संवैधानिक निहितार्थ: संपादकीय का तर्क है कि वर्तमान व्याख्याएं अनुच्छेद 21 के तहत ‘स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार’ और अनुच्छेद 48A के तहत राज्य के कर्तव्य को कमजोर करती हैं।
            • प्रक्रियात्मक अन्याय: बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अक्सर संक्षिप्त सुनवाई के साथ नियामक बाधाओं को पार कर जाती हैं, जिससे पर्यावरणीय अनुपालन को केवल एक “चेकलिस्ट” की तरह माना जा रहा है।
            • वैज्ञानिक विरोधाभास: परिपक्व मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र, जो प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं, उन्हें विकसित होने में दशकों लगते हैं और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर वृक्षारोपण अभियानों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (सुरक्षा; रक्षा प्रौद्योगिकी; भारतीय अर्थव्यवस्था)।

          • संदर्भ: दशकों में पहली बार रक्षा व्यय में दोहरे अंकों की उछाल का विश्लेषण, जो सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत तक पहुँच गया है।
          • मुख्य बिंदु:
            • आधुनिकीकरण पर जोर: वायु सेना (32 प्रतिशत वृद्धि) और थल सेना (30 प्रतिशत वृद्धि) को भारी वाहनों और हथियारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए आधुनिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण धन प्राप्त हुआ।
            • स्वदेशीकरण: पूंजी अधिग्रहण बजट का 75 प्रतिशत घरेलू उद्योगों के लिए आरक्षित है, जो 2014-15 के बाद से घरेलू उत्पादन में 174 प्रतिशत की वृद्धि का समर्थन करता है।
            • पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय: एक उल्लेखनीय बदलाव में, पूंजीगत व्यय (22 प्रतिशत की वृद्धि) ने राजस्व बजट को पीछे छोड़ दिया है, जिससे वर्षों की उपेक्षा समाप्त हुई है।
            • बढ़ता निर्यात: रक्षा निर्यात पिछले साल 23,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो 2014 के 1,000 करोड़ रुपये से मजबूत वृद्धि दर्शाता है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “आंतरिक सुरक्षा”, “रक्षा में आत्मनिर्भर भारत” और “रणनीतिक योजना”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • L-1 की बाधा: ‘न्यूनतम लागत’ (L-1) नियम अभी भी छोटे पैमाने के उच्च-तकनीकी नवोन्मेषकों (Innovators) के बजाय बड़े उद्योगों का पक्ष लेता है, जबकि आधुनिक सेना के लिए ये नवोन्मेषक अनिवार्य हैं।
            • अंतहीन देरी: पनडुब्बियों के लिए ‘प्रोजेक्ट 75’ (1997 में स्वीकृत) और राफेल सौदा एक ऐसी नौकरशाही व्यवस्था को उजागर करते हैं जहाँ आपूर्ति में दशकों लग जाते हैं।
            • बिखरा हुआ अनुसंधान (R&D): जबकि DRDO के वित्तपोषण में वृद्धि हुई है, भारत का कुल अनुसंधान बजट सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.66 प्रतिशत है, और निजी क्षेत्र का अनुसंधान एवं विकास लगभग नगण्य है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था; राज्यपाल की भूमिका; केंद्र-राज्य संबंध)।

          • संदर्भ: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में हालिया उदाहरणों से उत्पन्न एक बहस जहाँ राज्यपालों ने या तो सदन से बहिर्गमन किया या राज्य मंत्रिमंडलों द्वारा तैयार किए गए नीतिगत संबोधनों के चुनिंदा अंशों को ही पढ़ा।
          • मुख्य बिंदु:
            • अनुच्छेद 176 का अधिदेश: संविधान के अनुसार राज्यपाल को वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में राज्य विधानमंडल को संबोधित करना और सरकार के एजेंडे को रेखांकित करना अनिवार्य है।
            • प्रतीकवाद बनाम कार्य: इस संबोधन को बनाए रखने के समर्थकों का तर्क है कि यह राज्यपाल को विधानमंडल के एक अभिन्न अंग (अनुच्छेद 168) के रूप में मान्यता देता है और ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ को दर्शाता है।
            • संवैधानिक संकट: यदि कोई राज्यपाल अनिवार्य संबोधन देने से इनकार करता है, तो इससे सत्र के औपचारिक रूप से शुरू न हो पाने का जोखिम पैदा हो जाता है।
            • वैकल्पिक तंत्र: अनुच्छेद 175 पहले से ही राज्यपालों को लंबित विधानों के संबंध में सदन को संदेश भेजने का एक तरीका प्रदान करता है, जिसमें अनुच्छेद 176 जैसे समारोह की आवश्यकता नहीं होती।
          • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद विवाद”, “संवैधानिक पदाधिकारी” और “शासन स्थिरता”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • कोई विवेकाधीन शक्ति नहीं: नबाम रेबिया मामले (2016) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबोधन एक कार्यकारी कार्य है जो पूरी तरह से मंत्रिमंडल की “सहायता और सलाह” पर किया जाता है।
            • प्रसादपर्यंत सिद्धांत (Pleasure Doctrine) का टकराव: राष्ट्रपति के विपरीत, जो महाभियोग के अधीन हैं, राज्यपाल राष्ट्रपति (केंद्र) के “प्रसादपर्यंत” पद धारण करते हैं, जिससे वे राज्य विधानमंडल के बजाय नई दिल्ली के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाते हैं।
            • प्रणालीगत सुधार: विशेषज्ञों का सुझाव है कि संबोधन को समाप्त करने के बजाय, ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि राज्यपालों की नियुक्ति और निष्कासन में सुधार किया जाए ताकि उनकी प्राथमिक निष्ठा सत्तारूढ़ दल के बजाय संविधान के प्रति हो।

          संपादकीय विश्लेषण

          06 फरवरी, 2026
          GS-2 स्वास्थ्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अंतराल

          व्यय कुल व्यय के 1.9% पर स्थिर। बायोफार्मा SHAKTI और एक “वृद्ध राष्ट्र” के लिए 1.5 लाख जराचिकित्सा देखभाल कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण पर ध्यान।

          GS-3 सुरक्षा रक्षा आधुनिकीकरण

          रक्षा बजट जीडीपी के 2% तक पहुँचा। घरेलू उद्योग के लिए 75% पूंजीगत बजट का आरक्षण, फिर भी L-1 की बाधाएं उच्च-तकनीकी नवप्रवर्तकों को बाधित करती हैं।

          GS-3 पर्यावरण / न्याय न्यायशास्त्र का क्षरण

          सुप्रीम कोर्ट ने पिछली तारीख से मंजूरी (Retrospective Clearances) पर प्रतिबंध वापस लिया। अरावली श्रेणियों की नई परिभाषाएं संभावित रूप से निचली चोटियों को खनन शोषण के लिए खोल सकती हैं।

          बुनियादी ढांचा: स्वदेशी जहाज निर्माण का रोजगार पर 6.5 गुना गुणक प्रभाव पड़ता है, जो स्वदेशीकरण के माध्यम से विकास को गति देता है।
          संघवाद: संघीय असंतुलन तब बढ़ता है जब केंद्र स्वास्थ्य वित्त पोषण में अपनी हिस्सेदारी कम करता है, जिससे राज्यों के परिणामों में विषमता का जोखिम होता है।
          संविधान: राज्यपाल “राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत” पद धारण करते हैं, जिससे वे राज्यों की तुलना में संघ के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाते हैं।
          संरक्षण: परिपक्व मैंग्रोव को विकसित होने में दशकों लगते हैं और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर वृक्षारोपण अभियानों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।
          GS-4
          पारिस्थितिक कर्तव्य
          सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत: पर्यावरण अनुपालन को औद्योगिक विकास के लिए महज एक “चेकलिस्ट” मानना स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को कमजोर करता है। पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश पर न्यायिक मंजूरी अनुच्छेद 48A के तहत भविष्य की पीढ़ियों के लिए पारिस्थितिक विरासत को संरक्षित करने के राज्य के नैतिक कर्तव्य का उल्लंघन करती है।

          यहाँ सांस्कृतिक भूगोल के विकाससामरिक एयरोस्पेस क्लस्टर और अंतर-क्षेत्रीय संरक्षण पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

          6 फरवरी, 2026 तक भारत के पर्यटन भूगोल में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है, जो पारंपरिक “समुद्र तट बनाम पहाड़” (Beach vs. Hills) के द्वंद्व से आगे बढ़कर अनुभव-आधारित विरासत केंद्रों (Heritage hubs) की ओर बढ़ रहा है।

          • उभरते हुए केंद्रीय केंद्र: अयोध्या (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश), द्वारका (गुजरात) और पुरी (ओडिशा) जैसे शहरों को अब उच्च-मात्रा वाली, साल भर चलने वाली पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं के रूप में मानचित्र पर चिह्नित करें।
          • शिरडी-पंढरपुर बेल्ट का मानचित्रण: महाराष्ट्र के इस प्रमुख तीर्थ गलियारे की स्थिति पहचानें, जो अब एक उच्च-घनत्व वाले “अनुभव-आधारित” (Experience-led) क्षेत्र के रूप में कार्य कर रहा है।
          • रिवरफ्रंट विकास: वाराणसी और महेश्वर के घाटों के किनारे विस्तृत बुनियादी ढांचे के उन्नयन को चिह्नित करें, जहाँ “पवित्र और दैनिक जीवन” को एकीकृत आर्थिक स्थानों के रूप में मैप किया जा रहा है।

          6 फरवरी, 2026 को एयरोस्पेस के लिए एक नए ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CoE) का उद्घाटन किया गया, जिसने वडोदरा को भारत के उच्च-तकनीकी औद्योगिक मानचित्र पर एक प्रमुख बिंदु के रूप में स्थापित किया है।

          • गति शक्ति हब: यह वडोदरा में स्थित गति शक्ति विश्वविद्यालय (GSV) में है, जो परिवहन और रसद (Logistics) पर केंद्रित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है।
          • सतत विमानन ईंधन (Sustainable Aviation Fuel – SAF): यह केंद्र विशेष रूप से नगर निगम के ठोस कचरे (MSW) से SAF बनाने की तकनीकों का मानचित्रण कर रहा है, जो एक महत्वपूर्ण पर्यावरण-आर्थिक कड़ी है।
          • एयरोस्पेस पारिस्थितिकी तंत्र: वडोदरा को एयरबस-GSV साझेदारी के प्राथमिक केंद्र के रूप में चिह्नित करें, जिसका उद्देश्य वैश्विक एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखला का स्थानीयकरण करना है।

          यद्यपि इसकी स्थापना पहले हुई थी, लेकिन करिमपुझा वन्यजीव अभयारण्य को इस तिथि पर “नीलगिरी परिदृश्य” (Nilgiri Landscape) की निरंतरता में इसकी भूमिका के लिए विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

          • पारिस्थितिक कड़ी: यह केरल की साइलेंट वैली (शांत घाटी) और तमिलनाडु के मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान के बीच एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेतु (Bridge) बनाता है।
          • नदी भूगोल: इसका नाम करिमपुझा नदी के नाम पर रखा गया है, जो चालियार नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
          • जनजातीय विरासत: इसे चोलनायक्कन (Cholanaikan) जनजाति के पारंपरिक आवास के रूप में मैप किया गया है, जो पश्चिमी घाट के सबसे अलग रहने वाले शिकारी-संग्राहक समूहों में से एक है।

          भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने 6 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ता फिर से शुरू करने की शर्तों पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए।

          • छह-देशीय ब्लॉक: अपने मानचित्र पर GCC के सदस्यों को पहचानें: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन।
          • रणनीतिक चोक पॉइंट: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को भारत को इस व्यापार ब्लॉक से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी (Artery) के रूप में चिह्नित करें।
          श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
          नया विरासत केंद्रअयोध्या का कायाकल्पउत्तर प्रदेश
          एयरोस्पेस CoEगति शक्ति विश्वविद्यालयवडोदरा, गुजरात
          पश्चिमी घाट की कड़ीकरिमपुझा अभयारण्यकेरल (नीलगिरी BR)
          व्यापार भूगोलGCC राष्ट्रपश्चिम एशिया / खाड़ी क्षेत्र

          सांस्कृतिक केंद्रों को मैप करते समय उनके पास से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों को भी देखें। उदाहरण के लिए, अयोध्या और वाराणसी के बीच की कनेक्टिविटी उत्तर प्रदेश के पूर्वी आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार, वडोदरा की स्थिति दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे (DMIC) पर इसकी सामरिक महत्ता को बढ़ाती है।

          मानचित्रण विवरण

          सांस्कृतिक केंद्र एवं एयरोस्पेस क्लस्टर
          पवित्र भूगोल विरासत-आधारित केंद्र

          अयोध्या, उज्जैन और द्वारका जैसे उच्च-आवागमन वाले केंद्रों की ओर झुकाव। महाराष्ट्र में उच्च-घनत्व वाले शिरडी-पंढरपुर तीर्थ बेल्ट पर ध्यान दें।

          व्यापारिक गुट GCC FTA की बहाली

          6 राष्ट्रों (सऊदी, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन) और होर्मुज जलडमरूमध्य की पहचान करें, जो भारत को खाड़ी से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी है।

          रणनीतिक एयरोस्पेस हब
          वडोदरा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

          गति शक्ति विश्वविद्यालय में एयरबस साझेदारी के लिए एक प्राथमिक नोड। मानचित्रण एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखलाओं के स्थानीयकरण और MSW-से-SAF विमानन ईंधन तकनीक पर केंद्रित है।

          अंतर-क्षेत्रीय संरक्षण
          करीमपुझा वन्यजीव अभयारण्य

          साइलेंट वैली (केरल) और मुकुर्थी (तमिलनाडु) के बीच एक पारिस्थितिक पुल बनाता है। नीलगिरी परिदृश्य में एकांत चोलनायकन जनजाति का आवास।

          नदी विरासत

          गंगा और नर्मदा नदियों पर वाराणसी और महेश्वर घाटों के साथ बुनियादी ढांचे के मानचित्रण के माध्यम से “पवित्र और रोजमर्रा” को एकीकृत करना।

          विरासत केंद्र अयोध्या परिवर्तन (उत्तर प्रदेश)।
          एयरोस्पेस हब वडोदरा (गति शक्ति विश्वविद्यालय)।
          संरक्षण करीमपुझा अभयारण्य (केरल)।
          एटलस रणनीति
          स्थानिक आधार: 2026 का मानचित्रण लॉजिस्टिक्स (गति शक्ति) के साथ पारंपरिक विरासत (पवित्र केंद्रों) के संगम को उजागर करता है। नीलगिरी जैव विविधता गलियारों के विश्लेषण के लिए साइलेंट वैली और मुकुर्थी के बीच संपर्क को देखना आवश्यक है।

          IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 5 फ़रवरी 2026 (Hindi)

          यह अध्याय “महिलाएँ, जाति एवं सुधार” 19वीं और 20वीं शताब्दी के भारत की सामाजिक स्थितियों और उन आंदोलनों की व्याख्या करता है जिन्होंने समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं को चुनौती दी।

          19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय समाज लिंग और जाति के आधार पर गहरे भेदभाव से ग्रस्त था।

          • बाल विवाह: अधिकांश बच्चों की शादी बहुत कम उम्र में ही कर दी जाती थी।
          • बहुपत्नी प्रथा: हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की अनुमति थी।
          • सती प्रथा: देश के कुछ हिस्सों में विधवाओं को उनके पति की चिता पर जिंदा जलने के लिए मजबूर किया जाता था। ऐसी महिलाओं को “सती” (यानी ‘सदाचारी महिला’) कहकर महिमामंडन किया जाता था।
          • शिक्षा में बाधाएँ: महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार लगभग बंद थे। समाज में यह अंधविश्वास फैला था कि अगर महिला शिक्षित होगी, तो वह जल्दी विधवा हो जाएगी।
          • संपत्ति के अधिकार: संपत्ति पर स्वामित्व या विरासत में महिलाओं के अधिकार बहुत सीमित थे।
          • उच्च जातियाँ: ब्राह्मण और क्षत्रिय खुद को सबसे ऊपर मानते थे।
          • मध्यम जातियाँ: इसके बाद वैश्य (व्यापारी और महाजन) और फिर शूद्र (किसान और बुनकर/कुम्हार जैसे कारीगर) आते थे।
          • अस्पृश्यता (छुआछूत): सबसे निचले स्तर पर वे लोग थे जिनके काम को “दूषित” माना जाता था। उन्हें मंदिरों में जाने, सवर्णों के कुओं से पानी भरने या उनके तालाबों का उपयोग करने की अनुमति नहीं थी।

          19वीं सदी में छपाई की नई तकनीक (किताबें, अखबार, पत्रिकाएं) के विकास ने सामाजिक मुद्दों पर बहस करना आसान बना दिया। पहली बार आम जनता के बीच इन बुराइयों पर चर्चा शुरू हुई।

          • ब्रह्म सभा: राममोहन राय ने कलकत्ता में ‘ब्रह्म सभा’ (बाद में ब्रह्म समाज) की स्थापना की। उनका मानना था कि समाज में अन्यायपूर्ण प्रथाओं को बदला जाना चाहिए।
          • सती प्रथा का अंत: राममोहन राय ने प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान के आधार पर यह सिद्ध किया कि सती प्रथा को प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी स्वीकृति नहीं दी गई है।
          • कानूनी सफलता: उनके प्रयासों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया।
          • ईश्वरचंद्र विद्यासागर: उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का हवाला देकर तर्क दिया कि विधवाओं को दोबारा शादी करने की अनुमति होनी चाहिए।
          • कानून: उनके सुझावों पर अमल करते हुए अंग्रेजों ने 1856 में विधवा विवाह के पक्ष में कानून पारित किया।
          • आंदोलन का प्रसार: मद्रास प्रेसीडेंसी में वीरेशलिंगम पंतुलु और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी विधवा विवाह का पुरजोर समर्थन किया।

          सुधारकों का मानना था कि महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी उपकरण है, हालाँकि उन्हें भारी सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा।

          • विरोध और भय: लोगों को डर था कि स्कूल जाने से लड़कियाँ घरेलू कामकाज छोड़ देंगी और सार्वजनिक स्थानों से गुजरने पर उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
          • घरेलू शिक्षा: इस डर के कारण कई महिलाओं को उनके उदारवादी पिताओं या पतियों ने घर पर ही पढ़ाया। राससुंदरी देवी जैसी महिलाओं ने तो मोमबत्ती की रोशनी में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा।
          • मुस्लिम सुधारक: मुमताज़ अली ने कुरान की आयतों की पुनर्व्याख्या की ताकि महिलाओं की शिक्षा के पक्ष में तर्क दिया जा सके। भोपाल की बेगमों और बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोले।

          19वीं सदी के अंत तक महिलाओं ने स्वयं लिखना और अपनी सामाजिक स्थिति को चुनौती देना शुरू कर दिया।

          • ताराबाई शिंदे: उन्होंने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक भेदभाव और दोहरे मानदंडों की कड़ी आलोचना की गई।
          • पंडिता रमाबाई: वे संस्कृत की महान विद्वान थीं। उन्होंने ऊँची जातियों की हिंदू महिलाओं के उत्पीड़न पर लिखा और पुणे में एक ‘विधवा गृह’ की स्थापना की ताकि बेसहारा महिलाओं को आश्रय और व्यावसायिक प्रशिक्षण मिल सके।
          • राजनैतिक दबाव: 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं ने वोट देने के अधिकार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और कानूनी समानता के लिए अपने संगठन बनाए।

          19वीं और 20वीं सदी में जाति व्यवस्था के अन्याय को चुनौती देने वाले कई आंदोलन शुरू हुए।

          • आर्यों की श्रेष्ठता पर हमला: फुले का तर्क था कि ब्राह्मण स्वयं को जो श्रेष्ठ बताते हैं वह गलत है क्योंकि वे बाहर से आए ‘आर्य’ हैं जिन्होंने यहाँ के मूल निवासियों (निम्न जातियों) को गुलाम बनाया।
          • सत्यशोधक समाज: फुले द्वारा स्थापित इस संगठन ने जातिगत समानता के विचार का प्रचार किया।
          • अंतर्राष्ट्रीय संबंध: 1873 में अपनी पुस्तक ‘गुलामगीरी’ को फुले ने उन अमेरिकियों को समर्पित किया जिन्होंने दासों को मुक्त करने के लिए संघर्ष किया था, इस प्रकार उन्होंने भारत की निम्न जातियों और अमेरिका के काले दासों की स्थिति को एक साथ जोड़ दिया।
          • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: एक महार परिवार में जन्मे अम्बेडकर ने बचपन से जातिगत भेदभाव झेला था। उन्होंने 1927 से 1935 के बीच तीन मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाए ताकि समाज में जातिगत पूर्वाग्रहों की गहराई को उजागर किया जा सके।
          • ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार): उन्होंने दक्षिण भारत में ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ (Self Respect Movement) शुरू किया। वे मनुस्मृति और रामायण जैसे धर्मग्रंथों के कट्टर आलोचक थे, क्योंकि उनका मानना था कि इनका उपयोग ब्राह्मणवादी और पुरुष वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया गया है।
          1. ब्रह्म समाज (1830): मूर्ति पूजा और बलि का विरोध किया; उपनिषदों में विश्वास।
          2. यंग बंगाल आंदोलन: हेनरी डेरोजियो के नेतृत्व में; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तार्किक सोच पर जोर।
          3. रामकृष्ण मिशन: स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित; समाज सेवा और निस्वार्थ कर्म के माध्यम से मुक्ति का मार्ग।
          4. अलीगढ़ आंदोलन: सर सैयद अहमद खान के नेतृत्व में; मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए 1875 में ‘मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ की स्थापना।
          5. सिंह सभा आंदोलन: सिखों में व्याप्त अंधविश्वासों और जातिवाद को दूर करने तथा आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अमृतसर में शुरुआत।
          1. सुधारक: वे व्यक्ति जो समाज में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं।
          2. सती: पति के साथ चिता पर जलने वाली ‘पुण्यवान’ महिला (शाब्दिक अर्थ)।
          3. अस्पृश्य: वे लोग जिन्हें समाज के मुख्य हिस्से से अलग रखा गया था।
          4. महार: महाराष्ट्र की एक प्रमुख अछूत मानी जाने वाली जाति।
          NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
          अध्याय – 9

