IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 20 जनवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “शासक और इमारतें” आठवीं और अठारहवीं शताब्दी के बीच की वास्तुकला संबंधी उपलब्धियों की व्याख्या करता है और बताता है कि कैसे राजाओं ने निर्माण के माध्यम से अपनी शक्ति, भक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव को प्रदर्शित किया।

इस अवधि के दौरान, राजाओं और उनके अधिकारियों ने दो प्रकार की संरचनाओं का निर्माण किया:

  • किले, महल और मकबरे: ये सुरक्षित, संरक्षित और इस दुनिया तथा अगली दुनिया में शासकों के आराम के लिए भव्य स्थान थे।
  • सार्वजनिक गतिविधियाँ: इनमें मंदिर, मस्जिद, हौज (तलाब), कुएँ, सराय और बाज़ार शामिल थे। राजाओं ने अपनी प्रजा के आराम और उपयोग के लिए इनका निर्माण किया ताकि वे जनता की प्रशंसा और स्नेह प्राप्त कर सकें।

इन इमारतों के निर्माण में लगने वाली सटीकता (जैसे कुतुब मीनार की घुमावदार सतह पर अभिलेख लिखना) शिल्पकारों के उच्च स्तर के कौशल को दर्शाती है।

  • अनुप्रस्थ टोडा निर्माण (Trabeate Principle): आठवीं और तेरहवीं शताब्दी के बीच, वास्तुकारों ने इस शैली का उपयोग किया, जहाँ दो खड़े खंभों के ऊपर एक क्षैतिज शहतीर (Horizontal beam) रखकर छत, दरवाजे और खिड़कियाँ बनाई जाती थीं।
  • चापाकार शैली (Arcuate Principle): बारहवीं शताब्दी से दो प्रमुख तकनीकी विकास हुए:
    1. दरवाजों और खिड़कियों के ऊपर के ढांचे का भार कभी-कभी मेहराबों (Arches) द्वारा उठाया जाता था।
    2. निर्माण में चूना पत्थर सीमेंट का प्रयोग बढ़ गया, जो पत्थर के टुकड़ों के साथ मिलकर उच्च गुणवत्ता वाला कंक्रीट बन जाता था। इससे विशाल संरचनाओं का निर्माण आसान और तेज़ हो गया।

मंदिरों और मस्जिदों का निर्माण बहुत खूबसूरती से किया गया था क्योंकि वे उपासना के स्थल थे और संरक्षक की शक्ति, धन तथा भक्ति को प्रदर्शित करने के लिए थे।

  • प्रतीक के रूप में मंदिर: एक राजा अक्सर अपने नाम पर ही मंदिर का नाम रखता था (जैसे—राजा राजराजदेव ने अपने देवता ‘राजराजेश्वरम्’ की पूजा के लिए ‘राजराजेश्वर’ मंदिर बनवाया) ताकि वह स्वयं ईश्वर जैसा दिखे।
  • सबसे बड़े मंदिर: ये आमतौर पर राजाओं द्वारा बनाए गए थे, जबकि मंदिर के अन्य छोटे देवता राजा के सहयोगियों और अधीनस्थों के देवी-देवता थे।
  • मस्जिद और सुल्तान: हालाँकि मुस्लिम सुल्तान खुद को भगवान का अवतार नहीं मानते थे, लेकिन फारसी दरबारी इतिहास में सुल्तान का वर्णन ‘अल्लाह की परछाई’ (Shadow of God) के रूप में किया गया है।
  • जल का महत्व: शासक अक्सर जनता को पानी उपलब्ध कराने के लिए टैंक और जलाशय बनवाते थे, जैसे इल्तुतमिश का ‘हौज-ए-सुलतानी’ (राजा का जलाशय)।

चूँकि राजाओं ने अपनी भक्ति और शक्ति दिखाने के लिए मंदिर बनवाए थे, इसलिए आक्रमणों के दौरान वे अक्सर मुख्य निशाना बनते थे।

  • जब शासक एक-दूसरे के राज्यों पर आक्रमण करते थे, तो वे धन और प्रतिष्ठा लूटने के लिए अक्सर इन इमारतों को निशाना बनाते थे।
  • उदाहरण के लिए, चोल राजा राजेंद्र प्रथम ने पराजित शासकों से जब्त की गई मूर्तियों से अपना मंदिर भर दिया था, और सुल्तान महमूद गजनवी ने अपने अभियानों के दौरान सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया था।

मुगलों ने विभिन्न शैलियों को मिलाकर वास्तुकला को और अधिक जटिल बना दिया।

  • चारबाग (Chahar Bagh): बाबर को औपचारिक बागों का शौक था, जो आयताकार घेरों में स्थित थे और कृत्रिम नहरों द्वारा चार भागों में विभाजित थे। इस विन्यास को ‘चारबाग’ कहा जाता था।
  • पितरा दूरा (Pietra Dura): शाहजहाँ के शासनकाल में, दिल्ली के दीवान-ए-आम में सिंहासन के पीछे ‘पितरा दूरा’ जड़ाऊ काम (संगमरमर या बलुआ पत्थर पर नक्काशी करके उसमें कीमती रंगीन पत्थर जड़ना) की एक श्रृंखला का उपयोग किया गया था।
  • ताजमहल: शाहजहाँ ने ताजमहल के विन्यास के लिए ‘तटवर्ती बाग’ (River-front garden) की योजना अपनाई, जहाँ सफेद संगमरमर का मकबरा यमुना नदी के तट पर एक चबूतरे पर बनाया गया था और बाग इसके दक्षिण में था।

जैसे-जैसे साम्राज्य बढ़े, वास्तुकला की शैलियों का आदान-प्रदान हुआ।

  • विजयनगर में, राजाओं के गजशालाओं (हाथी-अस्तबल) पर बीजापुर और गोलकुंडा जैसे पड़ोसी सुल्तानों की वास्तुकला शैली का गहरा प्रभाव था।
  • वृंदावन में मंदिरों की निर्माण शैली फतेहपुर सीकरी के मुगल महलों से बहुत मिलती-जुलती थी।
  • मुगल शासक क्षेत्रीय शैलियों को अपनी वास्तुकला में अपनाने में बहुत कुशल थे, जैसे बंगाल का ‘बांग्ला गुंबद’
  1. शिखर: मंदिर के गर्भगृह के ऊपर की ऊँची मीनार।
  2. मंडप: मंदिर का वह स्थान जहाँ लोग इकट्ठा होते थे।
  3. मेहराब: दरवाजे या खिड़की के ऊपर का धनुषाकार हिस्सा।
  4. पितरा दूरा: संगमरमर पर कीमती पत्थरों की नक्काशी।

🏛️ शासक और इमारतें (8वीं-18वीं शताब्दी)

🏗️ अभियांत्रिकी कौशल
वास्तुकला की अनुप्रस्थ टोडा (Trabeate) शैली से चापाकार (Arcuate) शैली की ओर बदलाव आया, जहाँ मेहराबों पर भार डाला जाता था। चूना पत्थर सीमेंट के बढ़ते प्रयोग ने विशाल संरचनाओं का निर्माण आसान कर दिया।
🕌 सत्ता के प्रतीक
मंदिर राजा की शक्ति और धन का प्रदर्शन थे। मुस्लिम सुल्तानों ने स्वयं को भगवान का अवतार नहीं कहा, लेकिन उन्हें फारसी तवारीख़ में ‘ईश्वर की छाया’ के रूप में वर्णित किया गया। जनता का समर्थन पाने के लिए राजाओं ने हौज़ (जलाशय) बनवाए।
🌸 मुगल नवाचार
मुगलों ने चारबाग़ (बगीचे के चार समान हिस्से) की परंपरा शुरू की। शाहजहाँ ने संगमरमर पर रत्नों की जड़ाई की पितरा-दूरा (Pietra Dura) तकनीक और ताजमहल जैसे तट-वर्तीय बाग शैली को लोकप्रिय बनाया।
🔄 सांस्कृतिक आदान-प्रदान
विभिन्न क्षेत्रों की शैलियाँ आपस में मिलीं: विजयनगर की गजशालाओं पर सल्तनत शैली का प्रभाव था, जबकि मुगलों ने बंगाल की बाँगला गुम्बद शैली को अपनाया। वृन्दावन के मंदिरों का वास्तुशिल्प फ़तेहपुर सीकरी के महलों जैसा था।
युद्ध नीति चूँकि मंदिर शक्ति और अपार धन के प्रतीक थे, इसलिए जब एक राजा दूसरे के राज्य पर आक्रमण करता था, तो वे इन मंदिरों को प्राथमिक लक्ष्य बनाते थे।
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कक्षा-7 इतिहास अध्याय-5 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: शासक और इमारतें

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यहाँ भारतीय राजव्यवस्था (Indian Polity) के भाग IV: राज्य के नीति निदेशक तत्व (DPSP) के अंतर्गत अनुच्छेद 42 से 45 का विस्तृत विश्लेषण हिंदी में दिया गया है। ये अनुच्छेद कार्यस्थल को मानवीय बनाने, जीवन स्तर को सम्मानजनक बनाने और शिक्षा की नींव को मजबूत करने पर केंद्रित हैं।

मानवीय कल्याण और प्रारंभिक शिक्षा: अनुच्छेद 42–45
इन निर्देशों का उद्देश्य केवल अस्तित्व बचाने और गरिमापूर्ण जीवन के बीच के अंतर को समाप्त करना है। ये राज्य को एक ऐसा वातावरण बनाने का निर्देश देते हैं जहाँ काम मानवीय हो और भविष्य (बच्चे) सुरक्षित हों।

यह अनुच्छेद मानता है कि “काम का अधिकार” (अनुच्छेद 41) तब तक अर्थहीन है जब तक कि कार्य वातावरण दमनकारी या खतरनाक हो।

  • शासनादेश: राज्य काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाएं सुनिश्चित करने के लिए और मातृत्व सहायता (Maternity Relief) के लिए प्रावधान करेगा।
  • महत्व: यह इस बात पर जोर देता है कि श्रमिक केवल “उत्पादन के उपकरण” नहीं हैं, बल्कि स्वास्थ्य और गरिमा के अधिकार रखने वाले इंसान हैं।
  • कार्यान्वयन:
    • मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 (और 2017 संशोधन): गर्भवती महिला कर्मचारियों के लिए सवैतनिक अवकाश और लाभ प्रदान करता है।
    • कारखाना अधिनियम, 1948: कारखानों में श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण सुनिश्चित करता है।

अनुच्छेद 43 “न्यूनतम मजदूरी” की अवधारणा से आगे बढ़कर “निर्वाह मजदूरी” की बात करता है।

  • शासनादेश: राज्य सभी श्रमिकों (कृषि, औद्योगिक या अन्य) के लिए एक निर्वाह मजदूरी और ऐसी कार्य परिस्थितियाँ सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा जो जीवन का एक सभ्य स्तर और अवकाश (Leisure) का पूर्ण आनंद सुनिश्चित करें।
  • कुटीर उद्योगों को बढ़ावा: यह विशेष रूप से राज्य को ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है (गांधीवादी सिद्धांत)।
न्यूनतम मजदूरी (Minimum Wage) बनाम निर्वाह मजदूरी (Living Wage) में अंतर:
  1. न्यूनतम मजदूरी: केवल भोजन, कपड़े और आश्रय की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए।
  2. निर्वाह मजदूरी: बुनियादी जरूरतों के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा को भी शामिल करती है।
  • उत्पत्ति: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया।
  • शासनादेश: राज्य किसी भी उद्योग में लगे उपक्रमों, प्रतिष्ठानों या अन्य संगठनों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा।
  • लक्ष्य: औद्योगिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना और मालिकों व मजदूरों के बीच की खाई को कम करना।
  • उत्पत्ति: 97वें संविधान संशोधन अधिनियम (2011) द्वारा जोड़ा गया।
  • शासनादेश: राज्य सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज, लोकतांत्रिक नियंत्रण और पेशेवर प्रबंधन को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

यह भारतीय संविधान के सबसे चर्चित और विवादित अनुच्छेदों में से एक है।

  • शासनादेश: राज्य भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।
  • परिभाषा: UCC देश के प्रत्येक प्रमुख धार्मिक समुदाय के धर्मग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित ‘व्यक्तिगत कानूनों’ (Personal Laws) के स्थान पर हर नागरिक के लिए कानूनों का एक साझा सेट होगा।
  • दायरा: इसमें विवाह, तलाक, भरण-पोषण, विरासत और गोद लेने जैसे धर्मनिरपेक्ष मामले शामिल हैं।
  • वर्तमान स्थिति: गोवा में एक साझा पारिवारिक कानून (पुर्तगाली नागरिक संहिता) लागू है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर UCC अभी तक लागू नहीं हुआ है।

इस अनुच्छेद को 86वें संशोधन अधिनियम (2002) द्वारा महत्वपूर्ण रूप से बदला गया था।

  • मूल प्रावधान: सभी बच्चों को 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रावधान था।
  • वर्तमान शासनादेश: राज्य सभी बच्चों के लिए, जब तक वे छह वर्ष की आयु पूरी नहीं कर लेते, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) प्रदान करने का प्रयास करेगा।
  • बदलाव का कारण: 86वें संशोधन के बाद, 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए “शिक्षा का अधिकार” एक मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21A) बन गया। अब अनुच्छेद 45 केवल “प्री-स्कूल” या आंगनवाड़ी स्तर (0-6 वर्ष) पर केंद्रित है।
अनुच्छेदप्रकृतिमुख्य केंद्रप्रमुख कानून/उदाहरण
42समाजवादीमातृत्व सहायता और मानवीय कार्यमातृत्व लाभ अधिनियम
43समाजवादी/गांधीवादीनिर्वाह मजदूरी और कुटीर उद्योगमनरेगा / खादी बोर्ड
43Aसमाजवादीप्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारीट्रेड यूनियन अधिनियम
43Bउदारवादीसहकारी समितियाँ97वां संशोधन
44उदारवादीसमान नागरिक संहिता(वर्तमान में चर्चा का विषय)
45उदारवादी0-6 वर्ष के बच्चों की शिक्षाICDS / आंगनवाड़ी

🏢 मानव कल्याण और समान नागरिक संहिता

🤰 अनु. 42: प्रसूति और मानवीय कार्य
कार्य की न्यायसंगत और मानवीय दशाएं सुनिश्चित करना तथा मातृत्व राहत (Maternity Relief) प्रदान करना। इसके तहत श्रमिकों को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि इंसान समझा जाता है। (संदर्भ: मातृत्व लाभ अधिनियम)।
🥖 अनु. 43: निर्वाह मजदूरी
राज्य सभी श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी (बुनियादी जरूरतें + स्वास्थ्य/शिक्षा) सुनिश्चित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।
🤝 अनु. 43A और 43B: सहकारिता
43A: उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी। 43B: सहकारी समितियों का स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कामकाज और लोकतांत्रिक नियंत्रण को बढ़ावा देना।
⚖️ अनु. 44: समान नागरिक संहिता
राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा, जो विवाह, तलाक और विरासत के लिए धर्म-आधारित व्यक्तिगत कानूनों का स्थान लेगी।
👶 अनु. 45: शैशवकाल की देखभाल (0–6 वर्ष)
86वें संशोधन द्वारा संशोधित। जहाँ 6–14 वर्ष शिक्षा अब एक मूल अधिकार (अनु. 21A) है, वहीं अनुच्छेद 45 छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा पर केंद्रित है।
अनुच्छेद प्रकृति मुख्य फोकस प्रमुख विधान/योजना
42समाजवादीप्रसूति सहायतामातृत्व लाभ अधिनियम
43गांधीवादीनिर्वाह मजदूरीमनरेगा / खादी बोर्ड
43Aसमाजवादीप्रबंधन में भागीदारीट्रेड यूनियन अधिनियम
44उदारवादीसमान नागरिक संहिता(विधिक चर्चा का विषय)
45उदारवादी0–6 वर्ष की देखभालICDS / आंगनवाड़ी
विधिक तथ्य “निर्वाह मजदूरी” (Living Wage) “न्यूनतम मजदूरी” (Minimum Wage) से श्रेष्ठ है क्योंकि इसमें सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा शामिल है, जो एक गरिमापूर्ण जीवन सुनिश्चित करती है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (20 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; शासन के महत्वपूर्ण पहलू; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएं)।

  • संदर्भ: महाराष्ट्र के हालिया नगर निगम चुनाव परिणामों का विश्लेषण, जो राज्य के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़े बदलाव का संकेत देते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • भाजपा का चुनावी दबदबा: भाजपा पुणे, नागपुर और नासिक जैसे प्रमुख शहरों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसने 29 नगर निगमों की कुल 2,869 सीटों में से लगभग 1,425 सीटें जीती हैं।
    • पहचान की राजनीति का नया रूप: पार्टी ने मराठी क्षेत्रीयता (Nativism) और हिंदू सांप्रदायिकता को कुशलतापूर्वक मिलाकर बाल ठाकरे की विरासत को अपनाया है ताकि बदलते शहरी जनसांख्यिकी को साधा जा सके।
    • नेतृत्व का विकास: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वैचारिक अपेक्षाओं और शासन की जटिलताओं के बीच संतुलन बनाकर अपनी स्थिति मजबूत की है।
    • पारंपरिक गुटों का पतन: पवार और ठाकरे परिवारों का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। भाजपा-शिंदे गठबंधन ने बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) पर कब्जा कर लिया, जिस पर 25 साल से उद्धव ठाकरे का नियंत्रण था।
  • UPSC प्रासंगिकता: “क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय दल”, “चुनावी राजनीति और जनसांख्यिकी” और “भारत में वैचारिक विमर्श का विकास”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जनसांख्यिकीय लाभ: भाजपा ने हिंदी भाषी मतदाताओं को लुभाने के लिए प्रवासन (Migration) के कारण हुए जनसंख्या परिवर्तनों का उपयोग किया है, जिससे पारंपरिक क्षेत्रीय राजनीति कमजोर हुई है।
    • शिवसेना का संघर्ष: शिवसेना के विभिन्न गुट बदलती जनसंख्या के अनुसार खुद को ढालने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं।
    • समावेशिता का तर्क: लेख चेतावनी देता है कि क्षेत्रीयता के स्थान पर सांप्रदायिकता का आना राज्य के लिए आदर्श नहीं है; भाजपा को अपने लक्ष्यों के लिए अधिक समावेशी मंच का उपयोग करना चाहिए।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित/विकासशील देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: यमन की सऊदी समर्थित सरकार और यूएई (UAE) समर्थित ‘दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद’ (STC) के बीच हालिया संघर्ष।
  • मुख्य बिंदु:
    • क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता: इस संघर्ष ने सऊदी-यूएई तनाव को उजागर कर दिया है। रियाद ने अबू धाबी पर यमनी अलगाववादियों को हथियार देने का आरोप लगाया है।
    • हूथी की पकड़: जैसे-जैसे दक्षिण के गुट आपस में लड़ रहे हैं, उत्तर में हूथी मिलिशिया (अंसार अल्लाह) ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली है।
    • मानवीय संकट: यमन दुनिया के सबसे खराब संकटों में से एक का सामना कर रहा है, जहाँ लाखों लोग अकाल की कगार पर हैं और अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है।
    • यूएई की वापसी: सऊदी अरब की फटकार के बाद, यूएई ने यमन से अपनी सेना वापस बुलाने की घोषणा की है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “छद्म युद्ध (Proxy Wars)” और “अंतर्राष्ट्रीय मानवीय संकट प्रबंधन”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संघीय ढांचा समाधान: स्थायी शांति के लिए, संपादकीय सभी यमनी गुटों को एक संघीय शासन संरचना स्थापित करने की सलाह देता है।
    • सहयोग की आवश्यकता: लेख इस बात पर जोर देता है कि सऊदी अरब और यूएई को अपने पड़ोस में स्थिरता के लिए मिलकर काम करना चाहिए।
    • वायु शक्ति का प्रभाव: सऊदी हवाई शक्ति सरकारी बलों को खोए हुए क्षेत्रों को वापस पाने में मदद करने के लिए महत्वपूर्ण रही है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सांविधिक, नियामक और अर्ध-न्यायिक निकाय; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

  • संदर्भ: प्रवर्तन निदेशालय (ED) की हालिया जांच प्रणालियों की आलोचना और न्यायिक जांच से पहले छवि खराब करने वाले “मीडिया ट्रायल” की भूमिका।
  • मुख्य बिंदु:
    • तर्क का उलटफेर: PMLA (2002) के तहत, ED पर आरोप है कि वह किसी मूल अपराध (Scheduled Offence) को स्थापित किए बिना ही धन शोधन (Money Laundering) को एक स्वतंत्र अपराध की तरह मान रही है।
    • प्रक्रियात्मक अतिरेक: PMLA की धारा 50 के तहत, एजेंसी किसी को भी बुला सकती है और शपथ पर बयान दर्ज कर सकती है, जो जमानत के लिए ‘निर्दोषता के अनुमान’ (Presumption of Innocence) को उलट देता है।
    • न्यायिक हस्तक्षेप: सुप्रीम कोर्ट सहित कई अदालतों ने ED की जांच पर रोक लगाई है और कहा है कि एजेंसी “सभी सीमाएं पार कर रही है।”
    • संस्थागत अखंडता: रिश्वत लेते पकड़े गए ED अधिकारियों के मामलों ने एजेंसी की नैतिक साख को नुकसान पहुँचाया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जांच शक्तियों का दुरुपयोग”, “न्यायिक निरीक्षण” और “पत्रकारिता में नैतिकता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • मीडिया की संलिप्तता: संपादकीय उन पत्रकारों की आलोचना करता है जो चुनिंदा ‘लीक’ के लिए माध्यम के रूप में कार्य करते हैं; “पत्रकारिता स्टेनोग्राफी नहीं है।”
    • संवैधानिक सुरक्षा: लेख का तर्क है कि केवल सख्त सीमाएं ही जांच प्राधिकरण को मनमानी सरकारी शक्ति बनने से रोक सकती हैं।
    • लोकतंत्र का स्वास्थ्य: झूठे या कमजोर मामले संस्थानों में जनता के विश्वास को खत्म करते हैं।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते)।

  • संदर्भ: “डिप्लोमैटिक व्हाइट स्पेस” (राजनयिक रिक्त स्थान)—वैश्विक नेतृत्व में वे अंतराल जहाँ बड़ी शक्तियाँ आपस में भिड़ी हुई हैं—उनमें नेतृत्व करने के भारत के अवसरों की तलाश।
  • मुख्य बिंदु:
    • भारत-यूरोपीय संघ FTA: 2026 के गणतंत्र दिवस परेड में यूरोपीय संघ के नेतृत्व की उपस्थिति भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौते के लिए एक बड़ा संकेत है।
    • ब्रिक्स (BRICS) का संचालन: 2026 के अध्यक्ष के रूप में, भारत को इस समूह को पश्चिम-विरोधी बयानबाजी से हटाकर ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ के माध्यम से व्यावहारिक परिणामों की ओर ले जाना चाहिए।
    • क्वाड (Quad) की उपयोगिता: भारत क्वाड को हिंद महासागर के देशों के लिए उपयोगी बना सकता है, अपनी समुद्री डोमेन जागरूकता क्षमताओं को सेवाओं में बदलकर।
    • नए गठबंधन: भारत को “पैक्स सिलिका” (Pax Silica – अमेरिका के नेतृत्व वाला AI और सेमीकंडक्टर क्लब) में शामिल होने का निमंत्रण मिलना छोटे, कार्यात्मक राजनयिक गठबंधनों की ओर झुकाव को दर्शाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत का वैश्विक नेतृत्व”, “बहु-संरेखण रणनीति (Multi-alignment)” और “बहुपक्षवाद का भविष्य”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • छोटे मंच, बड़े लाभ: संपादकीय का सुझाव है कि विभाजित दुनिया में परिणाम संयुक्त राष्ट्र जैसे बड़े मंचों के बजाय छोटे गठबंधनों से निकल रहे हैं।
    • रणनीतिक संतुलन: भारत की 2026 की गति ‘व्हाइट स्पेस’ को वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं (जैसे AI मानक और आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा) के लिए कार्य तंत्र में बदलने से आएगी।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।

  • संदर्भ: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं और बिना दस्तावेजों वाले आव्रजन के मुद्दे का विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • मतदाता सूची पुनरीक्षण: विवादों के बावजूद, यह “अत्यधिक महसूस” किया जा रहा है कि मृत और नकली नामों को हटाने के लिए मतदाता सूची का पुनरीक्षण आवश्यक है।
    • सार्वजनिक चिंता: संपादकीय नोट करता है कि सबूतों के बावजूद अवैध प्रवासियों के मुद्दे को पूरी तरह नकारना राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंतित जनता के एक वर्ग को नाराज करता है।
    • संस्थागत विफलता: SIR 2.0 ने ECINet डिजिटल बुनियादी ढांचे का पूरी तरह उपयोग करने के बजाय कागजी फॉर्मों और भौतिक सुनवाइयों (नोबेल पुरस्कार विजेताओं को भी बुलाने) पर भरोसा किया।
    • चुनावी अखंडता: इस अभ्यास में लगभग 6.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे विपक्ष ने “वोट चोरी” के आरोप लगाए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “मतदाता सूची की अखंडता”, “आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां” और “नागरिकता की राजनीति”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सटीक संवाद: एक बुद्धिमानी भरा रास्ता यह होगा कि बयानबाजी के बजाय कानूनी कार्य प्राधिकरणों और राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित बातचीत की जाए।
    • डिजिटल-प्रथम समाधान: लेख ऑनलाइन दस्तावेज़ अपलोड और बैकएंड सत्यापन पर आधारित प्रणाली की वकालत करता है ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष और मानवीय हो सके।
    • भरोसे की रक्षा: चुनावी सुधार समावेश और डिजिटल उपकरणों के जिम्मेदार उपयोग के माध्यम से ही सफल होते हैं।

संपादकीय विश्लेषण

20 जनवरी, 2026
GS-2 राजव्यवस्था
🗳️ महाराष्ट्र: क्षेत्रीय ‘भगवा’ बदलाव
नगरपालिका चुनावों में भाजपा ने 2,869 में से 1,425 सीटें जीतकर पारंपरिक क्षेत्रीय दलों को विस्थापित किया। मुख्य रणनीति: बदलती शहरी जनसांख्यिकी को लुभाने के लिए मराठी भूमिपुत्रवाद (Nativism) और सांप्रदायिकता का मिश्रण। भाजपा-शिंदे गठबंधन ने BMC पर 25 साल पुराने ठाकरे दबदबे को समाप्त कर दिया।
GS-2 अंत. संबंध
🇾🇪 विभाजित यमन: सऊदी-यूएई प्रतिद्वंद्विता
अलगाववादियों को हथियार हस्तांतरण पर रियाद की फटकार के बाद यूएई द्वारा सेना वापस बुलाने से भू-राजनीतिक दरारें गहरी हुईं। परिणाम: उत्तरी केंद्रों में हुथी विद्रोहियों का सुदृढ़ीकरण। समाधान: मानवीय संकट से जूझ रहे इस देश में स्थायी शांति के लिए एक संघीय ढांचा अनिवार्य है।
GS-2 एजेंसियां
⚖️ ED और मीडिया ट्रायल की नैतिकता
प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग को “अनुसूचित अपराध” से स्वतंत्र मानने की आलोचना। PMLA धारा 50 के तहत शपथ पर दिए गए बयान निर्दोषता की उपधारणा के सिद्धांत को उलट देते हैं। चेतावनी: चयनात्मक मीडिया लीक राज्य की मनमानी शक्ति के वाहक बन रहे हैं।
GS-2 अंत. संबंध
🌍 राजनयिक रिक्त स्थान: 2026 का दृष्टिकोण
भारत नेतृत्व की कमियों को छोटे, कार्यात्मक गठबंधनों के माध्यम से भरने का लक्ष्य रखता है। मुख्य कदम: भारत-यूरोपीय संघ FTA को “जोखिम-निवारण समझौते” के रूप में देखना और पैक्स सिलिका (Pax Silica) (यूएस-नीत AI/सेमीकंडक्टर ब्लॉक) में शामिल होना। वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के लिए नए प्रबंध बनाना प्राथमिकता है।
GS-2 शासन
📜 चुनावी SIR: डिजिटल बनाम कागज़
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) 2.0 में 6.5 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने से “वोट चोरी” के आरोप लगे। आलोचना: त्रुटि-प्रवण कागजी फॉर्म और भौतिक सुनवाई पर निर्भरता के बजाय ECINet बुनियादी ढांचे की आवश्यकता। सुरक्षा पर बातचीत पारदर्शी होनी चाहिए, उपेक्षापूर्ण नहीं।

यहाँ भारत के समुद्री भूगोल (Ocean Geography) और सामरिक समुद्री बिंदुओं का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

सामरिक जलमार्ग और चैनल समुद्री व्यापार और सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका मानचित्रण करते समय अक्षांश रेखाओं (Latitudes) का ध्यान रखना आवश्यक है।

  • 8 डिग्री चैनल (8 Degree Channel): यह लक्षद्वीप समूह (विशेषकर मिनिकॉय) को मालदीव से अलग करता है।
  • 9 डिग्री चैनल (9 Degree Channel): यह मिनिकॉय द्वीप को शेष लक्षद्वीप द्वीपसमूह से अलग करता है।
  • 10 डिग्री चैनल (10 Degree Channel): यह बंगाल की खाड़ी में अंडमान द्वीपों को निकोबार द्वीपों से अलग करता है।
  • डंकन पैसेज (Duncan Passage): यह दक्षिण अंडमान और लिटिल अंडमान के बीच स्थित है।
  • पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait): भारत (तमिलनाडु) को श्रीलंका से अलग करने वाली पानी की एक संकरी पट्टी।
  • कोको चैनल (Coco Channel): अंडमान द्वीपों को म्यांमार के कोको द्वीपों से अलग करता है।

भारत के पास एक विशाल अनन्य आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) है जो समुद्री संसाधनों पर अधिकार प्रदान करता है।

  • महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf): तट से समुद्र की ओर फैला हुआ समुद्र तल का उथला हिस्सा।
  • EEZ की सीमा: आधार रेखा (Baseline) से 200 समुद्री मील (Nautical Miles) तक फैली होती है। भारत का EEZ लगभग 20.2 लाख वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करता है।
  • रणनीतिक नौसैनिक अड्डे:
    • पोर्ट ब्लेयर (अंडमान): भारत की एकमात्र ‘ट्राई-सर्विस कमांड’ (थल, जल और वायु सेना) का मुख्यालय।
    • कारवार (INS कदंब): पश्चिमी तट पर भारत के सबसे बड़े नौसैनिक अड्डों में से एक।
    • विशाखापत्तनम: पूर्वी नौसेना कमान का मुख्यालय।

भारत की प्रवाल भित्तियों का मानचित्रण पारिस्थितिक और पर्यावरणीय भूगोल के लिए महत्वपूर्ण है।

क्षेत्रभित्ति का प्रकारमहत्व
लक्षद्वीपएटोल (Atolls)पूरी तरह से प्रवाल द्वीपों से निर्मित; अत्यधिक संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र।
मन्नार की खाड़ीतटीय भित्ति (Fringing)भारत और श्रीलंका के बीच स्थित; एक जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserve)।
अंडमान और निकोबारतटीय भित्ति (Fringing)भारत में सबसे व्यापक और विस्तृत प्रवाल भित्तियाँ।
कच्छ की खाड़ीतटीय भित्ति (Fringing)भारत की सबसे उत्तरी प्रवाल भित्तियाँ; उथले पानी में पाई जाती हैं।

ये विशेषताएँ भारतीय तटरेखा के आकार को परिभाषित करती हैं।

  • कच्छ की खाड़ी: गुजरात में स्थित; उच्च ज्वारीय ऊर्जा (Tidal energy) क्षमता के लिए जानी जाती है।
  • खंभात की खाड़ी: गुजरात में स्थित; प्रमुख अपतटीय तेल (Offshore oil) अन्वेषण स्थल।
  • मन्नार की खाड़ी: दक्षिण में स्थित; मोती निकालने और समुद्री जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध।
  • बंगाल की खाड़ी: दुनिया की सबसे बड़ी खाड़ी, जो भारतीय मानसून को गहराई से प्रभावित करती है।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे दक्षिणी बिंदुइंदिरा पॉइंटग्रेट निकोबार द्वीप
ट्राई-सर्विस बेसपोर्ट ब्लेयरदक्षिण अंडमान
प्रवाल राजधानीकवरत्तीलक्षद्वीप
आदम का पुलराम सेतुपम्बन द्वीप और मन्नार द्वीप के बीच

UPSC के लिए पाक जलडमरूमध्य और मन्नार की खाड़ी की सापेक्ष स्थिति को ध्यान से देखें। पाक जलडमरूमध्य उत्तर में है, जबकि मन्नार की खाड़ी उसके दक्षिण में स्थित है।

समुद्री परिदृश्य (Maritime Horizons)

जलसंधियाँ एवं मार्ग
🧭 रणनीतिक चैनल
रणनीतिक अक्षांश रेखाएँ जैसे 8°, 9°, और 10° चैनल अरब सागर और बंगाल की खाड़ी के गलियारों को परिभाषित करती हैं। वहीं, पाक जलडमरूमध्य और डंकन मार्ग महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट (अवरोध बिंदु) के रूप में कार्य करते हैं।
अभ्यास: मानचित्र पर 10 डिग्री चैनल को खोजें और उन दो द्वीप समूहों की पहचान करें जिन्हें यह अलग करता है।
सुरक्षा
⚓ नौसेना कमान केंद्र
भारत की समुद्री रक्षा पोर्ट ब्लेयर (त्रि-सेवा कमान), कारवार (INS कदंब), और विशाखापत्तनम स्थित पूर्वी कमान पर आधारित है।
अभ्यास: भारतीय तटरेखा से 200 समुद्री मील की ‘अनन्य आर्थिक क्षेत्र’ (EEZ) सीमा को ट्रेस करें।
समुद्री जीव विज्ञान
🐚 मूंगा (कोरल) संरचनाएं
भारत की कोरल संपदा लक्षद्वीप के एटोल से लेकर अंडमान और मन्नार की खाड़ी की विस्तृत तटीय प्रवाल भित्तियों (Fringing Reefs) तक फैली हुई है।
क्षेत्र रीफ का प्रकार महत्व
लक्षद्वीपएटोल (Atolls)पूरी तरह से मूंगा द्वीप पारिस्थितिकी तंत्र
मन्नार की खाड़ीतटीय (Fringing)समुद्री जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
कच्छ की खाड़ीतटीय (Fringing)सबसे उत्तरी उथले पानी की भित्तियाँ
तटीय आकृति
🌊 खाड़ियाँ एवं ज्वारीय ऊर्जा
भारत की तटरेखा कच्छ की खाड़ी (ज्वारीय क्षमता) और खंभात की खाड़ी (अपतटीय तेल) से कटी-फटी है, जो गुजरात के अद्वितीय समुद्री प्रोफाइल को परिभाषित करती है।
अभ्यास: पंबन द्वीप और मन्नार द्वीप के बीच “आदम का पुल” (राम सेतु) के स्थान की पहचान करें।
समुद्री मानचित्रण चेकलिस्ट
श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
सबसे दक्षिणी सिराइंदिरा पॉइंटग्रेट निकोबार द्वीप
मूंगा राजधानीकवरत्तीलक्षद्वीप द्वीपसमूह
त्रि-सेवा आधारपोर्ट ब्लेयरदक्षिण अंडमान द्वीप
मोती की खेतीमन्नार की खाड़ीदक्षिणी तट (तमिलनाडु)

Dainik GS Quiz in Hindi – January 20, 2026

Dainik GS Quiz (20 January 2026)
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    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 19 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक—मुगल वंश के उदय, प्रशासन और उनकी विरासत की व्याख्या करता है।

    मुगल दो महान शासक वंशों के वंशज थे:

    • माता की ओर से: वे चीन और मध्य एशिया के मंगोल शासक चंगेज खान (मृत्यु 1227) के वंशज थे।
    • पिता की ओर से: वे ईरान, इराक और वर्तमान तुर्की के शासक तैमूर (मृत्यु 1404) के उत्तराधिकारी थे।
    • पहचान: मुगल खुद को मुगल या मंगोल कहलवाना पसंद नहीं करते थे, क्योंकि ‘मंगोल’ नाम चंगेज खान के नरसंहारों की यादों से जुड़ा था। इसके बजाय, वे ‘तैमूरी’ कहलाने पर गर्व महसूस करते थे क्योंकि उनके महान पूर्वज (तैमूर) ने 1398 में दिल्ली पर कब्जा किया था।
    • बाबर (1526–1530): पहला मुगल सम्राट। उसने 1504 में काबुल पर कब्जा किया और 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध में सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया।
    • हुमायूँ (1530–1540, 1555–1556): शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित कर ईरान भागने पर मजबूर कर दिया। 1555 में उसने सफ़ाविद शाह की मदद से दोबारा दिल्ली जीती।
    • अकबर (1556–1605): मात्र 13 वर्ष की आयु में सम्राट बना। उसने उत्तर भारत, गुजरात, बंगाल और दक्कन तक साम्राज्य का विस्तार किया।
    • जहाँगीर (1605–1627) और शाहजहाँ (1627–1658): इन्होंने दक्कन में सैन्य अभियान जारी रखे और अहोम, सिख तथा मेवाड़ के खिलाफ युद्ध किए। शाहजहाँ के काल में मुगल वास्तुकला (जैसे ताजमहल) शिखर पर पहुँची।
    • औरंगजेब (1658–1707): इसके काल में साम्राज्य अपने अधिकतम क्षेत्रीय विस्तार तक पहुँच गया, लेकिन उसे मराठों, सिखों, जाटों और सतनामियों के निरंतर विद्रोहों का सामना करना पड़ा।
    • मुगल ज्येष्ठाधिकार (जहाँ बड़ा बेटा पिता के राज्य का उत्तराधिकारी होता है) के नियम में विश्वास नहीं करते थे।
    • इसके बजाय, वे उत्तराधिकार की तैमूरी प्रथा ‘सहदायाद’ (coparcenary inheritance) को अपनाते थे, जिसमें विरासत का विभाजन सभी पुत्रों के बीच कर दिया जाता था। इसी कारण अक्सर भाइयों के बीच सिंहासन के लिए गृहयुद्ध होते थे।

    साम्राज्य के विस्तार के साथ मुगलों ने विभिन्न पृष्ठभूमि के अधिकारियों को नियुक्त किया:

    • मनसबदार: यह शब्द उस व्यक्ति के लिए उपयोग होता था जिसे कोई ‘मनसब’ (सरकारी पद या रैंक) मिलता था।
    • ज़ात (Zat): पद और वेतन का निर्धारण ‘ज़ात’ नामक संख्यात्मक मूल्य से होता था। ज़ात जितनी अधिक होती थी, दरबार में प्रतिष्ठा और वेतन उतना ही अधिक होता था।
    • सैन्य जिम्मेदारी: मनसबदारों को एक निश्चित संख्या में ‘सवार’ (घुड़सवार) रखने पड़ते थे।
    • जागीर: मनसबदारों को वेतन के रूप में राजस्व एकत्र करने के लिए क्षेत्र दिए जाते थे, जिन्हें ‘जागीर’ कहा जाता था। मनसबदार अपनी जागीरों में रहते नहीं थे, बल्कि उनके नौकर वहां से राजस्व इकट्ठा करते थे।

    मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य स्रोत किसानों की उपज पर लगने वाला कर था।

    • जमींदार: मुगलों ने सभी बिचौलियों (चाहे वे गाँव के मुखिया हों या शक्तिशाली स्थानीय सरदार) के लिए एक ही शब्द ‘जमींदार’ का उपयोग किया।
    • टोडर मल की राजस्व व्यवस्था: अकबर के राजस्व मंत्री टोडर मल ने 10 साल (1570–1580) की अवधि के लिए फसलों की पैदावार, कीमतों और कृषि भूमि का सावधानीपूर्वक सर्वेक्षण किया।
    • ज़ब्त (Zabt): इस डेटा के आधार पर प्रत्येक फसल पर नकद कर तय किया गया। प्रत्येक प्रांत को राजस्व मंडलों में बांटा गया था, जिनकी अपनी राजस्व दरों की सूची थी। इस व्यवस्था को ‘ज़ब्त’ कहा जाता था।

    अबुल फज़ल ने अकबर के शासनकाल का तीन खंडों में इतिहास लिखा, जिसका नाम ‘अकबरनामा’ है (तीसरा खंड ‘आइन-ए-अकबरी’ है)।

    • प्रशासन: साम्राज्य प्रांतों में विभाजित था जिन्हें ‘सूबा’ कहा जाता था। सूबे का शासन ‘सूबेदार’ चलाता था, जिसके पास राजनीतिक और सैन्य दोनों शक्तियाँ होती थीं।
    • धार्मिक सहिष्णुता: विभिन्न धर्मगुरुओं के साथ चर्चा के बाद अकबर ‘सुलह-ए-कुल’ (सर्वत्र शांति) के विचार पर पहुँचा। इस नैतिकता की प्रणाली (ईमानदारी, न्याय और शांति) ने उसके राज्य में विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच भेदभाव नहीं किया।

    17वीं शताब्दी के अंत तक मुगल प्रशासनिक दक्षता में गिरावट आने लगी।

    • आर्थिक असमानता: एक ओर साम्राज्य अपनी भव्यता के लिए जाना जाता था, वहीं दूसरी ओर भारी गरीबी थी। आंकड़ों के अनुसार, कुल 8,000 मनसबदारों में से केवल 445 उच्च श्रेणी के थे, जो साम्राज्य के कुल अनुमानित राजस्व का 61.5% हिस्सा डकार जाते थे।
    • पतन: जैसे-जैसे सम्राट की सत्ता कमजोर हुई, हैदराबाद और अवध जैसे प्रांतों के गवर्नरों ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और नए राजवंश स्थापित किए। हालाँकि वे औपचारिक रूप से दिल्ली के मुगल सम्राट को अपना स्वामी मानते रहे।
    1. बाबर (1526-1530)
    2. हुमायूँ (1530-1540 / 1555-1556)
    3. अकबर (1556-1605)
    4. जहाँगीर (1605-1627)
    5. शाहजहाँ (1627-1658)
    6. औरंगजेब (1658-1707)

    👑 मुगल साम्राज्य (1526-1707)

    ⚔️ तैमूरी वंश और बाबर
    मुगल चंगेज़ खान और तैमूर के वंशज थे। बाबर ने 1526 में पानीपत के युद्ध के बाद साम्राज्य की नींव रखी। मुगलों में ‘सहदायाद’ विरासत की प्रथा थी, जिसमें साम्राज्य सभी पुत्रों में विभाजित किया जाता था।
    🎖️ मनसबदार और जागीर
    मनसबदार के पद और वेतन का निर्धारण जात (संख्यात्मक मान) से होता था। वे घुड़सवारों (सवार) का रखरखाव करते थे और उन्हें वेतन के रूप में राजस्व अधिकार मिलते थे, जिन्हें जागीर कहा जाता था।
    📜 राजस्व और ज़ब्त प्रणाली
    अकबर के मंत्री टोडरमल ने 10 साल तक फसलों का सर्वेक्षण किया। ज़ब्त प्रणाली के तहत प्रत्येक फसल पर नकद कर निश्चित था। मध्यवर्ती बिचौलियों को सामूहिक रूप से ज़मींदार कहा जाता था।
    🕊️ अकबर की शासन नीति
    साम्राज्य प्रांतों (सूबा) में बंटा था। अकबर ने सुलह-ए-कुल (सार्वत्रिक शांति) का सिद्धांत दिया, जो ईमानदारी और न्याय पर आधारित था। इसका विस्तृत विवरण अबुल फ़ज़ल की आइन-ए-अकबरी में मिलता है।
    पतन के कारण 17वीं शताब्दी के अंत तक, अपार धन कुछ ही हाथों में सिमट गया था—कुल 8,000 मनसबदारों में से केवल 445 उच्च अधिकारियों को साम्राज्य के कुल राजस्व का 61% प्राप्त होता था।
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    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-4 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: मुगल साम्राज्य

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    नीति निदेशक तत्व ‘निर्देशों के साधन’ (Instrument of Instructions) हैं, जो सरकार को नीतियां बनाने और कानून लागू करने के लिए दिशा-निर्देश देते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य भारत को एक “पुलिस राज्य” से “कल्याणकारी राज्य” (Welfare State) में बदलना है।

    • संवैधानिक स्थिति: भाग IV, अनुच्छेद 36 से 51 तक।
    • स्रोत: आयरलैंड के संविधान (Irish Constitution) से लिए गए हैं।
    • उद्देश्य: सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना।
    • प्रकृति: ये गैर-न्यायिक (Non-justiciable) हैं। यानी, इनके उल्लंघन पर आप सरकार के खिलाफ अदालत नहीं जा सकते, लेकिन ये “देश के शासन में मूलभूत” (Art. 37) हैं।

    नीति निदेशक तत्वों के संदर्भ में, “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग III (मौलिक अधिकार) के अनुच्छेद 12 में दिया गया है।

    • इसमें भारत सरकार, संसद, राज्य सरकारें, विधानमंडल और भारत के क्षेत्र के भीतर सभी स्थानीय या अन्य अधिकारी (जैसे नगरपालिका, LIC, ONGC आदि) शामिल हैं।

    यह अनुच्छेद DPSP की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है। इसके दो मुख्य प्रावधान हैं:

    1. अप्रवर्तनीय: ये सिद्धांत किसी भी अदालत द्वारा कानूनी रूप से लागू नहीं करवाए जा सकते।
    2. शासन का आधार: भले ही ये न्यायिक न हों, लेकिन कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।

    इसे DPSP का “प्रमुख” अनुच्छेद माना जाता है क्योंकि यह कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य को परिभाषित करता है।

    • 38(1): राज्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करेगा जहाँ सभी को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिले।
    • 38(2): (44वें संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया) राज्य आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा।

    इसमें छह विशिष्ट लक्ष्य (39a से 39f) शामिल हैं:

    • 39(a): सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार।
    • 39(b): समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार हो कि उससे सामूहिक हित सध सके (वितरणकारी न्याय)।
    • 39(c): धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण रोकना।
    • 39(d): पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन
    • 39(e): श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा करना तथा बच्चों का दुरुपयोग रोकना।
    • 39(f): बच्चों को स्वस्थ तरीके से विकास के अवसर देना (42वें संशोधन द्वारा संशोधित)।
    • उत्पत्ति: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया।
    • शासनादेश: राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि कानूनी प्रणाली इस आधार पर काम करे कि सभी को समान अवसर मिले।
    • कार्यान्वयन: यह गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता देने का निर्देश देता है। इसी के तहत विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (1987) पारित किया गया और NALSA की स्थापना हुई।
    • दर्शन: यह “ग्राम स्वराज” की गांधीवादी विचारधारा को दर्शाता है।
    • शासनादेश: राज्य ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए कदम उठाएगा और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक शक्तियाँ देगा।
    • कार्यान्वयन: इसे अंततः 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा दिया गया।

    यह अनुच्छेद सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित है। राज्य अपनी आर्थिक क्षमता की सीमाओं के भीतर निम्नलिखित को सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा:

    1. काम पाने का अधिकार।
    2. शिक्षा का अधिकार।
    3. लोक सहायता (Public Assistance): विशेष रूप से बेकारी (Unemployment), बुढ़ापे, बीमारी, विकलांगता और अन्य अभाव की स्थितियों में।
    • कार्यान्वयन: मनरेगा (MGNREGA) और वृद्धावस्था पेंशन योजनाएं सीधे अनुच्छेद 41 का परिणाम हैं।
    अनुच्छेदश्रेणीमुख्य शब्दकार्यान्वयन का उदाहरण
    36सामान्यराज्य की परिभाषाअनुच्छेद 12 से जुड़ा
    37प्रकृतिगैर-न्यायिककानून निर्माण हेतु मार्गदर्शन
    38कल्याणकारीन्याय और समानतागरीबी उन्मूलन योजनाएं
    39समाजवादीवितरणकारी न्यायसमान पारिश्रमिक अधिनियम
    39Aन्यायमुफ्त कानूनी सहायताNALSA / लोक अदालत
    40गांधीवादीपंचायत73वां संशोधन अधिनियम
    41सामाजिक सुरक्षालोक सहायतामनरेगा / पेंशन योजनाएं

    🌿 राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV)

    ⚖️ निदेशक तत्वों की प्रकृति
    ये आयरलैंड के संविधान से लिए गए हैं। ये गैर-न्यायोचित (अदालत द्वारा लागू नहीं) निर्देश हैं जिनका लक्ष्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य बनाना है।
    📜 अनुच्छेद 36 और 37
    अनु. 36: राज्य की परिभाषा (अनु. 12 के समान)। अनु. 37: ये सिद्धांत शासन के लिए आधारभूत हैं, भले ही इन्हें अदालत द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता।
    🌍 अनु. 38: लोक कल्याण
    राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय सुनिश्चित करने तथा आय, स्थिति और अवसरों की असमानताओं को कम करने का निर्देश देता है।
    💰 अनु. 39 और 39A: न्यायसंगत वितरण
    समान कार्य के लिए समान वेतन और संसाधनों का उचित वितरण। अनु. 39A गरीबों के लिए ‘मुफ्त कानूनी सहायता’ (जैसे NALSA) सुनिश्चित करता है।
    🏘️ अनु. 40: पंचायतें
    गांधीवादी विचार ग्राम स्वराज पर आधारित। ग्राम पंचायतों को स्वशासन की इकाइयों के रूप में गठित करने का निर्देश (73वें संशोधन द्वारा प्रभावी)।
    🛡️ अनु. 41: सामाजिक सुरक्षा
    बेरोजगारी, बुढ़ापा या बीमारी की स्थिति में काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता पाने का अधिकार। यह मनरेगा जैसी योजनाओं का आधार है।
    अनुच्छेद मुख्य विषय कार्यान्वयन का उदाहरण
    38कल्याणकारी राज्यगरीबी उन्मूलन योजनाएं
    39वितरणात्मक न्यायसमान पारिश्रमिक अधिनियम
    39Aमुफ्त कानूनी सहायतालोक अदालतें / NALSA
    40गांधीवादी स्वराजपंचायती राज (1992)
    41सार्वजनिक सहायतावृद्धावस्था पेंशन / मनरेगा
    मुख्य तथ्य मूल अधिकार (भाग III) राजनीतिक लोकतंत्र प्रदान करते हैं, जबकि निदेशक तत्व (भाग IV) सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र का लक्ष्य रखते हैं।

    यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (19 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव; वैश्विक रणनीतिक भू-राजनीति)।

    • संदर्भ: ट्रम्प प्रशासन ने यूरोपीय देशों के एक समूह पर बढ़ते टैरिफ (शुल्क) लगाने की धमकी दी है, जब तक कि अमेरिका को ग्रीनलैंड “खरीदने” की अनुमति नहीं दी जाती।
    • आर्थिक दबाव (Economic Coercion):
      • टैरिफ में वृद्धि: अमेरिका ने 1 फरवरी से यूरोपीय देशों के “सभी सामानों” पर 10% टैरिफ लगाने की योजना बनाई है, जिसे 1 जून तक बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा।
      • लक्षित राष्ट्र: इनमें डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं।
      • कानूनी स्थिति: इन एकपक्षीय कार्रवाइयों को अमेरिकी कांग्रेस का विधायी समर्थन प्राप्त नहीं है, और ‘अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम’ के उपयोग के खिलाफ न्यायिक फैसले की उम्मीद है।
    • रणनीतिक और राजनयिक परिणाम:
      • नाटो (NATO) पर प्रभाव: यूरोपीय संघ (EU) चिंतित है क्योंकि यह कदम व्यापार नीति को क्षेत्रीय जबरदस्ती के साथ जोड़ता है, जिससे नाटो गठबंधन में दरार आने का जोखिम है।
      • यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया: यूरोपीय देश “जबरदस्ती-रोधी उपकरण” (anti-coercion instrument) को सक्रिय कर सकते हैं, जो यूरोपीय संघ के भीतर प्रमुख अमेरिकी तकनीकी फर्मों के व्यापार को सीमित करने की एक सुविधा है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “तनाव में बहुपक्षवाद”, “वैश्विक आर्थिक कूटनीति” और “आर्कटिक भू-राजनीति” के लिए महत्वपूर्ण।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; शिक्षा से संबंधित मुद्दे; शासन)।

    • संदर्भ: भारत के उच्चतम न्यायालय ने छात्र आत्महत्याओं के एक मामले की सुनवाई करते हुए, उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) में छात्रों के तनाव को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को नौ विशिष्ट निर्देश जारी किए हैं।
    • प्रमुख न्यायिक निर्देश:
      • संकाय रिक्तियां (Faculty Vacancies): न्यायालय ने आदेश दिया है कि सरकारी और निजी दोनों संस्थानों में शिक्षकों के खाली पदों को चार महीने के भीतर भरा जाना चाहिए।
      • नेतृत्व नियुक्तियां: कुलपति और रजिस्ट्रार के पदों के खाली होने के एक महीने के भीतर नियुक्तियां पूरी की जानी चाहिए।
      • तनाव की निगरानी: नौ में से सात निर्देश मानसिक स्वास्थ्य तनावों को समझने और उन्हें कम करने के लिए आत्महत्याओं के अलग से रिकॉर्ड रखने और ट्रैकिंग पर केंद्रित हैं।
    • संकट का तकनीकी विश्लेषण:
      • रिक्तियों की स्थिति: भारत के कई सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में 50% तक शिक्षकों के पद खाली हैं।
      • मानसिक स्वास्थ्य अंतराल: एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, 65% संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता उपलब्ध नहीं हैं।
      • तनाव के कारण: सख्त उपस्थिति नीतियां, शिक्षकों की कमी और शोषणकारी शैक्षणिक संस्कृति (विशेषकर चिकित्सा शिक्षा में) को मुख्य कारणों के रूप में पहचाना गया।
    • UPSC प्रासंगिकता: “मानव संसाधन विकास”, “मानसिक स्वास्थ्य नीति” और “शिक्षा में न्यायिक सक्रियता”।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; पारदर्शिता और जवाबदेही; न्यायपालिका की भूमिका)।

    • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण (PC) अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला (Split Verdict) सुनाया।
    • कानूनी संघर्ष:
      • धारा 17A: यह प्रावधान करती है कि कोई भी पुलिस अधिकारी उपयुक्त सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना किसी लोक सेवक (Public Servant) के खिलाफ जांच शुरू नहीं कर सकता।
      • हितों का टकराव: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सरकार को जांच रोकने की शक्ति देना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, विशेष रूप से वहां जहां विभाग के अधिकारी आपस में मिले हुए हों।
    • न्यायाधीशों के अलग मत:
      • न्यायमूर्ति नागरत्ना: उन्होंने इस धारा को असंवैधानिक माना क्योंकि पूर्व मंजूरी की आवश्यकता जांच को बाधित करती है और भ्रष्टों को बचाती है।
      • न्यायमूर्ति विश्वनाथन: उन्होंने इस प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध पाया, बशर्ते कि मंजूरी की शक्ति सरकार के बजाय लोकपाल जैसी किसी स्वतंत्र एजेंसी के पास हो, ताकि नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) को रोका जा सके।
    • UPSC प्रासंगिकता: “भ्रष्टाचार विरोधी ढांचा”, “शक्तियों का पृथक्करण” और “प्रशासनिक कानून”।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; कमजोर वर्गों के संरक्षण के लिए गठित तंत्र और कानून)।

    • संदर्भ: के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने बाल तस्करी को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश दिए हैं, और कहा है कि यह जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
    • कानूनी ढांचा:
      • भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023: धारा 143 तस्करी को व्यापक रूप से परिभाषित करती है, जिसमें शोषण के उद्देश्य से बल, धोखाधड़ी या शक्ति के दुरुपयोग द्वारा व्यक्तियों की भर्ती शामिल है।
      • संवैधानिक संरक्षण: अनुच्छेद 23 और 24 मानव तस्करी और बाल श्रम से विशिष्ट सुरक्षा प्रदान करते हैं।
    • सांख्यिकीय विश्लेषण:
      • दोषसिद्धि दर: 2018 और 2022 के बीच तस्करी के अपराधों के लिए दोषसिद्धि दर मात्र 4.8% रही, जबकि अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 53,000 से अधिक बच्चों को बचाया गया।
    • UPSC प्रासंगिकता: “बाल अधिकार”, “मानवाधिकार प्रवर्तन” और “कानून-व्यवस्था में संघीय समन्वय”।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; पर्यावरण: प्रदूषण और जलवायु)।

    • संदर्भ: दिल्ली में भीषण कोहरे के बीच, मौसम केंद्रों द्वारा “दृश्यता” (Visibility) को मापने के पीछे के विज्ञान का विश्लेषण।
    • वैज्ञानिक परिभाषा:
      • MOR (Meteorological Optical Range): दृश्यता को औपचारिक रूप से उस दूरी के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्रकाश की एक किरण वायुमंडल में तब तक तय करती है जब तक कि उसकी तीव्रता (Luminous Flux) अपने मूल मूल्य के 5% तक न गिर जाए।
      • प्रकीर्णन प्रभाव (Scattering Effect): दृश्यता कम हो जाती है क्योंकि प्रकाश पानी की बूंदों (कोहरा), धुएं के कणों या धूल द्वारा परावर्तित या अवशोषित हो जाता है।
    • मापने की तकनीक:
      • ट्रांसमिसोमीटर (Transmissometer): ये एक लेजर ट्रांसमीटर और रिसीवर का उपयोग करते हैं जो एक निश्चित दूरी (20-75 मीटर) पर होते हैं। रिसीवर MOR निर्धारित करने के लिए गणना करता है कि कितना प्रकाश दूसरी ओर पहुँचा।
      • प्रदूषण का संबंध (Smog): IMD दृश्यता को ‘स्मॉग’ (धुआं + कोहरा) के आधार पर वर्गीकृत करता है। दिल्ली में दृश्यता अक्सर “विपन्न” (Poor – 50-200 मीटर) श्रेणी में गिर जाती है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक सिद्धांत” और “सर्दियों में बुनियादी ढांचे (विमानन और रेलवे) की चुनौतियां”।

    संपादकीय विश्लेषण

    19 जनवरी, 2026
    GS-2 अंत. संबंध
    🇬🇱 ग्रीनलैंड और आर्थिक दबाव की राजनीति
    अमेरिकी प्रशासन क्षेत्रीय खरीद (Territorial Purchase) के लिए 10% – 25% टैरिफ को हथियार बना रहा है। प्रभाव: व्यापार नीति को क्षेत्रीय संप्रभुता के साथ जोड़ना नाटो के गठबंधन के लिए खतरा है। ईयू अमेरिकी टेक फर्मों के खिलाफ कोएर्शन-विरोधी उपकरणों की तैयारी कर रहा है।
    GS-2 शिक्षा
    🎓 HEIs: छात्र तनाव पर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
    SC ने छात्रों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए नौ निर्देश जारी किए। प्रमुख आदेश: 4 महीने के भीतर संकाय रिक्तियों को भरें और 1 महीने में कुलपति (VC) की नियुक्तियां पूरी करें। लक्ष्य: कठोर उपस्थिति नियमों से हटकर मानसिक स्वास्थ्य समर्थक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना।
    GS-2 शासन
    ⚖️ भ्रष्टाचार कानून: धारा 17A पर विभाजित निर्णय
    लोक सेवकों की जांच के लिए ‘पूर्व मंजूरी’ की आवश्यकता पर सुप्रीम कोर्ट का खंडित फैसला। बहस: क्या धारा 17A जांच में बाधा डालती है (जस्टिस नागरत्ना) या यह नीतिगत पक्षाघात (Policy Paralysis) को रोकने के लिए आवश्यक सुरक्षा प्रदान करती है (जस्टिस विश्वनाथन)।
    GS-2 सामाजिक
    🧒 बाल तस्करी: दोषसिद्धि में भारी कमी
    2024-25 में 53,000+ बचाव के बावजूद, दोषसिद्धि दर मात्र 4.8% पर स्थिर है। कानूनी बदलाव: भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 143 न्यायिक परिणामों को सुधारने के लिए शोषण की परिभाषा को व्यापक बनाती है।
    GS-3 वि. एवं प्रौ.
    🌫️ कोहरा विज्ञान: मौसम संबंधी दृश्यता रेंज (MOR)
    दृश्यता को ‘MOR’ द्वारा मापा जाता है—वह दूरी जहाँ प्रकाश की तीव्रता 5% तक गिर जाती है। तकनीक: ट्रांसमिसोमीटर और फॉरवर्ड स्कैटर सेंसर स्मॉग के दौरान विमानन और रेलवे सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘ल्यूमिनस फ्लक्स’ की गणना करते हैं।

    यहाँ भारत के प्रमुख मौसम विज्ञान संबंधी और प्राकृतिक आपदा क्षेत्रों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    कृषि उत्पादकता और जल प्रबंधन को समझने के लिए वर्षा का मानचित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है।

    • अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (>200 सेमी):
      • पश्चिमी घाट: पवनमुखी ढलान (Windward slopes) जहाँ पर्वतीय वर्षा (Orographic rainfall) होती है।
      • उत्तर-पूर्व भारत: मेघालय की खासी पहाड़ियाँ (मौसिनराम और चेरापूंजी)।
    • मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (100–200 सेमी):
      • गंगा के मैदान: बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा।
    • न्यून वर्षा वाले क्षेत्र (<50 सेमी):
      • पश्चिमी राजस्थान: थार मरुस्थल क्षेत्र।
      • लेह/लद्दाख: ऊँचाई पर स्थित शीत मरुस्थल।
      • वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow area): आंतरिक दक्कन का पठार (मराठवाड़ा, रायलसीमा)।

    भारत की लंबी तटरेखा को चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।

    तट (Coast)सुभेद्यता स्तर (Vulnerability Level)उच्च जोखिम वाले जिले/बिंदु
    पूर्वी तटअत्यधिक उच्चओडिशा (पारादीप, पुरी), आंध्र प्रदेश (विशाखापत्तनम), पश्चिम बंगाल (सुंदरवन)।
    पश्चिमी तटमध्यमगुजरात (कच्छ, सौराष्ट्र), महाराष्ट्र (मुंबई, अलीबाग)।

    आपदा प्रबंधन अध्ययन के लिए इन क्षेत्रों का मानचित्रण एक बुनियादी आवश्यकता है।

    • बाढ़-प्रवण क्षेत्र:
      • ब्रह्मपुत्र बेसिन: असम घाटी (नदी के मार्ग में बार-बार परिवर्तन के कारण)।
      • गंगा बेसिन: उत्तरी बिहार (कोसी — “बिहार का शोक”) और पूर्वी उत्तर प्रदेश।
      • तटीय डेल्टा: मानसून के दौरान महानदी, गोदावरी और कृष्णा के डेल्टा क्षेत्र।
    • सूखा-प्रवण क्षेत्र:
      • शुष्क पश्चिम: पश्चिमी राजस्थान और कच्छ।
      • अर्ध-शुष्क दक्कन: महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के वे क्षेत्र जो पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र में आते हैं।

    भारत को भूकंपीय जोखिम के आधार पर विभिन्न ज़ोन में बांटा गया है:

    • ज़ोन V (अत्यधिक उच्च जोखिम): पूरा उत्तर-पूर्वी भारत, जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कच्छ का रण और उत्तरी बिहार।
    • ज़ोन IV (उच्च जोखिम): जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के शेष हिस्से, दिल्ली और गंगा के मैदान।
    आपदा/विशेषतामानचित्रण मुख्य बिंदुभौगोलिक फोकस
    सबसे आर्द्र स्थानमौसिनराममेघालय (पूर्वी भारत)
    बिहार का शोककोसी नदीउत्तरी बिहार
    वृष्टि छाया क्षेत्रमराठवाड़ाआंतरिक महाराष्ट्र
    चक्रवात हॉटस्पॉटबंगाल की खाड़ीभारत का पूर्वी तट

    वर्षा के वितरण मानचित्र को जनसंख्या घनत्व मानचित्र के साथ जोड़कर देखें। आप पाएंगे कि मध्यम से उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों (जैसे गंगा के मैदान) में जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक है।

    आपदा परिदृश्य (Hazard Landscapes)

    मौसम विज्ञान
    🌧️ समवर्षा रेखाएँ एवं वर्षा
    भारत में वर्षा का वितरण मौसिनराम और पश्चिमी घाट में >200cm की भारी वर्षा से लेकर थार और लेह-लद्दाख के ठंडे मरुस्थल के <50cm वाले शुष्क क्षेत्रों तक विस्तृत है।
    अभ्यास: अपने मानचित्र पर आंतरिक दक्कन के ‘वृष्टि छाया क्षेत्रों’ (मराठवाड़ा/रायलसीमा) को लोकेट करें।
    समुद्री जोखिम
    🌀 चक्रवातीय संवेदनशीलता
    अत्यधिक उच्च जोखिम वाला पूर्वी तट (ओडिशा, बंगाल) अक्सर बंगाल की खाड़ी के विक्षोभों का सामना करता है, जबकि पश्चिमी तट मध्यम संवेदनशील रहता है।
    अभ्यास: तटीय रक्षा भूगोल को समझने के लिए पारादीप और विशाखापत्तनम के उच्च-जोखिम वाले बंदरगाहों को खोजें।
    संरचनात्मक जोखिम
    ⚠️ भूकंपीय एवं बाढ़ क्षेत्र
    भूवैज्ञानिक अस्थिरता के मानचित्रण में भूकंपीय क्षेत्र V (पूर्वोत्तर भारत, कच्छ का रण) और बाढ़-प्रवण बिहार का शोक (कोसी नदी) की पहचान शामिल है।
    जोखिम क्षेत्र प्रमुख भौगोलिक केंद्र प्राथमिक आपदा
    क्षेत्र (Zone) Vपूर्वोत्तर भारत, उत्तराखंड, कच्छउच्चतम तीव्रता वाले भूकंप
    असम घाटीब्रह्मपुत्र बेसिनलगातार मार्ग परिवर्तन एवं बाढ़
    शुष्क पश्चिमराजस्थान, उत्तरी गुजरातगंभीर कृषि सूखा (Drought)
    आपदा मैपिंग चेकलिस्ट
    आपदा मैपिंग हाइलाइट भौगोलिक स्थान
    सबसे गीला स्थानमौसिनराममेघालय (खासी पहाड़ियाँ)
    बिहार का शोककोसी नदीउत्तरी बिहार डेल्टा
    वृष्टि छाया क्षेत्रमराठवाड़ाआंतरिक महाराष्ट्र
    चक्रवात हॉटस्पॉटबंगाल की खाड़ीभारत का पूर्वी तट

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 17 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय दिल्ली के एक शक्तिशाली राजधानी के रूप में परिवर्तन और 12वीं से 15वीं शताब्दी के बीच दिल्ली सल्तनत के विस्तार का विवरण देता है।

    दिल्ली पहली बार तोमर राजपूतों के काल में किसी राज्य की राजधानी बनी, जिन्हें 12वीं शताब्दी के मध्य में अजमेर के चौहानों ने पराजित किया।

    • वाणिज्यिक केंद्र: तोमरों और चौहानों के शासनकाल में दिल्ली एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र बन गई।
    • देहलीवाल: शहर में रहने वाले समृद्ध जैन व्यापारियों ने कई मंदिरों का निर्माण कराया और यहाँ ‘देहलीवाल’ नाम के सिक्के ढाले जाते थे, जिनका व्यापक प्रचलन था।
    • सल्तनत की स्थापना: 13वीं शताब्दी की शुरुआत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना के साथ दिल्ली का नियंत्रण उपमहाद्वीप के विशाल क्षेत्रों पर हो गया। सुल्तानों ने इस क्षेत्र में कई शहर बसाए, जैसे देहली-ए-कुहना, सीरी और जहाँपनाह

    इतिहासकार अभिलेखों, सिक्कों और स्थापत्य (भवन निर्माण कला) पर भरोसा करते हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण स्रोत ‘तवारीख़’ (एकवचन: तारीख) हैं। ये सुल्तानों के शासनकाल में प्रशासन की भाषा फारसी में लिखे गए इतिहास हैं।

    • तवारीख़ के लेखक: ये शिक्षित व्यक्ति—सचिव, प्रशासक, कवि और दरबारी होते थे—जो शहरों (मुख्यतः दिल्ली) में रहते थे।
    • शासकों को सलाह: वे अक्सर सुल्तानों के लिए पुरस्कार की आशा में लिखते थे और उन्हें ‘जन्मसिद्ध अधिकार’ और ‘लिंग भेद’ पर आधारित एक “आदर्श” सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की सलाह देते थे।
    • रज़िया सुल्तान: 1236 में सुल्तान इल्तुतमिश की बेटी, रज़िया, सुल्तान बनी। हालाँकि वह अपने भाइयों से अधिक योग्य थी, लेकिन एक महिला शासक होने के कारण दरबारी और दरबारी रईस (अमीर) असहज थे, जिसके कारण 1240 में उसे सिंहासन से हटा दिया गया।

    सल्तनत का नियंत्रण दो मुख्य सीमाओं के माध्यम से फैला:

    • आंतरिक सीमा (Internal Frontier): इन अभियानों का लक्ष्य ‘ग़ैरिसन शहरों’ (सैनिकों वाली किलेबंद बसावट) के भीतरी क्षेत्रों (Hinterlands) को मजबूत करना था। इसके तहत गंगा-यमुना दोआब से जंगलों को साफ किया गया और कृषि को बढ़ावा देने के लिए शिकारी-संग्राहकों और चरवाहों को वहां से खदेड़ दिया गया।
    • बाहरी सीमा (External Frontier): दक्षिण भारत में सैन्य अभियान अलाउद्दीन ख़लजी के शासनकाल में शुरू हुए और मुहम्मद तुग़लक़ के समय अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए। इन सेनाओं ने हाथियों, घोड़ों और दासों पर कब्जा किया और बहुमूल्य धातुओं को लूटा।

    इतने विशाल साम्राज्य को संगठित करने के लिए सुल्तानों को विश्वसनीय गवर्नरों और प्रशासकों की आवश्यकता थी।

    • बंदगी (Bandagan): शुरुआती सुल्तानों (विशेषकर इल्तुतमिश) ने कुलीन वर्ग के बजाय सैन्य सेवा के लिए खरीदे गए विशेष दासों को प्राथमिकता दी, जिन्हें फारसी में ‘बंदगी’ कहा जाता था। उन्हें महत्वपूर्ण पदों के लिए प्रशिक्षित किया जाता था और वे पूरी तरह अपने मालिक पर निर्भर होते थे।
    • इक्ता प्रणाली (Iqta System): ख़लजी और तुग़लक़ शासकों ने सैन्य कमांडरों को विभिन्न क्षेत्रों के गवर्नर के रूप में नियुक्त किया, जिन्हें ‘इक्ता’ कहा जाता था।
    • मुक्ती (Muqtis): इन इक्ता के धारकों को ‘मुक्ती’ या ‘इक्तादार’ कहा जाता था। उनका कर्तव्य सैन्य अभियानों का नेतृत्व करना और अपने इक्ता में कानून-व्यवस्था बनाए रखना था। इसके बदले में, वे वेतन के रूप में राजस्व (Tax) वसूलते थे।
    • नियंत्रण: मुक्ती को शक्तिशाली होने से रोकने के लिए उनका पद अनुवांशिक नहीं होता था और उन्हें थोड़े समय के लिए ही इक्ता दिया जाता था। राजस्व की जाँच के लिए राज्य द्वारा लेखाकार (Accountants) नियुक्त किए जाते थे।
    • स्थानीय सामंत: अलाउद्दीन ख़लजी जैसे सुल्तानों ने स्थानीय सामंतों और जमींदारों को अपनी सत्ता स्वीकार करने और कर देने के लिए मजबूर किया। राज्य ने राजस्व निर्धारण और संग्रह को अपने नियंत्रण में ले लिया।
    • मंगोल आक्रमण: अलाउद्दीन ख़लजी और मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में अफगानिस्तान की ओर से मंगोल आक्रमण बढ़ गए।
      • अलाउद्दीन ख़लजी ने रक्षात्मक रुख अपनाया, एक नया ग़ैरिसन शहर (सीरी) बनवाया और एक बड़ी स्थायी सेना रखी।
      • मुहम्मद तुग़लक़ ने आक्रामक योजना बनाई और एक विशाल सेना तैयार की। हालाँकि, राजधानी को दौलताबाद स्थानांतरित करना और ‘सांकेतिक मुद्रा’ (Token Currency) चलाना जैसे उनके प्रशासनिक प्रयोग विफल रहे।

    तुग़लक़ों के बाद, सैयद और लोदी राजवंशों ने 1526 तक दिल्ली और आगरा से शासन किया।

    • नए राज्य: इस समय तक जौनपुर, बंगाल, मालवा, गुजरात, राजस्थान और दक्षिण भारत में स्वतंत्र शासकों ने शक्तिशाली राज्य स्थापित कर लिए थे।
    • शेर शाह सूरी: एक छोटे से इलाके के प्रबंधक से शुरुआत करके, उन्होंने मुगल सम्राट हुमायूँ को चुनौती दी और पराजित किया। हालाँकि सूरी वंश ने केवल 15 वर्षों तक शासन किया, लेकिन इसकी प्रशासनिक व्यवस्था इतनी उत्कृष्ट थी कि बाद में महान सम्राट अकबर ने इसे अपने मॉडल के रूप में अपनाया।
    1. राजपूत राजवंश (तोमर और चौहान)
    2. प्रारंभिक तुर्की शासक (कुतुबुद्दीन ऐबक, इल्तुतमिश, रज़िया, बलबन)
    3. ख़लजी वंश (जलालुद्दीन और अलाउद्दीन)
    4. तुग़लक़ वंश (ग़यासुद्दीन, मुहम्मद और फ़िरोज़ शाह)
    5. सैयद और लोदी वंश
    6. सूरी वंश (शेर शाह सूरी)

    🕌 दिल्ली के सुल्तान (12वीं-15वीं शताब्दी)

    📜 तवारीख़ और रज़िया
    फारसी में लिखे गए इतिहास (तवारीख़) सुल्तानों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। एक प्रमुख व्यक्तित्व रज़िया सुल्तान (1236) थीं, जो पहली महिला शासिका बनीं, लेकिन दरबारी उनके स्वतंत्र शासन से असहज थे।
    🏹 सैन्य विस्तार
    विस्तार दो मोर्चों पर हुआ: आंतरिक सीमा (गंगा-यमुना दोआब के जंगलों को साफ करना) और बाहरी सीमा (अलाउद्दीन ख़ल्जी और मुहम्मद तुग़लक़ द्वारा दक्षिण भारत पर सैन्य अभियान)।
    ⚖️ प्रशासन और इक्ता
    सुल्तानों ने बंदगाँ (सैन्य गुलामों) और इक्ता प्रणाली का उपयोग किया। ‘मुक्ति’ कहलाने वाले गवर्नर अपने क्षेत्रों से राजस्व वसूलते थे और अपनी सेना का रखरखाव करते थे।
    🐎 मंगोल चुनौतियां
    मंगोल आक्रमणों का सामना करने के लिए अलाउद्दीन ख़ल्जी ने ‘सीरी’ नामक सैन्य शहर बनवाया। मुहम्मद तुग़लक़ ने ‘सांकेतिक मुद्रा’ और राजधानी स्थानांतरण जैसे प्रयोग किए, जो असफल रहे।
    सूरी वंश शेरशाह सूरी ने हुमायूँ को हराकर एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की, जिसे बाद में महान मुगल सम्राट अकबर ने अपनाया।
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    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-3 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: दिल्ली के सुल्तान

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    मौलिक अधिकारों का वर्णन संविधान के भाग III में किया गया है। इन्हें अक्सर “भारत का मैग्ना कार्टा” कहा जाता है। ये अधिकार नागरिकों के भौतिक और नैतिक विकास के लिए आवश्यक बुनियादी स्थितियाँ प्रदान करते हैं। ये अधिकार वाद-योग्य (Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है कि इनका उल्लंघन होने पर इन्हें अदालतों (उच्चतम और उच्च न्यायालय) के माध्यम से लागू करवाया जा सकता है।

    • अनुच्छेद 12: “राज्य” की परिभाषा
      मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि जवाबदेह कौन है। इसके अंतर्गत ‘राज्य’ में शामिल हैं:
      • संघ की विधायी और कार्यकारी अंग: संसद, मंत्रालय, राष्ट्रपति।
      • राज्यों की विधायी और कार्यकारी अंग: विधानसभा, राज्यपाल।
      • स्थानीय प्राधिकारी: नगरपालिकाएं, पंचायतें।
      • अन्य निकाय: वैधानिक और गैर-वैधानिक निकाय जैसे LIC, ONGC और SAIL।
      • प्रमुख मामला: अजय हासिया बनाम खालिद मुजीब मामले में ‘इंस्ट्रुमेंटालिटी टेस्ट’ (उपकरण परीक्षण) स्थापित किया गया।
    • अनुच्छेद 13: मूल अधिकारों से असंगत विधियाँ
      यह अनुच्छेद न्यायपालिका को ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) की शक्ति देता है।
      • 13(1): संविधान पूर्व की वे विधियाँ जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं, शून्य हो जाएंगी (आच्छादन का सिद्धांत – Doctrine of Eclipse)।
      • 13(2): राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो मौलिक अधिकारों को छीनती या कम करती हो (पृथक्करणीयता का सिद्धांत – Doctrine of Severability)।
      • 13(3): “विधि” शब्द को व्यापक रूप से परिभाषित किया गया है जिसमें अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना और रूढ़ियाँ शामिल हैं।

    • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता
      • विधि के समक्ष समता: कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है (ब्रिटिश अवधारणा)।
      • विधियों का समान संरक्षण: समान परिस्थितियों में सभी के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए (अमेरिकी अवधारणा)।
      • तर्कसंगत वर्गीकरण: कानून अलग-अलग समूहों के साथ अलग व्यवहार कर सकता है, यदि वह वर्गीकरण तर्कसंगत हो और मनमाना न हो।
    • अनुच्छेद 15: भेदभाव का प्रतिषेध
      • राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
      • अपवाद: महिलाओं, बच्चों, SC/ST और OBC के सामाजिक उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं।
    • अनुच्छेद 16: लोक नियोजन में अवसर की समता
      • सरकारी नौकरियों में सभी नागरिकों को समान अवसर सुनिश्चित करता है।
      • अपवाद: यदि किसी पिछड़े वर्ग का राज्य की सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, तो उनके लिए आरक्षण का प्रावधान किया जा सकता है।
    • अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत
      • अस्पृश्यता को समाप्त कर दिया गया है और इसका किसी भी रूप में अभ्यास एक दंडनीय अपराध है। यह एक ‘पूर्ण अधिकार’ (Absolute Right) है।
    • अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत
      • राज्य सेना या शिक्षा संबंधी सम्मान के अलावा कोई अन्य उपाधि प्रदान नहीं करेगा।
      • भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।
      • नोट: राष्ट्रीय पुरस्कार (भारत रत्न, पद्म पुरस्कार आदि) वैध हैं, लेकिन इन्हें नाम के आगे या पीछे (उपसर्ग/प्रत्यय) के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता।
    • अनुच्छेद 19: 6 स्वतंत्रताओं का संरक्षण
      1. भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (इसमें प्रेस की स्वतंत्रता शामिल है)।
      2. शांतिपूर्वक और बिना हथियारों के एकत्रित होने की स्वतंत्रता।
      3. संघ या संगठन (सहकारी समितियाँ भी) बनाने की स्वतंत्रता।
      4. भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में अबाध संचरण (घूमने) की स्वतंत्रता।
      5. भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने की स्वतंत्रता।
      6. कोई भी पेशा, व्यवसाय या व्यापार करने की स्वतंत्रता।
      • नोट: ये स्वतंत्रताएँ निरपेक्ष नहीं हैं और इन पर ‘तर्कसंगत प्रतिबंध’ (जैसे देश की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था आदि) लगाए जा सकते हैं।
    • अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
      • कार्योत्तर विधि (Ex-Post-Facto Law): किसी व्यक्ति को तब तक दंडित नहीं किया जा सकता जब तक उसने किसी प्रभावी कानून का उल्लंघन न किया हो।
      • दोहरा दंड (Double Jeopardy): एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार दंडित नहीं किया जाएगा।
      • आत्म-अभिशंसन (Self-Incrimination): किसी को स्वयं के विरुद्ध गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
    • अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
      • किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना उसके जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा।
      • विस्तृत दायरा: इसमें निजता का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, स्वास्थ्य और त्वरित सुनवाई का अधिकार भी शामिल है।
    • अनुच्छेद 21A: 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार।
    • अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
      • दंडात्मक निरोध (Punitive Detention): गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी का कारण बताना होगा, वकील से परामर्श का अधिकार देना होगा और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा।
      • निवारक निरोध (Preventive Detention): भविष्य में अपराध रोकने के लिए बिना मुकदमे के हिरासत (सलाहकार बोर्ड की समीक्षा के बिना अधिकतम 3 महीने)।
    • अनुच्छेद 23: मानव तस्करी और बलात श्रम का निषेध
      • मानव तस्करी, बेगार (बिना भुगतान के श्रम) और जबरन श्रम के अन्य रूपों को प्रतिबंधित करता है।
    • अनुच्छेद 24: कारखानों आदि में बालकों के नियोजन का प्रतिषेध
      • 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों, खानों या किसी भी जोखिम भरे काम में लगाने पर रोक लगाता है।
    • अनुच्छेद 25: अंतःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने की व्यक्तिगत स्वतंत्रता।
    • अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंधन और संपत्ति रखने का सामूहिक अधिकार।
    • अनुच्छेद 27: किसी विशिष्ट धर्म की उन्नति के लिए कर (Tax) देने की अनिवार्यता से मुक्ति।
    • अनुच्छेद 28: पूर्णतः सरकारी निधि से संचालित शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा देने पर रोक।
    • अनुच्छेद 29: नागरिकों के किसी भी अनुभाग (अल्पसंख्यकों) की विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार।
    • अनुच्छेद 30: धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार।
    • अनुच्छेद 31: इसे निरस्त कर दिया गया है (संपत्ति का अधिकार अब अनुच्छेद 300A के तहत एक कानूनी अधिकार है)।
    • अनुच्छेद 32: संवैधानिक उपचारों का अधिकार
      • डॉ. अंबेडकर ने इसे संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा है। यह नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे उच्चतम न्यायालय जाने का अधिकार देता है।
      • उच्चतम न्यायालय 5 प्रकार की रिट (Writs) जारी कर सकता है:
        1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus): “शरीर को प्रस्तुत करना”।
        2. परमादेश (Mandamus): “हम आदेश देते हैं” (सार्वजनिक कर्तव्य पालन के लिए)।
        3. प्रतिषेध (Prohibition): निचली अदालत को रोकने के लिए।
        4. उत्प्रेषण (Certiorari): आदेश को रद्द करने के लिए।
        5. अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto): “किस अधिकार से” (सार्वजनिक पद की वैधता की जांच)।
    • अनुच्छेद 33: संसद को सशस्त्र बलों/पुलिस के मौलिक अधिकारों को सीमित करने की शक्ति देता है ताकि अनुशासन बना रहे।
    • अनुच्छेद 34: किसी क्षेत्र में ‘मार्शल लॉ’ (सैनिक शासन) लागू होने पर अधिकारों पर प्रतिबंध।
    • अनुच्छेद 35: केवल संसद के पास मौलिक अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने की शक्ति है (राज्य विधानमंडलों के पास नहीं)।
    समूहअनुच्छेदमुख्य सार
    समता (Equality)14–18सामाजिक और कानूनी निष्पक्षता।
    स्वतंत्रता (Freedom)19–22व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संरक्षण।
    शोषण के विरुद्ध23–24मानवीय गरिमा की रक्षा।
    धर्म (Religion)25–28धर्मनिरपेक्षता और विश्वास।
    शिक्षा/संस्कृति29–30अल्पसंख्यक पहचान।
    उपचार (Remedies)32–35न्यायिक संरक्षण (हृदय और आत्मा)।

    इन ट्रिक्स के माध्यम से आप अनुच्छेद संख्या को मुख्य शब्दों से जोड़ सकते हैं।

    यह क्रम को याद रखने का सबसे लोकप्रिय तरीका है:

    • 12-13: 12 में ‘State’ बताया, 13 में ‘Law’ सुधार दिया।
    • 14-18 (समता): सब Barabar (14), No Bhedbhav (15), Job का Mauka (16), Chhuachhoot खत्म (17), Title खत्म (18)।
    • 19-22 (स्वतंत्रता): 19 Bola, 20 Bach gaya (दोषसिद्धि), 21 Jeeya (जीवन), 22 Reha hua (गिरफ्तारी)।
    • 23-24 (शोषण): 23 Badi तस्करी (बड़ों का शोषण), 24 Chhote बच्चे (बाल श्रम)।

    यह पहले क्लस्टर (14–18) के क्रम को याद रखने में मदद करता है:
    E — D — O — U — T

    • E – Equality before law (विधि के समक्ष समता – 14)
    • D – Discrimination prohibition (भेदभाव का निषेध – 15)
    • O – Opportunity in employment (अवसर की समता – 16)
    • U – Untouchability abolition (अस्पृश्यता का अंत – 17)
    • T – Titles abolition (उपाधियों का अंत – 18)

    अनुच्छेद 19(1) के तहत 6 स्वतंत्रताओं के लिए:
    S – O – L – E – A — (P)

    • S – Speech (भाषण)
    • O – Organize (सम्मेलन/एकत्रित होना)
    • L – League (संघ/Association बनाना)
    • E – Everywhere movement (कहीं भी घूमना)
    • A – Anywhere residence (कहीं भी बसना)
    • P – Profession (पेशा/व्यवसाय)

    अल्पसंख्यक स्कूल की एक छोटी कहानी के रूप में:

    • 25-28 (धर्म): “मानो (Believe-25), प्रबंध करो (Manage-26), टैक्स मत दो (No Tax-27), प्रार्थना का दबाव नहीं (No Prayer-28)।”
    • 29-30 (अल्पसंख्यक): “संस्कृति बचाओ (Save Culture-29), स्कूल खोलो (Open School-30)।”

    “कोर्ट की पुकार” के रूप में सोचें:

    • 32: डॉक्टर (उपचार – “हृदय और आत्मा”)
    • 33: सैनिक (सशस्त्र बल सीमाएँ)
    • 34: मार्शल (सैनिक शासन)
    • 35: संसद (मौलिक अधिकारों के लिए कानून बनाने की शक्ति)
    अनुच्छेद श्रेणीनिमोनिक (Trick)विषय
    14–18E-DOUTसमता
    19S-OLEA6 स्वतंत्रताएँ
    23–24बड़ा vs छोटाशोषण
    25–28मानो और प्रबंध करोधर्म
    32डॉक्टर (इलाज)रिट्स (Writs)

    🇮🇳 मौलिक अधिकार (भाग III)

    🏛️ अनुच्छेद 12: राज्य की परिभाषा
    उन निकायों की पहचान करता है जो मूल अधिकारों के प्रति जवाबदेह हैं: संघ/राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय और वैधानिक संस्थाएं जैसे LIC, ONGC, SAIL
    🛡️ अनुच्छेद 13: न्यायिक समीक्षा
    यह अधिकारों का “सुरक्षा कवच” है। यह उन कानूनों को शून्य घोषित करता है जो मूल अधिकारों से टकराते हैं। इसमें आच्छादन (Eclipse) और पृथक्करणीयता का सिद्धांत शामिल है।
    प्रो टिप
    मौलिक अधिकारों को भारत का मैग्ना कार्टा कहा जाता है क्योंकि ये न्यायोचित (Justiciable) हैं और राज्य की मनमानी शक्ति पर रोक लगाते हैं।
    ⚖️ समानता (14–18)
    14: विधि के समक्ष समता। 15: भेदभाव निषेध। 16: अवसर की समता। 17: अस्पृश्यता का अंत। 18: उपाधियों का अंत।
    🗽 स्वतंत्रता (19–22)
    19: 6 स्वतंत्रताएं। 20: अपराध दोषसिद्धि से संरक्षण। 21: जीवन और निजता। 21A: शिक्षा का अधिकार। 22: गिरफ्तारी से संरक्षण।
    🛑 शोषण के विरुद्ध (23–24)
    23: मानव तस्करी और बेगार (जबरन श्रम) पर रोक। 24: 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए कारखानों में बाल श्रम निषेध।
    🕌 धार्मिक स्वतंत्रता (25–28)
    25: व्यक्तिगत आस्था। 26: धार्मिक प्रबंधन। 27: धार्मिक करों से मुक्ति। 28: धार्मिक शिक्षा में उपस्थिति से स्वतंत्रता।
    🎨 संस्कृति एवं शिक्षा (29–30)
    29: अल्पसंख्यकों की भाषा/संस्कृति की रक्षा। 30: अल्पसंख्यकों को अपने शिक्षण संस्थान चलाने का अधिकार।
    🏥 उपचार (32–35)
    32: संवैधानिक उपचार (रिट)। 33: सैन्य बलों के अधिकार। 34: मार्शल लॉ। 35: अधिकारों को प्रभावी बनाने की संसद की शक्ति।
    वर्ग (Cluster) अनुच्छेद मुख्य सार
    समानता14–18सामाजिक और कानूनी न्याय।
    स्वतंत्रता19–22व्यक्तिगत आजादी और सुरक्षा।
    धर्म25–28पंथनिरपेक्षता और विश्वास।
    उपचार32–35संविधान का “हृदय और आत्मा”।

    🧠 एग्जाम हैक्स और ट्रिक्स

    🇮🇳 हिंग्लिश राइम (12-24)
    12-13: Definition और Correction.
    14-18: सब बराबर, जॉब मौका, छुआछूत खत्म!
    19-22: 19 बोला, 20 बचा, 21 जिया, 22 रिहा हुआ।
    🔠 सूत्र: E-DOUT और S-OLEA
    E-DOUT: Equality, Discrim, Opp, Untouch, Titles.
    S-OLEA: Speech, Organize, League, Everywhere, Anywhere.
    🏫 अल्पसंख्यक स्कूल (25-30)
    Believe (25), Manage (26), No Tax (27), No Pressure (28), Save Culture (29), Open School (30)।
    ⚖️ रक्षक सूत्र (32-35)
    32: डॉक्टर (उपचार)
    33: सैनिक (सशस्त्र बल)
    34: मार्शल (सेना कानून)
    35: संसद (कानून बनाने की शक्ति)
    परीक्षा तथ्य
    अनुच्छेद 20 और 21 केवल दो ऐसे मौलिक अधिकार हैं जिन्हें राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है।

    यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (17 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।

    • संदर्भ: ट्रम्प प्रशासन द्वारा की गई हालिया आक्रामक और एकपक्षीय भू-राजनीतिक कार्रवाइयों (विशेष रूप से ईरान और वेनेजुएला के संबंध में) पर भारत की “मौन” प्रतिक्रियाओं का आलोचनात्मक विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • भू-राजनीतिक उथल-पुथल: संपादकीय अमेरिकी कार्रवाइयों की एक श्रृंखला पर प्रकाश डालता है: वेनेजुएला के राष्ट्रपति की गिरफ्तारी, दक्षिण अमेरिका में शासन परिवर्तन की धमकियाँ, ग्रीनलैंड के अधिग्रहण की योजना और रूसी तेल व यूरेनियम पर 500% टैरिफ का प्रस्ताव।
      • ईरान का दबाव: अमेरिका कथित तौर पर भारत पर चाबहार पोर्ट में परिचालन बंद करने का दबाव बना रहा है, जहाँ भारत ने करोड़ों का निवेश किया है। साथ ही ईरान के साथ व्यापार करने वाले किसी भी देश पर 25% अतिरिक्त टैरिफ की धमकी दी गई है।
      • नई दिल्ली का रुख: भारत की प्रतिक्रिया को “कमजोर” या “मौन” बताया गया है। हालाँकि विदेश मंत्रालय ने वेनेजुएला पर “गहरी चिंता” व्यक्त की, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के लिए अमेरिका का नाम लेने से परहेज किया।
    • UPSC प्रासंगिकता: “रणनीतिक स्वायत्तता”, “भारत-अमेरिका संबंध” और “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • 2019 का सबक: संपादकीय चेतावनी देता है कि 2019 में अमेरिकी दबाव में ईरानी और वेनेजुएला का तेल खरीदना बंद करने का भारत का निर्णय एक “सबक” होना चाहिए कि तुष्टीकरण से राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं की जा सकती।
      • प्रतिष्ठा का जोखिम: चूंकि भारत BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की तैयारी कर रहा है, अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन पर उसकी चुप्पी ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के भागीदारों के बीच उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकती है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएं; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

    • संदर्भ: 28 दिसंबर, 2025 को अपनी 140वीं वर्षगांठ के बाद, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थागत क्षरण और संरचनात्मक गिरावट का विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • गिरावट की जड़ें: लेखिका (ज़ोया हसन) का तर्क है कि भाजपा और कांग्रेस को समान मानना एक गलती है। भाजपा के पास RSS जैसा एक ठोस वैचारिक और कैडर आधार है, जो चुनाव चक्रों से स्वतंत्र होकर नेतृत्व को पुनर्जीवित करता है।
      • संगठनात्मक क्षरण: दशकों से कांग्रेस एक मजबूत जमीनी संगठन से हटकर शीर्ष पर केंद्रित सत्ता वाली पार्टी बन गई है, जिससे स्थानीय नेतृत्व कमजोर हुआ है।
      • खुलेपन का विरोधाभास: अन्य दलों के विपरीत, कांग्रेस आंतरिक असहमति (जैसे G-23) को सहन करती है, लेकिन इस खुलेपन को अक्सर गुटबाजी और अनिर्णय के रूप में देखा जाता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “राजनीतिक दल और शासन”, “राजनीतिक संस्थानों में आंतरिक लोकतंत्र” और “विपक्ष की चुनौतियां”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • विकेंद्रीकरण का मिथक: जहाँ भाजपा अपनी राज्य इकाइयों पर कड़ा केंद्रीय नियंत्रण रखती है, वहीं कांग्रेस अक्सर विकेंद्रीकृत प्रबंधन की अनुमति देती है, जो भाजपा की “चुनावी मशीनरी” के सामने एक कमजोरी बन जाती है।
      • सुधार में बाधा: राहुल गांधी के पार्टी सुधार के प्रयासों को अक्सर उन वरिष्ठ नेताओं द्वारा रोक दिया जाता है जो यथास्थिति से लाभान्वित होते हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; विकास)।

    • संदर्भ: फिक्की (FICCI) की महानिदेशक ज्योति विज की सिफारिशें कि आगामी केंद्रीय बजट वैश्विक बाधाओं के बीच घरेलू विकास को कैसे मजबूत कर सकता है।
    • मुख्य बिंदु:
      • प्रेरक के रूप में रक्षा: बजट में रक्षा क्षेत्र में पूंजीगत परिव्यय (Capital Outlay) की हिस्सेदारी 26.4% से बढ़ाकर 30% करनी चाहिए और DRDO के आवंटन में कम से कम ₹10,000 करोड़ की वृद्धि करनी चाहिए।
      • खनिज सुरक्षा: ‘राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन’ (NCMM) को सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए सामग्री सुरक्षित करने हेतु विशेष वित्तपोषण की आवश्यकता है।
      • निर्यात प्रतिस्पर्धा: वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए RoDTEP योजना (निर्यातित उत्पादों पर शुल्क और करों की छूट) के आवंटन में बड़ी वृद्धि की आवश्यकता है।
      • ड्रोन इकोसिस्टम: सरकार को वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए ₹1,000 करोड़ का ‘ड्रोन R&D फंड’ बनाना चाहिए।
    • UPSC प्रासंगिकता: “आर्थिक योजना”, “रक्षा स्वदेशीकरण” और “औद्योगिक नीति”।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; संरक्षण; मानव-वन्यजीव संघर्ष)।

    • संदर्भ: झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में एक हाथी द्वारा कम से कम 20 लोगों की जान लेने की घटना पर एक विस्तृत रिपोर्ट।
    • मुख्य बिंदु:
      • संघर्ष का पैमाना: हमले मुख्य रूप से रात में हुए हैं, जिससे ग्रामीणों में व्यापक दहशत है। ग्रामीण अब समूहों में या ऊंचे स्थानों पर सोने को मजबूर हैं।
      • आवास क्षरण (Habitat Degradation): ‘भारतीय वन्यजीव संस्थान’ (WII) का अध्ययन बताता है कि सारंडा के जंगलों में लौह अयस्क के अत्यधिक खनन के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो गए हैं।
      • खंडित परिदृश्य: झारखंड में हाथियों की संख्या 2017 के 678 से गिरकर आज केवल 217 रह गई है। जीवित हाथी खंडित क्षेत्रों में सीमित हैं जहाँ उनकी आहार संबंधी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पातीं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “मानव-वन्यजीव संघर्ष”, “खनन का पर्यावरणीय प्रभाव” और “जैव विविधता संरक्षण”।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।

    • संदर्भ: उत्तर प्रदेश में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के पहले मसौदे के दौरान 2.89 करोड़ (कुल का 18.7%) मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
    • मुख्य बिंदु:
      • शहरी प्रभाव: लखनऊ (30%) और गाजियाबाद (28%) जैसे शहरी क्षेत्रों में नाम हटाए जाने की दर सबसे अधिक है। इनमें वे लोग शामिल हैं जो काम के लिए पलायन कर गए थे लेकिन अपने मूल स्थान पर संपत्ति रखते थे।
      • नागरिकता का मुद्दा: इस पुनरीक्षण ने नागरिकता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो 2003 की मतदाता सूची से खुद को नहीं जोड़ पा रहे हैं और उन्हें अब सुनवाई में अनिवार्य दस्तावेज पेश करने होंगे।
      • सिस्टम की खामियां: मतदाता शिकायत कर रहे हैं कि निर्वाचन आयोग (EC) प्रविष्टियों में सुधार के लिए ‘फॉर्म 8’ तो स्वीकार कर रहा है, लेकिन “निवास परिवर्तन” के लिए नहीं, जिससे परिवारों को नए सिरे से पंजीकरण करने और पुराने रिकॉर्ड हटाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “चुनावी अखंडता”, “प्रवासी श्रमिकों के अधिकार” और “निर्वाचन आयोग की भूमिका”।
    1. इंसुरेक्शन एक्ट (Insurrection Act): अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने बड़े विरोध प्रदर्शनों के खिलाफ सेना तैनात करने के लिए इस 19वीं शताब्दी के कानून को लागू करने की धमकी दी है।
    2. बीज विधेयक (Seeds Bill): बीजों की गुणवत्ता और पारदर्शिता (QR कोड के माध्यम से) सुनिश्चित करने के लिए आगामी बजट सत्र में पेश होने की संभावना।
    3. SPREE योजना: ‘नियोक्ताओं/कर्मचारियों के पंजीकरण को बढ़ावा देने की योजना’ (SPREE) ने 1.03 करोड़ नए श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा (ESIC) के दायरे में लाया है।
    4. जल्लीकट्टू (Jallikattu): पोंगल के अवसर पर तमिलनाडु (पालमेडु) और आंध्र प्रदेश (पुल्लैयागरीपल्ले) में पारंपरिक सांडों को वश में करने वाले खेल शुरू हुए।
    5. इरीना क्रश (Irina Krush): शतरंज ग्रैंडमास्टर बनने वाली एकमात्र अमेरिकी महिला, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय शतरंज में अपनी शुरुआत भारत के कोझिकोड से की थी।

    संपादकीय विश्लेषण

    17 जनवरी, 2026
    GS-2 अंत. संबंध
    🇮🇳 रणनीतिक स्वायत्तता: चुप्पी की कीमत
    अमेरिकी एकपक्षवाद (वेनेजुएला/ईरान) पर भारत की “मौन” प्रतिक्रिया ‘ग्लोबल साउथ’ में इसकी प्रतिष्ठा को जोखिम में डालती है। मुख्य चिंता: चाबहार बंदरगाह परिचालन को समेटने के लिए अमेरिकी दबाव। सबक: अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन पर चुप्पी अल्पकालिक लाभ दे सकती है लेकिन रणनीतिक स्वतंत्रता को कमजोर करती है।
    GS-2 राजव्यवस्था
    🏛️ कांग्रेस के 140 वर्ष: संरचनात्मक अंतराल
    संस्थागत क्षरण बनाम भाजपा के RSS-कैडर मॉडल का विश्लेषण। मुख्य मुद्दा: स्थानीय नेतृत्व की कमी और खुलेपन का विरोधाभास (गुटबाजी)। समाधान: सामयिक लामबंदी से आगे बढ़कर एक सामाजिक रूप से जुड़ा हुआ और आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक पार्टी ढांचा तैयार करना।
    GS-3 अर्थव्यवस्था
    📉 बजट 2026-27: फिक्की (FICCI) का खाका
    रक्षा पूंजीगत परिव्यय को 30% तक बढ़ाने और ₹1,000 करोड़ का ड्रोन R&D फंड स्थापित करने की सिफारिश। महत्वपूर्ण खनिजों के लिए “टेलिंग्स रिकवरी” (अपशिष्ट से निष्कर्षण) और घरेलू विकास को स्थिर करने के लिए दो-स्तरीय कर विवाद समाधान पर ध्यान।
    GS-3 पर्यावरण
    🐘 हाथियों का प्रकोप: आवास विखंडन
    सारंडा वन (झारखंड) में लौह अयस्क खनन के कारण हाथियों के उत्पात में वृद्धि। डेटा: हाथियों की आबादी 678 (2017) से घटकर 217 (2025) रह गई है। आवास विखंडन के कारण नर हाथी आक्रामक होकर ग्रामीणों के लिए खतरा बन रहे हैं।
    GS-2 शासन
    🗳️ SIR: शहरी मतदाता विलोपन संकट
    यूपी में मतदाता सूची से 2.89 करोड़ नाम हटाए गए (कुल का 18.7%)। लखनऊ (30%) जैसे शहरी केंद्र सबसे ज्यादा प्रभावित। विवाद: नए नियम दोहरी प्रविष्टि को अपराध मानते हैं, जिससे प्रवासी श्रमिकों को शहर या गांव में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
    त्वरित मूल्यवर्धन (Value Addition):इंसरेक्शन एक्ट (Insurrection Act): घरेलू सैन्य तैनाती के लिए 19वीं सदी का अमेरिकी कानून। • बीज विधेयक (Seeds Bill): बीज की गुणवत्ता और QR-कोड पारदर्शिता पर केंद्रित। • SPREE योजना: ESIC नेटवर्क का 1.03 करोड़ नए श्रमिकों तक विस्तार।

    यहाँ भारत के प्रमुख जलप्रपातों (Waterfalls)द्वीप भूगोल, और प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़ एवं सूखा प्रवण क्षेत्र) का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    भारत में जलप्रपात मुख्य रूप से पश्चिमी घाट और छोटा नागपुर पठार में केंद्रित हैं, जिसका कारण यहाँ की खड़ी ढलान और कठोर चट्टानी संरचनाएँ हैं।

    जलप्रपातनदीराज्यमुख्य विशेषता
    कुंचिकल जलप्रपातवाराहीकर्नाटकभारत का सबसे ऊँचा सोपानी (Tiered) जलप्रपात।
    जोग जलप्रपातशरावतीकर्नाटकइसे ‘गरसोप्पा’ भी कहते हैं; यह राजा, रानी, ​​रोअर और रॉकेट नामक चार धाराओं के लिए प्रसिद्ध है।
    दूधसागर जलप्रपातमांडवीगोवाइसे “दूध का सागर” कहा जाता है; यह गोवा-कर्नाटक सीमा पर स्थित है।
    शिवसमुद्रमकावेरीकर्नाटकएशिया के पहले जल-विद्युत स्टेशनों में से एक यहाँ स्थित है।
    हुंडरू जलप्रपातसुवर्णरेखाझारखंडखनिज समृद्ध छोटा नागपुर पठार में स्थित एक प्रसिद्ध “निक-पॉइंट” (Knick-point) प्रपात।

    भारत के द्वीप न केवल पर्यटन स्थल हैं, बल्कि रणनीतिक सैन्य और पारिस्थितिक संपत्ति भी हैं।

    • अंडमान और निकोबार (ज्वालामुखी मूल):
      • सैडल पीक (Saddle Peak): उत्तरी अंडमान में स्थित द्वीप समूह का सबसे ऊँचा बिंदु।
      • इंदिरा पॉइंट: भारत के क्षेत्र का सबसे दक्षिणी बिंदु (ग्रेट निकोबार में स्थित)।
      • डंकन पैसेज (Duncan Passage): एक रणनीतिक जलडमरूमध्य जो दक्षिण अंडमान को लिटिल अंडमान से अलग करता है।
      • 10 डिग्री चैनल: अंडमान द्वीप समूह को निकोबार समूह से अलग करता है।
    • लक्षद्वीप (प्रवाल/मूँगा मूल):
      • कवरत्ती: लक्षद्वीप की प्रशासनिक राजधानी।
      • पिट्टी द्वीप: एक निर्जन द्वीप जो एक समर्पित पक्षी अभयारण्य के रूप में कार्य करता है।
      • एंड्रोट (Andrott): लक्षद्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप।

    वर्ष 2026 की आपदा प्रबंधन तैयारी के लिए इन क्षेत्रों का मानचित्रण अनिवार्य है।

    • बाढ़-प्रवण क्षेत्र (Flood-Prone Zones):
      • ब्रह्मपुत्र बेसिन: भारी वर्षा और नदी के मार्ग बदलने की प्रवृत्ति के कारण असम अत्यधिक संवेदनशील है।
      • गंगा के मैदान: उत्तरी बिहार (कोसी नदी – “बिहार का शोक”) और पश्चिम बंगाल।
      • तटीय डेल्टा: चक्रवात के मौसम के दौरान ओडिशा और आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्र।
    • सूखा-प्रवण क्षेत्र (Drought-Prone Zones):
      • वृष्टि छाया क्षेत्र (Rain Shadow Region): पश्चिमी घाट के पूर्व का क्षेत्र (महाराष्ट्र का मराठवाड़ा, उत्तरी कर्नाटक)।
      • शुष्क पश्चिम: पश्चिमी राजस्थान और गुजरात का कच्छ क्षेत्र।
      • कालाहांडी बेल्ट: ओडिशा के वे हिस्से जहाँ पूर्व में होने के बावजूद अक्सर वर्षा की विफलता देखी जाती है।
    श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
    सबसे ऊँचा जलप्रपातकुंचिकल जलप्रपातकर्नाटक
    सबसे दक्षिणी बिंदुइंदिरा पॉइंटग्रेट निकोबार
    बिहार का शोककोसी नदीउत्तरी बिहार
    सक्रिय ज्वालामुखीबैरन द्वीपअंडमान सागर

    कोसी नदी को मैप पर देखते समय उसकी सात मुख्य धाराओं (सप्तकोसी) पर ध्यान दें। लक्षद्वीप के द्वीपों को उत्तर से दक्षिण के क्रम (अमीनीदिवि → लक्कादिवि → मिनिकॉय) में याद रखें।

    झरने और तट (Cascades & Coasts)

    जल विज्ञान
    💧 प्रमुख जल प्रपात
    भारत के प्रमुख झरने पश्चिमी घाट की ढलानों और छोटा नागपुर पठार की कठोर चट्टानों में केंद्रित हैं। ये झरने पनबिजली और पर्यटन दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    जलप्रपात नदी मुख्य विशेषता
    जोग जलप्रपातशरावतीचार धाराओं (राजा, रानी, आदि) का समूह
    दूधसागरमांडवीगोवा-कर्नाटक सीमा पर ‘क्षीर सागर’ जैसा दृश्य
    हुंडरू प्रपातसुवर्णरेखाझारखंड में ‘निक-पॉइंट’ का उदाहरण
    अभ्यास: कावेरी नदी पर शिवसमुद्रम को खोजें और एशिया के जल-विद्युत इतिहास में इसके महत्व को पहचानें।
    द्वीप समूह
    🏝️ रणनीतिक भूगोल
    भारत के द्वीप रणनीतिक सैन्य और पारिस्थितिक संपदा के रूप में कार्य करते हैं। इनमें ज्वालामुखीय अंडमान और निकोबार और कोरल (मूंगा) से समृद्ध लक्षद्वीप शामिल हैं।
    अभ्यास: इंदिरा पॉइंट (ग्रेट निकोबार) और डंकन पैसेज को खोजें ताकि भारत की दक्षिणी समुद्री सीमाओं को समझा जा सके।
    आपदा मानचित्रण
    ⚠️ जोखिम संभावित क्षेत्र
    पर्यावरणीय जोखिम प्रबंधन में बाढ़-प्रवण ब्रह्मपुत्र और कोसी बेसिन, तथा दक्कन के सूखा-प्रवण वृष्टि छाया क्षेत्रों की ट्रैकिंग शामिल है।
    अभ्यास: ओडिशा में ‘कालाहांडी बेल्ट’ की पहचान करें और जांच करें कि तट के करीब होने के बावजूद यहाँ वर्षा की कमी क्यों होती है।
    मैपिंग चेकलिस्ट
    श्रेणी मैपिंग हाइलाइट प्रमुख स्थान
    सबसे ऊँचा झरनाकुंचिकल प्रपातकर्नाटक
    सबसे दक्षिणी बिंदुइंदिरा पॉइंटग्रेट निकोबार
    बिहार का शोककोसी नदीउत्तरी बिहार
    पक्षी अभयारण्यपिट्टी द्वीपलक्षद्वीप

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 16 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “नये राजा और उनके राज्य” सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में शक्तिशाली राजवंशों के उदय और उनकी शासन व्यवस्था का वर्णन करता है।

    सातवीं शताब्दी तक उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े भूस्वामी या योद्धा सरदार अस्तित्व में आ चुके थे, जिन्हें राजा ‘सामंत’ कहते थे।

    • सामंतों की भूमिका: उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे राजा के लिए उपहार लाएँ, उनके दरबार में हाज़िरी दें और सैन्य सहायता प्रदान करें।
    • शक्ति का संचय: जब सामंतों के पास अधिक शक्ति और धन आ जाता था, तो वे स्वयं को ‘महा-सामंत’ या ‘महा-मंडलेश्वर’ (पूरे क्षेत्र का महान स्वामी) घोषित कर देते थे।
    • स्वतंत्रता: कुछ सामंतों ने अपने शासकों से खुद को स्वतंत्र कर लिया। उदाहरण के लिए, दक्कन में राष्ट्रकूट शुरू में कर्नाटक के चालुक्यों के अधीनस्थ थे।
    • हिरण्य-गर्भ अनुष्ठान: राष्ट्रकूट प्रधान दंतीदुर्ग ने ‘हिरण्य-गर्भ’ (सोने का गर्भ) नामक एक अनुष्ठान किया। माना जाता था कि इससे व्यक्ति जन्म से क्षत्रिय न होने पर भी ‘क्षत्रिय’ के रूप में पुनर्जन्म प्राप्त कर सकता है।
    • अन्य उदाहरण: कदंब मयूरशर्मण और गुर्जर-प्रतिहार हरिश्चंद्र जैसे ब्राह्मणों ने अपने पारंपरिक पेशे को छोड़कर शस्त्र अपना लिए और सफलतापूर्वक अपने राज्य स्थापित किए।

    नए राजाओं ने अक्सर ‘महाराजाधिराज’ (राजाओं के राजा) और ‘त्रिभुवन-चक्रवर्तिन’ (तीन लोकों का स्वामी) जैसी भारी-भरकम उपाधियाँ धारण कीं।

    • संसाधन संग्रह: राजा सामंतों के साथ-साथ किसानों, व्यापारियों और ब्राह्मणों के संगठनों के साथ सत्ता साझा करते थे।
    • लगान/कर: किसानों, पशुपालकों और कारीगरों से उनकी उपज का एक हिस्सा ‘लगान’ के रूप में लिया जाता था।
    • चोल साम्राज्य के कर: चोल अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के करों के लिए 400 से अधिक शब्दों का उल्लेख है, जैसे ‘वेटी’ (जबरन श्रम/बेगार) और ‘कदमाइ’ (भू-राजस्व)।
    • धन का उपयोग: इन संसाधनों का उपयोग राजा के महल के रखरखाव, मंदिरों और किलों के निर्माण तथा युद्धों के वित्तपोषण के लिए किया जाता था।

    प्रशस्तियों में शासकों का गुणगान किया जाता था, जिसमें उन्हें शूरवीर और विजयी योद्धा के रूप में दिखाया जाता था।

    • इनकी रचना विद्वान ब्राह्मणों द्वारा की जाती थी जो कभी-कभी प्रशासन में भी मदद करते थे।
    • राजा ब्राह्मणों को भूमि अनुदान से पुरस्कृत करते थे, जिसे ताम्रपत्रों पर दर्ज किया जाता था।
    • कल्हण (12वीं शताब्दी): कश्मीर के इतिहास पर कल्हण ने एक लंबी संस्कृत कविता लिखी। उन्होंने अपने विवरण के लिए शिलालेखों, दस्तावेजों और प्रत्यक्षदर्शियों के वृत्तांतों का उपयोग किया और शासकों की नीतियों की आलोचनात्मक व्याख्या की।

    राजवंश अक्सर विशिष्ट क्षेत्रों पर नियंत्रण पाने के लिए आपस में लड़ते थे।

    • त्रिपक्षीय संघर्ष: गंगा घाटी में कन्नौज पर नियंत्रण के लिए सदियों तक गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल राजवंशों के शासक आपस में लड़ते रहे।
    • मंदिरों पर हमला: राजा अपनी शक्ति दिखाने के लिए बड़े मंदिर बनवाते थे; इसलिए आक्रमणों के दौरान ये मंदिर ही सबसे पहले निशाना बनते थे।
    • सुल्तान महमूद गज़नी: इसने 997 से 1030 ईस्वी तक उपमहाद्वीप पर 17 बार आक्रमण किया और गुजरात के सोमनाथ जैसे संपन्न मंदिरों को लूटा।
    • अल-बिरूनी: महमूद ने विद्वान अल-बिरूनी को उपमहाद्वीप का लेखा-जोखा लिखने का काम सौंपा, जिसे ‘किताब-उल-हिंद’ के नाम से जाना जाता है।
    • चाहमान (चौहान): इन्होंने दिल्ली और अजमेर पर शासन किया। उनके सबसे प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज तृतीय (1168-1192) थे, जिन्होंने 1191 में सुल्तान मोहम्मद गोरी को हराया, लेकिन अगले ही वर्ष (1192) वे उससे हार गए।

    चोलों ने दक्षिण में एक छोटे से परिवार से उठकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।

    • सत्ता का उदय: उरैयूर के चोल परिवार के विजयालय ने नौवीं शताब्दी के मध्य में मुत्तरैयार को हराकर कावेरी डेल्टा पर कब्जा किया।
    • राजराज प्रथम: इन्हें सबसे शक्तिशाली चोल शासक माना जाता है, जो 985 ईस्वी में राजा बने। उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने गंगा घाटी, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया पर आक्रमण किया और एक विशाल नौसेना बनाई।
    • भव्य मंदिर: तंजावुर और गंगईकोंडचोलपुरम् के मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला के चमत्कार हैं। ये मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र थे।
    • कांस्य मूर्तियाँ: चोल काल की कांस्य मूर्तियाँ (विशेषकर नटराज) दुनिया की बेहतरीन कलाकृतियों में गिनी जाती हैं।
    • कावेरी नदी बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले कई शाखाओं में बंट जाती है, जो खेतों के लिए उपजाऊ मिट्टी और नमी प्रदान करती हैं।
    • जंगलों को साफ कर और जमीन को समतल कर बड़े पैमाने पर खेती शुरू की गई।
    • बाढ़ रोकने के लिए तटबंध और खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए नहरें बनाई गईं। बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए विशाल टैंक और कुएँ बनाए गए।
    • ऊर (Ur): किसानों की बस्तियों को ‘ऊर’ कहा जाता था।
    • नाडु (Nadu): गाँवों के समूह को ‘नाडु’ कहा जाता था, जो न्याय करने और कर वसूलने जैसे प्रशासनिक कार्य करते थे।
    • ब्रह्मदेय: ब्राह्मणों को उपहार में दी गई भूमि को ‘ब्रह्मदेय’ कहा जाता था, जिससे कावेरी घाटी में कई ब्राह्मण बस्तियाँ बनीं।
    • सभा: प्रत्येक ब्रह्मदेय की देखरेख प्रमुख ब्राह्मण भूस्वामियों की एक सभा द्वारा की जाती थी।
    • उत्तरमेरुर अभिलेख: यह विवरण देता है कि सभा कैसे काम करती थी। सभा में सिंचाई, मंदिर, बगीचे आदि के लिए अलग-अलग समितियाँ थीं। सदस्यों का चुनाव लॉटरी प्रणाली (पर्ची निकालकर) द्वारा किया जाता था।

