Dainik GS Quiz in Hindi – February 13, 2026

Dainik GS Quiz (13 February 2026)
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        IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 11 फ़रवरी 2026 (Hindi)

        यह अध्याय “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” यूरोप में समाजवादी विचारों के उदय और रूस के एक निरंकुश राजतंत्र से दुनिया के पहले समाजवादी राज्य में बदलने की नाटकीय कहानी को दर्शाता है।

        फ्रांसीसी क्रांति ने समाज में नाटकीय बदलाव की संभावनाओं के द्वार खोल दिए, जिससे यूरोप में तीन अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण उभरे:

        • उदारवादी (Liberals):
          • वे एक ऐसा राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर सम्मान और जगह मिले।
          • वे वंशानुगत शासकों की अनियंत्रित सत्ता के विरोधी थे और एक निर्वाचित संसदीय सरकार के पक्ष में थे।
          • उन्होंने शासकों और अधिकारियों से स्वतंत्र एक न्यायपालिका के महत्व पर जोर दिया।
          • हालाँकि, वे “लोकतंत्रवादी” (Democrats) नहीं थे क्योंकि वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार में विश्वास नहीं करते थे; उनका मानना था कि केवल संपत्ति धारी पुरुषों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए और वे महिलाओं के लिए वोट के अधिकार के खिलाफ थे।
        • रेडिकल (Radicals):
          • वे ऐसी सरकार चाहते थे जो देश की अधिकांश आबादी के समर्थन पर आधारित हो।
          • वे महिलाओं के मताधिकार आंदोलन (Suffragette movement) के समर्थक थे।
          • वे बड़े जमींदारों और धनी फैक्ट्री मालिकों को मिलने वाले विशेषाधिकारों के विरोधी थे।
          • वे निजी संपत्ति के अस्तित्व के खिलाफ नहीं थे, लेकिन कुछ ही हाथों में संपत्ति के संकेंद्रण (Concentration) को नापसंद करते थे।
        • रूढ़िवादी (Conservatives):
          • 18वीं शताब्दी में वे आमतौर पर परिवर्तन के विचार के विरोधी थे।
          • 19वीं शताब्दी तक उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हैं, लेकिन उनका मानना था कि अतीत का सम्मान किया जाना चाहिए और परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी होनी चाहिए।

        19वीं शताब्दी के मध्य तक समाजवाद एक प्रसिद्ध विचारधारा बन चुकी थी, जिसकी मुख्य विशेषता निजी संपत्ति का विरोध था।

        • निजी संपत्ति का विरोध: समाजवादियों का मानना था कि निजी संपत्ति ही सभी सामाजिक बुराइयों की जड़ है क्योंकि संपत्ति के मालिक केवल व्यक्तिगत लाभ की चिंता करते थे, न कि उन लोगों के कल्याण की जो उस संपत्ति को उत्पादक बनाते थे।
        • भविष्य की दृष्टि:
          • रॉबर्ट ओवेन: एक अंग्रेज कपड़ा निर्माता, जिन्होंने इंडियाना (USA) में ‘नया समन्वय’ (New Harmony) नामक एक सहकारी समुदाय बनाने की मांग की।
          • लुई ब्लां: फ्रांस में वे चाहते थे कि सरकार सहकारी समितियों (Cooperatives) को प्रोत्साहित करे और पूंजीवादी उद्यमों की जगह ले।
          • कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स: मार्क्स का तर्क था कि औद्योगिक समाज “पूंजीवादी” है और पूंजीपतियों का मुनाफा श्रमिकों द्वारा पैदा किया जाता है। उनका मानना था कि श्रमिकों को एक क्रांतिकारी समाजवादी समाज के निर्माण के लिए पूंजीवाद और निजी संपत्ति को उखाड़ फेंकना होगा जहाँ सारी संपत्ति पर समाज का नियंत्रण हो (साम्यवाद)।

        1914 में ज़ार निकोलस II रूस और उसके विशाल साम्राज्य पर शासन कर रहा था, जिसमें आधुनिक फिनलैंड, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया और पोलैंड, यूक्रेन व बेलारूस के हिस्से शामिल थे।

        • आर्थिक स्थिति: रूस एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था था; लगभग 85% आबादी कृषि से अपनी आजीविका कमाती थी, जो फ्रांस या जर्मनी की तुलना में बहुत अधिक थी। किसान बाज़ार और अपनी ज़रूरतों दोनों के लिए उत्पादन करते थे।
        • औद्योगिक स्थिति: उद्योग बहुत कम जगहों पर थे, मुख्य रूप से सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को में। 1890 के दशक में रूस के रेलवे नेटवर्क के विस्तार और विदेशी निवेश बढ़ने के बाद कई बड़ी फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं।
        • सामाजिक विभाजन: श्रमिक एक विभाजित सामाजिक समूह थे। कुछ का अपने गाँवों से गहरा नाता था, जबकि अन्य शहरों में बस चुके थे। वे कौशल के आधार पर भी विभाजित थे; जैसे—धातु कर्मी खुद को मजदूरों के बीच “कुलीन” मानते थे। विभाजन के बावजूद, वे काम की परिस्थितियों या मालिकों के साथ विवाद होने पर हड़ताल के लिए एकजुट हो जाते थे।

        1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक दल अवैध थे।

        • सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी: इसकी स्थापना 1898 में मार्क्सवादी विचारों का सम्मान करने वाले समाजवादियों द्वारा की गई थी। बाद में यह दो समूहों में बंट गई:
          • बोल्शेविक: व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में। उनका मानना था कि ज़ार जैसे दमनकारी समाज में पार्टी अनुशासित होनी चाहिए और अपने सदस्यों की संख्या और गुणवत्ता पर नियंत्रण रखना चाहिए।
          • मेंशेविक: उनका मानना था कि पार्टी सभी के लिए खुली होनी चाहिए (जैसे जर्मनी में थी)।
        • सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी: 1900 में गठित, इसने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और मांग की कि कुलीनों की जमीन किसानों को हस्तांतरित की जानी चाहिए।

        रूस एक निरंकुश शासन (Autocracy) था जहाँ ज़ार संसद के अधीन नहीं था।

        • खूनी रविवार (Bloody Sunday): 1905 में पादरी गैपॉन के नेतृत्व में मजदूरों का एक जुलूस अपनी माँगें लेकर ज़ार के ‘विंटर पैलेस’ पहुँचा। उन पर पुलिस ने हमला किया, जिसमें 100 से अधिक मजदूर मारे गए और 300 घायल हुए।
        • परिणाम: इस घटना ने पूरे देश में हड़तालों की लहर पैदा कर दी, जिसके कारण ज़ार को पहली ‘डूमा’ (एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद) बनाने की अनुमति देनी पड़ी।

        1914 में युद्ध शुरू हुआ। रूस में शुरुआत में युद्ध को बहुत जन-समर्थन मिला, लेकिन जल्द ही परिस्थितियाँ बदल गईं।

        • रूस पर प्रभाव: 1914 और 1916 के बीच जर्मनी और ऑस्ट्रिया में रूसी सेना को भारी हार का सामना करना पड़ा। 1917 तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे और 30 लाख लोग शरणार्थी बन गए थे। युद्ध के कारण श्रम की कमी हो गई और अनाज की भारी किल्लत हो गई, जिससे 1916 की सर्दियों में रोटी की दुकानों पर दंगे आम हो गए।
        • फरवरी क्रांति: फरवरी 1917 में पेट्रोग्राद में भोजन की कमी के कारण फैक्ट्रियों में तालाबंदी और हड़तालें हुईं। सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया और सोवियत के साथ मिल गए। 2 मार्च को ज़ार ने गद्दी छोड़ दी और डूमा के नेताओं ने एक ‘अंतरिम सरकार’ (Provisional Government) बनाई।
        • अक्टूबर क्रांति: जैसे-जैसे अंतरिम सरकार की शक्ति कम हुई और बोल्शेविकों का प्रभाव बढ़ा, लेनिन ने विद्रोह का आयोजन किया। 24 अक्टूबर को विद्रोह शुरू हुआ; रात तक शहर बोल्शेविक नियंत्रण में था और मंत्रियों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
        • बोल्शेविक सुधार: नवंबर 1917 में अधिकांश उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। भूमि को सामाजिक संपत्ति घोषित किया गया और किसानों को कुलीनों की जमीन पर कब्जा करने की अनुमति दी गई।
        • गृहयुद्ध: बोल्शेविक विद्रोह का विरोध “गोरों” (ज़ार समर्थकों) और “हरों” (सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी) ने किया, जिन्हें फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। अंततः 1920 तक बोल्शेविक विजयी हुए।
        • स्टालिन का सामूहिकीकरण (Collectivisation): अनाज की कमी को दूर करने के लिए, स्टालिन ने 1929 से किसानों को सामूहिक खेती (कोल्खोज़) के लिए मजबूर किया। विरोध करने वालों को कड़ी सजा दी गई या देश निकाला दे दिया गया।
        1. डूमा: रूस की निर्वाचित परामर्शदाता संसद।
        2. सोवियत: मजदूरों और सैनिकों की परिषद।
        3. कुलक: रूस के संपन्न किसान।
        4. राष्ट्रीयकरण: उद्योगों या बैंकों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित होना।
        NCERT इतिहास   •   कक्षा-9
        अध्याय – 2

        यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति

        राजनीतिक विचारधाराएं
        उदारवादी: प्रतिनिधि सरकार और व्यक्तिगत अधिकारों के पक्षधर, लेकिन सार्वभौमिक मताधिकार के विरोधी थे।
        रेडिकल: ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो।
        रूढ़िवादी: शुरुआत में बदलाव के विरोधी थे, बाद में अतीत का सम्मान करते हुए धीमी प्रक्रिया को स्वीकार किया।
        समाजवादी दृष्टि
        कार्ल मार्क्स: उनका तर्क था कि मज़दूरों को पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना चाहिए ताकि एक “कम्युनिस्ट” समाज बनाया जा सके जहाँ संपत्ति सामाजिक नियंत्रण में हो।
        ज़ारशाही से क्रांति तक
        1905 की क्रांति: ‘खूनी रविवार’ की घटना से शुरू हुई; इसके कारण रूस में पहली निर्वाचित परामर्शदाता संसद ‘ड्यूमा’ का गठन हुआ।
        फरवरी 1917: पेट्रोग्राद में भोजन की कमी और हड़तालों ने ज़ार निकोलस II को गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया, जिससे रोमनोव शासन का अंत हुआ।
        अक्टूबर 1917: व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने अंतरिम सरकार से सत्ता छीन ली और बैंकों व उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया।
        गृहयुद्ध: 1920 में बोल्शेविकों की जीत तक ‘रेड्स’ (बोल्शेविक) और ‘व्हाइट्स’ (ज़ार समर्थक) के बीच भीषण संघर्ष चला।
        स्टालिन का युग: अनाज संकट को हल करने के लिए 1929 में सामूहिकीकरण (कोलखोज़) शुरू किया गया, किसानों को सरकारी फार्मों में मजबूरन भेजा गया।

        बोल्शेविक

        लेनिन का अनुशासित बहुमत वाला गुट जिसने एक केंद्रीकृत क्रांतिकारी पार्टी की वकालत की।

        खूनी रविवार

        1905 में विंटर पैलेस में शांतिपूर्ण मज़दूरों का नरसंहार, जिससे देशव्यापी हड़तालें शुरू हुईं।

        कोलखोज़

        सामूहिक फार्म जहाँ स्टालिन के शासन में किसानों को ज़मीन और श्रम साझा करने के लिए मजबूर किया गया था।

        वैश्विक प्रभाव
        रूसी क्रांति ने समाजवादी सिद्धांत को एक वैश्विक वास्तविकता में बदल दिया। इसने पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती दी और दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को प्रेरित किया, जिससे 20वीं सदी का राजनीतिक परिदृश्य मौलिक रूप से बदल गया।

        अधीनस्थ न्यायालयों को ‘अधीनस्थ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के प्रशासनिक और न्यायिक अधीक्षण (Superintendence) के अधीन कार्य करते हैं। इनका उल्लेख संविधान के भाग VI के अध्याय VI में किया गया है।

        • शासनादेश: किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना (Posting) और पदोन्नति (Promotion) उस राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाएगी।
        • पात्रता (Eligibility): वह व्यक्ति जो पहले से ही संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, केवल तभी जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्र होगा यदि:
          1. वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता (Advocate) या प्लीडर रहा हो।
          2. उच्च न्यायालय ने उसकी नियुक्ति के लिए सिफारिश की हो।
        • संदर्भ: इसे 20वें संविधान संशोधन अधिनियम (1966) द्वारा जोड़ा गया था।
        • शासनादेश: यह अनुच्छेद उन जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को वैध बनाता है, जिन्हें प्रक्रियात्मक तकनीकी त्रुटियों के कारण अनियमित माना जा सकता था। यह पिछली न्यायिक कार्रवाइयों के लिए एक “रक्षोपाय खंड” (Saving clause) के रूप में कार्य करता है।
        • शासनादेश: यह अनुच्छेद जिला न्यायाधीश के पद से नीचे की ‘न्यायिक सेवा’ (जैसे सिविल जज, मजिस्ट्रेट) की भर्ती से संबंधित है।
        • प्रक्रिया: ये नियुक्तियाँ राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती हैं। इसके लिए राज्यपाल राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद बनाए गए नियमों के अनुसार कार्य करता है।
        • शासनादेश: यह उच्च न्यायालय के लिए सबसे शक्तिशाली अनुच्छेद है। यह जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर “नियंत्रण” (Control) की शक्ति उच्च न्यायालय में निहित करता है।
        • नियंत्रण का दायरा: इसमें राज्य की न्यायिक सेवा के व्यक्तियों (जो जिला न्यायाधीश के पद से नीचे के हैं) की पदस्थापना, पदोन्नति और उन्हें छुट्टी (Leave) देने जैसे मामले शामिल हैं।
        • संरक्षण: हालाँकि, यह अनुच्छेद यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की अपनी सेवा की शर्तों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के खिलाफ अपील करने का अधिकार सुरक्षित रहे।

