यह अध्याय “ईश्वर से अनुराग” आठवीं शताब्दी के बाद से विकसित हुए विभिन्न भक्ति और सूफी आंदोलनों की व्याख्या करता है, जिन्होंने ईश्वर के प्रति प्रेम और सामाजिक भेदभाव के त्याग पर जोर दिया।

बड़े राज्यों के उदय से पहले लोग स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा करते थे। जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़े, नए विचार पैदा हुए:

  • पुनर्जन्म का चक्र: यह विश्वास व्यापक हो गया कि सभी जीव अपने अच्छे और बुरे कर्मों के आधार पर जन्म और पुनर्जन्म के चक्रों से गुजरते हैं।
  • सामाजिक असमानता: यह विचार कि सामाजिक विशेषाधिकार किसी “कुलीन” परिवार या “ऊँची” जाति में जन्म लेने से मिलते हैं, बहुत प्रबल हो गया।
  • व्यक्तिगत भक्ति: कई लोग सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए बुद्ध या जैनों की शिक्षाओं की ओर मुड़े। अन्य लोग ‘भक्ति’ के विचार से आकर्षित हुए, जिसमें एक परमेश्वर तक प्रेम और समर्पण के माध्यम से पहुँचा जा सकता था। यह विचार ‘भगवद्गीता’ में लोकप्रिय हुआ।

सातवीं से नौवीं शताब्दी के बीच, दक्षिण में नए धार्मिक आंदोलनों का नेतृत्व नयनारों और अलवारों ने किया।

  • संत: नयनार (शिव के भक्त) और अलवार (विष्णु के भक्त) सभी जातियों से आए थे, जिनमें पुलैयार और पनार जैसी “अस्पृश्य” मानी जाने वाली जातियों के लोग भी शामिल थे।
  • दर्शन: उन्होंने मुक्ति के मार्ग के रूप में शिव या विष्णु के प्रति गहरे प्रेम का उपदेश दिया। वे विभिन्न गाँवों में घूमते थे और स्थानीय मंदिरों में स्थापित देवताओं की प्रशंसा में सुंदर कविताएँ रचते थे।
  • मंदिर निर्माण: दसवीं और बारहवीं शताब्दी के बीच, चोल और पांड्य राजाओं ने उन धार्मिक स्थलों पर भव्य मंदिर बनवाए जहाँ इन संत-कवियों ने यात्रा की थी, जिससे भक्ति परंपरा और मंदिर पूजा के बीच संबंध मजबूत हुए।
  • शंकर (8वीं शताब्दी): केरल में जन्मे शंकर ‘अद्वैतवाद’ के समर्थक थे। इसके अनुसार जीवात्मा और परमात्मा दोनों एक ही हैं। उन्होंने सिखाया कि संसार एक ‘माया’ (भ्रम) है और उन्होंने ज्ञान के लिए संन्यास का मार्ग अपनाने का उपदेश दिया।
  • रामानुज (11वीं शताब्दी): तमिलनाडु में जन्मे रामानुज अलवार संतों से बहुत प्रभावित थे। उनके अनुसार मुक्ति प्राप्त करने का सबसे अच्छा साधन विष्णु के प्रति अनन्य भक्ति भाव रखना है। उन्होंने ‘विशिष्टाद्वैत’ के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जिसके अनुसार आत्मा, परमात्मा से जुड़ने के बाद भी अपनी अलग सत्ता बनाए रखती है।

वीरशैव आंदोलन की शुरुआत बसवन्ना और उनके साथियों (अल्लम प्रभु और अक्कमहादेवी) ने 12वीं शताब्दी के मध्य में कर्नाटक में की थी।

  • मान्यताएँ: उन्होंने सभी मनुष्यों की समानता के लिए और जाति व महिलाओं के प्रति व्यवहार के बारे में ब्राह्मणवादी विचारों के विरुद्ध तर्क दिया।
  • कर्मकांड: वे सभी प्रकार के कर्मकांडों और मूर्ति पूजा के विरोधी थे।

तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम जैसे संत-कवियों तथा सखूबाई जैसी महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  • विट्ठल भक्ति: यह परंपरा पंढरपुर में भगवान विट्ठल (विष्णु का एक रूप) की पूजा पर केंद्रित थी।
  • कर्मकांडों का त्याग: इन संतों ने सभी प्रकार के कर्मकांडों, पवित्रता के बाहरी प्रदर्शन और जन्म पर आधारित सामाजिक अंतरों को खारिज कर दिया। उन्होंने अपने परिवारों के साथ रहने, रोजी-रोटी कमाने और जरूरतमंद साथी मनुष्यों की सेवा करने को प्राथमिकता दी।

इस काल में कई धार्मिक समूहों ने पारंपरिक धर्म और सामाजिक व्यवस्था की आलोचना की।

  • मुक्ति का मार्ग: उन्होंने संसार का त्याग करने (संन्यास) की वकालत की और माना कि निराकार परम सत्य का चिंतन और ध्यान ही मुक्ति का मार्ग है।
  • अभ्यास: इसके लिए उन्होंने योगासन, प्राणायाम और ध्यान जैसी क्रियाओं के माध्यम से मन और शरीर को प्रशिक्षित करने पर जोर दिया।