          महिलाएँ, जाति एवं सुधार

          सामाजिक असमानताएँ
          महिलाओं की स्थिति: कम उम्र में विवाह, बहुपत्नी प्रथा और सती जैसी प्रथाओं का सामना; संपत्ति या शिक्षा तक लगभग कोई पहुँच नहीं।
          जाति व्यवस्था: एक कठोर व्यवस्था जिसमें ब्राह्मणों को शीर्ष पर और “अछूतों” को सबसे नीचे रखा गया; वे मंदिरों और साझा जल स्रोतों से वंचित थे।
          शुरुआती सुधार
          राजा राममोहन राय: ब्रह्म समाज की स्थापना की; उनके प्रयासों से 1829 में सती प्रथा पर रोक लगी।
          विधवा विवाह: ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने इसका समर्थन किया, जिससे 1856 में विधवा विवाह अधिनियम पारित हुआ।
          प्रतिरोध और परिवर्तन की आवाजें
          महिला सुधारक: ताराबाई शिंदे ने दोहरे मापदंडों को चुनौती देने के लिए स्त्रीपुरुषतुलना लिखी। पंडिता रमाबाई ने उत्पीड़ित उच्च-जातीय विधवाओं के लिए आश्रम स्थापित किए।
          ज्योतिराव फुले: सत्यशोधक समाज की स्थापना की; गुलामगीरी (1873) लिखी, जिसमें निम्न जाति के भारतीयों के संघर्ष को अमेरिका में दासता के अंत से जोड़ा।
          डॉ. बी.आर. अंबेडकर: गहरी जड़ों वाले पूर्वाग्रहों को उजागर करने और दलितों के अधिकारों के लिए मंदिर प्रवेश आंदोलनों (1927-35) का नेतृत्व किया।
          पेरियार: दक्षिण में आत्म-सम्मान आंदोलन शुरू किया; ब्राह्मणवादी और पुरुष वर्चस्व को सही ठहराने वाले शास्त्रों की कड़ी आलोचना की।
          आधुनिक शिक्षा: सैयद अहमद खान (अलीगढ़ आंदोलन) और सिंह सभाओं ने क्रमशः मुसलमानों और सिखों के लिए शिक्षा के आधुनिकीकरण का कार्य किया।

          गुलामगीरी

          1873 में फुले द्वारा लिखी गई पुस्तक, जिसका अर्थ है ‘गुलामी’; इसे अमेरिकी दास-मुक्ति आंदोलन को समर्पित किया गया।

          आर्य समाज

          हिंदू धर्म में सुधार और शिक्षा के समर्थन के लिए 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित।

          मंदिर प्रवेश

          पवित्र सार्वजनिक स्थानों से दलितों के बहिष्कार को चुनौती देने के लिए अंबेडकर के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलन।

          समानता का
          उदय
          सामाजिक सुधार केवल कानूनों को बदलने के बारे में नहीं था, बल्कि मानसिकता को चुनौती देने के बारे में था। प्राचीन ग्रंथों पर सवाल उठाकर और प्रेस की शक्ति का उपयोग करके, सुधारकों ने एक अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक आधुनिक भारत का मार्ग प्रशस्त किया।

          भारतीय संसद में विधेयकों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: साधारण विधेयक, धन विधेयक, वित्त विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक। यहाँ पहले तीन प्रकारों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो विधायी कार्यों के बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं।

          ये विधेयक वित्तीय विषयों के अलावा किसी भी अन्य मामले से संबंधित होते हैं।

          • प्रस्तुतीकरण: इसे संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है।
          • किसके द्वारा: इसे या तो कोई मंत्री (सरकारी विधेयक) या कोई गैर-सरकारी सदस्य (Private Member) पेश कर सकता है।
          • पारित होना: इसे दोनों सदनों द्वारा ‘साधारण बहुमत’ से पारित किया जाना आवश्यक है।
          • गतिरोध और संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108): यदि दोनों सदनों के बीच विधेयक को लेकर असहमति हो, तो राष्ट्रपति गतिरोध को दूर करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है।
          • राज्यसभा की शक्ति: राज्यसभा किसी साधारण विधेयक को अधिकतम 6 महीने तक रोक सकती है।

          अनुच्छेद 110 के अनुसार, कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ तब माना जाता है जब उसमें केवल कराधान (Taxation), सरकार द्वारा धन उधार लेने, या भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से संबंधित मामले शामिल हों।

          • प्रमाणन (Certification): केवल लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ही यह प्रमाणित कर सकता है कि कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं। उनका निर्णय अंतिम होता है और उसे किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
          • प्रस्तुतीकरण (अनुच्छेद 109):
            1. इसे केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है।
            2. इसे पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश अनिवार्य है।
          • राज्यसभा की सीमित भूमिका:
            1. राज्यसभा इसे न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही इसमें संशोधन कर सकती है; वह केवल सिफारिशें कर सकती है।
            2. राज्यसभा को यह विधेयक 14 दिनों के भीतर वापस करना होता है।
            3. यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर कार्रवाई नहीं करती है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
          • राष्ट्रपति की अनुमति: राष्ट्रपति इसे अपनी सहमति दे सकता है या रोक सकता है, लेकिन वह इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता (क्योंकि यह उनकी पूर्व अनुमति से ही पेश किया गया था)।

          एक प्रसिद्ध कहावत है: “सभी धन विधेयक वित्त विधेयक होते हैं, लेकिन सभी वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होते।” इसके दो प्रकार हैं:

          A. वित्त विधेयक (I) – अनुच्छेद 117(1):
          इसमें अनुच्छेद 110 में उल्लिखित विषयों के साथ-साथ अन्य सामान्य विधायी मामले भी शामिल होते हैं।

          • धन विधेयक के साथ समानता: इसे भी केवल लोकसभा में राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही पेश किया जा सकता है।
          • साधारण विधेयक के साथ समानता: एक बार पेश होने के बाद, इसे साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अर्थात राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकार कर सकती है और इस पर संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है)।

          B. वित्त विधेयक (II) – अनुच्छेद 117(3):
          इसमें भारत की संचित निधि से व्यय (Expenditure) से जुड़े प्रावधान होते हैं, लेकिन अनुच्छेद 110 का कोई भी विषय इसमें शामिल नहीं होता।

          • प्रक्रिया: इसे पूरी तरह से एक साधारण विधेयक की तरह माना जाता है। इसे किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती (सिफारिश केवल विचार करने के चरण में आवश्यक होती है)।
          विशेषतासाधारण विधेयकधन विधेयक (अनु. 110)वित्त विधेयक (I)
          उत्पत्ति का सदनकिसी भी सदन मेंकेवल लोकसभा मेंकेवल लोकसभा में
          राष्ट्रपति की सिफारिशआवश्यक नहींअनिवार्यअनिवार्य
          राज्यसभा की शक्तिसंशोधन/अस्वीकार कर सकती हैन संशोधन, न अस्वीकारसंशोधन/अस्वीकार कर सकती है
          गतिरोध का समाधानसंयुक्त बैठकसंयुक्त बैठक का प्रावधान नहींसंयुक्त बैठक
          अधिकतम विलंब (RS)6 महीने14 दिन6 महीने

          प्रत्येक विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों में इन चरणों से गुजरना पड़ता है:

          1. प्रथम वाचन (First Reading): विधेयक को पेश करना और इसे भारत के राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित करना।
          2. द्वितीय वाचन (Second Reading): इसमें विधेयक पर सामान्य चर्चा होती है और फिर प्रत्येक खंड (Clause) पर विस्तार से विचार किया जाता है। यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
          3. तृतीय वाचन (Third Reading): इस चरण में विधेयक पर अंतिम रूप से मतदान होता है (यहाँ कोई संशोधन नहीं किया जा सकता)।
          4. दूसरे सदन में विधेयक: दूसरे सदन में भी यही तीनों वाचन (Readings) होते हैं।
          5. राष्ट्रपति की अनुमति: जब दोनों सदन विधेयक पारित कर देते हैं, तो यह राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह ‘अधिनियम’ (Act) बन जाता है।

          यह याद रखें कि संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों और वित्त विधेयकों के लिए है। धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती।

          संघीय विधायिका • अनु. 107-117
          विधायी प्रक्रिया

          विधेयकों का वर्गीकरण

          अनुच्छेद 110
          धन विधेयकों को परिभाषित करता है। केवल अध्यक्ष ही किसी विधेयक की प्रकृति को प्रमाणित कर सकते हैं; यह निर्णय अंतिम और निर्विवाद है।
          पाँच चरण
          प्रत्येक विधेयक को अधिनियम बनने के लिए दोनों सदनों में 3 वाचनों से गुजरना होता है, जिसके बाद राष्ट्रपति की सहमति आवश्यक होती है।
          साधारण विधेयक (अनु. 107)
          किसी भी मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य द्वारा किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। दोनों सदनों में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है।
          गतिरोध: यदि सदन असहमत हों, तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक (अनु. 108) बुला सकते हैं। राज्यसभा इसे अधिकतम 6 महीने तक रोक सकती है।
          धन विधेयक (अनु. 109)
          राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के साथ केवल लोकसभा में पेश किया जाता है। राज्यसभा के पास इसे अस्वीकार या संशोधित करने की कोई शक्ति नहीं है।
          14-दिन का नियम: राज्यसभा को 14 दिनों के भीतर विधेयक वापस करना होगा, अन्यथा इसे पारित माना जाता है। संयुक्त बैठक की अनुमति नहीं है।

          वित्त विधेयक (I)

          सिफारिश के साथ केवल लोकसभा में पेश किया जाता है; एक बार पेश होने के बाद, इसे साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अनु. 117(1))।

          वित्त विधेयक (II)

          इसमें संचित निधि से व्यय शामिल होता है। इसे पूरी तरह से साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अनु. 117(3))।

          सहमति शक्ति

          राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं कर सकते, क्योंकि यह उनकी पूर्व सहमति से ही पेश किया जाता है।

          कानूनी
          सूत्र
          वित्तीय विधानों के बीच संवैधानिक संबंध सरल है: सभी धन विधेयक वित्त विधेयक होते हैं, लेकिन सभी वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होते। जबकि साधारण और वित्त विधेयकों में राज्यसभा की पूर्ण भागीदारी और संयुक्त बैठक का प्रावधान है, धन विधेयक केवल लोकसभा और अध्यक्ष के अनन्य अधिकार क्षेत्र में रहता है।

          यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (5 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; केंद्र-राज्य संबंध; संघवाद) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा)।

