अध्याय 3, “ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना“, में वर्णन किया गया है कि कैसे इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित किया और किसानों पर उसकी राजस्व नीतियों का क्या प्रभाव पड़ा।

12 अगस्त 1765 को मुगल सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल का ‘दीवान’ नियुक्त किया।

  • वित्तीय प्रशासन: दीवान के रूप में, कंपनी अपने नियंत्रण वाले क्षेत्र की मुख्य वित्तीय प्रशासक बन गई।
  • राजस्व की आवश्यकता: कंपनी को राजस्व संसाधनों को इस तरह व्यवस्थित करना था कि उसे अपने बढ़ते सैन्य और प्रशासनिक खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त लाभ मिल सके।
  • व्यापार में बदलाव: 1865 से पहले, कंपनी भारत से सामान खरीदने के लिए ब्रिटेन से सोने और चाँदी का आयात करती थी; लेकिन बंगाल की दीवानी मिलने के बाद, यहाँ से इकट्ठा किए गए राजस्व से ही निर्यात के लिए सामान खरीदा जाने लगा।

बंगाल की अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट का सामना कर रही थी, जिसका परिणाम 1770 के भीषण अकाल के रूप में निकला, जिसमें एक करोड़ (10 मिलियन) लोग मारे गए। राजस्व के निरंतर प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए, कंपनी ने भू-राजस्व की नई प्रणालियाँ शुरू कीं:

  • स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement – 1793): इसे लॉर्ड कॉर्नवालिस ने शुरू किया था। इस व्यवस्था में भू-राजस्व की राशि हमेशा के लिए (स्थायी रूप से) तय कर दी गई थी।
    • राजा और ताल्लुकदार: उन्हें ‘जमींदार’ के रूप में मान्यता दी गई और उन्हें किसानों से लगान वसूलने और कंपनी को राजस्व चुकाने की जिम्मेदारी दी गई।
    • प्रभाव: जमींदार अक्सर उच्च तय राजस्व चुकाने में विफल रहे और उनकी जमीनें छीन ली गईं। किसानों को यह व्यवस्था दमनकारी लगी क्योंकि लगान बहुत अधिक था और जमीन पर उनका कोई अधिकार सुरक्षित नहीं था।
  • महलवारी व्यवस्था (Mahalwari System – 1822): इसे होल्ट मैकेंजी ने बंगाल प्रेसिडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के लिए तैयार किया था।
    • महल: इसमें राजस्व गाँव या गाँवों के एक समूह से इकट्ठा किया जाता था, जिसे ‘महल’ कहा जाता था।
    • गाँव का मुखिया: जमींदार के बजाय, गाँव के मुखिया को राजस्व इकट्ठा करने और कंपनी को देने की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसमें राजस्व को समय-समय पर संशोधित किया जाना था।
  • रैयतवारी व्यवस्था (Ryotwari System): इसे दक्षिण भारत में कैप्टन अलेक्जेंडर रीड और थॉमस मुनरो द्वारा विकसित किया गया था।
    • सीधा समझौता: इस व्यवस्था में राजस्व का समझौता सीधे उन किसानों (रैयतों) के साथ किया गया जो पीढ़ियों से जमीन जोतते आ रहे थे।
विशेषतास्थायी बंदोबस्तमहलवारी व्यवस्थारैयतवारी (मुनरो) व्यवस्था
शुरुआत (वर्ष)लॉर्ड कॉर्नवालिस (1793)होल्ट मैकेंजी (1822)थॉमस मुनरो और अलेक्जेंडर रीड
मुख्य क्षेत्रबंगाल, बिहार और उड़ीसाबंगाल प्रेसिडेंसी के उत्तर-पश्चिमी प्रांतदक्षिण भारत (मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसी)
आकलन की इकाईव्यक्तिगत जमींदारमहल (गाँव या गाँवों का समूह)रैयत (व्यक्तिगत किसान)
राजस्व भुगतानकर्ताजमींदार (राजा और ताल्लुकदार)गाँव का मुखियाव्यक्तिगत किसान (रैयत)
राजस्व की प्रकृतिस्थायी रूप से तय; भविष्य में कभी नहीं बढ़ाया जाना थासमय-समय पर संशोधित; स्थायी रूप से तय नहींखेतों के सर्वेक्षण के बाद समय-समय पर संशोधित
स्वामित्व अधिकारजमींदारों को जमीन का मालिक माना गयास्वामित्व अक्सर गाँव समुदाय के पास रहारैयतों को जमीन का पैतृक मालिक/जोतने वाला माना गया
बिचौलियों की भूमिकाअत्यधिक; जमींदार राज्य और किसान के बीच कड़ी थेमध्यम; गाँव के मुखिया ने राजस्व एकत्र कियान्यूनतम; राज्य और किसान के बीच सीधा समझौता