        यह अनुच्छेद इस अध्याय में उपयोग किए गए शब्दों की कानूनी परिभाषा प्रदान करता है:

        • “जिला न्यायाधीश” (District Judge): इसमें नगर सिविल न्यायालय के न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायाधीश और अपर सत्र न्यायाधीश शामिल हैं।
        • “न्यायिक सेवा” (Judicial Service): इसका अर्थ ऐसी सेवा से है जो विशेष रूप से जिला न्यायाधीश के पद और जिला न्यायाधीश के पद से नीचे के अन्य दीवानी न्यायिक पदों को भरने के लिए बनाई गई है।
        • शासनादेश: राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि इस अध्याय के प्रावधान (अनुच्छेद 233 से 236) राज्य के किसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेटों पर लागू होंगे।
        • उद्देश्य: यह राज्य को कार्यपालक मजिस्ट्रेटों (Executive Magistrates) या अन्य विशेष न्यायिक अधिकारियों को उसी सुरक्षात्मक और प्रशासनिक ढांचे के तहत लाने की अनुमति देता है जो नियमित न्यायिक सेवा के लिए उपलब्ध है।
        अनुच्छेदमुख्य विषयशामिल प्राधिकारी
        233जिला न्यायाधीशों की नियुक्तिराज्यपाल + उच्च न्यायालय
        234निचली न्यायपालिका की भर्तीराज्यपाल + SPSC + उच्च न्यायालय
        235अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रणउच्च न्यायालय में निहित
        236परिभाषाएँ“जिला न्यायाधीश” और “सेवा” की व्याख्या
        237मजिस्ट्रेटों पर लागू होनाराज्यपाल की लोक अधिसूचना

        UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय के पास होता है, जबकि न्यायाधीशों की नियुक्ति का औपचारिक आदेश राज्यपाल जारी करता है। अनुच्छेद 235 उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता और निचले स्तर पर न्यायिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने का आधार है।

        राज्य न्यायपालिका • भाग VI • अनु. 233-237
        अधीनस्थ न्यायपालिका प्रणाली

        अधीनस्थ न्यायालय

        अनुच्छेद 233
        जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्यपाल द्वारा की जाती है। इसके लिए अधिवक्ता के रूप में 7 वर्ष का अनुभव आवश्यक है।
        अनुच्छेद 235
        सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (पदस्थापना, पदोन्नति, अवकाश) उच्च न्यायालय में निहित है।
        निचली न्यायिक सेवा (अनु. 234)
        जिला न्यायाधीश से नीचे के पदों पर भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद राज्यपाल द्वारा की जाती है।
        परिभाषाएँ (अनु. 236)
        जिला न्यायाधीश: इसमें सिटी सिविल कोर्ट के न्यायाधीश, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश और मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट शामिल हैं।
        न्यायिक सेवा: विशेष रूप से जिला न्यायाधीश और अधीनस्थ नागरिक न्यायिक पदों को भरने के लिए बनाई गई एक सेवा।

        अधिमान्यता (233A)

        पिछली नियुक्तियों और निर्णयों को मान्य करने के लिए एक “सेविंग क्लॉज” के रूप में कार्य करता है जो तकनीकी कारणों से बाधित हो सकते थे।

        मजिस्ट्रेट (237)

        राज्यपाल निर्देश दे सकते हैं कि इस अध्याय के प्रावधान राज्य के किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट पर लागू हों।

        HC पर्यवेक्षण

        न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उच्च न्यायालय न्यायिक और प्रशासनिक दोनों तरह का अधीक्षण बनाए रखता है।

        सुरक्षा
        कवच
        अधीनस्थ न्यायालय भारतीय न्यायपालिका की नींव हैं। प्रशासनिक नियंत्रण कार्यपालिका के बजाय उच्च न्यायालय (अनु. 235) में निहित करके, संविधान यह सुनिश्चित करता है कि निचली न्यायपालिका स्वतंत्र रहे और पदस्थापना एवं पदोन्नति जैसे दैनिक कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रहे।

        यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (11 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

        पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आईटी और कंप्यूटर; अर्थव्यवस्था) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

        • संदर्भ: “एआई उछाल” (AI surge) का एक विश्लेषण और यह परीक्षण कि क्या मानवीय संस्थाएं, नैतिकता और कानूनी ढांचे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की इस घातीय (exponential) वृद्धि के साथ तालमेल बिठा सकते हैं।
        • मुख्य बिंदु:
          • हार्डवेयर की सीमा: एआई के इस उछाल का मुख्य कारण कंप्यूटिंग शक्ति (Compute power) में बड़े पैमाने पर किया जा रहा निवेश है। अनुमान है कि एआई डेटा केंद्रों को चलाने के लिए छोटे देशों के बराबर ऊर्जा की आवश्यकता होगी।
          • आर्थिक विस्थापन: हालांकि एआई उत्पादकता बढ़ाने का वादा करता है, लेकिन संपादकीय मध्यम स्तर की बौद्धिक नौकरियों (Cognitive jobs) के खत्म होने की चेतावनी देता है, विशेष रूप से कोडिंग, कानूनी अनुसंधान और सामग्री निर्माण (Content creation) के क्षेत्रों में।
          • विश्वास की कमी: परिष्कृत ‘डीपफेक’ (Deepfakes) और एआई-जनित गलत सूचनाओं के प्रसार से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अखंडता और व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरा पैदा हो रहा है।
          • रणनीतिक संप्रभुता: वैश्विक शक्ति तेजी से कुछ “एआई महाशक्तियों” (देशों और निगमों) के हाथों में केंद्रित हो रही है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के लिए एक नया डिजिटल विभाजन पैदा कर रही है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “औद्योगिक क्रांति 4.0”, “डिजिटल नैतिकता” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए अनिवार्य।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • ऊर्जा और स्थिरता: संपादकीय एआई की “छिपी हुई पर्यावरणीय लागत” पर प्रकाश डालता है। इसमें उल्लेख किया गया है कि एक एकल ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) को प्रशिक्षित करने में उतना पानी खर्च हो सकता है जितना 3,000 लोग एक वर्ष में उपयोग करते हैं।
          • नियामक विलंब (Regulatory Lag): वर्तमान विधायी प्रयास (जैसे यूरोपीय संघ का एआई अधिनियम) अक्सर प्रतिक्रियात्मक होते हैं; लेख “अग्रिम शासन” (Anticipatory Governance) की वकालत करता है जो डिजाइन चरण में ही सुरक्षा मानकों को शामिल करता है।
          • मानव-केंद्रित एआई: लक्ष्य मानव एजेंसी को प्रतिस्थापित करना नहीं बल्कि “संवर्धित बुद्धिमत्ता” (Augmented Intelligence) होना चाहिए, जहाँ एआई उपकरणों का उपयोग जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवा और संसाधन प्रबंधन जैसी जटिल समस्याओं को हल करने के लिए किया जाए।

        पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार)।

        • संदर्भ: एक दुर्लभ संसदीय घटनाक्रम में, संयुक्त विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ पक्षपाती व्यवहार का आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने का नोटिस दिया है।
        • मुख्य बिंदु:
          • संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत, लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है, बशर्ते कि 14 दिन का पूर्व नोटिस दिया गया हो।
          • पक्षपात के आरोप: विपक्ष ने बार-बार माइक्रोफोन बंद करने, विपक्ष के नेता की टिप्पणियों को चुनिंदा रूप से कार्यवाही से हटाने और प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना ही ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पारित करने जैसे मुद्दों को आधार बनाया है।
          • अध्यक्ष का बचाव: सत्ता पक्ष का तर्क है कि अध्यक्ष ने अभूतपूर्व व्यवधानों के बीच सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी नियमों पर आधारित विवेकाधीन शक्तियों के भीतर कार्य किया है।
          • प्रक्रियात्मक गतिरोध: यह प्रस्ताव सदन में जारी तनाव को और बढ़ाता है, जिसके कारण वर्तमान सत्र में कई दिनों तक कोई कामकाज नहीं हो पाया है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “संसदीय प्रक्रियाएं”, “लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका और निष्पक्षता” तथा “विधायी जवाबदेही”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • संस्थागत अखंडता: अध्यक्ष संसदीय लोकतंत्र की धुरी (Linchpin) होता है। संपादकीय का तर्क है कि जब अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो पूरी विधायी प्रक्रिया की वैधता दांव पर लग जाती है।
          • ऐतिहासिक मिसालें: भारतीय इतिहास में ऐसे प्रस्ताव अत्यंत दुर्लभ हैं (जैसे 1954 में जी.वी. मावलंकर के खिलाफ)। भले ही इनके पारित होने की संख्यात्मक संभावना कम हो, लेकिन ये एक महत्वपूर्ण “राजनीतिक संकेत” के रूप में कार्य करते हैं।
          • परंपरा की भूमिका: लेख सुझाव देता है कि वर्तमान संकट अध्यक्ष और विपक्ष के बीच अनौपचारिक संवाद और परामर्श की परंपरा के टूटने का परिणाम है।

        पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (द्विपक्षीय संबंध)।

        • संदर्भ: गारमेंट (तैयार कपड़ों) के निर्यात के लिए अमेरिका और बांग्लादेश के बीच एक नई तरजीही व्यापार व्यवस्था (Preferential Trade Arrangement) ने भारतीय कपड़ा निर्माताओं के बीच चिंता पैदा कर दी है।
        • मुख्य बिंदु:
          • प्रतिस्पर्धात्मक अंतराल: यह समझौता बांग्लादेश के परिधान निर्यात को अमेरिकी बाजार में कम शुल्क की सुविधा देता है, जिससे भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं, क्योंकि नए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर 18% टैरिफ लागू है।
          • इनपुट-आउटपुट लिंक: बांग्लादेश भारतीय कपास और सूत (Yarn) के लिए एक प्रमुख बाजार है। यदि अमेरिकी समझौता कच्चे माल की “स्थानीय सोर्सिंग” (Local sourcing) को अनिवार्य बनाता है, तो भारत के सूत निर्यात को भारी नुकसान हो सकता है।
          • क्षेत्रीय असंतुलन: अमेरिका के इस कदम को ढाका में अंतरिम सरकार का समर्थन करने और चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकल्प प्रदान करने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार”, “कपड़ा क्षेत्र की चुनौतियां” और “दक्षिण एशियाई आर्थिक एकीकरण”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • समान अवसर (Level Playing Field): भारतीय निर्यातक “पारस्परिक समानता” की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत के उच्च पर्यावरणीय और श्रम मानकों को मूल्य-संवर्धन (Value-addition) के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
          • विविधीकरण की आवश्यकता: संपादकीय सुझाव देता है कि भारत को बुनियादी परिधानों पर निर्भरता कम करने के लिए ‘तकनीकी वस्त्र’ (Technical textiles) और मानव निर्मित फाइबर (Man-made fibers) की ओर बढ़ना चाहिए।
          • रणनीतिक व्यापार नीति: यह स्थिति भारत के लिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ अपने स्वयं के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से पूरा करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

        पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा; सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

        • संदर्भ: मणिपुर के उखरुल जिले में हुई ताज़ा हिंसा के कारण इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया गया है और कर्फ्यू लगा दिया गया है, जो राज्य की नाजुक सुरक्षा स्थिति को दर्शाता है।
        • मुख्य बिंदु:
          • क्षेत्रीय घर्षण: ताज़ा संघर्ष ‘तंगखुल नागा’ और ‘कुकी-ज़ो’ समुदायों के बीच भूमि विवाद और स्थानीय क्षेत्राधिकार को लेकर है।
          • डिजिटल ब्लैकआउट: इंटरनेट पर प्रतिबंध का उद्देश्य भड़काऊ सामग्री और अफवाहों के प्रसार को रोकना है जो अन्य जिलों में प्रतिशोधात्मक हिंसा को जन्म दे सकते हैं।
          • राज्य की क्षमता: लोकप्रिय सरकार की वापसी के बावजूद, राज्य मशीनरी कई जातीय दरारों (मैतेई-कुकी और नागा-कुकी) को प्रबंधित करने में अत्यधिक दबाव में दिख रही है।
          • नागा शांति प्रक्रिया: उखरुल जैसे नागा बहुल क्षेत्रों में तनाव केंद्र और नागा समूहों के बीच चल रही “फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” वार्ता को जटिल बनाता है।
        • UPSC प्रासंगिकता: “पूर्वोत्तर में आंतरिक सुरक्षा”, “जातीय संघर्ष” और “संकट प्रबंधन”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • बफर जोन का प्रभाव: सुरक्षा विश्लेषकों का सुझाव है कि “बफर जोन” के निर्माण ने अनजाने में समुदायों के बीच “किलेबंदी” (Fortification) कर दी है, जिससे एक-दूसरे के क्षेत्र में आवाजाही हिंसा का कारण बन रही है।
          • नागरिक समाज की भूमिका: सामुदायिक बुजुर्गों और नागरिक संगठनों की शांति स्थापित करने में विफलता राज्य में “मध्यम मार्ग के कट्टरपंथ” (Radicalization of the middle ground) की ओर इशारा करती है।

        पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी)।

        • संदर्भ: एक वैज्ञानिक लेख जो गगनयान और नासा के SLS जैसे आधुनिक अंतरिक्ष मिशनों में “ड्राई ड्रेस रिहर्सल” और “वेट ड्रेस रिहर्सल” (WDR) के बीच के अंतर को समझाता है।
        • मुख्य बिंदु:
          • ड्राई ड्रेस रिहर्सल (Dry Dress Rehearsal): इसमें बिना ईंधन भरे लॉन्च काउंटडाउन का पूर्ण अनुकरण (Simulation) किया जाता है। यह संचार, लॉजिक फ्लो और निर्णय लेने की प्रक्रिया का परीक्षण करता है।
          • वेट ड्रेस रिहर्सल (WDR): यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है जहाँ रॉकेट में वास्तविक ‘क्रायोजेनिक प्रोपेलेंट्स’ (तरल ऑक्सीजन/हाइड्रोजन) भरे जाते हैं ताकि अत्यधिक ठंड में लीकेज की जाँच की जा सके।
          • क्रायोजेनिक चुनौतियां: केवल WDR ही सील या वाल्व में “क्रायो-लीक” का पता लगा सकता है जो केवल तभी प्रकट होते हैं जब घटक -183°C से -253°C तापमान के कारण सिकुड़ जाते हैं।
          • जोखिम न्यूनीकरण: ये पूर्वाभ्यास टीमों को जमीन पर “सुरक्षित रूप से विफल” (Fail safely) होने की अनुमति देते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि रॉकेट छोड़ने से पहले हार्डवेयर की खामियों को पकड़ा जा सके।
        • UPSC प्रासंगिकता: “अंतरिक्ष मिशन प्रक्रियाएं”, “क्रायोजेनिक इंजन तकनीक” और “वैज्ञानिक सुरक्षा प्रोटोकॉल”।
        • विस्तृत विश्लेषण:
          • सांख्यिकीय महत्व: आधुनिक रॉकेट इतने जटिल हैं कि लगभग 40% लॉन्च देरी (Scrubs) उन मुद्दों के कारण होती है जिन्हें WDR के दौरान या उसके ठीक बाद पहचाना जाता है।
          • इसरो की सटीकता: चूंकि भारत मानवयुक्त मिशन (गगनयान) की तैयारी कर रहा है, इसलिए “एकीकृत पूर्वाभ्यास” (Integrated Rehearsals) में महारत हासिल करना अंतरिक्ष में मानव सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतिम मोर्चा है।

        संपादकीय विश्लेषण

        11 फरवरी, 2026
        GS-3 विज्ञान एवं तकनीक आगामी AI उछाल

        डेटा केंद्रों की बिजली की ज़रूरतें अब छोटे देशों के बराबर। संज्ञानात्मक रोजगार विस्थापन के प्रबंधन के लिए अग्रिम शासन पर ध्यान।

        GS-3 अर्थव्यवस्था कपड़ा व्यापार युद्ध

        अमेरिका-बांग्लादेश परिधान समझौता भारतीय निर्यात को कम कर रहा है। भारतीय कपास और यार्न बाजारों पर 18% टैरिफ के दबाव से क्षेत्र संकट में।

        GS-3 अंतरिक्ष तकनीक रॉकेट रिहर्सल: वेट बनाम ड्राई

        WDR ने -253°C पर क्रायो-लीक की पहचान की। महत्वपूर्ण “फेल सेफ” प्रोटोकॉल जहाँ 40% लॉन्च विफलता को पहले ही रोका जाता है।

        शासन: एक बड़े AI मॉडल के प्रशिक्षण में 3,000 लोगों के वार्षिक उपयोग के बराबर पानी खर्च होता है।
        संसद: अध्यक्ष लोकतंत्र की “धुरी” है; विधायी वैधता के लिए निष्पक्ष आचरण महत्वपूर्ण है।
        अर्थव्यवस्था: क्षेत्रीय असंतुलन का सामना कर रहे परिधान खंडों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को तकनीकी वस्त्रों की ओर बढ़ना चाहिए।
        सुरक्षा: “बफर ज़ोन” के निर्माण से अनजाने में सांप्रदायिक सुदृढ़ीकरण हुआ है, जिससे राजनीतिक संवाद रुक गया है।
        GS-4
        संस्थागत निष्पक्षता
        मध्यस्थता बनाम पक्षपात: अध्यक्ष की भूमिका सदन का निष्पक्ष मध्यस्थ होने की मांग करती है। जब विधायिका की “धुरी” को पक्षपाती के रूप में देखा जाता है, तो संसदीय लोकतंत्र की वैधता से समझौता हो जाता है, जिससे अनौपचारिक परामर्शदात्री परंपराओं की ओर लौटना आवश्यक हो जाता है।

        यहाँ पृथ्वी की वैश्विक संचार प्रणालियों—नदियों और झीलों—पर केंद्रित विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। ये आपकी UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं, जलवायु विनियमन और सभ्यताओं का आधार बनते हैं।

        नदियों को अक्सर उनकी लंबाई, जल विसर्जन आयतन (Discharge volume), या सामरिक सीमा-पारीय (Transboundary) महत्व के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

        महाद्वीपनदीलंबाई (लगभग)महत्व
        अफ्रीकानील (Nile)6,650 किमीदुनिया की सबसे लंबी नदी; उत्तर की ओर भूमध्य सागर में गिरती है।
        दक्षिण अमेरिकाअमेज़न (Amazon)6,400 किमीजल विसर्जन आयतन के आधार पर सबसे बड़ी; सबसे बड़े वर्षावन से गुजरती है।
        एशियायांग्त्ज़ी (Yangtze)6,300 किमीएशिया की सबसे लंबी नदी; पूरी तरह से चीन के भीतर बहती है।
        उत्तरी अमेरिकामिसिसिपी (Mississippi)6,275 किमीमैक्सिको की खाड़ी में “पक्षी के पंजे” (Bird-foot) जैसा डेल्टा बनाती है।
        यूरोपवोल्गा (Volga)3,530 किमीयूरोप की सबसे लंबी नदी; स्थल-रद्ध कैस्पियन सागर में गिरती है।
        ऑस्ट्रेलियामरे-डार्लिंग3,672 किमीऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप की प्राथमिक नदी प्रणाली।
        • भूमध्य रेखा को पार करने वाली: कांगो नदी (अफ्रीका) एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो भूमध्य रेखा को दो बार पार करती है। यह दुनिया की सबसे गहरी नदी (220 मीटर से अधिक) भी है।
        • “शोक” नदियाँ: चीन की पीली नदी (ह्वांग हे) अपनी विनाशकारी बाढ़ और भारी गाद (Silt) के लिए जानी जाती है।
        • सीमा-पारीय संघर्ष: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (IR) के मानचित्रण के लिए मेकांग (दक्षिण-पूर्व एशिया), ब्रह्मपुत्र (चीन-भारत-बांग्लादेश), और नील (ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम विवाद) पर ध्यान केंद्रित करें।

        झीलें पृथ्वी के स्वास्थ्य के “थर्मामीटर” की तरह हैं। 2026 की परीक्षाओं के लिए क्षेत्रफल, आयतन और लवणता के बीच अंतर पर ध्यान दें।

        1. कैस्पियन सागर (खारा पानी): दुनिया का सबसे बड़ा स्थल-रद्ध (Landlocked) जल निकाय। यह 5 देशों की सीमाओं को छूता है: रूस, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान और अजरबैजान।
        2. सुपीरियर झील (मीठा पानी): सतही क्षेत्रफल के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील (USA/कनाडा)।
        3. विक्टोरिया झील (मीठा पानी): सबसे बड़ी उष्णकटिबंधीय झील; यह श्वेत नील (White Nile) का स्रोत है (युगांडा, केन्या, तंजानिया)।
        4. ह्यूरन झील (Lake Huron): उत्तरी अमेरिका की ‘महान झीलों’ (Great Lakes) प्रणाली का हिस्सा।
        5. मिशिगन झील: पूरी तरह से एक ही देश (USA) के भीतर स्थित सबसे बड़ी झील।
        • सबसे गहरी और सबसे पुरानी: बैकाल झील (रूस)। इसमें दुनिया के बिना जमे हुए सतही मीठे पानी का 20% हिस्सा समाहित है।
        • सबसे लंबी मीठे पानी की झील: तांगानिका झील (अफ्रीका)। यह चार देशों में फैली हुई है: तंजानिया, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, बुरुंडी और जाम्बिया।
        • सबसे ऊँची नौगम्य (Navigable) झील: टिटिकाका झील (एंडीज पर्वत; पेरू/बोलीविया सीमा)।
        • पृथ्वी पर सबसे निचला बिंदु: मृत सागर (Dead Sea) (इजराइल/जॉर्डन)। यह समुद्र की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक खारा है।
        रिकॉर्डनामस्थान
        सबसे लंबी नदीनील (Nile)अफ्रीका
        सबसे बड़ी झील (क्षेत्रफल)कैस्पियन सागरयूरेशिया
        सबसे गहरी झीलबैकाल झीलरूस
        भूमध्य रेखा को दो बार काटने वालीकांगो नदीअफ्रीका
        सबसे निचली झीलमृत सागरपश्चिम एशिया

        मानचित्र पर अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley) की झीलों (जैसे तांगानिका, मलावी, एडवर्ड) को उत्तर-से-दक्षिण क्रम में देखें। साथ ही, उत्तरी अमेरिका की महान झीलों (HOMES: Huron, Ontario, Michigan, Erie, Superior) के पश्चिम-से-पूर्व क्रम को भी याद रखें।

        मानचित्रण विवरण

        वैश्विक नदियाँ और झीलें
        महाद्वीपीय अग्रणी सबसे लंबी नदियाँ

        नील (अफ्रीका) विश्व की सबसे लंबी है; अमेज़न (दक्षिण अमेरिका) जल प्रवाह में अग्रणी है। यांग्त्ज़ी एशिया की प्रमुख धमनी है।

        रणनीतिक केंद्र नदियों की चरम सीमाएँ

        कांगो नदी भूमध्य रेखा को दो बार पार करने वाली एकमात्र नदी है। मिसिसिपी एक अद्वितीय ‘पक्षी-पैर’ जैसा डेल्टा बनाती है।

        प्रमुख झील प्रणालियाँ
        रिकॉर्ड वाले बेसिन

        कैस्पियन सागर सबसे बड़ा स्थलवरुद्ध जलाशय बना हुआ है। सुपीरियर झील क्षेत्रफल के आधार पर ताजे पानी की अग्रणी झील है, जबकि विक्टोरिया झील सफेद नील के उष्णकटिबंधीय स्रोत के रूप में कार्य करती है।

        गहराई और लवणता
        जलमंडल की चरम सीमाएँ

        बैकाल झील (रूस) सबसे गहरी और प्राचीनतम है, जिसमें वैश्विक गैर-हिमित ताजे पानी का 20% हिस्सा है। मृत सागर पृथ्वी का सबसे निचला बिंदु और उच्चतम लवणता को चिह्नित करता है।

        नौगम्य ऊँचाइयाँ

        पेरू-बोलीविया सीमा पर स्थित, टिटिकाका झील दुनिया की सबसे ऊँची नौगम्य झील है, जबकि तांगानिका सबसे लंबी मीठे पानी की झील है।

        सबसे लंबी नदी नील (अफ्रीका) 6,650 किमी।
        सबसे गहरी झील बैकाल (रूस) 1,642 मी।
        सबसे खारी मृत सागर (इजरायल/जॉर्डन)।
        एटलस रणनीति
        स्थानिक आधार: जल-कूटनीति विश्लेषण के लिए मेकांग या ब्रह्मपुत्र जैसी सीमा-पारीय नदियों का मानचित्रण आवश्यक है। यूरोप की सबसे बड़ी स्थलवरुद्ध जल निकासी प्रणाली को समझने के लिए वोल्गा के कैस्पियन तक के मार्ग का पता लगाएं।

        Dainik CSAT Quiz in Hindi – February 11, 2026

        Dainik CSAT Quiz (11 February 2026)
        दैनिक CSAT क्विज़

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          Dainik GS Quiz in Hindi – February 11, 2026

          Dainik GS Quiz (11 February 2026)
          दैनिक GS क्विज़

          दैनिक GS क्विज़

          8:00

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            IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 10 फ़रवरी 2026 (Hindi)

            यह अध्याय “फ्रांसीसी क्रांति” 1789 में शुरू हुई उन परिवर्तनकारी घटनाओं का विवरण देता है, जिनके कारण फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र का अंत हुआ और लोकतांत्रिक आदर्शों का उदय हुआ।

            क्रांति की शुरुआत 14 जुलाई 1789 को पेरिस में बास्तील (Bastille) के किले-जेल पर हमले के साथ हुई। यह किला राजा की निरंकुश शक्तियों का प्रतीक था।

            • अशांति के कारण: पूरा शहर डर और आतंक के माहौल में था क्योंकि ऐसी अफवाहें फैली थीं कि राजा ने सेना को नागरिकों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया है। लगभग 7,000 स्त्री-पुरुष टाउन हॉल के सामने एकत्र हुए और उन्होंने एक जन-सेना का गठन करने का निर्णय लिया।
            • आर्थिक कष्ट: शहर और देहाती इलाकों में अधिकांश लोग पाव रोटी (Bread) की ऊँची कीमतों और भोजन की व्यापक कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

            फ्रांसीसी समाज तीन ‘एस्टेट्स’ (Estates) की सामंती व्यवस्था में विभाजित था:

            • प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग – Clergy): इसमें चर्च के अधिकारी शामिल थे। इन्हें जन्म से ही विशेष अधिकार प्राप्त थे, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण ‘राज्य को कर (Tax) न देने’ की छूट थी।
            • द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग – Nobility): इसमें राज्य के उच्च अधिकारी और जमींदार शामिल थे। इन्हें भी करों से छूट मिली हुई थी और वे किसानों से सामंती कर (Feudal dues) वसूलते थे।
            • तृतीय एस्टेट: इसमें जनसंख्या का लगभग 90% हिस्सा शामिल था। इसमें बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान और कारीगर आते थे। पूरे करों का बोझ केवल इसी एस्टेट पर था।
              • वे चर्च को ‘टाइद’ (Tithes) नामक धार्मिक कर देते थे।
              • वे राज्य को ‘टाइल’ (Taille) नामक प्रत्यक्ष कर और दैनिक उपभोग की वस्तुओं (नमक, तंबाकू) पर अप्रत्यक्ष कर देते थे।
            • जनसंख्या वृद्धि: फ्रांस की जनसंख्या 1715 में 2.3 करोड़ से बढ़कर 1789 में 2.8 करोड़ हो गई, जिससे खाद्यान्न की मांग तेजी से बढ़ी।
            • जीविका संकट (Subsistence Crisis): अनाज का उत्पादन मांग के साथ तालमेल नहीं बिठा सका। मजदूरों की मजदूरी स्थिर रही जबकि पाव रोटी की कीमतें आसमान छूने लगीं। जब कभी सूखा या ओले पड़ते थे, तो पैदावार गिर जाती थी, जिससे बार-बार “जीविका संकट” पैदा होता था।

