IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 24 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 7 Chapter-9 (जनजातियाँ, खानाबदोश और एक जगह बसे हुए समुदाय)
यह अध्याय “क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण“बताता है कि कैसे स्थानीय परंपराओं और उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों के विचारों के मेल-जोल से क्षेत्रीय पहचान विकसित हुई, जिसने अनूठी भाषाओं, कला रूपों और धार्मिक पद्धतियों को जन्म दिया।
1. भाषा और क्षेत्र: मलयालम
भाषा और क्षेत्र के बीच का संबंध लोगों का वर्णन करने का एक प्राथमिक तरीका है।
- चेर शासक: नौवीं शताब्दी में वर्तमान केरल में स्थापित ‘महोदयपुरम्’ के चेर राज्य ने अपने अभिलेखों में मलयालम भाषा और लिपि का प्रयोग किया।
- संस्कृत का प्रभाव: क्षेत्रीय भाषा का उपयोग करने के बावजूद, चेर शासकों ने संस्कृत परंपराओं से भी बहुत कुछ लिया। मलयालम के शुरुआती साहित्यिक कार्य (12वीं शताब्दी) संस्कृत के ऋणी थे।
- मणिप्रवालम्: 14वीं शताब्दी का एक ग्रंथ, ‘लीलातिलकम’, ‘मणिप्रवालम्’ शैली में लिखा गया था। इसका शाब्दिक अर्थ है “हीरा और मूंगा”, जो दो भाषाओं—संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ प्रयोग को दर्शाता है।
2. शासक और धार्मिक परंपराएँ: जगन्नाथ संप्रदाय
अन्य क्षेत्रों में, क्षेत्रीय संस्कृतियाँ धार्मिक परंपराओं के इर्द-गिर्द विकसित हुईं।
- जगन्नाथ संप्रदाय: उड़ीसा के पुरी में, स्थानीय देवता को विष्णु का स्वरूप माना गया। आज भी स्थानीय जनजातीय लोग देवता की लकड़ी की प्रतिमा बनाते हैं।
- राजनीतिक संरक्षण: 12वीं शताब्दी में गंगा वंश के राजा अनंतवर्मन ने जगन्नाथ के लिए एक मंदिर बनवाया। बाद में, राजा अनंगभीम तृतीय ने अपना राज्य देवता को अर्पित कर दिया और खुद को ईश्वर का “प्रतिनिधि” घोषित किया।
- विजय और नियंत्रण: जैसे-जैसे मंदिर तीर्थयात्रा का केंद्र बना, इसका सामाजिक और राजनीतिक महत्व बढ़ गया। मुगलों, मराठों और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस मंदिर पर नियंत्रण करने की कोशिश की ताकि उनका शासन स्थानीय लोगों को स्वीकार्य हो सके।
3. राजपूत और शूरवीरता की परंपरा
19वीं शताब्दी में, अंग्रेजों ने वर्तमान राजस्थान के क्षेत्र को ‘राजपूताना’ कहा।
- शूरवीर आदर्श: ये अक्सर राजपूतों से जुड़े थे, जो हार स्वीकार करने के बजाय युद्ध के मैदान में मृत्यु को चुनना पसंद करते थे।
- चारण-भाट (Minstrels): राजपूत नायकों की कहानियों को कविताओं और गीतों में दर्ज किया गया, जिन्हें चारण-भाटों द्वारा गाया जाता था। इन यादों को इसलिए सुरक्षित रखा गया ताकि दूसरे लोग भी उनके उदाहरण का अनुसरण करने के लिए प्रेरित हों।
- सती प्रथा: महिलाएँ भी इन वीरतापूर्ण कहानियों का हिस्सा थीं। कभी-कभी वे सती प्रथा के माध्यम से अपने मृतक पतियों के साथ चिता पर आत्मदाह कर लेती थीं।
4. क्षेत्रीय सीमाओं से परे: कथक की कहानी
विभिन्न क्षेत्रों में अनूठे नृत्य रूप विकसित हुए जिनकी जड़ें अक्सर धार्मिक थीं।
- उत्पत्ति: कथक की शुरुआत उत्तर भारत के मंदिरों में ‘कथा’ (कहानी) सुनाने वाली एक जाति से हुई, जो इशारों और गानों के साथ प्रदर्शन करते थे।
- विकास: भक्ति आंदोलन के प्रसार के साथ, कथक एक विशिष्ट नृत्य शैली के रूप में विकसित हुआ, जिसमें राधा और कृष्ण की कहानियों (रासलीला) को शामिल किया गया।