          • संदर्भ: मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को वापस लिया जाना और युमनाम खेमचंद सिंह का राज्य के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना।
          • मुख्य बिंदु:
            • राष्ट्रपति शासन की समाप्ति: राष्ट्रपति शासन को लागू होने के लगभग एक साल बाद वापस ले लिया गया है ताकि एक लोकप्रिय चुनी हुई सरकार की वापसी हो सके और इसे आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक अनिवार्य संवैधानिक संशोधन विधेयक से बचा जा सके।
            • गठबंधन नेतृत्व: नई सरकार में दो उपमुख्यमंत्री शामिल किए गए हैं—नेमचा किपजेन (कुकी-ज़ो समुदाय से) और लोसी दिखो (नागा पीपुल्स फ्रंट से)। इसका उद्देश्य समावेशिता का संदेश देना है।
            • निरंतर विस्थापन: अनुमानित 60,000 विस्थापित व्यक्तियों में से केवल 9,000 ही अपने घरों को लौट पाए हैं, जो समुदायों के बीच विश्वास की भारी कमी को दर्शाता है।
            • जातीय तनाव: भाजपा की आंतरिक एकता के बावजूद, प्रमुख कुकी-ज़ो संगठनों (KZC और KIM) ने अपने विधायकों को सरकार में शामिल होने के खिलाफ चेतावनी दी है और “अलग प्रशासन” की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।
          • UPSC प्रासंगिकता: “पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा चुनौतियां”, “राज्यपाल की भूमिका और राष्ट्रपति शासन” तथा “जातीय-राजनीतिक संघर्ष” के लिए अनिवार्य।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • नेतृत्व का परिवर्तन: पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के “विफल दूसरे कार्यकाल” के कारण भाजपा के भीतर विरोधियों के एक गठबंधन ने सफलतापूर्वक नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव बनाया।
            • सुरक्षा बनाम सुलह: हालांकि सुरक्षा बलों ने लूटे गए कई हथियारों को बरामद किया है, लेकिन जनवरी में एक कुकी-ज़ो क्षेत्र में एक मैतेई व्यक्ति की हत्या यह दर्शाती है कि कट्टरपंथी समूहों का अभी भी महत्वपूर्ण प्रभाव बना हुआ है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; सरकारी बजट; राजकोषीय नीति)।

          • संदर्भ: सी. रंगराजन और डी.के. श्रीवास्तव द्वारा 2026-27 के केंद्रीय बजट में व्यय के संरचनात्मक बदलावों और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण (Fiscal Consolidation) की धीमी गति का विश्लेषण।
          • मुख्य बिंदु:
            • राजस्व पुनर्गठन: कुल व्यय में राजस्व व्यय की हिस्सेदारी 2014-15 के 88 प्रतिशत से गिरकर 2026-27 में 77 प्रतिशत हो गई है। इसका मुख्य कारण केंद्रीय सब्सिडी में 7 प्रतिशत की कटौती है।
            • स्थिर पूंजीगत व्यय (Capex): हालांकि नाममात्र के पूंजीगत व्यय में 11.5 प्रतिशत की वृद्धि का बजट रखा गया है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में यह पिछले वर्ष के 3.1 प्रतिशत के स्तर पर ही स्थिर है।
            • ब्याज का बोझ: ब्याज भुगतान अब राजस्व प्राप्तियों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा डकार रहा है, जिससे प्राथमिक विकासात्मक कार्यों के लिए राजकोषीय स्थान बहुत कम हो गया है।
            • 16वाँ वित्त आयोग (FC16): वित्त आयोग ने राज्यों के लिए 41 प्रतिशत की हिस्सेदारी बरकरार रखी है, लेकिन ‘राजस्व घाटा अनुदान’ को बंद कर दिया है, जिससे हस्तांतरण में कुल मिलाकर कमी आई है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता”, “राजकोषीय संघवाद” और “संसाधन संग्रहण” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • धीमा सुदृढ़ीकरण: राजकोषीय घाटा-जीडीपी अनुपात में वार्षिक कमी 2026-27 के बजट अनुमानों में घटकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गई है।
            • निजी निवेश का जोखिम: यदि केंद्र और राज्यों का संयुक्त घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 8-9 प्रतिशत पर बना रहता है, तो यह निजी क्षेत्र के लिए निवेश योग्य संसाधनों को बाजार से बाहर धकेल देगा (Crowding out effect)।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।

          • संदर्भ: 5 फरवरी, 2026 को ‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि की समाप्ति और ट्रम्प प्रशासन के तहत नाटो (NATO) के भीतर विश्वास का टूटना।
          • मुख्य बिंदु:
            • हथियार नियंत्रण का अंत: ‘न्यू स्टार्ट’ अमेरिका और रूस के परमाणु शस्त्रागार को सीमित करने वाली अंतिम शेष संधि थी; इसकी समाप्ति शीत युद्ध के दौर जैसी हथियार जमा करने की होड़ की वापसी का संकेत है।
            • आधुनिकीकरण की दौड़: चीन (2023 से प्रतिवर्ष 100 हथियार जोड़ रहा है), रूस और अमेरिका सभी अपने परमाणु भंडारों के आधुनिकीकरण में लगे हुए हैं।
            • रणनीतिक बदलाव: ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप और अमेरिका के बीच आई दरार ने अमेरिका की “अंतिम सुरक्षा गारंटर” वाली छवि को नुकसान पहुँचाया है।
            • यूक्रेन का सबक: इस संघर्ष ने दिखाया है कि एक गैर-परमाणु देश भी परमाणु शक्ति संपन्न शत्रु के खिलाफ अपना बचाव कर सकता है, यदि उसे मजबूत पारंपरिक सैन्य सहायता मिले।
          • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक सुरक्षा संरचना”, “परमाणु अप्रसार” और “अमेरिका-यूरोप-रूस भू-राजनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • यूरोपीय स्वायत्तता: यूरोप अब एक नई सुरक्षा संरचना पर विचार करने के लिए मजबूर है जिसमें ब्रिटिश और फ्रांसीसी “परमाणु छतरी” (Nuclear Umbrella) शामिल हो सकती है।
            • वर्जना बनाम वास्तविकता: हालांकि 1945 के बाद से किसी परमाणु हथियार का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन “उपयोग योग्य” टैक्टिकल परमाणु हथियारों के विकास से परमाणु हमले और पारंपरिक हमले के बीच की रेखा धुंधली हो रही है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था; सामाजिक न्याय; उच्च शिक्षा)।

          • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना, 2026) के नियमों पर रोक लगा दी है, जिसमें स्पष्टता की कमी और संभावित दुरुपयोग का हवाला दिया गया है।
          • मुख्य बिंदु:
            • परिभाषा संबंधी विवाद: विवाद का केंद्र “जाति-आधारित भेदभाव” की नई परिभाषा है, जो विशेष रूप से केवल SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों पर केंद्रित है।
            • अपराधी का अनुमान: अनारक्षित (सामान्य) श्रेणी के सदस्यों का आरोप है कि ये नियम अनुचित रूप से यह मान लेते हैं कि वे हमेशा भेदभाव करने वाले पक्ष होंगे।
            • सुरक्षा उपायों का अभाव: 2026 के नियमों ने उन पिछले प्रावधानों को हटा दिया है जिनका उद्देश्य “झूठी” या “प्रेरित” शिकायतों को दंडित करना था।
            • न्यायिक अल्टीमेटम: न्यायालय ने 2026 के नियमों पर रोक लगाते हुए पुराने 2012 के नियमों को लागू रखा है, और यह सवाल उठाया है कि क्या जाति के लिए अलग परिभाषा संवैधानिक रूप से मान्य है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 15)” और “न्यायिक समीक्षा”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • वास्तविक समानता: सरकार का तर्क है कि उसे भेदभाव के विशिष्ट उपसमूहों को पहचानने का अधिकार है, क्योंकि जाति-आधारित पूर्वाग्रह असमान होते हैं और वंचित समूहों के लिए अधिक हानिकारक होते हैं।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शिक्षा से संबंधित मुद्दे; मानव संसाधन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

          • संदर्भ: भारत में 1.5 लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जहाँ शिक्षण कार्यबल का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा अनुबंधात्मक (Contractual) या अंशकालिक है।
          • मुख्य बिंदु:
            • कार्यबल में हिस्सेदारी: अनुबंध के आधार पर नियोजित शिक्षक (शिक्षा मित्र, अतिथि शिक्षक) वर्तमान में भारत के कुल स्कूली कार्यबल का 16 प्रतिशत (16 लाख से अधिक) हैं।
            • वेतन असमानता: विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुबंधात्मक शिक्षक समान कार्य करने के बावजूद नियमित शिक्षकों की तुलना में अक्सर एक-चौथाई या उससे भी कम वेतन पाते हैं।
            • पूर्वोत्तर में एकाग्रता: अनुबंधात्मक कर्मचारियों पर निर्भरता मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे अधिक है।
            • निजी क्षेत्र का प्रभाव: लगभग 21 प्रतिशत निजी स्कूलों में कम से कम आधा कार्यबल अनुबंधात्मक है, जो सभी प्रबंधन प्रकारों में सबसे अधिक है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौतियां”, “श्रम कानूनों का उल्लंघन” और “श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा”।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • लेबल का दुरुपयोग: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया कि प्रशासन 10 साल से अधिक समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को स्थायी दर्जा देने से मना करने के लिए “अनुबंधात्मक लेबल” का दुरुपयोग नहीं कर सकता।
            • निरंतर विरोध प्रदर्शन: पुडुचेरी, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में नौकरी के नियमितीकरण के लिए चल रहे प्रदर्शन इस राष्ट्रीय समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं।

          संपादकीय विश्लेषण

          05 फरवरी, 2026
          GS-3 अर्थव्यवस्था संरचनात्मक बजटीय बदलाव

          ब्याज भुगतान राजस्व प्राप्तियों का 40% हिस्सा ले रहा है। सब्सिडी में 7% की कटौती की गई क्योंकि राजस्व व्यय का हिस्सा गिरकर 77% रह गया है।

          GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध परमाणु हथियारों की दौड़

          ‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि की समाप्ति सीमाओं के अंत का संकेत है। चीन सालाना 100 वारहेड जोड़ रहा है क्योंकि निवारण अब “उपयोग योग्य” सामरिक परमाणु हथियारों की ओर बढ़ रहा है।

          GS-2 शिक्षा / श्रम संविदात्मक स्कूली शिक्षा

          1.5 लाख स्कूलों में 50% संविदा कर्मचारी हैं। समान कार्यों के बावजूद पैरा-टीचर्स नियमित कर्मचारियों के वेतन का केवल 1/4 हिस्सा कमाते हैं।

          आंतरिक सुरक्षा: 60,000 विस्थापित व्यक्तियों में से केवल 9,000 ही मणिपुर लौटे हैं, जो निरंतर विश्वास की कमी को उजागर करता है।
          राजकोषीय: 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान की समाप्ति राज्यों पर दबाव डालती है; संयुक्त घाटे से निजी पूंजी के बाहर होने (crowding out) का जोखिम है।
          रक्षा: नाटो-ट्रंप विश्वास टूटने के कारण यूरोप अब फ्रांसीसी/ब्रिटिश “परमाणु छत्र” (nuclear umbrella) वाले सुरक्षा ढांचे की तलाश कर रहा है।
          न्याय: उच्च न्यायालय ने लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को स्थायी दर्जा देने से इनकार करने के लिए ‘संविदात्मक लेबल’ के “दुरुपयोग” के खिलाफ चेतावनी दी है।
          GS-4
          न्याय और नीति
          तात्विक समानता बनाम अस्पष्टता: सरकार जाति-आधारित पूर्वाग्रह को विषम (asymmetric) रूप में विशिष्ट पहचान देने का तर्क देती है। हालाँकि, नीति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता से समझौता न हो, क्योंकि कोई भी नियामक अस्पष्टता उसी पूर्वाग्रह को आमंत्रित करती है जिसे वह खत्म करना चाहती है।

