IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 11 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” यूरोप में समाजवादी विचारों के उदय और रूस के एक निरंकुश राजतंत्र से दुनिया के पहले समाजवादी राज्य में बदलने की नाटकीय कहानी को दर्शाता है।

फ्रांसीसी क्रांति ने समाज में नाटकीय बदलाव की संभावनाओं के द्वार खोल दिए, जिससे यूरोप में तीन अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण उभरे:

  • उदारवादी (Liberals):
    • वे एक ऐसा राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर सम्मान और जगह मिले।
    • वे वंशानुगत शासकों की अनियंत्रित सत्ता के विरोधी थे और एक निर्वाचित संसदीय सरकार के पक्ष में थे।
    • उन्होंने शासकों और अधिकारियों से स्वतंत्र एक न्यायपालिका के महत्व पर जोर दिया।
    • हालाँकि, वे “लोकतंत्रवादी” (Democrats) नहीं थे क्योंकि वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार में विश्वास नहीं करते थे; उनका मानना था कि केवल संपत्ति धारी पुरुषों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए और वे महिलाओं के लिए वोट के अधिकार के खिलाफ थे।
  • रेडिकल (Radicals):
    • वे ऐसी सरकार चाहते थे जो देश की अधिकांश आबादी के समर्थन पर आधारित हो।
    • वे महिलाओं के मताधिकार आंदोलन (Suffragette movement) के समर्थक थे।
    • वे बड़े जमींदारों और धनी फैक्ट्री मालिकों को मिलने वाले विशेषाधिकारों के विरोधी थे।
    • वे निजी संपत्ति के अस्तित्व के खिलाफ नहीं थे, लेकिन कुछ ही हाथों में संपत्ति के संकेंद्रण (Concentration) को नापसंद करते थे।
  • रूढ़िवादी (Conservatives):
    • 18वीं शताब्दी में वे आमतौर पर परिवर्तन के विचार के विरोधी थे।
    • 19वीं शताब्दी तक उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हैं, लेकिन उनका मानना था कि अतीत का सम्मान किया जाना चाहिए और परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी होनी चाहिए।

19वीं शताब्दी के मध्य तक समाजवाद एक प्रसिद्ध विचारधारा बन चुकी थी, जिसकी मुख्य विशेषता निजी संपत्ति का विरोध था।

  • निजी संपत्ति का विरोध: समाजवादियों का मानना था कि निजी संपत्ति ही सभी सामाजिक बुराइयों की जड़ है क्योंकि संपत्ति के मालिक केवल व्यक्तिगत लाभ की चिंता करते थे, न कि उन लोगों के कल्याण की जो उस संपत्ति को उत्पादक बनाते थे।
  • भविष्य की दृष्टि:
    • रॉबर्ट ओवेन: एक अंग्रेज कपड़ा निर्माता, जिन्होंने इंडियाना (USA) में ‘नया समन्वय’ (New Harmony) नामक एक सहकारी समुदाय बनाने की मांग की।
    • लुई ब्लां: फ्रांस में वे चाहते थे कि सरकार सहकारी समितियों (Cooperatives) को प्रोत्साहित करे और पूंजीवादी उद्यमों की जगह ले।
    • कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स: मार्क्स का तर्क था कि औद्योगिक समाज “पूंजीवादी” है और पूंजीपतियों का मुनाफा श्रमिकों द्वारा पैदा किया जाता है। उनका मानना था कि श्रमिकों को एक क्रांतिकारी समाजवादी समाज के निर्माण के लिए पूंजीवाद और निजी संपत्ति को उखाड़ फेंकना होगा जहाँ सारी संपत्ति पर समाज का नियंत्रण हो (साम्यवाद)।

1914 में ज़ार निकोलस II रूस और उसके विशाल साम्राज्य पर शासन कर रहा था, जिसमें आधुनिक फिनलैंड, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया और पोलैंड, यूक्रेन व बेलारूस के हिस्से शामिल थे।

  • आर्थिक स्थिति: रूस एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था था; लगभग 85% आबादी कृषि से अपनी आजीविका कमाती थी, जो फ्रांस या जर्मनी की तुलना में बहुत अधिक थी। किसान बाज़ार और अपनी ज़रूरतों दोनों के लिए उत्पादन करते थे।
  • औद्योगिक स्थिति: उद्योग बहुत कम जगहों पर थे, मुख्य रूप से सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को में। 1890 के दशक में रूस के रेलवे नेटवर्क के विस्तार और विदेशी निवेश बढ़ने के बाद कई बड़ी फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं।
  • सामाजिक विभाजन: श्रमिक एक विभाजित सामाजिक समूह थे। कुछ का अपने गाँवों से गहरा नाता था, जबकि अन्य शहरों में बस चुके थे। वे कौशल के आधार पर भी विभाजित थे; जैसे—धातु कर्मी खुद को मजदूरों के बीच “कुलीन” मानते थे। विभाजन के बावजूद, वे काम की परिस्थितियों या मालिकों के साथ विवाद होने पर हड़ताल के लिए एकजुट हो जाते थे।

1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक दल अवैध थे।

  • सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी: इसकी स्थापना 1898 में मार्क्सवादी विचारों का सम्मान करने वाले समाजवादियों द्वारा की गई थी। बाद में यह दो समूहों में बंट गई:
    • बोल्शेविक: व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में। उनका मानना था कि ज़ार जैसे दमनकारी समाज में पार्टी अनुशासित होनी चाहिए और अपने सदस्यों की संख्या और गुणवत्ता पर नियंत्रण रखना चाहिए।
    • मेंशेविक: उनका मानना था कि पार्टी सभी के लिए खुली होनी चाहिए (जैसे जर्मनी में थी)।
  • सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी: 1900 में गठित, इसने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और मांग की कि कुलीनों की जमीन किसानों को हस्तांतरित की जानी चाहिए।

रूस एक निरंकुश शासन (Autocracy) था जहाँ ज़ार संसद के अधीन नहीं था।

  • खूनी रविवार (Bloody Sunday): 1905 में पादरी गैपॉन के नेतृत्व में मजदूरों का एक जुलूस अपनी माँगें लेकर ज़ार के ‘विंटर पैलेस’ पहुँचा। उन पर पुलिस ने हमला किया, जिसमें 100 से अधिक मजदूर मारे गए और 300 घायल हुए।
  • परिणाम: इस घटना ने पूरे देश में हड़तालों की लहर पैदा कर दी, जिसके कारण ज़ार को पहली ‘डूमा’ (एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद) बनाने की अनुमति देनी पड़ी।

1914 में युद्ध शुरू हुआ। रूस में शुरुआत में युद्ध को बहुत जन-समर्थन मिला, लेकिन जल्द ही परिस्थितियाँ बदल गईं।

  • रूस पर प्रभाव: 1914 और 1916 के बीच जर्मनी और ऑस्ट्रिया में रूसी सेना को भारी हार का सामना करना पड़ा। 1917 तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे और 30 लाख लोग शरणार्थी बन गए थे। युद्ध के कारण श्रम की कमी हो गई और अनाज की भारी किल्लत हो गई, जिससे 1916 की सर्दियों में रोटी की दुकानों पर दंगे आम हो गए।
  • फरवरी क्रांति: फरवरी 1917 में पेट्रोग्राद में भोजन की कमी के कारण फैक्ट्रियों में तालाबंदी और हड़तालें हुईं। सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया और सोवियत के साथ मिल गए। 2 मार्च को ज़ार ने गद्दी छोड़ दी और डूमा के नेताओं ने एक ‘अंतरिम सरकार’ (Provisional Government) बनाई।
  • अक्टूबर क्रांति: जैसे-जैसे अंतरिम सरकार की शक्ति कम हुई और बोल्शेविकों का प्रभाव बढ़ा, लेनिन ने विद्रोह का आयोजन किया। 24 अक्टूबर को विद्रोह शुरू हुआ; रात तक शहर बोल्शेविक नियंत्रण में था और मंत्रियों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
  • बोल्शेविक सुधार: नवंबर 1917 में अधिकांश उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। भूमि को सामाजिक संपत्ति घोषित किया गया और किसानों को कुलीनों की जमीन पर कब्जा करने की अनुमति दी गई।
  • गृहयुद्ध: बोल्शेविक विद्रोह का विरोध “गोरों” (ज़ार समर्थकों) और “हरों” (सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी) ने किया, जिन्हें फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। अंततः 1920 तक बोल्शेविक विजयी हुए।
  • स्टालिन का सामूहिकीकरण (Collectivisation): अनाज की कमी को दूर करने के लिए, स्टालिन ने 1929 से किसानों को सामूहिक खेती (कोल्खोज़) के लिए मजबूर किया। विरोध करने वालों को कड़ी सजा दी गई या देश निकाला दे दिया गया।
  1. डूमा: रूस की निर्वाचित परामर्शदाता संसद।
  2. सोवियत: मजदूरों और सैनिकों की परिषद।
  3. कुलक: रूस के संपन्न किसान।
  4. राष्ट्रीयकरण: उद्योगों या बैंकों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित होना।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-9
अध्याय – 2

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति

राजनीतिक विचारधाराएं
उदारवादी: प्रतिनिधि सरकार और व्यक्तिगत अधिकारों के पक्षधर, लेकिन सार्वभौमिक मताधिकार के विरोधी थे।
रेडिकल: ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो।
रूढ़िवादी: शुरुआत में बदलाव के विरोधी थे, बाद में अतीत का सम्मान करते हुए धीमी प्रक्रिया को स्वीकार किया।
समाजवादी दृष्टि
कार्ल मार्क्स: उनका तर्क था कि मज़दूरों को पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना चाहिए ताकि एक “कम्युनिस्ट” समाज बनाया जा सके जहाँ संपत्ति सामाजिक नियंत्रण में हो।
ज़ारशाही से क्रांति तक
1905 की क्रांति: ‘खूनी रविवार’ की घटना से शुरू हुई; इसके कारण रूस में पहली निर्वाचित परामर्शदाता संसद ‘ड्यूमा’ का गठन हुआ।
फरवरी 1917: पेट्रोग्राद में भोजन की कमी और हड़तालों ने ज़ार निकोलस II को गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया, जिससे रोमनोव शासन का अंत हुआ।
अक्टूबर 1917: व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने अंतरिम सरकार से सत्ता छीन ली और बैंकों व उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया।
गृहयुद्ध: 1920 में बोल्शेविकों की जीत तक ‘रेड्स’ (बोल्शेविक) और ‘व्हाइट्स’ (ज़ार समर्थक) के बीच भीषण संघर्ष चला।
स्टालिन का युग: अनाज संकट को हल करने के लिए 1929 में सामूहिकीकरण (कोलखोज़) शुरू किया गया, किसानों को सरकारी फार्मों में मजबूरन भेजा गया।

बोल्शेविक

लेनिन का अनुशासित बहुमत वाला गुट जिसने एक केंद्रीकृत क्रांतिकारी पार्टी की वकालत की।

खूनी रविवार

1905 में विंटर पैलेस में शांतिपूर्ण मज़दूरों का नरसंहार, जिससे देशव्यापी हड़तालें शुरू हुईं।

कोलखोज़

सामूहिक फार्म जहाँ स्टालिन के शासन में किसानों को ज़मीन और श्रम साझा करने के लिए मजबूर किया गया था।

वैश्विक प्रभाव
रूसी क्रांति ने समाजवादी सिद्धांत को एक वैश्विक वास्तविकता में बदल दिया। इसने पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती दी और दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को प्रेरित किया, जिससे 20वीं सदी का राजनीतिक परिदृश्य मौलिक रूप से बदल गया।

अधीनस्थ न्यायालयों को ‘अधीनस्थ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के प्रशासनिक और न्यायिक अधीक्षण (Superintendence) के अधीन कार्य करते हैं। इनका उल्लेख संविधान के भाग VI के अध्याय VI में किया गया है।

  • शासनादेश: किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना (Posting) और पदोन्नति (Promotion) उस राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाएगी।
  • पात्रता (Eligibility): वह व्यक्ति जो पहले से ही संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, केवल तभी जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्र होगा यदि:
    1. वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता (Advocate) या प्लीडर रहा हो।
    2. उच्च न्यायालय ने उसकी नियुक्ति के लिए सिफारिश की हो।
  • संदर्भ: इसे 20वें संविधान संशोधन अधिनियम (1966) द्वारा जोड़ा गया था।
  • शासनादेश: यह अनुच्छेद उन जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को वैध बनाता है, जिन्हें प्रक्रियात्मक तकनीकी त्रुटियों के कारण अनियमित माना जा सकता था। यह पिछली न्यायिक कार्रवाइयों के लिए एक “रक्षोपाय खंड” (Saving clause) के रूप में कार्य करता है।
  • शासनादेश: यह अनुच्छेद जिला न्यायाधीश के पद से नीचे की ‘न्यायिक सेवा’ (जैसे सिविल जज, मजिस्ट्रेट) की भर्ती से संबंधित है।
  • प्रक्रिया: ये नियुक्तियाँ राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती हैं। इसके लिए राज्यपाल राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद बनाए गए नियमों के अनुसार कार्य करता है।
  • शासनादेश: यह उच्च न्यायालय के लिए सबसे शक्तिशाली अनुच्छेद है। यह जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर “नियंत्रण” (Control) की शक्ति उच्च न्यायालय में निहित करता है।
  • नियंत्रण का दायरा: इसमें राज्य की न्यायिक सेवा के व्यक्तियों (जो जिला न्यायाधीश के पद से नीचे के हैं) की पदस्थापना, पदोन्नति और उन्हें छुट्टी (Leave) देने जैसे मामले शामिल हैं।
  • संरक्षण: हालाँकि, यह अनुच्छेद यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की अपनी सेवा की शर्तों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के खिलाफ अपील करने का अधिकार सुरक्षित रहे।

यह अनुच्छेद इस अध्याय में उपयोग किए गए शब्दों की कानूनी परिभाषा प्रदान करता है:

  • “जिला न्यायाधीश” (District Judge): इसमें नगर सिविल न्यायालय के न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायाधीश और अपर सत्र न्यायाधीश शामिल हैं।
  • “न्यायिक सेवा” (Judicial Service): इसका अर्थ ऐसी सेवा से है जो विशेष रूप से जिला न्यायाधीश के पद और जिला न्यायाधीश के पद से नीचे के अन्य दीवानी न्यायिक पदों को भरने के लिए बनाई गई है।
  • शासनादेश: राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि इस अध्याय के प्रावधान (अनुच्छेद 233 से 236) राज्य के किसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेटों पर लागू होंगे।
  • उद्देश्य: यह राज्य को कार्यपालक मजिस्ट्रेटों (Executive Magistrates) या अन्य विशेष न्यायिक अधिकारियों को उसी सुरक्षात्मक और प्रशासनिक ढांचे के तहत लाने की अनुमति देता है जो नियमित न्यायिक सेवा के लिए उपलब्ध है।
अनुच्छेदमुख्य विषयशामिल प्राधिकारी
233जिला न्यायाधीशों की नियुक्तिराज्यपाल + उच्च न्यायालय
234निचली न्यायपालिका की भर्तीराज्यपाल + SPSC + उच्च न्यायालय
235अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रणउच्च न्यायालय में निहित
236परिभाषाएँ“जिला न्यायाधीश” और “सेवा” की व्याख्या
237मजिस्ट्रेटों पर लागू होनाराज्यपाल की लोक अधिसूचना

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय के पास होता है, जबकि न्यायाधीशों की नियुक्ति का औपचारिक आदेश राज्यपाल जारी करता है। अनुच्छेद 235 उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता और निचले स्तर पर न्यायिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने का आधार है।

राज्य न्यायपालिका • भाग VI • अनु. 233-237
अधीनस्थ न्यायपालिका प्रणाली

अधीनस्थ न्यायालय

अनुच्छेद 233
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्यपाल द्वारा की जाती है। इसके लिए अधिवक्ता के रूप में 7 वर्ष का अनुभव आवश्यक है।
अनुच्छेद 235
सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (पदस्थापना, पदोन्नति, अवकाश) उच्च न्यायालय में निहित है।
निचली न्यायिक सेवा (अनु. 234)
जिला न्यायाधीश से नीचे के पदों पर भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद राज्यपाल द्वारा की जाती है।
परिभाषाएँ (अनु. 236)
जिला न्यायाधीश: इसमें सिटी सिविल कोर्ट के न्यायाधीश, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश और मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट शामिल हैं।
न्यायिक सेवा: विशेष रूप से जिला न्यायाधीश और अधीनस्थ नागरिक न्यायिक पदों को भरने के लिए बनाई गई एक सेवा।

अधिमान्यता (233A)

पिछली नियुक्तियों और निर्णयों को मान्य करने के लिए एक “सेविंग क्लॉज” के रूप में कार्य करता है जो तकनीकी कारणों से बाधित हो सकते थे।

मजिस्ट्रेट (237)

राज्यपाल निर्देश दे सकते हैं कि इस अध्याय के प्रावधान राज्य के किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट पर लागू हों।

HC पर्यवेक्षण

न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उच्च न्यायालय न्यायिक और प्रशासनिक दोनों तरह का अधीक्षण बनाए रखता है।

सुरक्षा
कवच
अधीनस्थ न्यायालय भारतीय न्यायपालिका की नींव हैं। प्रशासनिक नियंत्रण कार्यपालिका के बजाय उच्च न्यायालय (अनु. 235) में निहित करके, संविधान यह सुनिश्चित करता है कि निचली न्यायपालिका स्वतंत्र रहे और पदस्थापना एवं पदोन्नति जैसे दैनिक कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रहे।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (11 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आईटी और कंप्यूटर; अर्थव्यवस्था) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: “एआई उछाल” (AI surge) का एक विश्लेषण और यह परीक्षण कि क्या मानवीय संस्थाएं, नैतिकता और कानूनी ढांचे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की इस घातीय (exponential) वृद्धि के साथ तालमेल बिठा सकते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • हार्डवेयर की सीमा: एआई के इस उछाल का मुख्य कारण कंप्यूटिंग शक्ति (Compute power) में बड़े पैमाने पर किया जा रहा निवेश है। अनुमान है कि एआई डेटा केंद्रों को चलाने के लिए छोटे देशों के बराबर ऊर्जा की आवश्यकता होगी।
    • आर्थिक विस्थापन: हालांकि एआई उत्पादकता बढ़ाने का वादा करता है, लेकिन संपादकीय मध्यम स्तर की बौद्धिक नौकरियों (Cognitive jobs) के खत्म होने की चेतावनी देता है, विशेष रूप से कोडिंग, कानूनी अनुसंधान और सामग्री निर्माण (Content creation) के क्षेत्रों में।
    • विश्वास की कमी: परिष्कृत ‘डीपफेक’ (Deepfakes) और एआई-जनित गलत सूचनाओं के प्रसार से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अखंडता और व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरा पैदा हो रहा है।
    • रणनीतिक संप्रभुता: वैश्विक शक्ति तेजी से कुछ “एआई महाशक्तियों” (देशों और निगमों) के हाथों में केंद्रित हो रही है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के लिए एक नया डिजिटल विभाजन पैदा कर रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “औद्योगिक क्रांति 4.0”, “डिजिटल नैतिकता” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • ऊर्जा और स्थिरता: संपादकीय एआई की “छिपी हुई पर्यावरणीय लागत” पर प्रकाश डालता है। इसमें उल्लेख किया गया है कि एक एकल ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) को प्रशिक्षित करने में उतना पानी खर्च हो सकता है जितना 3,000 लोग एक वर्ष में उपयोग करते हैं।
    • नियामक विलंब (Regulatory Lag): वर्तमान विधायी प्रयास (जैसे यूरोपीय संघ का एआई अधिनियम) अक्सर प्रतिक्रियात्मक होते हैं; लेख “अग्रिम शासन” (Anticipatory Governance) की वकालत करता है जो डिजाइन चरण में ही सुरक्षा मानकों को शामिल करता है।
    • मानव-केंद्रित एआई: लक्ष्य मानव एजेंसी को प्रतिस्थापित करना नहीं बल्कि “संवर्धित बुद्धिमत्ता” (Augmented Intelligence) होना चाहिए, जहाँ एआई उपकरणों का उपयोग जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवा और संसाधन प्रबंधन जैसी जटिल समस्याओं को हल करने के लिए किया जाए।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार)।

  • संदर्भ: एक दुर्लभ संसदीय घटनाक्रम में, संयुक्त विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ पक्षपाती व्यवहार का आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने का नोटिस दिया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत, लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है, बशर्ते कि 14 दिन का पूर्व नोटिस दिया गया हो।
    • पक्षपात के आरोप: विपक्ष ने बार-बार माइक्रोफोन बंद करने, विपक्ष के नेता की टिप्पणियों को चुनिंदा रूप से कार्यवाही से हटाने और प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना ही ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पारित करने जैसे मुद्दों को आधार बनाया है।
    • अध्यक्ष का बचाव: सत्ता पक्ष का तर्क है कि अध्यक्ष ने अभूतपूर्व व्यवधानों के बीच सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी नियमों पर आधारित विवेकाधीन शक्तियों के भीतर कार्य किया है।
    • प्रक्रियात्मक गतिरोध: यह प्रस्ताव सदन में जारी तनाव को और बढ़ाता है, जिसके कारण वर्तमान सत्र में कई दिनों तक कोई कामकाज नहीं हो पाया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संसदीय प्रक्रियाएं”, “लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका और निष्पक्षता” तथा “विधायी जवाबदेही”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संस्थागत अखंडता: अध्यक्ष संसदीय लोकतंत्र की धुरी (Linchpin) होता है। संपादकीय का तर्क है कि जब अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो पूरी विधायी प्रक्रिया की वैधता दांव पर लग जाती है।
    • ऐतिहासिक मिसालें: भारतीय इतिहास में ऐसे प्रस्ताव अत्यंत दुर्लभ हैं (जैसे 1954 में जी.वी. मावलंकर के खिलाफ)। भले ही इनके पारित होने की संख्यात्मक संभावना कम हो, लेकिन ये एक महत्वपूर्ण “राजनीतिक संकेत” के रूप में कार्य करते हैं।
    • परंपरा की भूमिका: लेख सुझाव देता है कि वर्तमान संकट अध्यक्ष और विपक्ष के बीच अनौपचारिक संवाद और परामर्श की परंपरा के टूटने का परिणाम है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (द्विपक्षीय संबंध)।