- संरक्षण: मुगल सम्राटों के शासन में यह दरबार में प्रदर्शित किया जाने लगा और इसने अपने वर्तमान स्वरूप—तेज पद-संचालन और विस्तृत वेशभूषा—को प्राप्त किया। अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के संरक्षण में यह कला बहुत फली-फूली।
- शास्त्रीय दर्जा: हालांकि ब्रिटिश शासकों ने इसे नापसंद किया, लेकिन यह जीवित रहा और इसे भारत के छह “शास्त्रीय” नृत्यों में से एक के रूप में मान्यता मिली।
5. संरक्षकों के लिए चित्रकला: लघुचित्र (Miniatures)
एक अन्य क्षेत्रीय परंपरा लघुचित्रकला की थी—छोटे आकार के चित्र जो आमतौर पर कपड़े या कागज पर जलरंगों (Watercolors) से बनाए जाते थे।
- मुगल प्रभाव: मुगल सम्राटों ने अत्यधिक कुशल चित्रकारों को संरक्षण दिया जो ऐतिहासिक वृत्तांतों और कविता वाली पांडुलिपियों को चित्रित करते थे।
- क्षेत्रीय शैलियाँ: मुगल साम्राज्य के पतन के साथ, चित्रकार दक्कन और राजस्थान के राजपूत दरबारों जैसे क्षेत्रीय न्यायालयों में चले गए। उन्होंने पौराणिक कथाओं और कविता के विषयों पर आधारित विशिष्ट शैलियाँ विकसित कीं।
- बसोहली और कांगड़ा: हिमालय की तलहटी (हिमाचल प्रदेश) में, ‘बसोहली’ नामक एक साहसी शैली विकसित हुई। बाद में, वैष्णव परंपराओं से प्रेरित ‘कांगड़ा शैली’ उभरी, जिसकी विशेषता कोमल रंग और काव्यात्मक विषय थे।
6. नज़दीक से एक नज़र: बंगाल
बंगाली भाषा का विकास भाषाओं के जटिल मिश्रण को दर्शाता है।
- भाषा: हालाँकि बंगाली संस्कृत से निकली है, लेकिन यह विकास के कई चरणों से गुज़री। फारसी, यूरोपीय और जनजातीय भाषाओं के शब्दों का एक बड़ा हिस्सा आधुनिक बंगाली का हिस्सा बन गया।
- साहित्य: शुरुआती बंगाली साहित्य में संस्कृत महाकाव्यों के अनुवाद और ‘नाथ’ साहित्य (जैसे मयनामती और गोपी चंद्र के गीत) शामिल हैं।
- पीर और मंदिर: 16वीं शताब्दी से लोग दक्षिण-पूर्वी बंगाल में बसने लगे। समुदाय के नेताओं, जिन्हें अक्सर ‘पीर’ (आध्यात्मिक मार्गदर्शक) कहा जाता था, ने स्थिरता प्रदान की। बंगाल में मिट्टी और ईंटों के कई ‘टेराकोटा’ मंदिर बनाए गए।
- भोजन के रूप में मछली: क्षेत्रीय संस्कृतियाँ अक्सर खान-पान की आदतों से प्रभावित होती हैं। चूंकि बंगाल एक नदीय मैदान है, इसलिए मछली और चावल मुख्य आहार बन गए। दिलचस्प बात यह है कि बंगाल में ब्राह्मणों को कुछ किस्मों की मछली खाने की अनुमति थी, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों और मंदिरों की दीवारों पर मिलता है।
💡 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण शब्द:
- मणिप्रवालम्: संस्कृत और क्षेत्रीय भाषा के मेल वाली शैली।
- पीर: फारसी शब्द जिसका अर्थ ‘आध्यात्मिक मार्गदर्शक’ है।
- टेराकोटा: पकी हुई मिट्टी।
- चारण-भाट: वे लोग जो नायकों की प्रशंसा में गीत गाते थे।
🎨 क्षेत्रीय संस्कृतियों का निर्माण
कक्षा-7 इतिहास अध्याय-2 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नये राजा और उनके राज्य
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: भारत का राष्ट्रपति (अनुच्छेद 52–62)
राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का प्रमुख होता है। जहाँ प्रधानमंत्री वास्तविक प्रमुख (De Facto) होता है, वहीं राष्ट्रपति औपचारिक या नाममात्र का प्रमुख (De Jure) होता है।
अनुच्छेद 52: भारत का राष्ट्रपति