सूफी मुसलमान रहस्यवादी थे। उन्होंने बाहरी धार्मिकता को खारिज कर दिया और ईश्वर के प्रति प्रेम व भक्ति तथा सभी मनुष्यों के प्रति दया भाव पर बल दिया।

  • ईश्वर से मिलन: सूफियों का मानना था कि दुनिया को देखने के लिए दिल को प्रशिक्षित किया जा सकता है। उन्होंने ज़िक्र (नाम का जाप), चिंतन और समा (गाना) जैसे प्रशिक्षण के विस्तृत तरीके विकसित किए।
  • सिलसिले: सूफी गुरुओं की वंशावली को सिलसिला कहा जाता था। भारत में चिश्ती सिलसिला सबसे प्रभावशाली था, जिसमें ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती और निजामुद्दीन औलिया जैसे महान शिक्षक हुए।

तेरहवीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत में भक्ति आंदोलन की एक शक्तिशाली लहर आई।

  • कबीर: सबसे प्रभावशाली संतों में से एक, उनका पालन-पोषण वाराणसी के एक मुस्लिम बुनकर (जुलाहा) परिवार में हुआ था। उनके विचार ‘साखी’ और ‘पद’ नामक छंदों के संग्रह में मिलते हैं। वे निराकार परमेश्वर में विश्वास करते थे और उन्होंने जाति व्यवस्था व बाहरी पूजा के सभी रूपों को खारिज कर दिया।
  • बाबा गुरु नानक (1469–1539): उन्होंने करतारपुर में एक केंद्र स्थापित किया। उनकी शिक्षाओं ने एक ईश्वर की उपासना और ईमानदारी से जीवन जीने पर जोर दिया। उन्होंने अपनी शिक्षाओं के सार के लिए नाम, दान और इस्रान शब्दों का प्रयोग किया। उनके भजनों को ‘गुरु ग्रंथ साहिब’ में संकलित किया गया है।
  • मीराबाई: मेवाड़ के राजघराने की एक राजपूत राजकुमारी, वे ‘अस्पृश्य’ मानी जाने वाली जाति के संत रविदास की शिष्या बनीं। उनके गीतों ने “ऊँची” जातियों के मानदंडों को खुली चुनौती दी और वे आम जनता के बीच बहुत लोकप्रिय हुए।
  1. अद्वैतवाद: जीवात्मा और परमात्मा के एक होने का सिद्धांत।
  2. विशिष्टाद्वैत: आत्मा के परमात्मा से मिलने के बाद भी अपनी पहचान बनाए रखने का सिद्धांत।
  3. खानकाह: सूफी संस्था जहाँ सूफी संत अक्सर रहते थे और चर्चा करते थे।
  4. तांडा: बंजारों का समूह।

🪕 ईश्वर से अनुराग

🕉️ दक्षिण में भक्ति
इसका नेतृत्व नयनारों (शिव भक्त) और अलवारों (विष्णु भक्त) ने किया, जिन्होंने जातिवाद को नकारा। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद (परमात्मा से एकता) और रामानुज ने भक्ति को मोक्ष का मार्ग बताया।
🕌 सूफ़ी रहस्यवाद
सूफ़ी संतों ने ईश्वर के प्रति प्रेम और दया पर जोर दिया। वे ज़िक्र (नाम का जाप) और समा (गायन) का उपयोग करते थे। निज़ामुद्दीन औलिया जैसे संतों के कारण चिश्ती सिलसिला भारत में अत्यधिक प्रभावी हुआ।
🧘 विद्रोही विचारक
कर्नाटक के वीरशैवों ने समानता के लिए संघर्ष किया। नाथपंथी और योगियों जैसे समूहों ने संसार का त्याग कर योगासनों और प्राणायाम के माध्यम से निराकार परम सत्य के ध्यान की वकालत की।
📖 उत्तर भारत के संत
कबीर ने बाहरी आडंबरों को ठुकराया। बाबा गुरु नानक ने करतारपुर केंद्र बनाया और ‘नाम, दान और इस्रान’ की शिक्षा दी। राजपूत राजकुमारी मीराबाई ने अपने भजनों से उच्च जातियों के नियमों को चुनौती दी।
साझा संदेश मध्यकालीन संतों ने कर्मकांडों और सामाजिक भेदभाव को त्याग कर साधारण लोगों के बीच रहने और क्षेत्रीय भाषाओं में अपनी भक्ति व्यक्त करने को प्राथमिकता दी।
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कक्षा-7 इतिहास अध्याय-8 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: ईश्वर से अनुराग

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यहाँ भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) के अंतर्गत मौलिक अधिकार (FR) एवं नीति निदेशक तत्वों (DPSP) की तुलना और मौलिक कर्तव्यों का विस्तृत विवरण दिया गया है:

संविधान के भाग III (FR) और भाग IV (DPSP) के बीच का संबंध समय के साथ उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों के माध्यम से विकसित हुआ है। जहाँ मौलिक अधिकार व्यक्तिगत और वाद-योग्य हैं, वहीं DPSP समाजवादी और अवाद-योग्य हैं।

विशेषतामौलिक अधिकार (भाग III)नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
प्रकृतिनकारात्मक (राज्य को कुछ करने से रोकना)।सकारात्मक (राज्य को कुछ करने का निर्देश देना)।
न्यायिकतावाद-योग्य (अदालत द्वारा प्रवर्तनीय)।अवाद-योग्य (अदालत द्वारा अप्रवर्तनीय)।
उद्देश्यराजनीतिक लोकतंत्र की स्थापना।सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना।
कानूनी स्थितिसामान्यतः DPSP से वरिष्ठ।सामान्यतः FR के अधीनस्थ (Subordinate)।
  1. चंपकम दोराईराजन मामला (1951): सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं। यदि DPSP को लागू करने के लिए बनाया गया कोई कानून FR का उल्लंघन करता है, तो वह कानून शून्य होगा। DPSP को FR के “सहायक” के रूप में काम करना चाहिए।
  2. गोलकनाथ मामला (1967): कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकार “पवित्र” हैं और DPSP के कार्यान्वयन के लिए उन्हें कम नहीं किया जा सकता।
  3. 25वाँ संशोधन अधिनियम (1971): संसद ने अनुच्छेद 31C पेश किया, जिसमें कहा गया कि अनुच्छेद 39(b) और 39(c) को लागू करने के लिए बनाए गए कानूनों को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे अनुच्छेद 14 या 19 का उल्लंघन करते हैं।
  4. मिनर्वा मिल्स मामला (1980): सुप्रीम कोर्ट ने “सामंजस्य का सिद्धांत” (Doctrine of Harmony) स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान भाग III और भाग IV के बीच संतुलन की आधारशिला पर टिका है। एक को दूसरे पर पूर्ण प्राथमिकता देना संविधान की मूल संरचना को बिगाड़ देगा।

मौलिक कर्तव्य मूल संविधान का हिस्सा नहीं थे। इन्हें आपातकाल के दौरान नागरिकों को यह याद दिलाने के लिए जोड़ा गया था कि अधिकारों के साथ-साथ उनके कुछ कर्तव्य भी हैं।

  • संदर्भ: सरकार ने राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान मौलिक कर्तव्यों पर सिफारिशें देने के लिए इस समिति का गठन किया।
  • परिणाम: इसकी सिफारिशों के आधार पर 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1976) पारित किया गया।
  • नया जोड़: संविधान में एक नया भाग IV-A और एक अकेला अनुच्छेद 51A जोड़ा गया।
  • स्रोत: यह पूर्व सोवियत संघ (USSR – अब रूस) के संविधान से प्रेरित है।

मूल रूप से 10 कर्तव्य थे; 11वाँ बाद में जोड़ा गया।

  1. संविधान का पालन करना और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करना।
  2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखना और उनका पालन करना।
  3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करना और उसे अक्षुण्ण रखना।
  4. देश की रक्षा करना और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना।
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करना; महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध प्रथाओं का त्याग करना।
  6. हमारी सामासिक संस्कृति (Composite Culture) की समृद्ध विरासत का महत्व समझना और उसका परिरक्षण करना।
  7. प्राकृतिक पर्यावरण (वन, झील, नदी और वन्यजीव) की रक्षा करना और उसका संवर्धन करना।
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करना।
  9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखना और हिंसा से दूर रहना।
  10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करना।
  11. 6 से 14 वर्ष तक की आयु के अपने बच्चे को शिक्षा के अवसर प्रदान करना (इसे 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा जोड़ा गया)।
कर्तव्य का केंद्रयाद रखने के लिए कीवर्ड
ध्वज/गानसम्मान (Respect)
स्वतंत्रता संग्रामआदर्श (Ideals)
संप्रभुताएकता की रक्षा
राष्ट्रीय सेवादेश की रक्षा
भाईचारासमरसता
संस्कृतिविरासत (Heritage)
पर्यावरणवन्यजीव/नदियाँ
विज्ञानवैज्ञानिक दृष्टिकोण
संपत्तिसार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा
उत्कृष्टतासर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन
बच्चों की शिक्षा6-14 वर्ष की आयु (86वां संशोधन)
  • अवाद-योग्य (Non-Justiciable): DPSP की तरह, मौलिक कर्तव्य भी कानून द्वारा तब तक लागू नहीं किए जा सकते जब तक कि संसद उनके लिए कोई विशेष कानून न बनाए (जैसे राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम)।
  • केवल नागरिकों के लिए: कुछ मौलिक अधिकारों के विपरीत (जो विदेशियों पर भी लागू होते हैं), मौलिक कर्तव्य केवल भारत के नागरिकों के लिए हैं।