            18वीं शताब्दी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे ‘मध्य वर्ग’ कहा गया। इन्होंने समुद्री व्यापार और रेशमी व ऊनी कपड़ों के निर्माण के माध्यम से अपनी संपत्ति अर्जित की थी।

            • दार्शनिक प्रभाव: इस वर्ग के लोग शिक्षित थे और उनका मानना था कि समाज के किसी भी समूह को जन्म के आधार पर विशेषाधिकार नहीं मिलने चाहिए।
              • जॉन लॉक (John Locke): अपनी पुस्तक ‘टू ट्रीटीज़ ऑफ गवर्नमेंट’ में उन्होंने राजा के दैवीय और निरंकुश अधिकारों के सिद्धांत का खंडन किया।
              • जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau): उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक समझौते पर आधारित सरकार का विचार पेश किया।
              • मोंटेस्क्यू (Montesquieu): अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ द लॉज़’ में उन्होंने सरकार के भीतर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता के विभाजन का प्रस्ताव दिया।
            • एस्टेट्स जनरल: 5 मई 1789 को लुई XVI ने नए करों के प्रस्ताव के लिए एक बैठक बुलाई। प्रथम और द्वितीय एस्टेट ने अपने 300-300 प्रतिनिधि भेजे, जबकि तृतीय एस्टेट के 600 प्रतिनिधि पीछे खड़े हुए। तृतीय एस्टेट ने मांग की कि प्रत्येक सदस्य को एक वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए (लोकतांत्रिक सिद्धांत), जिसे राजा ने ठुकरा दिया।
            • नेशनल असेंबली और टेनिस कोर्ट की शपथ: विरोध में तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि सभा से बाहर चले गए। 20 जून को वे वर्साय (Versailles) के एक इंडोर टेनिस कोर्ट में जमा हुए और खुद को ‘नेशनल असेंबली’ घोषित कर दिया। उन्होंने शपथ ली कि जब तक वे फ्रांस के लिए एक नया संविधान तैयार नहीं कर लेते, तब तक वे अलग नहीं होंगे।
            • संवैधानिक राजतंत्र: 1791 में नेशनल असेंबली ने संविधान का मसौदा पूरा किया। इसका मुख्य उद्देश्य सम्राट की शक्तियों को सीमित करना था। अब शक्तियाँ एक व्यक्ति के हाथ में होने के बजाय विभिन्न संस्थाओं (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) को हस्तांतरित कर दी गईं।
            • फ्रांस एक गणराज्य बना: अप्रैल 1792 में नेशनल असेंबली ने प्रशा और ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। 21 सितंबर 1792 को नवनिर्वाचित सभा (कन्वेंशन) ने राजतंत्र को समाप्त कर दिया और फ्रांस को एक गणराज्य घोषित कर दिया। राजा लुई XVI पर देशद्रोह का मुकदमा चला और 21 जनवरी 1793 को उन्हें सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई।
            • आतंक का राज (The Reign of Terror – 1793 से 1794): यह काल मैक्सिमिलियन रोबेस्प्येर के शासन का था। उन्होंने नियंत्रण और दंड की सख्त नीति अपनाई। कुलीन वर्ग, पादरी और अन्य राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया। यदि वे दोषी पाए जाते, तो उन्हें ‘गिलोटिन’ (दो खंभों वाली मशीन जिस पर अपराधी का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था) पर चढ़ा दिया जाता था। अंततः जुलाई 1794 में रोबेस्प्येर को भी दोषी ठहराया गया और अगले ही दिन उन्हें गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।
            • स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व: ये विचार फ्रांसीसी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण विरासत थे। इन आदर्शों ने न केवल फ्रांस को बल्कि अगली सदी के दौरान पूरे यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों के राजनीतिक आंदोलनों को प्रेरित किया।
            • दास प्रथा का उन्मूलन: 1794 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा को समाप्त करने का कानून पारित किया गया, जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार था (हालाँकि 10 साल बाद नेपोलियन ने इसे फिर से शुरू कर दिया था)।
            • नेपोलियन बोनापार्ट: डायरेक्टरी के शासन की राजनीतिक अस्थिरता ने नेपोलियन के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। 1804 में उन्होंने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित किया। उन्होंने यूरोप के कई हिस्सों को जीता और निजी संपत्ति की सुरक्षा और माप-तोल की दशमलव प्रणाली जैसे आधुनिक कानून लागू किए। अंततः 1815 में वाटरलू (Waterloo) की लड़ाई में उनकी हार हुई।
            NCERT इतिहास   •   कक्षा-9
            अध्याय – 1

            फ्रांसीसी क्रांति

            प्राचीन राजतंत्र
            तीन एस्टेट: पादरी और कुलीन वर्ग को जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त थे, जबकि तृतीय एस्टेट (90%) पूरा टैक्स भरता था।
            जीविका संकट: तीव्र जनसंख्या वृद्धि और खराब फसल के कारण खाद्य दंगे हुए और पावरोटी की कीमतें बढ़ गईं।
            तर्क का युग
            लॉक और रूसो: दैवीय अधिकारों को चुनौती दी; सामाजिक अनुबंध पर आधारित सरकार का प्रस्ताव रखा।
            मोंटेस्क्यू: सत्ता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित करने का सुझाव दिया।
            क्रांतिकारी घटनाक्रम
            बास्तीन (14 जुलाई 1789): किले-जेल पर हमले ने राजा की निरंकुश सत्ता के अंत का संकेत दिया।
            नेशनल असेंबली: तृतीय एस्टेट ने राजतंत्र को सीमित करने वाले संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ ली।
            गणराज्य: कन्वेंशन ने 1792 में राजतंत्र को समाप्त किया; 1793 में लुई XVI को देशद्रोह के लिए फांसी दी गई।
            आतंक का राज (1793-94): रोबेस्पयेर के अधीन “गणराज्य के दुश्मनों” को गिलोटिन पर चढ़ाया गया। अंततः उसे भी फांसी दी गई।
            नेपोलियन बोनापार्ट: सैन्य अस्थिरता के बीच 1804 में खुद को सम्राट घोषित किया; खुद को यूरोप का “आधुनिकीकरणकर्ता” माना।

            टायद और टाइल

            चर्च को दिया जाने वाला कर और राज्य को दिया जाने वाला प्रत्यक्ष कर।

            गिलोटिन

            दो खंभों और एक ब्लेड वाली मशीन जिसका उपयोग लोगों का सिर काटने के लिए किया जाता था।

            जैकोबिन

            रोबेस्पयेर के नेतृत्व में समाज के कम समृद्ध वर्गों का एक राजनीतिक क्लब।

            आधुनिक विरासत
            फ्रांसीसी क्रांति की असली विरासत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सार्वभौमिक आदर्श हैं। इसने प्रजा को नागरिकों में बदल दिया और आधुनिक दुनिया में लोकतांत्रिक अधिकारों की नींव रखी।

            भारत की एकल एकीकृत न्यायिक प्रणाली में, उच्च न्यायालय (High Court – HC) उच्चतम न्यायालय के नीचे कार्य करता है लेकिन यह राज्य के स्तर पर सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है। आपके “IAS PCS मिशन 2026” के लिए यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि यद्यपि उच्चतम न्यायालय (SC) और उच्च न्यायालय (HC) कई शक्तियाँ साझा करते हैं, लेकिन उनके क्षेत्राधिकार में महत्वपूर्ण अंतर है, विशेष रूप से ‘रिट’ (Writs) के मामले में।

            अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा। हालाँकि, 7वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) ने संसद को यह अधिकार दिया कि वह दो या दो से अधिक राज्यों के लिए, अथवा दो या अधिक राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक साझा उच्च न्यायालय (Common High Court) स्थापित कर सके।

            • सदस्य संख्या: उच्चतम न्यायालय (जहाँ संसद संख्या तय करती है) के विपरीत, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा कार्यभार के आधार पर समय-समय पर निर्धारित की जाती है।
            • नियुक्ति: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
              • मुख्य न्यायाधीश: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श के बाद की जाती है।
              • अन्य न्यायाधीश: अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
            1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
            2. उसने भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम 10 वर्षों तक किसी न्यायिक पद पर कार्य किया हो।
            3. अथवा वह कम से कम 10 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (या लगातार दो या अधिक ऐसे न्यायालयों) का अधिवक्ता रहा हो।
            • नोट: उच्चतम न्यायालय के विपरीत, उच्च न्यायालय में “प्रसिद्ध न्यायविद” (Distinguished Jurist) को न्यायाधीश नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।
            • कार्यकाल: उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करता है (उच्चतम न्यायालय के लिए यह 65 वर्ष है)।
            • त्यागपत्र: वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
            • निष्कासन (Removal): उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की है। उन्हें केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर हटाया जा सकता है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।

            उच्च न्यायालय एक “अभिलेख न्यायालय” (Court of Record) है (अनुच्छेद 215) और इसके पास अपनी अवमानना (Contempt) के लिए दंड देने की शक्ति है।

            उच्च न्यायालय के पास मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए और “किसी अन्य उद्देश्य” (सामान्य कानूनी अधिकारों) के लिए भी बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी करने की शक्ति है।

            • तुलना: उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय की तुलना में व्यापक है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर ही रिट जारी कर सकता है।

            प्रत्येक उच्च न्यायालय के पास उन सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) के अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति होती है, जो उसके क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार के भीतर आते हैं (सैन्य अदालतों को छोड़कर)।

            जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति के संबंध में राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करता है। इसके अतिरिक्त, राज्य की न्यायिक सेवा के अन्य व्यक्तियों पर भी उच्च न्यायालय का नियंत्रण होता है।

            अनुच्छेदप्रावधान
            215उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होना।
            226रिट जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 32 से व्यापक)।
            227सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति।
            231दो या अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना की संसद की शक्ति।
            • बॉम्बे HC: महाराष्ट्र, गोवा, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव।
            • गुवाहाटी HC: असम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश।
            • पंजाब और हरियाणा HC: पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़।
            • कलकत्ता HC: पश्चिम बंगाल और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
            विशेषताउच्चतम न्यायालय (SC)उच्च न्यायालय (HC)
            सेवानिवृत्ति की आयु65 वर्ष62 वर्ष
            रिट अनुच्छेदअनुच्छेद 32 (संकीर्ण दायरा)अनुच्छेद 226 (व्यापक दायरा)
            नियुक्तिराष्ट्रपति द्वाराराष्ट्रपति द्वारा
            प्रसिद्ध न्यायविदनियुक्त किया जा सकता हैनियुक्त नहीं किया जा सकता
            निष्कासनसंसद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारासंसद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा

            यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और निष्कासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, लेकिन उन्हें पद की शपथ संबंधित राज्य के राज्यपाल दिलाते हैं। अक्सर छात्र यहाँ भ्रमित हो जाते हैं।

            IAS PCS मिशन 2026 • राज्य न्यायपालिका
            अनुच्छेद 214–231

            उच्च न्यायालय (High Courts)

            योग्यता
            भारतीय नागरिकता + 10 वर्ष का न्यायिक पद या 10 वर्ष तक HC अधिवक्ता होना आवश्यक। “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” का प्रावधान नहीं।
            कार्यकाल
            न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं। नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
            रिट क्षेत्राधिकार (अनु. 226)
            विस्तृत दायरा: HC मौलिक अधिकारों और “किसी अन्य उद्देश्य” (कानूनी अधिकार) के लिए रिट जारी करता है, जिससे इसका दायरा SC (अनु. 32) से व्यापक हो जाता है।
            अधीक्षण की शक्ति (अनु. 227)
            उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) पर अधीक्षण का प्रयोग करता है।
            प्रशासनिक नियंत्रण
            अनु. 235 के तहत, जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदस्थापना के लिए राज्यपाल द्वारा HC से परामर्श किया जाता है।

            अभिलेख न्यायालय

            अनु. 215 के तहत, उच्च न्यायालय के निर्णयों को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखा जाता है और इसके पास अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति है।

            साझा HC

            अनु. 231 के तहत, संसद दो या अधिक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक ही HC स्थापित कर सकती है (जैसे बॉम्बे या गुवाहाटी HC)।

            पदच्युति प्रक्रिया

            SC न्यायाधीशों के समान: कदाचार या अक्षमता के लिए संसद में विशेष बहुमत के बाद राष्ट्रपति का आदेश।

            कानूनी
            अंतर
            जहाँ उच्चतम न्यायालय शीर्ष पर है, वहीं उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है। मुख्य अंतर बरकरार हैं: सेवानिवृत्ति की आयु (62 बनाम 65), HC की व्यापक रिट शक्ति, और राज्य बेंच के लिए “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” नियुक्ति श्रेणी का अभाव।

            यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (10 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

            पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

            • संदर्भ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुआलालंपुर की 24 घंटे की यात्रा वर्ष 2025 में आए तनावपूर्ण दौर के बाद द्विपक्षीय संबंधों को फिर से स्थापित करने और मजबूत करने के रणनीतिक प्रयास का प्रतीक है।
            • मुख्य बिंदु:
              • गलतियों को सुधारना: अक्टूबर 2025 में आसियान (ASEAN) शिखर सम्मेलन के लिए प्रस्तावित यात्रा के अंतिम समय में रद्द होने के बाद, 2026 में मलेशिया प्रधानमंत्री का पहला विदेशी गंतव्य बना।
              • आतंकवाद विरोध पर सहमति: एक महत्वपूर्ण संयुक्त बयान में “सीमा पार आतंकवाद” की स्पष्ट रूप से निंदा की गई, जो पिछले मतभेदों के बावजूद सुरक्षा चिंताओं पर दोनों देशों के एक साथ आने का संकेत देता है।
              • उच्च-तकनीकी सहयोग: दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) के क्षेत्र में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जो ‘आईआईटी मद्रास ग्लोबल’ को मलेशिया की ‘एडवांस्ड सेमीकंडक्टर एकेडमी’ से जोड़ता है।
              • विवादास्पद मुद्दों से किनारा: दोनों पक्षों ने मलेशिया में धर्मोपदेशक जाकिर नाइक के निरंतर प्रवास जैसे संवेदनशील विषयों पर सार्वजनिक चर्चा से सावधानीपूर्वक परहेज किया।
            • UPSC प्रासंगिकता: “भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी”, “द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग” और “दक्षिण-पूर्वी एशिया की भू-राजनीति” के लिए अनिवार्य।
            • विस्तृत विश्लेषण:
              • आर्थिक धुरी (Economic Pivot): इस यात्रा का उद्देश्य ‘आसियान-भारत माल व्यापार समझौते’ (AITIGA) पर बातचीत को पुनर्जीवित करना है, जो भारतीय व्यापार अधिकारियों की आलोचनात्मक टिप्पणियों के कारण रुक गई थी।
              • रणनीतिक बहु-संरेखण (Multi-alignment): चूंकि भारत यूरोप और अमेरिका के साथ बड़े मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर काम कर रहा है, इसलिए मलेशिया जैसे आसियान भागीदारों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।
              • ब्रिक्स (BRICS) में भागीदारी: भारत ने ब्रिक्स में शामिल होने की मलेशिया की आकांक्षाओं को नोट किया है; प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम को भारत की अध्यक्षता में होने वाले आगामी शिखर सम्मेलन में भागीदार देश के रूप में आमंत्रित किया जाएगा।

            पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; न्यायपालिका; मौलिक अधिकार)।

            • संदर्भ: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘धार्मिक और जातिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाने’ के आधार पर घूसखोर पंडित नामक फिल्म के निर्माताओं के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के निर्देश का आलोचनात्मक विश्लेषण।
            • मुख्य बिंदु:
              • मजबूरन समर्पण: आपराधिक कार्यवाही की धमकी ने निर्माता को तथ्यों की न्यायिक जांच से पहले ही प्रचार सामग्री हटाने के लिए मजबूर कर दिया।
              • संवैधानिक संरक्षण: अनुच्छेद 19(1)(a) को उन विचारों की रक्षा के लिए बनाया गया है जो शक्तिशाली समूहों को अप्रिय लग सकते हैं; अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए गए प्रतिबंध आनुपातिक (Proportionate) होने चाहिए।
              • भावनाएं एक मापदंड के रूप में: संपादकीय का तर्क है कि एक विविध समाज में, “भावनाएं” आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक उपयोगी कानूनी मापदंड नहीं हो सकतीं।
              • विचारों का बाज़ार: विवादित सामग्री को हटाने की प्रक्रिया को सामान्य बनाना समाज को बहिष्कार या व्यंग्य जैसी लोकतांत्रिक प्रतिक्रियाओं का उपयोग करने से रोकता है और सार्वजनिक क्षेत्र को संकुचित करता है।
            • UPSC प्रासंगिकता: “भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, “कार्यपालिका की भूमिका” और “अपराध की कानूनी मानक” से संबंधित विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
            • विस्तृत विश्लेषण:
              • कार्यकारी अतिरेक (Executive Overreach): फिल्म के शीर्षक की नापसंदगी के लिए पुलिस कार्रवाई का निर्देश देना सार्वजनिक बहस के बजाय मुद्दे को केवल “अनुशासन का मामला” बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
              • प्रतिबंधों का पैटर्न: हाल के उदाहरण, जिनमें द केरला स्टोरी पर प्रतिबंध और बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन शामिल हैं, दृश्य कलाओं को नियंत्रित करने के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग की प्रवृत्ति का सुझाव देते हैं।
              • न्यायिक उपाय: अवैधता के दावों पर अधिक समझदारी भरी प्रतिक्रिया एकपक्षीय कार्यकारी कार्रवाई के बजाय न्यायिक राहत प्राप्त करना है।

            पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; प्रौद्योगिकी का प्रभाव) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

            • संदर्भ: अर्जुन अप्पादुरई द्वारा इस बात का विश्लेषण कि कैसे डिजिटल बाज़ार और प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म मानव सामाजिकता और पहचान को निष्कर्षण (Extraction) के लिए एक वैश्विक वस्तु में बदल रहे हैं।
            • मुख्य बिंदु:
              • पूंजीवादी निष्कर्षण: कच्चे माल या एआई से परे, अब “सामाजिकता स्वयं”—दोस्ती, पसंद-नापसंद और व्यक्तिगत कहानियाँ—पूंजीवादी खनन का प्राथमिक विषय बन गई हैं।
              • निजता का अंत: यह अत्यधिक तीव्र प्रोफाइलिंग (Profiling on steroids) अंतरंगता और विश्वास जैसी पारंपरिक अवधारणाओं को अप्रचलित बना देती है, क्योंकि इन्हें बिना किसी सीमा के खनन किए जाने वाले संसाधन के रूप में माना जाता है।
              • कहानी की अर्थव्यवस्था (Story Economy): ओटीटी (OTT) स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया बाज़ार को नियंत्रित करने के लिए “स्थानीय स्वाद” और सार्वभौमिक चरित्र प्रकारों का शिकार करते हैं ताकि उन्हें व्यावसायिक वस्तु बनाया जा सके।
              • कृत्रिम बनाम मानव: एआई बॉट्स (सिरी, चैटजीपीटी) अब निर्णय और अंतर्ज्ञान (Intuition) के मामले में मनुष्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे एकीकृत व्यक्ति की पहचान और बिखर रही है।
            • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल नैतिकता”, “बड़े डेटा के युग में निजता” और “इंटरनेट का समाजशास्त्र” के लिए महत्वपूर्ण।
            • विस्तृत विश्लेषण:
              • सेल्फी के स्रोत: व्यक्तिगत स्वतंत्रता के ज्ञानोदय (Enlightenment) मूल्यों को क्रेडिट स्कोर और एल्गोरिथम आधारित उपभोक्ता प्रोफाइल के एक अस्थिर मिश्रण द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
              • लोकतंत्रीकरण का जोखिम: हालांकि अब कोई भी “भाग्यशाली वायरल होने” (Lucky virality) के माध्यम से दर्शकों तक पहुँच सकता है, लेकिन यह प्रवृत्ति मानव अनुभव की हर जीवित खान में “ड्रिल करने” (Drilling) की निरंतर दौड़ को सुगम बनाती है।

            पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (अर्थव्यवस्था)।

            • संदर्भ: भारत ने वर्ष 2026 के लिए ‘किम्बरली प्रक्रिया’ (KP) की अध्यक्षता ग्रहण की है, जो हीरा व्यापार के वैश्विक शासन में सुधार के लिए एक मंच प्रदान करती है।
            • मुख्य बिंदु:
              • भारत का प्रभाव: दुनिया के अग्रणी कटिंग और पॉलिशिंग केंद्र के रूप में, जो वैश्विक कच्चे हीरों का 40% आयात करता है, भारत का इस मूल्य श्रृंखला में अद्वितीय प्रभाव है।
              • ‘संघर्ष’ (Conflict) की परिभाषा: किम्बरली प्रक्रिया की एक बड़ी आलोचना “संघर्ष हीरों” (Conflict Diamonds) की इसकी संकीर्ण परिभाषा है, जो राज्य से जुड़े दुर्व्यवहारों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और पर्यावरणीय क्षति की अनदेखी करती है।
              • तकनीकी समाधान: भारत धोखाधड़ी को कम करने और सीमा शुल्क डेटा विनिमय को आधुनिक बनाने के लिए डिजिटल, छेड़छाड़-मुक्त ब्लॉकचेन-आधारित प्रमाणपत्रों को बढ़ावा दे सकता है।
              • आजीविका पर ध्यान: विमर्श को केवल “खराब हीरों” को रोकने से हटाकर एक ऐसे जिम्मेदार व्यापार को सक्षम बनाने की ओर ले जाने की आवश्यकता है जो अफ्रीकी खनन समुदायों का समर्थन करे।
            • UPSC प्रासंगिकता: “अंतर्राष्ट्रीय संसाधन शासन”, “ग्लोबल साउथ में भारत का नेतृत्व” और “आपूर्ति श्रृंखला नैतिकता” के लिए अनिवार्य।
            • विस्तृत विश्लेषण:
              • संस्थागत सुधार: भारत साधारण विद्रोही उग्रवाद से परे मानवाधिकारों के जोखिमों पर आम सहमति बनाने के लिए तकनीकी कार्य समूहों का गठन कर सकता है।
              • त्रिपक्षीय शक्ति: सरकारों, उद्योग और नागरिक समाज के बीच खुले संचार की सुविधा प्रदान करके, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि किम्बरली प्रक्रिया एक प्रगतिशील बहुपक्षीय निकाय बनी रहे।

            पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार से संबंधित मुद्दे; सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम – MSME)।

            • संदर्भ: तमिलनाडु के इरोड में एक डेयरी प्रसंस्करण संयंत्र का मामला जो उन संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करता है जो भारत में रोजगार-गहन विकास को रोक रही हैं।
            • मुख्य बिंदु:
              • ऋण की बाधा (Credit Bottleneck): प्राथमिक बाधा मांग या बुनियादी ढांचे की कमी नहीं है, बल्कि छोटे उत्पादकों की उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती और विश्वसनीय औपचारिक ऋण तक पहुँच की कमी है।
              • एकत्रीकरण की शक्ति: अमूल मॉडल से प्रेरित होकर, यह सबक मिलता है कि विकास के लिए संस्थागत सहायता के माध्यम से उत्पादक स्तर पर ऋण की समस्याओं को हल करना आवश्यक है।
              • MSME का लचीलापन: इरोड का औद्योगिक परिदृश्य दिखाता है कि छोटी फर्में बढ़ने के लिए तैयार हैं लेकिन वे नियामक जटिलता, कौशल अंतराल और कर अनिश्चितता के कारण रुकी हुई हैं।
              • रोजगार अवशोषण: अकेले बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भारत के कार्यबल को समाहित नहीं कर सकती हैं; बड़े पैमाने पर रोजगार MSME और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्रों से ही आना चाहिए।
            • UPSC प्रासंगिकता: “समावेशी विकास”, “ग्रामीण विकास” और “वित्तीय समावेशन रणनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
            • विस्तृत विश्लेषण:
              • जनसांख्यिकीय घड़ी: भारत के पास अपनी कार्यशील आयु वाली जनसंख्या के लाभ के कम होने से पहले लगभग दो दशक का समय है; अब गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करने में विफल रहने का परिणाम एक खोए हुए अवसर के रूप में निकलेगा।
              • वैश्विक मिसाल: विश्व बैंक का अनुमान है कि लघु और मध्यम उद्यम (SMEs) वैश्विक रोजगार का लगभग 70% प्रदान करते हैं, जो उन्हें भारत के रोजगार संकट के लिए सबसे महत्वपूर्ण समाधान बनाता है।

            संपादकीय विश्लेषण

            10 फरवरी, 2026
            GS-3 तकनीक / समाज खनन योग्य स्व (The Mineable Self)

            “स्वयं सामाजिकता” को एक वस्तु के रूप में निकाला जा रहा है। अत्यधिक प्रोफाइलिंग ‘कहानी अर्थव्यवस्था’ (story economy) में आत्मीयता और विश्वास को अप्रचलित बना रही है।

            GS-2/3 अर्थव्यवस्था किम्बरली प्रोसेस 2026

            भारत ने अध्यक्षता संभाली। ब्लॉकचेन प्रमाणपत्रों पर जोर और ‘संघर्ष’ की परिभाषा को व्यापक बनाकर इसमें राज्य-संबद्ध दुरुपयोगों को शामिल करने का प्रयास।

            GS-3 MSME / रोजगार रोजगार सृजन की बाधाएं

            इरोड के डेयरी संयंत्रों से सबक; ऋण की बाधाएं और नियामक जटिलता महत्वपूर्ण MSME रोजगार इंजन को पीछे धकेल रही हैं।

            कूटनीति: बदलते वैश्विक मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के बीच एक्ट ईस्ट और AITIGA वार्ता के लिए मलेशिया के साथ संबंधों को बहाल करना महत्वपूर्ण है।
            अर्थव्यवस्था: वैश्विक संसाधन शासन में सुधार के लिए भारत के पास 40% कच्चे हीरे के आयातक के रूप में अद्वितीय लाभ है।
            बुनियादी ढांचा: MSMEs के विस्तार के लिए संस्थागत एकत्रीकरण के माध्यम से उत्पादक स्तर पर ऋण बाधाओं को दूर करना आवश्यक है।
            समाज: एल्गोरिद्म आधारित उपभोक्ता प्रोफाइल व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जगह ले रहे हैं, जो अनुभवों की हर “जीवंत खदान” में ड्रिल कर रहे हैं।
            GS-4
            कला की स्वतंत्रता
            कार्यकारी अतिरेक: अनुच्छेद 19(1)(a) को विवादित अभिव्यक्ति की रक्षा करनी चाहिए। भावनाओं पर आधारित प्राथमिकी लोकतांत्रिक बहस को राज्य के अनुशासन में बदल देती है, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र संकुचित होता है और विचारों का बाजार शांत हो जाता है।