अंग्रेजों ने महसूस किया कि ग्रामीण क्षेत्र न केवल राजस्व दे सकते हैं, बल्कि वहां वे फसलें भी उगाई जा सकती हैं जिनकी यूरोप में ज़रूरत थी, जैसे अफीम और नील

  • नील (Indigo) की मांग: भारतीय नील की यूरोप में इसके गहरे नीले रंग के कारण बहुत अधिक कीमत थी। 18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन में औद्योगीकरण के कारण कपड़े के उत्पादन में वृद्धि हुई, जिससे नील की मांग और बढ़ गई।
  • नील उत्पादन की विधियाँ: खेती की दो मुख्य प्रणालियाँ थीं:
    1. निज खेती: बागान मालिक सीधे अपनी नियंत्रित भूमि पर नील का उत्पादन करता था।
    2. रैयती खेती: बागान मालिक रैयतों (किसानों) को एक अनुबंध (सट्टा) पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करते थे और उन्हें अपनी कम से कम 25% जमीन पर नील उगाने के लिए कम ब्याज पर अग्रिम धन (कर्ज) देते थे।

नील की खेती की दमनकारी प्रकृति के कारण मार्च 1859 में बंगाल में एक विशाल जन-विद्रोह हुआ।

  • प्रतिरोध: रैयतों ने नील उगाने और लगान देने से मना कर दिया और नील की फैक्ट्रियों पर हमला किया। उन्हें स्थानीय जमींदारों और गाँव के मुखियाओं का भी समर्थन मिला, जो बागान मालिकों की बढ़ती शक्ति से नाखुश थे।
  • परिणाम: सरकार ने नील आयोग का गठन किया। आयोग ने बागान मालिकों को दोषी पाया और घोषणा की कि रैयत मौजूदा अनुबंधों को पूरा करने के बाद भविष्य में नील की खेती से इनकार कर सकते हैं।
  • बिहार की ओर स्थानांतरण: बंगाल में नील का उत्पादन धराशायी हो गया और बागान मालिक बिहार चले गए। यहाँ भी उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 1917 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चंपारण आंदोलन हुआ।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 3

ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

दीवानी अधिकार
1765: मुगल सम्राट ने कंपनी को बंगाल का दीवान नियुक्त किया, जिससे वे बंगाल के मुख्य वित्तीय प्रशासक बन गए।
आर्थिक बदलाव: अब बंगाल के राजस्व से कंपनी के व्यापार का वित्तपोषण होने लगा, जिससे ब्रिटेन से सोना/चांदी आयात करने की आवश्यकता समाप्त हो गई।
ग्रामीण संकट
1770 का अकाल: बंगाल में एक करोड़ लोग मारे गए; इस संकट ने कंपनी को राजस्व सुरक्षित करने के लिए खेती में सुधार करने पर मजबूर किया।
प्रमुख भू-राजस्व व्यवस्थाएँ
स्थायी बंदोबस्त (1793): लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा शुरू किया गया। राजस्व स्थायी रूप से तय किया गया था। ज़मींदार बिचौलियों के रूप में कार्य करते थे लेकिन उच्च माँग के कारण अक्सर अपनी ज़मीन खो देते थे।
महलवारी व्यवस्था (1822): होल्ट मैकेंज़ी द्वारा तैयार की गई। राजस्व ‘महल’ (गाँव) से ग्राम प्रधान के माध्यम से एकत्र किया जाता था और समय-समय पर संशोधित किया जाता था।
रैयतवारी व्यवस्था: थॉमस मुनरो द्वारा विकसित। दक्षिण भारत में बिचौलियों को हटाकर सीधे काश्तकारों (रैयतों) के साथ बंदोबस्त किया गया।
नील का संघर्ष: भारतीय नील की ब्रिटिश माँग के कारण दमनकारी रैयती व्यवस्था (अनुबंध/सट्टा) शुरू हुई और अंततः 1859 में नील विद्रोह हुआ।

नील आयोग

1859 के विद्रोह के बाद स्थापित; इसने घोषणा की कि नील का उत्पादन रैयतों के लिए लाभदायक नहीं था।

निज खेती

नील उत्पादन की वह व्यवस्था जहाँ बागान मालिक सीधे तौर पर किराए के मजदूरों के साथ ज़मीन पर नियंत्रण रखते थे।

चंपारण

बिहार का वह स्थान जहाँ महात्मा गांधी ने 1917 में नील बागान मालिकों के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया था।