  • संदर्भ: गारमेंट (तैयार कपड़ों) के निर्यात के लिए अमेरिका और बांग्लादेश के बीच एक नई तरजीही व्यापार व्यवस्था (Preferential Trade Arrangement) ने भारतीय कपड़ा निर्माताओं के बीच चिंता पैदा कर दी है।
  • मुख्य बिंदु:
    • प्रतिस्पर्धात्मक अंतराल: यह समझौता बांग्लादेश के परिधान निर्यात को अमेरिकी बाजार में कम शुल्क की सुविधा देता है, जिससे भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं, क्योंकि नए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर 18% टैरिफ लागू है।
    • इनपुट-आउटपुट लिंक: बांग्लादेश भारतीय कपास और सूत (Yarn) के लिए एक प्रमुख बाजार है। यदि अमेरिकी समझौता कच्चे माल की “स्थानीय सोर्सिंग” (Local sourcing) को अनिवार्य बनाता है, तो भारत के सूत निर्यात को भारी नुकसान हो सकता है।
    • क्षेत्रीय असंतुलन: अमेरिका के इस कदम को ढाका में अंतरिम सरकार का समर्थन करने और चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकल्प प्रदान करने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार”, “कपड़ा क्षेत्र की चुनौतियां” और “दक्षिण एशियाई आर्थिक एकीकरण”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • समान अवसर (Level Playing Field): भारतीय निर्यातक “पारस्परिक समानता” की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत के उच्च पर्यावरणीय और श्रम मानकों को मूल्य-संवर्धन (Value-addition) के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
    • विविधीकरण की आवश्यकता: संपादकीय सुझाव देता है कि भारत को बुनियादी परिधानों पर निर्भरता कम करने के लिए ‘तकनीकी वस्त्र’ (Technical textiles) और मानव निर्मित फाइबर (Man-made fibers) की ओर बढ़ना चाहिए।
    • रणनीतिक व्यापार नीति: यह स्थिति भारत के लिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ अपने स्वयं के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से पूरा करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा; सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: मणिपुर के उखरुल जिले में हुई ताज़ा हिंसा के कारण इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया गया है और कर्फ्यू लगा दिया गया है, जो राज्य की नाजुक सुरक्षा स्थिति को दर्शाता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • क्षेत्रीय घर्षण: ताज़ा संघर्ष ‘तंगखुल नागा’ और ‘कुकी-ज़ो’ समुदायों के बीच भूमि विवाद और स्थानीय क्षेत्राधिकार को लेकर है।
    • डिजिटल ब्लैकआउट: इंटरनेट पर प्रतिबंध का उद्देश्य भड़काऊ सामग्री और अफवाहों के प्रसार को रोकना है जो अन्य जिलों में प्रतिशोधात्मक हिंसा को जन्म दे सकते हैं।
    • राज्य की क्षमता: लोकप्रिय सरकार की वापसी के बावजूद, राज्य मशीनरी कई जातीय दरारों (मैतेई-कुकी और नागा-कुकी) को प्रबंधित करने में अत्यधिक दबाव में दिख रही है।
    • नागा शांति प्रक्रिया: उखरुल जैसे नागा बहुल क्षेत्रों में तनाव केंद्र और नागा समूहों के बीच चल रही “फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” वार्ता को जटिल बनाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पूर्वोत्तर में आंतरिक सुरक्षा”, “जातीय संघर्ष” और “संकट प्रबंधन”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • बफर जोन का प्रभाव: सुरक्षा विश्लेषकों का सुझाव है कि “बफर जोन” के निर्माण ने अनजाने में समुदायों के बीच “किलेबंदी” (Fortification) कर दी है, जिससे एक-दूसरे के क्षेत्र में आवाजाही हिंसा का कारण बन रही है।
    • नागरिक समाज की भूमिका: सामुदायिक बुजुर्गों और नागरिक संगठनों की शांति स्थापित करने में विफलता राज्य में “मध्यम मार्ग के कट्टरपंथ” (Radicalization of the middle ground) की ओर इशारा करती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: एक वैज्ञानिक लेख जो गगनयान और नासा के SLS जैसे आधुनिक अंतरिक्ष मिशनों में “ड्राई ड्रेस रिहर्सल” और “वेट ड्रेस रिहर्सल” (WDR) के बीच के अंतर को समझाता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • ड्राई ड्रेस रिहर्सल (Dry Dress Rehearsal): इसमें बिना ईंधन भरे लॉन्च काउंटडाउन का पूर्ण अनुकरण (Simulation) किया जाता है। यह संचार, लॉजिक फ्लो और निर्णय लेने की प्रक्रिया का परीक्षण करता है।
    • वेट ड्रेस रिहर्सल (WDR): यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है जहाँ रॉकेट में वास्तविक ‘क्रायोजेनिक प्रोपेलेंट्स’ (तरल ऑक्सीजन/हाइड्रोजन) भरे जाते हैं ताकि अत्यधिक ठंड में लीकेज की जाँच की जा सके।
    • क्रायोजेनिक चुनौतियां: केवल WDR ही सील या वाल्व में “क्रायो-लीक” का पता लगा सकता है जो केवल तभी प्रकट होते हैं जब घटक -183°C से -253°C तापमान के कारण सिकुड़ जाते हैं।
    • जोखिम न्यूनीकरण: ये पूर्वाभ्यास टीमों को जमीन पर “सुरक्षित रूप से विफल” (Fail safely) होने की अनुमति देते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि रॉकेट छोड़ने से पहले हार्डवेयर की खामियों को पकड़ा जा सके।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतरिक्ष मिशन प्रक्रियाएं”, “क्रायोजेनिक इंजन तकनीक” और “वैज्ञानिक सुरक्षा प्रोटोकॉल”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सांख्यिकीय महत्व: आधुनिक रॉकेट इतने जटिल हैं कि लगभग 40% लॉन्च देरी (Scrubs) उन मुद्दों के कारण होती है जिन्हें WDR के दौरान या उसके ठीक बाद पहचाना जाता है।
    • इसरो की सटीकता: चूंकि भारत मानवयुक्त मिशन (गगनयान) की तैयारी कर रहा है, इसलिए “एकीकृत पूर्वाभ्यास” (Integrated Rehearsals) में महारत हासिल करना अंतरिक्ष में मानव सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतिम मोर्चा है।

संपादकीय विश्लेषण

11 फरवरी, 2026
GS-3 विज्ञान एवं तकनीक आगामी AI उछाल

डेटा केंद्रों की बिजली की ज़रूरतें अब छोटे देशों के बराबर। संज्ञानात्मक रोजगार विस्थापन के प्रबंधन के लिए अग्रिम शासन पर ध्यान।

GS-3 अर्थव्यवस्था कपड़ा व्यापार युद्ध

अमेरिका-बांग्लादेश परिधान समझौता भारतीय निर्यात को कम कर रहा है। भारतीय कपास और यार्न बाजारों पर 18% टैरिफ के दबाव से क्षेत्र संकट में।

GS-3 अंतरिक्ष तकनीक रॉकेट रिहर्सल: वेट बनाम ड्राई

WDR ने -253°C पर क्रायो-लीक की पहचान की। महत्वपूर्ण “फेल सेफ” प्रोटोकॉल जहाँ 40% लॉन्च विफलता को पहले ही रोका जाता है।

शासन: एक बड़े AI मॉडल के प्रशिक्षण में 3,000 लोगों के वार्षिक उपयोग के बराबर पानी खर्च होता है।
संसद: अध्यक्ष लोकतंत्र की “धुरी” है; विधायी वैधता के लिए निष्पक्ष आचरण महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था: क्षेत्रीय असंतुलन का सामना कर रहे परिधान खंडों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को तकनीकी वस्त्रों की ओर बढ़ना चाहिए।
सुरक्षा: “बफर ज़ोन” के निर्माण से अनजाने में सांप्रदायिक सुदृढ़ीकरण हुआ है, जिससे राजनीतिक संवाद रुक गया है।
GS-4
संस्थागत निष्पक्षता
मध्यस्थता बनाम पक्षपात: अध्यक्ष की भूमिका सदन का निष्पक्ष मध्यस्थ होने की मांग करती है। जब विधायिका की “धुरी” को पक्षपाती के रूप में देखा जाता है, तो संसदीय लोकतंत्र की वैधता से समझौता हो जाता है, जिससे अनौपचारिक परामर्शदात्री परंपराओं की ओर लौटना आवश्यक हो जाता है।

यहाँ पृथ्वी की वैश्विक संचार प्रणालियों—नदियों और झीलों—पर केंद्रित विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। ये आपकी UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं, जलवायु विनियमन और सभ्यताओं का आधार बनते हैं।

नदियों को अक्सर उनकी लंबाई, जल विसर्जन आयतन (Discharge volume), या सामरिक सीमा-पारीय (Transboundary) महत्व के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

महाद्वीपनदीलंबाई (लगभग)महत्व
अफ्रीकानील (Nile)6,650 किमीदुनिया की सबसे लंबी नदी; उत्तर की ओर भूमध्य सागर में गिरती है।
दक्षिण अमेरिकाअमेज़न (Amazon)6,400 किमीजल विसर्जन आयतन के आधार पर सबसे बड़ी; सबसे बड़े वर्षावन से गुजरती है।
एशियायांग्त्ज़ी (Yangtze)6,300 किमीएशिया की सबसे लंबी नदी; पूरी तरह से चीन के भीतर बहती है।
उत्तरी अमेरिकामिसिसिपी (Mississippi)6,275 किमीमैक्सिको की खाड़ी में “पक्षी के पंजे” (Bird-foot) जैसा डेल्टा बनाती है।
यूरोपवोल्गा (Volga)3,530 किमीयूरोप की सबसे लंबी नदी; स्थल-रद्ध कैस्पियन सागर में गिरती है।
ऑस्ट्रेलियामरे-डार्लिंग3,672 किमीऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप की प्राथमिक नदी प्रणाली।
  • भूमध्य रेखा को पार करने वाली: कांगो नदी (अफ्रीका) एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो भूमध्य रेखा को दो बार पार करती है। यह दुनिया की सबसे गहरी नदी (220 मीटर से अधिक) भी है।
  • “शोक” नदियाँ: चीन की पीली नदी (ह्वांग हे) अपनी विनाशकारी बाढ़ और भारी गाद (Silt) के लिए जानी जाती है।
  • सीमा-पारीय संघर्ष: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (IR) के मानचित्रण के लिए मेकांग (दक्षिण-पूर्व एशिया), ब्रह्मपुत्र (चीन-भारत-बांग्लादेश), और नील (ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम विवाद) पर ध्यान केंद्रित करें।

झीलें पृथ्वी के स्वास्थ्य के “थर्मामीटर” की तरह हैं। 2026 की परीक्षाओं के लिए क्षेत्रफल, आयतन और लवणता के बीच अंतर पर ध्यान दें।

  1. कैस्पियन सागर (खारा पानी): दुनिया का सबसे बड़ा स्थल-रद्ध (Landlocked) जल निकाय। यह 5 देशों की सीमाओं को छूता है: रूस, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान और अजरबैजान।
  2. सुपीरियर झील (मीठा पानी): सतही क्षेत्रफल के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील (USA/कनाडा)।
  3. विक्टोरिया झील (मीठा पानी): सबसे बड़ी उष्णकटिबंधीय झील; यह श्वेत नील (White Nile) का स्रोत है (युगांडा, केन्या, तंजानिया)।
  4. ह्यूरन झील (Lake Huron): उत्तरी अमेरिका की ‘महान झीलों’ (Great Lakes) प्रणाली का हिस्सा।
  5. मिशिगन झील: पूरी तरह से एक ही देश (USA) के भीतर स्थित सबसे बड़ी झील।
  • सबसे गहरी और सबसे पुरानी: बैकाल झील (रूस)। इसमें दुनिया के बिना जमे हुए सतही मीठे पानी का 20% हिस्सा समाहित है।
  • सबसे लंबी मीठे पानी की झील: तांगानिका झील (अफ्रीका)। यह चार देशों में फैली हुई है: तंजानिया, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, बुरुंडी और जाम्बिया।
  • सबसे ऊँची नौगम्य (Navigable) झील: टिटिकाका झील (एंडीज पर्वत; पेरू/बोलीविया सीमा)।
  • पृथ्वी पर सबसे निचला बिंदु: मृत सागर (Dead Sea) (इजराइल/जॉर्डन)। यह समुद्र की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक खारा है।
रिकॉर्डनामस्थान
सबसे लंबी नदीनील (Nile)अफ्रीका
सबसे बड़ी झील (क्षेत्रफल)कैस्पियन सागरयूरेशिया
सबसे गहरी झीलबैकाल झीलरूस
भूमध्य रेखा को दो बार काटने वालीकांगो नदीअफ्रीका
सबसे निचली झीलमृत सागरपश्चिम एशिया

मानचित्र पर अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley) की झीलों (जैसे तांगानिका, मलावी, एडवर्ड) को उत्तर-से-दक्षिण क्रम में देखें। साथ ही, उत्तरी अमेरिका की महान झीलों (HOMES: Huron, Ontario, Michigan, Erie, Superior) के पश्चिम-से-पूर्व क्रम को भी याद रखें।

मानचित्रण विवरण

वैश्विक नदियाँ और झीलें
महाद्वीपीय अग्रणी सबसे लंबी नदियाँ

नील (अफ्रीका) विश्व की सबसे लंबी है; अमेज़न (दक्षिण अमेरिका) जल प्रवाह में अग्रणी है। यांग्त्ज़ी एशिया की प्रमुख धमनी है।

रणनीतिक केंद्र नदियों की चरम सीमाएँ

कांगो नदी भूमध्य रेखा को दो बार पार करने वाली एकमात्र नदी है। मिसिसिपी एक अद्वितीय ‘पक्षी-पैर’ जैसा डेल्टा बनाती है।

प्रमुख झील प्रणालियाँ
रिकॉर्ड वाले बेसिन

कैस्पियन सागर सबसे बड़ा स्थलवरुद्ध जलाशय बना हुआ है। सुपीरियर झील क्षेत्रफल के आधार पर ताजे पानी की अग्रणी झील है, जबकि विक्टोरिया झील सफेद नील के उष्णकटिबंधीय स्रोत के रूप में कार्य करती है।

गहराई और लवणता
जलमंडल की चरम सीमाएँ

बैकाल झील (रूस) सबसे गहरी और प्राचीनतम है, जिसमें वैश्विक गैर-हिमित ताजे पानी का 20% हिस्सा है। मृत सागर पृथ्वी का सबसे निचला बिंदु और उच्चतम लवणता को चिह्नित करता है।

नौगम्य ऊँचाइयाँ

पेरू-बोलीविया सीमा पर स्थित, टिटिकाका झील दुनिया की सबसे ऊँची नौगम्य झील है, जबकि तांगानिका सबसे लंबी मीठे पानी की झील है।

सबसे लंबी नदी नील (अफ्रीका) 6,650 किमी।
सबसे गहरी झील बैकाल (रूस) 1,642 मी।
सबसे खारी मृत सागर (इजरायल/जॉर्डन)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: जल-कूटनीति विश्लेषण के लिए मेकांग या ब्रह्मपुत्र जैसी सीमा-पारीय नदियों का मानचित्रण आवश्यक है। यूरोप की सबसे बड़ी स्थलवरुद्ध जल निकासी प्रणाली को समझने के लिए वोल्गा के कैस्पियन तक के मार्ग का पता लगाएं।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 10 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “फ्रांसीसी क्रांति” 1789 में शुरू हुई उन परिवर्तनकारी घटनाओं का विवरण देता है, जिनके कारण फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र का अंत हुआ और लोकतांत्रिक आदर्शों का उदय हुआ।

क्रांति की शुरुआत 14 जुलाई 1789 को पेरिस में बास्तील (Bastille) के किले-जेल पर हमले के साथ हुई। यह किला राजा की निरंकुश शक्तियों का प्रतीक था।

  • अशांति के कारण: पूरा शहर डर और आतंक के माहौल में था क्योंकि ऐसी अफवाहें फैली थीं कि राजा ने सेना को नागरिकों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया है। लगभग 7,000 स्त्री-पुरुष टाउन हॉल के सामने एकत्र हुए और उन्होंने एक जन-सेना का गठन करने का निर्णय लिया।
  • आर्थिक कष्ट: शहर और देहाती इलाकों में अधिकांश लोग पाव रोटी (Bread) की ऊँची कीमतों और भोजन की व्यापक कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

फ्रांसीसी समाज तीन ‘एस्टेट्स’ (Estates) की सामंती व्यवस्था में विभाजित था:

  • प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग – Clergy): इसमें चर्च के अधिकारी शामिल थे। इन्हें जन्म से ही विशेष अधिकार प्राप्त थे, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण ‘राज्य को कर (Tax) न देने’ की छूट थी।
  • द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग – Nobility): इसमें राज्य के उच्च अधिकारी और जमींदार शामिल थे। इन्हें भी करों से छूट मिली हुई थी और वे किसानों से सामंती कर (Feudal dues) वसूलते थे।
  • तृतीय एस्टेट: इसमें जनसंख्या का लगभग 90% हिस्सा शामिल था। इसमें बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान और कारीगर आते थे। पूरे करों का बोझ केवल इसी एस्टेट पर था।
    • वे चर्च को ‘टाइद’ (Tithes) नामक धार्मिक कर देते थे।
    • वे राज्य को ‘टाइल’ (Taille) नामक प्रत्यक्ष कर और दैनिक उपभोग की वस्तुओं (नमक, तंबाकू) पर अप्रत्यक्ष कर देते थे।
  • जनसंख्या वृद्धि: फ्रांस की जनसंख्या 1715 में 2.3 करोड़ से बढ़कर 1789 में 2.8 करोड़ हो गई, जिससे खाद्यान्न की मांग तेजी से बढ़ी।
  • जीविका संकट (Subsistence Crisis): अनाज का उत्पादन मांग के साथ तालमेल नहीं बिठा सका। मजदूरों की मजदूरी स्थिर रही जबकि पाव रोटी की कीमतें आसमान छूने लगीं। जब कभी सूखा या ओले पड़ते थे, तो पैदावार गिर जाती थी, जिससे बार-बार “जीविका संकट” पैदा होता था।

18वीं शताब्दी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे ‘मध्य वर्ग’ कहा गया। इन्होंने समुद्री व्यापार और रेशमी व ऊनी कपड़ों के निर्माण के माध्यम से अपनी संपत्ति अर्जित की थी।

  • दार्शनिक प्रभाव: इस वर्ग के लोग शिक्षित थे और उनका मानना था कि समाज के किसी भी समूह को जन्म के आधार पर विशेषाधिकार नहीं मिलने चाहिए।
    • जॉन लॉक (John Locke): अपनी पुस्तक ‘टू ट्रीटीज़ ऑफ गवर्नमेंट’ में उन्होंने राजा के दैवीय और निरंकुश अधिकारों के सिद्धांत का खंडन किया।
    • जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau): उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक समझौते पर आधारित सरकार का विचार पेश किया।
    • मोंटेस्क्यू (Montesquieu): अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ द लॉज़’ में उन्होंने सरकार के भीतर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता के विभाजन का प्रस्ताव दिया।
  • एस्टेट्स जनरल: 5 मई 1789 को लुई XVI ने नए करों के प्रस्ताव के लिए एक बैठक बुलाई। प्रथम और द्वितीय एस्टेट ने अपने 300-300 प्रतिनिधि भेजे, जबकि तृतीय एस्टेट के 600 प्रतिनिधि पीछे खड़े हुए। तृतीय एस्टेट ने मांग की कि प्रत्येक सदस्य को एक वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए (लोकतांत्रिक सिद्धांत), जिसे राजा ने ठुकरा दिया।
  • नेशनल असेंबली और टेनिस कोर्ट की शपथ: विरोध में तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि सभा से बाहर चले गए। 20 जून को वे वर्साय (Versailles) के एक इंडोर टेनिस कोर्ट में जमा हुए और खुद को ‘नेशनल असेंबली’ घोषित कर दिया। उन्होंने शपथ ली कि जब तक वे फ्रांस के लिए एक नया संविधान तैयार नहीं कर लेते, तब तक वे अलग नहीं होंगे।
  • संवैधानिक राजतंत्र: 1791 में नेशनल असेंबली ने संविधान का मसौदा पूरा किया। इसका मुख्य उद्देश्य सम्राट की शक्तियों को सीमित करना था। अब शक्तियाँ एक व्यक्ति के हाथ में होने के बजाय विभिन्न संस्थाओं (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) को हस्तांतरित कर दी गईं।
  • फ्रांस एक गणराज्य बना: अप्रैल 1792 में नेशनल असेंबली ने प्रशा और ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। 21 सितंबर 1792 को नवनिर्वाचित सभा (कन्वेंशन) ने राजतंत्र को समाप्त कर दिया और फ्रांस को एक गणराज्य घोषित कर दिया। राजा लुई XVI पर देशद्रोह का मुकदमा चला और 21 जनवरी 1793 को उन्हें सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई।
  • आतंक का राज (The Reign of Terror – 1793 से 1794): यह काल मैक्सिमिलियन रोबेस्प्येर के शासन का था। उन्होंने नियंत्रण और दंड की सख्त नीति अपनाई। कुलीन वर्ग, पादरी और अन्य राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया। यदि वे दोषी पाए जाते, तो उन्हें ‘गिलोटिन’ (दो खंभों वाली मशीन जिस पर अपराधी का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था) पर चढ़ा दिया जाता था। अंततः जुलाई 1794 में रोबेस्प्येर को भी दोषी ठहराया गया और अगले ही दिन उन्हें गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।
  • स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व: ये विचार फ्रांसीसी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण विरासत थे। इन आदर्शों ने न केवल फ्रांस को बल्कि अगली सदी के दौरान पूरे यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों के राजनीतिक आंदोलनों को प्रेरित किया।
  • दास प्रथा का उन्मूलन: 1794 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा को समाप्त करने का कानून पारित किया गया, जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार था (हालाँकि 10 साल बाद नेपोलियन ने इसे फिर से शुरू कर दिया था)।
  • नेपोलियन बोनापार्ट: डायरेक्टरी के शासन की राजनीतिक अस्थिरता ने नेपोलियन के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। 1804 में उन्होंने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित किया। उन्होंने यूरोप के कई हिस्सों को जीता और निजी संपत्ति की सुरक्षा और माप-तोल की दशमलव प्रणाली जैसे आधुनिक कानून लागू किए। अंततः 1815 में वाटरलू (Waterloo) की लड़ाई में उनकी हार हुई।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-9
अध्याय – 1

फ्रांसीसी क्रांति

प्राचीन राजतंत्र
तीन एस्टेट: पादरी और कुलीन वर्ग को जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त थे, जबकि तृतीय एस्टेट (90%) पूरा टैक्स भरता था।
जीविका संकट: तीव्र जनसंख्या वृद्धि और खराब फसल के कारण खाद्य दंगे हुए और पावरोटी की कीमतें बढ़ गईं।
तर्क का युग
लॉक और रूसो: दैवीय अधिकारों को चुनौती दी; सामाजिक अनुबंध पर आधारित सरकार का प्रस्ताव रखा।
मोंटेस्क्यू: सत्ता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित करने का सुझाव दिया।
क्रांतिकारी घटनाक्रम
बास्तीन (14 जुलाई 1789): किले-जेल पर हमले ने राजा की निरंकुश सत्ता के अंत का संकेत दिया।
नेशनल असेंबली: तृतीय एस्टेट ने राजतंत्र को सीमित करने वाले संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ ली।
गणराज्य: कन्वेंशन ने 1792 में राजतंत्र को समाप्त किया; 1793 में लुई XVI को देशद्रोह के लिए फांसी दी गई।
आतंक का राज (1793-94): रोबेस्पयेर के अधीन “गणराज्य के दुश्मनों” को गिलोटिन पर चढ़ाया गया। अंततः उसे भी फांसी दी गई।
नेपोलियन बोनापार्ट: सैन्य अस्थिरता के बीच 1804 में खुद को सम्राट घोषित किया; खुद को यूरोप का “आधुनिकीकरणकर्ता” माना।

टायद और टाइल

चर्च को दिया जाने वाला कर और राज्य को दिया जाने वाला प्रत्यक्ष कर।

गिलोटिन

दो खंभों और एक ब्लेड वाली मशीन जिसका उपयोग लोगों का सिर काटने के लिए किया जाता था।

जैकोबिन

रोबेस्पयेर के नेतृत्व में समाज के कम समृद्ध वर्गों का एक राजनीतिक क्लब।

आधुनिक विरासत
फ्रांसीसी क्रांति की असली विरासत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सार्वभौमिक आदर्श हैं। इसने प्रजा को नागरिकों में बदल दिया और आधुनिक दुनिया में लोकतांत्रिक अधिकारों की नींव रखी।

भारत की एकल एकीकृत न्यायिक प्रणाली में, उच्च न्यायालय (High Court – HC) उच्चतम न्यायालय के नीचे कार्य करता है लेकिन यह राज्य के स्तर पर सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है। आपके “IAS PCS मिशन 2026” के लिए यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि यद्यपि उच्चतम न्यायालय (SC) और उच्च न्यायालय (HC) कई शक्तियाँ साझा करते हैं, लेकिन उनके क्षेत्राधिकार में महत्वपूर्ण अंतर है, विशेष रूप से ‘रिट’ (Writs) के मामले में।

अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा। हालाँकि, 7वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) ने संसद को यह अधिकार दिया कि वह दो या दो से अधिक राज्यों के लिए, अथवा दो या अधिक राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक साझा उच्च न्यायालय (Common High Court) स्थापित कर सके।

  • सदस्य संख्या: उच्चतम न्यायालय (जहाँ संसद संख्या तय करती है) के विपरीत, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा कार्यभार के आधार पर समय-समय पर निर्धारित की जाती है।
  • नियुक्ति: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
    • मुख्य न्यायाधीश: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श के बाद की जाती है।
    • अन्य न्यायाधीश: अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
  1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. उसने भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम 10 वर्षों तक किसी न्यायिक पद पर कार्य किया हो।
  3. अथवा वह कम से कम 10 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (या लगातार दो या अधिक ऐसे न्यायालयों) का अधिवक्ता रहा हो।
  • नोट: उच्चतम न्यायालय के विपरीत, उच्च न्यायालय में “प्रसिद्ध न्यायविद” (Distinguished Jurist) को न्यायाधीश नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।
  • कार्यकाल: उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करता है (उच्चतम न्यायालय के लिए यह 65 वर्ष है)।
  • त्यागपत्र: वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
  • निष्कासन (Removal): उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की है। उन्हें केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर हटाया जा सकता है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।

उच्च न्यायालय एक “अभिलेख न्यायालय” (Court of Record) है (अनुच्छेद 215) और इसके पास अपनी अवमानना (Contempt) के लिए दंड देने की शक्ति है।

उच्च न्यायालय के पास मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए और “किसी अन्य उद्देश्य” (सामान्य कानूनी अधिकारों) के लिए भी बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी करने की शक्ति है।

  • तुलना: उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय की तुलना में व्यापक है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर ही रिट जारी कर सकता है।

प्रत्येक उच्च न्यायालय के पास उन सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) के अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति होती है, जो उसके क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार के भीतर आते हैं (सैन्य अदालतों को छोड़कर)।

जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति के संबंध में राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करता है। इसके अतिरिक्त, राज्य की न्यायिक सेवा के अन्य व्यक्तियों पर भी उच्च न्यायालय का नियंत्रण होता है।

अनुच्छेदप्रावधान
215उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होना।
226रिट जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 32 से व्यापक)।
227सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति।
231दो या अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना की संसद की शक्ति।
  • बॉम्बे HC: महाराष्ट्र, गोवा, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव।
  • गुवाहाटी HC: असम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश।
  • पंजाब और हरियाणा HC: पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़।
  • कलकत्ता HC: पश्चिम बंगाल और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
विशेषताउच्चतम न्यायालय (SC)उच्च न्यायालय (HC)
सेवानिवृत्ति की आयु65 वर्ष62 वर्ष
रिट अनुच्छेदअनुच्छेद 32 (संकीर्ण दायरा)अनुच्छेद 226 (व्यापक दायरा)
नियुक्तिराष्ट्रपति द्वाराराष्ट्रपति द्वारा
प्रसिद्ध न्यायविदनियुक्त किया जा सकता हैनियुक्त नहीं किया जा सकता
निष्कासनसंसद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारासंसद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा

यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और निष्कासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, लेकिन उन्हें पद की शपथ संबंधित राज्य के राज्यपाल दिलाते हैं। अक्सर छात्र यहाँ भ्रमित हो जाते हैं।

IAS PCS मिशन 2026 • राज्य न्यायपालिका
अनुच्छेद 214–231

उच्च न्यायालय (High Courts)

योग्यता
भारतीय नागरिकता + 10 वर्ष का न्यायिक पद या 10 वर्ष तक HC अधिवक्ता होना आवश्यक। “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” का प्रावधान नहीं।
कार्यकाल
न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं। नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
रिट क्षेत्राधिकार (अनु. 226)
विस्तृत दायरा: HC मौलिक अधिकारों और “किसी अन्य उद्देश्य” (कानूनी अधिकार) के लिए रिट जारी करता है, जिससे इसका दायरा SC (अनु. 32) से व्यापक हो जाता है।
अधीक्षण की शक्ति (अनु. 227)
उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) पर अधीक्षण का प्रयोग करता है।
प्रशासनिक नियंत्रण
अनु. 235 के तहत, जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदस्थापना के लिए राज्यपाल द्वारा HC से परामर्श किया जाता है।

अभिलेख न्यायालय

अनु. 215 के तहत, उच्च न्यायालय के निर्णयों को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखा जाता है और इसके पास अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति है।

साझा HC

अनु. 231 के तहत, संसद दो या अधिक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक ही HC स्थापित कर सकती है (जैसे बॉम्बे या गुवाहाटी HC)।

पदच्युति प्रक्रिया

SC न्यायाधीशों के समान: कदाचार या अक्षमता के लिए संसद में विशेष बहुमत के बाद राष्ट्रपति का आदेश।

कानूनी
अंतर
जहाँ उच्चतम न्यायालय शीर्ष पर है, वहीं उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है। मुख्य अंतर बरकरार हैं: सेवानिवृत्ति की आयु (62 बनाम 65), HC की व्यापक रिट शक्ति, और राज्य बेंच के लिए “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” नियुक्ति श्रेणी का अभाव।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (10 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुआलालंपुर की 24 घंटे की यात्रा वर्ष 2025 में आए तनावपूर्ण दौर के बाद द्विपक्षीय संबंधों को फिर से स्थापित करने और मजबूत करने के रणनीतिक प्रयास का प्रतीक है।
  • मुख्य बिंदु:
    • गलतियों को सुधारना: अक्टूबर 2025 में आसियान (ASEAN) शिखर सम्मेलन के लिए प्रस्तावित यात्रा के अंतिम समय में रद्द होने के बाद, 2026 में मलेशिया प्रधानमंत्री का पहला विदेशी गंतव्य बना।
    • आतंकवाद विरोध पर सहमति: एक महत्वपूर्ण संयुक्त बयान में “सीमा पार आतंकवाद” की स्पष्ट रूप से निंदा की गई, जो पिछले मतभेदों के बावजूद सुरक्षा चिंताओं पर दोनों देशों के एक साथ आने का संकेत देता है।
    • उच्च-तकनीकी सहयोग: दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) के क्षेत्र में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जो ‘आईआईटी मद्रास ग्लोबल’ को मलेशिया की ‘एडवांस्ड सेमीकंडक्टर एकेडमी’ से जोड़ता है।
    • विवादास्पद मुद्दों से किनारा: दोनों पक्षों ने मलेशिया में धर्मोपदेशक जाकिर नाइक के निरंतर प्रवास जैसे संवेदनशील विषयों पर सार्वजनिक चर्चा से सावधानीपूर्वक परहेज किया।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी”, “द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग” और “दक्षिण-पूर्वी एशिया की भू-राजनीति” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • आर्थिक धुरी (Economic Pivot): इस यात्रा का उद्देश्य ‘आसियान-भारत माल व्यापार समझौते’ (AITIGA) पर बातचीत को पुनर्जीवित करना है, जो भारतीय व्यापार अधिकारियों की आलोचनात्मक टिप्पणियों के कारण रुक गई थी।
    • रणनीतिक बहु-संरेखण (Multi-alignment): चूंकि भारत यूरोप और अमेरिका के साथ बड़े मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर काम कर रहा है, इसलिए मलेशिया जैसे आसियान भागीदारों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।
    • ब्रिक्स (BRICS) में भागीदारी: भारत ने ब्रिक्स में शामिल होने की मलेशिया की आकांक्षाओं को नोट किया है; प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम को भारत की अध्यक्षता में होने वाले आगामी शिखर सम्मेलन में भागीदार देश के रूप में आमंत्रित किया जाएगा।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; न्यायपालिका; मौलिक अधिकार)।

  • संदर्भ: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘धार्मिक और जातिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाने’ के आधार पर घूसखोर पंडित नामक फिल्म के निर्माताओं के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के निर्देश का आलोचनात्मक विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • मजबूरन समर्पण: आपराधिक कार्यवाही की धमकी ने निर्माता को तथ्यों की न्यायिक जांच से पहले ही प्रचार सामग्री हटाने के लिए मजबूर कर दिया।
    • संवैधानिक संरक्षण: अनुच्छेद 19(1)(a) को उन विचारों की रक्षा के लिए बनाया गया है जो शक्तिशाली समूहों को अप्रिय लग सकते हैं; अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए गए प्रतिबंध आनुपातिक (Proportionate) होने चाहिए।
    • भावनाएं एक मापदंड के रूप में: संपादकीय का तर्क है कि एक विविध समाज में, “भावनाएं” आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक उपयोगी कानूनी मापदंड नहीं हो सकतीं।
    • विचारों का बाज़ार: विवादित सामग्री को हटाने की प्रक्रिया को सामान्य बनाना समाज को बहिष्कार या व्यंग्य जैसी लोकतांत्रिक प्रतिक्रियाओं का उपयोग करने से रोकता है और सार्वजनिक क्षेत्र को संकुचित करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, “कार्यपालिका की भूमिका” और “अपराध की कानूनी मानक” से संबंधित विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कार्यकारी अतिरेक (Executive Overreach): फिल्म के शीर्षक की नापसंदगी के लिए पुलिस कार्रवाई का निर्देश देना सार्वजनिक बहस के बजाय मुद्दे को केवल “अनुशासन का मामला” बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
    • प्रतिबंधों का पैटर्न: हाल के उदाहरण, जिनमें द केरला स्टोरी पर प्रतिबंध और बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन शामिल हैं, दृश्य कलाओं को नियंत्रित करने के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग की प्रवृत्ति का सुझाव देते हैं।
    • न्यायिक उपाय: अवैधता के दावों पर अधिक समझदारी भरी प्रतिक्रिया एकपक्षीय कार्यकारी कार्रवाई के बजाय न्यायिक राहत प्राप्त करना है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; प्रौद्योगिकी का प्रभाव) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: अर्जुन अप्पादुरई द्वारा इस बात का विश्लेषण कि कैसे डिजिटल बाज़ार और प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म मानव सामाजिकता और पहचान को निष्कर्षण (Extraction) के लिए एक वैश्विक वस्तु में बदल रहे हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • पूंजीवादी निष्कर्षण: कच्चे माल या एआई से परे, अब “सामाजिकता स्वयं”—दोस्ती, पसंद-नापसंद और व्यक्तिगत कहानियाँ—पूंजीवादी खनन का प्राथमिक विषय बन गई हैं।
    • निजता का अंत: यह अत्यधिक तीव्र प्रोफाइलिंग (Profiling on steroids) अंतरंगता और विश्वास जैसी पारंपरिक अवधारणाओं को अप्रचलित बना देती है, क्योंकि इन्हें बिना किसी सीमा के खनन किए जाने वाले संसाधन के रूप में माना जाता है।
    • कहानी की अर्थव्यवस्था (Story Economy): ओटीटी (OTT) स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया बाज़ार को नियंत्रित करने के लिए “स्थानीय स्वाद” और सार्वभौमिक चरित्र प्रकारों का शिकार करते हैं ताकि उन्हें व्यावसायिक वस्तु बनाया जा सके।
    • कृत्रिम बनाम मानव: एआई बॉट्स (सिरी, चैटजीपीटी) अब निर्णय और अंतर्ज्ञान (Intuition) के मामले में मनुष्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे एकीकृत व्यक्ति की पहचान और बिखर रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल नैतिकता”, “बड़े डेटा के युग में निजता” और “इंटरनेट का समाजशास्त्र” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सेल्फी के स्रोत: व्यक्तिगत स्वतंत्रता के ज्ञानोदय (Enlightenment) मूल्यों को क्रेडिट स्कोर और एल्गोरिथम आधारित उपभोक्ता प्रोफाइल के एक अस्थिर मिश्रण द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
    • लोकतंत्रीकरण का जोखिम: हालांकि अब कोई भी “भाग्यशाली वायरल होने” (Lucky virality) के माध्यम से दर्शकों तक पहुँच सकता है, लेकिन यह प्रवृत्ति मानव अनुभव की हर जीवित खान में “ड्रिल करने” (Drilling) की निरंतर दौड़ को सुगम बनाती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: भारत ने वर्ष 2026 के लिए ‘किम्बरली प्रक्रिया’ (KP) की अध्यक्षता ग्रहण की है, जो हीरा व्यापार के वैश्विक शासन में सुधार के लिए एक मंच प्रदान करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • भारत का प्रभाव: दुनिया के अग्रणी कटिंग और पॉलिशिंग केंद्र के रूप में, जो वैश्विक कच्चे हीरों का 40% आयात करता है, भारत का इस मूल्य श्रृंखला में अद्वितीय प्रभाव है।
    • ‘संघर्ष’ (Conflict) की परिभाषा: किम्बरली प्रक्रिया की एक बड़ी आलोचना “संघर्ष हीरों” (Conflict Diamonds) की इसकी संकीर्ण परिभाषा है, जो राज्य से जुड़े दुर्व्यवहारों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और पर्यावरणीय क्षति की अनदेखी करती है।
    • तकनीकी समाधान: भारत धोखाधड़ी को कम करने और सीमा शुल्क डेटा विनिमय को आधुनिक बनाने के लिए डिजिटल, छेड़छाड़-मुक्त ब्लॉकचेन-आधारित प्रमाणपत्रों को बढ़ावा दे सकता है।
    • आजीविका पर ध्यान: विमर्श को केवल “खराब हीरों” को रोकने से हटाकर एक ऐसे जिम्मेदार व्यापार को सक्षम बनाने की ओर ले जाने की आवश्यकता है जो अफ्रीकी खनन समुदायों का समर्थन करे।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतर्राष्ट्रीय संसाधन शासन”, “ग्लोबल साउथ में भारत का नेतृत्व” और “आपूर्ति श्रृंखला नैतिकता” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संस्थागत सुधार: भारत साधारण विद्रोही उग्रवाद से परे मानवाधिकारों के जोखिमों पर आम सहमति बनाने के लिए तकनीकी कार्य समूहों का गठन कर सकता है।
    • त्रिपक्षीय शक्ति: सरकारों, उद्योग और नागरिक समाज के बीच खुले संचार की सुविधा प्रदान करके, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि किम्बरली प्रक्रिया एक प्रगतिशील बहुपक्षीय निकाय बनी रहे।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार से संबंधित मुद्दे; सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम – MSME)।

  • संदर्भ: तमिलनाडु के इरोड में एक डेयरी प्रसंस्करण संयंत्र का मामला जो उन संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करता है जो भारत में रोजगार-गहन विकास को रोक रही हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • ऋण की बाधा (Credit Bottleneck): प्राथमिक बाधा मांग या बुनियादी ढांचे की कमी नहीं है, बल्कि छोटे उत्पादकों की उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती और विश्वसनीय औपचारिक ऋण तक पहुँच की कमी है।
    • एकत्रीकरण की शक्ति: अमूल मॉडल से प्रेरित होकर, यह सबक मिलता है कि विकास के लिए संस्थागत सहायता के माध्यम से उत्पादक स्तर पर ऋण की समस्याओं को हल करना आवश्यक है।
    • MSME का लचीलापन: इरोड का औद्योगिक परिदृश्य दिखाता है कि छोटी फर्में बढ़ने के लिए तैयार हैं लेकिन वे नियामक जटिलता, कौशल अंतराल और कर अनिश्चितता के कारण रुकी हुई हैं।
    • रोजगार अवशोषण: अकेले बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भारत के कार्यबल को समाहित नहीं कर सकती हैं; बड़े पैमाने पर रोजगार MSME और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्रों से ही आना चाहिए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “समावेशी विकास”, “ग्रामीण विकास” और “वित्तीय समावेशन रणनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जनसांख्यिकीय घड़ी: भारत के पास अपनी कार्यशील आयु वाली जनसंख्या के लाभ के कम होने से पहले लगभग दो दशक का समय है; अब गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करने में विफल रहने का परिणाम एक खोए हुए अवसर के रूप में निकलेगा।
    • वैश्विक मिसाल: विश्व बैंक का अनुमान है कि लघु और मध्यम उद्यम (SMEs) वैश्विक रोजगार का लगभग 70% प्रदान करते हैं, जो उन्हें भारत के रोजगार संकट के लिए सबसे महत्वपूर्ण समाधान बनाता है।

संपादकीय विश्लेषण

10 फरवरी, 2026
GS-3 तकनीक / समाज खनन योग्य स्व (The Mineable Self)

“स्वयं सामाजिकता” को एक वस्तु के रूप में निकाला जा रहा है। अत्यधिक प्रोफाइलिंग ‘कहानी अर्थव्यवस्था’ (story economy) में आत्मीयता और विश्वास को अप्रचलित बना रही है।

GS-2/3 अर्थव्यवस्था किम्बरली प्रोसेस 2026

भारत ने अध्यक्षता संभाली। ब्लॉकचेन प्रमाणपत्रों पर जोर और ‘संघर्ष’ की परिभाषा को व्यापक बनाकर इसमें राज्य-संबद्ध दुरुपयोगों को शामिल करने का प्रयास।

GS-3 MSME / रोजगार रोजगार सृजन की बाधाएं

इरोड के डेयरी संयंत्रों से सबक; ऋण की बाधाएं और नियामक जटिलता महत्वपूर्ण MSME रोजगार इंजन को पीछे धकेल रही हैं।

कूटनीति: बदलते वैश्विक मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के बीच एक्ट ईस्ट और AITIGA वार्ता के लिए मलेशिया के साथ संबंधों को बहाल करना महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था: वैश्विक संसाधन शासन में सुधार के लिए भारत के पास 40% कच्चे हीरे के आयातक के रूप में अद्वितीय लाभ है।
बुनियादी ढांचा: MSMEs के विस्तार के लिए संस्थागत एकत्रीकरण के माध्यम से उत्पादक स्तर पर ऋण बाधाओं को दूर करना आवश्यक है।
समाज: एल्गोरिद्म आधारित उपभोक्ता प्रोफाइल व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जगह ले रहे हैं, जो अनुभवों की हर “जीवंत खदान” में ड्रिल कर रहे हैं।
GS-4
कला की स्वतंत्रता
कार्यकारी अतिरेक: अनुच्छेद 19(1)(a) को विवादित अभिव्यक्ति की रक्षा करनी चाहिए। भावनाओं पर आधारित प्राथमिकी लोकतांत्रिक बहस को राज्य के अनुशासन में बदल देती है, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र संकुचित होता है और विचारों का बाजार शांत हो जाता है।

यहाँ महत्वपूर्ण वैश्विक रेखाओं—भूमध्य रेखा (Equator)कर्क और मकर रेखाएँ (Tropics), और प्रधान मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) पर केंद्रित विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

भूमध्य रेखा (विषुवत रेखा) तीन महाद्वीपों के 13 देशों से होकर गुजरती है। यह एकमात्र अक्षांश है जो एक ‘वृहद वृत्त’ (Great Circle) है।

  • दक्षिण अमेरिका (3): इक्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील।
  • अफ्रीका (7): गैबॉन, कांगो गणराज्य, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया, साओ टोम और प्रिंसिपे।
  • एशिया/ओशिनिया (3): मालदीव, इंडोनेशिया, किरिबाती।
  • मैपिंग टिप: ध्यान दें कि जबकि भूमध्य रेखा मालदीव और किरिबाती के क्षेत्रीय जल (Territorial waters) से होकर गुजरती है, यह उनके वास्तविक भूभाग (Landmass) को नहीं छूती है।

यह रेखा उस सबसे उत्तरी बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ सूर्य दोपहर में सीधे सिर के ऊपर (June Solstice – जून संक्रांति) होता है। यह 17 देशों से होकर गुजरती है।

  • उत्तरी अमेरिका (2): मेक्सिको, बहामास।
  • अफ्रीका (7): पश्चिमी सहारा (विवादित), मॉरिटानिया, माली, अल्जीरिया, नाइजर, लीबिया, मिस्र।
  • एशिया (8): सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, ताइवान।
  • रणनीतिक बिंदु (भारत): भारत में, यह 8 राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम।

यह रेखा उस सबसे दक्षिणी बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ सूर्य सीधे सिर के ऊपर (December Solstice – दिसंबर संक्रांति) होता है। यह 10 देशों से होकर गुजरती है।

  • दक्षिण अमेरिका (4): चिली, अर्जेंटीना, पराग्वे, ब्राजील।
  • अफ्रीका (5): नामीबिया, बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, मेडागास्कर।
  • ओशिनिया (1): ऑस्ट्रेलिया।
  • मुख्य तथ्य: ब्राजील दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ से भूमध्य रेखा और मकर रेखा दोनों गुजरती हैं।

प्रधान मध्याह्न रेखा (ग्रीनविच रेखा) पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्ध में विभाजित करती है। यह 8 देशों से होकर गुजरती है।

  • यूरोप (3): यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, स्पेन।
  • अफ्रीका (5): अल्जीरिया, माली, बुर्किना फासो, टोगो, घाना।
  • मानचित्रण संदर्भ: प्रधान मध्याह्न रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को अटलांटिक महासागर में गिनी की खाड़ी (घाना के तट के पास) में काटती हैं।
महत्वपूर्ण रेखामहाद्वीपों की संख्यादेशों की संख्यामुख्य भौगोलिक केंद्र
भूमध्य रेखा313उष्णकटिबंधीय वर्षावन (अमेज़न, कांगो, इंडोनेशिया)।
कर्क रेखा317मरुस्थल (सहारा, थार) और मानसूनी पेटियाँ (भारत)।
मकर रेखा310अटाकामा मरुस्थल, ऑस्ट्रेलियाई आउटबैक।
प्रधान मध्याह्न रेखा28ग्रीनविच (UK) और गिनी की खाड़ी।

UPSC की परीक्षाओं में अक्सर यह पूछा जाता है कि कौन सा देश किस रेखा पर स्थित है। इसे याद करने के लिए महाद्वीप-वार समूहों का उपयोग करें। उदाहरण के लिए, अफ्रीका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ से भूमध्य रेखा, कर्क रेखा और मकर रेखा तीनों गुजरती हैं। मानचित्र पर इन रेखाओं के प्रतिच्छेदन बिंदुओं को भी ध्यान से देखें।

मानचित्रण विवरण

महत्वपूर्ण वैश्विक रेखाएँ
भूमध्य रेखा (0°) वृहत् वृत्त (The Great Circle)

ब्राजील, कांगो (DRC) और इंडोनेशिया सहित 13 देशों से गुजरती है। 11 देशों में भूमि को स्पर्श करती है, जबकि मालदीव और किरिबाती में समुद्री क्षेत्रों को पार करती है।

मुख्य मध्याह्न रेखा गोलार्ध विभाजक

यूरोप और अफ्रीका के 8 देशों से होकर गुजरती है। भूमध्य रेखा के साथ इसका मुख्य प्रतिच्छेदन घाना के पास गिनी की खाड़ी में होता है।

कर्क रेखा (23.5° उत्तर)
उत्तरी संक्रांति रेखा

मैक्सिको, मिस्र और भारत सहित 17 देशों को पार करती है। भारतीय संदर्भ में, यह 8 राज्यों से होकर गुजरती है: पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में मिजोरम तक।

मकर रेखा (23.5° दक्षिण)
दक्षिणी संक्रांति रेखा

दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के 10 देशों से होकर गुजरती है। ब्राजील विशिष्ट रूप से एकमात्र ऐसा देश है जहाँ से भूमध्य रेखा और यह रेखा दोनों गुजरती हैं।

क्षेत्रीय भौगोलिक फोकस

ये रेखाएँ वैश्विक जलवायु पेटियों को परिभाषित करती हैं, भूमध्य रेखा के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से लेकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के साथ स्थित शुष्क मरुस्थलों (सहारा/अटाकामा) तक।