          यहाँ पारिस्थितिक संगमोंवैज्ञानिक बुनियादी ढांचे, और पवित्र नदी भूगोल पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

          इस अभयारण्य का मानचित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की दो सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों के एक अद्वितीय मिलन बिंदु पर स्थित है।

          • संगम बिंदु: यह राजस्थान में विंध्य और अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के भूगर्भीय मिलन बिंदु पर स्थित है।
          • स्थलाकृतिक विशेषता: इसकी विशेषता चंबल नदी बेसिन के विस्तृत और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ (Ravines) हैं।
          • मानचित्रण संदर्भ: यह अभयारण्य लगभग 1,111 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और रणथंभौर तथा उत्तरी आवासों के बीच बाघों की आवाजाही के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण गलियारे (Corridor) के रूप में कार्य करता है।

          उच्च-ऊंचाई वाले बुनियादी ढांचे का निर्माण वर्ष 2026 का एक प्रमुख विषय है। ‘ट्रांस-हिमालय’ क्षेत्र में दो प्रमुख “विशाल विज्ञान” (Mega Science) सुविधाओं का मानचित्रण किया जा रहा है।

          • राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (National Large Solar Telescope – NLST): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास स्थापित किया जा रहा है। इस स्थान का चयन रणनीतिक रूप से उच्च-ऊंचाई वाले सौर अनुसंधान के लिए किया गया है।
          • 30-मीटर राष्ट्रीय विशाल ऑप्टिकल दूरबीन (NLOT): यह वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग के लिए एक प्रमुख बिंदु है, जो गहरे अंतरिक्ष (Deep-space) के अवलोकन में भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।

          5 फरवरी, 2026 को फल्गु नदी के अद्वितीय “छिपे हुए” भूगोल को इसके सांस्कृतिक और जल विज्ञान संबंधी महत्व के कारण रेखांकित किया गया।

          • संगम और मार्ग: यह गया के पास लीलाजन और मोहना नदियों के मिलन से बनती है। अंततः यह पुनपुन नदी में मिल जाती है, जो गंगा की एक सहायक नदी है।
          • “गुप्त गंगा” (Hidden Ganga): इसे मानचित्र पर एक “छिपी हुई” नदी के रूप में दिखाया जाता है क्योंकि यह एक चौड़े रेतीले तल के नीचे बहती है, और वर्ष के अधिकांश समय सतह पर सूखी दिखाई देती है।
          • मैपिंग पॉइंट: ऐतिहासिक रूप से इस नदी को ‘निरंजना नदी’ के रूप में जाना जाता है, जिसके तट पर गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।

          फरवरी 2026 में हुई एक महत्वपूर्ण गणना के अनुसार पक्षियों की आबादी में 21 प्रतिशत का उछाल देखा गया है, जो इसे एक प्रमुख पारिस्थितिक मानचित्रण बिंदु बनाता है।

          • गणना डेटा: 200 से अधिक प्रजातियों के 5 लाख से अधिक पक्षी दर्ज किए गए।
          • भौगोलिक विशेषता: यह 120.82 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है; पक्षियों की आबादी में वृद्धि का मुख्य कारण पिछले दो वर्षों के दौरान नौकायन (Boating) पर पूर्ण प्रतिबंध और शोर प्रदूषण में कमी को माना गया है।
          श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
          पर्वत संगमविंध्य-अरावली लिंकधौलपुर-करौली, राजस्थान
          छिपी हुई नदीफल्गु (निरंजना)गया, बिहार
          सौर विज्ञान केंद्रपैंगोंग झीललद्दाख
          आर्द्रभूमि सफलतानलसरोवर गणनागुजरात

          फल्गु नदी का अध्ययन करते समय मानचित्र पर ‘विष्णुपद मंदिर’ की स्थिति को भी देखें, जो इसी नदी के तट पर स्थित है। विंध्य और अरावली के संगम को चिह्नित करते समय यह ध्यान रखें कि अरावली श्रृंखला उत्तर-पूर्व की ओर (दिल्ली की तरफ) जाती है, जबकि विंध्य श्रृंखला पूर्व की ओर बढ़ती है।

          मानचित्रण विवरण

          पारिस्थितिक संगम एवं पवित्र नदियाँ
          पर्वतीय संगम विंध्य-अरावली मिलन स्थल

          धौलपुर-करौली रिजर्व (1,111 वर्ग किमी) इन प्राचीन श्रेणियों के मिलन बिंदु पर स्थित है, जो चंबल के बीहड़ों को एक महत्वपूर्ण टाइगर कॉरिडोर के रूप में उपयोग करता है।

          आर्द्रभूमि सफलता नलसरोवर गणना 2026

          गुजरात में पक्षियों की आबादी (5 लाख+) में 21% की वृद्धि दर्ज की गई, जिसका श्रेय अभयारण्य में नौकायन पर पूर्ण प्रतिबंध को दिया गया।

          नदी भूगोल
          फल्गु: अदृश्य “गुप्त गंगा”

          गया के पास लीलाजन और मोहना के संगम से निर्मित यह नदी (प्राचीन निरंजना) रेतीले तल के नीचे बहती है, और साल के अधिकांश समय सतह पर सूखी या “छिपी” रहती है।

          उच्च-ऊंचाई विज्ञान
          लद्दाख मेगा-टेलीस्कोप

          उन्नत अंतरिक्ष अवलोकन के लिए पेंगोंग झील के पास नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप और 30-मीटर ऑप्टिकल टेलीस्कोप का रणनीतिक मानचित्रण।

          टाइगर कॉरिडोर

          राजस्थान की ऊबड़-खाबड़ बीहड़ स्थलाकृति में बाघों के प्रसार के पैटर्न को समझने के लिए रणथंभौर-DKTR अक्ष का मानचित्रण आवश्यक है।

          पर्वतीय संपर्क विंध्य-अरावली (DKTR, राजस्थान)।
          पवित्र नदी फल्गु / निरंजना (गया, बिहार)।
          सौर केंद्र पेंगोंग झील (लद्दाख)।
          एटलस रणनीति
          स्थानिक आधार: धौलपुर-करौली में भूगर्भीय संगम दो अलग-अलग विवर्तनिक (tectonic) इतिहासों का दुर्लभ अध्ययन प्रदान करता है। साथ ही, फल्गु नदी का ‘गुप्त गंगा’ हाइड्रोलॉजिकल मॉडल गंगा प्रणाली में उप-सतह जल निकासी (sub-surface drainage) का एक प्रमुख उदाहरण है।

          IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 4 फ़रवरी 2026 (Hindi)

          यह अध्याय “‘देशी जनता’ को सभ्य बनाना राष्ट्र को शिक्षित करना” भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा के विकास और इसके प्रति ब्रिटिश अधिकारियों तथा भारतीय विचारकों की विभिन्न प्रतिक्रियाओं की व्याख्या करता है।

          1783 में विलियम जोन्स (William Jones) एक जूनियर जज के रूप में कलकत्ता आए। वे एक भाषाविद (Linguist) थे और उन्होंने स्थानीय पंडितों के साथ संस्कृत, व्याकरण और कविता का अध्ययन करना शुरू किया।

          • परंपरा के प्रति सम्मान: जोन्स और हेनरी थॉमस कोलब्रुक जैसे विद्वान भारत और पश्चिम दोनों की प्राचीन संस्कृतियों के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।
          • अतीत की पुनः खोज: उनका मानना था कि भारतीय सभ्यता प्राचीन काल में अपने गौरव के शिखर पर थी, लेकिन बाद में उसका पतन हो गया।
          • संस्कृति के संरक्षक: उनका मानना था कि प्राचीन पवित्र और कानूनी ग्रंथों का अनुवाद करके अंग्रेज भारतीयों को अपनी विरासत को फिर से खोजने में मदद कर सकते हैं, जबकि अंग्रेज उस संस्कृति के “स्वामी” और “अभिभावक” बन जाएंगे।
          • दिल जीतना: अधिकारियों का तर्क था कि अंग्रेजों को वही पढ़ाना चाहिए जिसे देशी लोग महत्व देते हैं और जिससे वे परिचित हैं (संस्कृत और फारसी साहित्य), ताकि वे अपनी प्रजा का सम्मान और विश्वास जीत सकें।
          • कलकत्ता मदरसा (1781): अरबी, फारसी और इस्लामी कानून के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए स्थापित।
          • हिंदू कॉलेज, बनारस (1791): प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए, जो प्रशासन में उपयोगी हो सकें।
          • एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल: विलियम जोन्स द्वारा शोध करने और एशियाटिक रिसर्च नामक पत्रिका प्रकाशित करने के लिए स्थापित।

          19वीं शताब्दी की शुरुआत तक, कई ब्रिटिश अधिकारियों ने प्राच्यवादी दृष्टिकोण पर हमला करना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे वैज्ञानिक आधारहीन और “गंभीर त्रुटियों” से भरा बताया।

          • प्रसन्नता के बजाय उपयोगिता: मिल का तर्क था कि अंग्रेजों को देशी लोगों को केवल उन्हें खुश करने के लिए उनकी पसंद की चीजें नहीं पढ़ानी चाहिए।
          • पश्चिमी प्रगति: उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य “उपयोगी और व्यावहारिक” चीजें सिखाना होना चाहिए, विशेष रूप से पश्चिम की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति।
          • असभ्य भारत: मैकाले भारत को एक असभ्य देश मानते थे जिसे सभ्य बनाना आवश्यक था।
          • “एक अलमारी” का दावा: उन्होंने प्रसिद्ध रूप से घोषणा की कि “एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक अलमारी का एक खाना (Shelf) भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य के बराबर है।”
          • 1835 का अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम: इस अधिनियम ने अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बना दिया और प्राच्य संस्थानों (जैसे कलकत्ता मदरसा और बनारस हिंदू कॉलेज) को बढ़ावा देना बंद कर दिया।

          1854 में ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के अध्यक्ष चार्ल्स वुुड द्वारा जारी इस नीति-पत्र ने भारत के लिए औपचारिक शैक्षिक नीति की रूपरेखा तैयार की।

          • व्यावसायिक लाभ: इसमें तर्क दिया गया कि यूरोपीय शिक्षा से भारतीयों को व्यापार और वाणिज्य के लाभों को पहचानने में मदद मिलेगी, जिससे ब्रिटिश सामानों की मांग पैदा होगी।
          • नैतिक और प्रशासनिक लाभ: इसका दावा था कि पश्चिमी साहित्य भारतीयों को सत्यवादी और ईमानदार बनाएगा, जिससे कंपनी को सिविल सेवकों (कर्मचारियों) की एक भरोसेमंद आपूर्ति मिलेगी।
          • संस्थागत परिवर्तन: इसके परिणामस्वरूप सरकारी शिक्षा विभागों का गठन हुआ और 1857 में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।

