IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 26 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 7 Chapter-10 (अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन)
यह अध्याय “अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन” 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य के पतन और उसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं के नाटकीय पुनर्गठन का वर्णन करता है।
1. मुगल साम्राज्य का संकट
मुगल साम्राज्य को कई कारकों के संयोजन का सामना करना पड़ा जिससे उसका पतन हुआ:
- उत्तराधिकार और दक्कन का युद्ध: औरंगजेब ने दक्कन में लंबी लड़ाइयाँ लड़ीं, जिससे साम्राज्य के सैन्य और वित्तीय संसाधन समाप्त हो गए।
- प्रशासनिक गिरावट: शाही प्रशासन की कार्यक्षमता बिगड़ गई, जिससे बाद के मुगल सम्राटों के लिए अपने शक्तिशाली मनसबदारों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया।
- विद्रोह: उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में किसानों और जमींदारों के विद्रोहों ने दबाव बढ़ा दिया। ये विद्रोह अक्सर उच्च करों के बोझ के कारण होते थे।
- विदेशी आक्रमण: ईरान के शासक नादिर शाह ने 1739 में दिल्ली पर आक्रमण किया और शहर को जमकर लूटा। इसके बाद अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली ने 1748 और 1761 के बीच पाँच बार आक्रमण किए।
2. नए राज्यों का उदय
अठारहवीं शताब्दी के दौरान, मुगल साम्राज्य धीरे-धीरे कई स्वतंत्र क्षेत्रीय राज्यों में बिखर गया। इन राज्यों को तीन समूहों में बांटा जा सकता है:
- पुरानी मुगल रियासतें (Old Mughal Provinces): अवध, बंगाल और हैदराबाद जैसे राज्य अत्यंत शक्तिशाली और काफी स्वतंत्र थे, लेकिन इनके शासकों ने मुगल सम्राट के साथ औपचारिक संबंध नहीं तोड़े।
- हैदराबाद: इसकी स्थापना निज़ाम-उल-मुल्क आसफ जाह ने की थी। उसने उत्तर भारत से कुशल सैनिकों और प्रशासकों को लाकर और इजारेदारी (Ijaradari) प्रथा अपनाकर अपनी स्थिति मजबूत की।
- अवध: बुरहान-उल-मुल्क सआदत खान को 1722 में सूबेदार नियुक्त किया गया था। उसने जागीरदारों की संख्या कम करके और रिक्त पदों पर अपने वफादार नौकरों को नियुक्त करके मुगल प्रभाव को कम करने की कोशिश की।
- बंगाल: मुर्शिद कुली खान के नेतृत्व में बंगाल धीरे-धीरे दिल्ली के नियंत्रण से अलग हो गया। उसने सभी मुगल जागीरदारों को उड़ीसा स्थानांतरित कर दिया और बंगाल के राजस्व का बड़े पैमाने पर पुनर्मूल्यांकन करने का आदेश दिया।
- राजपूतों के वतन (Vatans of the Rajputs): कई राजपूत राजाओं (विशेषकर अंबर और जोधपुर के) ने मुगलों के अधीन विशिष्ट सेवाएँ दी थीं। उन्हें अपनी ‘वतन जागीर’ में काफी स्वायत्तता प्राप्त थी। अठारहवीं शताब्दी में, इन शासकों ने आसपास के क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास किया।
- मराठों, सिखों और जाटों के राज्य: इन समूहों ने एक लंबे सशस्त्र संघर्ष के बाद मुगलों से अपनी स्वतंत्रता छीन ली थी।
3. सिख
सिखों के एक राजनीतिक समुदाय के रूप में संगठित होने से पंजाब में क्षेत्रीय राज्य निर्माण में मदद मिली।
- गुरु गोविंद सिंह: दसवें गुरु ने राजपूत और मुगल शासकों के खिलाफ कई लड़ाइयाँ लड़ीं और 1699 में ‘खालसा’ की स्थापना की।