भूमध्य रेखा 13 देश (वृहत् वृत्त)।
कर्क रेखा 8 भारतीय राज्य (GJ से MZ)।
मकर रेखा ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया को पार करती हुई।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: गिनी की खाड़ी में 0°/0° निर्देशांक को समझना वैश्विक नेविगेशन का शुरुआती बिंदु है। भारत की अद्वितीय जलवायु स्थिति की कल्पना करने के लिए कर्क रेखा के साथ मानसून बेल्ट का पता लगाएं।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 9 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “स्वतंत्रता के बाद भारत” एक नए स्वतंत्र राष्ट्र के सामने आने वाली विशाल चुनौतियों और एक आधुनिक, लोकतांत्रिक और एकीकृत भारत के निर्माण के लिए उठाए गए कदमों की जांच करता है।

जब अगस्त 1947 में भारत स्वतंत्र हुआ, तो उसे स्मारकीय चुनौतियों की एक श्रृंखला का सामना करना पड़ा जिसने इसकी स्थिरता को खतरे में डाल दिया था।

  • शरणार्थी संकट (The Refugee Crisis): विभाजन के परिणामस्वरूप, लगभग 80 लाख (8 मिलियन) शरणार्थी उस क्षेत्र से भारत आए जो अब पाकिस्तान बन गया था। सरकार के सामने इन लाखों विस्थापित लोगों के लिए घर खोजने और उन्हें रोजगार प्रदान करने का तात्कालिक कार्य था।
  • रियासतों का एकीकरण (The Integration of Princely States): लगभग 500 रियासतें थीं, जिनमें से प्रत्येक पर एक महाराजा या नवाब का शासन था। एक एकीकृत भारत सुनिश्चित करने के लिए इन प्रत्येक शासकों को नए राष्ट्र में शामिल होने के लिए राजी करना आवश्यक था।
  • आर्थिक और सामाजिक विभाजन (Economic and Social Divisions): 1947 में, भारत की जनसंख्या बहुत बड़ी थी, जिसकी कुल संख्या लगभग 34.5 करोड़ (345 मिलियन) थी। यह जनसंख्या ऊँची जातियों और नीची जातियों, बहुसंख्यक हिंदू समुदाय और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों, और विभिन्न भाषाई समूहों के बीच गहराई से विभाजित थी।
  • गरीबी: कृषि आजीविका का प्राथमिक साधन था, और यदि मानसून विफल हो जाता, तो लाखों किसानों और गैर-कृषि श्रमिकों (जैसे बुनकर और नाई) को भूखा रहना पड़ता।

दिसंबर 1946 और नवंबर 1949 के बीच, राष्ट्र के राजनीतिक भविष्य को तैयार करने के लिए संविधान सभा के हिस्से के रूप में लगभग 300 भारतीयों ने सत्रों की एक श्रृंखला में मुलाकात की। संविधान को 26 जनवरी, 1950 को अपनाया गया था।

  • सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise): सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक 21 वर्ष (अब 18 वर्ष) से अधिक आयु के सभी भारतीयों को राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में वोट देने का अधिकार प्रदान करना था। यह एक क्रांतिकारी कदम था, क्योंकि यूनाइटेड किंगडम (UK) और यूनाइटेड स्टेट्स (US) जैसे देशों में भी यह अधिकार चरणों में दिया गया था।
  • कानून के समक्ष समानता (Equality Before the Law): संविधान ने जाति या धार्मिक संबद्धता की परवाह किए बिना सभी नागरिकों को समानता की गारंटी दी।
  • वंचितों के लिए सुरक्षा उपाय (Safeguards for the Disadvantaged):
    • अस्पृश्यता का उन्मूलन: अस्पृश्यता की प्रथा, जिसे भारत पर एक “कलंक और धब्बा” बताया गया था, उसे समाप्त कर दिया गया।
    • आरक्षण: सदियों के भेदभाव की भरपाई के लिए सबसे निचली जातियों (हरिजनों) और आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) के लिए विधायिकाओं और सरकारी नौकरियों में सीटों का एक प्रतिशत आरक्षित किया गया।

केंद्र सरकार और राज्यों के अधिकार को संतुलित करने के लिए, संविधान ने विषयों की तीन सूचियाँ बनाईं:

  • संघ सूची (Union List): इसमें कर, रक्षा और विदेशी मामले शामिल हैं; ये केंद्र की एकमात्र जिम्मेदारी हैं।
  • राज्य सूची (State List): इसमें शिक्षा और स्वास्थ्य शामिल हैं; ये मुख्य रूप से राज्यों की जिम्मेदारी हैं।
  • समवर्ती सूची (Concurrent List): इसमें वन और कृषि शामिल हैं; केंद्र और राज्यों दोनों की इन पर संयुक्त जिम्मेदारी है।

प्रारंभ में, प्रधानमंत्री नेहरू और उप-प्रधानमंत्री वल्लभभाई पटेल भाषाई आधार पर देश को और अधिक विभाजित करने के लिए अनिच्छुक थे, उन्हें डर था कि विभाजन के आघात के बाद इससे और अधिक संघर्ष होगा।

  • राज्य के दर्जे के लिए विरोध: कन्नड़, मलयालम और मराठी भाषियों की ओर से कड़े विरोध प्रदर्शन हुए।
  • आंध्र का मामला: मद्रास प्रेसीडेंसी में तेलुगु भाषियों की ओर से सबसे कड़ा विरोध आया।
  • पोट्टी श्रीरामुलु: उन्होंने तेलुगु भाषियों के लिए एक अलग राज्य की मांग करते हुए भूख हड़ताल की और 58 दिनों के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
  • पहला भाषाई राज्य: उनकी मृत्यु और उसके बाद हुए दंगों के बाद, सरकार को 1 अक्टूबर, 1953 को आंध्र राज्य बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा।
  • राज्य पुनर्गठन आयोग (States Reorganisation Commission): 1956 में, आयोग ने बंगाली, तमिल, मलयालम और पंजाबी जैसी प्रमुख भाषाओं के आधार पर राज्यों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की सिफारिश की।

आधुनिक तकनीकी और औद्योगिक विकास के माध्यम से भारत को गरीबी से बाहर निकालना एक प्राथमिक लक्ष्य था।

  • योजना आयोग (The Planning Commission): आर्थिक विकास के लिए नीतियों को तैयार करने और निष्पादित करने के लिए 1950 में स्थापित किया गया।
  • मिश्रित अर्थव्यवस्था मॉडल (The Mixed Economy Model): भारत ने एक ऐसा मॉडल अपनाया जहाँ राज्य और निजी क्षेत्र दोनों उत्पादन और रोजगार सृजन में महत्वपूर्ण और पूरक भूमिका निभाएंगे।
  • दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956): इस योजना ने भारी उद्योगों (जैसे इस्पात) के निर्माण और भाखड़ा नांगल जैसे विशाल बांधों के निर्माण पर भारी ध्यान केंद्रित किया।

15 अगस्त, 2007 को भारत ने स्वतंत्रता के 60 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया।

  • एकता और लोकतंत्र: विदेशी भविष्यवाणियों के विपरीत कि भारत टूट जाएगा या सैन्य शासन के अधीन आ जाएगा, यह एक एकल, संयुक्त और लोकतांत्रिक देश बना रहा।
  • लोकतांत्रिक संस्थाएँ: भारत एक स्वतंत्र प्रेस, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और नियमित चुनावों को बनाए रखता है।
  • सामाजिक असमानता: गहरा विभाजन अभी भी बना हुआ है, और दलितों (पूर्व में अछूत) को अभी भी देश के कई हिस्सों में हिंसा और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
  • अमीर-गरीब की खाई: अमीर और गरीब के बीच की खाई चौड़ी हो गई है; जहाँ कुछ लोग विलासिता और महंगे स्कूलों का आनंद लेते हैं, वहीं अन्य लोग बुनियादी सुविधाओं के बिना झुग्गियों या ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी में रहना जारी रखते हैं।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 12

स्वतंत्रता के बाद भारत

जन्म के समय चुनौतियाँ
शरणार्थी संकट: पाकिस्तान से 80 लाख लोग घर और काम की तलाश में भारत आए।
रियासतें: 500 रियासतों के शासकों को सरदार पटेल ने एकीकृत राष्ट्र में शामिल होने के लिए मनाया।
आर्थिक कमजोरी: 34.5 करोड़ की आबादी गहरे संकट, गरीबी और मानसून पर निर्भर कृषि का सामना कर रही थी।
संविधान
सार्वभौमिक मताधिकार: क्रांतिकारी कदम जिसने लिंग या वर्ग की परवाह किए बिना सभी वयस्कों को वोट देने का अधिकार दिया।
शक्तियों का विभाजन: केंद्र और राज्य के अधिकारों को संतुलित करने के लिए संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ बनाई गईं।
एक आधुनिक गणराज्य का निर्माण
सामाजिक न्याय: 1950 के संविधान ने अस्पृश्यता को समाप्त किया और अनुसूचित जातियों व जनजातियों के लिए आरक्षण की शुरुआत की।
भाषायी राज्य: शुरुआती अनिच्छा के बावजूद, पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु के बाद आंध्र (1953) का गठन हुआ और 1956 में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन हुआ।
आर्थिक योजना: योजना आयोग (1950) ने “मिश्रित अर्थव्यवस्था” का मॉडल अपनाया। दूसरी पंचवर्षीय योजना (1956) ने भारी उद्योग और भाखड़ा नांगल जैसे बांधों को प्राथमिकता दी।
लोकतांत्रिक लचीलापन: साठ से अधिक वर्षों के बाद, भारत ने एक स्वतंत्र न्यायपालिका के साथ एक एकीकृत और लोकतांत्रिक राष्ट्र रहकर आलोचकों को गलत साबित कर दिया।
निरंतर अंतराल: एकता में सफल होने के बावजूद, गहरी सामाजिक असमानता और शहरी अमीरों व ग्रामीण गरीबों के बीच बढ़ती खाई के रूप में विफलताएं बरकरार हैं।

समवर्ती सूची

वन और कृषि जैसे विषय जहाँ केंद्र और राज्य दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी होती है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था

विकास का वह मॉडल जहाँ राज्य और निजी क्षेत्र दोनों पूरक भूमिकाएँ निभाते हैं।

हरिजन

निचली जातियों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द, जिनके लिए विधायिकाओं में सीटें आरक्षित की गई थीं।

साठ वर्षों
के बाद
1947 के बाद भारत की यात्रा लोकतांत्रिक दृढ़ता का प्रमाण है। जहाँ राष्ट्र ने अपनी एकता और संस्थागत स्वतंत्रता को सफलतापूर्वक बनाए रखा है, वहीं सामाजिक और आर्थिक विभाजन को पाटना अभी भी इसकी सबसे बड़ी अधूरी चुनौती है।

भारत में न्यायपालिका एक एकल और एकीकृत (Integrated) प्रणाली है, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) स्थित है। संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की संघीय प्रणाली के विपरीत, जहाँ संघ और राज्यों के लिए कानूनों के अलग-अलग सेट होते हैं, भारतीय उच्चतम न्यायालय केंद्रीय और राज्य दोनों कानूनों को लागू करता है।

उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी, 1950 को हुआ था। इसने ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935’ के तहत स्थापित ‘भारत के संघीय न्यायालय’ (Federal Court of India) का स्थान लिया।

  • सदस्य संख्या: वर्तमान में उच्चतम न्यायालय में कुल 34 न्यायाधीश (1 मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य न्यायाधीश) होते हैं। न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति संसद के पास होती है।
  • नियुक्ति: उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • कोलेजियम प्रणाली (The Collegium System): न्यायाधीशों की नियुक्ति एक ‘कोलेजियम’ के परामर्श के बाद की जाती है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • न्यायाधीश के लिए योग्यताएं:
    1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
    2. वह कम से कम 5 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो।
    3. अथवा उसने कम से कम 10 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय में वकालत की हो।
    4. अथवा राष्ट्रपति के मत में वह एक ‘प्रतिष्ठित न्यायविद’ (Distinguished Jurist) हो।
  • कार्यकाल: उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद पर बना रहता है। वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
  • निष्कासन (महाभियोग): एक न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ही पद से हटाया जा सकता है। ऐसा आदेश तभी जारी किया जा सकता है जब संसद के दोनों सदनों द्वारा उसी सत्र में ‘विशेष बहुमत’ से प्रस्ताव पारित किया गया हो।
  • आधार: सिद्ध कदाचार (Proved misbehavior) या अक्षमता (Incapacity)।
  • आवश्यक बहुमत: विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का 2/3 हिस्सा)।

भारतीय उच्चतम न्यायालय के पास दुनिया के किसी भी अन्य न्यायालय की तुलना में सबसे व्यापक क्षेत्राधिकार हैं।

उच्चतम न्यायालय निम्नलिखित विवादों में एक मध्यस्थ के रूप में कार्य करता है:

  • केंद्र और एक या एक से अधिक राज्यों के बीच विवाद।
  • एक ओर केंद्र और कोई राज्य (या राज्य) और दूसरी ओर एक या अधिक अन्य राज्यों के बीच विवाद।
  • दो या दो से अधिक राज्यों के बीच विवाद।

उच्चतम न्यायालय मौलिक अधिकारों का ‘गारंटीकर्ता और रक्षक’ है। यह मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), उत्प्रेषण (Certiorari), और अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto) जैसी रिट जारी कर सकता है।

उच्चतम न्यायालय अपील का सर्वोच्च न्यायालय है। यह उच्च न्यायालय के निर्णयों के खिलाफ अपील सुनता है:

  • संवैधानिक मामलों में।
  • दीवानी (Civil) मामलों में।
  • आपराधिक (Criminal) मामलों में।

राष्ट्रपति निम्नलिखित विषयों पर उच्चतम न्यायालय की राय मांग सकता है:

  • सार्वजनिक महत्व के कानून या तथ्य का कोई प्रश्न।
  • संविधान पूर्व संधियों से उत्पन्न विवाद।
  • नोट: उच्चतम न्यायालय की राय राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी नहीं होती है।
  • अभिलेख न्यायालय (Court of Record – अनुच्छेद 129): उच्चतम न्यायालय के निर्णय शाश्वत स्मृति और साक्ष्य के रूप में दर्ज किए जाते हैं। इसके पास ‘न्यायालय की अवमानना’ (Contempt of Court) के लिए दंड देने की शक्ति भी होती है।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review): विधायी अधिनियमों और कार्यकारी आदेशों की संवैधानिकता की जाँच करने की शक्ति।
  • उपचारात्मक याचिका (Curative Petition): पुनर्विचार याचिका (Review Petition) खारिज होने के बाद किसी निर्णय पर पुनर्विचार करने का अंतिम कानूनी सहारा (यह ‘रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा’ मामले में विकसित हुआ)।
अनुच्छेदमुख्य शक्ति / प्रावधानमुख्य विवरण
124स्थापना एवं गठनन्यायाधीशों की नियुक्ति और योग्यताएं।
129अभिलेख न्यायालयअवमानना के लिए दंड देने की शक्ति।
131मूल क्षेत्राधिकारसंघीय विवाद (केंद्र बनाम राज्य)।
136विशेष अनुमति याचिका (SLP)किसी भी अपील को सुनने की विवेकाधीन शक्ति।
141देश का कानूनउच्चतम न्यायालय के निर्णय सभी अदालतों पर बाध्यकारी हैं।
143परामर्शदात्री शक्तिराष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय से राय मांगना।

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को पद की शपथ राष्ट्रपति दिलाते हैं। इसके अलावा, भारत में अब तक किसी भी न्यायाधीश को महाभियोग द्वारा हटाया नहीं गया है, हालांकि कुछ न्यायाधीशों के खिलाफ कार्यवाही शुरू की गई थी।

संवैधानिक शीर्ष • अनु. 124-147
भारत का उच्चतम न्यायालय

नियुक्ति और क्षेत्राधिकार

योग्यता
भारत का नागरिक होना चाहिए और 5 वर्ष तक HC न्यायाधीश या 10 वर्ष तक HC अधिवक्ता या राष्ट्रपति की दृष्टि में एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता होना चाहिए।
कार्यकाल एवं पदच्युति
65 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं। संसद में विशेष बहुमत प्रस्ताव के बाद केवल राष्ट्रपति द्वारा हटाए जा सकते हैं।
संरचना एवं नियुक्ति
संख्या: 34 न्यायाधीश (1 मुख्य न्यायाधीश + 33 अन्य)। नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली (CJI + 4 वरिष्ठतम न्यायाधीश) का पालन करती है।
मूल क्षेत्राधिकार (अनु. 131)
केंद्र और राज्यों के बीच या दो या अधिक राज्यों के बीच संघीय विवादों में मध्यस्थ।
सलाहकारी शक्ति (अनु. 143)
राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों या संविधान-पूर्व संधियों पर SC की राय मांग सकते हैं। राय बाध्यकारी नहीं है।

रिट (Writ) शक्ति

अनु. 32 के तहत, SC मौलिक अधिकारों का संरक्षक है (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, आदि)।

अभिलेख न्यायालय

अनु. 129 के तहत, निर्णयों को साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड किया जाता है; इसमें अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति शामिल है।

SLP (अनु. 136)

भारत में किसी भी न्यायालय या न्यायाधिकरण के किसी भी निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने की विवेकाधीन शक्ति

देश का
कानून
अनुच्छेद 141 के तहत, उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है। यह एक एकीकृत न्यायिक प्रणाली सुनिश्चित करता है जहाँ SC के पास सभी विधायी और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की जांच करने के लिए न्यायिक समीक्षा की शक्ति है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (9 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले मुद्दे)।

  • संदर्भ: लोकसभा ने हाल ही में प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना ही राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ (Motion of Thanks) को अपनाकर संसदीय परंपरा का उल्लंघन किया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • असामान्य विचलन: लोकसभा ने 5 फरवरी को पारंपरिक रूप से प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही प्रस्ताव को पारित कर दिया।
    • सुरक्षा संबंधी चिंताएँ: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री से सदन में उपस्थित न होने का अनुरोध किया था क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री की सीट के पास संभावित व्यवधान या नुकसान के बारे में “विश्वसनीय इनपुट” मिले थे।
    • प्रक्रियात्मक उल्लंघन: संसदीय नियम यह अनिवार्य करते हैं कि धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस प्रधानमंत्री के उत्तर के साथ समाप्त होनी चाहिए; इसके बिना बहस को समाप्त करने के लिए एक विशिष्ट प्रस्ताव की आवश्यकता होती है।
    • भाषण पर रोक: विपक्ष के नेता राहुल गांधी को पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की पुस्तक के अंशों को उद्धृत करने से रोक दिया गया।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संसदीय प्रक्रिया”, “कार्यपालिका की जवाबदेही” और “अध्यक्ष की भूमिका” से संबंधित प्रश्नों के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जवाबदेही का क्षरण: बहस और उत्तर की प्रक्रिया कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने का एक मुख्य तंत्र है; इसे छोड़ना इस लोकतांत्रिक मानदंड के चिंताजनक क्षरण के रूप में देखा जा रहा है।
    • महत्वपूर्ण मुद्दों से बचना: संबंधित पुस्तक राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर मुद्दे उठाती है; संपादकीय का तर्क है कि निर्वाचित सदस्यों को उन पर चर्चा करने के अवसर से वंचित करना अनुचित है।
    • जिम्मेदारी से भागना: सदन के बाहर उद्धृत अंशों से पता चलता है कि राजनीतिक कार्यपालिका द्वारा निर्णय लेने से बचने और दूसरों पर जिम्मेदारी डालने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप; उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: गाजियाबाद में एक दुखद घटना के बाद, जहाँ तीन बहनों ने कथित तौर पर स्क्रीन की लत के कारण अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की मांग बढ़ रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • वैश्विक उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया (दिसंबर 2025) और स्पेन (फरवरी 2026) ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने के कदम उठाए हैं।
    • तकनीकी खामियाँ: इस तरह के प्रतिबंधों को वीपीएन (VPN) के माध्यम से आसानी से दरकिनार किया जा सकता है या यह उपयोगकर्ताओं को “डार्क वेब” की ओर धकेल सकता है जहाँ शोषण और कट्टरपंथ पनपता है।
    • लैंगिक असमानता: प्रतिबंध से असमानताएं और गहरी हो सकती हैं; डेटा से पता चलता है कि केवल 33.3% भारतीय महिलाएं इंटरनेट का उपयोग करती हैं, जबकि पुरुषों का यह आंकड़ा 57.1% है।
    • डिजिटल जीवन रेखा: अलग-थलग या ग्रामीण युवाओं के लिए ये प्लेटफॉर्म अक्सर सहायक समुदायों तक पहुँचने का एकमात्र जरिया होते हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल अधिकार”, “मानसिक स्वास्थ्य नीति” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नैतिक भय (Moral Panic): समाज अक्सर जटिल समस्याओं को “लोक शैतान” (Folk Devils) के रूप में लेबल करता है, जिससे वास्तविक समाधान के बजाय प्रतीकात्मक और असंगत दमनकारी कार्रवाई होती है।
    • “देखभाल के कर्तव्य” (Duty of Care) की आवश्यकता: प्रतिबंधों के बजाय, संपादकीय एक मजबूत डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून और प्लेटफार्मों के लिए कानूनी रूप से लागू करने योग्य “देखभाल के कर्तव्य” की वकालत करता है।
    • अनुसंधान का अभाव: भारत में इस बात पर दीर्घकालिक शोध की कमी है कि सोशल मीडिया वर्ग, जाति और क्षेत्र के आधार पर स्थानीय बच्चों के कल्याण को कैसे प्रभावित करता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू, पारदर्शिता और जवाबदेही) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा; संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौतियां)।

  • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय इंस्टाग्राम और फेसबुक के साथ उपयोगकर्ता डेटा साझा करने के संबंध में व्हाट्सएप के 2021 के अपडेट पर मेटा/व्हाट्सएप से सवाल कर रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • नेटवर्क प्रभाव: व्हाट्सएप का प्रभुत्व इसे इतना अनिवार्य बनाता है कि व्यक्तियों या व्यवसायों के लिए इस प्लेटफॉर्म पर रहे बिना कार्य करना व्यावहारिक रूप से असंभव है।
    • CCI का जुर्माना: भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने गोपनीयता परिवर्तनों के संबंध में “स्वीकार करें या छोड़ दें” के अल्टीमेटम के लिए ₹213.14 करोड़ का जुर्माना लगाया था।
    • अपर्याप्त उपचार: उपयोगकर्ताओं को “ऑप्ट-आउट” (बाहर निकलने) की अनुमति देना इतने बड़े पैमाने पर अप्रभावी माना जाता है जहाँ “डिफ़ॉल्ट शक्ति” के सामने बहुत कम विकल्प बचते हैं।
    • एन्क्रिप्शन मानक: ऐप द्वारा एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन को अपनाने ने भारत में सुरक्षित संचार को एक सामाजिक मानदंड के रूप में स्थापित किया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “डेटा गोपनीयता”, “डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून” और “बिग टेक विनियमन” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संचार का रूपांतरण: व्हाट्सएप ने मुफ्त टेलीफोनी और संदेश सेवाएं प्रदान की हैं जो 2016 से पहले अत्यधिक महंगी थीं।
    • विधायी विलंब: हालांकि उच्चतम न्यायालय के विचार सही हैं, लेकिन उन्हें एक डिजिटल प्रतिस्पर्धा कानून के समर्थन की आवश्यकता है, जो इसके 2024 के मसौदे के बाद से अटका हुआ है।
    • विज्ञापन मॉडल की ओर झुकाव: जैसे-जैसे प्लेटफॉर्म विज्ञापन मॉडल की ओर बढ़ रहा है, इसकी सर्वव्यापी उपयोगिता को देखते हुए उच्चतम स्तर की नियामक निगरानी की आवश्यकता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत और उसके पड़ोसी देश—संबंध; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: 2021 के तख्तापलट के पांच साल बाद, म्यांमार की सेना ने 2025 के अंत और जनवरी 2026 के बीच “चुनाव” आयोजित किए, जिन्हें सेना समर्थित दल USDP ने जीता।
  • मुख्य बिंदु:
    • नियंत्रित भागीदारी: 330 टाउनशिप में से केवल 265 में मतदान की अनुमति दी गई थी; प्रतिरोध के प्रभाव वाले ग्रामीण क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर बाहर रखा गया था।
    • मतदान में गिरावट: मतदान प्रतिशत गिरकर लगभग 55% रह गया (2015/2020 में 70% था), जो इस पूर्व-निर्धारित प्रक्रिया के प्रति व्यापक जन-अस्वीकृति को दर्शाता है।
    • विश्वसनीयता की कमी: सैन्य जुंटा ने NLD जैसे प्रमुख विपक्षी दलों को भंग कर दिया और वरिष्ठ नेताओं को जेल में डाल दिया।
    • शरणार्थी संकट: भारत वर्तमान में मिजोरम और मणिपुर में म्यांमार के 90,100 विस्थापित नागरिकों की मेजबानी कर रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “एक्ट ईस्ट पॉलिसी”, “क्षेत्रीय स्थिरता” और “गैर-पारंपरिक सुरक्षा खतरे” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रणनीतिक दुविधा: भारत को सुरक्षा और कनेक्टिविटी के लिए शासन के साथ संबंध बनाए रखने होंगे, साथ ही जुंटा को वैध ठहराए बिना लोकतांत्रिक परिवर्तन का समर्थन करना होगा।
    • परियोजनाओं में देरी: ‘कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट’ और ‘त्रिपक्षीय राजमार्ग’ जैसी प्रमुख पहलें सीमा पर असुरक्षा के कारण बार-बार देरी का सामना कर रही हैं।
    • साइबर गुलामी: सीमावर्ती संघर्ष क्षेत्रों में साइबर घोटाले (Cyber Scam) केंद्र एक उभरते खतरे के रूप में सामने आए हैं; 2022 से अब तक इन नेटवर्कों से 2,165 भारतीयों को बचाया गया है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक सशक्तिकरण)।