⚖️ FR और DPSP में संतुलन

विशेषता मूल अधिकार (भाग III) निदेशक तत्व (भाग IV)
प्रकृतिनकारात्मक (राज्य पर रोक)सकारात्मक (राज्य को निर्देश)
न्यायिकतावाद-योग्य (अदालत द्वारा प्रवर्तनीय)गैर-वादयोग्य
लक्ष्यराजनीतिक लोकतंत्रसामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र
प्राथमिकतासामान्यतः उच्च और पवित्रमूल अधिकारों के पूरक
📜 गोलकनाथ मामला (1967)
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मूल अधिकार अलंघनीय हैं और निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए भी इनमें कटौती नहीं की जा सकती।
🤝 मिनर्वा मिल्स (1980)
कोर्ट ने सामंजस्य का सिद्धांत दिया। संविधान भाग III और भाग IV के बीच संतुलन की बुनियाद पर खड़ा है।
विधिक तथ्य अनुच्छेद 31C के अनुसार, अनु. 39(b) और 39(c) को लागू करने वाले कानून अनु. 14 या 19 का उल्लंघन होने पर भी मान्य होंगे।

🇮🇳 मूल कर्तव्य (अनुच्छेद 51A)

✍️ उत्पत्ति और स्रोत
42वें संशोधन (1976) द्वारा स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर जोड़े गए। ये पूर्व सोवियत संघ (USSR) से प्रेरित हैं। भाग IV-A बनाया गया।
🛡️ दायरा और प्रकृति
DPSP की तरह ये भी गैर-वादयोग्य हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात: ये केवल नागरिकों पर लागू होते हैं, विदेशियों पर नहीं।
कर्तव्य का क्षेत्र मुख्य शब्द (Keyword) याद करने की ट्रिक
ध्वज/राष्ट्रगानसम्मानसंवैधानिक प्रतीकों का आदर
एकता/अखंडतासंप्रभुताभारत के मानचित्र की रक्षा
भाईचारासमरसतास्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध प्रथा त्यागना
पर्यावरणवन्यजीवझील, नदी और वनों का संरक्षण
ज्ञानवैज्ञानिक दृष्टिकोणजांच और सुधार की भावना
संपत्तिसार्वजनिक संपत्तिहिंसा से दूर रहना
शिक्षा6–14 वर्ष आयु86वें संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया
मुख्य नोट वर्तमान में कुल 11 मूल कर्तव्य हैं। 11वां कर्तव्य (शिक्षा का अवसर) शिक्षा के अधिकार (अनु. 21A) के साथ तालमेल के लिए जोड़ा गया था।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (23 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

  • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने भारत निर्वाचन आयोग (EC) से सवाल किया है कि क्या मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के लिए “अवैध सीमा पार आप्रवासन” (Illegal cross-border immigration) को स्पष्ट रूप से कारण बताया गया था, जिसके कारण लगभग 6.5 करोड़ नाम हटा दिए गए।
  • मुख्य बिंदु:
    • अस्पष्ट कारण: पीठ ने पाया कि SIR अधिसूचना में “बार-बार होने वाले प्रवास” (Frequent migration) को एक कारण बताया गया था, लेकिन 2003 के नागरिकता अधिनियम संशोधनों के तहत नागरिकता सत्यापन से जोड़ने वाला कोई “स्पष्ट उल्लेख” नहीं था।
    • न्यायिक स्पष्टीकरण: कोर्ट ने एक स्पष्ट अंतर बताया: भारत के भीतर “प्रवास” (Migration) एक मौलिक स्वतंत्रता है और हमेशा वैध है, जबकि “अवैध आप्रवासन” (Illegal immigration) में अंतर-देशीय आवाजाही शामिल है।
    • नागरिकों पर बोझ: कोर्ट ने उन लाखों लोगों (जिनमें नोबेल पुरस्कार विजेता और बुजुर्ग भी शामिल हैं) को होने वाले “अत्यधिक तनाव” को रेखांकित किया, जिन्हें अपनी पहचान साबित करने के लिए भौतिक सुनवाइयों में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
    • विवेकाधिकार की सीमाएँ: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि निर्वाचन आयोग के पास व्यापक विवेकाधिकार हैं, लेकिन वह निर्धारित मानदंडों से “पूरी तरह मुक्त” नहीं है और उसे निष्पक्षता से कार्य करना चाहिए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ”, “सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार” और “प्रशासनिक कार्यों की न्यायिक समीक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • अवैध प्रवासी की परिभाषा: 2003 में पेश की गई इस अवधारणा के अनुसार किसी मतदाता के माता-पिता दोनों का भारतीय नागरिक होना आवश्यक है; आयोग का तर्क है कि अनुच्छेद 324 उन्हें इसे सत्यापित करने का अधिकार देता है।
    • प्रक्रियात्मक सुधार: उत्तर प्रदेश के मतदाता अब निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर दस्तावेज अपलोड करके या अधिकृत प्रतिनिधियों के माध्यम से भौतिक सुनवाई से बच सकते हैं।
    • मताधिकार की पवित्रता: संपादकीय चेतावनी देता है कि वास्तविक मतदाताओं को ‘फॉर्म 6’ (नए मतदाताओं के लिए) के माध्यम से फिर से पंजीकरण करने के लिए मजबूर करना तर्कहीन है और उनके मतदान के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: भारत 2026 में अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) को एक एकीकृत जलवायु लचीलापन और हरित विकास रणनीति पर नेतृत्व करने का अवसर प्रदान करता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • बहुपक्षवाद को स्थिर करना: एक ऐसी दुनिया में जहाँ सहयोगी बहुपक्षवाद (जैसे अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से अमेरिका का हटना) तनाव में है, भारत ब्रिक्स को जलवायु कार्रवाई के लिए एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।
    • भू-राजनीतिक संतुलन: भारत को ब्रिक्स की “पश्चिम-विरोधी” छवि और अमेरिका के साथ अपने संबंधों के बीच संतुलन बनाना होगा, साथ ही अपनी रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित करनी होगी।
    • साझा चिंताएँ: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र की संवेदनशीलता और तटीय जोखिम जैसे जलवायु प्रभाव ब्रिक्स के सभी सदस्यों (जैसे ब्राजील, रूस, भारत, चीन) के लिए साझा चुनौतियाँ हैं।
    • विस्तार का प्रभाव: मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान और यूएई के शामिल होने के बाद ब्रिक्स अब वैश्विक जीडीपी का 40% और वैश्विक व्यापार का 26% प्रतिनिधित्व करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु परिवर्तन में वैश्विक नेतृत्व”, “भारत की बहु-संरेखण (Multi-alignment) रणनीति” और “दक्षिण-दक्षिण सहयोग”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जलवायु वित्त: विश्लेषण में सुझाव दिया गया है कि वैश्विक जलवायु वित्त को गति देने के लिए विश्व बैंक और आईएमएफ प्रमुखों को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल किया जाना चाहिए।
    • चीनी महत्वाकांक्षाओं का मुकाबला: ब्रिक्स के भीतर एक मजबूत भारतीय हरित एजेंडा पर्यावरण नेतृत्व की वैश्विक दौड़ में चीन को संतुलित करने का काम करेगा।
    • राजनयिक चतुराई: भारत को वैश्विक तेल भू-राजनीति और टैरिफ खतरों के बीच वाशिंगटन के साथ संबंधों को सुचारू रखते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ के हितों को आगे बढ़ाना होगा।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; द्विपक्षीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव)।

  • संदर्भ: दावोस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के “बोर्ड ऑफ पीस” (BoP) की उद्घाटन बैठक से भारत की अनुपस्थिति का विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • BoP की संरचना: इस बोर्ड का लक्ष्य संयुक्त राष्ट्र (UN) के प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरना है, जिसके अध्यक्ष ट्रंप हैं। इसमें गाजा संघर्ष को सुलझाने के लक्ष्य के बावजूद फिलिस्तीनी नेतृत्व को शामिल नहीं किया गया है।
    • सदस्यता के स्तर: एक विवादास्पद “दो-स्तरीय” प्रणाली के तहत $1 बिलियन की “फीस” देकर स्थायी सदस्यता का प्रस्ताव दिया गया है, जो एक बड़ी चिंता का विषय है।
    • क्षेत्रीय दबाव: पाकिस्तान, सऊदी अरब और यूएई के इसमें शामिल होने से भारत पर भी भागीदारी का दबाव है, बावजूद इसके कि इसकी संरचना स्पष्ट नहीं है।
    • कश्मीर का जोखिम: भारत के लिए एक बड़ा “खतरा” यह है कि ट्रंप कश्मीर विवाद को भी अपनी इस शांति योजना में शामिल कर सकते हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध”, “पश्चिम एशिया भू-राजनीति” और “बहुपक्षवाद की चुनौतियां” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रणनीतिक स्वायत्तता: संपादकीय सलाह देता है कि भारत को केवल “पीछे छूट जाने के डर” या अमेरिका की नाराजगी के डर से कार्य नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने भागीदारों से परामर्श करना चाहिए।
    • संयुक्त राष्ट्र के समानांतर: जहाँ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने गाजा प्रस्ताव के दूसरे चरण को मंजूरी दे दी है, BoP एकतरफा रूप से संयुक्त राष्ट्र के कार्यों को प्रतिस्थापित करता प्रतीत हो रहा है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन)।