यह अनुच्छेद पद की स्थापना करता है। यह स्पष्ट कहता है: “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”
अनुच्छेद 53: संघ की कार्यपालिका शक्ति
- संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति में निहित होंगी।
- वह इन शक्तियों का प्रयोग स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों (मंत्रिपरिषद) के माध्यम से करेगा।
- वह भारत के रक्षा बलों का सर्वोच्च सेनापति (Supreme Commander) होता है।
नोट: राष्ट्रपति नाममात्र का कार्यकारी (कानूनी रूप से प्रमुख) होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी (वास्तविक रूप से प्रमुख) होता है।
अनुच्छेद 54: राष्ट्रपति का निर्वाचन
राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं, बल्कि एक निर्वाचक मंडल (Electoral College) के सदस्यों द्वारा किया जाता है।
निर्वाचक मंडल के सदस्य:
- संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य।
- राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
- केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य (70वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया)।
महत्वपूर्ण नोट: संसद और विधानसभाओं के मनोनीत (Nominated) सदस्य चुनाव में भाग नहीं लेते हैं।
अनुच्छेद 55: निर्वाचन की रीति
चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote – STV) के माध्यम से होता है। मतदान गुप्त मतदान (Secret Ballot) द्वारा किया जाता है।
- एक विधायक (MLA) के मत का मूल्य:
- एक सांसद (MP) के मत का मूल्य:
अनुच्छेद 56: पदावधि (कार्यकाल)
- राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तारीख से 5 वर्ष की अवधि तक पद धारण करता है।
- वह उपराष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र सौंप सकता है।
- संविधान के उल्लंघन के लिए उसे महाभियोग (Impeachment) द्वारा हटाया जा सकता है।
अनुच्छेद 57: पुनर्निर्वाचन के लिए पात्रता
भारत का राष्ट्रपति कितनी भी बार पुनर्निर्वाचित हो सकता है (अमेरिका में अधिकतम दो बार की सीमा है)।
अनुच्छेद 58: निर्वाचन के लिए योग्यताएं
राष्ट्रपति चुने जाने के लिए व्यक्ति को:
- भारत का नागरिक होना चाहिए।
- 35 वर्ष की आयु पूरी कर लेनी चाहिए।
- लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने के लिए योग्य होना चाहिए।
- केंद्र सरकार, राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण के तहत किसी लाभ के पद (Office of Profit) पर नहीं होना चाहिए।
अनुच्छेद 59: राष्ट्रपति के पद के लिए शर्तें
- वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा व्यक्ति निर्वाचित होता है, तो पद ग्रहण की तारीख से उसकी वह सीट रिक्त मानी जाएगी।
- उसके कार्यकाल के दौरान उसकी उपलब्धियों और भत्तों को कम नहीं किया जा सकता।
- वह बिना किराया दिए आधिकारिक निवास (राष्ट्रपति भवन) के उपयोग का हकदार होगा।
अनुच्छेद 60: शपथ या प्रतिज्ञान
- राष्ट्रपति को शपथ भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) दिलाते हैं। उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं।
- राष्ट्रपति “संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण” करने की शपथ लेता है।
अनुच्छेद 61: महाभियोग की प्रक्रिया
यह राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया है।