  • संदर्भ: विद्वान जी.एन. देवी का सुझाव है कि मातृभाषाएं और सांस्कृतिक संकेतक आगामी 2027 की जाति जनगणना की तकनीकी चुनौतियों को हल कर सकते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • प्रणाली पर बहस: कुछ लोग “खुले क्षेत्र” (Open Field – जो 2011 SECC में उपयोग हुआ) की वकालत करते हैं, जबकि अन्य “पूर्व-संकलित सूची” (Pre-compiled List – जो बिहार के सर्वेक्षण में उपयोग हुई) को बेहतर मानते हैं।
    • डेटा का सरलीकरण: 2011 के SECC में 46 लाख जातियों के नाम सामने आए थे; भाषाई मॉडलिंग के माध्यम से इन्हें एक व्यापक और प्रबंधनीय सूची में बदला जा सकता है।
    • DNT का अलगाव: विमुक्त जनजातियों (Denotified Tribes – DNTs) की अलग से गणना न करना 10 करोड़ से अधिक लोगों को हाशिए पर धकेल सकता है।
    • संदर्भ बिंदु: भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की “पीपल ऑफ इंडिया” जैसी परियोजनाएं सत्यापन के लिए महत्वपूर्ण आधार हो सकती हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जाति जनगणना”, “जनजातीय अधिकार” और “योजना निर्माण में सामाजिक सांख्यिकी” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • मातृभाषा का नेतृत्व: यह प्रक्रिया 2011 की भाषाई जनगणना के समान हो सकती है, जिसने 19,000 मातृभाषाओं को 1,369 सत्यापित भाषाओं में संक्षिप्त किया था।
    • साझा पहचान: सांसी/कंजर समुदाय के उदाहरण का उपयोग करते हुए, देवी बताते हैं कि कैसे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों को एक साझा भाषा (भक्तु) और पूर्वजों के माध्यम से जोड़ा जा सकता है।
    • स्वतंत्र जांच: इस वैज्ञानिक मॉडल के लिए आवश्यक है कि सरकार स्वतंत्र विद्वानों द्वारा जांच के लिए डेटा को खुला रखे।

संपादकीय विश्लेषण

09 फरवरी, 2026
GS-2 राजव्यवस्था संसदीय जवाबदेही

‘सुरक्षा आधार’ पर प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही धन्यवाद प्रस्ताव अपनाया गया। पारंपरिक उत्तर को छोड़ना कार्यकारी जवाबदेही के मूल क्षरण के रूप में देखा जाता है।

GS-2 शासन / GS-1 समाज सोशल मीडिया प्रतिबंध पर बहस

गाजियाबाद त्रासदी के बाद नाबालिगों के लिए प्रतिबंध की मांग बढ़ी है। तकनीकी खामियां और लैंगिक असमानता (केवल 33% महिला इंटरनेट उपयोगकर्ता) दर्शाती है कि प्रतिबंध उल्टा असर कर सकते हैं।

GS-2/1 सामाजिक जाति गणना के संकेतक

46 लाख जाति नामों को छांटने के लिए मातृभाषा का उपयोग। भाषाई मॉडलिंग आगामी 2027 की जनगणना की तकनीकी चुनौतियों का समाधान कर सकती है।

संसद: प्रधानमंत्री के जवाब को छोड़ना महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सुरक्षा बहसों से बचने के लिए एक परेशान करने वाली मिसाल के रूप में कार्य करता है।
तकनीक: सांकेतिक सोशल मीडिया प्रतिबंधों के बजाय कानूनी रूप से लागू होने योग्य “देखभाल के कर्तव्य” दायित्वों की आवश्यकता है।
पड़ोस: सीमावर्ती असुरक्षा कालादान मल्टी-मॉडल प्रोजेक्ट और त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी प्रमुख परियोजनाओं के लिए खतरा है।
समाज: भाषाई जनगणना पद्धति 19,000 मातृभाषाओं को प्रबंधनीय सत्यापित पहचान संकेतकों में बदल सकती है।
GS-4
जवाबदेही
पारदर्शिता बनाम सुविधा: संसदीय उत्तर तंत्र केवल समारोह नहीं हैं; वे लोकतांत्रिक जवाबदेही की आधारशिला हैं। सच्ची संस्थागत शक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को खुले तौर पर संबोधित करने में निहित है, न कि अनिवार्य कार्यकारी जांच से बचने के लिए “विश्वसनीय इनपुट” का हवाला देने में।

यहाँ अविभाजित सीमाओंरामसर स्थल संरक्षण के मील के पत्थर, और रणनीतिक विज्ञान बुनियादी ढांचे पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

इस सप्ताह का एक प्रमुख आकर्षण भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते में निहित “मानचित्र संदेश” है।

  • रणनीतिक बदलाव: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) द्वारा जारी आधिकारिक मानचित्र में संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को—जिसमें ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ (PoK) और ‘अक्साई चिन’ भी शामिल हैं—भारत के हिस्से के रूप में दर्शाया गया है।
  • महत्व: यह विशिष्ट अमेरिकी सरकारी मानचित्रों की उस पुरानी पद्धति से एक बड़ा विचलन है जो इन क्षेत्रों को विवादित के रूप में दर्शाते थे। आपकी तैयारी के लिए, मानचित्र पर अक्साई चिन (जिस पर चीन का दावा है) और PoK की स्थिति को पहचानें, जो इस “प्रतीकात्मक राजनयिक मान्यता” को प्रदर्शित करता है।

फरवरी 2026 की शुरुआत तक, भारत ने 98 रामसर स्थलों का ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल कर लिया है, जो एशिया में इसकी अग्रणी स्थिति को बनाए रखता है।

नया रामसर स्थलजिला / राज्यमुख्य जैव विविधता
पटना पक्षी अभयारण्यएटा, उत्तर प्रदेश178 से अधिक प्रवासी पक्षी प्रजातियों के लिए एक महत्वपूर्ण विश्राम स्थल; यह विशेष रूप से सारस क्रेन के लिए जाना जाता है।
छारी-ढंढ (Chhari-Dhand) आर्द्रभूमिकच्छ, गुजरातबन्नी घास के मैदानों में स्थित एक मौसमी मरुस्थलीय आर्द्रभूमि; यह ‘कैराकल’ (Caracal), मरुस्थलीय लोमड़ी और धूसर भेड़िये (Grey Wolf) का घर है।

राज्यों की रैंकिंग: तमिलनाडु 20 स्थलों के साथ राष्ट्रीय स्तर पर शीर्ष पर बना हुआ है, उसके बाद उत्तर प्रदेश 11 स्थलों के साथ दूसरे स्थान पर है।

लद्दाख का उच्च-ऊंचाई वाला पठार अंतरिक्ष और सौर अनुसंधान के लिए एक वैश्विक केंद्र (Hub) बन रहा है।

  • राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (NLST): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास मानचित्रित किया गया है। कम वायुमंडलीय हस्तक्षेप और उच्च-ऊंचाई वाली स्पष्टता के कारण यह स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • आदित्य-L1 अवलोकन: फरवरी 2026 की शुरुआत में वैज्ञानिकों के लिए भारत के सौर मिशन के डेटा का उपयोग करने हेतु “अवसर की घोषणा” (Announcement of Opportunity) का पहला चक्र शुरू हो गया है।

16वें वित्त आयोग (2026–31) ने आधिकारिक तौर पर दो नई आपदा श्रेणियों के मानचित्रण और वित्तपोषण की सिफारिश की है।

  • लू (Heatwaves) और बिजली गिरना (Lightning): इन्हें अब राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित आपदाओं के रूप में शामिल किया गया है।
  • मानचित्रण की आवश्यकता: अपने भूगोल के नोट्स के लिए, पूर्वी और मध्य भारत में “बिजली गलियारे” (Lightning Corridor) और उत्तर-पश्चिमी व मध्य भारत में “लू पट्टी” (Heatwave Belt) को राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) के वित्तपोषण के लिए उच्च-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में चिह्नित करें।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
क्षेत्रीय मानचित्रअविभाजित J&K और लद्दाखUSTR अंतरिम व्यापार मानचित्र
रामसर स्थल अग्रणीतमिलनाडु (20 स्थल)दक्षिण भारत
अंतरिक्ष केंद्रपैंगोंग झीललद्दाख (NLST साइट)
नया आपदा मानचित्रबिजली और लूमध्य और उत्तर-पश्चिमी भारत

मानचित्र पर “बिजली गलियारे” को चिह्नित करते समय ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि यहाँ बिजली गिरने की घटनाएं सर्वाधिक होती हैं। इसी प्रकार, लू के लिए राजस्थान और हरियाणा के साथ-साथ तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के आंतरिक हिस्सों को भी देखें।

मानचित्रण विवरण

अविभाजित सीमाएं एवं रणनीतिक ग्रिड
मानचित्रण कूटनीति अविभाजित जम्मू-कश्मीर व्यापार मानचित्र

आधिकारिक USTR मानचित्र जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाता है—यह एक प्रमुख कूटनीतिक बदलाव है।

आपदा मानचित्रण अधिसूचित सुभेद्यता

लू (हीटवेव) और बिजली गिरना अब अधिसूचित आपदाएं हैं। प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में हीटवेव बेल्ट (उत्तर-पश्चिम भारत) और बिजली कॉरिडोर (मध्य भारत) शामिल हैं।

आर्द्रभूमि मील के पत्थर (रामसर)
98 स्थलों का मील का पत्थर

98 स्थलों के साथ भारत एशिया में अग्रणी है। प्रमुख अपडेट में पटना पक्षी अभयारण्य (UP) और बन्नी घास के मैदानों में स्थित मरुस्थलीय आर्द्रभूमि छारी-ढांढ (GJ) शामिल हैं।

अंतरिक्ष एवं सौर विज्ञान
लद्दाख अनुसंधान बुनियादी ढांचा

नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप (NLST) को पेंगोंग झील, लद्दाख में स्थापित किया गया है, जिसे इसके अत्यंत स्वच्छ उच्च-ऊंचाई वाले वातावरण के लिए चुना गया है।

आदित्य-L1 डेटा एकीकरण

फरवरी 2026 की शुरुआत सौर डेटा विश्लेषण के पहले वैज्ञानिक चक्र को चिह्नित करती है, जो लद्दाख को भारत के प्राथमिक उच्च-ऊंचाई वाले अंतरिक्ष हब के रूप में मजबूत करती है।

क्षेत्रीय अविभाजित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।
आर्द्रभूमि अग्रणी तमिलनाडु (20 रामसर स्थल)।
अंतरिक्ष हब पेंगोंग झील (NLST स्थल)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 16वें वित्त आयोग द्वारा **हीटवेव और बिजली गिरने** को शामिल करने के लिए मानक भौतिक मानचित्र पर शहरी हीट-आइलैंड और मध्य-भारतीय वायुमंडलीय गलियारों के एक नए विषयगत ओवरले की आवश्यकता है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 7 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन : 1870 के दशक से 1947 तक” संगठित राष्ट्रवाद के उदय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन की त्रासदी तक के भारतीय संघर्ष का व्यापक इतिहास प्रस्तुत करता है।

1870 और 1880 के दशक तक भारतीयों के बीच एक नई राजनीतिक चेतना पैदा हो चुकी थी। लोग यह महसूस करने लगे थे कि भारत के संसाधनों और यहाँ के लोगों के जीवन पर अंग्रेजों का नियंत्रण है। जब तक यह नियंत्रण खत्म नहीं होता, भारत यहाँ के लोगों का नहीं हो सकता।

  • प्रारंभिक संस्थाएँ: 1850 के बाद कई राजनीतिक संगठन अस्तित्व में आए, जैसे— पुणे सार्वजनिक सभा, इंडियन एसोसिएशन, मद्रास महाजन सभा और बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन। इनका नेतृत्व मुख्य रूप से अंग्रेजी शिक्षित पेशेवरों (जैसे वकील) द्वारा किया गया।
  • कांग्रेस की स्थापना: ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना दिसंबर 1885 में बंबई (मुंबई) में हुई। इसमें देशभर के 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
  • प्रारंभिक नेतृत्व: शुरुआती नेताओं में दादाभाई नौरोजी (जिन्हें ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है), फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और रोमेश चंद्र दत्त शामिल थे। नौरोजी उस समय लंदन में रहते थे और ब्रिटिश संसद के सदस्य भी थे।
  • नरमपंथी मांगें (Moderates): अपने पहले बीस वर्षों में कांग्रेस “नरमपंथी” रही। उन्होंने सरकार में भारतीयों को अधिक जगह देने, विधान परिषदों को अधिक शक्तिशाली बनाने और सिविल सेवा परीक्षा भारत में भी आयोजित करने की मांग की। उन्होंने भेदभावपूर्ण ‘आर्म्स एक्ट’ को निरस्त करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी मांग की।
  • कट्टरपंथी नेता: 1890 के दशक तक विपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) जैसे नेताओं ने नरमपंथियों की “प्रार्थना की राजनीति” की आलोचना शुरू कर दी। उन्होंने आत्मनिर्भरता और रचनात्मक कार्यों पर जोर दिया।
  • तिलक का नारा: तिलक ने प्रसिद्ध नारा दिया— “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा!”
  • बंगाल विभाजन (1905): वायसराय कर्जन ने “प्रशासनिक सुविधा” का बहाना बनाकर बंगाल का विभाजन कर दिया। वास्तविक उद्देश्य बंगाली राजनेताओं के प्रभाव को कम करना और जनता को बांटना था।
  • स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: इस विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। इसने ब्रिटिश शासन का विरोध किया, भारतीय शिक्षा और उद्योगों को बढ़ावा दिया और ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार का आह्वान किया।

महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, जहाँ उन्होंने नस्लभेदी प्रतिबंधों के खिलाफ अहिंसक आंदोलनों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था।

  • प्रारंभिक अभियान: भारत आने के बाद पहले साल गांधीजी ने पूरे देश का दौरा किया। बाद में उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद के स्थानीय आंदोलनों का नेतृत्व किया।
  • रौलट एक्ट (1919): इस कानून के जरिए सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने की शक्ति मिल गई।
  • सत्याग्रह: गांधीजी ने इस कानून के खिलाफ ‘अपमान और प्रार्थना’ दिवस और हड़ताल का आह्वान किया। यह अंग्रेजों के खिलाफ पहला अखिल भारतीय संघर्ष था।
  • जलियाँवाला बाग हत्याकांड: बैसाखी के दिन अमृतसर में जनरल डायर द्वारा किए गए नरसंहार के खिलाफ पूरे देश में आक्रोश फैल गया। इसके विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि वापस कर दी।
  • खिलाफत आंदोलन: मोहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में तुर्की के खलीफा के सम्मान की रक्षा के लिए यह आंदोलन शुरू हुआ।
  • असहयोग आंदोलन (1920): गांधीजी ने खिलाफत और स्वराज की मांग को जोड़कर एक विशाल आंदोलन शुरू किया। भारतीयों ने सरकारी स्कूलों, अदालतों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया।
  • आंदोलन का अंत: 1922 में चौरी-चौरा की घटना (जहाँ भीड़ ने एक पुलिस थाने को जला दिया था और 22 पुलिसकर्मी मारे गए थे) के बाद गांधीजी ने अचानक आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे हिंसा के सख्त खिलाफ थे।

1920 के दशक के मध्य के बाद, गाँवों में रचनात्मक कार्यों और नए राजनीतिक बदलावों के कारण राष्ट्रीय आंदोलन को और गति मिली।

  • साइमन कमीशन (1927): भारत के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने के लिए इंग्लैंड से एक आयोग भेजा गया, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे भारत में इसका विरोध “साइमन गो बैक” के नारों के साथ हुआ।
  • पूर्ण स्वराज (1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित किया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
  • नमक मार्च (1930): गांधीजी ने साबरमती से दांडी तक की यात्रा की ताकि नमक कानून को तोड़ा जा सके। नमक पर राज्य का एकाधिकार था और एक बुनियादी ज़रूरत पर टैक्स लगाना गांधीजी को अन्यायपूर्ण लगा।
  • 1935 का अधिनियम: भारत सरकार अधिनियम 1935 ने ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ प्रदान की। 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रांतों में सरकार बनाई।

संघर्ष का अंतिम चरण द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ।

  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया। अंग्रेजों ने भीषण दमन किया, हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया, लेकिन विद्रोह पूरे देश में फैल गया।
  • आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA): सुभाष चंद्र बोस ने बाहरी सहायता से भारत को स्वतंत्र कराने के लिए आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की।
  • वार्ता का दौर: युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ बातचीत शुरू की। लेकिन लीग मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग पर अड़ी रही।

स्वतंत्रता की खुशी देश के विभाजन की हिंसा के कारण फीकी पड़ गई।

  • कूटनीति की विफलता: 1946 का ‘कैबिनेट मिशन’ एक एकीकृत भारत के ढांचे पर सहमति बनाने में विफल रहा। इसके बाद मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ (Direct Action Day) का आह्वान किया।
  • विभाजन (1947): अंततः भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन देश भारत और पाकिस्तान में बंट गया।
  • मानवीय क्षति: विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। हज़ारों महिलाओं को अकल्पनीय अत्याचारों का सामना करना पड़ा।
  1. 1885: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना।
  2. 1905: बंगाल का विभाजन।
  3. 1915: गांधीजी का भारत आगमन।
  4. 1919: रौलट सत्याग्रह और जलियाँवाला बाग।
  5. 1930: दांडी यात्रा (सविनय अवज्ञा आंदोलन)।
  6. 1942: भारत छोड़ो आंदोलन।
  7. 1947: भारत की स्वतंत्रता और विभाजन।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 11

राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन: 1870 के दशक से 1947 तक

उदय
1885: 72 प्रतिनिधियों के साथ बॉम्बे में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन; प्रारंभिक नेतृत्व ‘मध्यमार्गी’ था।
गरम दल: लाल-बाल-पाल ने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया; तिलक ने नारा दिया, “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!”
स्वदेशी
1905: बंगाल के विभाजन ने स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया, जिसने ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की वकालत की।
गांधीवादी युग और स्वतंत्रता का मार्ग
आगमन (1915): गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे; रॉलेट सत्याग्रह (1919) के रूप में पहले अखिल भारतीय संघर्ष का नेतृत्व किया।
असहयोग: गांधी ने खिलाफत और स्वराज की मांगों को मिलाया (1920) लेकिन चौरी-चौरा की घटना (1922) के बाद इसे वापस ले लिया।
सविनय अवज्ञा: नेहरू (1929) के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रखा गया। 1930 में गांधी ने दांडी में नमक कानून तोड़ा।
भारत छोड़ो (1942): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान “करो या मरो” के नारे के साथ शुरू हुआ, जिससे व्यापक जन-आंदोलन हुआ।
विभाजन (1947): स्वतंत्रता प्राप्त हुई लेकिन यह विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी के साथ आई।

रॉलेट एक्ट

1919 का ‘काला कानून’ जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया।

दांडी मार्च

एक बुनियादी जरूरत पर राज्य के एकाधिकार को तोड़ने के लिए दांडी तक 240 मील की यात्रा।

आज़ाद हिंद फ़ौज

सुभाष चंद्र बोस द्वारा फिर से संगठित की गई भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA)।

राष्ट्र की आत्मा
राष्ट्रीय आंदोलन जनचेतना की एक यात्रा थी। इसने औपनिवेशिक प्रांतों के समूह को एक एकीकृत राष्ट्र में बदल दिया, जिसने अहिंसा और निरंतर संघर्ष के माध्यम से आत्मनिर्णय के अपने अधिकार को पुनः प्राप्त किया।

संसदीय समितियाँ संसद की “आँख और कान” कहलाती हैं। चूंकि संसद एक विशाल निकाय है और उसके पास समय सीमित होता है, इसलिए वह प्रत्येक विधायी और कार्यकारी कार्रवाई की विस्तार से जाँच नहीं कर सकती। यह कार्य समितियों को सौंपा जाता है, जो दलीय राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष रूप से कार्य करती हैं।

समितियाँ दो प्रकार की होती हैं:

  1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees): ये स्थायी प्रकृति की होती हैं और प्रत्येक वर्ष पुनर्गठित की जाती हैं।
  2. तदर्थ समितियाँ (Ad Hoc Committees): ये अस्थायी होती हैं, जिन्हें किसी विशिष्ट कार्य के लिए बनाया जाता है और कार्य पूरा होने पर इन्हें भंग कर दिया जाता है।

यह अनुभाग परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

  • स्थापना: पहली बार 1921 में (भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत) गठित की गई।
  • संरचना: इसमें कुल 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)।
  • कार्यकाल: 1 वर्ष।
  • भूमिका: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के ऑडिट रिपोर्टों की जाँच करना।
  • मुख्य विशेषता: कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता। 1967 से यह परंपरा रही है कि इस समिति का अध्यक्ष आमतौर पर विपक्ष से होता है।
  • याद रखने की ट्रिक: इसे प्राकलन समिति की “जुड़वां बहन” कहा जाता है।
  • स्थापना: जॉन मथाई की सिफारिश पर (1950)।
  • संरचना: इसमें कुल 30 सदस्य होते हैं (सभी 30 सदस्य केवल लोकसभा से होते हैं)।
  • विशेष नोट: इसमें राज्यसभा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता।
  • भूमिका: सार्वजनिक व्यय में ‘मितव्ययिता’ (Economy) के सुझाव देना। इसे अक्सर ‘सतत मितव्ययिता समिति’ (Continuous Economy Committee) कहा जाता है।
  • मुख्य विशेषता: यह संसद की सबसे बड़ी समिति है।
  • स्थापना: कृष्णा मेनन समिति की सिफारिश पर (1964)।
  • संरचना: इसमें 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)।
  • भूमिका: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) की रिपोर्ट और खातों की जाँच करना।
  • कुल संख्या: वर्तमान में ऐसी 24 समितियाँ हैं।
  • संरचना: प्रत्येक समिति में 31 सदस्य होते हैं (21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से)।
  • भूमिका: इनका मुख्य कार्य कार्यपालिका की संसद के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से लोकसभा में मतदान से पहले ‘अनुदान की माँगों’ की विस्तृत जाँच करना।
समितिउद्देश्य
कार्य सलाहकार समिति (Business Advisory Committee)सदन के कार्यक्रम और समय-सारणी को विनियमित करती है।
अधीनस्थ विधान संबंधी समिति (Subordinate Legislation)यह जाँच करती है कि कार्यपालिका अपनी “नियम और उपविधि” बनाने की शक्ति का प्रयोग संसद द्वारा दी गई सीमाओं के भीतर कर रही है या नहीं।
आचार समिति (Ethics Committee)सदस्यों के दुर्व्यवहार के मामलों की जाँच करके अनुशासन और मर्यादा बनाए रखती है।
विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee)सदन या उसके सदस्यों के “विशेषाधिकार हनन” के मामलों की जाँच करती है।
विशेषतालोक लेखा समिति (PAC)प्राकलन समितिसार्वजनिक उपक्रम समिति
सदस्य संख्या22 (15 LS + 7 RS)30 (केवल लोकसभा)22 (15 LS + 7 RS)
अध्यक्षआमतौर पर विपक्ष सेआमतौर पर सत्ता पक्ष सेलोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त
मुख्य कार्यखर्च होने के बाद जाँच (Post-mortem)कार्यक्षमता और बचत के सुझाव देनाPSUs का ऑडिट करना
CAG से संबंधCAG के साथ मिलकर कार्य करती हैकोई प्रत्यक्ष संबंध नहींPSUs पर CAG की रिपोर्ट जाँचती है