  • संदर्भ: उत्तराखंड के पारिस्थितिक रूप से नाजुक और आपदा-प्रवण क्षेत्रों में चार धाम सड़क परियोजना के लिए लगभग 7,000 देवदार (Deodar) के पेड़ों को काटने के फैसले का आलोचनात्मक विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • दोषपूर्ण मानक: यह परियोजना ‘डबल लेन विद पेव्ड शोल्डर’ (DL-PS) मानक का उपयोग करती है, जो अस्थिर ढलानों पर भी 12 मीटर की चौड़ाई अनिवार्य बनाती है, जहाँ बड़े निर्माण की मनाही होनी चाहिए।
    • पारिस्थितिक क्षति: पेड़ों के नुकसान के अलावा, सड़क चौड़ी करने के कारण 700 किलोमीटर के दायरे में 800 से अधिक नए सक्रिय भूस्खलन क्षेत्र बन गए हैं।
    • जड़ प्रणाली के लाभ: देवदार के जंगल ढलानों को स्थिर करते हैं, भूस्खलन रोकते हैं और हिमस्खलन (Avalanches) के खिलाफ प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं।
    • जल गुणवत्ता: ये जंगल अपनी लकड़ी और छाल में मौजूद सूक्ष्मजीव-रोधी गुणों के कारण गंगा के पानी की गुणवत्ता भी बनाए रखते हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)”, “सतत पर्वतीय विकास” और “हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के लिए राष्ट्रीय मिशन (NMSHE)”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नियमों का उल्लंघन: परियोजना का कार्यान्वयन इस बात का उदाहरण है कि निर्माण कैसे नहीं किया जाना चाहिए, जिसमें व्यापक EIA की अनदेखी और खड़ी पहाड़ियों की कटाई शामिल है।
    • जोखिमों में वृद्धि: जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च-ऊंचाई वाले क्षेत्र वैश्विक औसत से 50% अधिक तेज़ी से गर्म हो रहे हैं, जो वनों की कटाई के साथ मिलकर विनाशकारी बाढ़ और भूस्खलन को बढ़ावा देता है।
    • स्थानीय प्रतिक्रिया: बार-बार होने वाले भूस्खलन और क्षति के कारण स्थानीय लोग इस ‘ऑल-वेदर रोड’ को मज़ाक में “ऑल-पैदल” रोड कहने लगे हैं।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; समावेशी विकास)।

  • संदर्भ: घरेलू वित्त आंकड़ों का विश्लेषण, जो बताता है कि भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता तेजी से ‘घरेलू कर्ज’ (Household Debt) पर निर्भर होती जा रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • बढ़ता कर्ज: घरेलू कर्ज 2021 में जीडीपी के 36% से बढ़कर मार्च 2025 तक 41.3% हो गया है; हालाँकि यह अन्य देशों की तुलना में कम है, लेकिन यह घरेलू आय के तनाव को छिपा देता है।
    • उपभोग के लिए कर्ज: क्रेडिट (कर्ज) का उपयोग तेजी से आय-व्यय के अंतर को पाटने के लिए किया जा रहा है, न कि संपत्ति निर्माण के लिए। यह स्थिर वास्तविक आय वृद्धि का विकल्प बनता जा रहा है।
    • बचत में कमी: शुद्ध वित्तीय बचत में भारी उतार-चढ़ाव आया है, जो इंगित करता है कि बचत का एक बड़ा हिस्सा नए कर्ज को चुकाने में जा रहा है।
    • जोखिम का हस्तांतरण: राजकोषीय नीतियां जो पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देती हैं और राजस्व व्यय को सीमित करती हैं, वे अनजाने में आर्थिक जोखिम को राज्य से हटाकर परिवारों पर स्थानांतरित कर रही हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय नीति”, “मौद्रिक नीति का संचरण” और “समाज कल्याण अर्थशास्त्र” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संवेदनशील समूह: कम आय वाले समूहों के लिए रोजगार के अवसरों की कमी और आय में वृद्धि न होना, मध्यम ऋण स्तर को भी भेद्यता (Vulnerability) का एक बड़ा स्रोत बना देता है।
    • बजट 2026 का कार्य: आगामी बजट के लिए मुख्य कार्य लोगों की ‘खर्च करने योग्य आय’ (Disposable Income) बढ़ाकर और श्रम-प्रधान रोजगार पैदा करके संतुलन बहाल करना है।