    🏰 नए राजा और उनके राज्य (7वीं-12वीं शताब्दी)

    👑 सामंतों का उदय
    योद्धा प्रमुख, जिन्हें सामंत कहा जाता था, अपनी शक्ति बढ़ाकर ‘महा-मंडलेश्वर’ बन जाते थे। दन्तिदुर्ग ने हिरण्य-गर्भ नामक अनुष्ठान कर क्षत्रिय का दर्जा प्राप्त किया और राष्ट्रकूट वंश की नींव रखी।
    ⚔️ धन के लिए युद्ध
    कन्नौज पर नियंत्रण के लिए गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूटों के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष चला। इसी दौरान अफगानिस्तान के सुल्तान महमूद गजनवी ने सोमनाथ जैसे समृद्ध मंदिरों को अपनी राजधानी सजाने के लिए लूटा।
    🪷 भव्य चोल साम्राज्य
    विजयालय द्वारा स्थापित इस वंश का विस्तार राजराज प्रथम ने किया। यह साम्राज्य तंजावुर के मंदिरों और उत्कृष्ट कांस्य मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध था। कावेरी नदी के जल का उपयोग उन्नत सिंचाई के लिए किया जाता था।
    🗳️ ग्रामीण लोकतंत्र
    चोल गांवों का प्रबंधन सभा करती थी। उत्तरमेरुर अभिलेखों के अनुसार, समितियों के सदस्यों का चुनाव एक अनूठी लॉटरी पद्धति (मिट्टी के घड़े में पर्चियां डालकर) द्वारा किया जाता था।
    राजस्व तथ्य चोल अभिलेखों में करों के लिए 400 से अधिक शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे वेट्टी (जबरन श्रम के रूप में कर) और कदमाई (भू-राजस्व)।
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    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-2 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नये राजा और उनके राज्य

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    बिना प्रवर्तन तंत्र के, अधिकारों की सूची केवल शब्दों का संग्रह है। अनुच्छेद 32 वह तंत्र प्रदान करता है जो यह सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकार ‘वाद-योग्य’ (Justiciable) बने रहें।

    डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को “संविधान की आत्मा और उसका हृदय” कहा था। यह मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपयुक्त कार्यवाही के माध्यम से उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) जाने का अधिकार प्रदान करता है।

    • स्वयं में एक मौलिक अधिकार: उपचार मांगने का अधिकार केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि स्वयं में एक मौलिक अधिकार है।
    • मूल संरचना (Basic Structure): उच्चतम न्यायालय ने फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन कामगार यूनियन मामले में व्यवस्था दी कि अनुच्छेद 32 संविधान की ‘मूल संरचना’ का हिस्सा है; अतः इसे संविधान संशोधन द्वारा भी छीना नहीं जा सकता।
    • दायरा: यह केवल मौलिक अधिकारों (भाग III) के प्रवर्तन के लिए है, न कि वैधानिक या सामान्य कानूनी अधिकारों के लिए।

    अनुच्छेद 32 (उच्चतम न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के तहत न्यायपालिका विशिष्ट आदेश जारी कर सकती है जिन्हें ‘रिट’ कहा जाता है:

    1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus – “शरीर को प्रस्तुत करना”): किसी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करने का आदेश ताकि उसकी हिरासत की वैधता की जाँच की जा सके। यह मनमानी गिरफ्तारी के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
    2. परमादेश (Mandamus – “हम आज्ञा देते हैं”): यह किसी सार्वजनिक अधिकारी, निचली अदालत या सरकारी निकाय को दिया जाने वाला आदेश है ताकि वे उस कानूनी कर्तव्य का पालन करें जिसे करने में वे विफल रहे हैं।
    3. प्रतिषेध (Prohibition – “रोकना”): यह उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या अर्ध-न्यायिक निकाय को जारी किया जाता है ताकि उसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने या प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध कार्य करने से रोका जा सके।
    4. उत्प्रेषण (Certiorari – “पूर्णतः सूचित करना”): यह किसी निचली अदालत या ट्रिब्यूनल द्वारा पहले से पारित आदेश को रद्द करने के लिए जारी किया जाता है। जहाँ प्रतिषेध ‘निवारक’ (Preventive) है, वहीं उत्प्रेषण ‘निवारक और सहायक’ (Curative) दोनों है।
    5. अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto – “किस अधिकार से”): यह किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद के दावे की वैधता की जाँच करने के लिए जारी किया जाता है। यह किसी भी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद के अवैध “हड़पने” को रोकता है।

    अनुच्छेद 33 संसद को विशिष्ट समूहों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने या निरस्त करने की शक्ति देता है ताकि वे अपने कर्तव्यों का उचित पालन कर सकें और उनमें अनुशासन बना रहे।

    • सशस्त्र बलों (Armed Forces) के सदस्य।
    • अर्धसैनिक बलों (Paramilitary Forces) के सदस्य।
    • पुलिस बल।
    • खुफिया एजेंसियां (Intelligence Agencies)।
    • इन सेवाओं के लिए बनाए गए दूरसंचार प्रणालियों में कार्यरत व्यक्ति।

    नोट: यह कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं। इन कानूनों को किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन के आधार पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

    अनुच्छेद 34 भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी भी क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू होने पर मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध का प्रावधान करता है।

    • परिभाषा: संविधान में “मार्शल लॉ” को परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन इसका अर्थ है ‘सैनिक शासन’ जहाँ लोक व्यवस्था बिगड़ने के कारण सेना प्रशासन को अपने हाथ में ले लेती है।
    • संसदीय क्षतिपूर्ति (Indemnity): मार्शल लॉ के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी भी सरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए कार्यों को संसद कानून बनाकर ‘वैध’ घोषित कर सकती है और उन्हें कानूनी सजा से मुक्ति दे सकती है।
    • राष्ट्रीय आपातकाल से अंतर: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के विपरीत, मार्शल लॉ केवल मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है और एक विशिष्ट क्षेत्र तक सीमित होता है।

    अनुच्छेद 35 यह सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकारों की प्रकृति और उनके उल्लंघन के लिए सजा पूरे भारत में एक समान रहे। यह संसद को विशिष्ट अधिकारों के संबंध में कानून बनाने की विशेष शक्ति देता है।

    संसद की विशेष शक्ति: केवल संसद (राज्य विधानमंडल नहीं) के पास निम्नलिखित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है:

    • रोजगार के लिए निवास की शर्त निर्धारित करना (अनुच्छेद 16)।
    • उच्चतम/उच्च न्यायालय के अलावा अन्य अदालतों को रिट जारी करने की शक्ति देना (अनुच्छेद 32)।
    • सशस्त्र बलों के अधिकारों को प्रतिबंधित करना (अनुच्छेद 33)।
    • मार्शल लॉ के दौरान सरकारी कर्मचारियों को क्षतिपूर्ति देना (अनुच्छेद 34)।
    • दंड: संसद के पास उन कृत्यों के लिए सजा निर्धारित करने की शक्ति है जिन्हें भाग III के तहत अपराध घोषित किया गया है (जैसे अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता या अनुच्छेद 23 के तहत बलात श्रम)।
    अनुच्छेदविषयमुख्य बिंदु
    32संवैधानिक उपचार“हृदय और आत्मा”; रिट याचिका जारी करने की शक्ति।
    33सशस्त्र बलअनुशासित बलों के लिए अधिकारों को सीमित करने की संसद की शक्ति।
    34मार्शल लॉसैन्य शासन वाले क्षेत्रों में अधिकारों पर प्रतिबंध।
    35विधान शक्तिसंसद के माध्यम से अधिकारों का समान प्रवर्तन सुनिश्चित करना।

    ⚖️ अनुच्छेद 32–35: विधिक उपचार

    ❤️ अनु. 32: संवैधानिक उपचार
    अंबेडकर ने इसे संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा। यह नागरिकों को मूल अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देकर उन्हें ‘वाद-योग्य’ बनाता है।
    📜 पांच प्रकार की रिट (Writs)
    1. बंदी प्रत्यक्षीकरण, 2. परमादेश (कर्तव्य पालन), 3. प्रतिषेध (निचली अदालत को रोकना), 4. उत्प्रेषण (फैसला रद्द करना), 5. अधिकार पृच्छा (अधिकार की जाँच)।
    🛡️ अनु. 33: सशस्त्र बल
    संसद को यह शक्ति देता है कि वह सशस्त्र बलों, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के मूल अधिकारों को सीमित करे ताकि वे अनुशासन के साथ अपना कर्तव्य निभा सकें।
    🪖 अनु. 34: मार्शल लॉ
    जब किसी क्षेत्र में सैन्य शासन लागू हो, तो वहाँ मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। संसद व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए गए कार्यों को ‘क्षतिपूर्ति’ प्रदान कर सकती है।
    ⚡ अनु. 35: विधान की शक्ति
    यह अधिकार केवल संसद को है (राज्यों को नहीं) कि वह अस्पृश्यता (अनु. 17) या बलात् श्रम (अनु. 23) जैसे अपराधों के लिए दंड निर्धारित करने हेतु कानून बनाए।
    🏗️ मूल ढांचा (Basic Structure)
    अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार संविधान की मूल विशेषता है। इसे संविधान संशोधन द्वारा भी छीना या कम नहीं किया जा सकता।
    निष्कर्ष जहाँ अनुच्छेद 32 उपचार प्रदान करता है, वहीं अनुच्छेद 33-35 संसद को राष्ट्रीय सुरक्षा और समान न्याय के लिए अधिकारों को विनियमित करने की शक्ति देते हैं।

    यहाँ ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ (The Indian Express) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (16 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

    • संदर्भ: अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते पर अनिश्चितता और भारी 50% अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव के बीच, भारत यूरोपीय संघ (EU) के साथ अपने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं को तेज कर रहा है।
    • मुख्य बिंदु:
      • वार्ता का मील का पत्थर: भारत और यूरोपीय संघ ने FTA के 24 में से 20 अध्यायों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।
      • गणतंत्र दिवस का संकेत: यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। वे 27 जनवरी को 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता भी करेंगे।
      • रणनीतिक बदलाव: यह समझौता परिधान जैसे श्रम-प्रधान भारतीय निर्यातों पर अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
      • मोड 4 (Mode 4) वार्ता: पहली बार, कुशल पेशेवरों की आवाजाही (Mode 4) पर बातचीत हो रही है, जिससे जर्मनी और अन्य देशों में भारतीय पेशेवरों के लिए रास्ते खुल सकते हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक संबंध”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “निर्यात बाजारों का विविधीकरण”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • बाधाओं को पार करना: पर्यावरण और श्रम अधिकारों के मुद्दों पर यह FTA एक दशक से रुका हुआ था। अमेरिकी संरक्षणवाद के कारण अब दोनों पक्षों में लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने की तात्कालिकता आई है।
      • जर्मन स्तंभ: यूरोपीय संघ के व्यापार में जर्मनी का प्रभुत्व और उसका “कुशल आप्रवासन अधिनियम” इस समझौते के लिए उत्प्रेरक का काम कर रहे हैं।
      • कार्बन टैक्स की चुनौती: यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) अभी भी सबसे बड़ी बाधा है, क्योंकि यह भारत के धातु निर्यात पर भारी शुल्क लगा सकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत-अमेरिका संबंध; भू-राजनीति)।

    • संदर्भ: पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष का विश्लेषण और भारत-अमेरिका संबंधों में आई स्थिरता (Stagnation) पर चर्चा।
    • मुख्य बिंदु:
      • ठहराव की स्थिति: पिछले 25 वर्षों से द्विपक्षीय संबंधों में जारी निरंतर वृद्धि अब एक ठहराव पर पहुँच गई है, जिसका कारण उच्च टैरिफ और भारत के रूस के साथ संबंधों पर अमेरिकी आलोचना है।
      • चीन के साथ ‘ग्रैंड बारगेन’: अमेरिकी प्रशासन चीन के साथ एक बड़े समझौते (Grand Bargain) पर अधिक ध्यान केंद्रित करता दिख रहा है, जिससे हिंद-प्रशांत रणनीति और क्वाड (Quad) की प्राथमिकता कम हो सकती है।
      • पैक्स सिलिका (Pax Silica): हालांकि भारत को इस तकनीकी गठबंधन में शामिल किया गया है, लेकिन इसमें हुई देरी बताती है कि भारत को अमेरिका का पसंदीदा भागीदार बने रहने के लिए अधिक प्रयास करने होंगे।
    • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंध”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • लेनदेन वाली कूटनीति (Transactional Diplomacy): विश्लेषकों का तर्क है कि “लेनदेन” वाले अमेरिकी युग में भारत का पारंपरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण कमजोर साबित हो रहा है, जहाँ अमेरिका बड़ी रियायतों और प्रशंसा की उम्मीद रखता है।
      • आगे की राह: भारत को केवल अमेरिका के भरोसे रहने के बजाय अपनी आंतरिक विकास दर को बढ़ाने और अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को स्थिर करने पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी गई है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; कल्याणकारी योजनाएं; डिजाइन और कार्यान्वयन के मुद्दे)।

    • संदर्भ: मनरेगा (MGNREGA) से ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ (VB-GRAM G) में संक्रमण।
    • मुख्य बिंदु:
      • दिनों में वृद्धि, पहुंच में शर्त: नया कानून गारंटीशुदा कार्य को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करता है, लेकिन काम की उपलब्धता को अधिक “शर्तों के अधीन” बना सकता है।
      • महिला भागीदारी पर जोखिम: आलोचकों का तर्क है कि घर के पास काम की पूर्ण गारंटी के बिना, ग्रामीण महिलाओं को असुरक्षित और अनौपचारिक कार्यों की ओर धकेला जा सकता है।
      • डिजिटल निरीक्षण: यह अधिनियम ‘पंचायत निर्णय ऐप’ और ‘ई-मेज़रमेंट बुक’ के माध्यम से वास्तविक समय में प्रगति और मजदूरी को ट्रैक करने के लिए डिजिटल ऑडिट पेश करता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “ग्रामीण विकास”, “महिला सशक्तिकरण” और “कल्याणकारी शासन”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • संक्रमण के नियम: ग्रामीण विकास मंत्रालय वर्तमान में मनरेगा जॉब कार्डों के उपयोग की अनुमति दे रहा है ताकि बदलाव के दौरान काम में बाधा न आए।
      • फंडिंग का बोझ: नए कानून में राज्यों से फंडिंग की हिस्सेदारी बढ़ा दी गई है, जिससे गरीब राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; स्वास्थ्य; जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र)।

    • संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गांधीनगर, गुजरात में ‘बायो-सेफ्टी लेवल 4’ (BSL-4) लैब की आधारशिला रखी।
    • मुख्य बिंदु:
      • रणनीतिक संपत्ति: यह भारत की पहली ऐसी BSL-4 लैब होगी जो पूरी तरह से राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित और नियंत्रित होगी।
      • घातक रोगजनक (Pathogens): लैब इबोला, मारबर्ग, निपाह और ‘क्रीमियन-कांगो रक्तस्रावी बुखार’ (CCHF) जैसे दुनिया के सबसे घातक वायरस का अध्ययन करेगी।
      • बुनियादी ढांचा: ₹362 करोड़ की इस सुविधा में पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाले रोगों (Zoonotic diseases) के अनुसंधान के लिए ‘एनिमल बायो-सेफ्टी लेवल’ (ABSL) मॉड्यूल भी शामिल होंगे।
    • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा”, “जैव-प्रौद्योगिकी विकास” और “आपदा तैयारी”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • कमी को दूर करना: वर्तमान में भारत में बहुत कम नागरिक BSL-4 सुविधाएं (पुणे और ग्वालियर) हैं। ऐसी प्रयोगशालाओं की कमी के कारण बीमारी के प्रकोपों की जांच में बाधा आती रही है। यह लैब एक “राष्ट्रीय सुविधा” के रूप में कार्य करेगी।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (बुनियादी ढांचा: सड़कें; आपदा प्रबंधन)।

    • संदर्भ: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ (SaveLIFE Foundation) की एक संयुक्त रिपोर्ट, जो भारत के शीर्ष 100 जिलों में सड़क दुर्घटनाओं का विश्लेषण करती है।
    • मुख्य बिंदु:
      • इंजीनियरिंग कारक: 59% घातक दुर्घटनाओं में यातायात नियमों का उल्लंघन शामिल नहीं है, बल्कि खराब सड़क इंजीनियरिंग (Engineering) मौत का मुख्य कारण है।
      • ब्लैक स्पॉट: 58% मौतें पहले से ज्ञात दुर्घटना-संभावित स्थानों या “ब्लैक स्पॉट” पर होती हैं।
      • समय: 53% मौतें शाम 6 बजे से रात 12 बजे के बीच दर्ज की जाती हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “बुनियादी ढांचा योजना”, “सार्वजनिक सुरक्षा” और “शहरी शासन”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • ट्रॉमा केयर में कमी: 10 में से 8 पीड़ितों को सरकारी एम्बुलेंस के बजाय अन्य साधनों से अस्पताल पहुँचाया गया, जो दुर्घटना के बाद की चिकित्सा देखभाल (Trauma Care) में गंभीर कमियों को दर्शाता है।
      • समाधान: रिपोर्ट का तर्क है कि नई योजनाओं के बजाय, मौजूदा बजट का उपयोग सड़क इंजीनियरिंग में सुधार और पुलिस व अस्पतालों के बीच बेहतर समन्वय के लिए किया जाना चाहिए।

    इंडियन एक्सप्रेस विश्लेषण

    16 जनवरी, 2026
    GS-2 अंत. संबंध
    🇪🇺 भारत-यूरोपीय संघ FTA: रणनीतिक गति
    अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए भारत यूरोप की ओर बढ़ा; 24 में से 20 अध्यायों पर बातचीत पूरी। बड़ी सफलता: मोड 4 (कुशल श्रम गतिशीलता) का समावेश। मुख्य बाधा: ईयू का कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) भारतीय धातु निर्यात के लिए अब भी जोखिम बना हुआ है।
    GS-2 अंत. संबंध
    🇺🇸 भारत-अमेरिका संबंध: लेन-देन का ठहराव
    ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में चीन के साथ “ग्रैंड बारगेन” के कारण क्वाड (Quad) की प्राथमिकता में कमी। घर्षण बिंदु: ऑपरेशन सिंदूर और लेन-देन वाली कूटनीति। विश्लेषण का सुझाव: भारत को महाशक्ति पर निर्भरता के बजाय आंतरिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
    GS-2 कल्याण
    🌾 मनरेगा से VB-GRAM G तक
    नया अधिनियम गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन करता है, लेकिन पंचायत निर्णय ऐप के माध्यम से डिजिटल बाधाएं पेश करता है। चिंता: राज्यों पर बढ़ता वित्तीय बोझ (40%) पहुंच को सीमित कर सकता है, जिसका सीधा प्रभाव ग्रामीण महिलाओं पर पड़ेगा।
    GS-3 वि. एवं प्रौ.
    🧪 भारत की पहली राज्य-वित्त पोषित BSL-4 लैब
    गुजरात ने ₹362 करोड़ की लागत से इबोला, निपाह और मारबर्ग के अध्ययन के लिए लैब लॉन्च की। रणनीतिक मूल्य: केंद्रीय अनुसंधान बाधाओं को दरकिनार करने वाली पहली राज्य-नियंत्रित उच्च-सुरक्षा लैब। इसमें ज़ूनोटिक रोगों की ट्रैकिंग के लिए पशु जैव-सुरक्षा (ABSL) मॉड्यूल शामिल है।
    GS-3 बुनियादी ढांचा
    🛣️ सड़क सुरक्षा: इंजीनियरिंग का संकट
    चौंकाने वाला डेटा: 59% मौतें खराब इंजीनियरिंग के कारण होती हैं, न कि यातायात उल्लंघन से। महत्वपूर्ण समय: 53% मौतें शाम 6 से रात 12 बजे के बीच होती हैं। आवश्यकता: ‘ब्लैक स्पॉट्स’ को खत्म करना और ट्रॉमा केयर में अस्पतालों की तत्परता बढ़ाना।

    यहाँ भारत के भौतिक विभागों (Physiographic Divisions), विशेष रूप से हिमालय पर्वतमाला, प्रायद्वीपीय पठार और पश्चिमी घाट के प्रमुख दर्रों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    हिमालय कोई एक अकेली श्रृंखला नहीं है, बल्कि समानांतर पर्वतमालाओं की एक श्रृंखला है। इनका मानचित्रण करने के लिए उनकी ऊर्ध्वाधर परतों (Vertical Layers) को समझना आवश्यक है।

    • ट्रांस-हिमालय (Trans-Himalayas): इसमें कराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियाँ शामिल हैं। भारत की सबसे ऊँची चोटी K2 (गॉडविन-ऑस्टिन) यहीं स्थित है।
    • वृहद हिमालय (हिमाद्रि): यह सबसे उत्तरी और सबसे ऊँची श्रेणी है, जिसमें माउंट एवरेस्ट और कंचनजंगा जैसी चोटियाँ स्थित हैं।
    • लघु हिमालय (हिमाचल): यह हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित है; यह पीर पंजाल और धौलाधार श्रेणियों तथा शिमला, मनाली जैसे हिल स्टेशनों के लिए प्रसिद्ध है।
    • शिवालिक: यह सबसे बाहरी और सबसे युवा श्रेणी है। यहाँ समतल घाटियाँ पाई जाती हैं जिन्हें ‘दून’ कहा जाता है (जैसे: देहरादून)।

    यह भारत का सबसे पुराना भूभाग है, जिसे नर्मदा नदी द्वारा दो व्यापक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।

    • मध्य उच्चभूमि (Central Highlands): नर्मदा के उत्तर में स्थित। इसमें मालवा का पठार, विंध्य श्रेणी और अरावली (दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला) शामिल हैं।
    • दक्कन का पठार: नर्मदा के दक्षिण में स्थित एक त्रिकोणीय भूभाग।
      • पश्चिमी घाट (सह्याद्रि): पश्चिमी तट के साथ फैली निरंतर पर्वतमाला; यह पूर्वी घाट से अधिक ऊँची है।
      • पूर्वी घाट: यह कटा-छँटा (Discontinuous) है और पूर्व की ओर बहने वाली नदियों (महानदी, गोदावरी, कृष्णा) द्वारा अपरदित है।
    • नीलगिरी पहाड़ियाँ: वह स्थान जहाँ पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट आपस में मिलते हैं।

    हिमालयी दर्रों के विपरीत, ये ‘घाट’ या अंतराल तटीय मैदानों को आंतरिक पठार से जोड़ने के लिए आवश्यक हैं।

    दर्रा (Ghat)किसे जोड़ता हैरणनीतिक महत्व
    थल घाटमुंबई से नासिकउत्तर भारत की ओर जाने वाले रेल और सड़क यातायात के लिए मुख्य कड़ी।
    भोर घाटमुंबई से पुणेतट को दक्कन के पठार के मुख्य भाग से जोड़ता है।
    पाल घाटपलक्कड़ से कोयंबटूरकेरल को तमिलनाडु से जोड़ने वाला पश्चिमी घाट का एक प्रमुख अंतराल।
    सेनकोट्टा दर्राकोल्लम से मदुरैकेरल और तमिलनाडु को जोड़ने वाला सबसे दक्षिणी प्रमुख दर्रा।
    • भारत की सबसे ऊँची चोटी: K2 (कराकोरम श्रेणी, लद्दाख)।
    • हिमालय (भारत) की सबसे ऊँची चोटी: कंचनजंगा (सिक्किम)।
    • प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची चोटी: अनाइमुडी (केरल, अन्नामलाई पहाड़ियाँ)।
    • अरावली की सबसे ऊँची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू, राजस्थान)।
    • पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी: जिंदागाड़ा चोटी (आंध्र प्रदेश)।
    श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
    सबसे पुरानी पर्वतमालाअरावलीराजस्थान/हरियाणा
    सर्वोच्च प्रायद्वीपीय चोटीअनाइमुडीकेरल
    घाटों का मिलन बिंदुनीलगिरी पहाड़ियाँतमिलनाडु/केरल/कर्नाटक संगम
    सबसे लंबा हिमनद (Glacier)सियाचिनकराकोरम श्रेणी

    मानचित्र पर उत्तर से दक्षिण की ओर पर्वत श्रेणियों के क्रम (कराकोरम → लद्दाख → जास्कर → पीर पंजाल) को याद रखें। UPSC अक्सर इनका सही क्रम लगाने के लिए प्रश्न पूछता है।

    भौतिक प्रदेश (Physiographic Realms)

    वलित पर्वत
    🏔️ हिमालयी चाप
    समानांतर श्रेणियों का क्रम: ट्रांस-हिमालय (काराकोरम/जास्कर), सबसे ऊँचा हिमाद्रि, हिल-स्टेशनों से समृद्ध हिमाचल, और बाहरी शिवालिक
    अभ्यास: मानचित्र पर देहरादून को खोजें और इसे एक ‘दून’ के रूप में पहचानें—लघु हिमालय और शिवालिक के बीच की एक समतल घाटी।
    प्राचीन शील्ड
    ⛰️ प्रायद्वीपीय पठार
    नर्मदा नदी भारत के इस सबसे पुराने भूभाग को मध्य उच्च भूमि (विंध्य/अरावली) और त्रिभुजाकार दक्कन के पठार में विभाजित करती है।
    अभ्यास: नीलगिरि पहाड़ियों पर पश्चिमी और पूर्वी घाट के मिलन बिंदु को ट्रेस करें।
    कनेक्टिविटी
    🛣️ सह्याद्रि के प्रमुख दर्रे
    पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) के ये प्रमुख मार्ग तटीय मैदानों और आंतरिक पठार के बीच व्यापार और परिवहन को सुगम बनाते हैं।
    दर्रा (Ghat) किसे जोड़ता है महत्व
    थाल घाटमुंबई से नासिकउत्तर भारत से जुड़ाव
    भोर घाटमुंबई से पुणेदक्कन के हृदय तक पहुँच
    पाल घाटपलक्कड़ से कोयंबटूरकेरल-तमिलनाडु मार्ग
    सर्वोच्च शिखर चेकलिस्ट
    क्षेत्र सर्वोच्च शिखर स्थान
    काराकोरम श्रेणीK2 (गॉडविन-ऑस्टिन)लद्दाख (POK)
    प्रायद्वीपीय पठारअनाइमुडीकेरल (अनामलाई पहाड़ियाँ)
    अरावली श्रेणीगुरु शिखरमाउंट आबू, राजस्थान
    पूर्वी घाटजिंधागड़ा शिखरआंध्र प्रदेश

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 15 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय भारतीय इतिहास के मध्यकाल (लगभग 700 से 1750 ईस्वी) के परिचय के रूप में कार्य करता है। यह बताता है कि इस सहस्राब्दी (1000 वर्ष) के दौरान मानचित्र, शब्दावली, सामाजिक संरचना और धर्म कैसे विकसित हुए।

    मानचित्र हमें किसी विशिष्ट समय के भौगोलिक ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।

    • अल-इदरीसी का मानचित्र (1154 ईस्वी): इस अरब भूगोलवेत्ता ने दक्षिण भारत को ऊपर की ओर और श्रीलंका को शीर्ष पर एक द्वीप के रूप में दिखाया था।
    • फ्रांसीसी मानचित्रकार का मानचित्र (1720 का दशक): लगभग 600 साल बाद बनाया गया यह मानचित्र हमें अधिक परिचित लगता है, जिसमें तटीय क्षेत्रों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
    • परिवर्तनशील सटीकता: इन मानचित्रों के बीच का अंतर यह दर्शाता है कि सदियों के दौरान “मानचित्रकला का विज्ञान” काफी बदल गया था।

    समय के साथ शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड कई भाषाओं में मौजूद हैं जो सदियों से काफी बदल गए हैं।

    • हिंदुस्तान:
      • 13वीं शताब्दी में, मिन्हाज-इ-सिराज ने इसका उपयोग पंजाब, हरियाणा और गंगा-यमुना के बीच की भूमि के क्षेत्रों (राजनीतिक संदर्भ) का वर्णन करने के लिए किया था।
      • 16वीं शताब्दी तक, बाबर ने उपमहाद्वीप के भूगोल, जीव-जंतुओं और संस्कृति का वर्णन करने के लिए इस शब्द का उपयोग किया।
    • विदेशी (Foreigner): आज इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो भारतीय नहीं है। मध्यकाल में, इसका अर्थ किसी भी ऐसे अजनबी से था जो किसी गाँव में आता था और उस समाज या संस्कृति का हिस्सा नहीं होता था (जैसे— ‘परदेसी’ या ‘अजनबी’)।

    इतिहासकार उस काल के आधार पर विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग करते हैं जिसका वे अध्ययन कर रहे हैं।

    • लिखित रिकॉर्ड: इस अवधि के दौरान लिखित रिकॉर्ड की संख्या और विविधता नाटकीय रूप से बढ़ गई क्योंकि कागज सस्ता और व्यापक रूप से उपलब्ध हो गया था।
    • पांडुलिपियाँ (Manuscripts): इन्हें धनी लोगों, शासकों, मठों और मंदिरों द्वारा एकत्र किया गया था। इन्हें पुस्तकालयों और अभिलेखागारों (Archives) में रखा गया था।
    • नकलनवीश/लिपिक (Scribes): चूँकि उस समय कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं थी, इसलिए लिपिक हाथ से पांडुलिपियों की नकल करते थे। नकल के दौरान किए गए छोटे-छोटे बदलाव सदियों से बढ़ते गए, जिससे एक ही पाठ के विभिन्न संस्करण एक-दूसरे से काफी अलग हो गए।

    700 और 1750 के बीच की अवधि महान गतिशीलता और नए समूहों के उदय का समय था।

    • तकनीकी परिवर्तन: नई तकनीकें सामने आईं, जैसे सिंचाई में रहत (Persian wheel), कताई में चरखा और युद्ध में आग्नेयास्त्र (Firearms)
    • नई फसलें: आलू, मक्का, मिर्च, चाय और कॉफी जैसी फसलें उपमहाद्वीप में आईं।
    • राजपूत: यह नाम “राजपुत्र” (राजा का पुत्र) से निकला है। 8वीं और 14वीं शताब्दी के बीच, यह शब्द योद्धाओं के एक समूह के लिए लागू होता था जो क्षत्रिय होने का दावा करते थे।
    • जातियाँ: जैसे-जैसे समाज अधिक विकसित हुआ, लोगों को उनकी पृष्ठभूमि और व्यवसाय के आधार पर जातियों (उप-जातियों) में बांटा गया। जातियों ने अपने सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए अपने स्वयं के नियम और कानून बनाए, जिन्हें बुजुर्गों की एक सभा द्वारा लागू किया जाता था, जिसे जाति पंचायत कहा जाता था।

    चोल, तुगलक या मुगलों जैसे बड़े राज्यों ने कई क्षेत्रों को अपने भीतर समाहित कर लिया था।

    • सर्वक्षेत्रीय साम्राज्य (Pan-Regional Empire): यह शब्द विविध क्षेत्रों में फैले साम्राज्यों का वर्णन करता है।
    • साम्राज्यों की विरासत: जब बड़े साम्राज्यों का पतन हुआ, तो कई छोटे राज्य उभरे, लेकिन उन क्षेत्रों पर शासन, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्रों में “सर्वक्षेत्रीय” शासन की विशिष्ट और साझा विरासत बनी रही।

    इन हज़ार वर्षों के दौरान धार्मिक परंपराओं में बड़े विकास हुए।

    • हिंदू धर्म: परिवर्तनों में नए देवी-देवताओं की पूजा, राजाओं द्वारा मंदिरों का निर्माण और समाज में प्रभावशाली समूहों के रूप में ब्राह्मणों और पुजारियों का बढ़ता महत्व शामिल था।
    • भक्ति: भक्ति का विचार उभरा—एक प्रेमपूर्ण, व्यक्तिगत ईष्ट देव की अवधारणा, जहाँ भक्त बिना पुजारियों या विस्तृत यज्ञों की सहायता के स्वयं पहुँच सकते थे।
    • इस्लाम: उपमहाद्वीप में नए धर्म आए। व्यापारी और अप्रवासी सबसे पहले 7वीं शताब्दी में पवित्र कुरान की शिक्षाओं को लेकर आए। कई शासक इस्लाम और उलेमा (विद्वान धर्मशास्त्रियों और न्यायविदों) के संरक्षक थे।

    इतिहासकारों को इतिहास को समय के “खंडों” में विभाजित करते समय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

    • ब्रिटिश विभाजन: 19वीं शताब्दी के मध्य में, ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को केवल शासकों के धर्म के आधार पर “हिंदू”, “मुस्लिम” और “ब्रिटिश” काल में विभाजित किया।
    • आधुनिक दृष्टिकोण: आज अधिकांश इतिहासकार इस धार्मिक विभाजन को अनदेखा करते हैं और इसके बजाय प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल के बीच अंतर करने के लिए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

    🗺️ हज़ारों वर्षों के दौरान हुए परिवर्तन (700-1750)

    🗺️ मानचित्र और शब्दावली
    मानचित्रकला अल-इदरीसी (1154) से लेकर फ्रांसीसी मानचित्रों (1720) तक विकसित हुई। हिंदुस्तान जैसे शब्दों का अर्थ 13वीं सदी के राजनीतिक भूगोल से बदलकर 16वीं सदी (बाबर) में सांस्कृतिक वर्णन बन गया।
    ✒️ अभिलेख और लिपिक
    कागज सस्ता होने से पांडुलिपियों की संख्या बढ़ी। प्रिंटिंग प्रेस न होने के कारण नकल नवीस (Scribes) हाथ से पांडुलिपियां बनाते थे, जिससे छोटे-छोटे फेरबदल हुए जो सदियों बाद बड़े अंतर बन गए।
    🎡 नवाचार और जातियाँ
    सिंचाई में रहत (Persian Wheel) जैसी नई तकनीक और आलू, मिर्च जैसी फसलें आईं। समाज विभिन्न जातियों (उप-जातियों) में बंट गया, जो अपने नियमों के लिए अपनी जाति पंचायत बनाती थीं।
    🕌 धर्म और साम्राज्य
    इस युग में भक्ति (व्यक्तिगत प्रेम) का उदय और इस्लाम का आगमन हुआ। मुगल और तुगलक जैसे ‘सर्व-क्षेत्रीय’ साम्राज्यों ने विविध क्षेत्रों के प्रशासन पर अपनी गहरी छाप छोड़ी।
    काल-विभाजन आधुनिक इतिहासकार जेम्स मिल के “हिंदू-मुस्लिम-ब्रिटिश” काल-विभाजन को नकारते हैं और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के आधार पर ‘मध्यकाल’ को परिभाषित करते हैं।
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    कक्षा-7 इतिहास अध्याय-1 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल

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    जहाँ अनुच्छेद 14-28 मुख्य रूप से व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता पर केंद्रित हैं, वहीं अनुच्छेद 29 और 30 सामूहिक पहचान—विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करते हैं। अनुच्छेद 31, जो कभी भाग III का आधार स्तंभ था, निजी संपत्ति की सुरक्षा से लेकर जन कल्याण को सक्षम बनाने तक भारत के संवैधानिक विकास की कहानी बताता है।

    अनुच्छेद 29 यह सुनिश्चित करता है कि “नागरिकों का कोई भी अनुभाग” अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रख सके। दिलचस्प बात यह है कि हालाँकि इसके शीर्षक में “अल्पसंख्यक” शब्द है, लेकिन इसके मुख्य पाठ में “नागरिकों के अनुभाग” (Section of citizens) वाक्यांश का उपयोग किया गया है, जो इसके दायरे को व्यापक बनाता है।

    • अनुच्छेद 29(1): भारत के किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे संरक्षित करने का अधिकार देता है।
      • नोट: अनुच्छेद 19 के विपरीत, यह अधिकार स्पष्ट रूप से “तर्कसंगत प्रतिबंधों” के अधीन नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भाषा के संरक्षण के अधिकार में उसके संरक्षण के लिए आंदोलन करने का अधिकार भी शामिल है।
    • अनुच्छेद 29(2): राज्य द्वारा संचालित या राज्य निधि से सहायता प्राप्त करने वाले किसी भी शिक्षण संस्थान में केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित करने पर रोक लगाता है।

    अहमदाबाद सेंट जेवियर्स कॉलेज मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 29 केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है। यहाँ तक कि बहुसंख्यक समुदाय भी (यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र में उनकी अपनी भाषा/संस्कृति है) इस अधिकार का दावा कर सकता है।

    यह अनुच्छेद विशेष रूप से धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए है। यह उन्हें अपने समुदाय को शिक्षा प्रदान करने की स्वायत्तता देता है।

    1. स्थापना का अधिकार: अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान (स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय) बनाने का अधिकार।
    2. प्रशासन का अधिकार: बिना किसी अनावश्यक बाहरी नियंत्रण के संस्थान का प्रबंधन और संचालन करने का अधिकार।
    3. सहायता में भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण: राज्य किसी अल्पसंख्यक संस्थान को वित्तीय सहायता देते समय केवल इस आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता कि वह अल्पसंख्यक प्रबंधन के अधीन है।
    • टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन मामला (2002): उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “अल्पसंख्यक” का दर्जा राज्य स्तर पर निर्धारित किया जाना चाहिए, न कि राष्ट्रीय स्तर पर। उदाहरण के लिए, हिंदू पंजाब या नागालैंड में अल्पसंख्यक हो सकते हैं।
    • नियामक निरीक्षण: हालाँकि अल्पसंख्यक संस्थानों को स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन राज्य अभी भी शैक्षणिक मानकों, स्वच्छता, सुरक्षा और शिक्षकों के कल्याण सुनिश्चित करने के लिए नियम लागू कर सकता है। यह “प्रशासन करने का अधिकार” है, न कि “कुप्रशासन करने का अधिकार”।

    अनुच्छेद 31 मूल रूप से एक मौलिक अधिकार था जो राज्य को उचित कानून और “मुआवजे” के बिना किसी व्यक्ति की संपत्ति लेने से रोकता था।