हमेशा याद रखें कि प्राकलन समिति ही एकमात्र ऐसी वित्तीय समिति है जिसमें राज्यसभा का कोई भी सदस्य शामिल नहीं होता है। इसके अलावा, इन तीनों वित्तीय समितियों में किसी भी मंत्री को सदस्य के रूप में नहीं चुना जा सकता।

संसदीय निगरानी • “आँख और कान”
स्थायी और वित्तीय समितियाँ

लोकतंत्र के समीक्षक

लोक लेखा समिति (PAC)
1921 में स्थापित। 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा)। CAG रिपोर्टों की जाँच करके व्यय की “शव-परीक्षा” (post-mortem) करती है।
विभागीय समितियाँ (DRSCs)
31 सदस्यों वाली 24 विभागीय समितियाँ (21 लोकसभा, 10 राज्यसभा)। अनुदानों की जाँच के माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं।
प्राकलन समिति (1950)
संरचना: 30 सदस्य, सभी केवल लोकसभा से। यह सबसे बड़ी संसदीय समिति है।
उद्देश्य: इसे ‘सतत मितव्ययिता समिति’ के रूप में जाना जाता है; यह सार्वजनिक व्यय में दक्षता और बचत के सुझाव देती है।
सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU)
संरचना: 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा)। दक्षता सुनिश्चित करने के लिए PSUs के खातों और संबंधित CAG रिपोर्टों की जाँच करती है।

कार्य मंत्रणा समिति

सदन के कार्यक्रम और समय सारणी को विनियमित करती है। इसकी अध्यक्षता अध्यक्ष/सभापति करते हैं।

अधीनस्थ विधान

यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका संसद द्वारा सौंपे गए अधिकारों की सीमा के भीतर ही नियम और उपनियम बनाए।

आचार एवं विशेषाधिकार

सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए सदस्यों के दुराचार और “विशेषाधिकार हनन” के मामलों की जाँच करती है।

गैर-पक्षपाती
ढाल
संसदीय समितियाँ एक ‘लघु-संसद’ के रूप में कार्य करती हैं जहाँ सदस्य दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करते हैं। विशेष रूप से, एक मंत्री को PAC, प्राकलन या COPU में नहीं चुना जा सकता। 1967 से, PAC का अध्यक्ष पारंपरिक रूप से विपक्ष से होता है, जो सरकार के वित्तीय निर्णयों का निष्पक्ष ऑडिट सुनिश्चित करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (7 फ़रवरी, 2026) दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: 5 फरवरी को मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स में एक अवैध ‘रैट-होल’ कोयला खदान में हुए विस्फोट में कम से कम 18 श्रमिकों की मृत्यु हो गई (बाद में यह संख्या बढ़कर 25 हो गई)। यह घटना शासन की विफलता और न्यायिक प्रतिबंधों के निष्प्रभावी होने को उजागर करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • प्रणालीगत विफलता: यह त्रासदी इस बात की “कठोर याद दिलाती है” कि अदालती निगरानी (जैसे 2014 का नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) प्रतिबंध) प्रभावी राज्य शासन का विकल्प नहीं हो सकती।
    • परिचालन संबंधी मानदंड: रैट-होल खनन इसलिए जारी है क्योंकि इसमें न्यूनतम निवेश की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें इंजीनियर द्वारा निर्मित छत और दीवारों की सुरक्षा का अभाव होता है, जिससे खदान धंसने की घटनाएं बार-बार होती हैं।
    • जवाबदेही का अभाव: भूमि के स्वामित्व का विखंडन और निजी मालिकाना हक खदान संचालकों को श्रमिकों को औपचारिक रिकॉर्ड से बाहर रखने और दुर्घटनाओं की कम रिपोर्टिंग करने की अनुमति देते हैं।
    • आपूर्ति श्रृंखला की सफाई (Laundering): अवैध कोयले को बिचौलियों के माध्यम से वैध बाजारों में आसानी से मिला दिया जाता है, जिससे नीलामी वाले कोयले और अवैध कोयले के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरणीय शासन”, “पूर्वोत्तर भारत की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां” और “सतत खनन नीति” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • निवारक के रूप में तकनीक: संपादकीय अवैध परिवहन की लागत बढ़ाने के लिए कोयला ले जाने वाले वाहनों के लिए अनिवार्य GPS ट्रैकिंग, ड्रोन गश्त और उपग्रह चित्रों के उपयोग की वकालत करता है।
    • विकल्पों की आवश्यकता: विकल्प प्रदान किए बिना प्रतिबंध अक्सर विफल हो जाते हैं; राज्य को खनन क्षेत्र के मजदूरों को खपाने के लिए बागवानी, पर्यटन और लघु विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए ऋण और बाजार संपर्क प्रदान करना चाहिए।
    • प्रशासनिक सुधार: स्थानीय संरक्षण (Patronage) का मुकाबला करने के लिए, संपादकीय संवेदनशील जिलों में प्रशासनिक पदों के रोटेशन और सामुदायिक निगरानी को प्रोत्साहित करने के लिए स्थानीय निकायों के साथ जुर्माने की राशि साझा करने का सुझाव देता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; जलवायु परिवर्तन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: COP30 के बाद वैश्विक जलवायु वार्ताओं में आई संरचनात्मक गिरावट का एक आलोचनात्मक विश्लेषण, जहाँ प्रक्रियाएं तो बढ़ी हैं लेकिन वास्तविक कार्रवाई रुक गई है।
  • मुख्य बिंदु:
    • विज्ञान की राजनीति: वैज्ञानिकों की निश्चितता का उपयोग राजनेताओं द्वारा देरी को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है, यह तर्क देते हुए कि निर्णायक कार्रवाई का समय “अभी नहीं आया है।”
    • “ग्लोबल मुतिराओ” (Global Mutirão) पैकेज: COP30 ने सहयोग पर जोर देने वाला एक पैकेज प्रदान किया, लेकिन इसके उपाय काफी हद तक स्वैच्छिक हैं, जो “समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” (CBDR) के सिद्धांत को कमजोर करते हैं।
    • वित्त का अंतराल: विकासशील देशों के लिए वर्तमान जलवायु वित्त प्रवाह प्रति वर्ष 400 अरब डॉलर से कम है, जबकि वास्तविक आवश्यकता 2.4 ट्रिलियन से 3 ट्रिलियन डॉलर के बीच है।
    • बाजार की अवसरवादिता: सरकारी कार्रवाई के अभाव में, बाजार दीर्घकालिक पर्यावरणीय परिणामों के बजाय अल्पकालिक लाभ के आधार पर जलवायु अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक पर्यावरणीय राजनीति”, “UNFCCC और COP के परिणाम” तथा “जलवायु वित्त” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सार्वभौमिक वैधता: अपनी कमियों के बावजूद, UNFCCC समन्वित कार्रवाई के लिए एकमात्र सार्वभौमिक रूप से वैध मंच बना हुआ है; G-20 या BRICS जैसे विकल्पों में आवश्यक कानूनी ढांचे का अभाव है।
    • अनुकूलन (Adaptation) में ठहराव: हालांकि COP30 ने अनुकूलन वित्त को “तिगुना” करने का संकल्प लिया, लेकिन आधार वर्ष या बाध्यकारी स्रोतों की कमी के कारण यह वादा केवल एक आकांक्षा बनकर रह गया है।
    • संरचनात्मक विचलन: संपादकीय एक “शून्यता” की चेतावनी देता है जहाँ राष्ट्रीय हित वैश्विक तात्कालिकता पर हावी हो रहे हैं। लेख नोट करता है कि व्यक्ति बातचीत के मंच से तो बाहर निकल सकता है (hop off), लेकिन इस ग्रह से बाहर नहीं निकल सकता।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल ही में संपन्न व्यापार समझौते का विश्लेषण, जो केवल वाणिज्यिक हितों से हटकर एक व्यापक रणनीतिक पुनर्गठन का संकेत देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • भू-राजनीतिक झुकाव: “डोनरो डॉक्ट्रिन” (अमेरिकी वाणिज्यिक आक्रामकता) और चीन व रूस के खतरों से प्रेरित यह सौदा एक संघर्षपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थिर करने का लक्ष्य रखता है।
    • शिखर सम्मेलन कूटनीति: इस सफलता का श्रेय 10 वर्षों के उच्च-स्तरीय जुड़ाव और स्पष्ट विचारों के आदान-प्रदान को दिया जाता है जिसने नई दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच आपसी विश्वास पैदा किया।
    • रणनीतिक बहुध्रुवीयता: यह साझेदारी बहुध्रुवीयता को व्यावहारिक अर्थ देने का एक “दुर्लभ अवसर” प्रदान करती है, जो विकास और सुरक्षा के लिए एक लोकतांत्रिक विकल्प पेश करती है।
    • आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन: सेमीकंडक्टर, एआई (AI) और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर सहयोग का उद्देश्य आपसी कमजोरियों को कम करना है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ संबंध”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “वैश्विक मूल्य श्रृंखला” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • टैरिफ से परे: यदि यह समझौता केवल बाजार पहुंच तक सीमित रहता है, तो यह केवल सामरिक (Tactical) बनकर रह जाएगा; इसे रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और गतिशीलता के क्षेत्रों में और अधिक विस्तार देने की आवश्यकता है।
    • समुद्री स्थिरता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास और सूचना साझा करने के बढ़ते अवसर मौजूद हैं।
    • सामाजिक गहराई: छात्रों और शोधकर्ताओं की आवाजाही के माध्यम से राजनीतिक तालमेल को सामाजिक गहराई में बदलने के लिए वीजा और पेशेवर मान्यता संबंधी विवादों को हल किया जाना चाहिए।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत और इसके पड़ोसी; क्षेत्रीय नीतियों का प्रभाव)।

  • संदर्भ: जनवरी 2026 के अंत में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा किए गए समन्वित हमले पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत में हिंसा के गहरे होते चक्र पर जोर देते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • गहराता अलगाव: राज्य की दमनकारी कार्रवाई और उग्रवाद विरोधी अभियान, जिनमें जबरन गायब करना (Enforced disappearances) और न्यायेतर हत्याएं शामिल हैं, ने उसी उग्रवाद को बढ़ावा दिया है जिसे वे कुचलना चाहते हैं।
    • संसाधन संघर्ष: बलूच राष्ट्रवादियों का तर्क है कि 60 अरब डॉलर की CPEC जैसी परियोजनाएं न्यूनतम पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों के लिए सीमित आर्थिक लाभ के साथ आगे बढ़ रही हैं।
    • भारत का डर (Bogey): बिना किसी सत्यापन योग्य साक्ष्य के अशांति के लिए बार-बार भारत को दोषी ठहराने की इस्लामाबाद की प्रवृत्ति को एक ऐसी कहानी के रूप में वर्णित किया गया है जो आवश्यक आत्मनिरीक्षण से बचती है।
    • आतंकवादी पुनर्गठन: अफगान सीमा पर बिगड़ती स्थितियों ने बलूच विद्रोहियों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अपने अभियानों को तेज़ करने की अनुमति दी है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पड़ोसी देशों की गतिशीलता”, “क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना” और “मानवाधिकार” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • प्रतिक्रियात्मक प्रतिशोध: संपादकीय नोट करता है कि सैन्य कार्रवाइयों के माध्यम से विद्रोहियों को मारना राजनीतिक समाधान के बिना स्थायी सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं होगा।
    • स्थिरता का मार्ग: शांति के लिए आर्थिक बहिष्कार की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को दूर करने और विद्रोही समूहों के साथ भी संवाद के रास्ते खोलने की आवश्यकता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन; कल्याणकारी योजनाएं; शासन के महत्वपूर्ण पहलू) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: तेलंगाना का एक दुखद मामला जहाँ एक पिता ने कथित तौर पर अपनी बेटी की हत्या कर दी ताकि वह महाराष्ट्र के “दो बच्चों के नियम” को दरकिनार कर सके और उसकी पत्नी स्थानीय चुनाव लड़ सके।
  • मुख्य बिंदु:
    • दो बच्चों का नियम: 1990 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण उपाय के रूप में कई राज्यों द्वारा लागू किया गया यह नियम दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करता है।
    • विकृत प्रोत्साहन: यह मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे कड़े पात्रता मानदंड एक परिवार के कमजोर सदस्यों के लिए चरम और अनपेक्षित परिणाम पैदा कर सकते हैं।
    • संस्थागत बाधाएं: आरोपी ने शुरू में नियम से बचने के लिए अपने बेटे को गोद देने का प्रयास किया था, लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड इसमें बाधा बन गए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जनसंख्या नीति के प्रभाव”, “पंचायती राज शासन” और “सार्वजनिक जीवन में नैतिकता” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सुनियोजित प्रकृति: जांच से पता चला कि हत्या की योजना सावधानीपूर्वक बनाई गई थी, जिसमें आरोपी ने अपनी पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढंका था और ट्रैकिंग से बचने के लिए अपना फोन पीछे छोड़ दिया था।
    • जवाबदेही बनाम अधिकार: हालांकि इस नियम का उद्देश्य जनप्रतिनिधियों के बीच जिम्मेदारी सुनिश्चित करना था, यह रिपोर्ट बताती है कि जब राजनीतिक महत्वाकांक्षा कानूनी बाधाओं से टकराती है, तो यह सामाजिक विकृतियों का कारण बन सकती है।

संपादकीय विश्लेषण

07 फरवरी, 2026
GS-3 पर्यावरण जलवायु शासन का शून्य

वित्त अंतराल $2.4 ट्रिलियन से अधिक। जहाँ COP प्रक्रियाएँ बढ़ रही हैं, वहीं राष्ट्रीय हितों के वैश्विक तत्परता पर हावी होने से वास्तविक कार्रवाई रुकी हुई है।

GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध भारत-EU: रणनीतिक महत्वपूर्ण मोड़

डोनरो सिद्धांत (Donroe Doctrine) का एक रणनीतिक विकल्प। इस समझौते का लक्ष्य सेमीकंडक्टर, AI और समुद्री क्षेत्र के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करना है।

GS-2 शासन / सामाजिक दो-बच्चा मानदंड की विकृति

तेलंगाना त्रासदी रेखांकित करती है कि स्थानीय चुनावों के लिए कड़ी पात्रता कैसे सुभेद्य परिवारों के लिए अत्यधिक और अनपेक्षित सामाजिक विकृतियाँ पैदा करती है।

शासन: उत्तर-पूर्व भारत में अवैध कोयला परिवहन की लागत बढ़ाने के लिए GPS ट्रैकिंग और ड्रोन गश्त को बढ़ाना अनिवार्य है।
पर्यावरण: देरी के बावजूद UNFCCC एकमात्र सार्वभौमिक रूप से वैध मंच है; “कोई भी इस ग्रह से बाहर नहीं कूद सकता।”
कूटनीति: भारत-यूरोपीय संघ के राजनीतिक तालमेल को सामाजिक गहराई में बदलने के लिए वीजा और पेशेवर पहचान के मुद्दों को हल करना होगा।
सामाजिक: जनसंख्या नियंत्रण नियम बुनियादी नैतिकता और मौलिक अधिकारों की कीमत पर स्थानीय लोकतंत्र में बाधक नहीं बनने चाहिए।
GS-4
विकृत प्रोत्साहन
जवाबदेही बनाम मानवता: तेलंगाना का मामला एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए कानूनी बाधाएं नैतिक तर्क के पतन का कारण बन सकती हैं। जब नीति डिजाइन मानवीय हताशा को समझने में विफल रहता है, तो वह जीवन की पवित्रता का उल्लंघन करने वाले विकृत प्रोत्साहनों को संस्थागत बनाने का जोखिम उठाता है।

यहाँ राजनयिक मानचित्रणनई समुद्री प्रजातियों की खोज और रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

7 फरवरी, 2026 की एक बड़ी राजनयिक घटना में “मानचित्रों के माध्यम से एक संदेश” दिया गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के साथ एक मानचित्र जारी किया, जिसके महत्वपूर्ण क्षेत्रीय निहितार्थ हैं।

  • रणनीतिक बदलाव: आधिकारिक अमेरिकी मानचित्र में संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को भारत के हिस्से के रूप में दर्शाया गया है।
  • मानचित्रण का महत्व: यह विवादित क्षेत्रों के लिए ‘डॉटेड लाइन्स’ (बिंदुदार रेखाओं) या टिप्पणियों का उपयोग करने की दीर्घकालिक अमेरिकी प्रथा से एक बड़ा विचलन है। इसे भारत के 1994 के संसदीय प्रस्ताव के अनुरूप एक “प्रतीकात्मक राजनयिक संकेत” के रूप में देखा जा रहा है।
  • मुख्य बिंदु: मानचित्र पर अक्साई चिन (उत्तर-पूर्वी लद्दाख) और PoK की स्थिति पहचानें—ध्यान दें कि पहली बार किसी बड़े अमेरिकी नीति दस्तावेज में इन्हें अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है।

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के शोधकर्ताओं ने बंगाल की खाड़ी के पारिस्थितिकी तंत्र में समुद्री कीड़ों (Polychaetes) की दो नई प्रजातियों का पता लगाया है।

  • स्थान: पश्चिम बंगाल तट के कीचड़ के मैदान (Mudflats) और मैंग्रोव क्षेत्र।
  • प्रजातियों के नाम:
    1. Namalycastis solenotognatha (इसकी विशिष्ट जबड़े की संरचना के आधार पर नाम)।
    2. Nereis dhritiae (ZSI की पहली महिला निदेशक, धृति बनर्जी के नाम पर)।
  • पारिस्थितिक महत्व: ये प्रजातियाँ अत्यधिक सल्फाइड युक्त और प्रदूषित वातावरण के अनुकूल हैं। ये सुंदरवन और आसपास के कीचड़ के मैदानों के स्वास्थ्य के ‘सूचक’ (Indicators) के रूप में कार्य करती हैं।

महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र में ‘ट्रैपडोर स्पाइडर’ (Trapdoor Spider) की एक नई प्रजाति दर्ज की गई है।

  • स्थान: कोल्हापुर जिला, महाराष्ट्र।
  • मानचित्रण संदर्भ: ट्रैपडोर मकड़ियाँ अद्वितीय हैं क्योंकि वे मिट्टी और रेशम से बने “ट्रैपडोर” (गुप्त द्वार) वाले बिलों में रहती हैं। यह खोज उत्तरी पश्चिमी घाट के जैव विविधता मानचित्रण में एक नया अध्याय जोड़ती है, जो क्षेत्र अपनी उच्च ‘स्थानिकता’ (Endemism) के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है।

7 फरवरी को मिली रिपोर्टों के अनुसार, भारत के “रणनीतिक सुरंग मानचित्र” (Strategic Tunnel Map) में तेजी से प्रगति हो रही है।

  • शिंकु ला सुरंग (Shinku La Tunnel): यह हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ती है। पूरा होने पर, यह 15,800 फीट की ऊंचाई के साथ दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग होगी।
  • सेला सुरंग (Sela Tunnel): यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है। यह उच्च-ऊंचाई वाले सेला दर्रे को बायपास करती है जो अक्सर बर्फबारी के कारण बंद रहता है।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
क्षेत्रीय मानचित्रअविभाजित J&K/लद्दाखभारत-अमेरिका व्यापार ढांचा मानचित्र
समुद्री खोजNereis dhritiaeपश्चिम बंगाल के कीचड़ के मैदान
दक्कन की खोजट्रैपडोर मकड़ीकोल्हापुर, महाराष्ट्र
रणनीतिक सीमातवांग कनेक्टिविटीसेला सुरंग, अरुणाचल प्रदेश

भारत-अमेरिका व्यापार मानचित्र की नई सीमाओं को चिह्नित करते समय सियाचिन हिमनद और गिलगित-बाल्टिस्तान के क्षेत्रों को विशेष रूप से देखें। यह मानचित्र केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता के अंतरराष्ट्रीय समर्थन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

मानचित्रण विवरण

मानचित्रण कूटनीति एवं जैव विविधता
संप्रभु संरेखण अविभाजित जम्मू-कश्मीर व्यापार मानचित्र

आधिकारिक USTR मानचित्र जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाता है—एक प्रमुख कूटनीतिक बदलाव।

दक्कन स्थानिकता (Endemism) मकड़ी की खोज

महाराष्ट्र में “ट्रैपडोर स्पाइडर” की एक नई प्रजाति, टाइटनिडियोप्स कोल्हापुरेंसिस, दर्ज की गई, जो उत्तरी पश्चिमी घाट के जैव विविधता मानचित्र को समृद्ध करती है।

समुद्री भूगोल
मडफ्लैट्स के जैव-योद्धा

पश्चिम बंगाल में समुद्री कीड़ों की दो नई प्रजातियों, जिनमें नेरेस धृतिया (Nereis dhritiae) शामिल है, की पहचान की गई। सल्फाइड-युक्त प्रदूषित वातावरण के अनुकूल, ये महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र संकेतकों के रूप में कार्य करते हैं।

रणनीतिक सीमा ग्रिड
उच्च-ऊंचाई वाली सुरंगें

लाहौल को ज़ांस्कर से जोड़ने वाली शिंकू ला (15,800 फीट) और अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक 365 दिन हर मौसम में पहुँच प्रदान करने वाली सेला सुरंग का मानचित्रण।

बंगाल की खाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र

सुंदरबन मडफ्लैट्स में नए पॉलीकीट्स की खोज लचीले जैविक मोर्चों के रूप में मैंग्रोव के मानचित्रण के महत्व को पुख्ता करती है।

क्षेत्रीय अविभाजित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।
समुद्री पश्चिम बंगाल मैंग्रोव मडफ्लैट्स।
रणनीतिक सेला सुरंग (तवांग पहुँच)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: अमेरिकी व्यापार दस्तावेजों में मानचित्रण परिवर्तन एक प्रमुख भू-राजनीतिक धुरी का संकेत देता है। साथ ही, कोल्हापुर में ट्रैपडोर मकड़ियों का दस्तावेजीकरण दक्कन के पठार की अमानचित्रित सूक्ष्म-स्थानिकता (micro-endemism) को उजागर करता है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 6 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया” बताता है कि औपनिवेशिक काल के दौरान नई पश्चिमी शैलियों, तकनीकों और विषयों के आगमन ने भारत की कला और वास्तुकला को कैसे बदल दिया।

अठारहवीं शताब्दी में, यूरोपीय कलाकारों का एक तांता भारत आया, जो अपने साथ तैल चित्र (Oil Painting) की तकनीक और यथार्थवाद (Realism) की अवधारणा लेकर आए। इससे वे ऐसे चित्र बनाने में सक्षम हुए जो बिल्कुल असली और जीवंत दिखते थे।