संपादकीय विश्लेषण

23 जनवरी, 2026
GS-2 राजव्यवस्था
🗳️ चुनाव आयोग पर SC: विवेक बनाम संवैधानिक स्वतंत्रता
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग (ECI) से SIR के दौरान 6.5 करोड़ नामों के विलोपन पर सवाल किए। पीठ ने “आंतरिक प्रवासन” (वैध) और “अवैध आप्रवासन” के बीच अंतर स्पष्ट किया। आलोचना: वास्तविक मतदाताओं को “अत्यधिक दबाव” में नागरिकता साबित करने के लिए मजबूर करना मताधिकार की पवित्रता का उल्लंघन है।
GS-2 अंत. संबंध
🌍 ब्रिक्स 2026: भारत का हरित नेतृत्व
भारत 2026 में ब्रिक्स की मेजबानी के लिए तैयार है, जो वैश्विक GDP के 40% का प्रतिनिधित्व करता है। रणनीति: NDB के माध्यम से जलवायु वित्त और ग्लोबल साउथ के लचीलेपन के लिए ब्रिक्स को एक स्थिर शक्ति के रूप में स्थापित करना, जबकि अमेरिकी टैरिफ खतरों व चीनी महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना।
GS-2 अंत. संबंध
🏳️ बोर्ड ऑफ पीस: $1 बिलियन की सदस्यता
दावोस में संयुक्त राष्ट्र के प्रतिद्वंद्वी के रूप में ट्रम्प के “बोर्ड ऑफ पीस” (BoP) का परिचय, जहाँ स्थायी सीटों के लिए $1 बिलियन शुल्क का प्रस्ताव है। भारत के लिए जोखिम: BoP के जनादेश का कश्मीर विवाद तक विस्तार होने की संभावना, जो संयुक्त राष्ट्र के कार्यों को दरकिनार कर सकता है।
GS-3 पर्यावरण
🌲 हिमालयी पारिस्थितिकी विनाश: चारधाम की लागत
सड़क चौड़ीकरण (DL-PS मानक) के लिए 7,000 देवदार के पेड़ों की कटाई को मंजूरी। पारिस्थितिक परिणाम: 800 सक्रिय भूस्खलन क्षेत्रों का निर्माण। आलोचना: बुनियादी ढांचा परियोजनाएं NMSHE (2014) के जनादेशों की अनदेखी कर रही हैं, जिससे “ऑल-वेदर सड़कें” असुरक्षित गलियारों में बदल रही हैं।
GS-3 अर्थव्यवस्था
📉 घरेलू ऋण: उपभोग का जाल
घरेलू ऋण बढ़कर GDP का 41.3% हो गया है। चिंता: ऋण का उपयोग संपत्ति निर्माण के बजाय आय-व्यय के अंतर को पाटने के लिए किया जा रहा है। परिणाम: व्यापक आर्थिक जोखिम राज्य से परिवारों की ओर स्थानांतरित हो रहा है, जिससे वित्तीय बचत कम हो रही है।
त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):DL-PS मानक: पेव्ड शोल्डर के साथ डबल लेन (12 मीटर चौड़ाई) – संवेदनशील हिमालयी ढलानों के लिए अनुपयुक्त। • धारा 21(3): लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम – चुनाव आयोग को विवेक प्रदान करता है, लेकिन यह कानून के शासन के अधीन है। • NMSHE: हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय मिशन – वर्तमान पेड़ों की कटाई से इसे क्षति पहुँच रही है।

यहाँ भारत के प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों (National Parks) और वन्यजीव अभयारण्यों का भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर वर्गीकृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

ये उद्यान उच्च-ऊंचाई वाली वनस्पतियों और ‘हिम तेंदुआ’ (Snow Leopard) व ‘कस्तूरी मृग’ (Musk Deer) जैसे जीवों के लिए जाने जाते हैं।

  • दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान (जम्मू-कश्मीर): यह ‘हंगुल’ (कश्मीरी स्टैग) के लिए प्रसिद्ध है।
  • हेमिस राष्ट्रीय उद्यान (लद्दाख): यह भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय उद्यान है और हिम तेंदुओं का वैश्विक गढ़ माना जाता है।
  • फूलों की घाटी और नंदा देवी (उत्तराखंड): यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल, जो अपने अल्पाइन घास के मैदानों के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • जिम कॉर्बेट (उत्तराखंड): यह भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान है, जो शिवालिक की तलहटी में स्थित है।
  • ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (हिमाचल प्रदेश): यह ‘वेस्टर्न ट्रैगोपन’ और ‘हिमालयी तहर’ के लिए जाना जाता है।

यहाँ का ध्यान शुष्क पर्णपाती वनों और रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के अनुकूल प्रजातियों पर होता है।

  • गिर राष्ट्रीय उद्यान (गुजरात): यह एशियाई शेरों (Asiatic Lion) का दुनिया में एकमात्र प्राकृतिक आवास है।
  • डेजर्ट नेशनल पार्क (राजस्थान): यह ‘गोडावण’ (Great Indian Bustard) के अंतिम बचे हुए घरों में से एक है।
  • रणथंभौर और सरिस्का (राजस्थान): अरावली और विंध्य श्रेणियों में स्थित प्रमुख बाघ अभयारण्य (Tiger Reserves)।
  • समुद्री राष्ट्रीय उद्यान (कच्छ की खाड़ी): यह भारत का पहला समुद्री पार्क है, जो प्रवाल भित्तियों (Corals) और ‘डगोंग’ (समुद्री गाय) के लिए प्रसिद्ध है।

ये क्षेत्र “महा-शाकाहारी” (Mega-herbivore) संरक्षण और उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के मानचित्रण के लिए महत्वपूर्ण हैं।