    स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में, अनुच्छेद 31 भूमि सुधार और जमींदारी प्रथा के उन्मूलन में एक बड़ी बाधा बन गया। जमींदार बार-बार अदालत में सरकारी परियोजनाओं को चुनौती देते थे और भारी मुआवजे की मांग करते थे।

    • 44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1978): इसके द्वारा अनुच्छेद 31 (और अनुच्छेद 19(1)(f)) को मौलिक अधिकार की सूची से हटा दिया गया।
    • वर्तमान स्थिति: इसे संविधान के एक नए अध्याय में अनुच्छेद 300A के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया।
    • यह अब मौलिक अधिकार नहीं है; यह अब एक विधिक/संवैधानिक अधिकार (Legal/Constitutional Right) है।
    • प्रभाव: यदि किसी नागरिक की संपत्ति छीनी जाती है, तो वह अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय नहीं जा सकता। हालाँकि, वह अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जा सकता है।
    • नियम: किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। सरकार को अभी भी एक निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन करना होगा और आधुनिक कानूनों (जैसे LARR एक्ट, 2013) के तहत मुआवजा देना होगा।
    विशेषताअनुच्छेद 29अनुच्छेद 30अनुच्छेद 31 (अब 300A)
    श्रेणीसांस्कृतिक एवं शैक्षिकशैक्षिक स्वायत्ततासंपत्ति का अधिकार
    किसे उपलब्ध हैनागरिकों का कोई भी अनुभाग (बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों)केवल धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकसभी व्यक्ति
    वर्तमान स्थितिमौलिक अधिकारमौलिक अधिकारविधिक अधिकार (मौलिक नहीं)
    मुख्य उद्देश्यलिपि/संस्कृति का संरक्षणअपने स्कूलों का प्रबंधनसंतुलित भूमि अधिग्रहण

    याद रखें कि अनुच्छेद 29 ‘नागरिकों के समूह’ के लिए है, जबकि अनुच्छेद 30 केवल ‘अल्पसंख्यकों’ (धार्मिक और भाषाई) के लिए है।

    🎨 अनुच्छेद 29, 30 और 31

    📜 अनु. 29: पहचान का संरक्षण
    नागरिकों के “किसी भी अनुभाग” को अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार देता है। इसका दायरा व्यापक है और यह केवल अल्पसंख्यकों तक ही सीमित नहीं है।
    🏫 अनु. 30: अल्पसंख्यकों की स्वायत्तता
    यह अधिकार विशेष रूप से धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए है। उन्हें अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने का अधिकार है।
    📍 ‘अल्पसंख्यक’ का निर्धारण
    टी.एम.ए. पाई केस के अनुसार, अल्पसंख्यक का दर्जा ‘राज्य-वार’ निर्धारित किया जाता है, न कि राष्ट्रीय स्तर पर। एक समुदाय देश में बहुसंख्यक लेकिन किसी विशिष्ट राज्य में अल्पसंख्यक हो सकता है।
    🏠 अनु. 31: संपत्ति का इतिहास
    मूल रूप से यह एक मौलिक अधिकार था, जिसे 44वें संशोधन (1978) द्वारा हटा दिया गया ताकि भूमि सुधार और सार्वजनिक कल्याण परियोजनाओं के मार्ग की बाधाएं दूर हो सकें।
    ⚖️ वर्तमान कानूनी स्थिति
    संपत्ति अब अनुच्छेद 300A के तहत एक कानूनी/संवैधानिक अधिकार है। राज्य अब भी जमीन ले सकता है, लेकिन इसके लिए कानून का अधिकार और उचित प्रक्रिया अनिवार्य है।
    🔍 प्रशासन बनाम विनियमन
    अल्पसंख्यकों को संस्था का प्रशासन करने का हक है, ‘कुप्रशासन’ का नहीं। राज्य शैक्षणिक मानकों, शिक्षकों के कल्याण और स्वच्छता संबंधी नियमों को लागू कर सकता है।
    विशेष तथ्य जहाँ अनुच्छेद 29 नागरिकों के सभी अनुभागों (बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों) पर लागू होता है, वहीं अनुच्छेद 30 केवल अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित है।

    यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (15 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था और शासन; शासन के महत्वपूर्ण पहलू, पारदर्शिता और जवाबदेही; न्यायपालिका)।

    • संदर्भ: 2020 के दिल्ली दंगों के साजिश मामले में कुछ कार्यकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का विश्लेषण, जो यूएपीए (UAPA) की कठोर प्रकृति को उजागर करता है।
    • मुख्य बिंदु:
      • “भागीदारी का पदानुक्रम”: कोर्ट ने “वैचारिक संचालकों” और “स्थानीय स्तर के मददगारों” के बीच अंतर किया है। जिन्हें वैचारिक संचालक माना गया है, उन्हें बिना मुकदमे के अनिश्चितकालीन हिरासत का सामना करना पड़ रहा है।
      • बाधा के रूप में यूएपीए: यूएपीए की धारा 43D(5) जमानत को लगभग असंभव बना देती है यदि अदालत को आरोप प्रथम दृष्टया सही लगते हैं। इससे “प्रक्रिया ही सजा” (Process as punishment) बन जाती है।
      • मुकदमे से पहले की हिरासत: संपादकीय चिंता जताता है कि मुकदमे की तारीख तय हुए बिना लंबे समय तक जेल में रखना अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “आपराधिक न्याय सुधार”, “मौलिक अधिकार” और “आंतरिक सुरक्षा कानून” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • न्यायिक निरंतरता: संपादकीय “जेल नहीं, जमानत” के सिद्धांत के निरंतर पालन का तर्क देता है। यह जिरह (Cross-examination) के बिना केवल अभियोजन पक्ष की कहानी पर भरोसा करने के लिए अदालत की आलोचना करता है।
      • आतंक की परिभाषा: विरोध प्रदर्शनों और सड़क जाम को ‘आतंकी कृत्य’ के रूप में वर्गीकृत करने से लोकतंत्र में असहमति (Dissent) के लिए जगह कम होने का खतरा है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; शिक्षा से संबंधित मुद्दे; SC/ST से संबंधित मुद्दे)।

    • संदर्भ: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) को जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए ‘कैंपस इक्विटी समितियाँ’ (Campus Equity Committees) स्थापित करने का निर्देश दिया है।
    • मुख्य बिंदु:
      • संरचनात्मक निरीक्षण: प्रत्येक विश्वविद्यालय में अब एक स्थायी समिति होगी जिसकी अध्यक्षता SC/ST समुदाय के एक वरिष्ठ संकाय सदस्य करेंगे।
      • अनिवार्य वेब पोर्टल: संस्थानों को छात्रों के लिए गुमनाम रूप से भेदभाव की शिकायत दर्ज करने के लिए समर्पित वेब पोर्टल विकसित करने होंगे।
      • नियमित ऑडिट: संस्थानों को अपने परिसरों की सामाजिक समावेशिता का आकलन करने के लिए वार्षिक ‘इक्विटी ऑडिट’ करना होगा और यूजीसी को रिपोर्ट सौंपनी होगी।
    • UPSC प्रासंगिकता: “सामाजिक न्याय”, “शिक्षा सुधार” और “समावेशी विकास” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • जवाबदेही: इन समितियों के कामकाज के लिए कुलपति (Vice-Chancellor) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बनाकर, यूजीसी का लक्ष्य केवल कागजी खानापूर्ति से आगे बढ़ना है।
      • सहायक पारिस्थितिकी तंत्र: इसमें हाशिए पर रहने वाले छात्रों के लिए ‘ब्रिज कोर्स’, ‘पीयर मेंटरिंग’ और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसे सहायक तंत्र बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

    • संदर्भ: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोहराया है कि अमेरिका को “महत्वपूर्ण सुरक्षा” के लिए ग्रीनलैंड की आवश्यकता है, जिससे डेनमार्क के साथ राजनयिक दरार पैदा हो गई है।
    • मुख्य बिंदु:
      • आर्कटिक भू-राजनीति: जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, ग्रीनलैंड नए शिपिंग मार्गों और विशाल खनिज संसाधनों (दुर्लभ मृदा तत्व – Rare Earth Elements) तक पहुंच के लिए केंद्र बन गया है।
      • नाटो (NATO) तनाव: डेनमार्क ने कहा है कि अमेरिकी अधिग्रहण प्रभावी रूप से नाटो गठबंधन को समाप्त कर देगा क्योंकि यह एक सदस्य देश की संप्रभुता को कमजोर करेगा।
      • थ्यूल एयर बेस: अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में थ्यूल बेस बनाए रखता है, जो उसकी रडार प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “आर्कटिक परिषद”, “वैश्विक रणनीतिक भू-राजनीति” और “अमेरिकी विदेश नीति” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • खनिज सीमा: ग्रीनलैंड में हरित ऊर्जा परिवर्तन के लिए आवश्यक खनिजों के दुनिया के सबसे बड़े भंडार हैं, जो इसे अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में एक “रणनीतिक पुरस्कार” बनाते हैं।
      • भारत के लिए निहितार्थ: आर्कटिक परिषद में एक स्थायी पर्यवेक्षक के रूप में, भारत का हित यह सुनिश्चित करने में है कि आर्कटिक शक्तियों के संघर्ष के बजाय सहयोग का क्षेत्र बना रहे।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं; केंद्र-राज्य संबंध)।

    • संदर्भ: कर्नाटक सरकार राज्य में मनरेगा के कार्यान्वयन को समाप्त करने या उसमें महत्वपूर्ण संशोधन करने के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए तैयार है।
    • मुख्य बिंदु:
      • भ्रष्टाचार के आरोप: राज्य सरकार ने “व्यवस्थागत रिसाव” (Systemic leakages) और “अनुत्पादक संपत्ति निर्माण” को इसके कारणों के रूप में उद्धृत किया है।
      • विकल्प: “गारंटीशुदा शारीरिक श्रम” के बजाय राज्य द्वारा संचालित मिशनों के तहत “कौशल-आधारित रोजगार” पर ध्यान केंद्रित करने का प्रस्ताव है।
      • संवैधानिक बाधा: चूंकि मनरेगा एक केंद्रीय अधिनियम है, इसलिए कोई राज्य इसे एकतरफा रद्द नहीं कर सकता।
    • UPSC प्रासंगिकता: “कल्याणकारी शासन”, “संघवाद” और “ग्रामीण विकास” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • सुरक्षा जाल (Safety Net): मजदूर संगठनों का तर्क है कि कृषि संकट के दौरान भूमिहीन गरीबों के लिए मनरेगा ही एकमात्र सहारा है।
      • संपत्ति की गुणवत्ता: समस्या कानून में नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर कार्यों की योजना बनाने में है, जो अक्सर स्थायी सिंचाई या मृदा संरक्षण के बुनियादी ढांचे बनाने में विफल रहती है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; प्रदूषण; आपदा प्रबंधन)।

    • संदर्भ: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने उन रिपोर्टों के बाद तीन उत्तर भारतीय राज्यों को नोटिस जारी किया है जिनमें पुष्टि हुई है कि अनुपचारित सीवेज (Untreated sewage) पीने के पानी की लाइनों में रिस रहा है।
    • मुख्य बिंदु:
      • अंतःसंबद्ध बुनियादी ढांचा: कई शहरों में पुरानी सीवेज लाइनें और पानी की आपूर्ति पाइप समानांतर और बहुत पास चलते हैं, जिससे रिसाव के दौरान क्रॉस-कंटामिनेशन (दूषित होना) होता है।
      • सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट: यह विफलता हैजा और दस्त जैसी जल-जनित बीमारियों के हालिया प्रकोपों से जुड़ी है।
      • स्वच्छ जल का अधिकार: NGT ने राज्यों को तत्काल “भेद्यता का मानचित्र” (Map of vulnerabilities) प्रदान करने का निर्देश दिया है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “शहरी बुनियादी ढांचे की चुनौतियां”, “पर्यावरण शासन” और “सार्वजनिक स्वास्थ्य” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • शहरी शासन की अनदेखी: संपादकीय “स्मार्ट सिटी” की बाहरी सुंदरता पर ध्यान देने और जमीन के नीचे पाइपों की खराब स्थिति की अनदेखी करने की आलोचना करता है।
      • प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle): NGT उन नगर निकायों पर भारी जुर्माना लगाने पर विचार कर रहा है जो एक निश्चित समय सीमा के भीतर दोहरी पाइप प्रणाली को अलग करने में विफल रहते हैं।

    संपादकीय विश्लेषण

    15 जनवरी, 2026
    GS-2 राजव्यवस्था
    ⚖️ UAPA: प्रक्रिया बनाम सजा
    सुप्रीम कोर्ट ने वैचारिक प्रेरकों और सहायकों के बीच अंतर करने के लिए भागीदारी का पदानुक्रम का उपयोग किया। चिंता: धारा 43D(5) जमानत को लगभग असंभव बना देती है, जो अनिश्चितकालीन मुकदमे-पूर्व हिरासत के माध्यम से अनुच्छेद 21 का उल्लंघन कर सकती है।
    GS-2 सामाजिक
    🎓 परिसर समता: समावेशिता की अनिवार्यता
    UGC ने उच्च शिक्षण संस्थानों को SC/ST संकाय की अध्यक्षता में समानता समितियां बनाने का निर्देश दिया। नई आवश्यकताएं: गुमनाम शिकायतों के लिए वेब पोर्टल और सूक्ष्म जाति-आधारित भेदभाव के “प्रच्छन्न पाठ्यक्रम” (hidden curriculum) को खत्म करने के लिए वार्षिक इक्विटी ऑडिट
    GS-2 अंत. संबंध
    🏔️ ग्रीनलैंड दांव: आर्कटिक पुरस्कार
    ग्रीनलैंड में अमेरिकी रुचि ने संप्रभुता और थुले एयर बेस को लेकर डेनमार्क के साथ तनाव पैदा कर दिया है। सामरिक मूल्य: आर्कटिक बर्फ पिघलने के साथ अनछुए दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earths) और नए शिपिंग मार्ग। भारत के लिए निहितार्थ: आर्कटिक परिषद सहयोग में हिस्सेदारी।
    GS-2 शासन
    🚜 मनरेगा: कल्याण बनाम सुधार
    कर्नाटक में प्रणालीगत रिसाव का हवाला देते हुए मनरेगा में संशोधन पर बहस। द्वंद्व: कौशल-आधारित बदलाव बनाम केंद्रीय अधिनियम। आलोचना: ध्यान निरस्त करने के बजाय टिकाऊ संपत्ति निर्माण के लिए पंचायत-स्तरीय नियोजन में सुधार पर होना चाहिए।
    GS-3 पर्यावरण
    💧 सीवेज संदूषण और शहरी स्वास्थ्य
    पेयजल पाइपलाइनों में सीवेज लीक होने पर NGT ने नोटिस जारी किया। संवेदनशीलता: समानांतर और पुरानी बुनियादी संरचना जो क्रॉस-संदूषण का कारण बन रही है। NGT पाइपलाइनों को अलग करने में विफल नगर निकायों के लिए ‘प्रदूषक भुगतान सिद्धांत’ पर विचार कर रहा है।

    यहाँ भारत के यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थलोंप्रमुख महासागरीय धाराओं एवं पवनों, और प्रमुख खनिज पेटियों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    भारत में कई ऐसे स्थल हैं जिन्हें उनके उत्कृष्ट सांस्कृतिक या प्राकृतिक महत्व के लिए पहचाना गया है। इन्हें सांस्कृतिक, प्राकृतिक और मिश्रित श्रेणियों में बांटा गया है।

    • अजंता और एलोरा की गुफाएं (महाराष्ट्र): प्राचीन रॉक-कट बौद्ध, हिंदू और जैन गुफाएं जो अद्भुत कला और वास्तुकला का प्रदर्शन करती हैं।
    • ताजमहल (उत्तर प्रदेश): यमुना नदी के तट पर स्थित हाथीदांत-सफेद संगमरमर का एक प्रतिष्ठित मकबरा।
    • हम्पी (कर्नाटक): विजयनगर साम्राज्य की राजधानी के अवशेष, जिसमें शानदार मंदिर और महल शामिल हैं।
    • धौलावीरा (गुजरात): एक प्रमुख हड़प्पा शहर जो अपने अद्वितीय तीन-भाग विभाजन और उन्नत जल प्रबंधन के लिए जाना जाता है।
    • काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (असम): एक सींग वाले गेंडों की आबादी के लिए प्रसिद्ध।
    • पश्चिमी घाट: भारत के पश्चिमी तट के साथ चलने वाली एक पर्वत श्रृंखला और जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot)।
    • ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (हिमाचल प्रदेश): अपनी ऊँची पर्वत चोटियों और विविध अल्पाइन वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध।
    • कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान (सिक्किम): इसे इसकी अद्वितीय जैविक विविधता और स्थानीय समुदायों के लिए सांस्कृतिक महत्व दोनों के लिए मान्यता प्राप्त है। (यह भारत का एकमात्र मिश्रित स्थल है)।

    भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और समुद्री गतिविधियाँ आसपास के महासागरों और मौसमी हवाओं के पैटर्न से भारी रूप से प्रभावित होती हैं।

    • दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): जून से सितंबर तक; ये नमी से लदी हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं, जिससे अधिकांश भारत में भारी वर्षा होती है।
    • उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): अक्टूबर से दिसंबर तक; ये हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, जिससे मुख्य रूप से कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) पर वर्षा होती है।
    • दक्षिण-पश्चिम मानसूनी धारा: एक गर्म धारा जो गर्मियों के दौरान भारत के तट के साथ घड़ी की दिशा (Clockwise) में बहती है।
    • उत्तर-पूर्वी मानसूनी धारा: सर्दियों के महीनों के दौरान घड़ी की विपरीत दिशा (Counter-clockwise) में बहती है।

    भारत की औद्योगिक शक्ति उसके समृद्ध खनिज भंडारों में निहित है, जो विशिष्ट भूगर्भीय पेटियों में केंद्रित हैं।

    पेटी (Belt)क्षेत्र/राज्यप्राथमिक खनिज
    उत्तर-पूर्वी पठारझारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाललौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट।
    दक्षिण-पश्चिमी पेटीकर्नाटक, गोवा, तमिलनाडुउच्च श्रेणी का लौह अयस्क, मैंगनीज, चूना पत्थर।
    उत्तर-पश्चिमी पेटीराजस्थान, गुजराततांबा, जस्ता, सीसा, कीमती पत्थर, पेट्रोलियम।
    मध्य पेटीछत्तीसगढ़, म.प्र., आंध्र प्रदेशलौह अयस्क, मैंगनीज, चूना पत्थर, कोयला।
    श्रेणीमुख्य बिंदुभौगोलिक फोकस
    प्राचीन शहर विरासतधौलावीरागुजरात (पश्चिम)
    खनिज हृदय स्थलछोटा नागपुर पठारपूर्वी भारत
    प्राथमिक वर्षा पवनदक्षिण-पश्चिम मानसूनसंपूर्ण उपमहाद्वीप
    प्राचीन बंदरगाह विरासतलोथलगुजरात तट

    यूनेस्को स्थलों को याद करते समय उन्हें राज्यों के साथ मैप पर चिह्नित करें। खनिज पेटियों के लिए छोटा नागपुर पठार को विशेष रूप से देखें क्योंकि इसे भारत का ‘रूर’ (Ruhr) कहा जाता है।

    विरासत एवं तत्व (Heritage & Elements)

    यूनेस्को स्थल
    🏛️ सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत
    चट्टानों को काटकर बनाई गई अजंता की गुफाओं से लेकर हड़प्पा काल के शहर धोलावीरा और पश्चिमी घाट की जैव विविधता तक, भारत की विरासत सहस्राब्दियों और विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों में फैली हुई है।
    अभ्यास: सिक्किम में कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान को लोकेट करें और पहचानें कि इसे “मिश्रित” (Mixed) श्रेणी का विरासत स्थल क्यों माना जाता है।
    वायुमंडल
    🌬️ मानसून और पवनें
    भारत की जलवायु दक्षिण-पश्चिम मानसून (जून-सितंबर) और उत्तर-पूर्व मानसून द्वारा निर्धारित होती है। उत्तर-पूर्व मानसून विशेष रूप से कोरोमंडल तट पर सर्दियों की वर्षा लाता है।
    अभ्यास: उत्तर-पूर्व मानसून के मार्ग को ट्रेस करें और देखें कि तमिलनाडु में तब बारिश क्यों होती है जब शेष भारत शुष्क रहता है।
    पृथ्वी की संपदा
    💎 खनिज पेटियाँ
    भारत का औद्योगिक हृदय उत्तर-पूर्वी पठार (कोयला/लोहा) और उत्तर-पश्चिमी पेटी (तांबा और जस्ता के लिए प्रसिद्ध) में धड़कता है।
    पेटी (Belt) प्रमुख क्षेत्र मुख्य खनिज
    उ.पू. पठारJH, OD, WBलौह अयस्क, कोयला, अभ्रक
    दक्षिण-पश्चिमीकर्नाटक, गोवाउच्च श्रेणी का लौह अयस्क
    उत्तर-पश्चिमीRJ, गुजराततांबा, जस्ता, पेट्रोलियम
    अभ्यास: छोटा नागपुर पठार को मानचित्र पर खोजें और उन तीन प्रमुख राज्यों की पहचान करें जिन्हें यह कवर करता है।
    त्वरित मानचित्रण सारांश
    श्रेणी मुख्य आकर्षण भौगोलिक केंद्र
    प्राचीन विरासतधोलावीरागुजरात (कच्छ)
    खनिज हृदयस्थलछोटा नागपुर पठारपूर्वी भारत
    मुख्य वर्षा पवनद.प. मानसूनसंपूर्ण उपमहाद्वीप
    मिश्रित श्रेणी स्थलकंचनजंगासिक्किम (हिमालय)

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 14 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “इमारतें, चित्र तथा किताबें” वास्तुकला, कला, विज्ञान और साहित्य के क्षेत्रों में प्राचीन भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है।

    प्राचीन भारतीय धातुविज्ञानी अत्यधिक उन्नत थे। जहाँ हड़प्पावासी कांस्य युग के थे, वहीं उनके उत्तराधिकारी लौह युग में प्रवेश कर चुके थे।

    • लौह स्तंभ: दिल्ली के महरौली में स्थित यह स्तंभ 7.2 मीटर ऊँचा है और इसका वजन 3 टन से अधिक है।
    • ऐतिहासिक महत्व: इसे लगभग 1500 साल पहले ‘चंद्र’ नामक शासक के समय बनाया गया था, जो संभवतः गुप्त वंश के थे।
    • वैज्ञानिक आश्चर्य: 15 शताब्दियों से अधिक पुराना होने के बावजूद, इस स्तंभ में आज तक जंग नहीं लगा है।

    इस काल में ईंटों और पत्थरों से बनी भव्य धार्मिक संरचनाओं का निर्माण हुआ।

    • अर्थ: स्तूप का शाब्दिक अर्थ ‘टीला’ होता है।
    • विशेषताएँ: अधिकांश स्तूपों के केंद्र में एक छोटा सा डिब्बा होता है जिसे ‘धातु-मंजूषा’ (Relic casket) कहते हैं। इसमें बुद्ध या उनके अनुयायियों के शरीर के अवशेष (दांत, राख आदि) या उनके द्वारा प्रयुक्त वस्तुएँ रखी जाती थीं।
    • संरचना: इस मंजूषा को मिट्टी से ढक दिया जाता था, जिसके ऊपर ईंटों की परत और बाद में नक्काशीदार पत्थर की शिलाएँ लगाई जाती थीं।
    • प्रदक्षिणा पथ: भक्तों के लिए स्तूप के चारों ओर घूमने के लिए एक गोलाकार मार्ग होता था, जहाँ घड़ी की सुई की दिशा (clockwise) में परिक्रमा की जाती थी।
    • साँची का महान स्तूप: मध्य प्रदेश में स्थित, जिसका ईंटों का टीला अशोक के समय का है और रेलिंग तथा प्रवेश द्वार बाद के शासकों द्वारा जोड़े गए।
    • गर्भगृह: यह मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण भाग था जहाँ मुख्य देवी-देवता (जैसे विष्णु, शिव या दुर्गा) की मूर्ति रखी जाती थी।
    • शिखर: गर्भगृह के ऊपर बनाई गई एक ऊँची मीनार, जो इसकी पवित्रता को दर्शाती थी।
    • मंडप: यह एक सभागार होता था जहाँ लोग इकट्ठा हो सकते थे।
    • एकाश्मक मंदिर (Monoliths): महाबलीपुरम् के मंदिर एक ही विशाल पत्थर को काटकर बनाए गए हैं।

    महाराष्ट्र के अजंता की गुफाओं में विश्व प्रसिद्ध मठ हैं जो उत्कृष्ट चित्रों से सजे हैं।

    • तकनीक: चूँकि गुफाओं के भीतर अंधेरा था, इसलिए कलाकारों ने मशालों की रोशनी में ये चित्र बनाए।
    • सामग्री: ये चटकीले रंग पौधों और खनिजों से तैयार किए गए थे, जो 1500 साल बाद भी आज ताज़ा दिखते हैं।

    यह युग वीर पुरुषों, महिलाओं और देवताओं के बारे में लंबी रचनाओं का स्वर्ण युग था।

    • तमिल महाकाव्य:
      1. शिल्पदिकारम: लगभग 1800 साल पहले इलांगो द्वारा रचित। यह कोवलन, माधवी और कणगी की कहानी है।
      2. मणिमेखलै: लगभग 1400 साल पहले सत्तनार द्वारा रचित।
    • संस्कृत साहित्य: कालिदास ने ‘मेघदूतम्’ जैसी प्रसिद्ध कृतियाँ लिखीं।
    • पुराण: इसका शाब्दिक अर्थ है ‘पुराना’। इनमें देवी-देवताओं की कहानियाँ हैं और इन्हें सरल संस्कृत में लिखा गया था ताकि महिलाएँ और शूद्र भी इन्हें सुन सकें।
    • संस्कृत महाकाव्य: महाभारत और रामायण लगभग 1500 साल पहले लिखे गए थे। महाभारत के संकलन का श्रेय व्यास को और संस्कृत रामायण के लेखक वाल्मीकि को माना जाता है।

    संस्कृत ग्रंथों में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति दर्ज की गई है।

    • आर्यभट्ट: एक गणितज्ञ और खगोलशास्त्री जिन्होंने ‘आर्यभट्टीयम्’ लिखी। उन्होंने बताया कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने (Rotation) के कारण दिन और रात होते हैं और उन्होंने ग्रहण (Eclipse) की भी वैज्ञानिक व्याख्या दी।
    • शून्य और अंक: भारतीय गणितज्ञों ने शून्य के लिए एक विशेष चिह्न का आविष्कार किया। अंकों की यह प्रणाली अरबों द्वारा अपनाई गई और फिर यूरोप में फैली।
    • आयुर्वेद: प्राचीन भारत में विकसित स्वास्थ्य विज्ञान। प्रमुख ग्रंथों में चरक द्वारा रचित ‘चरक संहिता’ (औषधि) और सुश्रुत द्वारा रचित ‘सुश्रुत संहिता’ (शल्य चिकित्सा/Surgery) शामिल हैं।

    🏛️ इमारतें, चित्र तथा किताबें

    🏗️ वास्तुकला
    बौद्ध स्तूप (टीला) में धातु-मंजूषा रखी जाती थी, जबकि मंदिरों में गर्भगृह (मुख्य कक्ष) और उसके ऊपर शिखर बनाया जाता था। महाबलीपुरम जैसे मंदिर एकाश्मिक (पत्थरों को काटकर) बने थे।
    🧪 विज्ञान और धातु विज्ञान
    महरौली का लौह स्तंभ 1,500 साल बाद भी जंग-रहित है। आर्यभट्ट ने ग्रहण और पृथ्वी के घूमने की व्याख्या की, जबकि चरक और सुश्रुत ने आयुर्वेद के विज्ञान को आगे बढ़ाया।
    🎨 कला और अजंता
    अजंता की गुफाओं के चित्र विश्व प्रसिद्ध हैं। चित्रकारों ने पौधों और खनिजों से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया, जो मशालों की रोशनी वाली गुफाओं में 1,500 साल बाद भी चमकदार हैं।
    📚 साहित्य और महाकाव्य
    इस काल में सिलप्पदिकारम् जैसे तमिल महाकाव्य और पुराणों का संकलन हुआ। संस्कृत महाकाव्य महाभारत और रामायण ने भी इसी समय अपना अंतिम रूप प्राप्त किया।
    नवाचार भारतीय गणितज्ञों ने शून्य और दशमलव प्रणाली के लिए विशिष्ट चिह्न विकसित किए, जिन्हें बाद में अरबों ने अपनाया और पूरे यूरोप में फैलाया।
    📂

    कक्षा-6 इतिहास अध्याय-12 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: इमारतें, चित्र तथा किताबें

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    ये अनुच्छेद सुनिश्चित करते हैं कि भारत में धर्म केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि एक संरक्षित सामूहिक गतिविधि भी है। साथ ही, ये राज्य और धर्म के बीच “पृथक्करण की दीवार” बनाए रखते हैं ताकि राज्य किसी विशेष धर्म का पक्ष न ले सके।

    जहाँ अनुच्छेद 25 व्यक्ति की रक्षा करता है, वहीं अनुच्छेद 26 “धार्मिक संप्रदायों” (Religious Denominations) या उनके वर्गों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह उन्हें अपने मामलों को संगठित और प्रबंधित करने के अधिकार की गारंटी देता है।

    प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं:

    1. संस्थाओं की स्थापना और पोषण: धार्मिक और धर्मार्थ (Charitable) उद्देश्यों के लिए।
    2. अपने कार्यों का प्रबंधन: विशेष रूप से “धर्म के मामलों” में।
    3. संपत्ति का स्वामित्व और अर्जन: चल (पैसा, वाहन) और अचल (भूमि, भवन) दोनों।
    4. संपत्ति का प्रशासन: कानून के अनुसार।

    उच्चतम न्यायालय ने (शिरूर मठ मामले में) किसी समूह को “संप्रदाय” मानने के लिए तीन शर्तें निर्धारित की हैं:

    • यह उन व्यक्तियों का समूह होना चाहिए जिनका एक साझा विश्वास (Common Faith) हो।
    • इसका एक साझा संगठन होना चाहिए।
    • इसे एक विशिष्ट नाम से जाना जाना चाहिए।
    • उदाहरण: रामकृष्ण मिशन और आनंद मार्ग हिंदू धर्म के भीतर संप्रदाय माने गए हैं।

    सीमाएँ: अनुच्छेद 25 की तरह, ये अधिकार भी लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन हैं।

    अनुच्छेद 27 भारतीय धर्मनिरपेक्षता का एक मुख्य स्तंभ है। यह राज्य को जनता से एकत्रित कर (Tax) का उपयोग किसी एक धर्म को दूसरे के ऊपर बढ़ावा देने के लिए करने से रोकता है।

    • राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता जिसका उपयोग विशेष रूप से किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या रखरखाव के लिए किया जाता हो।
    • तर्क: यदि राज्य कर के पैसे का उपयोग केवल एक धर्म के समर्थन के लिए करता है, तो यह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है। हालाँकि, यदि राज्य सभी धर्मों को समान रूप से समर्थन देता है, तो यह इस अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

    उच्चतम न्यायालय ने यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर किया है:

    • कर (Tax): प्रतिबंधित है, यदि किसी विशिष्ट धर्म के लिए उपयोग किया जाए।
    • शुल्क (Fee): अनुमत (Allowed) है। राज्य तीर्थयात्रियों (जैसे वैष्णो देवी या हज) से “शुल्क” ले सकता है ताकि उन्हें धर्मनिरपेक्ष सेवाएं जैसे स्वच्छता, सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जा सकें। शुल्क सेवा के बदले लिया गया भुगतान है, धर्म का प्रचार नहीं।

    यह अनुच्छेद शैक्षणिक संस्थानों के “धर्मनिरपेक्ष स्वरूप” से संबंधित है। यह नियंत्रित करता है कि स्कूलों और कॉलेजों में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है या नहीं।

    धार्मिक शिक्षा की वैधता संस्थान के प्रकार पर निर्भर करती है:

    संस्थान का प्रकारधार्मिक शिक्षा की स्थिति
    पूर्णतः राज्य निधि से संचालितपूरी तरह प्रतिबंधित (Prohibited)।
    राज्य द्वारा प्रशासित लेकिन न्यास (Trust) द्वारा स्थापितदी जा सकती है (जैसे किसी धार्मिक ट्रस्ट द्वारा स्थापित स्कूल)।
    राज्य द्वारा मान्यता प्राप्तस्वैच्छिक आधार पर (Participation is voluntary)।
    राज्य निधि से सहायता प्राप्तस्वैच्छिक आधार पर (Participation is voluntary)।

    जिन संस्थानों में धार्मिक शिक्षा की अनुमति है (प्रकार 3 और 4), वहाँ किसी भी व्यक्ति को भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

    • यदि छात्र नाबालिग है, तो उसके संरक्षक (Guardian) की सहमति आवश्यक है।
    • यह सुनिश्चित करता है कि राज्य शिक्षा का उपयोग धार्मिक धर्मांतरण के उपकरण के रूप में न करे।
    अनुच्छेदअधिकार की प्रकृतिमुख्य सीमा/विशेषता
    26सामूहिक (समूहों/संप्रदायों के लिए)लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य।
    27वित्तीय (करों से सुरक्षा)कर (निषेध) और शुल्क (अनुमति) के बीच अंतर।
    28शैक्षिक (स्कूल/कॉलेज)सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में जबरन धार्मिक शिक्षा पर रोक।

    🕌 अनुच्छेद 26, 27 और 28

    🏛️ अनु. 26: सामूहिक अधिकार
    धार्मिक संप्रदायों की रक्षा करता है। उन्हें संस्थाएं स्थापित करने, अपने धार्मिक कार्यों का प्रबंधन करने और कानून के अनुसार संपत्ति के प्रशासन का अधिकार है।
    🔍 संप्रदाय क्या है?
    शिरूर मठ केस के अनुसार, समूह के पास होना चाहिए: 1. एक साझा विश्वास, 2. एक साझा संगठन, और 3. एक विशिष्ट नाम (जैसे- रामकृष्ण मिशन)।
    💰 अनु. 27: राजकोषीय धर्मनिरपेक्षता
    राज्य किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म की उन्नति के लिए कर (Tax) देने हेतु मजबूर नहीं कर सकता। यह राज्य की धार्मिक तटस्थता बनाए रखता है।
    ⚖️ कर बनाम शुल्क
    जहाँ धर्म के लिए कर (सामान्य राजस्व) लेना वर्जित है, वहीं राज्य तीर्थयात्रियों को सुरक्षा और स्वच्छता जैसी सेवाएं देने के लिए शुल्क (Fee) ले सकता है।
    🏫 अनु. 28: धार्मिक शिक्षा
    पूरी तरह से सरकारी धन से चलने वाले स्कूलों में धार्मिक शिक्षा प्रतिबंधित है। सहायता प्राप्त स्कूलों में यह केवल स्वैच्छिक आधार पर दी जा सकती है।
    ✍️ सहमति और नाबालिग
    किसी को भी धार्मिक शिक्षा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। नाबालिगों के लिए, किसी भी धार्मिक गतिविधि में भाग लेने हेतु अभिभावक की स्पष्ट सहमति अनिवार्य है।
    निष्कर्ष अनुच्छेद 26 समूह के अधिकारों को कवर करता है, अनुच्छेद 27 वित्तीय धर्मनिरपेक्षता सुनिश्चित करता है, और अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थानों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखता है।

    यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (14 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत और इसके पड़ोसी देश; सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां)।

    • संदर्भ: थल सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी की वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस, जिसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति को “स्थिर लेकिन संवेदनशील” बताया गया है।
    • मुख्य बिंदु:
      • परिचालन तत्परता: सेना प्रमुख ने कहा कि यद्यपि डेपसांग और डेमचोक जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में ‘डिसइंगेजमेंट’ (सैनिकों का पीछे हटना) हो गया है, लेकिन यथास्थिति को बदलने के किसी भी प्रयास को रोकने के लिए सेना हाई अलर्ट पर है।
      • भरोसे की कमी: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अप्रैल 2020 के बाद से “भरोसा” सबसे बड़ा हताहत हुआ है। इसे बहाल करने के लिए तीन चरणों की आवश्यकता है: डिसइंगेजमेंट, डी-एस्केलेशन (तनाव कम करना), और अंत में सैनिकों का प्रबंधन।
      • बुनियादी ढांचा समानता: भारत चीन के बराबर बुनियादी ढांचा हासिल करने के लिए सीमा पर सड़कों, सुरंगों और पुलों का निर्माण तेजी से कर रहा है ताकि आवश्यकता पड़ने पर सैनिकों की त्वरित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।
    • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-चीन संबंध”, “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “सीमा बुनियादी ढांचा विकास” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • डी-एस्केलेशन की चुनौती: डिसइंगेजमेंट से डी-एस्केलेशन की ओर बढ़ना जटिल है। इसमें भारी तोपखाने, टैंकों और हजारों सैनिकों को उनके स्थायी ठिकानों पर वापस भेजना शामिल है—एक ऐसा कदम जिसे उठाने में चीन हिचकिचा रहा है।
      • बफर जोन और गश्त: अस्थायी “नो-पेट्रोल” बफर जोन ने शारीरिक झड़पों को तो रोका है, लेकिन इससे कई गश्त बिंदुओं (Patrolling points) तक भारत की पारंपरिक पहुंच भी सीमित हो गई है।
      • रणनीतिक धैर्य: सेना का रुख एक दीर्घकालिक “प्रतीक्षा करो और देखो” नीति की ओर संकेत करता है, जहाँ कूटनीतिक बातचीत को ज़मीन पर एक मजबूत सैन्य मुद्रा का समर्थन प्राप्त है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; सामाजिक न्याय; न्यायपालिका की भूमिका)।

    • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी जिसमें सुझाव दिया गया है कि जो लोग आवारा कुत्तों को खिलाते हैं, उन्हें कुत्ते के काटने की स्थिति में पीड़ितों के चिकित्सा खर्च के लिए आर्थिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
    • मुख्य बिंदु:
      • कानूनी जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि जानवरों को खिलाना दया का कार्य है, लेकिन इससे सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा नहीं होना चाहिए। खिलाने वालों से उन पीड़ितों के इलाज का खर्च उठाने को कहा जा सकता है जिन्हें उनके द्वारा पालित कुत्ते ने काटा हो।
      • संवैधानिक संतुलन: कोर्ट नागरिकों के “जीवन के अधिकार” (अनुच्छेद 21) और जानवरों के प्रति नैतिक व्यवहार के बीच एक महीन रेखा खींचने की कोशिश कर रहा है।
      • ABC नियमों की अनदेखी: नसबंदी और टीकाकरण की प्राथमिक जिम्मेदारी ‘पशु जन्म नियंत्रण’ (ABC) नियमों के तहत स्थानीय नगर निकायों की है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सक्रियता”, “स्थानीय स्वशासन की चुनौतियां” और “सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • संस्थागत विफलता: संपादकीय में उल्लेख किया गया है कि आवारा कुत्तों के हमलों में वृद्धि शहरी स्थानीय निकायों द्वारा नसबंदी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता का सीधा परिणाम है।
      • सामाजिक संघर्ष: स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में “पशु प्रेमियों” और “रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA)” के बीच घर्षण बढ़ रहा है, जिससे न्यायपालिका को मध्यस्थ के रूप में हस्तक्षेप करना पड़ा है।
      • कार्यान्वयन की बाधा: इस नियम को लागू करने के लिए “नियमित रूप से खिलाने” को कानूनी रूप से परिभाषित करना और एक विशिष्ट कुत्ते को एक विशिष्ट व्यक्ति से जोड़ना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती होगी।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 1 (आधुनिक भारतीय इतिहास; सामाजिक सशक्तिकरण; राजनीतिक दर्शन)।