- आधार: केवल “संविधान का उल्लंघन”।
- प्रक्रिया:
- 14 दिन का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य है।
- आरोप पत्र पर उस सदन के कम से कम 1/4 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
- प्रस्ताव उस सदन की कुल सदस्यता के 2/3 बहुमत से पारित होना चाहिए।
- दूसरा सदन आरोपों की जाँच करता है; यदि वह भी 2/3 बहुमत से प्रस्ताव पारित कर देता है, तो राष्ट्रपति को पद छोड़ना पड़ता है।
अनुच्छेद 62: पद की रिक्ति को भरना
- कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही नए राष्ट्रपति का चुनाव करा लेना चाहिए।
- यदि रिक्ति मृत्यु, त्यागपत्र या हटाए जाने के कारण हुई है, तो चुनाव 6 महीने के भीतर होने चाहिए। इस अंतराल में उपराष्ट्रपति ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के रूप में कार्य करता है।
त्वरित रिवीजन तालिका (Quick Shortcut Table)
| अनुच्छेद | कीवर्ड | याद रखने की ट्रिक |
| 52 | पद | भारत का एक राष्ट्रपति होगा। |
| 54 | निर्वाचन | कौन वोट देगा (निर्वाचक मंडल)। |
| 56 | कार्यकाल | 5 वर्ष की अवधि। |
| 58 | योग्यताएं | 35 वर्ष + लोकसभा की योग्यता। |
| 60 | शपथ | CJI द्वारा दिलाई जाती है। |
| 61 | महाभियोग | हटाने की प्रक्रिया (2/3 बहुमत)। |
| 62 | रिक्ति | 6 महीने के भीतर चुनाव अनिवार्य। |
🏛️ भारत का राष्ट्रपति (अनुच्छेद 52–62)
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (24 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (24 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. 2027 के बाद परिसीमन: भारत में सत्ता का पुनर्गठन
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; संवैधानिक समायोजन; संघवाद; क्षेत्रीय संतुलन)।
- संदर्भ: जनगणना 2027 के बाद होने वाले आगामी परिसीमन (Delimitation) अभ्यास का विश्लेषण, जो स्वतंत्रता के बाद राजनीतिक शक्ति का सबसे महत्वपूर्ण पुनर्गठन होगा।
- मुख्य बिंदु:
- संवैधानिक रोक (Freeze): जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले राज्यों को दंडित होने से बचाने के लिए 1976 से लोकसभा सीटों के वितरण को 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर रोक दिया गया है।
- प्रजनन दर में अंतर: उत्तर भारत के राज्यों (यूपी, बिहार) में जनसंख्या वृद्धि जारी है, जबकि दक्षिण और पश्चिम के राज्यों ने प्रजनन दर में भारी कमी हासिल की है।
- अनुमानित आंकड़े: 888 सदस्यों वाली विस्तारित लोकसभा में, उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 151 और बिहार की 40 से बढ़कर 82 हो सकती हैं, जो सदन की कुल संख्या का 26% से अधिक होगा।
- सापेक्ष प्रभाव में गिरावट: यद्यपि तमिलनाडु (39 से 53) और केरल (20 से 23) जैसे राज्यों की सीटों की संख्या बढ़ेगी, लेकिन कुल सदन में उनकी प्रतिशत हिस्सेदारी काफी कम हो जाएगी।
- UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद की चुनौतियां”, “चुनावी प्रतिनिधित्व” और “शासन पर जनसंख्या नीति के प्रभाव”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- नैतिक विरोधाभास: पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी के अनुसार, सुशासन (जनसंख्या नियंत्रण) के लिए राज्यों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के नुकसान के रूप में सजा क्यों मिलनी चाहिए?