  • काजीरंगा (असम): ‘एक सींग वाले गेंडे’ के लिए विश्व प्रसिद्ध।
  • मानस (असम): भूटान की सीमा पर स्थित एक बाघ अभयारण्य और जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र।
  • केइबुल लामजाओ (मणिपुर): यह दुनिया का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान है (लोकटक झील पर स्थित), जो ‘संगाई’ (ब्रो-एंटलर्ड हिरण) का घर है।
  • नामदफा (अरुणाचल प्रदेश): यह एकमात्र ऐसा पार्क है जहाँ बड़ी बिल्ली की चार प्रजातियाँ (बाघ, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और क्लाउडेड तेंदुआ) पाई जाती हैं।
  • सुंदरवन (पश्चिम बंगाल): दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन; रॉयल बंगाल टाइगर के लिए प्रसिद्ध।

ये उद्यान पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार में हाथी और बाघ संरक्षण के मुख्य केंद्र हैं।

उद्यान का नामराज्यमुख्य मैपिंग विशेषता
कान्हा और बांधवगढ़मध्य प्रदेश“टाइगर स्टेट” का हृदय स्थल; कान्हा ‘बारहसिंगा’ के लिए प्रसिद्ध है।
बांदीपुर और नागरहोलकर्नाटकनीलगिरी जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र का हिस्सा; यहाँ हाथियों का उच्च घनत्व है।
पेरियारकेरलएक कृत्रिम झील के चारों ओर स्थित हाथी और बाघ अभयारण्य।
शांत घाटी (Silent Valley)केरलनीलगिरी में उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन; ‘शेर जैसी पूंछ वाले मकाक’ का घर।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे बड़ा उद्यानहेमिसलद्दाख
एकमात्र तैरता उद्यानकेइबुल लामजाओमणिपुर
शेरों का प्राकृतिक आवासगिरगुजरात
गेंडे का गढ़काजीरंगाअसम

परीक्षा में अक्सर इन उद्यानों को उत्तर से दक्षिण या पूर्व से पश्चिम के क्रम में लगाने के लिए पूछा जाता है। मानचित्र पर इनकी सापेक्ष स्थिति को ध्यान से देखें (जैसे: जिम कॉर्बेट उत्तर में है और पेरियार दक्षिण में)।

वन्यजीव परिदृश्य (Wildlife Horizons)

हिमालयी क्षेत्र
🏔️ उच्च तुंगता शरणस्थल
लद्दाख के हेमिस (भारत का सबसे बड़ा पार्क) से लेकर फूलों की घाटी तक विस्तृत। ये क्षेत्र हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग और हिमालयी तहर का संरक्षण करते हैं।
अभ्यास: जम्मू-कश्मीर में दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान को खोजें और इसे लुप्तप्राय ‘हंगुल’ के मुख्य आवास के रूप में पहचानें।
शुष्क एवं समुद्री
🦁 शुष्क पर्णपाती गढ़
अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र; जैसे गीर (एशियाई शेरों का अंतिम निवास) और मरुभूमि राष्ट्रीय उद्यान, जो ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोडावण) का घर है।
अभ्यास: कच्छ की खाड़ी में समुद्री राष्ट्रीय उद्यान खोजें—जो भारत का पहला समर्पित समुद्री अभयारण्य है।
पूर्वी वर्षा-पट्टी
🦏 मेगा-शाकाहारी हब
महत्वपूर्ण आर्द्रभूमि और वर्षावन; जिनमें काजीरंगा (एक सींग वाला गैंडा) और केइबुल लामजाओ—लोकतक झील पर स्थित विश्व का एकमात्र तैरता हुआ राष्ट्रीय उद्यान शामिल है।
अभ्यास: पश्चिम बंगाल डेल्टा में सुंदरबन को लोकेट करें, जो बाघों के लिए विश्व का सबसे बड़ा मैंग्रोव क्षेत्र है।
दक्षिण एवं मध्य भारत के रत्न
उद्यान का नाम राज्य मुख्य मैपिंग विशेषता
कान्हा एवं बांधवगढ़म.प्र.बाघ हृदयस्थल; ‘बारहसिंगा’ के लिए प्रसिद्ध
बांदीपुर एवं नागरहोलकर्नाटकनीलगिरि बायोस्फीयर का हिस्सा; हाथियों का घनत्व
पेरियारकेरलकृत्रिम झील के चारों ओर स्थित बाघ अभयारण्य
शांत घाटी (Silent Valley)केरलउष्णकटिबंधीय सदाबहार; शेर जैसी पूंछ वाला बंदर
त्वरित मानचित्रण चेकलिस्ट
श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
सबसे बड़ा उद्यानहेमिस नेशनल पार्कलद्दाख (उच्च तुंगता)
एकमात्र तैरता उद्यानकेइबुल लामजाओमणिपुर (लोकतक झील)
शेरों का प्राकृतिक आवासगीर नेशनल पार्कगुजरात (सौराष्ट्र)
गैंडों का गढ़काजीरंगा नेशनल पार्कअसम (ब्रह्मपुत्र तट)

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