    • संदर्भ: नीले रंग के ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व का विश्लेषण, जो चंपारण के नील के खेतों से शुरू होकर अंबेडकरवादी आंदोलन तक पहुँचता है।
    • मुख्य बिंदु:
      • चंपारण सत्याग्रह (1917): नीला रंग किसान प्रतिरोध से जुड़ा, जब नील की खेती करने वाले किसानों ने ब्रिटिश बागान मालिकों के खिलाफ संघर्ष किया।
      • अंबेडकर का आसमान: डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ के झंडे के लिए नीला रंग चुना, जो आकाश का प्रतिनिधित्व करता है—सार्वभौमिक, विशाल और जाति या धर्म की सीमाओं से मुक्त।
      • दलित अस्मिता: आज, नीला स्कार्फ और झंडा दलित पहचान, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की मांग का एक शक्तिशाली दृश्य प्रतीक है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “सामाजिक सुधार आंदोलन”, “राजनीतिक समाजशास्त्र” और “स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • एक धर्मनिरपेक्ष पहचान: केसरिया या हरे रंग के विपरीत, जो अक्सर विशिष्ट धर्मों से जुड़े होते हैं, नीले रंग को एक “तटस्थ” रंग के रूप में चुना गया जो धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिकता का प्रतीक है।
      • दृश्य एकजुटता: यह रंग भारत की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों के वंचित वर्गों को सशक्तिकरण पर केंद्रित एक अखिल भारतीय पहचान में जोड़ने का काम करता है।
      • उत्पीड़न से सत्ता तक: औपनिवेशिक शोषण (नील) के प्रतीक से राजनीतिक शक्ति (अंबेडकरवादी आंदोलन) के प्रतीक तक नीले रंग का सफर भारत के बदलते सामाजिक ताने-बाने को दर्शाता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी; आपदा प्रबंधन)।

    • संदर्भ: फूलों की घाटी (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल) में लगी भीषण आग पांच दिनों से जारी है, जिससे राज्य को भारतीय वायु सेना (IAF) की मदद लेनी पड़ी है।
    • मुख्य बिंदु:
      • पारिस्थितिक क्षति: यह घाटी 600 प्रकार के विदेशी फूलों और दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों का घर है जो वर्तमान में खतरे में हैं।
      • IAF का हस्तक्षेप: वायु सेना दुर्गम और खड़ी ढलानों पर आग बुझाने के लिए “बम्बी बकेट” (Bambi Bucket) का उपयोग कर रही है।
      • जलवायु कारक: सर्दियों में बर्फबारी की भारी कमी और असामान्य रूप से शुष्क मौसम ने जंगलों को ज्वलनशील बना दिया है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “जैव विविधता का संरक्षण”, “आपदा प्रबंधन तंत्र” और “हिमालयी पारिस्थितिकी”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • नीतिगत कमी: भारत में वनाग्नि प्रबंधन अक्सर प्रतिक्रियात्मक होता है। संपादकीय एक “राष्ट्रीय वनाग्नि नीति” की आवश्यकता बताता है जो सामुदायिक ‘वन पंचायतों’ और उपग्रह-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों पर केंद्रित हो।
      • आक्रामक प्रजातियाँ: ओक जैसे चौड़े पत्तों वाले पेड़ों के स्थान पर चीड़ (पाइन) के पेड़ों का विस्तार हिमालयी जंगलों को आग के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है क्योंकि चीड़ की पत्तियां अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (आंतरिक सुरक्षा; साइबर सुरक्षा; पुलिस व्यवस्था में तकनीक की भूमिका)।

    • संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने “डिजिटल अरेस्ट” घोटाले से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसमें जालसाज कानून प्रवर्तन अधिकारी बनकर पैसे ऐंठते हैं।
    • मुख्य बिंदु:
      • घोटाले का तरीका: अपराधी वीडियो कॉल का उपयोग करके खुद को CBI या ED अधिकारी बताते हैं और पीड़ितों से कहते हैं कि वे “डिजिटल अरेस्ट” के तहत हैं और जब तक वे जुर्माना नहीं देते, वे घर नहीं छोड़ सकते या कॉल नहीं काट सकते।
      • अंतर-एजेंसी पैनल: इस पैनल में भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), RBI और दूरसंचार विभाग (DoT) शामिल हैं जो वास्तविक समय में फर्जी सिम को ब्लॉक करने और बैंक खातों को फ्रीज करने का काम करेंगे।
      • सत्यापन प्रोटोकॉल: समिति एक ऐसी प्रणाली पर काम कर रही है जहाँ नागरिक एक सरकारी पोर्टल के माध्यम से कॉल करने वाले अधिकारी की पहचान सत्यापित कर सकें।
    • UPSC प्रासंगिकता: “साइबर सुरक्षा चुनौतियां”, “पुलिस सुधार” और “वित्तीय धोखाधड़ी की रोकथाम”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • सीमा पार संबंध: इनमें से कई घोटाले दक्षिण-पूर्व एशिया (कंबोडिया, म्यांमार) के “साइबर-गुलाम” केंद्रों से संचालित होते हैं, जिसके लिए इंटरपोल के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।
      • मनोवैज्ञानिक तत्व: जालसाज कानून प्रवर्तन के प्रति आम नागरिक के डर और सम्मान का फायदा उठाते हैं। संपादकीय इस बात पर जोर देता है कि जन जागरूकता ही बचाव की पहली पंक्ति है; कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से पूछताछ नहीं करती हैं।

    संपादकीय विश्लेषण

    14 जनवरी, 2026
    GS-2 IR
    🏔️ LAC: विश्वास का अभाव
    सेना प्रमुख ने सीमा को “स्थिर लेकिन संवेदनशील” बताया। डेपसांग/डेमचोक में पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद तनाव कम करने (De-escalation) की प्रक्रिया रुकी हुई है। भारत का लक्ष्य: चीन द्वारा यथास्थिति में बदलाव को रोकने के लिए बुनियादी ढांचा समानता प्राप्त करना।
    GS-2 शासन
    🐕 पशु-पोषण और सार्वजनिक सुरक्षा
    सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को खिलाने वालों पर वित्तीय दायित्व का सुझाव दिया। कानूनी तनाव: अनुच्छेद 21 (सुरक्षा का अधिकार) बनाम करुणा। मूल कारण: स्थानीय निकायों द्वारा पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता।
    GS-1 इतिहास
    🗳️ नीला रंग: नील से सशक्तिकरण तक
    चंपारण (1917) के प्रतिरोध से लेकर आंबेडकरवादी आंदोलन तक इस रंग का इतिहास। आकाश (सार्वभौमिक/मुक्त) का प्रतिनिधित्व करने वाला नीला रंग, दलित पहचान और जातिगत पदानुक्रमों के खिलाफ संवैधानिक दावे के लिए एक धर्मनिरपेक्ष सूत्र के रूप में कार्य करता है।
    GS-3 आपदा
    🔥 फूलों की घाटी: पारिस्थितिक संकट
    यूनेस्को स्थल में 5 दिनों से जंगल की आग। कारण: शुष्क सर्दी और ज्वलनशील चीड़ के पेड़ों (Chir Pine) का बढ़ना। IAF द्वारा बाम्बी बकेट का उपयोग। आवश्यकता: सामुदायिक नेतृत्व वाली ‘वन पंचायतों’ के साथ एकीकृत एक राष्ट्रीय वन अग्नि नीति।
    GS-3 सुरक्षा
    📞 “डिजिटल अरेस्ट” का मुकाबला
    गृह मंत्रालय ने जबरन वसूली गिरोहों को खत्म करने के लिए I4C, RBI और DoT के साथ पैनल बनाया। रणनीति: खातों को रियल-टाइम फ्रीज करना और फर्जी सिम ब्लॉक करना। तथ्य: कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ नहीं करती हैं।

    यहाँ भारत की प्रमुख जनजातियोंकृषि पेटियों और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तथा रणनीतिक रेखाओं का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    भारत में एक विशाल जनजातीय आबादी है, जो मुख्य रूप से वन क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।

    • उत्तर और उत्तर-पूर्व भारत:
      • भोटिया और गुज्जर: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
      • गारो, खासी और जयंतिया: मुख्य रूप से मेघालय की पहाड़ियों में निवास करते हैं।
      • नागा: नागालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों में स्थित हैं।
    • मध्य भारत:
      • गोंड: भारत के सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से एक, जो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं।
      • भील: मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं।
      • संथाल: झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में केंद्रित हैं।
    • दक्षिण भारत:
      • टोडा: तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों में रहने वाला एक अद्वितीय समुदाय।
      • चेन्चू: मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की नल्लामाला पहाड़ियों में पाए जाते हैं।

    भारत में फसलों का वितरण मिट्टी के प्रकार, वर्षा और तापमान द्वारा निर्धारित होता है।

    फसलप्राथमिक क्षेत्रआवश्यक स्थितियाँ
    चावलपश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेशउच्च तापमान, उच्च आर्द्रता और भारी वर्षा (100 सेमी से अधिक)।
    गेहूँपंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेशबढ़ते समय ठंडा मौसम और पकते समय तेज़ खिली हुई धूप।
    कपासगुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगानाउच्च तापमान और हल्की वर्षा; काली मृदा में सर्वोत्तम विकास।
    चायअसम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), केरलपहाड़ी ढलानों पर अच्छे जल निकास वाली मिट्टी और बार-बार होने वाली बौछारें।
    कॉफीकर्नाटक (बाबा बुदन पहाड़ियाँ), केरलढलानों पर समृद्ध और सुअपवाहित मिट्टी; कर्नाटक सबसे बड़ा उत्पादक है।

    भारत की सीमाएँ विशिष्ट रेखाओं द्वारा चिह्नित हैं जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों और रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

    • रेडक्लिफ रेखा (Radcliffe Line): भारत और पाकिस्तान, साथ ही भारत और बांग्लादेश के बीच की सीमा रेखा।
    • मैकमोहन रेखा (McMahon Line): चीन और भारत के बीच की प्रभावी सीमा (विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश क्षेत्र में)।
    • नियंत्रण रेखा (LoC – Line of Control): जम्मू और कश्मीर के भारतीय और पाकिस्तानी नियंत्रित हिस्सों के बीच की सैन्य नियंत्रण रेखा।
    • वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC – Line of Actual Control): लद्दाख और पूर्वी क्षेत्रों में भारत और चीन के बीच की प्रभावी सीमा।
    • डूरंड रेखा (Durand Line): अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की सीमा (भारत भी PoK क्षेत्र में अफगानिस्तान के साथ एक छोटी सीमा को मान्यता देता है)।
    श्रेणीमुख्य बिंदुभौगोलिक फोकस
    सबसे बड़ी जनजातिभील / गोंडमध्य और पश्चिमी भारत
    चावल का कटोरापश्चिम बंगाल और पंजाबभारत-गंगा के मैदान
    सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाभारत-बांग्लादेशपूर्वी भारत
    कपास का केंद्रदक्कन ट्रैपगुजरात और महाराष्ट्र

    जनजातियों के स्थानों को अक्सर उन पहाड़ियों के नाम से याद रखा जा सकता है जहाँ वे रहती हैं, जैसे ‘गारो-खासी-जयंतिया’ पहाड़ियाँ और उनके नाम पर आधारित जनजातियाँ। मानचित्र पर इन पहाड़ियों की स्थिति को ध्यान से देखें।

    मानव एवं रणनीतिक परिदृश्य

    नृवंशविज्ञान
    👤 प्रमुख जनजातियाँ
    भारत का सांस्कृतिक मानचित्र मध्य हृदयस्थल के गोंड और संथाल, नीलगिरी पहाड़ियों के टोडा और पूर्वोत्तर के नागा जैसे स्वदेशी समूहों द्वारा परिभाषित है।
    अभ्यास: टोडा जनजाति के अनूठे निवास स्थान को खोजने के लिए तमिलनाडु में नीलगिरी पहाड़ियों को लोकेट करें।
    कृषि
    🌾 कृषि पेटियाँ
    फसल वितरण भूगोल का प्रतिबिंब है। जहाँ उत्तर में गेहूँ पनपता है, वहीं कॉफी और चाय के लिए बाबा बुदन पहाड़ियों और दार्जिलिंग के ढलानों की आवश्यकता होती है।
    फसल मुख्य क्षेत्र आवश्यक परिस्थितियाँ
    कपासगुजरात, महाराष्ट्रकाली मिट्टी; उच्च तापमान
    चावलप. बंगाल, पंजाब, UPउच्च आर्द्रता; 100cm+ वर्षा
    कॉफीकर्नाटक की पहाड़ियाँअच्छी जल निकासी वाले ढलान
    अभ्यास: दक्कन ट्रैप के मानचित्र पर भारत के “कपास हब” की पहचान करें।
    भू-राजनीति
    🚩 रणनीतिक सीमाएँ
    महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय रेखाएँ जैसे रेडक्लिफ रेखा (पाकिस्तान/बांग्लादेश) और मैकमोहन रेखा (चीन) राष्ट्र की संप्रभु सीमाओं को परिभाषित करती हैं।
    अभ्यास: जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के मानचित्र पर LoC (पाकिस्तान की ओर) और LAC (चीन की ओर) के बीच अंतर स्पष्ट करें।
    मानचित्रण सारांश
    श्रेणी मुख्य विशेषता भौगोलिक केंद्र
    सबसे बड़ी जनजातिभील / गोंडमध्य एवं पश्चिमी भारत
    धान का कटोराप. बंगाल और पंजाबसिंधु-गंगा के मैदान
    सबसे लंबी सीमाभारत-बांग्लादेशपूर्वी भारत (4,096 किमी)

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 13 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “नए साम्राज्य और राज्य” गुप्त वंश के उदय, हर्षवर्धन के शासन और दक्षिण भारत के शक्तिशाली राज्यों के बारे में जानकारी प्रदान करता है।

    गुप्त शासकों के बारे में हमें मुख्य रूप से ‘प्रशस्तियों’ से जानकारी मिलती है। प्रशस्ति एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ‘प्रशंसा में’

    • समुद्रगुप्त का अभिलेख: समुद्रगुप्त की एक प्रसिद्ध प्रशस्ति इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में अशोक स्तंभ पर खुदी हुई है। इसकी रचना उनके दरबारी कवि और मंत्री हरिषेण ने की थी।
    • योद्धा के रूप में राजा: कवि ने समुद्रगुप्त का वर्णन एक महान योद्धा के रूप में किया है, जिनका शरीर युद्ध में कुल्हाड़ियों, तीरों और भालों के घावों के निशानों से ढका हुआ था।
    • संगीत प्रेमी राजा: उस काल के सिक्कों पर समुद्रगुप्त को वीणा बजाते हुए दिखाया गया है, जो संगीत और कविता के प्रति उनकी रुचि को दर्शाता है।
    1. आर्यावर्त (उत्तर भारत): यहाँ के नौ शासकों को उखाड़ फेंका गया और उनके राज्यों को साम्राज्य का हिस्सा बना लिया गया।
    2. दक्षिणापथ (दक्षिण भारत): यहाँ के बारह शासकों ने हार के बाद आत्मसमर्पण किया; समुद्रगुप्त ने उन्हें फिर से शासन करने की अनुमति दी (अधीनता स्वीकार करने पर)।
    3. आंतरिक घेरा: असम, नेपाल और उत्तर-पश्चिम के गण संघ जैसे राज्य कर देते थे और उनके आदेशों का पालन करते थे।
    4. बाहरी इलाके: कुषाण, शक और श्रीलंका के शासकों ने उनकी अधीनता स्वीकार की और अपनी बेटियों का विवाह उनसे किया।

    गुप्त प्रशस्तियों में अक्सर परिवार के उदय को दिखाने के लिए पूर्वजों की सूची (वंशावली) दी जाती है।

    • सम्मान की उपाधियाँ: समुद्रगुप्त के पिता, चंद्रगुप्त, पहले शासक थे जिन्होंने ‘महाराजाधिराज’ जैसी बड़ी उपाधि धारण की। उनके पूर्वजों को केवल ‘महाराजा’ कहा जाता था।
    • चंद्रगुप्त द्वितीय: समुद्रगुप्त के पुत्र ने पश्चिम भारत में सैन्य अभियान का नेतृत्व किया और अंतिम ‘शक’ शासक को हराया। उन्हें ‘विक्रम संवत्’ (58 ईसा पूर्व से शुरू) और ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि से जोड़ा जाता है। उनके दरबार में कवि कालिदास और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट रहते थे।

    गुप्तों के बारे में जहाँ हमें सिक्कों और अभिलेखों से पता चलता है, वहीं राजा हर्षवर्धन (जिन्होंने 1400 साल पहले शासन किया) के बारे में हमें उनकी जीवनियों से जानकारी मिलती है।

    • हर्षचरित: उनके दरबारी कवि बाणभट्ट द्वारा संस्कृत में लिखी गई हर्षवर्धन की जीवनी।
    • सत्ता तक पहुँच: पिता और बड़े भाई की मृत्यु के बाद हर्ष थानेसर के राजा बने। बाद में, जब उनके बहनोई (कन्नौज के शासक) को बंगाल के शासक ने मार दिया, तो हर्ष ने कन्नौज पर भी कब्जा कर लिया।
    • विस्तार और पराजय: हर्ष ने मगध और बंगाल को जीता, लेकिन जब उन्होंने दक्कन की ओर बढ़ने की कोशिश की, तो उन्हें चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने नर्मदा नदी के तट पर रोक दिया।
    • श्वेन त्सांग: चीनी तीर्थयात्री हर्ष के दरबार में रहे और उन्होंने वहाँ के प्रशासन और समाज का विस्तृत विवरण दिया।

    इस काल में दक्षिण भारत में ये दो प्रमुख राजवंश थे।

    • पल्लव: उनका राज्य उनकी राजधानी कांचीपुरम् के आसपास केंद्रित था और कावेरी डेल्टा तक फैला हुआ था।
    • चालुक्य: इनका राज्य कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों के बीच ‘रायचूर दोआब’ में स्थित था। उनकी राजधानी ऐहोल (Aihole) एक समृद्ध व्यापारिक और धार्मिक केंद्र थी।
    • पुलकेशिन द्वितीय: सबसे प्रसिद्ध चालुक्य राजा। उनके दरबारी कवि रविकर्ति ने एक प्रशस्ति लिखी, जिसमें उनके सैन्य अभियानों का वर्णन है।

    राजाओं ने शक्तिशाली पुरुषों (सामंतों और मंत्रियों) का समर्थन हासिल करने के लिए नई व्यवस्थाएँ विकसित कीं।

    • अनुवांशिक पद: कुछ प्रशासनिक पद पिता से पुत्र को मिलने लगे। जैसे हरिषेण अपने पिता की तरह ‘महादंडनायक’ (मुख्य न्यायिक अधिकारी) थे।
    • एक व्यक्ति, कई पद: अक्सर एक व्यक्ति के पास कई पद होते थे। हरिषेण महादंडनायक के साथ-साथ ‘कुमारमात्य’ (महत्वपूर्ण मंत्री) और ‘संधिविग्रहिक’ (युद्ध और शांति का मंत्री) भी थे।
    • सामंत: ये सैन्य नेता थे जो राजा को सेना उपलब्ध कराते थे। उन्हें वेतन के बजाय अक्सर भूमि दी जाती थी, जिससे वे राजस्व (Tax) वसूलते थे और अपनी सेना का रखरखाव करते थे।
    • दक्षिण की सभाएँ: पल्लव अभिलेखों में ‘सभा’ (ब्राह्मण भूस्वामियों का संगठन), ‘ऊर’ (गैर-ब्राह्मण ग्राम सभा) और ‘नगरम’ (व्यापारियों का संगठन) का उल्लेख मिलता है।
    • भाषा और स्थिति: कालिदास के नाटकों (जैसे अभिज्ञान शाकुन्तलम्) में राजा और ब्राह्मण संस्कृत बोलते हैं, जबकि आम पुरुष और महिलाएँ प्राकृत भाषा का प्रयोग करते हैं।
    • अस्पृश्यता (Untouchability): चीनी तीर्थयात्री फा-शिएन ने ध्यान दिया कि अछूतों को शहरों के बाहर रहना पड़ता था। जब वे शहर में आते थे, तो उन्हें लकड़ी के टुकड़े पर चोट करके आवाज़ करनी पड़ती थी ताकि दूसरे लोग उनके संपर्क से बच सकें।
    • राजा की सेना: जब सेना चलती थी, तो वह संगीतकारों, सैनिकों और जानवरों का एक विशाल जुलूस होता था। ग्रामीणों को सेना के लिए भोजन, उपहार और चारे की व्यवस्था करनी पड़ती थी।
    • गुप्त वंश का आरंभ: लगभग 1700 साल पहले।
    • हर्षवर्धन का शासन: लगभग 1400 साल पहले।

    📜 नए साम्राज्य और राज्य

    🔱 गुप्त वंश और प्रशस्तियाँ
    राजाओं के बारे में जानकारी प्रशस्तियों (प्रशंसा में लिखे अभिलेख) से मिलती है। हरिषेण ने समुद्रगुप्त को एक योद्धा और संगीतज्ञ बताया। उनके पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय ने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की।
    🦁 राजा हर्षवर्धन
    1,400 साल पहले कन्नौज से शासन किया। बाणभट्ट ने उनकी जीवनी हर्षचरित संस्कृत में लिखी। उन्होंने विस्तार की कोशिश की, लेकिन चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने उन्हें नर्मदा तट पर रोक दिया।
    🏛️ दक्षिण के राज्य
    दक्षिण में पल्लव (काँचीपुरम्) और चालुक्य (ऐहोल) शक्तिशाली थे। स्थानीय शासन में सभा (ब्राह्मण भूस्वामी), उर (ग्राम सभा) और नगरम (व्यापारियों का संगठन) जैसे निकाय महत्वपूर्ण थे।
    ⚔️ प्रशासन व्यवस्था
    प्रशासनिक पद आनुवंशिक होने लगे (जैसे हरिषेण पिता की तरह महादंडनायक बने)। शक्तिशाली सेनापतियों को सामंत कहा जाता था, जिन्हें भूमि दी जाती थी और वे जरूरत पड़ने पर राजा को सैन्य सहायता देते थे।
    सामाजिक तथ्य अभिजात वर्ग संस्कृत बोलता था, जबकि आम लोग प्राकृत। चीनी यात्री फा-शिएन (फाह्यान) के अनुसार, ‘अछूतों’ को शहर से बाहर रहना पड़ता था और आते समय सूचना देनी पड़ती थी।
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    कक्षा-6 इतिहास अध्याय-11 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नए साम्राज्य और राज्य

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    जहाँ पिछले अनुच्छेद व्यक्ति को राज्य के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करते हैं, वहीं अनुच्छेद 23 और 24 अक्सर व्यक्ति को निजी शोषण से बचाते हैं, और अनुच्छेद 25 व्यक्ति की आध्यात्मिक स्वायत्तता (Spiritual Autonomy) स्थापित करता है।

    अनुच्छेद 23 एक व्यापक “शोषण के विरुद्ध अधिकार” है। यह इस मामले में अद्वितीय है कि यह राज्य और निजी व्यक्तियों दोनों के विरुद्ध लागू होता है।

    • मानव तस्करी (Human Trafficking): व्यावसायिक यौन शोषण, गुलामी या जबरन श्रम के उद्देश्यों के लिए मनुष्यों का अवैध व्यापार।
    • बेगार (Begar): जबरन श्रम का एक रूप जहाँ किसी व्यक्ति को बिना किसी भुगतान के काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। यह रियासतों में एक आम ऐतिहासिक प्रथा थी।
    • बलात श्रम (Forced Labour): किसी भी दंड की धमकी के तहत किसी व्यक्ति से कराया गया कार्य या सेवा, जिसके लिए उस व्यक्ति ने स्वेच्छा से स्वयं को प्रस्तुत नहीं किया है।

    पीयूडीआर बनाम भारत संघ (एशियाड श्रमिक मामला) में सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुच्छेद का विस्तार किया।

    • फैसला: अदालत ने कहा कि “बल” (Force) केवल शारीरिक या कानूनी नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति गरीबी या भूख के कारण न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम करने को मजबूर है, तो उसे भी अनुच्छेद 23 के तहत “बलात श्रम” माना जाएगा।

    राज्य ‘सार्वजनिक उद्देश्यों’ के लिए अनिवार्य सेवा (जैसे सैन्य भर्ती या अनिवार्य सामाजिक सेवा) लागू कर सकता है।

    • शर्त: ऐसा करते समय, राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।

    अनुच्छेद 24 एक “सामाजिक अधिदेश” है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भारत के नागरिकों का बचपन श्रम की भेंट न चढ़ जाए।

    यह 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को निम्नलिखित स्थानों पर काम पर रखने से रोकता है:

    • कारखाने (Factories)
    • खदानें (Mines)
    • जोखिम भरे रोजगार (जैसे निर्माण कार्य, रेलवे, पटाखा निर्माण)।
    • बाल श्रम (निषेध एवं नियमन) संशोधन अधिनियम, 2016: इसने अनुच्छेद 24 की खामियों को दूर किया। यह 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को सभी व्यवसायों में काम करने से रोकता है (सिर्फ स्कूल के बाद पारिवारिक व्यवसाय में मदद को छोड़कर)। इसने “किशोर” (14-18 वर्ष) की एक नई श्रेणी भी पेश की, जिन्हें जोखिम भरे कामों में प्रतिबंधित किया गया है।
    • एम.सी. मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य (1996): सुप्रीम कोर्ट ने ‘बाल श्रम पुनर्वास कल्याण कोष’ बनाने का निर्देश दिया। उल्लंघन करने वाले नियोक्ता को प्रति बच्चा ₹20,000 इस कोष में जमा करने होंगे।

    अनुच्छेद 25 भारतीय धर्मनिरपेक्षता (Secularism) का आधार है। यह प्रत्येक व्यक्ति को अपने विश्वासों को मानने और पालन करने की स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

    1. अंतःकरण की स्वतंत्रता (Conscience): किसी भी भगवान को मानने या न मानने की पूर्ण आंतरिक स्वतंत्रता।
    2. मानने का अधिकार (Profess): अपने विश्वास और आस्था की सार्वजनिक घोषणा करना।
    3. आचरण का अधिकार (Practice): पूजा-पाठ, परंपराएं और अनुष्ठान करने का अधिकार (जैसे पगड़ी पहनना या क्रॉस पहनना)।
    4. प्रचार का अधिकार (Propagate): अपने विचारों का प्रसार करना।
      • धर्मांतरण की सीमा: स्टेनिस्लॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य में कोर्ट ने कहा कि “प्रचार” के अधिकार में “धर्मांतरण” का अधिकार शामिल नहीं है। जबरन या धोखाधड़ी से कराया गया धर्मांतरण संवैधानिक रूप से सुरक्षित नहीं है।

    न्यायपालिका ने यह तय करने के लिए एक सिद्धांत विकसित किया है कि धर्म के किन हिस्सों को सुरक्षा दी जाए। केवल वही प्रथाएं संरक्षित हैं जो धर्म का अभिन्न या अनिवार्य हिस्सा हैं।

    • उदाहरण: तीन तलाक को इस्लाम की अनिवार्य प्रथा नहीं माना गया, इसलिए इसे समाप्त किया जा सका। इसी तरह, अजान या भजन के लिए लाउडस्पीकर के उपयोग को विनियमित किया जा सकता है।

    राज्य धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है:

    • सामाजिक सुधार: हिंदू मंदिरों को सभी जातियों (दलितों) के लिए खोलना।
    • धर्मनिरपेक्ष गतिविधियाँ: धार्मिक ट्रस्ट के वित्तीय या राजनीतिक कार्यों को विनियमित करना।
    • नोट: यहाँ “हिंदू” शब्द के दायरे में सिख, जैन और बौद्ध भी शामिल हैं।
    विशेषताअनुच्छेद 23अनुच्छेद 24अनुच्छेद 25
    श्रेणीशोषण के विरुद्ध अधिकारशोषण के विरुद्ध अधिकारधार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
    मुख्य केंद्रबलात श्रम और तस्करीबाल श्रम (14 से कम)व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता
    लक्ष्यवयस्क और बच्चेविशेष रूप से बच्चेसभी व्यक्ति (व्यक्तिगत रूप से)
    मुख्य सीमासार्वजनिक सेवा का अपवादकोई नहीं (पूर्ण निषेध)सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य

    🛡️ अनुच्छेद 23, 24 और 25

    🚫 अनु. 23: मानव तस्करी
    यह बेगार और बलात् श्रम (Forced Labour) को प्रतिबंधित करता है। ‘एशियाड वर्कर्स’ मामले के अनुसार, गरीबी के कारण न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना भी बलात् श्रम की श्रेणी में आता है।
    🧒 अनु. 24: बाल श्रम निषेध
    14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को कारखानों या खानों में काम पर रखने पर रोक। 2016 के अधिनियम ने इसे सभी व्यवसायों तक बढ़ा दिया और किशोरों (14-18 वर्ष) के लिए सुरक्षा जोड़ी।
    🙏 अनु. 25: व्यक्तिगत आस्था
    चार स्वतंत्रताएं देता है: 1. अंतःकरण (आंतरिक विश्वास), 2. मानने, 3. आचरण, और 4. प्रचार करने का अधिकार। यह नागरिकों और विदेशियों दोनों के लिए उपलब्ध है।
    ⚖️ अनिवार्य प्रथाएं
    राज्य केवल अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं की रक्षा करता है। अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन हैं। जबरन धर्म परिवर्तन कोई मौलिक अधिकार नहीं है।
    🛠️ राज्य का हस्तक्षेप
    राज्य धर्म के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को नियंत्रित कर सकता है और सामाजिक सुधार लागू कर सकता है (जैसे मंदिरों को सभी के लिए खोलना)। यहाँ ‘हिन्दू’ शब्द में सिख, जैन और बौद्ध शामिल हैं।
    📖 ऐतिहासिक निर्णय
    स्टैनिसलॉस केस: दूसरों को धर्मांतरित करने का अधिकार नहीं। एम.सी. मेहता: बाल श्रम कल्याण कोष की स्थापना। तीन तलाक: इसे गैर-अनिवार्य प्रथा घोषित किया गया।
    विशेष तथ्य जहाँ अनुच्छेद 23 को “सार्वजनिक उद्देश्यों” (जैसे अनिवार्य सैन्य सेवा) के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है, वहीं अनुच्छेद 24 जोखिम भरे कार्यों में बच्चों के लिए पूर्ण निषेध है।

    यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (13 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष क्षेत्र में जागरूकता)।

    • संदर्भ: इसरो (ISRO) का PSLV-C62 मिशन, जो रणनीतिक उपग्रह EOS-NI को ले जा रहा था, 12 जनवरी को तीसरे चरण (third-stage) की खराबी के कारण विफल हो गया।
    • मुख्य बिंदु:
      • विसंगति: इसरो ने पुष्टि की कि तीसरे चरण (PS3) के अंत में “रोल रेट डिस्टर्बेंस” (roll rate disturbance) हुआ, जिससे रॉकेट अनियंत्रित होकर घूमने लगा और अपने मार्ग से भटक गया।
      • दोहराव: यह पीएसएलवी की लगातार दूसरी विफलता है; मई 2025 में पीएसएलवी-सी61 मिशन के दौरान भी तीसरे चरण में ऐसी ही समस्या आई थी।
      • रणनीतिक क्षति: प्राथमिक पेलोड, EOS-NI, डीआरडीओ (DRDO) द्वारा निर्मित एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह था, जिसे विशेष रणनीतिक अनुप्रयोगों के लिए बनाया गया था।
    • UPSC प्रासंगिकता: “विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियां”, “स्वदेशीकरण” और “अंतरिक्ष अन्वेषण में चुनौतियां”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • गुणवत्ता आश्वासन संकट: चूंकि पीएसएलवी एक पुरानी और भरोसेमंद तकनीक है, इसलिए लगातार विफलताएं डिजाइन की खामियों के बजाय गुणवत्ता आश्वासन (Quality Assurance) प्रोटोकॉल में व्यवस्थागत चूक का संकेत देती हैं।
      • पारदर्शिता और जांच: 2025 की विफलता के बाद की रिपोर्ट को ‘वर्गीकृत’ (Classified) रखा गया था। संपादकीय का तर्क है कि बाहरी जांच की कमी ने C62 लॉन्च से पहले सुधारों में बाधा डाली।
      • व्यावसायिक प्रतिष्ठा: इसरो ‘न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड’ (NSIL) के माध्यम से पीएसएलवी का विपणन करता है। इन विफलताओं से अंतरराष्ट्रीय बीमा प्रीमियम बढ़ सकता है, जिससे यह वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी हो जाएगा।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत से जुड़े द्विपक्षीय समूह और समझौते)।

    • संदर्भ: अमेरिका के आगामी राजदूत सर्जियो गोर ने घोषणा की है कि भारत को अगले महीने ‘पैक्स सिलिका’ (Pax Silica) में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।
    • मुख्य बिंदु:
      • गठबंधन: यह अमेरिका के नेतृत्व वाली एक व्यवस्था है जो सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में रणनीतिक सहयोग पर केंद्रित है।
      • रणनीतिक साझेदार: भारत इसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, यूएई, इजराइल और नीदरलैंड जैसे देशों के साथ शामिल होगा।
      • राजनयिक संदर्भ: यह निमंत्रण ऐसे समय में आया है जब भारत और अमेरिका व्यापारिक तनाव (भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ) और रूसी तेल आयात पर मतभेदों से जूझ रहे हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव”, “भारत-अमेरिका संबंध” और “महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी शासन”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • रणनीतिक आवश्यकता: दिसंबर में वाशिंगटन में इसके लॉन्च के समय भारत गायब था; अब इसका शामिल होना दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश को वैश्विक हाई-टेक आपूर्ति श्रृंखला में एकीकृत करने की रणनीतिक जरूरत को दर्शाता है।
      • व्यापार वार्ता के लिए उत्प्रेरक: यह निमंत्रण लंबे समय से लंबित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को सुलझाने के लिए आवश्यक गति प्रदान कर सकता है।
      • क्षेत्रीय स्थिरता: राजदूत गोर दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं, जो संकेत देता है कि तकनीकी सहयोग को पाकिस्तान और बांग्लादेश में क्षेत्रीय स्थिरता के प्रयासों के साथ जोड़ा जाएगा।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; स्वास्थ्य और शिक्षा से संबंधित मुद्दे)।

    • संदर्भ: प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और विकास (ECCD) पर एक राष्ट्रीय मिशन की वकालत, ताकि भारत के $30 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को सुरक्षित किया जा सके।
    • मुख्य बिंदु:
      • 3,000 दिनों का विंडो: गर्भधारण से पहले 1,000 दिन मस्तिष्क के विकास (80-85%) के लिए महत्वपूर्ण होते हैं, उसके बाद के 2,000 दिन सामाजिक और संज्ञानात्मक कौशल को आकार देते हैं।
      • आर्थिक तर्क: ECCD में निवेश एक रणनीतिक कदम है जो भविष्य में उपचारात्मक शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले खर्च को कम करता है।
      • सार्वभौमिक दृष्टिकोण: लेखक का तर्क है कि ECCD को केवल गरीब वर्ग तक सीमित रखने के बजाय ‘सार्वभौमिक’ होना चाहिए, क्योंकि सभी आय स्तरों के बच्चे ‘स्क्रीन एक्सपोजर’ और मोटापे जैसे जोखिमों का सामना कर रहे हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “मानव पूंजी निर्माण”, “सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति” और “सतत विकास लक्ष्य”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • छूटा हुआ अवसर: वर्तमान में सरकारी हस्तक्षेप 30-36 महीनों (आंगनवाड़ी) से शुरू होता है, लेकिन पहले 1,000 दिन—जहाँ उपेक्षा अक्सर अपरिवर्तनीय क्षति पहुँचाती है—अभी भी नीतिगत कमी का हिस्सा हैं।
      • एकीकृत ढांचा: एक प्रस्तावित ECCD मिशन के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला एवं बाल विकास मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी।
      • माता-पिता का सशक्तिकरण: माता-पिता कोresponsive देखभाल के बारे में शिक्षित करना एक प्रमुख स्तंभ है, जो टीकाकरण जितना ही प्रभावी हो सकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; शिक्षा नीति)।

    • संदर्भ: ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक, 2025’ का विश्लेषण, जिसका उद्देश्य भारतीय उच्च शिक्षा की देखरेख को एकीकृत और आधुनिक बनाना है।
    • मुख्य बिंदु:
      • एकीकृत निकाय: विधेयक UGC, AICTE और NCTE को समाप्त कर एक एकल निकाय, ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ बनाने का प्रस्ताव करता है।
      • भूमिकाओं का पृथक्करण: यह विनियमन, प्रत्यायन (Accreditation) और मानकों के लिए तीन अलग-अलग परिषदों का निर्माण करता है ताकि हितों के टकराव को कम किया जा सके।
      • पारदर्शिता मॉडल: यह वित्त, परिणामों और संकाय डेटा के सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण (self-disclosure) पर आधारित एक तकनीक-सक्षम ‘सिंगल-विंडो’ प्रणाली की परिकल्पना करता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “शिक्षा सुधार”, “जवाबदेही” और “NEP 2020 का कार्यान्वयन”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • “लाइट बट टाइट” (Light but Tight): विधेयक NEP 2020 के अनुरूप है, जो निरीक्षणों के “जाल” को कम करता है ताकि संस्थान अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित कर सकें, साथ ही उच्च मानकों को भी बनाए रखता है।
      • स्वायत्तता: यह अच्छा प्रदर्शन करने वाले संस्थानों को अधिक स्वतंत्रता देता है, जिससे स्वायत्तता को उत्कृष्टता के उपकरण के रूप में उपयोग किया जा सके।
      • छात्र सशक्तिकरण: मजबूत शिकायत निवारण तंत्र के माध्यम से छात्रों को सक्रिय हितधारक बनाया गया है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; ई-गवर्नेंस; नीतियां और हस्तक्षेप)।