- भारित फॉर्मूला (Weighted Formula): एक प्रस्तावित समाधान ऐसा फॉर्मूला है जिसमें 80% महत्व जनसंख्या को और 20% विकास संकेतकों (साक्षरता, स्वास्थ्य) को दिया जाए।
- राज्यसभा का सुदृढ़ीकरण: संघीय संतुलन बहाल करने के लिए राज्यसभा में अधिवास (Domicile) आवश्यकताओं को फिर से लागू करने और राज्यों के स्तर (बड़े, मध्यम, छोटे) के अनुसार प्रतिनिधित्व देने के सुझाव दिए गए हैं।
2. भारत और यूरोपीय संघ: विभाजित दुनिया में एक रणनीतिक तालमेल
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध; रणनीतिक स्वायत्तता)।
- संदर्भ: गणतंत्र दिवस और 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के लिए नई दिल्ली में यूरोपीय संघ (EU) के नेतृत्व की आगामी यात्रा की तैयारी।
- मुख्य बिंदु:
- भू-राजनीतिक बीमा: 2007 से बातचीत के अधीन मुक्त व्यापार समझौता (FTA) अब वैश्विक अनिश्चितता (अमेरिकी टैरिफ और चीन की आक्रामकता) के खिलाफ एक ‘बीमा पॉलिसी’ के रूप में देखा जा रहा है।
- जलवायु इक्विटी मुद्दे: एक प्रमुख बाधा यूरोपीय संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) है, जिसे भारत एक ‘गैर-टैरिफ बाधा’ मानता है जो निर्यात पर 20%-35% शुल्क लगा सकता है।
- रक्षा साझेदारी: व्यापार के अलावा, एक प्रस्तावित सुरक्षा और रक्षा साझेदारी यूरोपीय संघ को भारत के बाजार तक और भारत को यूरोपीय उच्च तकनीक तक पहुंच प्रदान करेगी।
- रणनीतिक स्वायत्तता: दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हैं कि संप्रभु विकल्प स्वतंत्र रहने चाहिए, जिसमें वाशिंगटन, मास्को या बीजिंग का ‘वीटो’ न हो।
- UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक संबंध”, “जलवायु वित्त/व्यापार नीति” और “वैश्विक बहुपक्षवाद”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- सह-उत्पादन के अवसर: भारत के लिए, यह साझेदारी हिंद महासागर में संयुक्त सैन्य अभ्यास और सह-उत्पादन के अवसर खोलकर ‘मेक इन इंडिया’ को पूरक बनाती है।
- बहुध्रुवीय व्यवस्था: इस गठबंधन का उद्देश्य बहुपक्षवाद का एक नया अध्याय सह-निर्मित करना है जो लचीला और न्यायसंगत हो।
3. गरिमा का अधिकार: आशा (ASHA) कार्यकर्ताओं के लिए समान वेतन
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य का विकास और प्रबंधन; गरीबी और भूख से संबंधित मुद्दे)।
- संदर्भ: पश्चिम बंगाल में आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं द्वारा मासिक वेतन ₹15,000 करने की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन।
- मुख्य बिंदु:
- दर्जे से वंचित: क्रमिक सरकारों ने श्रम कानूनों और स्थायी कर्मचारी लाभों से बचने के लिए इन आवश्यक श्रमिकों को ‘स्वयंसेवक’ (Volunteers) या ‘कार्यकर्ता’ (Activists) के रूप में वर्गीकृत किया है।
- बजटीय कटौती: 2015 में ICDS बजट में कटौती की गई और 2018 में केंद्र ने कार्यकर्ताओं के वेतन में अपने योगदान को स्थिर (Freeze) कर दिया।