नील की खेती का सच
ग्रामीण इलाकों में “सुधार” करने का कंपनी का प्रयास राजस्व के लालच से प्रेरित था। इसके कारण ऐसी दमनकारी प्रणालियाँ बनीं जिन्होंने अंततः किसानों की चुप्पी तोड़ी और भारत में संगठित कृषि प्रतिरोध का मार्ग प्रशस्त किया।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-3 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: ग्रामीण क्षेत्र पर शासन चलाना

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भारतीय संसदीय प्रणाली में, जहाँ राष्ट्रपति नाममात्र का प्रमुख (विधितः – De Jure) होता है, वहीं प्रधानमंत्री वास्तविक कार्यकारी प्रमुख (यथार्थ – De Facto) होता है। प्रधानमंत्री ‘सरकार का प्रमुख’ और राष्ट्र की नीतियों का मुख्य वास्तुकार होता है।

  • नियुक्ति: संविधान स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा। परंपरा के अनुसार, राष्ट्रपति लोकसभा में बहुमत प्राप्त दल (या गठबंधन) के नेता को प्रधानमंत्री नियुक्त करता है।
  • विवेकाधीन शक्ति: यदि किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत न हो, तो राष्ट्रपति अपने व्यक्तिगत विवेक का उपयोग करके सबसे बड़े दल/गठबंधन के नेता को नियुक्त कर सकता है और उन्हें एक निश्चित अवधि (आमतौर पर एक महीने) के भीतर अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकता है।
  • योग्यता:
    1. भारत का नागरिक होना चाहिए।
    2. लोकसभा (न्यूनतम आयु 25 वर्ष) या राज्यसभा (न्यूनतम आयु 30 वर्ष) का सदस्य होना चाहिए।
    3. एक गैर-सदस्य को भी नियुक्त किया जा सकता है, लेकिन उसे 6 महीने के भीतर किसी भी सदन की सदस्यता प्राप्त करनी होगी।
  • पदावधि: प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure) पद धारण करता है। इसका मतलब यह नहीं है कि राष्ट्रपति उसे कभी भी हटा सकता है; जब तक प्रधानमंत्री को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, उसे बर्खास्त नहीं किया जा सकता।

यह अनुच्छेद राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद (COM) के बीच संबंधों को परिभाषित करता है।

  • नियम: राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद होगी जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होगा।
  • बाध्यकारी प्रकृति: राष्ट्रपति ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य है। हालाँकि, राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने के लिए कह सकता है; लेकिन पुनर्विचार के बाद दी गई दूसरी सलाह राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य होती है।
  • गोपनीयता: मंत्रियों द्वारा राष्ट्रपति को दी गई सलाह की प्रकृति की किसी भी अदालत द्वारा जाँच नहीं की जा सकती।

अनुच्छेद 78 राष्ट्रपति और कैबिनेट के बीच संवैधानिक सेतु (Bridge) के रूप में कार्य करता है। प्रधानमंत्री के कर्तव्य हैं:

  • सूचित करना: संघ के प्रशासन और विधायी प्रस्तावों से संबंधित मंत्रिपरिषद के सभी निर्णयों को राष्ट्रपति को संप्रेषित करना।
  • जानकारी प्रदान करना: प्रशासन या विधान से संबंधित ऐसी कोई भी जानकारी देना जिसे राष्ट्रपति माँगे।
  • विचारार्थ प्रस्तुत करना: यदि राष्ट्रपति ऐसा चाहे, तो किसी ऐसे मामले को मंत्रिपरिषद के विचार के लिए रखना जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो लेकिन परिषद ने विचार न किया हो।
  • सिफारिश: वह उन व्यक्तियों की सिफारिश करता है जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा मंत्री नियुक्त किया जाता है।
  • विभागों का आवंटन: वह मंत्रियों के बीच विभिन्न विभागों (Portfolios) का आवंटन और फेरबदल करता है।
  • अध्यक्षता: वह मंत्रिपरिषद की बैठकों की अध्यक्षता करता है और उनके निर्णयों को प्रभावित करता है।
  • समन्वय: वह सभी मंत्रियों की गतिविधियों का मार्गदर्शन, निर्देशन, नियंत्रण और समन्वय करता है।
  • इस्तीफा: चूंकि प्रधानमंत्री प्रमुख है, उसका इस्तीफा या मृत्यु स्वचालित रूप से मंत्रिपरिषद के विघटन का कारण बनती है।
  • प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच संचार का मुख्य माध्यम है।
  • वह राष्ट्रपति को भारत के महान्यायवादी (Attorney General), CAG, UPSC के अध्यक्ष, चुनाव आयुक्तों आदि जैसे महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति के संबंध में सलाह देता है।
  • सदन का नेता: प्रधानमंत्री निचले सदन (लोकसभा) का नेता होता है।
  • सत्र बुलाना/सत्रावसान: वह राष्ट्रपति को संसद के सत्र बुलाने और सत्रावसान (Proroguing) के संबंध में सलाह देता है।
  • विघटन: वह किसी भी समय राष्ट्रपति को लोकसभा भंग (Dissolve) करने की सिफारिश कर सकता है।
  • नीतिगत घोषणाएँ: वह सदन के पटल पर सरकार की प्रमुख नीतियों की घोषणा करता है।
  • मुख्य प्रवक्ता: वह राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर केंद्र सरकार का मुख्य प्रवक्ता होता है।
  • विदेश नीति: वह देश की विदेश नीति को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • पदेन अध्यक्ष: वह कई महत्वपूर्ण निकायों का पदेन (Ex-officio) अध्यक्ष होता है:
    1. नीति आयोग (NITI Aayog)
    2. राष्ट्रीय विकास परिषद (NDC)
    3. राष्ट्रीय एकता परिषद
    4. अंतर-राज्य परिषद
    5. राष्ट्रीय जल संसाधन परिषद
  • संकट प्रबंधक: वह आपातकाल के दौरान राजनीतिक स्तर पर मुख्य संकट प्रबंधक होता है।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व (अनुच्छेद 75): मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होती है। इसका अर्थ है कि प्रधानमंत्री और मंत्री “एक साथ तैरते हैं और एक साथ डूबते हैं।” यदि प्रधानमंत्री के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो पूरी कैबिनेट को इस्तीफा देना पड़ता है।
  • व्यक्तिगत उत्तरदायित्व: राष्ट्रपति किसी मंत्री को हटा सकता है, लेकिन वह ऐसा केवल प्रधानमंत्री की सलाह पर ही करता है।
अनुच्छेदकीवर्ड (Keyword)मुख्य शासनादेश
74सलाहप्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सलाह देने के लिए परिषद का प्रमुख होता है (सलाह बाध्यकारी है)।
75नियुक्तिप्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा; सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत।
78सूचनाराष्ट्रपति को सरकार के निर्णयों के बारे में सूचित रखना प्रधानमंत्री का कर्तव्य है।

प्रधानमंत्री भारतीय संविधान का सबसे शक्तिशाली पदाधिकारी है। जहाँ राष्ट्रपति “राष्ट्र का प्रमुख” है, वहीं प्रधानमंत्री “सरकार का प्रमुख” होता है, जो कार्यपालिका के इंजन और विधायिका के नेता के रूप में कार्य करता है।

शासनाध्यक्ष • वास्तविक कार्यपालिका
भारत के प्रधानमंत्री

नियुक्ति, शक्तियाँ और भूमिका

अनुच्छेद 75
प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है; परंपरा के अनुसार, लोकसभा में बहुमत दल का नेता।
अनुच्छेद 74
प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद का नेतृत्व करते हैं। ऐसी सलाह बाध्यकारी है।
संवैधानिक सेतु (अनु. 78)
कर्तव्य: कैबिनेट के सभी निर्णयों की सूचना राष्ट्रपति को देना और मांगे जाने पर प्रशासनिक/विधायी जानकारी प्रदान करना।
विचार-विमर्श: किसी मंत्री द्वारा लिए गए निर्णय को, जिस पर कैबिनेट ने विचार न किया हो, परिषद के समक्ष विचार के लिए रखना।
संसद से संबंध
सदन के नेता के रूप में, प्रधानमंत्री सत्रों को बुलाने/सत्रावसान करने की सलाह देते हैं और लोकसभा को भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं।

कैबिनेट की आधारशिला

पोर्टफोलियो आवंटित करना, बैठकों की अध्यक्षता करना और सभी मंत्रियों की गतिविधियों का समन्वय करना।

पदेन अध्यक्ष

नीति आयोग, राष्ट्रीय एकता परिषद और अंतर-राज्य परिषद सहित महत्वपूर्ण निकायों के प्रमुख।

सामूहिक उत्तरदायित्व

मंत्री सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं; वे प्रधानमंत्री के नेतृत्व में “एक साथ तैरते और डूबते” हैं।