    • संदर्भ: कर्नाटक का ‘भूमि’ (Bhoomi) प्रोजेक्ट, जिसने भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण किया, 2025 में 25 वर्ष पूरे कर रहा है।
    • मुख्य बिंदु:
      • विवेकाधिकार का अंत: वर्ष 2000 में शुरू किए गए इस प्रोजेक्ट का लक्ष्य ग्रामीण लेखाकारों के हस्तलिखित रिकॉर्ड को कंप्यूटरीकृत करना और उनके व्यक्तिगत विवेकाधिकार (Discretion) को समाप्त करना था।
      • प्रभाव: 25 वर्षों में 3.5 करोड़ किसानों को 39.8 करोड़ से अधिक RTC (अधिकार, किरायेदारी और फसल का रिकॉर्ड) जारी किए गए हैं।
      • एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र: आज भूमि प्रोजेक्ट पंजीकरण प्रणाली (कावेरी), सर्वेक्षण (मोजिनी) और पीएम-किसान जैसी कल्याणकारी योजनाओं के साथ एकीकृत है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “ई-गवर्नेंस और विकास”, “भूमि सुधार” और “प्रशासनिक सुधार केस स्टडी”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • सांस्कृतिक बदलाव: इस सफलता के लिए लगभग 18,000 कर्मियों को डिजिटल प्रणालियों के उपयोग के लिए प्रशिक्षित किया गया।
      • भ्रष्टाचार में कमी: पंजीकरण को भूमि रिकॉर्ड से जोड़कर, इस परियोजना ने धोखाधड़ी वाले लेनदेन को काफी कम कर दिया और बिचौलियों को समाप्त कर दिया।
      • विश्वास का सुदृढ़ीकरण: तकनीक से परे, इस परियोजना की सबसे बड़ी उपलब्धि राजस्व प्रशासन को अधिक विश्वसनीय बनाकर सार्वजनिक संस्थानों में विश्वास को मजबूत करना है।

    संपादकीय विश्लेषण

    13 जनवरी, 2026
    GS-3 अंतरिक्ष
    🚀 PSLV-C62: प्रणालियों की विफलता का विश्लेषण
    स्टेज-3 में ‘रोल रेट डिस्टर्बेंस’ के कारण लगातार दूसरी विफलता। नुकसान: रणनीतिक उपग्रह EOS-NI। आलोचना: विफलता रिपोर्टों को “वर्गीकृत” (Classified) रखना बाहरी विशेषज्ञों की समीक्षा को रोकता है, जिससे वैश्विक प्रक्षेपण बाजार में इसरो की प्रतिष्ठा को खतरा है।
    GS-2 अंत. संबंध
    💻 ‘पैक्स सिलिका’ और उच्च-तकनीक कूटनीति
    भारत को सेमीकंडक्टर और AI के लिए अमेरिकी नेतृत्व वाले ब्लॉक में शामिल होने का निमंत्रण। रणनीतिक कदम: व्यापार तनाव से बचने के लिए भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करना। अवसर: भारतीय निर्यात पर 50% टैरिफ गतिरोध को सुलझाने के लिए तकनीकी संबंधों का उपयोग करना।
    GS-2 सामाजिक
    👶 ECCD: 3,000 दिनों का महत्वपूर्ण पथ
    जीवन के पहले 1,000 दिनों में मस्तिष्क का विकास 80-85% तक पूर्ण हो जाता है। 3 वर्ष की आयु से पहले के “मिसिंग विंडो” को भरने के लिए राष्ट्रीय मिशन की आवश्यकता। फोकस: विकसित भारत के लिए मानव पूंजी निर्माण सुनिश्चित करने हेतु सार्वभौमिक बाल्यावस्था देखभाल।
    GS-2 शिक्षा
    🎓 उच्च शिक्षा विनियमन में सुधार
    विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक द्वारा UGC, AICTE और NCTE को एकीकृत करने का प्रयास। संरचनात्मक बदलाव: विनियमन (Regulation) को प्रत्यायन (Accreditation) से अलग करना। लक्ष्य: सार्वजनिक प्रकटीकरण पर आधारित “लाइट बट टाइट” निरीक्षण की ओर बढ़ना।
    GS-2 ई-गवर्नेंस
    📜 भूमि (Bhoomi) के 25 वर्ष: भू-अभिलेख सफलता
    कर्नाटक के डिजिटलीकरण का मील का पत्थर: 39.8 करोड़ RTC जारी किए गए। प्रशासनिक बदलाव: मानवीय विवेक के स्थान पर स्वचालित नियमों का उपयोग। एकीकृत इकोसिस्टम भू-अभिलेखों को कावेरी (पंजीकरण) और PM-किसान से जोड़ता है, जिससे ग्रामीण भ्रष्टाचार में भारी कमी आई है।

    यहाँ भारत के नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों (सौर और पवन पार्क)राष्ट्रीय जलमार्गों और प्रमुख बांध परियोजनाओं का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    भारत ने अपनी नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का काफी विस्तार किया है, विशेष रूप से उन राज्यों पर ध्यान केंद्रित किया है जहाँ सौर विकिरण अधिक है और पवन की गति तेज़ है।

    • भड़ला सोलर पार्क (राजस्थान): वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े सौर पार्कों में से एक, जो थार मरुस्थल के शुष्क क्षेत्र में स्थित है।
    • पावागढ़ सोलर पार्क (कर्नाटक): दक्षिण भारत के तुमकुरु जिले में स्थित एक विशाल सौर स्थापना।
    • कुरनूल अल्ट्रा मेगा सोलर पार्क (आंध्र प्रदेश): एक प्रमुख चालू पार्क जो दक्षिणी ग्रिड में महत्वपूर्ण योगदान देता है।
    • मुप्पंडल विंड फार्म (तमिलनाडु): भारत का सबसे बड़ा चालू ‘ओंशोर’ (तटवर्ती) पवन फार्म, जो कन्याकुमारी क्षेत्र में हवा की गति का लाभ उठाता है।
    • जैसलमेर विंड पार्क (राजस्थान): देश के सबसे बड़े पवन फार्मों में से एक, जो पश्चिमी राजस्थान के विशाल खुले स्थानों का उपयोग करता है।

    अंतर्देशीय जल परिवहन परिवहन का एक किफायती और पर्यावरण के अनुकूल माध्यम है। सरकार ने कई नदियों को राष्ट्रीय जलमार्ग घोषित किया है।

    • NW-1 (गंगा-भागीरथी-हुगली): यह प्रयागराज (इलाहाबाद) को हल्दिया से जोड़ता है; यह सबसे लंबा और सबसे महत्वपूर्ण जलमार्ग है, जो ऐतिहासिक मगध क्षेत्र से होकर बहता है।
    • NW-2 (ब्रह्मपुत्र): उत्तर-पूर्व (असम) में सादिया से धुबरी को जोड़ता है।
    • NW-3 (पश्चिमी तट नहर): केरल में स्थित, कोट्टापुरम से कोल्लम को जोड़ता है।
    • NW-4 (गोदावरी-कृष्णा): पूर्वी तट के साथ काकीनाडा से पुडुचेरी को जोड़ता है।

    बांध बहुउद्देशीय परियोजनाएं हैं जिनका उपयोग सिंचाई, बिजली उत्पादन और बाढ़ नियंत्रण के लिए किया जाता है।

    • भाखड़ा नांगल बांध (हिमाचल प्रदेश/पंजाब): सतलुज नदी पर निर्मित, यह दुनिया के सबसे ऊँचे गुरुत्वीय बांधों (Gravity dams) में से एक है और पंजाब क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
    • टिहरी बांध (उत्तराखंड): भागीरथी नदी पर स्थित भारत का सबसे ऊँचा बांध
    • हीराकुंड बांध (ओडिशा): महानदी पर निर्मित, दुनिया के सबसे लंबे मिट्टी के बांधों (Earthen dams) में से एक है।
    • सरदार सरोवर बांध (गुजरात): नर्मदा नदी पर स्थित, जो राजस्थान और गुजरात को पानी और बिजली प्रदान करता है।
    • नागार्जुन सागर बांध (तेलंगाना/आंध्र प्रदेश): कृष्णा नदी पर निर्मित, सबसे बड़े चिनाई वाले बांधों (Masonry dams) में से एक है।
    श्रेणीमुख्य बिंदुभौगोलिक स्थिति
    सबसे बड़ा सौर पार्कभड़ला सोलर पार्कराजस्थान (पश्चिम)
    सबसे लंबा जलमार्गNW-1 (गंगा नदी)उत्तर/पूर्व भारत
    सबसे ऊँचा बांधटिहरी बांधउत्तराखंड (हिमालय)
    सबसे लंबा बांधहीराकुंड बांधओडिशा (पूर्वी तट)

    नदियों और उन पर बने बांधों के युग्म (Pairs) को याद रखें, जैसे: सतलुज → भाखड़ा नांगलभागीरथी → टिहरीमहानदी → हीराकुंडनर्मदा → सरदार सरोवरकृष्णा → नागार्जुन सागर। UPSC अक्सर मैच-द-फॉलोइंग (Match the following) में ऐसे प्रश्न पूछता है।

    सतत विकास एवं संसाधन

    स्वच्छ ऊर्जा
    ☀️ सौर एवं पवन पार्क
    थार मरुस्थल में स्थित विश्व स्तरीय भादला सोलर पार्क से लेकर कन्याकुमारी के पास विशाल मुप्पंडल पवन फार्म तक, भारत का ऊर्जा मानचित्र अब ‘ग्रीन’ हो रहा है।
    अभ्यास: कर्नाटक में पावगडा सोलर पार्क को खोजें और इसकी जलवायु की तुलना थार मरुस्थल के शुष्क क्षेत्र से करें।
    नौवहन
    🛶 राष्ट्रीय जलमार्ग
    अंतर्देशीय परिवहन गंगा (NW-1), ब्रह्मपुत्र (NW-2) और केरल की पश्चिमी तट नहर (NW-3) जैसी नदियों पर विकसित हो रहा है।
    अभ्यास: उत्तर-पूर्वी मैदानों के मानचित्र पर प्रयागराज से हल्दिया तक NW-1 के मार्ग को ट्रेस करें।
    इंजीनियरिंग
    🏗️ प्रमुख बांध परियोजनाएं
    बहुउद्देशीय परियोजनाएं जैसे टिहरी (सबसे ऊँचा), हीराकुंड (सबसे लंबा), और भाखड़ा नांगल सिंचाई और बिजली के लिए जीवन रेखा का कार्य करती हैं।
    अभ्यास: नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध की पहचान करें और उन राज्यों के नाम लिखें जिन्हें यह जल पहुँचाता है।
    मानचित्रण सारांश
    श्रेणी मुख्य विशेषता भौगोलिक केंद्र
    सौर ऊर्जाभादला सोलर पार्कराजस्थान (थार मरुस्थल)
    अंतर्देशीय जलमार्गNW-1 (गंगा)प्रयागराज से हल्दिया
    सबसे ऊँचा बांधटिहरी बांधउत्तराखंड (भागीरथी नदी)
    पवन ऊर्जामुप्पंडल फार्मतमिलनाडु (दक्षिणी सिरा)

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 12 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री” बताता है कि कैसे वस्तुओं, लोगों और विचारों की आवाजाही ने प्राचीन दुनिया को आकार दिया और भारत को रोम और चीन जैसे दूर के साम्राज्यों से जोड़ा।

    इतिहासकारों को व्यापार के प्रमाण पुरातात्विक खोजों और साहित्य के माध्यम से मिलते हैं।

    • उत्तरी काले चमकीले पात्र (NBPW): ये बेहतरीन मिट्टी के बर्तन उपमहाद्वीप के कई स्थानों पर मिले हैं। संभवतः व्यापारी इन्हें इनके निर्माण स्थलों से दूर-दूर तक ले गए थे।
    • दक्षिण भारत का खजाना: दक्षिण भारत सोना, कीमती पत्थर और काली मिर्च जैसे मसालों के लिए प्रसिद्ध था। रोमन साम्राज्य में काली मिर्च की इतनी अधिक मांग थी कि इसे “काला सोना” कहा जाता था।
    • समुद्री मार्ग: व्यापारियों ने अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को तेजी से पार करने के लिए मानसूनी हवाओं का उपयोग किया। उदाहरण के लिए, वे अफ्रीका या अरब से भारत के पश्चिमी तट पर पहुँचने के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ जहाज चलाते थे।
    • रेशम मार्ग (Silk Route):
      • उत्पत्ति: रेशम बनाने की तकनीक का आविष्कार लगभग 7,000 साल पहले चीन में हुआ था और इसे हज़ारों वर्षों तक गुप्त रखा गया।
      • मांग: लगभग 2,000 साल पहले, रोम के अमीरों के बीच रेशम पहनना एक फैशन और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया।
      • नियंत्रण: शासक (विशेषकर कुषाण) रेशम मार्ग पर नियंत्रण करना चाहते थे ताकि वे व्यापारियों से कर, शुल्क और उपहार प्राप्त कर सकें।

    दक्षिण भारत में, शक्तिशाली प्रमुखों ने उपजाऊ नदी घाटियों और तटों पर नियंत्रण किया।

    • तीन प्रमुख (मुवेन्दार): तमिल शब्द ‘मुवेन्दार’ का प्रयोग तीन शासक परिवारों के लिए किया गया था: चोल, चेर और पांड्य। ये लगभग 2,300 साल पहले शक्तिशाली हुए।
    • सत्ता के केंद्र: प्रत्येक प्रमुख के पास सत्ता के दो केंद्र थे—एक अंतर्देशीय और एक तटीय। इनमें पुहार (चोलों का पत्तन/बंदरगाह) और मदुरै (पांड्यों की राजधानी) सबसे महत्वपूर्ण थे।
    • संगम साहित्य: ये प्रमुख नियमित कर नहीं वसूलते थे बल्कि उपहार और भेंट प्राप्त करते थे। वे कवियों को पुरस्कृत करते थे, जिन्होंने उनकी प्रशंसा में कविताएँ लिखीं जो संगम साहित्य में संकलित हैं।
    • सातवाहन: लगभग 2,100 साल पहले पश्चिमी भारत में सातवाहन शक्तिशाली हुए। उनके सबसे प्रतापी राजा गौतमीपुत्र श्री शातकर्णी थे। इन शासकों को “दक्षिणापथ के स्वामी” कहा जाता था।

    कुषाण राजा कनिष्क (लगभग 1,900 साल पहले) के शासनकाल में बौद्ध धर्म एक नए चरण में पहुँचा।

    • महायान बौद्ध धर्म: इस नए रूप में दो बड़े बदलाव आए:
      1. बुद्ध की मूर्तियाँ: पहले बुद्ध की उपस्थिति संकेतों (जैसे पीपल का पेड़) के माध्यम से दिखाई जाती थी, लेकिन अब बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं।
      2. बोधिसत्व: बोधिसत्वों में विश्वास बढ़ा। ये ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया था, लेकिन वे एकांत में रहने के बजाय दुनिया में रहकर दूसरों को शिक्षा देने और मदद करने के लिए रुक गए।
    • विस्तार: बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन, कोरिया और जापान तक फैला। साथ ही, थेरवाद (बौद्ध धर्म का पुराना रूप) श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया में अधिक लोकप्रिय रहा।

    चीनी बौद्ध तीर्थयात्री पवित्र स्थानों के दर्शन करने और प्रसिद्ध मठों में अध्ययन करने के लिए भारत आए।

    • प्रसिद्ध तीर्थयात्री: फा-शिएन (1,600 साल पहले), श्वेन त्सांग (1,400 साल पहले), और इ-त्सिन्ग व्यापारियों के साथ यात्रा करते थे और उन्होंने अपनी यात्राओं के खतरों का विवरण लिखा है।
    • नालंदा विश्वविद्यालय: श्वेन त्सांग ने बिहार के नालंदा में अध्ययन किया, जो शिक्षा का एक अनूठा केंद्र था। यहाँ के शिक्षक अत्यधिक प्रतिभाशाली थे और नियम बहुत सख्त थे।
    • पांडुलिपियाँ: श्वेन त्सांग अपने साथ 600 से अधिक पांडुलिपियाँ वापस ले गया और अपना शेष जीवन उनका संस्कृत से चीनी भाषा में अनुवाद करने में बिताया।

    इस काल में ‘भक्ति’ की अवधारणा हिंदू धर्म की एक प्रमुख विशेषता बन गई।

    • मुख्य देवता: पूजा का केंद्र शिव, विष्णु और दुर्गा जैसे देवी-देवता थे।
    • समर्पण में समानता: भक्ति ने किसी देवता के प्रति व्यक्ति के व्यक्तिगत समर्पण पर जोर दिया। यह मार्ग सभी के लिए खुला था, चाहे उनकी जाति, संपत्ति या लिंग कुछ भी हो।
    • भगवद् गीता: भक्ति के विचार इस पवित्र ग्रंथ में मिलते हैं, जहाँ कृष्ण अर्जुन को अपनी शरण में आने के लिए कहते हैं।
    • शुद्ध मन: भक्तों का मानना था कि यदि किसी देवता की पूजा शुद्ध मन से की जाए, तो वह देवता उसी रूप में दर्शन देगा जिसे भक्त देखना चाहता है।
    • कलात्मक विरासत: इसी भक्ति भाव ने सुंदर मूर्तियों, कविताओं और शुरुआती मंदिरों के निर्माण को प्रेरित किया।

    🧭 व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री

    🚢 व्यापार और रेशम
    दक्षिण भारतीय काली मिर्च की रोम में इतनी माँग थी कि इसे काला सोना कहा जाता था। व्यापारी समुद्री यात्रा के लिए मानसूनी हवाओं का उपयोग करते थे, जबकि कुषाणों ने कर वसूलने के लिए रेशम मार्ग (Silk Route) पर नियंत्रण रखा।
    👑 तीन मुखिया (मुवेंदार)
    2,300 साल पहले दक्षिण में मुवेंदार (चोल, चेर और पांड्य) का शासन था। उनके पास पुहार जैसे महत्वपूर्ण पत्तन थे और संगम साहित्य में उनकी वीरता और उदारता की प्रशंसा की गई है।
    ☸️ बौद्ध धर्म का प्रसार
    राजा कनिष्क के समय बौद्ध धर्म महायान शाखा में बदल गया, जिसमें बुद्ध की मूर्तियाँ और बोधिसत्व की पूजा शुरू हुई। तीर्थयात्री श्वेन त्सांग बाद में नालंदा विश्वविद्यालय में पढ़ने आए।
    🙏 भक्ति का मार्ग
    ईश्वर के प्रति व्यक्तिगत भक्ति का झुकाव बढ़ा जिसे भक्ति मार्ग कहा गया। यह जाति या लिंग के भेदभाव के बिना सबके लिए खुला था। इन विचारों को भगवद गीता के माध्यम से लोकप्रियता मिली।
    तीर्थयात्री तथ्य चीनी तीर्थयात्री श्वेन त्सांग ने नालंदा में कई साल बिताए और लौटते समय 20 घोड़ों पर 600 से ज्यादा पांडुलिपियाँ चीन ले गए!
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    कक्षा-6 इतिहास अध्याय-10 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री

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    जहाँ पिछले अनुच्छेदों (14-19) ने समानता और बुनियादी स्वतंत्रताएँ स्थापित की थीं, वहीं अनुच्छेद 20, 21 और 22 विशिष्ट कानूनी संरक्षण प्रदान करते हैं। ये किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने, दोषी ठहराने या उसके जीवन और स्वतंत्रता को छीनने की राज्य की मनमानी शक्ति के खिलाफ सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं।

    अनुच्छेद 20 किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति (नागरिक या विदेशी) के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। यह राज्य द्वारा अभियोजन और दंड देने के आधारभूत नियम तय करता है।

    1. कार्योत्तर विधि से संरक्षण (No Ex-Post-Facto Law) [अनुच्छेद 20(1)]: किसी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो उसे किए जाने के समय अपराध नहीं था। इसके अलावा, सजा उस समय के कानून द्वारा निर्धारित सजा से अधिक नहीं हो सकती।
      • नोट: यह केवल आपराधिक कानूनों पर लागू होता है, दीवानी या कर कानूनों पर नहीं।
    2. दोहरे दंड से मुक्ति (No Double Jeopardy) [अनुच्छेद 20(2)]: किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा।
      • सीमा: यह संरक्षण केवल न्यायालय या न्यायिक अधिकरण के समक्ष कार्यवाही पर लागू होता है, विभागीय या प्रशासनिक जांच पर नहीं।
    3. आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण (No Self-Incrimination) [अनुच्छेद 20(3)]: किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
      • दायरा: इसमें मौखिक और दस्तावेजी दोनों साक्ष्य शामिल हैं। हालाँकि, यह अंगूठे के निशान, रक्त के नमूने या हस्ताक्षर के नमूने देने से सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।

    अनुच्छेद 21 संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद है। यह कहता है: “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।”

    प्रारंभ में, ए.के. गोपालन मामले (1950) में, सुप्रीम कोर्ट ने संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा था कि अनुच्छेद 21 केवल ‘कार्यपालिका’ की मनमानी कार्रवाई से बचाता है। यदि कोई कानून मौजूद है, तो अदालत यह सवाल नहीं उठाएगी कि वह कानून “उचित” है या नहीं।

    हालाँकि, मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में कोर्ट ने अपना रुख पूरी तरह बदल दिया:

    • स्वर्णिम त्रिभुज: कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 अलग नहीं हैं बल्कि एक “स्वर्णिम त्रिभुज” बनाते हैं। स्वतंत्रता छीनने वाले किसी भी कानून को इन तीनों की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
    • प्रक्रिया ‘उचित’ होनी चाहिए: “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” मनमानी या दमनकारी नहीं होनी चाहिए; यह न्यायपूर्ण, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए। इसने भारतीय कानून में अमेरिकी अवधारणा “विधि की उचित प्रक्रिया” (Due Process of Law) को पेश किया।
    • गरिमा के साथ जीने का अधिकार।
    • निजता का अधिकार (पुट्टस्वामी मामला, 2017)।
    • आजीविका का अधिकार (ओल्गा टेलिस मामला)।
    • मुफ्त कानूनी सहायता और त्वरित सुनवाई का अधिकार।
    • स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार।

    अनुच्छेद 22 उन व्यक्तियों को प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान करता है जिन्हें गिरफ्तार किया जाता है। यह हिरासत को दो श्रेणियों में विभाजित करता है: दंडात्मक (अपराध होने के बाद) और निवारक (भविष्य में अपराध को रोकने के लिए)।

    1. गिरफ्तारी के कारणों के बारे में जल्द से जल्द सूचित किए जाने का अधिकार।
    2. अपनी पसंद के कानूनी व्यवसायी (वकील) से परामर्श करने और बचाव करने का अधिकार।
    3. गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार (यात्रा के समय को छोड़कर)।
    4. 24 घंटे के बाद रिहाई का अधिकार, जब तक कि मजिस्ट्रेट आगे की हिरासत को अधिकृत न करे।

    भारत उन गिने-चुने लोकतांत्रिक देशों में से है जहाँ शांति काल के दौरान भी निवारक निरोध का संवैधानिक प्रावधान है।

    • समय सीमा: किसी व्यक्ति को 3 महीने से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि एक सलाहकार बोर्ड (हाई कोर्ट के न्यायाधीशों का) विस्तार के लिए पर्याप्त कारण न पाए।
    • बंदी के अधिकार: हिरासत के आधार व्यक्ति को बताए जाने चाहिए (जब तक कि यह जनहित के विरुद्ध न हो), और उन्हें आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन (Representation) करने का जल्द से जल्द अवसर दिया जाना चाहिए।
    विशेषताअनुच्छेद 20अनुच्छेद 21अनुच्छेद 22
    मुख्य केंद्रमुकदमे के दौरान अभियुक्त के अधिकार।जीवन और स्वतंत्रता का सामान्य अधिकार।गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार।
    प्रमुख सिद्धांतदोहरे दंड/आत्म-अभिशंसन से मुक्ति।प्रक्रिया न्यायपूर्ण और उचित होनी चाहिए।24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी।
    निलंबनआपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता।आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता।आपातकाल/निवारक कानूनों के दौरान प्रतिबंधित किया जा सकता है।

    ⚖️ अनुच्छेद 20, 21 और 22

    ⚖️ अनु. 20: अभियुक्तों के अधिकार
    तीन सुरक्षाएं देता है: 1. कार्योत्तर विधि (Ex-Post-Facto) से संरक्षण, 2. दोहरे दंड (Double Jeopardy) से मुक्ति, 3. आत्म-अभिशंसन (Confession) के विरुद्ध अधिकार।
    🌱 अनु. 21: जीवन और स्वतंत्रता
    सबसे व्यापक अधिकार। मेनका गांधी केस (1978) के बाद, कानून को न्यायोचित और युक्तियुक्त होना अनिवार्य है। यह अनु. 14 और 19 के साथ “स्वर्णिम त्रिभुज” बनाता है।
    📖 अंतर्निहित अधिकार (अनु. 21)
    न्यायपालिका ने इसमें निजता का अधिकार (Privacy), गरिमा का अधिकार, स्वच्छ पर्यावरण, आजीविका और मुफ्त कानूनी सहायता को शामिल किया है।
    🚔 अनु. 22: दंडात्मक गिरफ्तारी
    अनिवार्य करता है: 1. गिरफ्तारी का आधार बताना, 2. वकील से सलाह का अधिकार, 3. 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी (यात्रा समय छोड़कर)।
    🔒 निवारक निरोध (Preventive)
    अपराध होने से पहले ही रोकना। अधिकतम 3 महीने की अवधि, जब तक कि सलाहकार बोर्ड विस्तार न दे। निरुद्ध व्यक्ति को आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन का हक है।
    🛡️ पूर्ण सुरक्षा
    44वें संशोधन के बाद, अनुच्छेद 20 और 21 को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता। यह राज्य की निरंकुश शक्ति पर अंतिम रोक है।
    कानूनी तथ्य जहाँ अनुच्छेद 21 मनमानी कार्यपालिका और विधायिका की कार्यवाही से रक्षा करता है, वहीं अनुच्छेद 22 उन सुरक्षाओं को लागू करने की विशिष्ट प्रक्रिया प्रदान करता है।

    यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (12 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (आंतरिक सुरक्षा; साइबर सुरक्षा; विज्ञान और प्रौद्योगिकी- विकास और अनुप्रयोग)।

    • संदर्भ: केंद्र सरकार स्मार्टफोन निर्माताओं पर सुरक्षा आवश्यकताओं को लागू करने की दिशा में बढ़ रही है, जिसमें “वल्नरेबिलिटी एनालिसिस” (Vulnerability analysis) की मांग शामिल है। इसमें डिवाइस के ‘सोर्स कोड’ (Source Code) तक पहुंच की मांग भी की जा सकती है।
    • मुख्य बिंदु:
      • भारतीय दूरसंचार सुरक्षा आश्वासन आवश्यकताएं: मसौदे में 83 सुरक्षा मानकों का प्रस्ताव है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि डिवाइस सुरक्षित हैं और राज्य-प्रायोजित हैकर्स द्वारा प्रभावित नहीं हैं।
      • लॉग रिटेंशन: नीति के अनुसार डिवाइस निर्माताओं को सुरक्षा ऑडिट के लिए सभी डिवाइस गतिविधियों का एक साल का ‘लॉग’ (Log) रखना अनिवार्य होगा।
      • मालवेयर स्कैनिंग: हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्तर पर स्वचालित और समय-समय पर मालवेयर स्कैनिंग की आवश्यकता होगी।
      • उद्योग की आपत्तियां: एप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियों का तर्क है कि ‘सोर्स कोड’ साझा करना बौद्धिक संपदा (IP) के लिए बड़ा जोखिम है और इससे नई सुरक्षा खामियां पैदा हो सकती हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “डेटा संप्रभुता”, “राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम निजता” और “दूरसंचार क्षेत्र की चुनौतियां”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • तकनीकी संप्रभुता: सरकार का तर्क है कि बैंकिंग और ई-गवर्नेंस के लिए स्मार्टफोन प्राथमिक माध्यम हैं, इसलिए “ब्लैक बॉक्स” जैसे बंद सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहना सुरक्षा जोखिम है।
      • निजता की चिंता: अनिवार्य लॉग रिटेंशन और ऑटोमैटिक स्कैनिंग पुट्टस्वामी निर्णय के तहत अनुच्छेद 21 (निजता का अधिकार) पर सवाल उठाते हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था और शासन; संघीय ढांचा; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम)।

    • संदर्भ: आगामी परिसीमन (Delimitation) अभ्यास में दक्षिणी राज्यों के संभावित राजनीतिक और वित्तीय हाशिए पर जाने का विश्लेषण और संरचनात्मक समाधान।
    • मुख्य बिंदु:
      • जनसंख्या दंड (Population Penalty): जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया, उन्हें लोकसभा में अपनी सीटों का अनुपात अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों के पक्ष में खोने का डर है।
      • ** यूरोपीय मॉडल:** लेखक यूरोपीय संसद के मॉडल को अपनाने का सुझाव देता है, जहाँ बड़ी आबादी को अधिक सीटें मिलती हैं, लेकिन छोटे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व अनुपात अधिक रखा जाता है ताकि उनका प्रभुत्व बना रहे।
      • राज्यसभा सुधार: संघीय संतुलन की रक्षा के लिए अमेरिकी सीनेट की तरह सभी राज्यों को राज्यसभा में समान प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव।
    • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद”, “परिसीमन की चुनौतियां” और “जनसांख्यिकीय लाभांश बनाम प्रतिनिधित्व”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • राजकोषीय संबंध: चूंकि परिसीमन अक्सर वित्त आयोग के हस्तांतरण से जुड़ा होता है, राजनीतिक वजन कम होने का मतलब वित्तीय संसाधनों का नुकसान भी होगा, जो विकसित राज्यों के लिए एक तरह का ‘प्रदर्शन दंड’ है।
      • संवैधानिक संकट: बिना किसी आम सहमति वाले समाधान के, परिसीमन उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन को जन्म दे सकता है, जो “राज्यों के संघ” की अवधारणा को चुनौती देगा।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; बच्चों से संबंधित मुद्दे; आपराधिक न्याय प्रणाली)।

    • संदर्भ: पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत त्वरित विशेष अदालतों (FTSCs) के प्रदर्शन की समीक्षा, जिसमें यह पाया गया कि मामलों के निपटारे की उच्च दर का मतलब दोषसिद्धि दर में वृद्धि नहीं है।
    • मुख्य बिंदु:
      • निपटारा बनाम दोषसिद्धि: 2025 में भारत ने पॉक्सो मामलों में 109% की रिकॉर्ड निपटान दर हासिल की, लेकिन दोषसिद्धि दर (Conviction rate) पिछले वर्षों के 35% से गिरकर 29% रह गई।
      • व्यवस्थागत कमजोरियां: निपटान के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जल्दबाजी में की गई जांच अक्सर अधूरी चार्जशीट और मुकरने वाले गवाहों (hostile witnesses) का कारण बनती है।
      • सहायक व्यक्तियों की कमी: कानूनी अनिवार्यता के बावजूद, कई राज्यों में बच्चों को सुनवाई के दौरान मार्गदर्शन देने के लिए ‘सहायक व्यक्ति’ (Support person) उपलब्ध नहीं हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “बाल संरक्षण कानून” और “सामाजिक न्याय”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • मात्रात्मक बनाम गुणात्मक: संपादकीय केवल संख्यात्मक डेटा (निपटान) पर ध्यान केंद्रित करने की आलोचना करता है। न्याय की गुणवत्ता के बदले केवल गति को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।
      • फॉरेंसिक बैकलॉग: डीएनए परीक्षण और साइबर फॉरेंसिक में देरी मुख्य बाधा बनी हुई है, जिससे अक्सर “संदेह का लाभ” पाकर आरोपी बरी हो जाते हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी; जैव विविधता संरक्षण; स्वदेशी लोगों से संबंधित मुद्दे)।

    • संदर्भ: “किला संरक्षण” (Fortress Conservation) मॉडल का विश्लेषण और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर जनजातीय समुदायों के चल रहे विस्थापन की आलोचना।
    • मुख्य बिंदु:
      • औपनिवेशिक मॉडल: यह मॉडल इंसानों और वन्यजीवों को एक-दूसरे का विरोधी मानता है, जिससे वनवासियों को जबरन बेदखल किया जाता है।
      • बाघ बनाम जनजातीय संघर्ष: लेख सहानुभूति के शहरी-ग्रामीण विभाजन को रेखांकित करता है, जहाँ एक बाघ की मृत्यु पर राष्ट्रीय आक्रोश होता है, लेकिन जंगली जानवरों द्वारा ग्रामीणों की हत्या को अनदेखा कर दिया जाता है।
      • समावेशी संरक्षण: शोधकर्ता एक ऐसे ढांचे का प्रस्ताव करते हैं जो जैव विविधता प्रबंधन में स्वदेशी लोगों के क्षेत्रीय अधिकारों को एकीकृत करता है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “मानव-वन्यजीव संघर्ष”, “वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006” और “सतत विकास”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • जंगल के रक्षक: साक्ष्य बताते हैं कि स्वदेशी समुदायों द्वारा प्रबंधित क्षेत्रों में सरकारी संरक्षित पार्कों की तुलना में उच्च जैव विविधता स्तर होते हैं।
      • स्थानीय लोगों का अपराधीकरण: संपादकीय पारंपरिक प्रथाओं (जैसे पशु चराना या शहद संग्रह) के अपराधीकरण की आलोचना करता है, जो अक्सर सरकारी पर्यटन बुनियादी ढांचे की तुलना में बहुत कम हानिकारक होते हैं।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (सुरक्षा; आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां; नीली अर्थव्यवस्था)।

    • संदर्भ: भारत की समुद्री रणनीति की ऐतिहासिक, आर्थिक और तकनीकी समीक्षा।
    • मुख्य बिंदु:
      • नेट सुरक्षा प्रदाता: भारतीय नौसेना ने 2000 के दशक की शुरुआत में अरब सागर में पायरेसी को रोकने में शानदार भूमिका निभाकर एक ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ (Net security provider) के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है।
      • भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता: विशेषज्ञ समुद्री क्षेत्रों में “हितों के टकराव” को रोकने के लिए द्विपक्षीय चर्चा और नियमों को स्थापित करने की सलाह देते हैं।
      • हिंद-प्रशांत का महत्व: यूक्रेन, गाजा और लाल सागर के संकटों के बावजूद हिंद-प्रशांत क्षेत्र भारत की रणनीति का केंद्र बना हुआ है।
      • तकनीकी सीमाएँ: भविष्य की रणनीति का ध्यान “अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस” (UDA) और “नीली अर्थव्यवस्था क्रांति” पर होना चाहिए।
    • UPSC प्रासंगिकता: “समुद्री सुरक्षा”, “राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति” और “नीली अर्थव्यवस्था नीतियां”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • ऐतिहासिक विरासत: यह विश्लेषण चोल शासकों (समुद्री शेर) से लेकर हिंद-अरब व्यापार मार्गों तक भारत की समुद्री पहुंच का पता लगाता है।
      • रणनीति को रिफाइन करना: भारत को अपनी हिंद-प्रशांत दृष्टि को अमेरिका की 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के आलोक में और बेहतर बनाने की आवश्यकता है, जो चीन को एक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है।

    संपादकीय विश्लेषण

    12 जनवरी, 2026
    GS-3 सुरक्षा
    📱 स्मार्टफोन संप्रभुता और सोर्स कोड
    सरकार ने डिवाइस निर्माताओं के लिए 83 सुरक्षा मानक प्रस्तावित किए हैं, जिसमें सोर्स कोड का “भेद्यता विश्लेषण” शामिल है। विवाद: टेक दिग्गज इसे बौद्धिक संपदा (IP) का जोखिम मानते हैं, जबकि राज्य इसे “ब्लैक बॉक्स” राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा मानता है।
    GS-2 राजव्यवस्था
    🏛️ परिसीमन: दक्षिणी राज्यों का नुकसान
    सफल जनसंख्या नियंत्रण के कारण दक्षिणी राज्य राजनीतिक हाशिए पर जाने का सामना कर रहे हैं। समाधान: डिग्र्रेसिव प्रोपोर्शनैलिटी को अपनाना और राज्यों के समान प्रतिनिधित्व के लिए राज्यसभा में सुधार। लक्ष्य 866 सीटों वाले मॉडल में “परफॉरमेंस पेनल्टी” को रोकना है।
    GS-2 सामाजिक
    ⚖️ POCSO विरोधाभास: गति बनाम गुणवत्ता
    FTSCs ने रिकॉर्ड 109% निपटान दर हासिल की, फिर भी सजा की दर गिरकर 29% रह गई। कोटा पूरा करने के लिए जल्दबाजी में की गई जांच से साक्ष्य अधूरे रह जाते हैं। आवश्यकता: मुआवजे को अंतरिम चरण में लाना और पीड़ितों के लिए ‘सपोर्ट पर्सन’ सुनिश्चित करना।
    GS-3 पर्यावरण
    🐅 संरक्षण में औपनिवेशिक विरासत
    “फोर्ट्रेस कंजर्वेशन” का विश्लेषण जो मनुष्यों और वन्यजीवों को एक-दूसरे का विरोधी मानता है। स्वदेशी समुदायों द्वारा प्रबंधित क्षेत्रों में अक्सर उच्च जैव विविधता देखी जाती है। वनवासियों को विस्थापित किए बिना वैश्विक “30 by 30” लक्ष्य को पूरा करने के लिए अधिकार-आधारित संरक्षण की मांग।
    GS-3 सुरक्षा
    ⚓ समुद्री भारत: नेट सुरक्षा प्रदाता की भूमिका
    अरब सागर में केवल एक पर्यवेक्षक से नेट सुरक्षा प्रदाता के रूप में परिवर्तन। रणनीतिक बदलाव: भारत-चीन संघर्ष से बचने के लिए ‘रूल्स ऑफ एंगेजमेंट’ स्थापित करना और नीली अर्थव्यवस्था को सुरक्षित करने के लिए अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस (UDA) का विस्तार करना।

    यहाँ भारत के बिजली संयंत्रों (तापीय और परमाणु)प्रमुख औद्योगिक समूहों (Industrial Clusters) और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    भारत अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था को शक्ति देने के लिए ऊर्जा स्रोतों के मिश्रण पर निर्भर है। ये संयंत्र रणनीतिक रूप से ईंधन स्रोतों या जल निकायों के पास स्थित होते हैं।

    ये बिजली पैदा करने के लिए यूरेनियम का उपयोग करते हैं और अक्सर ठंडा करने के लिए पानी के स्रोतों के पास स्थित होते हैं।