- अंतर-राज्यीय असमानता: केंद्र के मानदेय में वृद्धि न होने के कारण, धनी राज्यों ने अपने बजट से अतिरिक्त भुगतान किया, जिससे वेतन में क्षेत्रीय असमानता पैदा हो गई है।
- कानूनी वर्गीकरण: संपादकीय न्यूनतम मजदूरी और पेंशन सुनिश्चित करने के लिए ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ के तहत उन्हें ‘वैधानिक कर्मचारी’ के रूप में पुनर्वर्गीकृत करने की मांग करता है।
- UPSC प्रासंगिकता: “स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के लिए सामाजिक सुरक्षा”, “श्रम कानून सुधार” और “कल्याणकारी शासन”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- सामाजिक अनुबंध का उल्लंघन: राज्य ने अपने सबसे कमजोर श्रमिकों के साथ सामाजिक अनुबंध को तोड़ दिया है।
- शोषणकारी ढांचा: मुख्य कल्याणकारी योजनाओं के लिए इन पर निर्भर रहना और उन्हें उचित हक न देना जानबूझकर किया गया शोषण है।
4. राज्यपाल का बहिर्गमन: संवैधानिक सीमाओं का परीक्षण
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; राज्यपाल की भूमिका; केंद्र-राज्य संबंध)।
- संदर्भ: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल जैसे विपक्षी शासित राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधानसभा से बहिर्गमन (Walkout) और नीतिगत भाषणों के चुनिंदा अंशों को पढ़ना।
- मुख्य बिंदु:
- अनुच्छेद 176 (1) का अधिदेश: संविधान निर्दिष्ट करता है कि राज्यपाल विधानमंडल को संबोधित “करेगा” (Shall); इसे एक कार्यकारी कार्य माना जाता है।
- सीमित विवेकाधिकार: उच्चतम न्यायालय (जैसे नबाम रेबिया मामला) ने माना है कि राज्यपाल के पास पैराग्राफ छोड़ने या सरकारी नीति की आलोचना करने का कोई विवेकाधिकार नहीं है।
- सहायता और सलाह: राज्यपाल का भाषण राज्य मंत्रिमंडल की नीति को दर्शाता है, और राज्यपाल संवैधानिक रूप से उनकी सलाह मानने के लिए बाध्य हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद विवाद”, “संवैधानिक पदाधिकारी” और “केंद्र-राज्य घर्षण”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- लोकतंत्र का प्रतीक: संबोधन जनता की निर्वाचित सरकार के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करता है; इसमें व्यवधान डालना “कर्तव्य से विमुख होना” माना जाता है।
- संस्थागत पुनर्परिभाषा: राज्यपाल के पद की गरिमा को दलीय राजनीति से ऊपर बनाए रखने के लिए इस भूमिका को फिर से परिभाषित करने की मांग बढ़ रही है।
5. सोशल मीडिया ट्रायल: सार्वजनिक अपमान की कीमत
पाठ्यक्रम: GS पेपर 1 (सामाजिक मुद्दे; प्रौद्योगिकी का प्रभाव) और GS पेपर 2 (शासन; नैतिकता)।
- संदर्भ: केरल की एक दुखद घटना जहाँ एक व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर एक वायरल वीडियो में छेड़छाड़ का आरोप लगने के बाद आत्महत्या कर ली।
- मुख्य बिंदु:
- तत्काल न्याय: यह प्रकरण उजागर करता है कि कैसे सोशल मीडिया एक “युद्धक्षेत्र” बन गया है जहाँ जनमत न्यायाधीश और जूरी की भूमिका निभाता है।