वास्तविक
शक्ति
जहाँ राष्ट्रपति ‘नाममात्र’ के प्रमुख हैं, वहीं प्रधानमंत्री वास्तविक (De Facto) कार्यकारी हैं। प्रधानमंत्री का इस्तीफा या मृत्यु स्वतः ही पूरी मंत्रिपरिषद के विघटन का कारण बनती है, जबकि किसी अन्य मंत्री की मृत्यु केवल एक रिक्ति पैदा करती है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (29 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच एक ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिया गया है, जो 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के दौरान व्यापार संबंधों में एक रणनीतिक बदलाव का प्रतीक है।
  • मुख्य बिंदु:
    • रणनीतिक बीमा: इस समझौते को वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं के खिलाफ दोनों पक्षों के लिए “भू-राजनीतिक बीमा पॉलिसी” के रूप में देखा जा रहा है।
    • संतुलित व्यापार: भारत ने एक ऐसे सौदे पर सफलतापूर्वक बातचीत की है जो उसके घरेलू डेयरी और कृषि क्षेत्रों की रक्षा करता है, साथ ही वस्त्र और फार्मास्यूटिकल्स के लिए बेहतर बाजार पहुंच प्राप्त करता है।
    • निवेश संरक्षण: एक अलग निवेश संरक्षण समझौता (IPA) भारत में यूरोपीय निवेशकों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा प्रदान करता है।
    • भौगोलिक संकेत (GIs): समझौते में GI के लिए कड़े संरक्षण शामिल हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि दार्जिलिंग चाय या फेटा चीज़ जैसे पारंपरिक उत्पादों को नकल से बचाया जाए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक साझेदारी”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “द्विपक्षीय निवेश संधियाँ” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM): हालांकि FTA पर हस्ताक्षर हो गए हैं, लेकिन भारत यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स को लेकर चिंतित है, जिसे वह एक गैर-टैरिफ बाधा (Non-tariff barrier) मानता है। दोनों पक्ष इन चिंताओं को दूर करने के लिए “संयुक्त निगरानी तंत्र” पर सहमत हुए हैं।
    • रणनीतिक स्वायत्तता: संपादकीय इस बात पर जोर देता है कि यह सौदा “रणनीतिक स्वायत्तता” की जीत है, जो दर्शाता है कि दो बड़े लोकतांत्रिक ब्लॉक बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के समझौते पर पहुँच सकते हैं।
    • डिजिटल सहयोग: यह समझौता एआई (AI) और सेमीकंडक्टर्स जैसे उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में डेटा पर्याप्तता और सहयोग की नींव रखता है, जो पहले व्यापार वार्ता से अलग थे।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों और राजनीति का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने ईरान को उसके परमाणु कार्यक्रम के संबंध में गंभीर चेतावनी दी है, और संवर्धन गतिविधियों (Enrichment activities) को तुरंत न रोकने पर “पूर्ण परिणामों” की धमकी दी है।
  • मुख्य बिंदु:
    • परमाणु सीमा (Nuclear Threshold): ट्रम्प ने दावा किया कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की कगार पर है, जो वर्तमान अमेरिकी प्रशासन के लिए एक “रेड लाइन” है।
    • आर्थिक नाकाबंदी: अमेरिका ने ईरान के साथ व्यापार जारी रखने वाले किसी भी देश (भारत सहित) पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी है, जो विशेष रूप से तेल और खनिज निर्यात को लक्षित करता है।
    • राजनयिक अलगाव: अमेरिका यूरोपीय सहयोगियों पर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को फिर से लागू करने (Snap back) के लिए दबाव डाल रहा है, जिससे 2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) के बचे हुए अवशेष भी समाप्त हो सकते हैं।
    • चाबहार पर प्रभाव: बढ़ते तनाव से चाबहार बंदरगाह की परिचालन स्थिरता को खतरा है, जहाँ भारत ने महत्वपूर्ण रणनीतिक और वित्तीय निवेश किया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “अमेरिकी प्रतिबंध और भारत” और “परमाणु अप्रसार” को समझने के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • वैश्विक तेल अस्थिरता: फारस की खाड़ी में किसी भी सैन्य या आर्थिक वृद्धि से वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आने की उम्मीद है, जिससे भारत के राजकोषीय घाटे और रुपये के मूल्य पर सीधा असर पड़ेगा।
    • दबाव में रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को ईरान के साथ अपनी रणनीतिक ऊर्जा साझेदारी और अपने सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार अमेरिका की व्यापारिक दंड की धमकी के बीच एक कठिन विकल्प का सामना करना पड़ रहा है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि)।