    • नरोरा (उत्तर प्रदेश): उत्तरी मैदानों में स्थित।
    • रावतभाटा (राजस्थान): राणा प्रताप सागर बांध के पास स्थित।
    • काकरापार (गुजरात): पश्चिमी औद्योगिक पट्टी में स्थित।
    • तारापुर (महाराष्ट्र): भारत का पहला वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
    • कैगा (कर्नाटक): दक्षिण-पश्चिमी घाट क्षेत्र में स्थित।
    • कुडनकुलम और कलपक्कम (तमिलनाडु): दक्षिण भारत में प्रमुख परमाणु केंद्र।

    ये कोयला, तेल या गैस जलाकर बिजली पैदा करते हैं।

    • नामरूप (असम): उत्तर-पूर्व में एक प्रमुख गैस आधारित संयंत्र।
    • सिंगरौली (मध्य प्रदेश): भारत के सबसे बड़े कोयला आधारित संयंत्रों में से एक।
    • रामागुंडम (तेलंगाना): दक्षिणी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण बिजली केंद्र।

    औद्योगिक समूह वे क्षेत्र हैं जहाँ कच्चे माल, श्रम और परिवहन की उपलब्धता के कारण उद्योग केंद्रित होते हैं।

    • मुंबई-पुणे क्लस्टर: ऑटोमोबाइल, रसायन और कपड़ों का एक विशाल केंद्र।
    • हुगली क्लस्टर (पश्चिम बंगाल): ऐतिहासिक रूप से जूट के लिए और अब इंजीनियरिंग और रसायनों के लिए प्रसिद्ध।
    • बैंगलोर-तमिलनाडु क्लस्टर: सूचना प्रौद्योगिकी (IT), इलेक्ट्रॉनिक्स और वैमानिकी (Aeronautics) के लिए भारत का प्राथमिक केंद्र।
    • गुजरात क्लस्टर: अहमदाबाद और वडोदरा के आसपास केंद्रित, कपड़ों और पेट्रोकेमिकल्स के लिए प्रसिद्ध।
    • छोटा नागपुर क्षेत्र: इसे भारत का ‘खनिज हृदय स्थल’ कहा जाता है, जो भारी लोहा और इस्पात उद्योगों पर केंद्रित है।

    हवाई अड्डे वैश्विक कनेक्टिविटी और व्यापार के लिए “प्रवेश द्वार” के रूप में कार्य करते हैं।

    • इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (दिल्ली): भारत का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा, जो राजधानी क्षेत्र की सेवा करता है।
    • छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (मुंबई): पश्चिमी भारत का प्राथमिक प्रवेश द्वार।
    • मीनाम्बक्कम (चेन्नई): दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ कनेक्टिविटी का एक प्रमुख केंद्र।
    • नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (कोलकाता): पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत का मुख्य प्रवेश द्वार।
    • राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (हैदराबाद): अपने उन्नत कार्गो और फार्मास्युटिकल (दवा) प्रबंधन के लिए जाना जाता है।
    श्रेणीमुख्य बिंदुभौगोलिक स्थिति
    सबसे पुराना परमाणु संयंत्रतारापुरमहाराष्ट्र
    IT औद्योगिक केंद्रबैंगलोरकर्नाटक
    सबसे व्यस्त हवाई अड्डादिल्ली (IGI)उत्तर भारत
    लोहा और इस्पात केंद्रछोटा नागपुरपूर्वी भारत

    UPSC के लिए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को उत्तर-से-दक्षिण के क्रम में याद रखें (जैसे: नरोरा → रावतभाटा → काकरापार → तारापुर → कैगा → कलपक्कम → कुडनकुलम)। मानचित्र पर इनकी सटीक स्थिति की पहचान करना महत्वपूर्ण है।

    ऊर्जा एवं उद्योग

    ऊर्जा केंद्र
    ⚡ बिजली उत्पादन
    भारत की ऊर्जा रीढ़ में तारापुर और नरोरा जैसे परमाणु संयंत्र तथा सिंगरौली और रामागुंडम जैसे विशाल तापीय संयंत्र शामिल हैं।
    अभ्यास: राजस्थान में रावतभाटा को खोजें और शीतलन जल (cooling water) के लिए राणा प्रताप सागर बांध से इसकी निकटता पर ध्यान दें।
    विनिर्माण
    🏭 औद्योगिक क्लस्टर
    रणनीतिक जमाव वाले क्षेत्र जैसे मुंबई-पुणे ऑटोमोबाइल बेल्ट, बेंगलुरु-तमिलनाडु आईटी हब, और छोटा नागपुर खनिज हृदयस्थल।
    अभ्यास: पश्चिम बंगाल में हुगली क्लस्टर की पहचान करें और जूट उद्योग के साथ इसके ऐतिहासिक संबंध पर शोध करें।
    कनेक्टिविटी
    ✈️ वैश्विक प्रवेश द्वार
    IGI (दिल्ली) और मीनांबक्कम (चेन्नई) जैसे प्रमुख हवाई अड्डे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, फार्मा और यात्री पारगमन के लिए महत्वपूर्ण नोड्स के रूप में कार्य करते हैं।
    अभ्यास: राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे को खोजें और वैश्विक फार्मास्यूटिकल्स के प्रबंधन में इसकी विशेष भूमिका को पहचानें।
    मानचित्रण सारांश
    श्रेणी मुख्य विशेषता भौगोलिक केंद्र
    परमाणु ऊर्जातारापुर (सबसे पुराना)महाराष्ट्र तट
    IT/इलेक्ट्रॉनिक्सबेंगलुरु हबदक्षिणी पठार
    विमाननIGI दिल्ली (सबसे व्यस्त)उत्तर भारत
    भारी उद्योगछोटा नागपुरपूर्वी खनिज पट्टी

    IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 10 जनवरी 2026 (Hindi)

    यह अध्याय “खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर” कृषि के विकास, ग्रामीण समाज की संरचना, और भारतीय उपमहाद्वीप में शुरुआती शहरों और व्यापारिक नेटवर्कों के उदय की व्याख्या करता है।

    शक्तिशाली साम्राज्यों की नींव समृद्ध गाँवों का अस्तित्व था। लगभग 2,500 वर्ष पहले कृषि विकास के दो मुख्य कारण थे:

    • लोहे का बढ़ता उपयोग: हालाँकि लोहे का उपयोग 3,000 साल पहले शुरू हो गया था, लेकिन 2,500 साल पहले इसका विस्तार हुआ। इनमें जंगलों को साफ करने के लिए कुल्हाड़ियाँ और लोहे के हल के फाल शामिल थे, जो कठोर जमीन में उत्पादन बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण थे।
    • सिंचाई के कार्य: राजाओं ने फसल उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए सिंचाई में निवेश किया। इसके तहत नहरें, कुएँ, तालाब और कृत्रिम झीलें बनाई गईं।
    • आर्थिक चक्र: बढ़े हुए उत्पादन से किसानों के लिए कर (Tax) देना आसान हुआ, जिससे राजा की सेना और महलों के लिए धन उपलब्ध हुआ।

    उत्तर और दक्षिण दोनों क्षेत्रों में समाज स्पष्ट रूप से तीन मुख्य समूहों में विभाजित था:

    1. वेल्लालर (Vellalar): ये बड़े भूस्वामी थे।
    2. उझवार (Uzhavar): साधारण हलवाहे।
    3. कडैसियार और अडिमई (Kadaisiyar & Adimai): भूमिहीन मज़दूर और दास।
    1. ग्राम भोजक (Grama Bhojaka): गाँव का प्रधान, जो अक्सर सबसे बड़ा भूस्वामी होता था। यह पद अनुवांशिक था। वह शक्तिशाली था; वह राजा के लिए कर वसूलता था और न्यायाधीश या पुलिस के रूप में भी कार्य करता था।
    2. गृहपति (Grihapatis): स्वतंत्र किसान जो ज्यादातर छोटे भूस्वामी थे।
    3. दास कर्मकार (Dasa Karmakara): वे स्त्री-पुरुष जिनके पास अपनी जमीन नहीं थी और उन्हें दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था।

    पुरातत्वविद और इतिहासकार शुरुआती शहरों को समझने के लिए कई प्रकार के साक्ष्यों का उपयोग करते हैं:

    • जातक (Jatakas): आम लोगों द्वारा रचित कहानियाँ जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा संरक्षित किया गया। ये शहर के जीवन की झलकियाँ प्रदान करती हैं।
    • वलय कूप (Ring Wells): एक-दूसरे के ऊपर रखे गए बर्तनों या सिरेमिक छल्लों की पंक्तियाँ। इनका उपयोग घरों में शौचालय, नाली या कूड़ेदान के रूप में किया जाता था।
    • आहत सिक्के (Punch-marked Coins): सबसे पुराने सिक्के, जो लगभग 500 वर्षों तक चलन में रहे। ये चाँदी या तांबे पर प्रतीकों को ठप्पा मारकर (पंच करके) बनाए जाते थे।
    • मूर्तिकला: शहरों, गाँवों और जंगलों के दैनिक जीवन के दृश्यों को प्रवेश द्वारों और स्तंभों को सजाने के लिए उकेरा जाता था।

    कुछ शहर अपनी विशेष भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध हुए:

    • मथुरा: 2,500 से अधिक वर्षों से एक महत्वपूर्ण बस्ती। यह व्यापारिक मार्गों का चौराहा था (उत्तर-पश्चिम से पूर्व और उत्तर से दक्षिण)। यह बेहतरीन मूर्तिकला का केंद्र और बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कृष्ण भक्ति का धार्मिक केंद्र था।
    • बेरीगाज़ा (भरुच): खंभात की खाड़ी का एक संकरा बंदरगाह। यहाँ शराब और सोने/चाँदी के सिक्कों का आयात होता था, जबकि हिमालयी जड़ी-बूटियाँ, हाथीदांत, रेशम और सूती कपड़े का निर्यात किया जाता था।
    • अरिकामेडु: पुडुचेरी में एक तटीय बस्ती। यह एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र था जहाँ रोमन सामान जैसे अम्फोरा (शराब के जार) और आरैटाइन (मुहर लगे इतालवी बर्तन) मिले हैं।

    शिल्प उत्पादन बहुत संगठित था, विशेष रूप से कपड़ा निर्माण (वाराणसी और मदुरै जैसे केंद्र)।

    • उत्तरी काले चमकीले पात्र (NBPW): एक कठोर, धातु जैसा दिखने वाला मिट्टी का बर्तन जिसकी चमक शीशे जैसी काली होती थी।
    • श्रेणी (Shrenis): शिल्पकारों और व्यापारियों द्वारा बनाए गए संघ।
      • ये प्रशिक्षण प्रदान करते थे और कच्चा माल जुटाते थे।
      • इन्होंने व्यापार का आयोजन किया और बैंकों के रूप में कार्य किया जहाँ अमीर लोग पैसा जमा करते थे।
      • इस जमा राशि से प्राप्त ब्याज का उपयोग मठों जैसे धार्मिक संस्थानों की सहायता के लिए किया जाता था।

    अर्थशास्त्र में कार्यशालाओं के लिए सख्त दिशा-निर्देश दिए गए थे:

    • ऊन, कपास और रेशम को साफ करने के लिए विधवाओं, दिव्यांगों और सेवानिवृत्त नौकरों को काम पर रखा जाता था।
    • जो महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल सकती थीं, वे कच्चा माल लाने के लिए दासियों को भेजती थीं।
    • गलत व्यवहार के लिए अधिकारियों को दंडित किया जाता था और काम अधूरा रहने पर महिलाओं पर जुर्माना लगाया जाता था।

    🌾 खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर

    🚜 कृषि विस्तार
    खेती में वृद्धि लोहे के औजारों (कुल्हाड़ियों और फाल) के बढ़ते प्रयोग और राज्य द्वारा निर्मित सिंचाई (नहरें और कुएं) से हुई। इससे उत्पादन बढ़ा और राजाओं को नियमित कर मिलने लगा।
    🏘️ सामाजिक संरचना
    उत्तर में ग्राम भोजक (गाँव का प्रधान) शक्तिशाली था। तमिल क्षेत्र में समाज में वेल्लार (बड़े भूस्वामी), उझवार (साधारण हलवाहे) और भूमिहीन मजदूर (अडिमई) शामिल थे।
    🏺 शहरी साक्ष्य
    शहरों में जल निकासी के लिए वलय कूप (Ring Wells) और चमकदार NBPW पात्र मिले हैं। व्यापार के लिए आहत सिक्कों (Punch-marked Coins) का प्रयोग होता था, जो सबसे पुराने सिक्के थे।
    ⚓ व्यापार और श्रेणियाँ
    मथुरा एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और धार्मिक केंद्र था। शिल्पकारों और व्यापारियों ने अपने संघ बनाए जिन्हें श्रेणी कहा जाता था। श्रेणियाँ बैंकों के रूप में भी कार्य करती थीं।
    पुरातत्व अरिकामेडु (पुडुचेरी) में मिले रोमन बर्तन और एम्फोरा यह सिद्ध करते हैं कि 2,000 साल पहले प्राचीन भारत का भूमध्य सागरीय क्षेत्र के साथ व्यापक समुद्री व्यापार था।
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    कक्षा-6 इतिहास अध्याय-9 PDF

    सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर

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    जहाँ अनुच्छेद 17 और 18 अतीत की सामाजिक बाधाओं और ऊंच-नीच को दूर करते हैं, वहीं अनुच्छेद 19 वे सकारात्मक “स्वतंत्रताएँ” प्रदान करता है जो एक नागरिक को जीवंत लोकतंत्र में सक्रिय रूप से भाग लेने की अनुमति देती हैं।

    अनुच्छेद 17 एक ऐतिहासिक प्रावधान है जिसका उद्देश्य भारत में सबसे गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक बुराई को समाप्त करना है। यह एक ही वाक्य में समाहित एक “सामाजिक क्रांति” है।

    • पूर्ण प्रकृति (Absolute Nature): अधिकांश मौलिक अधिकारों के विपरीत, अनुच्छेद 17 ‘पूर्ण’ है। इसके कोई “तर्कसंगत प्रतिबंध” नहीं हैं। किसी भी आधार (धर्म, परंपरा या दर्शन) पर अस्पृश्यता का अभ्यास नहीं किया जा सकता।
    • कानूनी समर्थन: अनुच्छेद केवल प्रथा को समाप्त घोषित करता है, लेकिन सजा निर्धारित नहीं करता। इसके लिए संसद ने कानून बनाए हैं:
      1. नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता के आधार पर अस्पतालों, मंदिरों या दुकानों में प्रवेश से रोकने के लिए दंड का प्रावधान करता है।
      2. SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: घृणा अपराधों को रोकने और विशेष अदालतों के गठन के लिए एक अधिक कठोर कानून।
    • क्षैतिज अनुप्रयोग (Horizontal Application): यह केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी लागू है।
    • परिभाषा: उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि “अस्पृश्यता” शब्द का प्रयोग यहाँ इसके शाब्दिक या व्याकरणिक अर्थ में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से विकसित उस ‘प्रथा’ के संदर्भ में किया गया है जो जाति व्यवस्था से जुड़ी है।

    गणराज्य के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने के लिए, राज्य को उपाधियों के माध्यम से “कुलीन वर्ग” या विशेषाधिकार प्राप्त नागरिकों का समूह बनाने से रोका गया है।

    1. राज्य की उपाधियाँ: राज्य किसी को कोई उपाधि नहीं देगा। अपवाद: सैन्य और शैक्षणिक विशिष्टताएँ (जैसे जनरल, मेजर, डॉक्टर, प्रोफेसर)।
    2. विदेशी उपाधियाँ: भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।
    3. लाभ के पद पर विदेशी: भारत सरकार के अधीन ‘लाभ के पद’ पर कार्यरत कोई विदेशी व्यक्ति राष्ट्रपति की सहमति के बिना विदेशी उपाधि नहीं ले सकता।
    4. उपहार और उपलब्धियाँ: लाभ के पद पर आसीन कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति की सहमति के बिना विदेशी राज्य से कोई भेंट या पद स्वीकार नहीं करेगा (विदेशी प्रभाव/भ्रष्टाचार रोकने के लिए)।
    • उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय पुरस्कार (भारत रत्न, पद्म विभूषण, आदि) पुरस्कार हैं, उपाधियाँ नहीं।
    • ये समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करते क्योंकि ये “योग्यता” (Merit) को मान्यता देते हैं।
    • नियम: इन्हें नाम के आगे (Prefix) या पीछे (Suffix) इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर पुरस्कार वापस लिया जा सकता है।

    अनुच्छेद 19 को “संविधान की आत्मा” माना जाता है। यह केवल नागरिकों को (विदेशी या निगमों को नहीं) बुनियादी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

    1. भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इसमें विचार व्यक्त करने, प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना का अधिकार (RTI) शामिल है।
    2. शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्रता: बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार (हड़ताल का अधिकार शामिल नहीं है)।
    3. संघ बनाने की स्वतंत्रता: संगठन, यूनियन या सहकारी समितियां (97वां संशोधन) बनाने का अधिकार।
    4. अबाध संचरण की स्वतंत्रता: भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार।
    5. निवास की स्वतंत्रता: देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार।
    6. व्यवसाय की स्वतंत्रता: कोई भी पेशा चुनने या व्यापार और व्यवसाय करने का अधिकार।

    नोट: मूल रूप से इसमें 7वां अधिकार (संपत्ति का अधिकार) भी था, जिसे 44वें संशोधन (1978) द्वारा हटा दिया गया।

    ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। राज्य निम्नलिखित आधारों पर इन पर “तर्कसंगत प्रतिबंध” लगा सकता है:

    • भारत की संप्रभुता और अखंडता।
    • राज्य की सुरक्षा।
    • विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध।
    • सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार या नैतिकता।
    • न्यायालय की अवमानना या मानहानि।
    • Bennett Coleman & Co. v. Union of India: इस मामले ने स्थापित किया कि “प्रेस की स्वतंत्रता” अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।
    • Shreya Singhal v. Union of India (2015): सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66A को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि यह ऑनलाइन भाषण की स्वतंत्रता को असंवैधानिक रूप से प्रतिबंधित करती है।
    • K.S. Puttaswamy v. Union of India: निजता पर चर्चा करते हुए, इसने इस बात पर बल दिया कि अनुच्छेद 19 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं अनुच्छेद 21 (जीवन) से परस्पर जुड़ी हुई हैं।
    विशेषताअनुच्छेद 17अनुच्छेद 18अनुच्छेद 19
    प्राथमिक लक्ष्यसामाजिक कलंक को मिटाना।वर्ग-पदानुक्रम को हटाना।व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सशक्त करना।
    प्रयोज्यता (Applicability)नागरिक और गैर-नागरिक।नागरिक और गैर-नागरिक।केवल नागरिक
    अपवादपूर्ण (Absolute): कोई अपवाद नहीं।सैन्य/शैक्षणिक उपाधियाँ दी जा सकती हैं।सीमित: तर्कसंगत प्रतिबंधों के अधीन।

    🗳️ अनुच्छेद 17, 18 और 19

    🚫 अनु. 17: अस्पृश्यता का अंत
    एक निरपेक्ष अधिकार जिसका कोई अपवाद नहीं है। यह किसी भी रूप में “छुआछूत” को समाप्त करता है। इसे नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम (1955) और SC/ST एक्ट द्वारा मजबूती दी गई है।
    🎖️ अनु. 18: उपाधियों का अंत
    राज्य को उपाधियाँ देने से रोकता है। सैन्य और शैक्षणिक विशिष्टताएँ इसके अपवाद हैं। राष्ट्रीय पुरस्कार (भारत रत्न आदि) दिए जा सकते हैं, लेकिन उन्हें नाम के आगे या पीछे नहीं लगाया जा सकता।
    🗣️ अनु. 19: छह स्वतंत्रताएं
    यह केवल भारतीय नागरिकों के लिए है। अधिकार: 1. विचार एवं अभिव्यक्ति, 2. शांतिपूर्ण सम्मेलन, 3. संघ बनाने, 4. संचरण (घूमने), 5. निवास, और 6. व्यवसाय की स्वतंत्रता।
    ⚖️ तर्कसंगत प्रतिबंध
    स्वतंत्रताएं निरपेक्ष नहीं हैं। राज्य संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार या न्यायालय की अवमानना के आधार पर इन पर उचित प्रतिबंध लगा सकता है।
    🗞️ प्रेस और संपत्ति
    प्रेस की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की आजादी में अंतर्निहित है। संपत्ति के अधिकार को 44वें संशोधन (1978) द्वारा मूल अधिकारों की सूची से हटा दिया गया था।
    📖 ऐतिहासिक मामले
    बालाजी राघवन: राष्ट्रीय पुरस्कारों की वैधता को सही ठहराया। श्रेया सिंघल: ऑनलाइन अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए IT एक्ट की धारा 66A को रद्द किया।
    मुख्य निष्कर्ष जहाँ अनुच्छेद 17 निरपेक्ष है और सभी पर लागू होता है, वहीं अनुच्छेद 19 “संविधान की आत्मा” है लेकिन विशेष रूप से केवल भारतीय नागरिकों के लिए आरक्षित है।

    यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (10 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (संघवाद; शासन के महत्वपूर्ण पहलू, पारदर्शिता और जवाबदेही)।

    • संदर्भ: इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापों और केंद्र व पश्चिम बंगाल के बीच उपजे राजनीतिक टकराव की आलोचना।
    • मुख्य बिंदु:
      • राजनीतिक उपकरण: संपादकीय का तर्क है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सलाहकार संस्था I-PAC पर छापों का समय बताता है कि चुनाव से पहले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग किया जा रहा है।
      • संस्थागत असंतुलन: एक स्पष्ट प्रवृत्ति देखी जा रही है जहाँ ED, CBI और IT विभाग विपक्षी शासित राज्यों में “अत्यधिक सक्रिय” हैं, लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ शायद ही कभी कार्रवाई करते हैं।
      • चुनावी अखंडता: ऐसी कार्रवाइयाँ चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और सभी के लिए समान अवसर (level playing field) बनाए रखने की संस्थागत क्षमता पर सवाल उठाती हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “केंद्र-राज्य संबंध”, “चुनावी अखंडता” और “संघीय जांच एजेंसियों की भूमिका” के लिए महत्वपूर्ण।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • I-PAC छापा: 8 जनवरी को ED ने कोलकाता में I-PAC के ठिकानों पर तलाशी ली। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि यह 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पार्टी की “आंतरिक रणनीति चुराने” का प्रयास है।
      • लोकतंत्र के लिए जोखिम: मुख्य चेतावनी यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए “खेल के नियमों” को तोड़ना सरकारी संस्थानों की अखंडता में जनता के विश्वास को कम करता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS पेपर 3 (अर्थव्यवस्था; वैश्विक व्यापार और वित्त)।

    • संदर्भ: रूस प्रतिबंध विधेयक (Russia Sanctions Bill) का विश्लेषण, जो अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है।
    • मुख्य बिंदु:
      • पेट्रोडॉलर की रक्षा: प्रतिबंधों के प्रति इस आक्रामक रुख को वैश्विक वित्त में अमेरिकी डॉलर की केंद्रीयता को बचाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
      • वैकल्पिक व्यवस्था: भारत और चीन जैसे देशों ने ऐसी व्यापारिक व्यवस्थाएं विकसित की हैं जो डॉलर को दरकिनार करती हैं, जैसे रूसी कच्चे तेल के लिए युआन में भुगतान करना।
      • चीन से संरचनात्मक चुनौती: इलेक्ट्रिक वाहन (EV) पारिस्थितिकी तंत्र में चीन का प्रभुत्व अमेरिकी तेल वर्चस्व पर आधारित पारंपरिक आर्थिक ढांचे के लिए दीर्घकालिक खतरा है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक व्यापार गतिशीलता”, “ऊर्जा कूटनीति” और “भारत पर अमेरिकी विदेश नीति का प्रभाव”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • भू-राजनीतिक पुनर्गठन: संपादकीय का तर्क है कि अमेरिकी कदम किसी विशिष्ट भू-राजनीतिक शिकायत को हल करने के बजाय ऊर्जा बाजारों में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से हैं।
      • BRICS और समानांतर मुद्रा: BRICS देशों द्वारा विचार की जा रही समानांतर मुद्रा व्यवस्था पारंपरिक डॉलर-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था को और अधिक अस्थिर कर रही है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; महिलाओं से संबंधित मुद्दे; आपराधिक न्याय प्रणाली)।

    • संदर्भ: महाराष्ट्र के फलटण में एक युवा महिला डॉक्टर की आत्महत्या के बाद महिला पीड़ितों की सुरक्षा में व्यवस्थागत विफलताओं पर चर्चा।
    • मुख्य बिंदु:
      • द्वितीयक प्रताड़ना (Secondary Victimisation): लेख में “दूसरे अपराध” पर प्रकाश डाला गया है—मदद की गुहार लगाने के बाद पीड़ित का सार्वजनिक चरित्र हनन करना।
      • संस्थागत विफलता: महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष जैसे सार्वजनिक पदाधिकारियों द्वारा पीड़ित के निजी जीवन के विवरणों का उपयोग करना “अतिरिक्त-न्यायिक पीड़ित शर्मिंदगी” (victim shaming) के रूप में देखा गया है।
      • कानूनी संरक्षण: निर्भया अधिनियम (2013) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम पीड़ित के चरित्र को साक्ष्य के रूप में उपयोग करने से रोकते हैं, लेकिन सामाजिक मानसिकता अभी भी पितृसत्तात्मक है।
    • UPSC प्रासंगिकता: “महिला सशक्तिकरण”, “अपराधिक न्याय सुधार” और “सामाजिक न्याय”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • मामले का विवरण: डॉक्टर ने अपनी मृत्यु से पहले अपनी हथेली पर लिखे नोट में एक पुलिस अधिकारी द्वारा बलात्कार और उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
      • रणनीति: पुलिस और न्यायाधीशों के लिए अनिवार्य संवेदीकरण प्रशिक्षण, पीड़ित को दोषी ठहराने की संस्कृति को समाप्त करना और डिजिटल साक्ष्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का भारत पर प्रभाव)।

    • संदर्भ: दिसंबर 2025 में इज़राइल द्वारा सोमालीलैंड को एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता देने के निर्णय का विश्लेषण।
    • मुख्य बिंदु:
      • हॉर्न ऑफ अफ्रीका में बदलाव: इज़राइल का यह कदम लाल सागर समुद्री गलियारे के सैन्यीकरण को और बढ़ा सकता है।
      • चीन की रणनीतिक दुविधा: सोमालीलैंड को मान्यता मिलना चीन के “वन चाइना” सिद्धांत और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य में उसके सुरक्षा हितों के लिए चुनौती है।
      • स्थिरता बनाम राज्य का दर्जा: सोमालीलैंड के पिछले तीन दशकों की शांति और कार्यात्मक संस्थान सोमालिया की पुरानी अस्थिरता के बिल्कुल विपरीत हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “हिंद-प्रशांत और लाल सागर सुरक्षा” और “चीन की वैश्विक रणनीति”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • ताइवान कारक: सोमालीलैंड के ताइपे के साथ आधिकारिक संबंधों (2020 से) ने इसे चीन के प्रभाव के लिए एक क्षेत्रीय चुनौती बना दिया है।
      • वैकल्पिक रसद केंद्र: मान्यता मिलने के बाद सोमालीलैंड जिबूती में चीन के सैन्य अड्डे के पास एक वैकल्पिक सुरक्षा और रसद केंद्र के रूप में उभर सकता है।

    पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।

    • संदर्भ: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण पर रिपोर्ट, जहाँ पहले चरण में 58 लाख नाम हटाए गए हैं।
    • मुख्य बिंदु:
      • पैमाना और मानदंड: 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पंजीकृत मतदाताओं में 12-13% की गिरावट देखी गई है। नाम हटाने का आधार “ASDD” है—अनुपस्थित (Absent), स्थानांतरित (Shifted), मृत (Dead) और डुप्लिकेट (Duplicate)।
      • प्रवासियों पर प्रभाव: औद्योगिक क्षेत्रों और जूट मिल बेल्ट में भारी संख्या में नाम हटाए गए हैं जहाँ प्रवासी श्रमिक काम के कारण अस्थायी रूप से बाहर थे।
      • राजनीतिक मुद्दा: जहाँ भाजपा इसे “अवैध बांग्लादेशी मतदाताओं” की पहचान के लिए आवश्यक बताती है, वहीं सबसे अधिक नाम सीमावर्ती जिलों के बजाय कोलकाता महानगर में हटाए गए हैं।
    • UPSC प्रासंगिकता: “चुनावी अखंडता”, “प्रवासी मतदाताओं के अधिकार” और “केंद्र-राज्य संबंध”।
    • विस्तृत विश्लेषण:
      • प्रक्रियात्मक संकट: रिपोर्ट उन मामलों पर प्रकाश डालती है जहाँ ट्रक ड्राइवरों और जूट मिल श्रमिकों को केवल इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वे काम पर बाहर थे।
      • दस्तावेजी चुनौतियाँ: जूट मिल बेल्ट के कई निवासियों के पास भूमि रिकॉर्ड या संपत्ति के दस्तावेज नहीं हैं, जो सुनवाई के दौरान नागरिकता साबित करने के लिए मांगे जा रहे हैं।

    संपादकीय विश्लेषण

    10 जनवरी, 2026
    GS-2 संघवाद
    ⚖️ एजेंसी छापेमारी और चुनावी अखंडता
    I-PAC (TMC की सलाहकार संस्था) पर छापेमारी विपक्ष के खिलाफ ED/CBI को “हथियार बनाने” की चिंताओं को उजागर करती है। संस्थागत जोखिम: 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले समान अवसर (Level Playing Field) का क्षरण, जो सहकारी संघवाद के ढांचे पर दबाव डालता है।
    GS-3 अर्थव्यवस्था
    💵 डी-डॉलरीकरण और पेट्रोडॉलर
    अमेरिकी तेल प्रतिबंधों (500% टैरिफ) को डॉलर के वर्चस्व को बचाने के कदम के रूप में देखा जा रहा है। बदलाव: भारत/चीन कच्चे तेल के लिए तेजी से युआन में भुगतान कर रहे हैं। चुनौती: एक समानांतर BRICS वित्तीय व्यवस्था का उदय डॉलर की वैश्विक केंद्रीयता के लिए खतरा है।
    GS-2 सामाजिक
    👩‍⚕️ चरित्र हनन बनाम न्याय
    फलटण (Phaltan) मामला महिलाओं के द्वितीयक पीड़िताकरण (Secondary Victimisation) को उजागर करता है। आलोचना: संस्थागत प्रमुखों द्वारा सार्वजनिक अपमान संवैधानिक नैतिकता का उल्लंघन है। आवश्यकता: निर्भया अधिनियम (2013) को लागू करना, जो पीड़िता के चरित्र को कानूनी साक्ष्य के रूप में उपयोग करने पर रोक लगाता है।
    GS-2 अंत. संबंध
    🌍 सोमालीलैंड: लाल सागर की भू-राजनीति
    इजरायल ने सोमालीलैंड को मान्यता दी (दिसंबर 2025), जो चीन के “वन चाइना” सिद्धांत और सोमालिया की संप्रभुता को चुनौती देता है। रणनीतिक केंद्र: सोमालीलैंड बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य का विकल्प प्रदान करता है, जो हॉर्न ऑफ अफ्रीका में शक्ति संतुलन बदल सकता है।
    GS-2 शासन
    🗳️ SIR: मताधिकार से वंचित प्रवासी
    विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के कारण पश्चिम बंगाल में 58 लाख नाम हटाए गए (12% की गिरावट)। समस्या: “ASDD” (अनुपस्थित/स्थानांतरित) मानदंडों के आधार पर नाम हटाना प्रवासी श्रमिकों को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। कोलकाता के मध्य वार्डों में सबसे अधिक 36.85% की गिरावट दर्ज की गई।

    यहाँ भारत के जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों (Biosphere Reserves)प्रमुख मृदा प्रकारों (Soil Types) और वनस्पति पेटियों (Vegetation Belts) का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

    जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास के लिए निर्दिष्ट बड़े संरक्षित क्षेत्र होते हैं। भारत में 18 अधिसूचित जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें से कुछ यूनेस्को (UNESCO) के विश्व नेटवर्क का हिस्सा हैं।

    • नीलगिरी (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक): भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र। यह नीलगिरी तहर और शेर जैसी पूंछ वाले बंदर (Lion-tailed Macaque) के लिए प्रसिद्ध है।
    • मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु): एक समुद्री जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र जो समुद्री गाय (डगोंग) और प्रवाल भित्तियों (Coral reefs) के लिए जाना जाता है।
    • सुंदरवन (पश्चिम बंगाल): दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन और रॉयल बंगाल टाइगर का घर।
    • नंदा देवी (उत्तराखंड): हिमालय की चोटियों में स्थित, अपनी विशिष्ट अल्पाइन वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध।
    • नोकरेक (मेघालय): गारो पहाड़ियों का हिस्सा, यह खट्टे फलों की प्रजातियों और लाल पांडा के लिए प्रसिद्ध है।
    • पचमढ़ी (मध्य प्रदेश): इसे “सतपुड़ा की रानी” के रूप में जाना जाता है, यहाँ अद्वितीय गुफा चित्र और घने जंगल पाए जाते हैं।

    भारत की विविध भू-आकृति और जलवायु के कारण उपमहाद्वीप में विभिन्न प्रकार की मृदा का निर्माण हुआ है।

    मृदा का प्रकारक्षेत्र/राज्यमुख्य विशेषताएं
    जलोढ़ मृदा (Alluvial)भारत-गंगा के मैदान (पंजाब से बिहार)अत्यधिक उपजाऊ; नदियों द्वारा जमा की गई; गेहूँ और चावल के लिए सर्वोत्तम।
    काली मृदा (Black Soil)दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र, गुजरात)इसे ‘रेगुर’ भी कहा जाता है; नमी सोखने की उच्च क्षमता; कपास की खेती के लिए आदर्श।
    लाल और पीली मृदाप्रायद्वीपीय पठार (ओडिशा, छत्तीसगढ़)लोहे की अधिकता; क्रिस्टलीय चट्टानों में लोहे के प्रसार के कारण इसका रंग लाल होता है।
    लेटराइट मृदा (Laterite)पश्चिमी घाट, तमिलनाडु, केरलभारी वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (Leaching) के कारण निर्मित; काजू और चाय के लिए उपयुक्त।
    शुष्क/मरुस्थलीय मृदाराजस्थान, उत्तरी गुजरातउच्च लवणता और कम जैविक पदार्थ; खेती के लिए भारी सिंचाई की आवश्यकता।

    भारत की वनस्पति वर्षा की मात्रा और ऊँचाई के अनुसार बदलती रहती है।

    • उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen): 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (पश्चिमी घाट, लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार) में पाए जाते हैं। ये घने होते हैं और इनके पेड़ एक साथ अपनी पत्तियाँ नहीं गिराते।
    • उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous): भारत में सबसे व्यापक वन प्रकार (इन्हें अक्सर मानसूनी वन कहा जाता है)। ये गर्मियों में 6-8 सप्ताह के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।
    • पर्वतीय वन (Montane Forests): हिमालय जैसे ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ऊँचाई बढ़ने के साथ वनस्पति पर्णपाती से शंकुधारी (Coniferous) में बदल जाती है।
    • मैंग्रोव वन (Mangrove): ज्वार-भाटे से प्रभावित तटीय क्षेत्रों (गंगा, महानदी और कृष्णा के डेल्टा) में पाए जाते हैं। इनकी जड़ें पानी में डूबी रहती हैं।
    श्रेणीमुख्य बिंदुभौगोलिक केंद्र
    सबसे पुराना जैवमंडलनीलगिरीतमिलनाडु, केरल, कर्नाटक का जंक्शन
    कपास के लिए सर्वश्रेष्ठ मृदाकाली मृदा (रेगुर)दक्कन का पठार
    सबसे बड़ा मैंग्रोवसुंदरवनपश्चिम बंगाल डेल्टा
    सर्वाधिक वर्षा वाली वनस्पतिउष्णकटिबंधीय सदाबहारपश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व

    UPSC परीक्षा के लिए मृदा के वितरण को वर्षा के वितरण मानचित्र (Rainfall Map) के साथ जोड़कर देखें, इससे याद रखना आसान हो जाता है। उदाहरण के लिए, जहाँ वर्षा सबसे अधिक है, वहाँ लेटराइट या सदाबहार वनस्पति पाई जाती है।

    प्रकृति एवं पृथ्वी

    संरक्षण
    🌿 जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र
    भारत के 18 आरक्षित क्षेत्र, जैसे नीलगिरि (पहला) और सुंदरबन (सबसे बड़ा मैंग्रोव), जैव विविधता के संरक्षण और मानवीय उपयोग के बीच संतुलन बनाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।
    अभ्यास: मानचित्र पर मन्नार की खाड़ी को खोजें और इसे ‘डुगोंग’ (समुद्री गाय) के समुद्री अभयारण्य के रूप में पहचानें।
    मृदा विज्ञान
    🪵 मिट्टी के प्रकार
    उत्तर के मैदानों की उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी से लेकर दक्कन की नमी सोखने वाली काली मिट्टी तक, भारत की ऊपरी परत विविध प्रकार की मृदाओं का मिश्रण है।
    मिट्टी का प्रकार प्रमुख क्षेत्र मुख्य विशेषता
    जलोढ़ (Alluvial)सिंधु-गंगा के मैदानअत्यधिक उपजाऊ; गेहूँ/चावल के लिए उत्तम
    काली (Regur)दक्कन ट्रैपनमी धारण क्षमता; कपास के लिए आदर्श
    लैटेराइट (Laterite)पश्चिमी घाटनिक्षालित मृदा; काजू/चाय के लिए उपयुक्त
    अभ्यास: राजस्थान के शुष्क क्षेत्रों को लोकेट करें और जानें कि वहां की उच्च-लवणता वाली मिट्टी के लिए सिंचाई क्यों अनिवार्य है।
    पारिस्थितिकी
    🌳 वनस्पति पेटियाँ
    भारत की वनस्पति सदाबहार वनों (200 सेमी+ वर्षा) से लेकर व्यापक रूप से फैले पर्णपाती वनों (मानसून वन) तक विस्तृत है, जो गर्मियों में अपनी पत्तियां गिरा देते हैं।
    अभ्यास: हिमालय की ऊँचाई पर नजर डालें और देखें कि कैसे ऊँचाई बढ़ने पर वनस्पति पर्णपाती से शंकुधारी (पर्वतीय) वनों में बदल जाती है।
    त्वरित मानचित्रण सारांश
    श्रेणी मुख्य विशेषता भौगोलिक फोकस
    सबसे पुराना जैवमंडलनीलगिरिTN, केरल, कर्नाटक का संगम
    कपास का हृदय स्थलकाली मिट्टीदक्कन का पठार (MH/GJ)
    सबसे बड़ा मैंग्रोवसुंदरबनपश्चिम बंगाल डेल्टा
    उच्च वर्षा वनस्पतिसदाबहारपश्चिमी घाट एवं पूर्वोत्तर

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