- पुलिस जाँच: बाद में सीसीटीवी फुटेज और गवाहों के बयानों की समीक्षा में व्यक्ति के व्यवहार में “कुछ भी असामान्य या आपत्तिजनक नहीं” पाया गया।
- कानूनी ग्रे ज़ोन: साइबर अपराध जांचकर्ताओं का कहना है कि बिना सहमति के सार्वजनिक स्थानों पर वीडियो बनाना और सार्वजनिक अपमान के लिए उनका उपयोग करना व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन है।
- UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल नैतिकता”, “साइबर अपराध और कानून” और “डिजिटल युग में सामाजिक अनुबंध”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- विनाशकारी शक्ति: यह मामला “त्वरित और लापरवाह रील्स” के दौर में जवाबदेही, सहानुभूति और झूठे आरोपों के जोखिम पर असहज सवाल उठाता है।
- सामान्यीकृत आघात: मनोवैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि सार्वजनिक अपमान के कारण मानसिक आघात के जवाब में जीवन समाप्त करना सामान्य होता जा रहा है।
संपादकीय विश्लेषण
24 जनवरी, 2026Mapping:
यहाँ भारत के प्रमुख समुद्री बंदरगाहों और रणनीतिक समुद्री मार्गों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। ये विषय UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये आर्थिक भूगोल को भू-राजनीतिक रणनीति (जैसे SAGAR पहल और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स) के साथ जोड़ते हैं।
1. पश्चिमी तट के प्रमुख बंदरगाह (अरब सागर)
पश्चिमी तट अपनी प्राकृतिक बंदरगाह संरचनाओं के लिए जाना जाता है और यह मध्य पूर्व तथा यूरोप के साथ व्यापार का प्रवेश द्वार है।
- कांडला (दीनदयाल बंदरगाह), गुजरात: यह एक ज्वारीय बंदरगाह (Tidal port) है और पेट्रोलियम व उर्वरक आयात का मुख्य केंद्र है। यह उत्तर-पश्चिमी भारत के औद्योगिक क्षेत्रों की सेवा करता है।
- मुंबई बंदरगाह, महाराष्ट्र: भारत का सबसे बड़ा और सबसे व्यस्त प्राकृतिक बंदरगाह।
- जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह (JNPT), महाराष्ट्र: इसे ‘न्हावा शेवा’ के नाम से भी जाना जाता है; यह भारत का सबसे बड़ा कंटेनर बंदरगाह है, जिसे मुंबई बंदरगाह के दबाव को कम करने के लिए विकसित किया गया था।
- मर्मगाओ, गोवा: भारत का प्रमुख लौह अयस्क निर्यातक बंदरगाह।
- न्यू मंगलुरु, कर्नाटक: कुद्रेमुख की खानों से लौह अयस्क के निर्यात का प्रबंधन करता है।
- कोच्चि, केरल: यह विंलिंगडन द्वीप (Willingdon Island) पर वेम्बनाड झील के मुहाने पर स्थित है।
2. पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाह (बंगाल की खाड़ी)
पूर्वी तट डेल्टा संरचनाओं के लिए जाना जाता है और यह दक्षिण-पूर्व एशिया और सुदूर पूर्व के देशों के साथ व्यापार का प्रवेश द्वार है।
- तूतूकोरिन (V.O. चिदंबरनार), तमिलनाडु: श्रीलंका और मालदीव जैसे पड़ोसी देशों के लिए विभिन्न प्रकार के माल का प्रबंधन करता है।
- चेन्नई, तमिलनाडु: पूर्वी तट के सबसे पुराने कृत्रिम बंदरगाहों में से एक।
- एन्नौर (कामराजार बंदरगाह), तमिलनाडु: भारत का पहला कॉर्पोरेट बंदरगाह, जो चेन्नई के उत्तर में स्थित है।