  • संदर्भ: दिसंबर 2025 में भारत का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) 26 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, जो विनिर्माण (Manufacturing) में मजबूत सुधार का संकेत देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • विनिर्माण की बढ़त: विनिर्माण क्षेत्र, जिसका IIP में सबसे अधिक भार है, इलेक्ट्रॉनिक्स और परिवहन उपकरणों के कारण 8.2% बढ़ा।
    • पूंजीगत वस्तुओं में वृद्धि: पूंजीगत वस्तुओं (Capital Goods) में दोहरे अंकों की वृद्धि बताती है कि लंबे समय के ठहराव के बाद निजी निवेश अंततः गति पकड़ रहा है।
    • उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं: टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की बढ़ती मांग 2026-27 के केंद्रीय बजट से पहले शहरी उपभोग की मजबूती का संकेत देती है।
    • खनन और बिजली: खनन में 5.4% की वृद्धि हुई, जबकि बिजली उत्पादन में 6.1% की वृद्धि देखी गई, जो उच्च औद्योगिक गतिविधि को दर्शाती है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “आर्थिक संकेतक”, “विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन” और “निवेश रुझान” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नीतिगत प्रोत्साहन: संपादकीय इस वृद्धि का श्रेय आंशिक रूप से इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं के विलंबित प्रभाव को देता है।
    • बजटीय अपेक्षाएं: यह सकारात्मक डेटा सरकार को आगामी केंद्रीय बजट में बुनियादी ढांचे और ग्रामीण मांग पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अधिक राजकोषीय स्थान प्रदान करता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य) और GS पेपर 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: कुत्तों के हमलों के बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न राज्यों में पशु जन्म नियंत्रण (ABC) कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर कड़ी असंतोष व्यक्त किया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • कार्यान्वयन अंतराल: कोर्ट ने नोट किया कि पशु जन्म नियंत्रण नियम, 2023 के बावजूद, स्थानीय निकाय व्यवस्थित नसबंदी और टीकाकरण करने में विफल रहे हैं।
    • मानव-पशु संघर्ष: पीठ ने जोर दिया कि जहाँ पशु अधिकार महत्वपूर्ण हैं, वहीं नागरिकों, विशेष रूप से बच्चों और बुजुर्गों के “जीवन और सुरक्षा का अधिकार” सर्वोपरि होना चाहिए।
    • निधि की जवाबदेही: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से राज्यों को आवंटित धन और नगर निगमों द्वारा उनके उपयोग के बारे में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
    • डेटा की कमी: आवारा कुत्तों की वास्तविक आबादी पर विश्वसनीय डेटा का अभाव नीतिगत हस्तक्षेपों को अप्रभावी बना रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “शासन और सार्वजनिक सुरक्षा”, “स्थानीय निकाय जवाबदेही” और “पशु अधिकारों में नैतिकता” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • शहरी शासन की विफलता: संपादकीय इस बात पर प्रकाश डालता है कि आवारा कुत्तों का संकट भारतीय शहरों में खराब अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management) का एक लक्षण है, जो कुत्तों के झुंडों को “खाद्य सुरक्षा” प्रदान करता है।
    • कानूनी उत्तरदायित्व: कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि क्या कुत्तों के हमलों के पीड़ितों को मुआवजे के लिए स्थानीय अधिकारियों को वित्तीय रूप से उत्तरदायी ठहराया जाना चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप) और GS पेपर 3 (आपदा प्रबंधन)।

  • संदर्भ: गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर कोलकाता के आनंदपुर में दो बड़े गोदामों में लगी विनाशकारी आग के परिणामस्वरूप कम से कम 11 लोगों की मौत हो गई, जो शहरी सुरक्षा में व्यवस्थागत विफलताओं को उजागर करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • अवैध संरचनाएं: राज्य अग्निशमन विभाग ने पुष्टि की कि 12,000 वर्ग फुट में फैले गोदामों को अग्नि सुरक्षा के लिए मंजूरी नहीं दी गई थी और उनमें बुनियादी सुरक्षा सुविधाओं का अभाव था।
    • हाशिए पर रहने वाले पीड़ित: मृतक मुख्य रूप से पूर्वी मेदिनीपुर के प्रवासी श्रमिक थे जो इन अस्थायी, ज्वलनशील संरचनाओं का उपयोग रैन बसेरों के रूप में कर रहे थे।
    • प्रशासनिक उदासीनता: संपादकीय राज्य एजेंसियों की “मौन” प्रतिक्रिया और मुख्यमंत्री द्वारा स्थल का आधिकारिक दौरा न करने की आलोचना करता है, जो चुनाव से पहले त्रासदी को कम करके दिखाने की इच्छा का संकेत देता है।
    • बढ़ते जोखिम: आग मंगलवार दोपहर तक धधकती रही, जिसके लिए 12 दमकल इंजनों की आवश्यकता पड़ी। इसने पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में बनी संरचनाओं के लिए योजना की कमी को रेखांकित किया।
  • UPSC प्रासंगिकता: “शहरी शासन”, “औद्योगिक सुरक्षा मानक” और “प्रवासी श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नागरिक पतन (Civic Decay): कभी भारत के अग्रणी शहर रहे कोलकाता में ऐसी बड़ी, बिना मंजूरी वाली संरचनाओं का होना वर्तमान नागरिक प्रशासन की दयनीय स्थिति का एक “स्पष्ट प्रमाण” है।
    • सुरक्षा का सामान्यीकरण: लेख चेतावनी देता है कि कोलकाता में विनाशकारी आग एक “परेशान करने वाली नियमित घटना” बनती जा रही है। पिछले साल बड़ाबाजार में होटल की आग में भी 14 लोगों की जान गई थी।