- बंदा बहादुर: उनके नेतृत्व में खालसा ने मुगल सत्ता के खिलाफ विद्रोह किया, गुरु नानक और गुरु गोविंद सिंह के नाम पर सिक्के जारी करके अपने संप्रभु शासन की घोषणा की और अपना प्रशासन स्थापित किया।
- मिसल (Misls): अठारहवीं शताब्दी में सिखों ने खुद को कई जत्थों और बाद में ‘मिसलों’ में संगठित किया। उनकी संयुक्त सेना को ‘दल खालसा’ के नाम से जाना जाता था।
4. मराठा
मुगल शासन के निरंतर विरोध से उत्पन्न होने वाला मराठा राज्य एक और शक्तिशाली क्षेत्रीय राज्य था।
- शिवाजी: उन्होंने शक्तिशाली योद्धा परिवारों (देशमुखों) और अत्यधिक गतिशील कृषक-पशुपालकों (कुनबियों) के सहयोग से एक स्थिर राज्य की स्थापना की।
- पेशवा: शिवाजी की मृत्यु के बाद, मराठा राज्य की प्रभावी शक्ति चितपावन ब्राह्मणों के एक परिवार के हाथ में रही, जिन्होंने शिवाजी के उत्तराधिकारियों की सेवा ‘पेशवा’ (प्रधानमंत्री) के रूप में की।
- विस्तार: 1720 और 1761 के बीच मराठा साम्राज्य का विस्तार हुआ। उन्होंने मुगलों से मालवा और गुजरात छीन लिया और राजस्थान, बंगाल तथा उड़ीसा पर छापे मारे।
- राजस्व: वे उन क्षेत्रों से चौथ (भू-राजस्व का 25%) और सरदेशमुखी (9-10%) वसूलते थे जो उनके सीधे नियंत्रण में नहीं थे।
5. जाट
अन्य राज्यों की तरह, जाटों ने सत्रहवीं शताब्दी के अंत और अठारहवीं शताब्दी के दौरान अपनी शक्ति संगठित की।
- चूड़ामन: उनके नेतृत्व में जाटों ने दिल्ली के पश्चिम में स्थित क्षेत्रों पर नियंत्रण कर लिया।
- सूरज मल: उनके अधीन भरतपुर का राज्य एक शक्तिशाली राज्य के रूप में उभरा।
💡 परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण शब्द:
- इजारेदारी: राजस्व वसूली के लिए ठेकेदारी की प्रथा।
- चौथ: मराठों द्वारा पड़ोसी राज्यों से वसूला जाने वाला कर (उपज का 1/4 हिस्सा)।
- सरदेशमुखी: मुख्य राजस्व अधिकारी होने के नाते वसूला जाने वाला अतिरिक्त कर (9-10%)।
- खालसा: सिखों का सैन्य दल।
- तकरीबन: लगभग (इतिहास की तिथियों के संदर्भ में प्रयोग)।
अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन
चौथ
मराठों द्वारा गैर-मराठा क्षेत्रों से मांगे जाने वाले भू-राजस्व का 25 प्रतिशत हिस्सा।
खालसा
सिखों की संप्रभु संस्था, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने एक राज्य शक्ति में बदल दिया था।
जाट
समृद्ध कृषक जिन्होंने सूरज मल के नेतृत्व में भरतपुर में एक मजबूत राज्य का निर्माण किया था।
कक्षा-7 इतिहास अध्याय-10 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: अठारहवीं शताब्दी में नए राजनीतिक गठन
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: राष्ट्रपति की शक्तियाँ (कार्यकारी और विधायी)
राष्ट्रपति भारतीय संघ का सर्वोच्च प्रमुख होता है। यद्यपि उनका पद “नाममात्र” का होता है, लेकिन देश के शासन के लिए उनकी इन शक्तियों का कानूनी महत्व बहुत अधिक है।
1. कार्यकारी शक्तियाँ (Executive Powers)
भारत सरकार के सभी कार्यकारी कार्य औपचारिक रूप से राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
प्रमुख नियुक्तियाँ:
राष्ट्रपति देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकारियों की नियुक्ति करता है:
- प्रधानमंत्री और अन्य मंत्री (प्रधानमंत्री की सलाह पर)।
- भारत के महान्यायवादी (Attorney General) – राष्ट्रपति उनके वेतन और कार्यकाल का निर्धारण भी करते हैं।
- भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त, तथा UPSC के अध्यक्ष व सदस्य।
- राज्यों के राज्यपाल (Governors)।
- अंतर-राज्यीय परिषद (Inter-State Council): केंद्र-राज्य और राज्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के लिए इसकी नियुक्ति।
प्रशासनिक नियंत्रण:
- राष्ट्रपति किसी भी क्षेत्र को ‘अनुसूचित क्षेत्र’ घोषित कर सकता है और उसे अनुसूचित क्षेत्रों व जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में विशेष शक्तियाँ प्राप्त हैं।
- वह प्रधानमंत्री से किसी भी ऐसे मामले पर निर्णय मंत्रिपरिषद के विचारार्थ प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकता है, जिस पर किसी मंत्री ने निर्णय ले लिया हो लेकिन परिषद ने विचार न किया हो।
2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)
राष्ट्रपति संसद का एक अभिन्न अंग होता है। इस कारण उसे विधायी प्रक्रिया से संबंधित कई शक्तियाँ प्राप्त हैं:
- सत्र बुलाना और सत्रावसान (Summoning & Proroguing): वह संसद के सत्र को बुला सकता है या उसका सत्रावसान कर सकता है तथा लोकसभा को भंग कर सकता है।
- संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108): किसी साधारण विधेयक पर दोनों सदनों के बीच गतिरोध (Deadlock) होने की स्थिति में वह संयुक्त बैठक बुला सकता है।
- मनोनयन (Nominations): वह राज्यसभा में 12 सदस्यों को मनोनीत करता है (साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों से)।
- पूर्व सिफारिश: कुछ विधेयकों को उनकी पूर्व सिफारिश के बिना संसद में पेश नहीं किया जा सकता (जैसे—धन विधेयक, या राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन से संबंधित विधेयक)।
3. वीटो शक्ति (Veto Power – अनुच्छेद 111)
जब संसद द्वारा पारित कोई विधेयक राष्ट्रपति की सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 111 के तहत उनके पास तीन विकल्प होते हैं:
- आत्यंतिक वीटो (Absolute Veto): “नहीं” कहने की शक्ति। वह विधेयक पर अपनी सहमति सुरक्षित रख लेता है, जिससे विधेयक समाप्त हो जाता है और कानून नहीं बन पाता।
- उपयोग: आमतौर पर गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों या तब किया जाता है जब सहमति देने से पहले मंत्रिमंडल इस्तीफा दे दे।
- निलंबनकारी वीटो (Suspensive Veto): “पुनर्विचार” के लिए कहने की शक्ति। वह विधेयक को संसद को वापस भेज देता है।
- शर्त: यदि संसद उस विधेयक को दोबारा (संशोधन के साथ या बिना) पारित कर राष्ट्रपति के पास भेजती है, तो राष्ट्रपति को अपनी सहमति देनी ही पड़ती है।
- नोट: वह ‘धन विधेयक’ के लिए इसका उपयोग नहीं कर सकता।
- पॉकेट वीटो (Pocket Veto): “मौन” रहने की शक्ति। वह विधेयक पर न तो सहमति देता है, न उसे अस्वीकार करता है और न ही वापस भेजता है, बल्कि उसे अनिश्चित काल के लिए लंबित रखता है।
- परीक्षा तथ्य: भारतीय राष्ट्रपति की ‘जेब’ (Pocket) अमेरिकी राष्ट्रपति से बड़ी है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति को 10 दिनों के भीतर विधेयक वापस करना होता है, जबकि भारतीय संविधान में ऐसी कोई समय सीमा नहीं है।
4. अध्यादेश जारी करने की शक्ति (Ordinance-Making Power – अनुच्छेद 123)
यह राष्ट्रपति की सबसे महत्वपूर्ण विधायी शक्ति है, जो उसे तब कानून बनाने की अनुमति देती है जब संसद सत्र में न हो।
अनिवार्य शर्तें:
- समय: इसे केवल तभी जारी किया जा सकता है जब संसद का कोई एक सदन (या दोनों) सत्र में न हो।
- आवश्यकता: राष्ट्रपति को संतुष्ट होना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियाँ मौजूद हैं जिनमें तत्काल कार्रवाई करना आवश्यक है।
- प्रभाव: अध्यादेश का वही बल और प्रभाव होता है जो संसद के अधिनियम का होता है, लेकिन यह एक अस्थायी कानून है।
अध्यादेश की अवधि:
- संसद के पुन: सत्र शुरू होने पर अध्यादेश को दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना चाहिए।
- 6 सप्ताह का नियम: यदि संसद इसे अनुमोदित कर देती है, तो यह अधिनियम बन जाता है। यदि कोई कार्रवाई नहीं की जाती, तो संसद की बैठक शुरू होने के 6 सप्ताह बाद यह समाप्त हो जाता है।
- अधिकतम अवधि: चूँकि संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने हो सकता है, इसलिए किसी अध्यादेश का अधिकतम जीवन 6 महीने और 6 सप्ताह हो सकता है।
विस्तृत तुलनात्मक तालिका
| शक्ति का प्रकार | अनुच्छेद | मुख्य शासनादेश | कार्यान्वयन विवरण |
| वीटो शक्ति | 111 | विधेयकों पर सहमति | आत्यंतिक, निलंबनकारी या पॉकेट। |
| अध्यादेश | 123 | कानून बनाने की शक्ति | 6 महीने + 6 सप्ताह तक वैध। |
| संयुक्त बैठक | 108 | गतिरोध सुलझाना | राष्ट्रपति बुलाता है, अध्यक्षता लोकसभा अध्यक्ष करता है। |
| क्षमादान | 72 | न्यायिक राहत | मृत्युदंड तक को क्षमा कर सकते हैं। |
💡 परीक्षा के लिए टिप:
हमेशा याद रखें कि राष्ट्रपति अपनी वीटो शक्ति या अध्यादेश शक्ति का प्रयोग स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है। (42वें और 44वें संशोधन के अनुसार)।
राष्ट्रपति की शक्तियाँ
आत्यंतिक वीटो
सहमति रोकने की शक्ति; विधेयक तुरंत समाप्त हो जाता है और कानून नहीं बन पाता।
निलंबनकारी वीटो
विधेयक को पुनर्विचार हेतु वापस करना। यदि पुन: पारित हो जाए, तो सहमति अनिवार्य है।
पॉकेट वीटो
विधेयक को अनिश्चित काल के लिए लंबित रखना। संविधान में इसकी कोई समय सीमा तय नहीं है।
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (26 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (26 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. 77वाँ गणतंत्र: भारतीय संघवाद का ‘स्ट्रेस टेस्ट’
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारतीय संविधान; संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध)।
- संदर्भ: भारत के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारतीय संघवाद के स्वास्थ्य का विश्लेषण, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते तनाव को रेखांकित किया गया है।
- मुख्य बिंदु:
- राजकोषीय केंद्रीकरण (Fiscal Centralization): संपादकीय नोट करता है कि केंद्र द्वारा ‘उपकर’ (Cess) और ‘अधिभार’ (Surcharge) के बढ़ते उपयोग के माध्यम से विभाज्य कर पूल में राज्यों की हिस्सेदारी प्रभावी रूप से कम हो रही है।
- राज्यपाल की भूमिका: केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों द्वारा संवैधानिक सेतु के बजाय “राजनीतिक एजेंट” के रूप में कार्य करने से कार्यपालिका के संबंधों में तनाव आया है।
- विधायी अतिक्रमण: राज्य सूची के विषयों (जैसे कृषि, स्वास्थ्य और शिक्षा) में केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से बढ़ते हस्तक्षेप ने “एकात्मक झुकाव” (Unitary bias) की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