            यहाँ महत्वपूर्ण वैश्विक रेखाओं—भूमध्य रेखा (Equator)कर्क और मकर रेखाएँ (Tropics), और प्रधान मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) पर केंद्रित विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

            भूमध्य रेखा (विषुवत रेखा) तीन महाद्वीपों के 13 देशों से होकर गुजरती है। यह एकमात्र अक्षांश है जो एक ‘वृहद वृत्त’ (Great Circle) है।

            • दक्षिण अमेरिका (3): इक्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील।
            • अफ्रीका (7): गैबॉन, कांगो गणराज्य, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया, साओ टोम और प्रिंसिपे।
            • एशिया/ओशिनिया (3): मालदीव, इंडोनेशिया, किरिबाती।
            • मैपिंग टिप: ध्यान दें कि जबकि भूमध्य रेखा मालदीव और किरिबाती के क्षेत्रीय जल (Territorial waters) से होकर गुजरती है, यह उनके वास्तविक भूभाग (Landmass) को नहीं छूती है।

            यह रेखा उस सबसे उत्तरी बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ सूर्य दोपहर में सीधे सिर के ऊपर (June Solstice – जून संक्रांति) होता है। यह 17 देशों से होकर गुजरती है।

            • उत्तरी अमेरिका (2): मेक्सिको, बहामास।
            • अफ्रीका (7): पश्चिमी सहारा (विवादित), मॉरिटानिया, माली, अल्जीरिया, नाइजर, लीबिया, मिस्र।
            • एशिया (8): सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, ताइवान।
            • रणनीतिक बिंदु (भारत): भारत में, यह 8 राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम।

            यह रेखा उस सबसे दक्षिणी बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ सूर्य सीधे सिर के ऊपर (December Solstice – दिसंबर संक्रांति) होता है। यह 10 देशों से होकर गुजरती है।

            • दक्षिण अमेरिका (4): चिली, अर्जेंटीना, पराग्वे, ब्राजील।
            • अफ्रीका (5): नामीबिया, बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, मेडागास्कर।
            • ओशिनिया (1): ऑस्ट्रेलिया।
            • मुख्य तथ्य: ब्राजील दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ से भूमध्य रेखा और मकर रेखा दोनों गुजरती हैं।

            प्रधान मध्याह्न रेखा (ग्रीनविच रेखा) पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्ध में विभाजित करती है। यह 8 देशों से होकर गुजरती है।

            • यूरोप (3): यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, स्पेन।
            • अफ्रीका (5): अल्जीरिया, माली, बुर्किना फासो, टोगो, घाना।
            • मानचित्रण संदर्भ: प्रधान मध्याह्न रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को अटलांटिक महासागर में गिनी की खाड़ी (घाना के तट के पास) में काटती हैं।
            महत्वपूर्ण रेखामहाद्वीपों की संख्यादेशों की संख्यामुख्य भौगोलिक केंद्र
            भूमध्य रेखा313उष्णकटिबंधीय वर्षावन (अमेज़न, कांगो, इंडोनेशिया)।
            कर्क रेखा317मरुस्थल (सहारा, थार) और मानसूनी पेटियाँ (भारत)।
            मकर रेखा310अटाकामा मरुस्थल, ऑस्ट्रेलियाई आउटबैक।
            प्रधान मध्याह्न रेखा28ग्रीनविच (UK) और गिनी की खाड़ी।

            UPSC की परीक्षाओं में अक्सर यह पूछा जाता है कि कौन सा देश किस रेखा पर स्थित है। इसे याद करने के लिए महाद्वीप-वार समूहों का उपयोग करें। उदाहरण के लिए, अफ्रीका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ से भूमध्य रेखा, कर्क रेखा और मकर रेखा तीनों गुजरती हैं। मानचित्र पर इन रेखाओं के प्रतिच्छेदन बिंदुओं को भी ध्यान से देखें।

            मानचित्रण विवरण

            महत्वपूर्ण वैश्विक रेखाएँ
            भूमध्य रेखा (0°) वृहत् वृत्त (The Great Circle)

            ब्राजील, कांगो (DRC) और इंडोनेशिया सहित 13 देशों से गुजरती है। 11 देशों में भूमि को स्पर्श करती है, जबकि मालदीव और किरिबाती में समुद्री क्षेत्रों को पार करती है।

            मुख्य मध्याह्न रेखा गोलार्ध विभाजक

            यूरोप और अफ्रीका के 8 देशों से होकर गुजरती है। भूमध्य रेखा के साथ इसका मुख्य प्रतिच्छेदन घाना के पास गिनी की खाड़ी में होता है।

            कर्क रेखा (23.5° उत्तर)
            उत्तरी संक्रांति रेखा

            मैक्सिको, मिस्र और भारत सहित 17 देशों को पार करती है। भारतीय संदर्भ में, यह 8 राज्यों से होकर गुजरती है: पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में मिजोरम तक।

            मकर रेखा (23.5° दक्षिण)
            दक्षिणी संक्रांति रेखा

            दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के 10 देशों से होकर गुजरती है। ब्राजील विशिष्ट रूप से एकमात्र ऐसा देश है जहाँ से भूमध्य रेखा और यह रेखा दोनों गुजरती हैं।

            क्षेत्रीय भौगोलिक फोकस

            ये रेखाएँ वैश्विक जलवायु पेटियों को परिभाषित करती हैं, भूमध्य रेखा के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से लेकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के साथ स्थित शुष्क मरुस्थलों (सहारा/अटाकामा) तक।

            भूमध्य रेखा 13 देश (वृहत् वृत्त)।
            कर्क रेखा 8 भारतीय राज्य (GJ से MZ)।
            मकर रेखा ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया को पार करती हुई।
            एटलस रणनीति
            स्थानिक आधार: गिनी की खाड़ी में 0°/0° निर्देशांक को समझना वैश्विक नेविगेशन का शुरुआती बिंदु है। भारत की अद्वितीय जलवायु स्थिति की कल्पना करने के लिए कर्क रेखा के साथ मानसून बेल्ट का पता लगाएं।

            Dainik CSAT Quiz in Hindi – February 10, 2026

            Dainik CSAT Quiz (10 February 2026)
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                IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 9 फ़रवरी 2026 (Hindi)

                यह अध्याय “स्वतंत्रता के बाद भारत” एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के सामने आने वाली विशाल चुनौतियों और एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और एकीकृत भारत के निर्माण के लिए उठाए गए कदमों की जांच करता है।

                जब अगस्त 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, तो उसे स्मारकीय चुनौतियों की एक श्रृंखला का सामना करना पड़ा जिसने इसकी स्थिरता को खतरे में डाल दिया था।

                • शरणार्थी संकट (The Refugee Crisis): विभाजन के परिणामस्वरूप, लगभग 80 लाख (8 मिलियन) शरणार्थी उस क्षेत्र से भारत आए जो अब पाकिस्तान बन गया था। सरकार के सामने इन लाखों विस्थापित लोगों के लिए घर खोजने और उन्हें रोजगार प्रदान करने का तात्कालिक कार्य था।
                • रियासतों का एकीकरण (The Integration of Princely States): लगभग 500 रियासतें थीं, जिनमें से प्रत्येक पर एक महाराजा या नवाब का शासन था। एक एकीकृत भारत सुनिश्चित करने के लिए इन प्रत्येक शासकों को नए राष्ट्र में शामिल होने के लिए राजी करना आवश्यक था।
                • आर्थिक और सामाजिक विभाजन (Economic and Social Divisions): 1947 में, भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी थी, जिसकी कुल संख्या लगभग 34.5 करोड़ (345 मिलियन) थी। यह जनसंख्या ऊँची जातियों और नीची जातियों, बहुसंख्यक हिंदू समुदाय और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों, और विभिन्न भाषाई समूहों के बीच गहराई से विभाजित थी।
                • गरीबी: कृषि आजीविका का प्राथमिक साधन था, और यदि मानसून विफल हो जाता, तो लाखों किसानों और गैर-कृषि श्रमिकों (जैसे बुनकर और नाई) को भूखा रहना पड़ता।

                दिसंबर 1946 और नवंबर 1949 के बीच, राष्ट्र के राजनीतिक भविष्य को तैयार करने के लिए संविधान सभा के हिस्से के रूप में लगभग 300 भारतीयों ने सत्रों की एक श्रृंखला में मुलाकात की। संविधान को 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया था।

                • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise): सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक 21 वर्ष (अब 18 वर्ष) से अधिक आयु के सभी भारतीयों को राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में वोट देने का अधिकार प्रदान करना था। यह एक क्रांतिकारी कदम था, क्योंकि यूनाइटेड किंगडम (UK) और यूनाइटेड स्टेट्स (US) जैसे देशों में भी यह अधिकार चरणों में दिया गया था।
                • कानून के समक्ष समानता (Equality Before the Law): संविधान ने जाति या धार्मिक संबद्धता की परवाह किए बिना सभी नागरिकों को समानता की गारंटी दी।
                • वंचितों के लिए सुरक्षा उपाय (Safeguards for the Disadvantaged):
                  • अस्पृश्यता का उन्मूलन: अस्पृश्यता की प्रथा, जिसे भारत पर एक “कलंक और धब्बा” बताया गया था, उसे समाप्त कर दिया गया।
                  • आरक्षण: सदियों के भेदभाव की भरपाई के लिए सबसे निचली जातियों (हरिजनों) और आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) के लिए विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में सीटों का एक प्रतिशत आरक्षित किया गया।

                केंद्र सरकार और राज्यों के अधिकार को संतुलित करने के लिए, संविधान ने विषयों की तीन सूचियाँ बनाईं:

                • संघ सूची (Union List): इसमें कर, रक्षा और विदेशी मामले शामिल हैं; ये केंद्र की एकमात्र जिम्मेदारी हैं।
                • राज्य सूची (State List): इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं; ये मुख्य रूप से राज्यों की जिम्मेदारी हैं।
                • समवर्ती सूची (Concurrent List): इसमें वन और कृषि शामिल हैं; केंद्र और राज्यों दोनों की इन पर संयुक्त जिम्मेदारी है।

                प्रारंभ में, प्रधानमंत्री नेहरू और उप-प्रधानमंत्री वल्लभभाई पटेल भाषाई आधार पर देश को और अधिक विभाजित करने के लिए अनिच्छुक थे, उन्हें डर था कि विभाजन के आघात के बाद इससे और अधिक संघर्ष होगा।

                • राज्य के दर्जे के लिए विरोध: कन्नड़, मलयालम और मराठी भाषियों की ओर से कड़े विरोध प्रदर्शन हुए।
                • आंध्र का मामला: मद्रास प्रेसीडेंसी में तेलुगु भाषियों की ओर से सबसे कड़ा विरोध आया।
                • पोट्टी श्रीरामुलु: उन्होंने तेलुगु भाषियों के लिए एक अलग राज्य की मांग करते हुए भूख हड़ताल की और 58 दिनों के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
                • पहला भाषाई राज्य: उनकी मृत्यु और उसके बाद हुए दंगों के बाद, सरकार को 1 अक्टूबर, 1953 को आंध्र राज्य बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
                • राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission): 1956 में, आयोग ने बंगाली, तमिल, मलयालम और पंजाबी जैसी प्रमुख भाषाओं के आधार पर राज्यों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की सिफारिश की।

                आधुनिक तकनीकी और औद्योगिक विकास के माध्यम से भारत को गरीबी से बाहर निकालना एक प्राथमिक लक्ष्य था।

                • योजना आयोग (The Planning Commission): आर्थिक विकास के लिए नीतियों को तैयार करने और निष्पादित करने के लिए 1950 में स्थापित किया गया।
                • मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल (The Mixed Economy Model): भारत ने एक ऐसा मॉडल अपनाया जहाँ राज्य और निजी क्षेत्र दोनों उत्पादन और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण और पूरक भूमिका निभाएंगे।
                • दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956): इस योजना ने भारी उद्योगों (जैसे इस्पात) के निर्माण और भाखड़ा नांगल जैसे विशाल बांधों के निर्माण पर भारी ध्यान केंद्रित किया।

                15 अगस्त, 2007 को भारत ने स्वतंत्रता के 60 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया।

                • एकता और लोकतंत्र: विदेशी भविष्यवाणियों के विपरीत कि भारत टूट जाएगा या सैन्य शासन के अधीन आ जाएगा, यह एक एकल, संयुक्त और लोकतांत्रिक देश बना रहा।
                • लोकतांत्रिक संस्थाएँ: भारत एक स्वतंत्र प्रेस, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और नियमित चुनावों को बनाए रखता है।
                • सामाजिक असमानता: गहरा विभाजन अभी भी बना हुआ है, और दलितों (पूर्व में अछूत) को अभी भी देश के कई हिस्सों में हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
                • अमीर-गरीब की खाई: अमीर और गरीब के बीच की खाई चौड़ी हो गई है; जहाँ कुछ लोग विलासिता और महंगे स्कूलों का आनंद लेते हैं, वहीं अन्य लोग बुनियादी सुविधाओं के बिना झुग्गियों या ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी में रहना जारी रखते हैं।
                NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
                अध्याय – 12