  • चित्रकला की इस शैली में भारत को एक विचित्र, ऊबड़-खाबड़ और अनगढ़ भूमि के रूप में दिखाया गया जिसे अभी ब्रिटिश शासन द्वारा “सभ्य” बनाया जाना बाकी था।
  • थॉमस डैनियल और उनके भतीजे विलियम डैनियल इस परंपरा के सबसे प्रसिद्ध परिदृश्य कलाकार थे।
  • उनके काम में अक्सर पारंपरिक भारत की छवियों (जैसे खंडहर) की तुलना ब्रिटिश “आधुनिकीकरण” के प्रतीकों (जैसे नई इमारतें और बेहतर परिवहन) के साथ की जाती थी।
  • ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय राजघरानों के लिए अपनी धन-दौलत, प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शित करने हेतु व्यक्तिचित्र (पोर्ट्रेट) बनवाना एक लोकप्रिय तरीका था।
  • भारतीय लघुचित्र परंपरा के विपरीत, ये पोर्ट्रेट आमतौर पर आदमकद (Life-size) तैल चित्र होते थे।
  • भारतीय शासकों, जैसे अवध के नवाब, ने जोहान जोफ़नी जैसे यूरोपीय चित्रकारों को औपनिवेशिक परिवेश में अपना चित्र बनाने के लिए नियुक्त किया ताकि वे ब्रिटिश शक्ति के साथ अपने जुड़ाव पर जोर दे सकें।
  • इस विधा में ब्रिटिश सैन्य विजय के विभिन्न प्रकरणों को नाटकीय रूप से चित्रित किया जाता था।
  • ये चित्र साम्राज्यवादी प्रचार (Propaganda) का काम करते थे, जो अंग्रेजों को अजेय और सर्वशक्तिमान के रूप में दिखाते थे।
  • मैसूर के टीपू सुल्तान की हार को दर्शाने वाले चित्रों की श्रृंखला इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जिन्हें ब्रिटिश विजय का जश्न मनाने के लिए लंदन में प्रदर्शित किया गया था।

ब्रिटिश सत्ता के उदय ने पारंपरिक दरबारी चित्रकारों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया, जिससे उनके संरक्षण और शैली में बदलाव आया।

  • पारंपरिक संरक्षण का पतन: जैसे-जैसे स्थानीय शासकों ने शक्ति खोई, मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रीय दरबारों के कलाकारों ने यूरोपीय तकनीकों, जैसे परिप्रेक्ष्य (Perspective) और प्रकाश के उपयोग को अपनाना शुरू कर दिया।
  • कंपनी पेंटिंग्स: कई कलाकारों ने सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के लिए काम करना शुरू किया।
    • उन्होंने “कंपनी पेंटिंग्स” तैयार कीं—जिनमें भारतीय पौधों, जानवरों, त्योहारों और व्यवसायों के चित्र थे। अंग्रेज इन्हें एक “अजीबोगरीब” (Exotic) उपनिवेश के दस्तावेज़ और स्मारिका के रूप में इकट्ठा करते थे।

उन्नीसवीं शताब्दी में, कलकत्ता जैसे बढ़ते शहरों में एक व्यापक दर्शक वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए लोकप्रिय कला का एक नया रूप उभरा।

  • कालीघाट चित्रकला: कलकत्ता के कालीघाट मंदिर में, पारंपरिक पटुआ (स्क्रॉल पेंटर्स) ने गहरे रंगों और मोटी रेखाओं का उपयोग करके एक नई शैली विकसित की।
  • सामाजिक व्यंग्य: उन्नीसवीं सदी के अंत तक, इन कलाकारों ने उन “बाबूओं” (पश्चिमी रंग में रंगे भारतीयों) का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया जो ब्रिटिश तौर-तरीकों और जीवनशैली की नकल करते थे।
  • छापाखाना (The Printing Press): लकड़ी के ब्लॉक और लिथोग्राफिक प्रिंटिंग की शुरुआत ने इन चित्रों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की अनुमति दी, जिससे ये गरीबों के लिए भी सुलभ और सस्ते हो गए।
  • फोटोग्राफी: उन्नीसवीं सदी के मध्य में फोटोग्राफी का आगमन हुआ। अंग्रेजों ने इसका उपयोग भारतीय वास्तुकला और 1857 के विद्रोह के बाद के दृश्यों को दर्ज करने के लिए किया।

जैसे-जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन ने गति पकड़ी, कलाकारों ने एक ऐसी शैली की तलाश की जो पश्चिमी यथार्थवाद की नकल के बजाय वास्तव में “भारतीय” हो।

  • राजा रवि वर्मा: वे पश्चिमी तैल चित्र तकनीकों को भारतीय पौराणिक और महाकाव्य विषयों के साथ जोड़ने वाले पहले लोगों में से थे। उनके चित्रों के प्रिंट अत्यधिक लोकप्रिय हुए और पूरे भारत के घरों में पाए जाने लगे।
  • अवनिंद्रनाथ टैगोर: उन्होंने रवि वर्मा के पश्चिमी यथार्थवाद को “भौतिकवादी” कहकर खारिज कर दिया।
    • अपने अनुयायियों के साथ, उन्होंने प्रेरणा के लिए अजंता की गुफाओं और मुगल लघुचित्रों की ओर रुख किया। उन्होंने एक आध्यात्मिक और धुंधली शैली बनाई जिसे ‘बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट’ के रूप में जाना गया।

औपनिवेशिक भारत में वास्तुकला का उपयोग ब्रिटिश सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभुत्व को भौतिक रूप से व्यक्त करने के लिए किया गया था।

  • बंबई का कायाकल्प: उन्नीसवीं सदी के मध्य में, बंबई को ‘गॉथिक रिवाइवल’ (Gothic Revival) जैसी यूरोपीय शैलियों का उपयोग करके पुनर्निर्मित किया गया, जिसकी विशेषता नुकीले मेहराब और पत्थर की नक्काशी थी।
  • विक्टोरिया टर्मिनस: यह रेलवे स्टेशन गॉथिक शैली का एक मील का पत्थर है, जिसे यूरोपीय गिरजाघर (Cathedral) जैसा दिखने के लिए डिजाइन किया गया था।
  • इंडो-सारसेनिक शैली: बाद में, अंग्रेजों ने अपनी इमारतों में गुंबद और मीनार जैसे भारतीय तत्वों को शामिल करना शुरू किया ताकि वे खुद को मुगल सम्राटों के वैध उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर सकें।
  1. यथार्थवाद (Realism): ऐसी शैली जो चीजों को वैसा ही दिखाती है जैसी वे वास्तव में दिखती हैं।
  2. परिप्रेक्ष्य (Perspective): चित्रकला की वह तकनीक जिससे दूर की चीजें छोटी और पास की चीजें बड़ी दिखाई देती हैं, जिससे गहराई का भ्रम पैदा होता है।
  3. पटुआ: कपड़े या कागज के लंबे रोल पर पेंटिंग करने वाले पारंपरिक कलाकार।
  4. इंडो-सारसेनिक: एक स्थापत्य शैली जिसमें भारतीय और यूरोपीय दोनों तत्व शामिल होते हैं।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 10

दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया

शाही सौंदर्यशास्त्र
पिक्चरस्क (मनोरम): डेनियल्स जैसे यूरोपीय कलाकारों ने भारत को एक ऊबड़-खाबड़, “अनगढ़” भूमि के रूप में चित्रित किया जो ब्रिटिश सभ्यता की प्रतीक्षा कर रही थी।
रूप-चित्रण: ब्रिटिश अधिकारियों और नवाबों द्वारा अधिकार और धन की छवि प्रदर्शित करने के लिए आदमकद तेल चित्रों का उपयोग किया गया।
कंपनी चित्रकला
साम्राज्य के स्मृति चिह्न: स्थानीय कलाकारों ने कंपनी अधिकारियों के लिए भारतीय वनस्पतियों, जीवों और त्योहारों को चित्रित करने के लिए परिप्रेक्ष्य और प्रकाश की तकनीक को अपनाया।
राष्ट्रवाद और लोकप्रिय कला
कालीघाट कला: कलकत्ता के पारंपरिक पटुआ कलाकारों ने एक जीवंत शैली विकसित की, जिसने पश्चिमी जीवनशैली की नकल करने वाले “बाबुओं” पर व्यंग्य किया।
राजा रवि वर्मा: उन्होंने पश्चिमी यथार्थवाद और तेल तकनीक को भारतीय पौराणिक कथाओं के साथ जोड़ा, जिससे चित्र हर घर तक सुलभ हो गए।
बंगाल स्कूल: अवनिंद्रनाथ टैगोर ने पश्चिमी यथार्थवाद को त्याग कर अजंता के भित्ति चित्रों और मुगल लघुचित्रों से प्रेरित एक आध्यात्मिक शैली को अपनाया।
औपनिवेशिक वास्तुकला: विक्टोरिया टर्मिनस (गोथिक पुनरुत्थान) जैसी इमारतों में ब्रिटिश प्रभुत्व को भौतिक रूप से स्थापित करने के लिए पत्थर और गुंबदों का उपयोग किया गया।
फोटोग्राफी: वास्तुकला और 1857 के विद्रोह के भयानक परिणामों को दर्ज करने के लिए 19वीं सदी के मध्य में इसका आगमन हुआ।

यथार्थवाद

पेंटिंग की एक शैली जिसका उद्देश्य लोगों और प्रकृति का जीवंत और सटीक चित्रण करना था।

गोथिक पुनरुत्थान

नुकीले मेहराबों वाली वास्तुशिल्प शैली, जिससे इमारतें यूरोपीय गिरजाघरों जैसी दिखती थीं।

लिथोग्राफी

एक मुद्रण प्रक्रिया जिसने आम जनता के लिए सस्ते चित्रों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की अनुमति दी।

सत्ता का
कैनवास
दृश्य कलाएँ पहचान का एक युद्धक्षेत्र थीं। शाही प्रचार चित्रों से लेकर बंगाल स्कूल की आध्यात्मिक धुंध तक, कला का उपयोग या तो औपनिवेशिक शासन को उचित ठहराने के लिए किया गया या स्वतंत्रता चाहने वाले राष्ट्र की आत्मा को पुनः प्राप्त करने के लिए।

भारतीय संविधान में “बजट” शब्द का कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय, अनुच्छेद 112 में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ (Annual Financial Statement) कहा गया है। यह संसद की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय घटना है, क्योंकि भारत की संचित निधि से कोई भी धन संसदीय स्वीकृति के बिना नहीं निकाला जा सकता।

बजट एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के लिए भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण होता है।

  • अनुच्छेद 112: राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ रखवाएगा।
  • पूर्व सिफारिश: बजट केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के साथ ही लोकसभा में पेश किया जाता है।
  • कानून के बिना कोई कर नहीं: विधि के प्राधिकार के बिना न तो कोई कर लगाया जाएगा और न ही एकत्र किया जाएगा (अनुच्छेद 265)।
  • व्यय का पृथक्करण: बजट में राजस्व खाते (Revenue account) पर होने वाले व्यय को अन्य व्यय से अलग दिखाना अनिवार्य है।

बजट में दो प्रकार के व्यय शामिल होते हैं:

  1. भारत की संचित निधि पर ‘भारित’ व्यय (Expenditure Charged): इन पर संसद में मतदान नहीं होता (केवल चर्चा की जा सकती है)।
    • उदाहरण: राष्ट्रपति, राज्यसभा के सभापति, लोकसभा अध्यक्ष, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और CAG के वेतन व भत्ते; सरकार के ऋण भार।
  2. संचित निधि से ‘किए जाने वाले’ व्यय (Expenditure Made/Voted): इन पर संसद में मतदान होता है और इन्हें ‘अनुदान की मांगों’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

बजट को कानून बनने के लिए इन विशिष्ट चरणों से गुजरना पड़ता है:

  1. बजट का प्रस्तुतीकरण: वित्त मंत्री द्वारा ‘बजट भाषण’ के साथ बजट पेश किया जाता है। (2017 से रेल बजट को आम बजट में मिला दिया गया है)।
  2. सामान्य चर्चा: प्रस्तुति के कुछ दिनों बाद, दोनों सदन बजट पर समग्र रूप से चर्चा करते हैं। इस चरण में कोई प्रस्ताव पेश नहीं किया जाता।
  3. विभागीय समितियों द्वारा जाँच: सामान्य चर्चा के बाद संसद 3-4 सप्ताह के लिए स्थगित हो जाती है। इस दौरान 24 विभागीय स्थायी समितियाँ अनुदान की माँगों की विस्तार से जाँच करती हैं।
  4. अनुदान की माँगों पर मतदान: लोकसभा अनुदान की माँगों पर मतदान करती है। (नोट: राज्यसभा को मांगों पर मतदान करने की कोई शक्ति नहीं है)। इसी चरण में ‘कटौती प्रस्ताव’ (Cut Motions) पेश किए जा सकते हैं:
    • नीतिगत कटौती (Policy Cut): मांग की राशि को घटाकर 1 रुपया करना (नीति की अस्वीकृति)।
    • आर्थिक कटौती (Economy Cut): मांग की राशि को एक विशिष्ट सीमा तक कम करना।
    • सांकेतिक कटौती (Token Cut): मांग की राशि में से 100 रुपये कम करना (विशिष्ट शिकायत दर्ज करना)।
  5. विनियोग विधेयक पारित करना (अनुच्छेद 114): यह विधेयक संचित निधि से धन निकालने को कानूनी मान्यता देता है। इस विधेयक में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
  6. वित्त विधेयक पारित करना (अनुच्छेद 117): यह विधेयक बजट के आय पक्ष (कराधान प्रस्तावों) को कानूनी रूप देता है।

कभी-कभी सरकार को नियमित बजट चक्र के बाहर धन की आवश्यकता होती है:

  • लेखा अनुदान (Vote on Account – अनुच्छेद 116): चूंकि बजट प्रक्रिया में समय लगता है, इसलिए लोकसभा 2 महीने के लिए सरकार चलाने हेतु कुल अनुमान का 1/6 हिस्सा अग्रिम रूप से देती है।
  • अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant – अनुच्छेद 115): जब किसी सेवा के लिए स्वीकृत राशि उस वर्ष के लिए अपर्याप्त पाई जाती है।
  • अतिरिक्त अनुदान (Excess Grant – अनुच्छेद 115): जब स्वीकृत राशि से अधिक धन खर्च हो जाता है। इसे लोकसभा में लाने से पहले लोक लेखा समिति (PAC) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
  • प्रत्ययानुदान (Vote of Credit – अनुच्छेद 116): राष्ट्रीय आपातकाल (जैसे युद्ध) के कारण किसी अप्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए दिया गया ‘ब्लैंक चेक’।
  1. भारत की संचित निधि (Consolidated Fund – अनुच्छेद 266): सरकार को प्राप्त होने वाला सारा राजस्व, ऋण और ऋण की वसूली इसी में जमा होती है। संसद की अनुमति के बिना यहाँ से पैसा नहीं निकाला जा सकता।
  2. भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund – अनुच्छेद 267): यह राष्ट्रपति के अधिकार में होती है। इसका उपयोग अप्रत्याशित खर्चों के लिए किया जाता है, जिसके लिए बाद में संसद की मंजूरी ली जाती है।
  3. भारत का लोक लेखा (Public Account – अनुच्छेद 266): इसमें भविष्य निधि (PF), बचत जमा आदि का पैसा होता है। इसके भुगतान के लिए संसदीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती (यह कार्यकारी प्रक्रिया है)।
शब्दअनुच्छेदउद्देश्य
वार्षिक वित्तीय विवरण112मुख्य बजट दस्तावेज।
विनियोग विधेयक114धन निकालने का कानूनी अधिकार।
वित्त विधेयक117कर लगाने और एकत्र करने का अधिकार।
लेखा अनुदान1162 महीने के लिए अग्रिम धन।
अनुपूरक अनुदान115स्वीकृत राशि कम पड़ने पर अतिरिक्त धन।
संचित निधि266सरकार का मुख्य खजाना।

याद रखें कि ‘गिलोटिन’ (Guillotine) वह प्रक्रिया है जिसमें अनुदान की मांगों के लिए आवंटित समय समाप्त होने पर, शेष सभी मांगों को बिना चर्चा के सीधे मतदान के लिए रख दिया जाता है। यह बजट सत्र के अंतिम दिनों में होता है।

वार्षिक वित्तीय विवरण • अनु. 112
सार्वजनिक वित्त और बजट

केंद्रीय बजट

अनुच्छेद 112
इसे वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में संदर्भित किया जाता है। यह वित्तीय वर्ष के लिए अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण है।
भारित व्यय
गैर-मतदेय व्यय (जैसे, राष्ट्रपति/न्यायाधीशों के वेतन)। इस पर चर्चा की अनुमति है लेकिन मतदान नहीं होता है।
बजट पारित होने के चरण
1. प्रस्तुतिकरण: लोकसभा में वित्त मंत्री द्वारा।
2. सामान्य चर्चा: दोनों सदन कुल आंकड़ों पर चर्चा करते हैं।
3. जांच: 24 विभागीय समितियां अनुदान मांगों की जांच करती हैं।
4. मतदान: केवल लोकसभा में किया जाता है।
5. विनियोग विधेयक (अनु. 114): संचित निधि से निकासी को कानूनी रूप देता है।
6. वित्त विधेयक (अनु. 117): कराधान प्रस्तावों को कानूनी रूप देता है।
विशेष अनुदान (अनु. 115-116)
लेखानुदान: 2 महीने के लिए 1/6 हिस्सा अग्रिम अनुदान।
अनुपूरक: वर्तमान सेवा के लिए अतिरिक्त धनराशि।
प्रत्ययानुदान: राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए ‘ब्लैंक चेक’।

नीतिगत कटौती

मांग को घटाकर 1 रुपया कर दिया जाता है; यह सरकार की नीति की पूर्ण अस्वीकृति को दर्शाता है।

आर्थिक कटौती

व्यय में मितव्ययिता सुनिश्चित करने के लिए मांग को एक विशिष्ट राशि से कम कर दिया जाता है।

सांकेतिक कटौती

मांग को 100 रुपये कम कर दिया जाता है; इसका उपयोग सरकार के खिलाफ विशिष्ट शिकायत व्यक्त करने के लिए होता है।

कानूनी
ढाल
अनुच्छेद 265 के तहत, कानून के अधिकार के बिना कोई कर एकत्र नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, विनियोग विधेयक संचित निधि की एकमात्र कुंजी के रूप में कार्य करता है; इसके पारित हुए बिना, सरकार कानूनी रूप से एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती है, जो कार्यपालिका के खजाने पर पूर्ण संसदीय नियंत्रण सुनिश्चित करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (6 फ़रवरी, 2026) दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; पर्यावरण; बुनियादी ढांचा)।

  • संदर्भ: केंद्रीय बजट 2026-27 के जलवायु संबंधी दृष्टिकोण का विश्लेषण और यह परीक्षण कि क्या वित्तीय आवंटन भारत के घोषित लक्ष्यों के अनुरूप हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • CCUS का प्रायोगिक चरण: बजट में ‘कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज’ (CCUS) के लिए पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये के परिव्यय का प्रस्ताव दिया गया है, जो इन जटिल प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन चरण (Demonstration phase) में प्रवेश का संकेत देता है।
    • छत पर सौर ऊर्जा (Rooftop Solar) का विस्तार: ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ को बढ़ाकर 22,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जिसका लक्ष्य विकेंद्रीकृत प्रणालियों के माध्यम से भूमि के दबाव और घरेलू ऊर्जा लागत को कम करना है।
    • परमाणु और सौर पंप: लागत को कम करने के लिए परमाणु संयंत्र उपकरणों पर शून्य बुनियादी सीमा शुल्क को 2035 तक बढ़ा दिया गया है, जबकि ‘पीएम-कुसुम’ (सौर पंप) के लिए 5,000 करोड़ रुपये का आवंटन बरकरार रखा गया है।
    • हरित हाइड्रोजन का अंतराल: उच्च नीतिगत महत्वाकांक्षा के बावजूद, हरित हाइड्रोजन पर वास्तविक खर्च मामूली बना हुआ है, जो सरकार के इरादे और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच एक निरंतर अंतर को उजागर करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु वित्त”, “औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन” और “नवीकरणीय ऊर्जा नीति” से संबंधित विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • निर्यात प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) के लागू होने के साथ, स्टील और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों को कार्बन मुक्त बनाना अब केवल एक पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं बल्कि व्यापारिक अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है।
    • निजी पूंजी की अनिश्चितता: हालांकि कानूनी बदलाव अब परमाणु ऊर्जा में निजी भागीदारी की अनुमति देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सुरक्षा, दायित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं से घिरे इस क्षेत्र में निजी निवेश कितनी तेजी से आएगा।
    • संग्रहण की बाधाएं: संपादकीय का तर्क है कि हालांकि इरादा स्पष्ट है, लेकिन बजट वास्तविक आवंटन पर सतर्क रहता है, जिससे तीव्र डीकार्बोनाइजेशन के लिए आवश्यक निजी पूंजी जुटाने की भारत की क्षमता पर अनिश्चितता बनी रहती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य; शासन; सरकारी बजट)।

  • संदर्भ: 2026 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में 10 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5 प्रतिशत के दीर्घकालिक लक्ष्य को पूरा करने में इसकी विफलता की समीक्षा।
  • मुख्य बिंदु:
    • बजटीय स्थिरता: कुल स्वास्थ्य आवंटन 1.05 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.26 प्रतिशत और कुल सरकारी खर्च का मात्र 1.9 प्रतिशत है।
    • बायोपार्मा शक्ति (SHAKTI) योजना: पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये की एक प्रमुख पहल, जिसे भारत को ‘बायोलॉजिक्स’ और ‘बायोसिमिलर्स’ के लिए वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदलने के लिए डिजाइन किया गया है।
    • वृद्धों की देखभाल (Geriatric Care) पर ध्यान: सरकार का लक्ष्य बुजुर्गों के लिए 1.5 लाख देखभाल कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना है, जो गिरती प्रजनन दर के कारण भारत के “वृद्ध राष्ट्र” (Grey Nation) की ओर बढ़ने की वास्तविकता को स्वीकार करता है।
    • किफायती उपचार के उपाय: मरीजों और उनके परिवारों पर वित्तीय बोझ कम करने के लिए कैंसर की 17 दवाओं और कई दुर्लभ बीमारियों के उपचार पर सीमा शुल्क माफ कर दिया गया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा”, “भेषज (फार्मास्युटिकल) अनुसंधान एवं विकास” और “जनसांख्यिकीय बदलाव”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • प्रतिबद्धता का अंतराल: सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 प्रतिशत खर्च के लक्ष्य तक पहुँचने से सरकार के इनकार की आलोचना की है, जैसा कि मूल रूप से 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वादा किया गया था।
    • NHM फंडिंग की चिंता: उपयोग की उच्च दरों के बावजूद, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के वित्तपोषण में गिरावट देखी गई है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता के बारे में डर पैदा हो गया है।
    • संघीय असंतुलन: ऐसी चिंताएं बढ़ रही हैं कि जैसे-जैसे केंद्र स्वास्थ्य वित्तपोषण में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहा है, राजकोषीय हस्तांतरण से राष्ट्रीय सुधार के बजाय विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य परिणामों में असमानता पैदा हो सकती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (न्यायपालिका)।