- विशाखापत्तनम, आंध्र प्रदेश: भारत का सबसे गहरा स्थलसीमा से घिरा (Landlocked) और सुरक्षित बंदरगाह; जापान को लौह अयस्क निर्यात का मुख्य केंद्र।
- पारादीप, ओडिशा: महानदी डेल्टा में स्थित; लौह अयस्क और कोयले के निर्यात में विशेषज्ञता।
- कोलकाता-हल्दिया, पश्चिम बंगाल: यह हुगली नदी पर स्थित एक नदीय बंदरगाह (Riverine port) है। हल्दिया को भारी माल के प्रबंधन के लिए कोलकाता के एक सहायक बंदरगाह के रूप में विकसित किया गया था।
3. रणनीतिक समुद्री चोक पॉइंट्स और मार्ग
इनका मानचित्रण “आंतरिक सुरक्षा” और “अंतर्राष्ट्रीय संबंध” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।
| विशेषता (Feature) | सामरिक महत्व (Strategic Importance) | मानचित्र की स्थिति (Mapping Location) |
| 6 डिग्री चैनल | ग्रेट निकोबार को सुमात्रा (इंडोनेशिया) से अलग करता है। | इंदिरा पॉइंट के दक्षिण में |
| पाक जलडमरूमध्य | बंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी से जोड़ता है। | तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच |
| 10 डिग्री चैनल | अंडमान द्वीप समूह को निकोबार समूह से अलग करता है। | 10° उत्तरी अक्षांश रेखा |
| 9 डिग्री चैनल | मिनिकॉय द्वीप को मुख्य लक्षद्वीप से अलग करता है। | 9° उत्तरी अक्षांश रेखा |
4. प्रमुख राष्ट्रीय जलमार्ग (NW)
- NW-1: गंगा-भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली (प्रयागराज से हल्दिया)।
- NW-2: ब्रह्मपुत्र नदी (सादिया से धुबरी)।
- NW-3: केरल में पश्चिमी तट नहर (कोट्टापुरम से कोल्लम)।
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| श्रेणी | मानचित्रण मुख्य बिंदु | मुख्य स्थान |
| सबसे गहरा बंदरगाह | विशाखापत्तनम | आंध्र प्रदेश |
| पहला कॉर्पोरेट बंदरगाह | एन्नौर | तमिलनाडु |
| सबसे बड़ा कंटेनर पोर्ट | JNPT (न्हावा शेवा) | महाराष्ट्र |
| नदीय बंदरगाह | कोलकाता | पश्चिम बंगाल |
💡 मैपिंग टिप:
पश्चिमी और पूर्वी तट के बंदरगाहों को उनके उत्तर-से-दक्षिण क्रम में याद रखें। उदाहरण के लिए, पश्चिम में: कांडला → मुंबई → मर्मगाओ → मंगलुरु → कोच्चि। परीक्षाओं में अक्सर इनका सही भौगोलिक क्रम पूछा जाता है।
समुद्री प्रवेश द्वार (Maritime Gateways)
| विशेषता | रणनीतिक महत्व | स्थान |
|---|---|---|
| 6° चैनल | निकोबार को सुमात्रा से अलग करता है | इंदिरा पॉइंट के दक्षिण में |
| पाक जलडमरूमध्य | बंगाल की खाड़ी को पाक खाड़ी से जोड़ता है | तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच |
| 10° चैनल | अंडमान को निकोबार से अलग करता है | 10° उत्तरी अक्षांश |
| श्रेणी | मैपिंग हाइलाइट | प्रमुख स्थान |
|---|---|---|
| सबसे गहरा बंदरगाह | विशाखापत्तनम | आंध्र प्रदेश |
| कॉर्पोरेट बंदरगाह | एन्नोर (कामराजर) | तमिलनाडु |
| सबसे बड़ा कंटेनर हब | JNPT (न्हावा शेवा) | महाराष्ट्र |
| नदीय बंदरगाह | कोलकाता बंदरगाह | हुगली नदी, प. बंगाल |