                स्वतंत्रता के बाद भारत

                जन्म के समय चुनौतियाँ
                शरणार्थी संकट: पाकिस्तान से 80 लाख लोग घर और काम की तलाश में भारत आए।
                रियासतें: 500 रियासतों के शासकों को सरदार पटेल ने एकीकृत राष्ट्र में शामिल होने के लिए मनाया।
                आर्थिक कमजोरी: 34.5 करोड़ की आबादी गहरे संकट, गरीबी और मानसून पर निर्भर कृषि का सामना कर रही थी।
                संविधान
                सार्वभौमिक मताधिकार: क्रांतिकारी कदम जिसने लिंग या वर्ग की परवाह किए बिना सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार दिया।
                शक्तियों का विभाजन: केंद्र और राज्य के अधिकारों को संतुलित करने के लिए संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ बनाई गईं।
                एक आधुनिक गणराज्य का निर्माण
                सामाजिक न्याय: 1950 के संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया और अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए आरक्षण की शुरुआत की।
                भाषायी राज्य: शुरुआती अनिच्छा के बावजूद, पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु के बाद आंध्र (1953) का गठन हुआ और 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ।
                आर्थिक योजना: योजना आयोग (1950) ने “मिश्रित अर्थव्यवस्था” का मॉडल अपनाया। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956) ने भारी उद्योग और भाखड़ा नांगल जैसे बांधों को प्राथमिकता दी।
                लोकतांत्रिक लचीलापन: साठ से अधिक वर्षों के बाद, भारत ने एक स्वतंत्र न्यायपालिका के साथ एक एकीकृत और लोकतांत्रिक राष्ट्र रहकर आलोचकों को गलत साबित कर दिया।
                निरंतर अंतराल: एकता में सफल होने के बावजूद, गहरी सामाजिक असमानता और शहरी अमीरों व ग्रामीण गरीबों के बीच बढ़ती खाई के रूप में विफलताएं बरकरार हैं।

                समवर्ती सूची

                वन और कृषि जैसे विषय जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी होती है।

                मिश्रित अर्थव्यवस्था

                विकास का वह मॉडल जहाँ राज्य और निजी क्षेत्र दोनों पूरक भूमिकाएँ निभाते हैं।

                हरिजन

                निचली जातियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द, जिनके लिए विधायिकाओं में सीटें आरक्षित की गई थीं।

                साठ वर्षों
                के बाद
                1947 के बाद भारत की यात्रा लोकतांत्रिक दृढ़ता का प्रमाण है। जहाँ राष्ट्र ने अपनी एकता और संस्थागत स्वतंत्रता को सफलतापूर्वक बनाए रखा है, वहीं सामाजिक और आर्थिक विभाजन को पाटना अभी भी इसकी सबसे बड़ी अधूरी चुनौती है।

                भारत में न्यायपालिका एक एकल और एकीकृत (Integrated) प्रणाली है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) स्थित है। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की संघीय प्रणाली के विपरीत, जहाँ संघ और राज्यों के लिए कानूनों के अलग-अलग सेट होते हैं, भारतीय उच्चतम न्यायालय केंद्रीय और राज्य दोनों कानूनों को लागू करता है।

                उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी, 1950 को हुआ था। इसने ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935’ के तहत स्थापित ‘भारत के संघीय न्यायालय’ (Federal Court of India) का स्थान लिया।

                • सदस्य संख्या: वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में कुल 34 न्यायाधीश (1 मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य न्यायाधीश) होते हैं। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति संसद के पास होती है।
                • नियुक्ति: उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
                • कोलेजियम प्रणाली (The Collegium System): न्यायाधीशों की नियुक्ति एक ‘कोलेजियम’ के परामर्श के बाद की जाती है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
                • न्यायाधीश के लिए योग्यताएं:
                  1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
                  2. वह कम से कम 5 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो।
                  3. अथवा उसने कम से कम 10 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय में वकालत की हो।
                  4. अथवा राष्ट्रपति के मत में वह एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ (Distinguished Jurist) हो।
                • कार्यकाल: उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर बना रहता है। वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
                • निष्कासन (महाभियोग): एक न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही पद से हटाया जा सकता है। ऐसा आदेश तभी जारी किया जा सकता है जब संसद के दोनों सदनों द्वारा उसी सत्र में ‘विशेष बहुमत’ से प्रस्ताव पारित किया गया हो।
                • आधार: सिद्ध कदाचार (Proved misbehavior) या अक्षमता (Incapacity)।
                • आवश्यक बहुमत: विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 हिस्सा)।

                भारतीय उच्चतम न्यायालय के पास दुनिया के किसी भी अन्य न्यायालय की तुलना में सबसे व्यापक क्षेत्राधिकार हैं।

                उच्चतम न्यायालय निम्नलिखित विवादों में एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है:

                • केंद्र और एक या एक से अधिक राज्यों के बीच विवाद।
                • एक ओर केंद्र और कोई राज्य (या राज्य) और दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों के बीच विवाद।
                • दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद।

                उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों का ‘गारंटीकर्ता और रक्षक’ है। यह मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), उत्प्रेषण (Certiorari), और अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) जैसी रिट जारी कर सकता है।

                उच्चतम न्यायालय अपील का सर्वोच्च न्यायालय है। यह उच्च न्यायालय के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनता है:

                • संवैधानिक मामलों में।
                • दीवानी (Civil) मामलों में।
                • आपराधिक (Criminal) मामलों में।

                राष्ट्रपति निम्नलिखित विषयों पर उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है:

                • सार्वजनिक महत्व के कानून या तथ्य का कोई प्रश्न।
                • संविधान पूर्व संधियों से उत्पन्न विवाद।
                • नोट: उच्चतम न्यायालय की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं होती है।
                • अभिलेख न्यायालय (Court of Record – अनुच्छेद 129): उच्चतम न्यायालय के निर्णय शाश्वत स्मृति और साक्ष्य के रूप में दर्ज किए जाते हैं। इसके पास ‘न्यायालय की अवमानना’ (Contempt of Court) के लिए दंड देने की शक्ति भी होती है।
                • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): विधायी अधिनियमों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करने की शक्ति।
                • उपचारात्मक याचिका (Curative Petition): पुनर्विचार याचिका (Review Petition) खारिज होने के बाद किसी निर्णय पर पुनर्विचार करने का अंतिम कानूनी सहारा (यह ‘रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा’ मामले में विकसित हुआ)।
                अनुच्छेदमुख्य शक्ति / प्रावधानमुख्य विवरण
                124स्थापना एवं गठनन्यायाधीशों की नियुक्ति और योग्यताएं।
                129अभिलेख न्यायालयअवमानना के लिए दंड देने की शक्ति।
                131मूल क्षेत्राधिकारसंघीय विवाद (केंद्र बनाम राज्य)।
                136विशेष अनुमति याचिका (SLP)किसी भी अपील को सुनने की विवेकाधीन शक्ति।
                141देश का कानूनउच्चतम न्यायालय के निर्णय सभी अदालतों पर बाध्यकारी हैं।
                143परामर्शदात्री शक्तिराष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से राय मांगना।

                उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को पद की शपथ राष्ट्रपति दिलाते हैं। इसके अलावा, भारत में अब तक किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा हटाया नहीं गया है, हालांकि कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई थी।

                संवैधानिक शीर्ष • अनु. 124-147
                भारत का उच्चतम न्यायालय

                नियुक्ति और क्षेत्राधिकार

                योग्यता
                भारत का नागरिक होना चाहिए और 5 वर्ष तक HC न्यायाधीश या 10 वर्ष तक HC अधिवक्ता या राष्ट्रपति की दृष्टि में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होना चाहिए।
                कार्यकाल एवं पदच्युति
                65 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं। संसद में विशेष बहुमत प्रस्ताव के बाद केवल राष्ट्रपति द्वारा हटाए जा सकते हैं।
                संरचना एवं नियुक्ति
                संख्या: 34 न्यायाधीश (1 मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य)। नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली (CJI + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश) का पालन करती है।
                मूल क्षेत्राधिकार (अनु. 131)
                केंद्र और राज्यों के बीच या दो या अधिक राज्यों के बीच संघीय विवादों में मध्यस्थ।
                सलाहकारी शक्ति (अनु. 143)
                राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों या संविधान-पूर्व संधियों पर SC की राय मांग सकते हैं। राय बाध्यकारी नहीं है।

                रिट (Writ) शक्ति

                अनु. 32 के तहत, SC मौलिक अधिकारों का संरक्षक है (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, आदि)।

                अभिलेख न्यायालय

                अनु. 129 के तहत, निर्णयों को साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड किया जाता है; इसमें अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति शामिल है।

                SLP (अनु. 136)

                भारत में किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के किसी भी निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने की विवेकाधीन शक्ति

                देश का
                कानून
                अनुच्छेद 141 के तहत, उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। यह एक एकीकृत न्यायिक प्रणाली सुनिश्चित करता है जहाँ SC के पास सभी विधायी और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की जांच करने के लिए न्यायिक समीक्षा की शक्ति है।

                यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (9 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

                पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले मुद्दे)।

                • संदर्भ: लोकसभा ने हाल ही में प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ (Motion of Thanks) को अपनाकर संसदीय परंपरा का उल्लंघन किया है।
                • मुख्य बिंदु:
                  • असामान्य विचलन: लोकसभा ने 5 फरवरी को पारंपरिक रूप से प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही प्रस्ताव को पारित कर दिया।
                  • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से सदन में उपस्थित न होने का अनुरोध किया था क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री की सीट के पास संभावित व्यवधान या नुकसान के बारे में “विश्वसनीय इनपुट” मिले थे।
                  • प्रक्रियात्मक उल्लंघन: संसदीय नियम यह अनिवार्य करते हैं कि धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस प्रधानमंत्री के उत्तर के साथ समाप्त होनी चाहिए; इसके बिना बहस को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट प्रस्ताव की आवश्यकता होती है।
                  • भाषण पर रोक: विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक के अंशों को उद्धृत करने से रोक दिया गया।
                • UPSC प्रासंगिकता: “संसदीय प्रक्रिया”, “कार्यपालिका की जवाबदेही” और “अध्यक्ष की भूमिका” से संबंधित प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • जवाबदेही का क्षरण: बहस और उत्तर की प्रक्रिया कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने का एक मुख्य तंत्र है; इसे छोड़ना इस लोकतांत्रिक मानदंड के चिंताजनक क्षरण के रूप में देखा जा रहा है।
                  • महत्वपूर्ण मुद्दों से बचना: संबंधित पुस्तक राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दे उठाती है; संपादकीय का तर्क है कि निर्वाचित सदस्यों को उन पर चर्चा करने के अवसर से वंचित करना अनुचित है।
                  • जिम्मेदारी से भागना: सदन के बाहर उद्धृत अंशों से पता चलता है कि राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा निर्णय लेने से बचने और दूसरों पर जिम्मेदारी डालने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

                पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप; उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

                • संदर्भ: गाजियाबाद में एक दुखद घटना के बाद, जहाँ तीन बहनों ने कथित तौर पर स्क्रीन की लत के कारण अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की मांग बढ़ रही है।
                • मुख्य बिंदु:
                  • वैश्विक उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया (दिसंबर 2025) और स्पेन (फरवरी 2026) ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के कदम उठाए हैं।
                  • तकनीकी खामियाँ: इस तरह के प्रतिबंधों को वीपीएन (VPN) के माध्यम से आसानी से दरकिनार किया जा सकता है या यह उपयोगकर्ताओं को “डार्क वेब” की ओर धकेल सकता है जहाँ शोषण और कट्टरपंथ पनपता है।
                  • लैंगिक असमानता: प्रतिबंध से असमानताएं और गहरी हो सकती हैं; डेटा से पता चलता है कि केवल 33.3% भारतीय महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं, जबकि पुरुषों का यह आंकड़ा 57.1% है।
                  • डिजिटल जीवन रेखा: अलग-थलग या ग्रामीण युवाओं के लिए ये प्लेटफॉर्म अक्सर सहायक समुदायों तक पहुँचने का एकमात्र जरिया होते हैं।
                • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल अधिकार”, “मानसिक स्वास्थ्य नीति” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • नैतिक भय (Moral Panic): समाज अक्सर जटिल समस्याओं को “लोक शैतान” (Folk Devils) के रूप में लेबल करता है, जिससे वास्तविक समाधान के बजाय प्रतीकात्मक और असंगत दमनकारी कार्रवाई होती है।
                  • “देखभाल के कर्तव्य” (Duty of Care) की आवश्यकता: प्रतिबंधों के बजाय, संपादकीय एक मजबूत डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून और प्लेटफार्मों के लिए कानूनी रूप से लागू करने योग्य “देखभाल के कर्तव्य” की वकालत करता है।
                  • अनुसंधान का अभाव: भारत में इस बात पर दीर्घकालिक शोध की कमी है कि सोशल मीडिया वर्ग, जाति और क्षेत्र के आधार पर स्थानीय बच्चों के कल्याण को कैसे प्रभावित करता है।

                पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू, पारदर्शिता और जवाबदेही) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा; संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौतियां)।

                • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय इंस्टाग्राम और फेसबुक के साथ उपयोगकर्ता डेटा साझा करने के संबंध में व्हाट्सएप के 2021 के अपडेट पर मेटा/व्हाट्सएप से सवाल कर रहा है।
                • मुख्य बिंदु:
                  • नेटवर्क प्रभाव: व्हाट्सएप का प्रभुत्व इसे इतना अनिवार्य बनाता है कि व्यक्तियों या व्यवसायों के लिए इस प्लेटफॉर्म पर रहे बिना कार्य करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
                  • CCI का जुर्माना: भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने गोपनीयता परिवर्तनों के संबंध में “स्वीकार करें या छोड़ दें” के अल्टीमेटम के लिए ₹213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया था।
                  • अपर्याप्त उपचार: उपयोगकर्ताओं को “ऑप्ट-आउट” (बाहर निकलने) की अनुमति देना इतने बड़े पैमाने पर अप्रभावी माना जाता है जहाँ “डिफ़ॉल्ट शक्ति” के सामने बहुत कम विकल्प बचते हैं।
                  • एन्क्रिप्शन मानक: ऐप द्वारा एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को अपनाने ने भारत में सुरक्षित संचार को एक सामाजिक मानदंड के रूप में स्थापित किया है।
                • UPSC प्रासंगिकता: “डेटा गोपनीयता”, “डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून” और “बिग टेक विनियमन” के लिए अनिवार्य।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • संचार का रूपांतरण: व्हाट्सएप ने मुफ्त टेलीफोनी और संदेश सेवाएं प्रदान की हैं जो 2016 से पहले अत्यधिक महंगी थीं।
                  • विधायी विलंब: हालांकि उच्चतम न्यायालय के विचार सही हैं, लेकिन उन्हें एक डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून के समर्थन की आवश्यकता है, जो इसके 2024 के मसौदे के बाद से अटका हुआ है।
                  • विज्ञापन मॉडल की ओर झुकाव: जैसे-जैसे प्लेटफॉर्म विज्ञापन मॉडल की ओर बढ़ रहा है, इसकी सर्वव्यापी उपयोगिता को देखते हुए उच्चतम स्तर की नियामक निगरानी की आवश्यकता है।

                पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत और उसके पड़ोसी देश—संबंध; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

                • संदर्भ: 2021 के तख्तापलट के पांच साल बाद, म्यांमार की सेना ने 2025 के अंत और जनवरी 2026 के बीच “चुनाव” आयोजित किए, जिन्हें सेना समर्थित दल USDP ने जीता।
                • मुख्य बिंदु:
                  • नियंत्रित भागीदारी: 330 टाउनशिप में से केवल 265 में मतदान की अनुमति दी गई थी; प्रतिरोध के प्रभाव वाले ग्रामीण क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर बाहर रखा गया था।
                  • मतदान में गिरावट: मतदान प्रतिशत गिरकर लगभग 55% रह गया (2015/2020 में 70% था), जो इस पूर्व-निर्धारित प्रक्रिया के प्रति व्यापक जन-अस्वीकृति को दर्शाता है।
                  • विश्वसनीयता की कमी: सैन्य जुंटा ने NLD जैसे प्रमुख विपक्षी दलों को भंग कर दिया और वरिष्ठ नेताओं को जेल में डाल दिया।
                  • शरणार्थी संकट: भारत वर्तमान में मिजोरम और मणिपुर में म्यांमार के 90,100 विस्थापित नागरिकों की मेजबानी कर रहा है।
                • UPSC प्रासंगिकता: “एक्ट ईस्ट पॉलिसी”, “क्षेत्रीय स्थिरता” और “गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरे” के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • रणनीतिक दुविधा: भारत को सुरक्षा और कनेक्टिविटी के लिए शासन के साथ संबंध बनाए रखने होंगे, साथ ही जुंटा को वैध ठहराए बिना लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थन करना होगा।
                  • परियोजनाओं में देरी: ‘कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट’ और ‘त्रिपक्षीय राजमार्ग’ जैसी प्रमुख पहलें सीमा पर असुरक्षा के कारण बार-बार देरी का सामना कर रही हैं।
                  • साइबर गुलामी: सीमावर्ती संघर्ष क्षेत्रों में साइबर घोटाले (Cyber Scam) केंद्र एक उभरते खतरे के रूप में सामने आए हैं; 2022 से अब तक इन नेटवर्कों से 2,165 भारतीयों को बचाया गया है।

                पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक सशक्तिकरण)।

                • संदर्भ: विद्वान जी.एन. देवी का सुझाव है कि मातृभाषाएं और सांस्कृतिक संकेतक आगामी 2027 की जाति जनगणना की तकनीकी चुनौतियों को हल कर सकते हैं।
                • मुख्य बिंदु:
                  • प्रणाली पर बहस: कुछ लोग “खुले क्षेत्र” (Open Field – जो 2011 SECC में उपयोग हुआ) की वकालत करते हैं, जबकि अन्य “पूर्व-संकलित सूची” (Pre-compiled List – जो बिहार के सर्वेक्षण में उपयोग हुई) को बेहतर मानते हैं।
                  • डेटा का सरलीकरण: 2011 के SECC में 46 लाख जातियों के नाम सामने आए थे; भाषाई मॉडलिंग के माध्यम से इन्हें एक व्यापक और प्रबंधनीय सूची में बदला जा सकता है।
                  • DNT का अलगाव: विमुक्त जनजातियों (Denotified Tribes – DNTs) की अलग से गणना न करना 10 करोड़ से अधिक लोगों को हाशिए पर धकेल सकता है।
                  • संदर्भ बिंदु: भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की “पीपल ऑफ इंडिया” जैसी परियोजनाएं सत्यापन के लिए महत्वपूर्ण आधार हो सकती हैं।
                • UPSC प्रासंगिकता: “जाति जनगणना”, “जनजातीय अधिकार” और “योजना निर्माण में सामाजिक सांख्यिकी” के लिए महत्वपूर्ण।
                • विस्तृत विश्लेषण:
                  • मातृभाषा का नेतृत्व: यह प्रक्रिया 2011 की भाषाई जनगणना के समान हो सकती है, जिसने 19,000 मातृभाषाओं को 1,369 सत्यापित भाषाओं में संक्षिप्त किया था।
                  • साझा पहचान: सांसी/कंजर समुदाय के उदाहरण का उपयोग करते हुए, देवी बताते हैं कि कैसे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों को एक साझा भाषा (भक्तु) और पूर्वजों के माध्यम से जोड़ा जा सकता है।
                  • स्वतंत्र जांच: इस वैज्ञानिक मॉडल के लिए आवश्यक है कि सरकार स्वतंत्र विद्वानों द्वारा जांच के लिए डेटा को खुला रखे।

                संपादकीय विश्लेषण

                09 फरवरी, 2026
                GS-2 राजव्यवस्था संसदीय जवाबदेही

                ‘सुरक्षा आधार’ पर प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव अपनाया गया। पारंपरिक उत्तर को छोड़ना कार्यकारी जवाबदेही के मूल क्षरण के रूप में देखा जाता है।

                GS-2 शासन / GS-1 समाज सोशल मीडिया प्रतिबंध पर बहस

                गाजियाबाद त्रासदी के बाद नाबालिगों के लिए प्रतिबंध की मांग बढ़ी है। तकनीकी खामियां और लैंगिक असमानता (केवल 33% महिला इंटरनेट उपयोगकर्ता) दर्शाती है कि प्रतिबंध उल्टा असर कर सकते हैं।

                GS-2/1 सामाजिक जाति गणना के संकेतक

                46 लाख जाति नामों को छांटने के लिए मातृभाषा का उपयोग। भाषाई मॉडलिंग आगामी 2027 की जनगणना की तकनीकी चुनौतियों का समाधान कर सकती है।

                संसद: प्रधानमंत्री के जवाब को छोड़ना महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा बहसों से बचने के लिए एक परेशान करने वाली मिसाल के रूप में कार्य करता है।
                तकनीक: सांकेतिक सोशल मीडिया प्रतिबंधों के बजाय कानूनी रूप से लागू होने योग्य “देखभाल के कर्तव्य” दायित्वों की आवश्यकता है।
                पड़ोस: सीमावर्ती असुरक्षा कालादान मल्टी-मॉडल प्रोजेक्ट और त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी प्रमुख परियोजनाओं के लिए खतरा है।
                समाज: भाषाई जनगणना पद्धति 19,000 मातृभाषाओं को प्रबंधनीय सत्यापित पहचान संकेतकों में बदल सकती है।
                GS-4
                जवाबदेही
                पारदर्शिता बनाम सुविधा: संसदीय उत्तर तंत्र केवल समारोह नहीं हैं; वे लोकतांत्रिक जवाबदेही की आधारशिला हैं। सच्ची संस्थागत शक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को खुले तौर पर संबोधित करने में निहित है, न कि अनिवार्य कार्यकारी जांच से बचने के लिए “विश्वसनीय इनपुट” का हवाला देने में।

                यहाँ अविभाजित सीमाओंरामसर स्थल संरक्षण के मील के पत्थर, और रणनीतिक विज्ञान बुनियादी ढांचे पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

                इस सप्ताह का एक प्रमुख आकर्षण भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में निहित “मानचित्र संदेश” है।

                • रणनीतिक बदलाव: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) द्वारा जारी आधिकारिक मानचित्र में संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को—जिसमें ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ (PoK) और ‘अक्साई चिन’ भी शामिल हैं—भारत के हिस्से के रूप में दर्शाया गया है।
                • महत्व: यह विशिष्ट अमेरिकी सरकारी मानचित्रों की उस पुरानी पद्धति से एक बड़ा विचलन है जो इन क्षेत्रों को विवादित के रूप में दर्शाते थे। आपकी तैयारी के लिए, मानचित्र पर अक्साई चिन (जिस पर चीन का दावा है) और PoK की स्थिति को पहचानें, जो इस “प्रतीकात्मक राजनयिक मान्यता” को प्रदर्शित करता है।

                फरवरी 2026 की शुरुआत तक, भारत ने 98 रामसर स्थलों का ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल कर लिया है, जो एशिया में इसकी अग्रणी स्थिति को बनाए रखता है।

                नया रामसर स्थलजिला / राज्यमुख्य जैव विविधता
                पटना पक्षी अभयारण्यएटा, उत्तर प्रदेश178 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण विश्राम स्थल; यह विशेष रूप से सारस क्रेन के लिए जाना जाता है।
                छारी-ढंढ (Chhari-Dhand) आर्द्रभूमिकच्छ, गुजरातबन्नी घास के मैदानों में स्थित एक मौसमी मरुस्थलीय आर्द्रभूमि; यह ‘कैराकल’ (Caracal), मरुस्थलीय लोमड़ी और धूसर भेड़िये (Grey Wolf) का घर है।

                राज्यों की रैंकिंग: तमिलनाडु 20 स्थलों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष पर बना हुआ है, उसके बाद उत्तर प्रदेश 11 स्थलों के साथ दूसरे स्थान पर है।

                लद्दाख का उच्च-ऊंचाई वाला पठार अंतरिक्ष और सौर अनुसंधान के लिए एक वैश्विक केंद्र (Hub) बन रहा है।

                • राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (NLST): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास मानचित्रित किया गया है। कम वायुमंडलीय हस्तक्षेप और उच्च-ऊंचाई वाली स्पष्टता के कारण यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
                • आदित्य-L1 अवलोकन: फरवरी 2026 की शुरुआत में वैज्ञानिकों के लिए भारत के सौर मिशन के डेटा का उपयोग करने हेतु “अवसर की घोषणा” (Announcement of Opportunity) का पहला चक्र शुरू हो गया है।

                16वें वित्त आयोग (2026–31) ने आधिकारिक तौर पर दो नई आपदा श्रेणियों के मानचित्रण और वित्तपोषण की सिफारिश की है।

                • लू (Heatwaves) और बिजली गिरना (Lightning): इन्हें अब राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित आपदाओं के रूप में शामिल किया गया है।
                • मानचित्रण की आवश्यकता: अपने भूगोल के नोट्स के लिए, पूर्वी और मध्य भारत में “बिजली गलियारे” (Lightning Corridor) और उत्तर-पश्चिमी व मध्य भारत में “लू पट्टी” (Heatwave Belt) को राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के वित्तपोषण के लिए उच्च-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में चिह्नित करें।
                श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
                क्षेत्रीय मानचित्रअविभाजित J&K और लद्दाखUSTR अंतरिम व्यापार मानचित्र
                रामसर स्थल अग्रणीतमिलनाडु (20 स्थल)दक्षिण भारत
                अंतरिक्ष केंद्रपैंगोंग झीललद्दाख (NLST साइट)
                नया आपदा मानचित्रबिजली और लूमध्य और उत्तर-पश्चिमी भारत

                मानचित्र पर “बिजली गलियारे” को चिह्नित करते समय ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि यहाँ बिजली गिरने की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं। इसी प्रकार, लू के लिए राजस्थान और हरियाणा के साथ-साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के आंतरिक हिस्सों को भी देखें।

                मानचित्रण विवरण

                अविभाजित सीमाएं एवं रणनीतिक ग्रिड
                मानचित्रण कूटनीति अविभाजित जम्मू-कश्मीर व्यापार मानचित्र

                आधिकारिक USTR मानचित्र जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाता है—यह एक प्रमुख कूटनीतिक बदलाव है।

                आपदा मानचित्रण अधिसूचित सुभेद्यता

                लू (हीटवेव) और बिजली गिरना अब अधिसूचित आपदाएं हैं। प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में हीटवेव बेल्ट (उत्तर-पश्चिम भारत) और बिजली कॉरिडोर (मध्य भारत) शामिल हैं।

                आर्द्रभूमि मील के पत्थर (रामसर)
                98 स्थलों का मील का पत्थर

                98 स्थलों के साथ भारत एशिया में अग्रणी है। प्रमुख अपडेट में पटना पक्षी अभयारण्य (UP) और बन्नी घास के मैदानों में स्थित मरुस्थलीय आर्द्रभूमि छारी-ढांढ (GJ) शामिल हैं।

                अंतरिक्ष एवं सौर विज्ञान
                लद्दाख अनुसंधान बुनियादी ढांचा

                नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (NLST) को पेंगोंग झील, लद्दाख में स्थापित किया गया है, जिसे इसके अत्यंत स्वच्छ उच्च-ऊंचाई वाले वातावरण के लिए चुना गया है।

                आदित्य-L1 डेटा एकीकरण

                फरवरी 2026 की शुरुआत सौर डेटा विश्लेषण के पहले वैज्ञानिक चक्र को चिह्नित करती है, जो लद्दाख को भारत के प्राथमिक उच्च-ऊंचाई वाले अंतरिक्ष हब के रूप में मजबूत करती है।

                क्षेत्रीय अविभाजित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।
                आर्द्रभूमि अग्रणी तमिलनाडु (20 रामसर स्थल)।
                अंतरिक्ष हब पेंगोंग झील (NLST स्थल)।
                एटलस रणनीति
                स्थानिक आधार: 16वें वित्त आयोग द्वारा **हीटवेव और बिजली गिरने** को शामिल करने के लिए मानक भौतिक मानचित्र पर शहरी हीट-आइलैंड और मध्य-भारतीय वायुमंडलीय गलियारों के एक नए विषयगत ओवरले की आवश्यकता है।

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