- भाषा और पहचान: ‘हिंदी थोपने’ की बहस और 2027 के बाद होने वाला परिसीमन अभ्यास क्षेत्रीय उप-राष्ट्रवाद के लिए संभावित ‘फ्लैशप्वाइंट’ के रूप में उभर रहे हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “भारतीय संघवाद की प्रकृति”, “संवैधानिक पदाधिकारियों की भूमिका” और “राजकोषीय संघवाद” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- सहकारी बनाम प्रतिस्पर्धी संघवाद: विश्लेषण का तर्क है कि जहाँ “प्रतिस्पर्धी संघवाद” ने व्यापार करने में आसानी (Ease of doing business) में सुधार किया है, वहीं इसने सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में “सहकारी संघवाद” को कमजोर किया है।
- स्वायत्तता का क्षरण: राज्यों की उधारी सीमाओं पर केंद्रीय शर्तों को थोपना राज्य के वित्तीय प्रबंधन में “पिछले दरवाजे से प्रवेश” के रूप में वर्णित किया गया है।
- आगे की राह: संपादकीय विश्वास बहाल करने के लिए अंतर-राज्य परिषद को पुनर्जीवित करने और राज्यपालों की नियुक्ति पर सरकारिया आयोग की सिफारिशों को अपनाने का सुझाव देता है।
2. संरक्षकों की रक्षा: न्यायिक जवाबदेही
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (न्यायपालिका; शासन के महत्वपूर्ण पहलू; जवाबदेही)।
- संदर्भ: न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता किए बिना उच्च न्यायपालिका के भीतर कदाचार के आरोपों को संबोधित करने के लिए एक औपचारिक तंत्र की आवश्यकता पर चर्चा।
- मुख्य बिंदु:
- इन-हाउस प्रक्रिया की सीमाएँ: न्यायाधीशों की जांच के लिए वर्तमान “इन-हाउस” तंत्र की पारदर्शिता और सार्वजनिक विश्वास की कमी के लिए आलोचना की जाती है।
- महाभियोग की बाधाएं: महाभियोग (Impeachment) की संवैधानिक प्रक्रिया को इसकी अत्यधिक राजनीतिक प्रकृति और कठोर आवश्यकताओं के कारण “व्यावहारिक रूप से असंभव” बताया गया है।
- ‘अंकल जज’ सिंड्रोम: संपादकीय न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद (Nepotism) और इसके परिणामस्वरूप “कॉलेजियम बनाम सरकार” के गतिरोध पर चिंता व्यक्त करता है।
- न्यायिक मानक विधेयक: न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों के निपटान के लिए ‘न्यायिक मानक और जवाबदेही विधेयक’ के समान एक वैधानिक ढांचे की फिर से मांग की गई है।
- UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता” और “चेक्स एंड बैलेंसेज” (नियंत्रण और संतुलन)।
- विस्तृत विश्लेषण:
- पारदर्शिता बनाम स्वतंत्रता: लेख का तर्क है कि जवाबदेही स्वतंत्रता की दुश्मन नहीं है; बल्कि, “बंद कमरे” वाला दृष्टिकोण अक्सर कार्यपालिका के हस्तक्षेप को आमंत्रित करता है।
- आचार संहिता: कानूनी आवश्यकताओं से परे, संपादकीय सेवानिवृत्ति के बाद की नौकरियों और सार्वजनिक व्यस्तताओं के संबंध में एक कड़ाई से लागू नैतिक संहिता की आवश्यकता पर जोर देता है।
3. AI छलनी: ExoMiner++ के साथ नई दुनिया की खोज
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी; आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस)।
- संदर्भ: नासा (NASA) द्वारा ‘ExoMiner++’ जारी करना, जो कि केपलर और TESS मिशन डेटा से ‘एक्सोप्लैनेट’ (सौर मंडल के बाहर के ग्रह) के उम्मीदवारों को सत्यापित करने के लिए डिज़ाइन किया गया एक ओपन-सोर्स AI मॉडल है।