          1830 के दशक में, कंपनी ने एक स्कॉटिश मिशनरी विलियम एडम को बंगाल और बिहार के स्थानीय स्कूलों (पाठशालाओं) पर रिपोर्ट देने का काम सौंपा।

          • व्यापक शिक्षा: एडम ने पाया कि वहां 1 लाख से अधिक पाठशालाएँ थीं जिनमें 20 लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे थे।
          • लचीलापन: यह शिक्षा प्रणाली स्थानीय जरूरतों के अनुसार बहुत लचीली थी:
            • न कोई निश्चित शुल्क था, न छपी हुई किताबें, न अलग इमारतें और न ही ब्लैकबोर्ड।
            • फीस माता-पिता की आय पर निर्भर करती थी; अमीर ज्यादा देते थे और गरीब कम।
            • फसल की कटाई के समय कक्षाएं नहीं होती थीं, ताकि किसान परिवारों के बच्चे खेतों में काम कर सकें और बाद में अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।
          • कंपनी ने स्कूलों की देखरेख और शिक्षण मानकों में सुधार के लिए सरकारी पंडितों की नियुक्ति की।
          • गुरुओं को पाठ्यपुस्तकों का उपयोग करने, एक निश्चित समय-सारणी का पालन करने और वार्षिक रिपोर्ट जमा करने के लिए मजबूर किया गया।
          • प्रभाव: नियमित उपस्थिति और फसल कटाई के दौरान भी स्कूल आने की अनिवार्यता ने गरीब बच्चों के लिए स्कूल में टिके रहना मुश्किल बना दिया।

          कई भारतीयों ने महसूस किया कि पश्चिमी शिक्षा औपनिवेशिक गुलामी का एक साधन है और उन्होंने इसके विकल्प प्रस्तावित किए।

          • हीनता की भावना: गांधी का तर्क था कि औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के गौरव को नष्ट कर दिया है और उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि पश्चिमी सभ्यता श्रेष्ठ है।
          • गरिमा और आत्म-सम्मान: वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों को उनकी गरिमा पुनः प्राप्त करने में मदद करे। उन्होंने छात्रों से ब्रिटिश संस्थानों को छोड़ने का आह्वान किया।
          • व्यावहारिक हस्तशिल्प: गांधी का मानना था कि केवल साक्षरता ही शिक्षा नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों को कोई कला या शिल्प सीखना चाहिए और अपने हाथों से काम करना चाहिए ताकि उनके मस्तिष्क और आत्मा का विकास हो सके।
          • “शांति का निवास”: टैगोर ने 1901 में कलकत्ता से 100 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण परिवेश में इसकी स्थापना की।
          • रचनात्मक स्वतंत्रता: टैगोर को ब्रिटिश स्कूलों के “जेल जैसे” और कठोर वातावरण से नफरत थी। उनका मानना था कि बचपन प्राकृतिक वातावरण में स्वयं सीखने का समय होना चाहिए।
          • पूर्व और पश्चिम का समन्वय: जहाँ गांधी आधुनिक तकनीक के आलोचक थे, वहीं टैगोर भारतीय परंपरा के सर्वोत्तम तत्वों को आधुनिक पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ना चाहते थे।
          1. भाषाविद (Linguist): एक व्यक्ति जो कई भाषाएँ जानता और पढ़ता है।
          2. प्राच्यवादी (Orientalist): एशिया की भाषा और संस्कृति का गहन ज्ञान रखने वाले विद्वान।
          3. मुंशी: एक व्यक्ति जो फारसी पढ़, लिख और पढ़ा सकता है।
          4. वर्नाकुलर (Vernacular): स्थानीय भाषा या बोली जो मानक भाषा से अलग होती है।
          NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
          अध्याय – 8

          देसी जनता को सभ्य बनाना, राष्ट्र को शिक्षित करना

          प्राच्यवादियों का दृष्टिकोण
          विलियम जोन्स: 1783 में आगमन; प्रजा का ‘दिल’ जीतने के लिए भारत के प्राचीन गौरव की पुनर्खोज में विश्वास रखते थे।
          प्रमुख केंद्र: संस्कृत और फारसी कानून को संरक्षित करने के लिए कलकत्ता मदरसा (1781) और हिंदू कॉलेज (1791) की स्थापना की गई।
          आंग्लवादियों की आलोचना
          मैकॉले: भारतीय साहित्य को अवैज्ञानिक मानकर खारिज किया; उनका प्रसिद्ध दावा था कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय का केवल एक खाना ही पूरे भारत और अरब के समूचे साहित्य के बराबर है।
          औपनिवेशिक और राष्ट्रीय मार्ग
          अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835): उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया, ‘उपयोगी और व्यावहारिक’ पश्चिमी ज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया गया।
          वुड का नीति-पत्र (1854): प्रशासनिक रूप से विश्वसनीय सिविल सेवकों को तैयार करने और पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से ब्रिटिश वस्तुओं की मांग बढ़ाने के लिए औपचारिक नीति।
          पाठशाला सुधार: विलियम एडम ने लचीले स्थानीय स्कूलों पर रिपोर्ट दी; 1854 के बाद, अंग्रेजों ने कठोर नियम, पाठ्यपुस्तकें और समय-सारणी लागू कर दी।
          महात्मा गांधी: अंग्रेजी शिक्षा को “गुलाम बनाने वाली” कहकर विरोध किया, उनका तर्क था कि इसने भारतीयों में हीन भावना पैदा की; उन्होंने हस्तशिल्प सीखने की वकालत की।
          रवींद्रनाथ टैगोर: 1901 में शांति निकेतन की स्थापना की; वे प्राकृतिक वातावरण में रचनात्मक स्वतंत्रता को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना चाहते थे।

          प्राच्यवादी

          एशिया की प्राचीन संस्कृतियों, पवित्र ग्रंथों और कानूनों के प्रति गहरा सम्मान रखने वाले विद्वान।

          वुड का नीति-पत्र

          1854 का वह दस्तावेज जिसने यूरोपीय शिक्षा के औपचारिक प्रशासनिक और आर्थिक लाभों को रेखांकित किया।

          शांति निकेतन

          प्राकृतिक वातावरण में स्थित एक स्कूल जहाँ टैगोर ने स्व-शिक्षा और कलात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा दिया।

          मस्तिष्क का
          संघर्ष
          औपनिवेशिक भारत में शिक्षा केवल साक्षरता के बारे में नहीं थी; यह एक वैचारिक संघर्ष था। जहाँ अंग्रेजों को कुशल क्लर्क चाहिए थे, वहीं भारतीय विचारक ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों की गरिमा, आत्म-सम्मान और रचनात्मक स्वतंत्रता को बहाल कर सके।

          पीठासीन अधिकारी सदनों की गरिमा और विशेषाधिकारों के संरक्षक होते हैं। उनके बिना, संसद एक विचार-विमर्श करने वाले निकाय के रूप में कार्य नहीं कर सकती।

          अध्यक्ष लोकसभा का प्रमुख और उसका प्रतिनिधि होता है।

          • निर्वाचन: लोकसभा के सदस्य अपने बीच से ही अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की तारीख राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
          • कार्यकाल: वह लोकसभा के पूरे कार्यकाल के दौरान पद पर बना रहता है। हालाँकि, यदि वह सदन का सदस्य नहीं रहता या उपाध्यक्ष को अपना त्यागपत्र सौंप देता है, तो उसे पद छोड़ना पड़ता है।
          • विशेष शक्तियाँ:
            • धन विधेयक (Money Bill): कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं, इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है और उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
            • संयुक्त बैठक: वह संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) की अध्यक्षता करता है।
            • निर्णायक मत (Casting Vote): अध्यक्ष पहली बार में मतदान नहीं करता, लेकिन मतों के बराबर होने (टाई) की स्थिति में वह अपना निर्णायक मत देता है।
            • दसवीं अनुसूची: वह दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यों की अयोग्यता पर निर्णय लेता है।
          • सामयिक अध्यक्ष (Speaker Pro Tem): यह एक अस्थायी अध्यक्ष होता है जिसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है (आमतौर पर सदन का सबसे वरिष्ठ सदस्य)। इसका मुख्य कार्य नए सदस्यों को शपथ दिलाना और स्थायी अध्यक्ष का चुनाव करवाना होता है।
          • कौन होता है? भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होता है।
          • मुख्य अंतर: लोकसभा अध्यक्ष के विपरीत (जो सदन का सदस्य होता है), सभापति राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है।
          • पद से हटाना: सभापति को उसके पद से केवल तभी हटाया जा सकता है जब उसे उपराष्ट्रपति के पद से हटा दिया जाए।
          • शक्तियाँ: सदन की कार्यवाही चलाने के संबंध में उसकी शक्तियाँ लोकसभा अध्यक्ष के समान होती हैं, लेकिन सभापति संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता और न ही वह यह तय कर सकता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।

          राष्ट्रपति के पास संसद के प्रत्येक सदन का सत्र बुलाने (आहूत करने) की शक्ति होती है।

          • 6 महीने का नियम: संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता। इसलिए, संसद को वर्ष में कम से कम दो बार मिलना अनिवार्य है।
          • तीन पारंपरिक सत्र: भारत में आमतौर पर तीन सत्र आयोजित किए जाते हैं:
            1. बजट सत्र: (फरवरी से मई) – यह सबसे लंबा सत्र होता है।
            2. मानसून सत्र: (जुलाई से सितंबर)।
            3. शीतकालीन सत्र: (नवंबर से दिसंबर) – यह सबसे छोटा सत्र होता है।
          • स्थगन (Adjournment): यह सदन की बैठक को कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों के लिए समाप्त कर देता है। यह पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
          • अनिश्चितकालीन स्थगन (Adjournment Sine Die): यह सदन की बैठक को अनिश्चित काल के लिए समाप्त कर देता है (अगली बैठक की तारीख तय किए बिना)। यह भी पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
          • सत्रावसान (Prorogation): यह न केवल बैठक को बल्कि सदन के पूरे सत्र को समाप्त कर देता है। यह राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
          • विघटन (Dissolution): यह सदन (केवल लोकसभा) के जीवन को ही समाप्त कर देता है। इसके बाद नए सिरे से चुनाव होते हैं। यह राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
          • गणपूर्ति या कोरम (Quorum – अनुच्छेद 100): सदन की कार्यवाही चलाने के लिए उपस्थित सदस्यों की वह न्यूनतम संख्या जो आवश्यक है। यह प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का 1/10वाँ भाग (पीठासीन अधिकारी सहित) होता है।
          विशेषतालोकसभा अध्यक्ष (Speaker)राज्यसभा सभापति (Chairman)
          क्या वह सदन का सदस्य है?हाँनहीं (उपराष्ट्रपति होता है)
          चुनाव की तारीखराष्ट्रपति द्वारा निर्धारितलागू नहीं (पदेन पद)
          किसे इस्तीफा देता है?उपाध्यक्ष कोराष्ट्रपति को
          संयुक्त बैठकअध्यक्षता करता हैअध्यक्षता नहीं करता
          धन विधेयकप्रकृति पर निर्णय लेता हैकोई शक्ति नहीं
          वोट देने का अधिकारकेवल बराबर होने पर (Casting Vote)केवल बराबर होने पर (Casting Vote)

          यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि जब राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है, तो उसकी अध्यक्षता हमेशा लोकसभा अध्यक्ष ही करता है। यदि अध्यक्ष अनुपस्थित हो, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष अध्यक्षता करता है। यदि वह भी अनुपस्थित हो, तो राज्यसभा का उपसभापति अध्यक्षता करता है। राज्यसभा का सभापति कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं करता।

          विधायी आचरण • अनु. 85-100
          संसदीय प्रक्रिया

          पीठासीन अधिकारी और सत्र

          लोकसभा अध्यक्ष
          सदस्यों द्वारा निर्वाचित; धन विधेयकों का निर्णय करते हैं और संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करते हैं।
          गणपूर्ति (अनु. 100)
          कार्य संचालन के लिए कुल सदस्यता का कम से कम 1/10 हिस्सा उपस्थित होना चाहिए।
          राज्यसभा सभापति (अनु. 89)
          उपराष्ट्रपति पदेन सभापति होते हैं। अध्यक्ष के विपरीत, वे सदन के सदस्य नहीं होते हैं।
          संसद के सत्र (अनु. 85)
          6 महीने का नियम: सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता। आमतौर पर बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र शामिल होते हैं।
          सत्रावसान बनाम विघटन: राष्ट्रपति सत्रों का सत्रावसान करते हैं और लोकसभा को भंग करते हैं; स्थगन पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।

          धन विधेयक

          कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम और निर्विवाद होता है।

          निर्णायक मत

          पीठासीन अधिकारी केवल मत बराबर होने की स्थिति में वोट देते हैं (प्रथम दृष्टया नहीं)।

          दलबदल विरोधी

          अध्यक्ष/सभापति 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता पर निर्णय लेते हैं।

          “कार्यवाहक”
          अधिकारी
          प्रोटेम स्पीकर एक अस्थायी पद है जिसे राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाने और स्थायी अध्यक्ष के चुनाव की देखरेख के लिए नियुक्त किया जाता है। पदत्याग के संबंध में, अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को सौंपते हैं, जबकि सभापति केवल उपराष्ट्रपति के पद से हटने पर ही पद छोड़ते हैं।

          यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (4 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (द्विपक्षीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

          • संदर्भ: भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित व्यापार समझौते का विश्लेषण, जो महत्वपूर्ण टैरिफ राहत तो लाता है लेकिन कई रणनीतिक सवाल खड़े करता है।
          • मुख्य बिंदु:
            • टैरिफ (शुल्क) में कटौती: अमेरिका भारतीय आयात पर अपने “पारस्परिक” टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने और रूसी तेल आयात के कारण पहले लगाए गए 25 प्रतिशत के “जुर्माना” टैरिफ को पूरी तरह हटाने पर सहमत हो गया है।
            • संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण: वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि इस सौदे में संवेदनशील कृषि उत्पादों और डेयरी को बाहर रखा गया है, जिससे घरेलू किसानों का संरक्षण सुनिश्चित होगा।
            • श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ: इस कटौती से कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, रत्न और आभूषण तथा इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
            • “बाय अमेरिकन” के प्रति प्रतिबद्धता: राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि उत्पादों को खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है, हालांकि भारत सरकार ने अभी तक इसकी समयसीमा की पुष्टि नहीं की है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “ऊर्जा कूटनीति” से संबंधित प्रश्नों के लिए अनिवार्य।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • रूसी तेल की पहेली: राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी और वेनेजुएला के स्रोतों के पक्ष में रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए सहमत हुए हैं; यदि यह सच है, तो यह एक बड़ा भू-राजनीतिक पुनर्गठन होगा जो भारत-रूस संबंधों पर प्रभाव डाल सकता है।
            • बाजार और रुपये पर प्रभाव: इस समझौते की खबर ने तुरंत भारतीय शेयर बाजारों को मजबूती दी और रुपया घोषणा के दिन 1.28 प्रतिशत की बढ़त के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बुनियादी ढांचा; ऊर्जा संक्रमण; औद्योगिक नीति)।

          • संदर्भ: श्रीकांत माधव वैद्य का एक विश्लेषण कि क्यों भारत की अगली औद्योगिक क्रांति को पारंपरिक ईंधन दहन (अणुओं – Molecules) के बजाय विद्युतीकरण (इलेक्ट्रॉनों – Electrons) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
          • मुख्य बिंदु:
            • दक्षता का लाभ: इलेक्ट्रिक मोटर इनपुट ऊर्जा के 90 प्रतिशत से अधिक को उपयोगी कार्य में परिवर्तित करती है, जबकि आंतरिक दहन इंजन (Internal Combustion Engines) आमतौर पर 35 प्रतिशत से भी कम ऊर्जा को परिवर्तित कर पाते हैं।
            • वैश्विक नेतृत्व: चीन वर्तमान में अपनी औद्योगिक ऊर्जा का लगभग आधा हिस्सा बिजली (इलेक्ट्रॉनों) से प्राप्त करता है, जबकि भारत लगभग एक-चौथाई के स्तर पर काफी पीछे है।
            • हरित हिस्सेदारी का अंतराल: भारत की अंतिम औद्योगिक ऊर्जा में ‘ग्रीन इलेक्ट्रॉनों’ (नवीकरणीय ग्रिड पावर) की हिस्सेदारी केवल 7-8 प्रतिशत है, जो चीन और यूरोपीय संघ की तुलना में बहुत कम है।
            • CBAM का जोखिम: औद्योगिक प्रक्रियाओं (विशेष रूप से स्टील और सीमेंट) के तेजी से विद्युतीकरण के बिना, भारतीय निर्यात को यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) के तहत भारी दंड का सामना करना पड़ेगा।
          • UPSC प्रासंगिकता: “ऊर्जा सुरक्षा”, “सतत विनिर्माण” और “जलवायु परिवर्तन शमन रणनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • रणनीतिक अनिवार्यता: घरेलू बिजली की ओर रुख करने से वैश्विक तेल और गैस की कीमतों के झटकों से बचाव होगा, जिससे राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता में वृद्धि होगी।
            • नीतिगत रोडमैप: लेखक ‘औद्योगिक विद्युतीकरण पर राष्ट्रीय मिशन’ की वकालत करते हैं, जिसका लक्ष्य MSME के कोयला बॉयलरों का विद्युतीकरण और ‘इलेक्ट्रिक-आर्क-फर्नेस’ (EAF) स्टील उत्पादन का विस्तार करना है।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आईटी और कंप्यूटर; अर्थव्यवस्था)।

          • संदर्भ: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योग बुनियादी ढांचे के भारी चरण (चिप्स और डेटा सेंटर) से हटकर लाभदायक और वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों (Applications) पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
          • मुख्य बिंदु:
            • लाभप्रदता का दबाव: 2025 में बुनियादी ढांचे पर 320 अरब डॉलर खर्च करने के बावजूद, ओपनएआई (OpenAI) जैसे ‘फाउंडेशन मॉडल’ व्यवसाय उच्च प्रसंस्करण लागत के कारण कम लाभ मार्जिन का सामना कर रहे हैं।
            • अनुप्रयोगों में वृद्धि: व्यवसायों ने 2025 में एआई अनुप्रयोगों पर 19 अरब डॉलर खर्च किए, जो अब सभी जनरेटिव एआई खर्चों के आधे से अधिक है।
            • विभागीय एआई: वास्तविक मूल्य विशिष्ट क्षेत्रों में उभर रहा है; उदाहरण के लिए, एआई कोडिंग टूल्स का बाजार 2025 में 4 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
            • ऊर्ध्वाधर एकीकरण (Vertical Integration): स्वास्थ्य सेवा, कानून और वित्त जैसे विशिष्ट कार्यप्रवाहों में गहराई से एकीकृत समाधानों को अब सबसे अधिक “निवेश योग्य” एआई व्यवसाय माना जा रहा है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “औद्योगिक क्रांति 4.0”, “डिजिटल अर्थव्यवस्था” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • सर्कुलर फाइनेंसिंग (Circular Financing): संपादकीय चेतावनी देता है कि वर्तमान राजस्व आंकड़े अक्सर सर्कुलर फाइनेंसिंग से धुंधले होते हैं, जहाँ बुनियादी ढांचा प्रदाता उन्हीं मॉडलों को वित्तपोषित करते हैं जो उनकी सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं।
            • नियामक संतुलन: नीति निर्माताओं को चेतावनी दी गई है कि वे “एप्लिकेशन लेयर” को समय से पहले सख्त नियमों से न दबाएं, लेकिन उन्हें उन अधिग्रहणों के प्रति सतर्क रहना चाहिए जो संभावित प्रतिस्पर्धियों को खत्म कर देते हैं।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (न्यायपालिका; मौलिक अधिकार; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

          • संदर्भ: ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ (NALSAR) की एक रिपोर्ट से पता चला है कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले तीन वर्षों में एक भी मृत्युदंड की पुष्टि (Confirm) नहीं की है।
          • मुख्य बिंदु:
            • न्यायिक संशयवाद (Judicial Scepticism): जबकि निचली अदालतों ने अकेले 2025 में 128 व्यक्तियों को मौत की सजा सुनाई, उच्चतम न्यायालय का रुख लगातार प्रतिबंधात्मक होता जा रहा है।
            • गलत दोषसिद्धि की चिंता: शीर्ष अदालत ने 2025 में मृत्युदंड पाए 10 कैदियों को बरी कर दिया—जो एक दशक में सबसे अधिक संख्या है—जो निचली अदालतों के स्तर पर गंभीर त्रुटियों को उजागर करता है।
            • प्रक्रियात्मक उल्लंघन: 2025 में लगभग 95 प्रतिशत मृत्युदंड की सजाएं उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों (जैसे मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और शमन सुनवाई) का पालन किए बिना दी गईं।
            • बिना छूट के आजीवन कारावास: मृत्युदंड के निश्चित विकल्प के रूप में ‘बिना किसी छूट के आजीवन कारावास’ का उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
          • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “मानवाधिकार” और “दुर्लभतम से दुर्लभ” (Rarest of Rare) सिद्धांत के लिए अनिवार्य।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • अपीलीय उलटफेर: उच्च न्यायालयों द्वारा पुष्टि किए गए 37 मृत्युदंड के मामलों में से जो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पहुँचे, 15 में कैदी बरी हो गए और 14 की सजा कम कर दी गई, जबकि एक की भी पुष्टि नहीं हुई।
            • डेथ रो (Death Row) पर लंबा इंतजार: रिपोर्ट के अनुसार 2025 के अंत तक भारत में 574 कैदी मृत्युदंड की प्रतीक्षा में थे, जिनमें से कई अंततः बरी होने से पहले पांच साल से अधिक जेल में बिता चुके हैं।

          पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संघवाद; संवैधानिक निकाय; केंद्र-राज्य संबंध)।