संपादकीय विश्लेषण

29 जनवरी, 2026
GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध ईरान परमाणु ‘रेड लाइन’

अमेरिका ने ईरान के व्यापारिक भागीदारों पर 25% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दी। रणनीतिक ऊर्जा संबंध और चाबहार बंदरगाह की स्थिरता सीधे दबाव में।

GS-3 अर्थव्यवस्था IIP बढ़कर 7.8% हुआ

विनिर्माण क्षेत्र 8.2% की दर से बढ़ा, जो 26 महीने का उच्चतम स्तर है। पूंजीगत वस्तुओं (Capital Goods) में दोहरे अंकों की वृद्धि निजी निवेश में सुधार का संकेत है।

GS-3 आपदा प्रबंधन कोलकाता गोदाम अग्निकांड

11 मौतों ने अवैध औद्योगिक संरचनाओं को उजागर किया। नागरिक प्रशासनिक उदासीनता के कारण विनाशकारी आग ‘चिंताजनक रूप से सामान्य’ होती जा रही है।

संघवाद: सुप्रीम कोर्ट ने आवारा पशु नीति की विफलता को ठीक करने के लिए नगर निगमों से निधि उपयोग रिपोर्ट मांगी।
शहरी सुरक्षा: खराब अपशिष्ट प्रबंधन आवारा कुत्तों के लिए “खाद्य सुरक्षा” का कार्य करता है, जिससे मानव-पशु संघर्ष बढ़ता है।
रणनीतिक स्वायत्तता: भारत-यूरोपीय संघ FTA साबित करता है कि प्रमुख लोकतांत्रिक गुट बाहरी हस्तक्षेप के बिना समझौते कर सकते हैं।
ऊर्जा सुरक्षा: फारस की खाड़ी में तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल अस्थिरता का खतरा है, जिससे भारत का राजकोषीय घाटा प्रभावित हो सकता है।
GS-4
सुरक्षा की नैतिकता
सार्वजनिक सुरक्षा बनाम प्रशासनिक उदासीनता: कोलकाता की आग नागरिक क्षय का एक स्पष्ट प्रमाण है। जब सुविधा के लिए सुरक्षा मानदंडों की अनदेखी की जाती है, तो सबसे कमजोर वर्ग—प्रवासी श्रमिक—संस्थागत विफलता की भारी कीमत चुकाते हैं।

यहाँ 2026 के लिए अद्यतन (Updated) संरक्षण स्थलों और रणनीतिक औद्योगिक गलियारों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है।

UPSC और राज्य PCS 2026 की परीक्षाओं के लिए ये बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से भारत के पारिस्थितिक और आर्थिक मानचित्र में हुए नवीनतम बदलावों को ट्रैक करने के लिए।

2026 की शुरुआत तक, भारत ने 96 रामसर स्थलों का मील का पत्थर हासिल कर लिया है, जिससे यह दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुँच गया है।

नया रामसर स्थलराज्यमुख्य महत्व
कोपरा जलाशयछत्तीसगढ़सबसे हालिया जुड़ाव (2025 के अंत में); बिलासपुर के पास प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण।
सिलीसेढ़ झीलराजस्थान2025 के अंत में नामित; अलवर में स्थित, यह एक महत्वपूर्ण मीठे पानी का आवास है।
गोगाबील झीलबिहारभारत का 94वाँ स्थल; गंगा-कोसी प्रणाली में एक प्रमुख गोखुर झील (Oxbow lake)
नंजरायण अभयारण्यतमिलनाडुकावेरी बेसिन में स्थित; ‘सेंट्रल एशियन फ्लाईवे’ (प्रवास मार्ग) का समर्थन करता है।

मैपिंग टिप: वर्तमान में तमिलनाडु 20 रामसर स्थलों के साथ देश में सबसे आगे है, उसके बाद उत्तर प्रदेश (10) का स्थान है। बिहार और ओडिशा 6-6 स्थलों के साथ इसके बाद आते हैं।

भारत में 18 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें से 13 अब यूनेस्को (UNESCO) के विश्व नेटवर्क के तहत मान्यता प्राप्त हैं।

  • कोल्ड डेजर्ट (हिमाचल प्रदेश): 2025 में यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त; यह हिम तेंदुआ (Snow Leopard) और हिमालयी साकिन (Ibex) की रक्षा करता है।
  • नीलगिरी BR (TN/KL/KN): भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (1986); इसमें ‘साइलेंट वैली’ और ‘बांदीपुर’ उद्यान शामिल हैं।
  • कच्छ का महान रण (गुजरात): भारत का सबसे बड़ा जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।
  • डिब्रू-सैखोवा (असम): भारत का सबसे छोटा जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।

राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम (NICDP) भारत के विकास के लिए एक “एकीकृत स्थानिक रीढ़” तैयार कर रहा है।

गलियारा (Corridor)मुख्य मार्गरणनीतिक नोड्स (Nodes)
DMICदिल्ली-मुंबई (1,504 किमी)धोलेरा (GJ), ऑरिक (MH), ग्रेटर नोएडा (UP)।
AKICअमृतसर-कोलकातागया (BR), खुरपिया (UK), राजपुरा (PB)।
CBICचेन्नई-बेंगलुरुकृष्णपट्टनम (AP), तुमकुरु (KN)।
ECECपूर्वी तट आर्थिक गलियाराविजाग-चेन्नई (चरण 1); NH-5 का अनुसरण करता है।
  • मिग ला दर्रा (Mig La Pass), लद्दाख: हाल ही में 19,400 फीट की ऊंचाई पर खोला गया, यह अब दुनिया का सबसे ऊँचा मोटर योग्य दर्रा है, जिसने ‘उमलिंग ला’ को पीछे छोड़ दिया है।
  • चिनाब रेलवे ब्रिज (जम्मू-कश्मीर): दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल (359 मीटर); यह कश्मीर घाटी को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करता है।
  • नवी मुंबई हवाई अड्डा: ‘वॉटर टैक्सी’ (Water Taxi) से जुड़ा भारत का पहला हवाई अड्डा।
विशेषतामानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
नवीनतम BR (UNESCO)कोल्ड डेजर्टहिमाचल प्रदेश
सबसे ऊँचा मोटर मार्गमिग ला दर्रालद्दाख
सबसे छोटा BRडिब्रू-सैखोवाअसम
रामसर स्थलों में अग्रणीतमिलनाडु20 रामसर साइट्स

औद्योगिक गलियारों को मैप करते समय उनके पास स्थित प्रमुख बंदरगाहों और हवाई अड्डों को भी चिह्नित करें। उदाहरण के लिए, DMIC सीधे JNPT बंदरगाह से जुड़ता है, जो इसके निर्यात-आयात लॉजिस्टिक्स के लिए महत्वपूर्ण है।

मानचित्रण विवरण

संरक्षण और रणनीतिक गलियारे
रामसर स्थल 96 आर्द्रभूमि मील के पत्थर

तमिलनाडु 20 स्थलों के साथ अग्रणी है। हाल के प्रमुख जुड़ावों में कोपरा जलाशय (छ.ग.) और सिलीसेढ़ झील (रा.) शामिल हैं।

जैवमंडल नेटवर्क यूनेस्को (UNESCO) अपडेट

शीत मरुस्थल (हि.प्र.) नवीनतम यूनेस्को जुड़ाव (2025) है। डिब्रू-सैखोवा सबसे छोटा रिजर्व बना हुआ है।

औद्योगिक गलियारे (NICDP)
एकीकृत स्थानिक आधार

DMIC (दिल्ली-मुंबई) धोलेरा और AURIC जैसे नोड्स को जोड़ता है। AKIC (अमृतसर-कोलकाता) गया और राजपुरा को एक विशाल पूर्वी आर्थिक धमनी में एकीकृत करता है।

रणनीतिक बुनियादी ढांचा
2026 कनेक्टिविटी की ऊंचाइयां

मिग ला दर्रा (लद्दाख) अब 19,400 फीट पर दुनिया का सबसे ऊंचा मोटरमार्ग है। चेनाब रेल ब्रिज कश्मीर घाटी को सबसे ऊंचा संरचनात्मक लिंक प्रदान करता है।

तटीय अर्थव्यवस्था

ECEC (पूर्वी तट) चरण 1 विजाग-चेन्नई अक्ष पर केंद्रित है, जो तीव्र बंदरगाह-आधारित औद्योगिकीकरण के लिए NH-5 का उपयोग करता है।

नवीनतम BR शीत मरुस्थल यूनेस्को (HP)
सबसे ऊंचा दर्रा मिग ला दर्रा (लद्दाख)
आर्द्रभूमि अग्रणी तमिलनाडु (20 स्थल)
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 2026 के मानचित्रण के लिए रामसर स्थलों की पारिस्थितिक संवेदनशीलता को NICDP गलियारों की औद्योगिक तीव्रता के साथ संतुलित करने की आवश्यकता है। GS-III विश्लेषण के लिए DMIC और अरावली संरक्षण क्षेत्रों के मिलन बिंदु की पहचान करें।

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