- मुख्य बिंदु:
- संकेतों में अंतर: AI मॉडल वास्तविक ‘ग्रहीय पारगमन’ (किसी तारे की चमक में गिरावट) को बाइनरी सितारों या बैकग्राउंड शोर जैसे झूठे संकेतों से अलग करने में मदद करता है।
- व्याख्यात्मक AI (Explainable AI): “ब्लैक-बॉक्स” मॉडल के विपरीत, ExoMiner++ खगोलविदों को एक स्कोर और यह जानकारी प्रदान करता है कि उसने किसी सिग्नल को ग्रह के रूप में क्यों वर्गीकृत किया।
- सफलता: इस मॉडल ने केपलर डेटा से 370 नए एक्सोप्लैनेट को पहले ही सत्यापित कर दिया है जो संदिग्ध संकेतों के कारण “वैज्ञानिक अधर” में फंसे हुए थे।
- TESS और भविष्य: उपकरण ने TESS डेटा में 7,000 संभावित उम्मीदवारों की पहचान की है और भविष्य के नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप के लिए इसके महत्वपूर्ण होने की उम्मीद है।
- UPSC प्रासंगिकता: “अंतरिक्ष अन्वेषण में AI के अनुप्रयोग”, “विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग” और “खगोल विज्ञान में वर्तमान विकास”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- डेटा का लोकतंत्रीकरण: सॉफ्टवेयर को गिटहब (GitHub) पर ओपन-सोर्स बनाकर, नासा वैश्विक शोधकर्ताओं को एल्गोरिदम को परिष्कृत करने और उन्हें विभिन्न डेटासेट पर लागू करने की अनुमति दे रहा है।
4. वायरस के साथ जीना: डेंगू की स्थानिकता (Endemicity)
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे)।
- संदर्भ: भारत की बदलती सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया की समीक्षा, क्योंकि डेंगू शहरी केंद्रों में एक मौसमी प्रकोप से बदलकर साल भर रहने वाले “स्थानिक खतरे” (Endemic threat) में बदल रहा है।
- मुख्य बिंदु:
- वायरस की निरंतरता: वर्षा के बदलते पैटर्न और तेजी से अनियोजित शहरीकरण ने ‘एडिस एजिप्टी’ मच्छर के लिए स्थायी प्रजनन स्थल बना दिए हैं।
- स्ट्रेन विविधता: डेंगू के सभी चार सीरोटाइप (DENV-1 से 4) का एक साथ प्रसार एंटीबॉडी-डिपेंडेंट एन्हांसमेंट के कारण ‘गंभीर डेंगू’ के जोखिम को बढ़ाता है।
- टीकाकरण की बाधाएं: यद्यपि वैश्विक स्तर पर ‘क्यूडेंगा’ (Qdenga) जैसे टीके मौजूद हैं, भारत की विशिष्ट सीरोटाइप स्थिति के लिए स्थानीय नैदानिक परीक्षणों और एक सतर्क रोलआउट रणनीति की आवश्यकता है।
- सामुदायिक उदासीनता: संपादकीय नोट करता है कि जल-निकासी (ठहरे हुए पानी को हटाना) सरकारी दृष्टिकोण के रूप में विफल रहा है, इसके लिए अब एक “जन आंदोलन” की आवश्यकता है।
- UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन”, “शहरी नियोजन और स्वास्थ्य” और “महामारी विज्ञान के रुझान”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- जीनोम अनुक्रमण: लेख विभिन्न स्ट्रेन की घातकता को ट्रैक करने और भविष्य के प्रसार पैटर्न की भविष्यवाणी करने के लिए जीनोमिक निगरानी बढ़ाने की वकालत करता है।
- एकीकृत वाहक प्रबंधन: फॉगिंग (जो काफी हद तक दिखावटी है) से आगे बढ़ते हुए, ध्यान ‘वोल्बाचिया’ (Wolbachia) बैक्टीरिया से संक्रमित मच्छरों जैसे जैविक नियंत्रणों पर केंद्रित होना चाहिए।
5. डेटा पॉइंट: ग्रामीण उपभोग की नब्ज (The Pulse of Rural Consumption)
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; गरीबी और विकास संबंधी मुद्दे)।