          • संदर्भ: इस बात का विश्लेषण कि कैसे 16वें वित्त आयोग की उर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution) सिफारिशें राज्यों के दबाव के बजाय केंद्र के राजकोषीय स्थान को प्राथमिकता देती हैं।
          • मुख्य बिंदु:
            • हस्तांतरण में स्थिरता: 16वें वित्त आयोग ने उर्ध्वाधर हस्तांतरण दर को 41 प्रतिशत पर बनाए रखा, जबकि 18 राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की मांग की थी।
            • विभाज्य पूल का सिकुड़ना: केंद्र के कुल कर राजस्व में विभाज्य पूल (Divisible Pool) की हिस्सेदारी लगातार छह वर्षों से 90 प्रतिशत से नीचे गिर गई है, जिसका कारण उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) में बेतहाशा वृद्धि है।
            • गैर-साझा करने योग्य राजस्व: उपकर और अधिभार (जिन्हें केंद्र राज्यों के साथ साझा नहीं करता) 2011-12 में जीडीपी के 1.1 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में जीडीपी के 2.2 प्रतिशत हो गए।
            • राज्यों की आम सहमति की अनदेखी: आयोग ने केंद्र की प्राथमिकताओं का समर्थन किया, भले ही विभिन्न राज्यों के बीच राजकोषीय तनाव को लेकर एक दुर्लभ आम सहमति थी।
          • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “संसाधन संग्रहण” और “केंद्र-राज्य वित्तीय घर्षण” के लिए महत्वपूर्ण।
          • विस्तृत विश्लेषण:
            • कर रणनीति का प्रभाव: मानक करों के बजाय उपकर (जैसे पेट्रोल/डीजल उपकर) का पक्ष लेकर, केंद्र प्रभावी रूप से राज्यों के लिए उपलब्ध “साझा करने योग्य राजस्व” को कम कर देता है।
            • उर्ध्वाधर असंतुलन: रिपोर्ट का तर्क है कि गैर-साझा उपकरणों पर वर्तमान निर्भरता वित्त आयोग की प्रतिशत-आधारित सिफारिशों को राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए कम प्रभावी बना देती है।

          संपादकीय विश्लेषण

          04 फरवरी, 2026
          GS-3 ऊर्जा और उद्योग औद्योगिक विद्युतीकरण

          दहन इंजनों की 35% दक्षता की तुलना में इलेक्ट्रिक मोटर 90% दक्षता प्रदान करते हैं। यूरोपीय संघ के CBAM दंड से बचने के लिए ‘हरित इलेक्ट्रॉनों’ की ओर रुख करना आवश्यक है।

          GS-3 तकनीक AI: एप्लीकेशन लेयर

          चिप से सॉफ्टवेयर की ओर बदलाव; वर्टिकल AI कानून और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश का केंद्र बना। फाउंडेशन मॉडल में सर्कुलर फाइनेंसिंग पर चेतावनी।

          GS-2 संघवाद हस्तांतरण की दुविधा

          उपकर (Cesses) बढ़कर जीडीपी का 2.2% हो गया। 16वें वित्त आयोग ने राज्यों की सहमति के बजाय केंद्र के राजकोषीय स्थान को प्राथमिकता देते हुए 41% की दर बरकरार रखी।

          रणनीति: यदि भारत विशेष रूप से अमेरिका/वेनेजुएला के स्रोतों की ओर रुख करता है, तो ‘रूसी तेल पहेली’ एक बड़े भू-राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत देती है।
          अर्थव्यवस्था: व्यापार घोषणा के तुरंत बाद रुपया सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया, जिसमें 1.28% की बढ़त दर्ज की गई।
          विनिर्माण: भारत औद्योगिक विद्युतीकरण में 25% पर पिछड़ रहा है; राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता सुरक्षित करने के लिए एक ‘राष्ट्रीय मिशन’ की आवश्यकता है।
          अधिकार: भारत में 574 कैदी मृत्युदंड की कतार में हैं; सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ‘बिना किसी छूट के आजीवन कारावास’ का एक निश्चित विकल्प बनाती है।
          GS-4
          विधि का शासन
          न्याय और प्रक्रियात्मक अखंडता: जब मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन या न्यूनीकरण सुनवाई के बिना 95% मृत्युदंड दिए जाते हैं, तो यह निचली अदालतों की प्रणाली की एक नैतिक विफलता है। सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंधात्मक रुख गलत और अपरिवर्तनीय सजा के खिलाफ एक आवश्यक नैतिक बफर के रूप में कार्य करता है।

          यहाँ महत्वपूर्ण खनिज बुनियादी ढांचेआपदा प्रबंधन मानचित्रण और रणनीतिक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

          एक महत्वपूर्ण विकास के रूप में, हाई-टेक विनिर्माण के लिए आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित करने हेतु समर्पित दुर्लभ मृदा गलियारों की विस्तृत योजना बनाई गई है।

          • तटीय पट्टी का मानचित्रण: ये गलियारे मुख्य रूप से पूर्वी और दक्षिणी तटीय पट्टियों पर केंद्रित हैं, जिनमें विशेष रूप से निम्नलिखित राज्य शामिल हैं:
            • ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल।
          • खनिज केंद्र (Hubs): इन राज्यों के तटीय बालू (Beach sands) में पाए जाने वाले 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट (Monazite) भंडार को मानचित्र पर चिह्नित करें।
          • कठोर चट्टानी निक्षेप (Hard Rock Deposits): राजस्थान और गुजरात के उन विशिष्ट आंतरिक स्थलों को चिह्नित करें जहाँ 1.29 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा ऑक्साइड संसाधनों की पहचान की गई है।

          4 फरवरी, 2026 को उत्तर-पूर्व के लिए एक नई एआई (AI) आधारित मानचित्रण परियोजना पर प्रकाश डाला गया, जो उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में अपनी सटीकता के लिए जानी जाती है।

          • सुभेद्यता (Vulnerability) मानचित्रण:
            • अत्यधिक उच्च जोखिम (Very High Risk): मेघालय का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा इसी श्रेणी में आता है।
            • पूर्वी खासी हिल्स (East Khasi Hills): इसे सबसे सुभेद्य जिले के रूप में पहचाना गया है, जिसका 730 वर्ग किमी क्षेत्र “अत्यधिक उच्च जोखिम” क्षेत्र के अंतर्गत वर्गीकृत है।
            • मानचित्र पर अन्य जिले: री भोई (Ri Bhoi), पश्चिम खासी हिल्स और जयंतिया हिल्स को भी मानचित्र पर अंकित करें।

          रणनीतिक समुद्री और राजनयिक मानचित्रण IAS/PCS पाठ्यक्रम का एक मुख्य हिस्सा है।

          • सेशेल्स (राजकीय यात्रा):
            • मानचित्रण संदर्भ: हिंद महासागर में स्थित 115 द्वीपों वाला एक द्वीपसमूह राष्ट्र।
            • रणनीतिक महत्व: यह भारत की “ब्लू इकोनॉमी” (नीली अर्थव्यवस्था) और पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
          • तंजानिया (ज़ांज़ीबार):
            • मानचित्रण संदर्भ: भारत ने हाल ही में ‘चौथी संयुक्त रक्षा सहयोग समिति’ के माध्यम से ज़ांज़ीबार में संबंधों को मजबूत किया है।
            • प्रमुख स्थल: इसकी सीमाओं को विक्टोरिया झील (अफ्रीका की सबसे बड़ी झील) और तांगानिका झील (अफ्रीका की सबसे गहरी झील) के साथ मानचित्र पर दर्शाएं।
          • सुबनसिरी निचली जलविद्युत परियोजना (LHE): अरुणाचल प्रदेश में ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) की विफलताओं के संबंध में चिंताएं जताई गई हैं।
          • मैपिंग पॉइंट: अरुणाचल प्रदेश और असम की सीमा पर सुबनसिरी नदी (ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी) की स्थिति को पहचानें।
          श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
          खनिज गलियारादुर्लभ मृदा पेटी (Rare Earth Belt)ओडिशा से केरल तक का तटीय क्षेत्र
          उच्च जोखिम क्षेत्रपूर्वी खासी हिल्समेघालय (भूस्खलन मानचित्र)
          समुद्री भागीदारसेशेल्सपश्चिमी हिंद महासागर
          नदी परियोजनासुबनसिरी LHEअरुणाचल-असम सीमा

          खनिज संसाधनों का अध्ययन करते समय उन्हें उन राज्यों के बंदरगाहों के साथ जोड़कर देखें जहाँ से उनका निर्यात संभव है। उदाहरण के लिए, ओडिशा के दुर्लभ मृदा निक्षेपों को पारादीप बंदरगाह के साथ जोड़कर देखा जा सकता है।

          मानचित्रण विवरण

          महत्वपूर्ण खनिज एवं रणनीतिक भूगोल
          खनिज गलियारे रणनीतिक दुर्लभ मृदा (Rare Earths)

          ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में तटवर्ती रेत के मोनाजाइट भंडार पर केंद्रित। हार्ड-रॉक ऑक्साइड निक्षेपों के लिए राजस्थान/गुजरात को चिह्नित करें।

          आपदा मानचित्रण भूस्खलन जोखिम सुस्पष्टता

          नए AI मानचित्रण ने पूर्वी खासी हिल्स (मेघालय) को उच्च-जोखिम वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना है, जिसका 730 वर्ग किमी क्षेत्र “अत्यधिक उच्च सुभेद्यता” श्रेणी में है।

          रणनीतिक कूटनीति
          पश्चिमी हिंद महासागर आउटरीच

          भारत सेशेल्स (115-द्वीपीय द्वीपसमूह) और तंजानिया (ज़ंजीबार) के साथ समुद्री सुरक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है, जो विक्टोरिया और तांगानिका झील की सीमा पर स्थित हैं।

          जल-पर्यावरण
          सुबनसिरी निचली परियोजना (LHE)

          अरुणाचल-असम सीमा पर स्थित, सुबनसिरी नदी (ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी) पर बनी यह परियोजना प्रतिपूरक वनीकरण को लेकर जांच के घेरे में है।

          महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाएँ

          हाई-टेक विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण 13.15 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा संसाधनों को सुरक्षित करने के लिए पूर्वी तटीय पट्टी के साथ समर्पित गलियारों का मानचित्रण किया जा रहा है।

          खनिज पट्टी ओडिशा से केरल तटरेखा।
          उच्च जोखिम क्षेत्र पूर्वी खासी हिल्स (मेघालय)।
          समुद्री सेशेल्स (पश्चिमी हिंद महासागर)।
          एटलस रणनीति
          स्थानिक आधार: भारत की हाई-टेक संप्रभुता के लिए तटवर्ती रेत मोनाजाइट और हार्ड-रॉक दुर्लभ मृदा ऑक्साइड की दोहरी एकाग्रता को समझना महत्वपूर्ण है। GS-III के लिए हिमालय-पूर्वोत्तर के व्यापक जोखिम मैट्रिक्स में पूर्वी खासी हिल्स की भूस्खलन सुभेद्यता को एकीकृत करें।

          Dainik CSAT Quiz in Hindi – February 7, 2026

          Dainik CSAT Quiz (7 February 2026)
          दैनिक CSAT क्विज़

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            Dainik GS Quiz in Hindi – February 7, 2026

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