- संदर्भ: हालिया FMCG बिक्री आंकड़ों का विश्लेषण जो लंबे समय के ठहराव के बाद ग्रामीण मांग में सुधार के संकेत दे रहा है।
- मुख्य बिंदु:
- वॉल्यूम ग्रोथ: दो वर्षों में पहली बार ग्रामीण बाजारों ने वॉल्यूम ग्रोथ (बिक्री की मात्रा) में शहरी बाजारों को पीछे छोड़ दिया है, जिसका मुख्य कारण छोटे और सस्ते पैकेट (Lower-unit-price packs) हैं।
- मजदूरी का अंतराल: वॉल्यूम में वृद्धि के बावजूद, वास्तविक ग्रामीण मजदूरी (महंगाई के लिए समायोजित) लगभग स्थिर बनी हुई है, जिससे पता चलता है कि खपत बढ़ती अमीरी के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।
- मानसून का प्रभाव: यह सुधार “सामान्य” मानसून के पूर्वानुमान पर निर्भर है, जो कृषि आय को स्थिर करता है और खाद्य मुद्रास्फीति को कम करता है।
- FMCG रणनीति: कंपनियां अब ग्रामीण मध्यम वर्ग की मांग को पकड़ने के लिए “ब्रिज पैक्स” (मध्यम आकार के उत्पादों) पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “ग्रामीण-शहरी आर्थिक विभाजन”, “उपभोग पैटर्न” और “FMCG क्षेत्र एक आर्थिक संकेतक के रूप में”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- K-आकार की रिकवरी: डेटा शहरी क्षेत्रों में प्रीमियम खपत और ग्रामीण क्षेत्रों में मूल्य-आधारित खपत के बीच बढ़ते अंतर को दर्शाता है, जो बताता है कि सुधार सभी आय स्तरों पर समान नहीं है।
- सुरक्षा के रूप में मनरेगा: संपादकीय जोर देता है कि निजी निवेश बढ़ने तक इस उपभोग की गति को बनाए रखने के लिए ग्रामीण रोजगार योजनाओं (MGNREGA) पर निरंतर सरकारी खर्च महत्वपूर्ण है।
संपादकीय विश्लेषण
02 जनवरी, 2026ओपन-सोर्स AI ने 370 नए एक्सोप्लैनेट्स की पुष्टि की। ग्रहीय पारगमन और बैकग्राउंड शोर के बीच अंतर करने के लिए ‘एक्सप्लेनेबल AI’ की ओर बदलाव।
डेंगू अब साल भर रहने वाला खतरा बन गया है। 4 सेरोटाइप के एक साथ सक्रिय होने से जोखिम चरम पर है। अब ध्यान ‘वोल्बाचिया’ जैसे जैविक नियंत्रणों पर होना चाहिए।
ग्रामीण विकास शहरी क्षेत्रों से आगे है; हालाँकि, वास्तविक मजदूरी स्थिर बनी हुई है, जो दर्शाती है कि उपभोग धन के बजाय आवश्यकता से प्रेरित है।
कर्तव्य की नैतिकता
Mapping:
यहाँ भारत के प्रमुख ऊर्जा संसाधनों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। यह UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है, क्योंकि यह भारत की आर्थिक और औद्योगिक नींव को समझने के लिए अनिवार्य है।
1. कोयला क्षेत्र (कोयला – ‘काला सोना’)
भारत में कोयला मुख्य रूप से गोंडवाना (Gondwana) और टर्शियरी (Tertiary) चट्टानों में पाया जाता है। मानचित्रण के लिए पूर्वी और मध्य भारत की “कोयला पेटियों” पर ध्यान केंद्रित करें।
- गोंडवाना कोयला (98% भंडार): यह दामोदर, महानदी, सोन और गोदावरी नदी घाटियों में पाया जाता है।
- झरिया (झारखंड): भारत का सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र; उच्च गुणवत्ता वाले ‘कोकिंग कोल’ के लिए प्रसिद्ध।
- रानीगंज (पश्चिम बंगाल): भारत में खोली गई पहली कोयला खदान।
- बोकारो और गिरिडीह (झारखंड): इस्पात उद्योग के लिए प्रमुख केंद्र।
- कोरबा (छत्तीसगढ़): एक विशाल ‘ओपन-कास्ट’ (खुली खदान) खनन केंद्र।
- सिंगरेनी (तेलंगाना): देश के दक्षिणी भाग का एकमात्र प्रमुख कोयला क्षेत्र।
- टर्शियरी कोयला (लिग्नाइट):
- नेवेली (तमिलनाडु): भारत में लिग्नाइट (भूरा कोयला) का सबसे महत्वपूर्ण भंडार।
2. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
पेट्रोलियम का मानचित्रण तटीय और उत्तरी क्षेत्रों की अवसादी चट्टानों (Sedimentary rocks) में स्थित ‘अपतटीय’ और ‘स्थलीय’ बेसिनों को कवर करता है।
- पश्चिमी अपतटीय (Western Offshore):
- मुंबई हाई: अरब सागर में स्थित भारत का सबसे बड़ा पेट्रोलियम क्षेत्र।
- बसीन (Bassein): मुंबई हाई के दक्षिण में स्थित, प्राकृतिक गैस के लिए प्रसिद्ध।
- पूर्वी स्थलीय/अपतटीय (Eastern Onshore/Offshore):
- डिगबोई (असम): भारत का सबसे पुराना तेल कुआं (19वीं शताब्दी में खोदा गया)।
- नहरकटिया और मोरन-हुग्रीजन (असम): उत्तर-पूर्व के अन्य प्रमुख तेल क्षेत्र।
- KG बेसिन (कृष्णा-गोदावरी): बंगाल की खाड़ी में स्थित एक प्रमुख गहरा जल गैस भंडार।
- उत्तर-पश्चिमी स्थलीय (North-Western Onshore):
- अंकलेश्वर और कलोल (गुजरात): खंभात (Cambay) बेसिन के प्रमुख क्षेत्र।
- बाड़मेर बेसिन (राजस्थान): यहाँ ‘मंगला’ तेल क्षेत्र स्थित है, जो भारत की सबसे बड़ी स्थलीय खोजों में से एक है।
3. परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plants)
परमाणु ऊर्जा का मानचित्रण आपके 2026 की तैयारी के “विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी” और “पर्यावरण” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।
| संयंत्र का नाम | राज्य | महत्व |
| नरोरा | उत्तर प्रदेश | गंगा नदी के पास उपजाऊ गंगा के मैदानों में स्थित। |
| रावतभाटा | राजस्थान | चंबल नदी पर राणा प्रताप सागर बांध के पास स्थित। |
| काकरापार | गुजरात | सूरत के पास औद्योगिक पट्टी में स्थित। |
| तारापुर | महाराष्ट्र | भारत का पहला व्यावसायिक परमाणु ऊर्जा केंद्र (1969 में स्थापित)। |
| कैगा | कर्नाटक | पश्चिमी घाट में स्थित; दक्षिणी ग्रिड के लिए महत्वपूर्ण। |
| कलपक्कम (MAPS) | तमिलनाडु | भारत का पहला पूर्णतः स्वदेशी परमाणु ऊर्जा केंद्र। |
| कुडनकुलम | तमिलनाडु | भारत का सबसे बड़ी क्षमता वाला परमाणु संयंत्र (VVER रिएक्टर)। |
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| श्रेणी | मानचित्रण मुख्य बिंदु | मुख्य स्थान |
| सबसे बड़ा कोयला क्षेत्र | झरिया | झारखंड |
| सबसे पुराना तेल क्षेत्र | डिगबोई | असम |
| पहला परमाणु संयंत्र | तारापुर | महाराष्ट्र |
| सबसे बड़ा परमाणु संयंत्र | कुडनकुलम | तमिलनाडु |
💡 मैपिंग टिप:
ऊर्जा संसाधनों को याद रखने के लिए उन्हें प्रमुख औद्योगिक गलियारों (Industrial Corridors) के साथ जोड़कर देखें। उदाहरण के लिए, झारखंड-छत्तीसगढ़ बेल्ट भारत के ‘लौह-इस्पात’ उद्योग को ऊर्जा प्रदान करती है। मानचित्र पर इन केंद्रों की उत्तर-से-दक्षिण स्थिति को जरूर चिह्नित करें।
मानचित्रण विवरण
भारत के ऊर्जा संसाधनप्रमुख स्थलों में तारापुर (MH), भारत का पहला स्टेशन, और कुडनकुलम (TN), उच्चतम क्षमता वाला संयंत्र शामिल हैं। नरौरा गंगा के मैदानों में एक प्रमुख उत्तरी केंद्र है।
KG बेसिन एक प्रमुख गहरे पानी का गैस भंडार है। ऑनशोर में, बाड़मेर बेसिन (RJ) मंगला क्षेत्र का घर है, जबकि अंकलेश्वर गुजरात में एक प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र के रूप में कार्य करता है।
सबसे महत्वपूर्ण भूरा कोयला (लिग्नाइट) भंडार नेवेली (तमिलनाडु) में स्थित है, जो दक्षिणी पावर ग्रिड के लिए आवश्यक है।