  • संदर्भ: एक कानूनी विद्वतापूर्ण आलोचना कि कैसे भारत की उच्च न्यायपालिका कथित तौर पर विकास के नाम पर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को “कमजोर” करने में सहायता कर रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • पूर्वव्यापी (Retrospective) मंजूरी: उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में अपने स्वयं के 2025 के निर्णय (वनशक्ति बनाम भारत संघ) को वापस ले लिया, जिसने पहले पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी पर प्रतिबंध लगा दिया था।
    • EIA का सरलीकरण: गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए, नीतिगत बदलाव अब स्थान और क्षेत्र के विशिष्ट विवरणों के बिना ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA) करने की अनुमति देते हैं।
    • अरावली की परिभाषा: न्यायालय ने अपने 2010 के रुख से हटते हुए एक ऐसी परिभाषा को स्वीकार किया है जो केवल 100 मीटर से ऊपर की चोटियों की रक्षा करती है, जिससे निचली पहाड़ियों के खनन और शोषण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
    • मैंग्रोव की हानि: न्यायिक अनुमति ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए 158 मैंग्रोव के विनाश की अनुमति दी, जो केवल प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) के “वादे” पर आधारित थी।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)”, “न्यायिक समीक्षा” और “संवैधानिक जवाबदेही”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संवैधानिक निहितार्थ: संपादकीय का तर्क है कि वर्तमान व्याख्याएं अनुच्छेद 21 के तहत ‘स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार’ और अनुच्छेद 48A के तहत राज्य के कर्तव्य को कमजोर करती हैं।
    • प्रक्रियात्मक अन्याय: बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अक्सर संक्षिप्त सुनवाई के साथ नियामक बाधाओं को पार कर जाती हैं, जिससे पर्यावरणीय अनुपालन को केवल एक “चेकलिस्ट” की तरह माना जा रहा है।
    • वैज्ञानिक विरोधाभास: परिपक्व मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र, जो प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं, उन्हें विकसित होने में दशकों लगते हैं और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर वृक्षारोपण अभियानों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (सुरक्षा; रक्षा प्रौद्योगिकी; भारतीय अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: दशकों में पहली बार रक्षा व्यय में दोहरे अंकों की उछाल का विश्लेषण, जो सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत तक पहुँच गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • आधुनिकीकरण पर जोर: वायु सेना (32 प्रतिशत वृद्धि) और थल सेना (30 प्रतिशत वृद्धि) को भारी वाहनों और हथियारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए आधुनिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण धन प्राप्त हुआ।
    • स्वदेशीकरण: पूंजी अधिग्रहण बजट का 75 प्रतिशत घरेलू उद्योगों के लिए आरक्षित है, जो 2014-15 के बाद से घरेलू उत्पादन में 174 प्रतिशत की वृद्धि का समर्थन करता है।
    • पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय: एक उल्लेखनीय बदलाव में, पूंजीगत व्यय (22 प्रतिशत की वृद्धि) ने राजस्व बजट को पीछे छोड़ दिया है, जिससे वर्षों की उपेक्षा समाप्त हुई है।
    • बढ़ता निर्यात: रक्षा निर्यात पिछले साल 23,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो 2014 के 1,000 करोड़ रुपये से मजबूत वृद्धि दर्शाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “आंतरिक सुरक्षा”, “रक्षा में आत्मनिर्भर भारत” और “रणनीतिक योजना”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • L-1 की बाधा: ‘न्यूनतम लागत’ (L-1) नियम अभी भी छोटे पैमाने के उच्च-तकनीकी नवोन्मेषकों (Innovators) के बजाय बड़े उद्योगों का पक्ष लेता है, जबकि आधुनिक सेना के लिए ये नवोन्मेषक अनिवार्य हैं।
    • अंतहीन देरी: पनडुब्बियों के लिए ‘प्रोजेक्ट 75’ (1997 में स्वीकृत) और राफेल सौदा एक ऐसी नौकरशाही व्यवस्था को उजागर करते हैं जहाँ आपूर्ति में दशकों लग जाते हैं।
    • बिखरा हुआ अनुसंधान (R&D): जबकि DRDO के वित्तपोषण में वृद्धि हुई है, भारत का कुल अनुसंधान बजट सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.66 प्रतिशत है, और निजी क्षेत्र का अनुसंधान एवं विकास लगभग नगण्य है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था; राज्यपाल की भूमिका; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में हालिया उदाहरणों से उत्पन्न एक बहस जहाँ राज्यपालों ने या तो सदन से बहिर्गमन किया या राज्य मंत्रिमंडलों द्वारा तैयार किए गए नीतिगत संबोधनों के चुनिंदा अंशों को ही पढ़ा।
  • मुख्य बिंदु:
    • अनुच्छेद 176 का अधिदेश: संविधान के अनुसार राज्यपाल को वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में राज्य विधानमंडल को संबोधित करना और सरकार के एजेंडे को रेखांकित करना अनिवार्य है।
    • प्रतीकवाद बनाम कार्य: इस संबोधन को बनाए रखने के समर्थकों का तर्क है कि यह राज्यपाल को विधानमंडल के एक अभिन्न अंग (अनुच्छेद 168) के रूप में मान्यता देता है और ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ को दर्शाता है।
    • संवैधानिक संकट: यदि कोई राज्यपाल अनिवार्य संबोधन देने से इनकार करता है, तो इससे सत्र के औपचारिक रूप से शुरू न हो पाने का जोखिम पैदा हो जाता है।
    • वैकल्पिक तंत्र: अनुच्छेद 175 पहले से ही राज्यपालों को लंबित विधानों के संबंध में सदन को संदेश भेजने का एक तरीका प्रदान करता है, जिसमें अनुच्छेद 176 जैसे समारोह की आवश्यकता नहीं होती।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद विवाद”, “संवैधानिक पदाधिकारी” और “शासन स्थिरता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कोई विवेकाधीन शक्ति नहीं: नबाम रेबिया मामले (2016) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबोधन एक कार्यकारी कार्य है जो पूरी तरह से मंत्रिमंडल की “सहायता और सलाह” पर किया जाता है।
    • प्रसादपर्यंत सिद्धांत (Pleasure Doctrine) का टकराव: राष्ट्रपति के विपरीत, जो महाभियोग के अधीन हैं, राज्यपाल राष्ट्रपति (केंद्र) के “प्रसादपर्यंत” पद धारण करते हैं, जिससे वे राज्य विधानमंडल के बजाय नई दिल्ली के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाते हैं।
    • प्रणालीगत सुधार: विशेषज्ञों का सुझाव है कि संबोधन को समाप्त करने के बजाय, ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि राज्यपालों की नियुक्ति और निष्कासन में सुधार किया जाए ताकि उनकी प्राथमिक निष्ठा सत्तारूढ़ दल के बजाय संविधान के प्रति हो।

संपादकीय विश्लेषण

06 फरवरी, 2026
GS-2 स्वास्थ्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अंतराल

व्यय कुल व्यय के 1.9% पर स्थिर। बायोफार्मा SHAKTI और एक “वृद्ध राष्ट्र” के लिए 1.5 लाख जराचिकित्सा देखभाल कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण पर ध्यान।

GS-3 सुरक्षा रक्षा आधुनिकीकरण

रक्षा बजट जीडीपी के 2% तक पहुँचा। घरेलू उद्योग के लिए 75% पूंजीगत बजट का आरक्षण, फिर भी L-1 की बाधाएं उच्च-तकनीकी नवप्रवर्तकों को बाधित करती हैं।

GS-3 पर्यावरण / न्याय न्यायशास्त्र का क्षरण

सुप्रीम कोर्ट ने पिछली तारीख से मंजूरी (Retrospective Clearances) पर प्रतिबंध वापस लिया। अरावली श्रेणियों की नई परिभाषाएं संभावित रूप से निचली चोटियों को खनन शोषण के लिए खोल सकती हैं।

बुनियादी ढांचा: स्वदेशी जहाज निर्माण का रोजगार पर 6.5 गुना गुणक प्रभाव पड़ता है, जो स्वदेशीकरण के माध्यम से विकास को गति देता है।
संघवाद: संघीय असंतुलन तब बढ़ता है जब केंद्र स्वास्थ्य वित्त पोषण में अपनी हिस्सेदारी कम करता है, जिससे राज्यों के परिणामों में विषमता का जोखिम होता है।
संविधान: राज्यपाल “राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत” पद धारण करते हैं, जिससे वे राज्यों की तुलना में संघ के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाते हैं।
संरक्षण: परिपक्व मैंग्रोव को विकसित होने में दशकों लगते हैं और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर वृक्षारोपण अभियानों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।
GS-4
पारिस्थितिक कर्तव्य
सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत: पर्यावरण अनुपालन को औद्योगिक विकास के लिए महज एक “चेकलिस्ट” मानना स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को कमजोर करता है। पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश पर न्यायिक मंजूरी अनुच्छेद 48A के तहत भविष्य की पीढ़ियों के लिए पारिस्थितिक विरासत को संरक्षित करने के राज्य के नैतिक कर्तव्य का उल्लंघन करती है।

यहाँ सांस्कृतिक भूगोल के विकाससामरिक एयरोस्पेस क्लस्टर और अंतर-क्षेत्रीय संरक्षण पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

6 फरवरी, 2026 तक भारत के पर्यटन भूगोल में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है, जो पारंपरिक “समुद्र तट बनाम पहाड़” (Beach vs. Hills) के द्वंद्व से आगे बढ़कर अनुभव-आधारित विरासत केंद्रों (Heritage hubs) की ओर बढ़ रहा है।

  • उभरते हुए केंद्रीय केंद्र: अयोध्या (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश), द्वारका (गुजरात) और पुरी (ओडिशा) जैसे शहरों को अब उच्च-मात्रा वाली, साल भर चलने वाली पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं के रूप में मानचित्र पर चिह्नित करें।
  • शिरडी-पंढरपुर बेल्ट का मानचित्रण: महाराष्ट्र के इस प्रमुख तीर्थ गलियारे की स्थिति पहचानें, जो अब एक उच्च-घनत्व वाले “अनुभव-आधारित” (Experience-led) क्षेत्र के रूप में कार्य कर रहा है।
  • रिवरफ्रंट विकास: वाराणसी और महेश्वर के घाटों के किनारे विस्तृत बुनियादी ढांचे के उन्नयन को चिह्नित करें, जहाँ “पवित्र और दैनिक जीवन” को एकीकृत आर्थिक स्थानों के रूप में मैप किया जा रहा है।

6 फरवरी, 2026 को एयरोस्पेस के लिए एक नए ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CoE) का उद्घाटन किया गया, जिसने वडोदरा को भारत के उच्च-तकनीकी औद्योगिक मानचित्र पर एक प्रमुख बिंदु के रूप में स्थापित किया है।

  • गति शक्ति हब: यह वडोदरा में स्थित गति शक्ति विश्वविद्यालय (GSV) में है, जो परिवहन और रसद (Logistics) पर केंद्रित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है।
  • सतत विमानन ईंधन (Sustainable Aviation Fuel – SAF): यह केंद्र विशेष रूप से नगर निगम के ठोस कचरे (MSW) से SAF बनाने की तकनीकों का मानचित्रण कर रहा है, जो एक महत्वपूर्ण पर्यावरण-आर्थिक कड़ी है।
  • एयरोस्पेस पारिस्थितिकी तंत्र: वडोदरा को एयरबस-GSV साझेदारी के प्राथमिक केंद्र के रूप में चिह्नित करें, जिसका उद्देश्य वैश्विक एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखला का स्थानीयकरण करना है।

यद्यपि इसकी स्थापना पहले हुई थी, लेकिन करिमपुझा वन्यजीव अभयारण्य को इस तिथि पर “नीलगिरी परिदृश्य” (Nilgiri Landscape) की निरंतरता में इसकी भूमिका के लिए विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

  • पारिस्थितिक कड़ी: यह केरल की साइलेंट वैली (शांत घाटी) और तमिलनाडु के मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान के बीच एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेतु (Bridge) बनाता है।
  • नदी भूगोल: इसका नाम करिमपुझा नदी के नाम पर रखा गया है, जो चालियार नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
  • जनजातीय विरासत: इसे चोलनायक्कन (Cholanaikan) जनजाति के पारंपरिक आवास के रूप में मैप किया गया है, जो पश्चिमी घाट के सबसे अलग रहने वाले शिकारी-संग्राहक समूहों में से एक है।

भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने 6 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ता फिर से शुरू करने की शर्तों पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए।

  • छह-देशीय ब्लॉक: अपने मानचित्र पर GCC के सदस्यों को पहचानें: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन।
  • रणनीतिक चोक पॉइंट: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को भारत को इस व्यापार ब्लॉक से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी (Artery) के रूप में चिह्नित करें।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
नया विरासत केंद्रअयोध्या का कायाकल्पउत्तर प्रदेश
एयरोस्पेस CoEगति शक्ति विश्वविद्यालयवडोदरा, गुजरात
पश्चिमी घाट की कड़ीकरिमपुझा अभयारण्यकेरल (नीलगिरी BR)
व्यापार भूगोलGCC राष्ट्रपश्चिम एशिया / खाड़ी क्षेत्र

सांस्कृतिक केंद्रों को मैप करते समय उनके पास से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों को भी देखें। उदाहरण के लिए, अयोध्या और वाराणसी के बीच की कनेक्टिविटी उत्तर प्रदेश के पूर्वी आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार, वडोदरा की स्थिति दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे (DMIC) पर इसकी सामरिक महत्ता को बढ़ाती है।

मानचित्रण विवरण

सांस्कृतिक केंद्र एवं एयरोस्पेस क्लस्टर
पवित्र भूगोल विरासत-आधारित केंद्र

अयोध्या, उज्जैन और द्वारका जैसे उच्च-आवागमन वाले केंद्रों की ओर झुकाव। महाराष्ट्र में उच्च-घनत्व वाले शिरडी-पंढरपुर तीर्थ बेल्ट पर ध्यान दें।

व्यापारिक गुट GCC FTA की बहाली

6 राष्ट्रों (सऊदी, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन) और होर्मुज जलडमरूमध्य की पहचान करें, जो भारत को खाड़ी से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी है।

रणनीतिक एयरोस्पेस हब
वडोदरा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

गति शक्ति विश्वविद्यालय में एयरबस साझेदारी के लिए एक प्राथमिक नोड। मानचित्रण एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखलाओं के स्थानीयकरण और MSW-से-SAF विमानन ईंधन तकनीक पर केंद्रित है।

अंतर-क्षेत्रीय संरक्षण
करीमपुझा वन्यजीव अभयारण्य

साइलेंट वैली (केरल) और मुकुर्थी (तमिलनाडु) के बीच एक पारिस्थितिक पुल बनाता है। नीलगिरी परिदृश्य में एकांत चोलनायकन जनजाति का आवास।

नदी विरासत

गंगा और नर्मदा नदियों पर वाराणसी और महेश्वर घाटों के साथ बुनियादी ढांचे के मानचित्रण के माध्यम से “पवित्र और रोजमर्रा” को एकीकृत करना।

विरासत केंद्र अयोध्या परिवर्तन (उत्तर प्रदेश)।
एयरोस्पेस हब वडोदरा (गति शक्ति विश्वविद्यालय)।
संरक्षण करीमपुझा अभयारण्य (केरल)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 2026 का मानचित्रण लॉजिस्टिक्स (गति शक्ति) के साथ पारंपरिक विरासत (पवित्र केंद्रों) के संगम को उजागर करता है। नीलगिरी जैव विविधता गलियारों के विश्लेषण के लिए साइलेंट वैली और मुकुर्थी के बीच संपर्क को देखना आवश्यक है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 5 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “महिलाएँ, जाति एवं सुधार” 19वीं और 20वीं शताब्दी के भारत की सामाजिक स्थितियों और उन आंदोलनों की व्याख्या करता है जिन्होंने समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं को चुनौती दी।

19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय समाज लिंग और जाति के आधार पर गहरे भेदभाव से ग्रस्त था।

  • बाल विवाह: अधिकांश बच्चों की शादी बहुत कम उम्र में ही कर दी जाती थी।
  • बहुपत्नी प्रथा: हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की अनुमति थी।
  • सती प्रथा: देश के कुछ हिस्सों में विधवाओं को उनके पति की चिता पर जिंदा जलने के लिए मजबूर किया जाता था। ऐसी महिलाओं को “सती” (यानी ‘सदाचारी महिला’) कहकर महिमामंडन किया जाता था।
  • शिक्षा में बाधाएँ: महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार लगभग बंद थे। समाज में यह अंधविश्वास फैला था कि अगर महिला शिक्षित होगी, तो वह जल्दी विधवा हो जाएगी।
  • संपत्ति के अधिकार: संपत्ति पर स्वामित्व या विरासत में महिलाओं के अधिकार बहुत सीमित थे।
  • उच्च जातियाँ: ब्राह्मण और क्षत्रिय खुद को सबसे ऊपर मानते थे।
  • मध्यम जातियाँ: इसके बाद वैश्य (व्यापारी और महाजन) और फिर शूद्र (किसान और बुनकर/कुम्हार जैसे कारीगर) आते थे।
  • अस्पृश्यता (छुआछूत): सबसे निचले स्तर पर वे लोग थे जिनके काम को “दूषित” माना जाता था। उन्हें मंदिरों में जाने, सवर्णों के कुओं से पानी भरने या उनके तालाबों का उपयोग करने की अनुमति नहीं थी।

19वीं सदी में छपाई की नई तकनीक (किताबें, अखबार, पत्रिकाएं) के विकास ने सामाजिक मुद्दों पर बहस करना आसान बना दिया। पहली बार आम जनता के बीच इन बुराइयों पर चर्चा शुरू हुई।

  • ब्रह्म सभा: राममोहन राय ने कलकत्ता में ‘ब्रह्म सभा’ (बाद में ब्रह्म समाज) की स्थापना की। उनका मानना था कि समाज में अन्यायपूर्ण प्रथाओं को बदला जाना चाहिए।
  • सती प्रथा का अंत: राममोहन राय ने प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान के आधार पर यह सिद्ध किया कि सती प्रथा को प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी स्वीकृति नहीं दी गई है।
  • कानूनी सफलता: उनके प्रयासों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • ईश्वरचंद्र विद्यासागर: उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का हवाला देकर तर्क दिया कि विधवाओं को दोबारा शादी करने की अनुमति होनी चाहिए।
  • कानून: उनके सुझावों पर अमल करते हुए अंग्रेजों ने 1856 में विधवा विवाह के पक्ष में कानून पारित किया।
  • आंदोलन का प्रसार: मद्रास प्रेसीडेंसी में वीरेशलिंगम पंतुलु और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी विधवा विवाह का पुरजोर समर्थन किया।

सुधारकों का मानना था कि महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी उपकरण है, हालाँकि उन्हें भारी सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा।

  • विरोध और भय: लोगों को डर था कि स्कूल जाने से लड़कियाँ घरेलू कामकाज छोड़ देंगी और सार्वजनिक स्थानों से गुजरने पर उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
  • घरेलू शिक्षा: इस डर के कारण कई महिलाओं को उनके उदारवादी पिताओं या पतियों ने घर पर ही पढ़ाया। राससुंदरी देवी जैसी महिलाओं ने तो मोमबत्ती की रोशनी में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा।
  • मुस्लिम सुधारक: मुमताज़ अली ने कुरान की आयतों की पुनर्व्याख्या की ताकि महिलाओं की शिक्षा के पक्ष में तर्क दिया जा सके। भोपाल की बेगमों और बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोले।

19वीं सदी के अंत तक महिलाओं ने स्वयं लिखना और अपनी सामाजिक स्थिति को चुनौती देना शुरू कर दिया।

  • ताराबाई शिंदे: उन्होंने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक भेदभाव और दोहरे मानदंडों की कड़ी आलोचना की गई।
  • पंडिता रमाबाई: वे संस्कृत की महान विद्वान थीं। उन्होंने ऊँची जातियों की हिंदू महिलाओं के उत्पीड़न पर लिखा और पुणे में एक ‘विधवा गृह’ की स्थापना की ताकि बेसहारा महिलाओं को आश्रय और व्यावसायिक प्रशिक्षण मिल सके।
  • राजनैतिक दबाव: 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं ने वोट देने के अधिकार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और कानूनी समानता के लिए अपने संगठन बनाए।

19वीं और 20वीं सदी में जाति व्यवस्था के अन्याय को चुनौती देने वाले कई आंदोलन शुरू हुए।

  • आर्यों की श्रेष्ठता पर हमला: फुले का तर्क था कि ब्राह्मण स्वयं को जो श्रेष्ठ बताते हैं वह गलत है क्योंकि वे बाहर से आए ‘आर्य’ हैं जिन्होंने यहाँ के मूल निवासियों (निम्न जातियों) को गुलाम बनाया।
  • सत्यशोधक समाज: फुले द्वारा स्थापित इस संगठन ने जातिगत समानता के विचार का प्रचार किया।
  • अंतर्राष्ट्रीय संबंध: 1873 में अपनी पुस्तक ‘गुलामगीरी’ को फुले ने उन अमेरिकियों को समर्पित किया जिन्होंने दासों को मुक्त करने के लिए संघर्ष किया था, इस प्रकार उन्होंने भारत की निम्न जातियों और अमेरिका के काले दासों की स्थिति को एक साथ जोड़ दिया।
  • डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: एक महार परिवार में जन्मे अम्बेडकर ने बचपन से जातिगत भेदभाव झेला था। उन्होंने 1927 से 1935 के बीच तीन मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाए ताकि समाज में जातिगत पूर्वाग्रहों की गहराई को उजागर किया जा सके।
  • ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार): उन्होंने दक्षिण भारत में ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ (Self Respect Movement) शुरू किया। वे मनुस्मृति और रामायण जैसे धर्मग्रंथों के कट्टर आलोचक थे, क्योंकि उनका मानना था कि इनका उपयोग ब्राह्मणवादी और पुरुष वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया गया है।
  1. ब्रह्म समाज (1830): मूर्ति पूजा और बलि का विरोध किया; उपनिषदों में विश्वास।
  2. यंग बंगाल आंदोलन: हेनरी डेरोजियो के नेतृत्व में; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तार्किक सोच पर जोर।
  3. रामकृष्ण मिशन: स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित; समाज सेवा और निस्वार्थ कर्म के माध्यम से मुक्ति का मार्ग।
  4. अलीगढ़ आंदोलन: सर सैयद अहमद खान के नेतृत्व में; मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए 1875 में ‘मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ की स्थापना।
  5. सिंह सभा आंदोलन: सिखों में व्याप्त अंधविश्वासों और जातिवाद को दूर करने तथा आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अमृतसर में शुरुआत।
  1. सुधारक: वे व्यक्ति जो समाज में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं।
  2. सती: पति के साथ चिता पर जलने वाली ‘पुण्यवान’ महिला (शाब्दिक अर्थ)।
  3. अस्पृश्य: वे लोग जिन्हें समाज के मुख्य हिस्से से अलग रखा गया था।
  4. महार: महाराष्ट्र की एक प्रमुख अछूत मानी जाने वाली जाति।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 9

महिलाएँ, जाति एवं सुधार

सामाजिक असमानताएँ
महिलाओं की स्थिति: कम उम्र में विवाह, बहुपत्नी प्रथा और सती जैसी प्रथाओं का सामना; संपत्ति या शिक्षा तक लगभग कोई पहुँच नहीं।
जाति व्यवस्था: एक कठोर व्यवस्था जिसमें ब्राह्मणों को शीर्ष पर और “अछूतों” को सबसे नीचे रखा गया; वे मंदिरों और साझा जल स्रोतों से वंचित थे।
शुरुआती सुधार
राजा राममोहन राय: ब्रह्म समाज की स्थापना की; उनके प्रयासों से 1829 में सती प्रथा पर रोक लगी।
विधवा विवाह: ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने इसका समर्थन किया, जिससे 1856 में विधवा विवाह अधिनियम पारित हुआ।
प्रतिरोध और परिवर्तन की आवाजें
महिला सुधारक: ताराबाई शिंदे ने दोहरे मापदंडों को चुनौती देने के लिए स्त्रीपुरुषतुलना लिखी। पंडिता रमाबाई ने उत्पीड़ित उच्च-जातीय विधवाओं के लिए आश्रम स्थापित किए।
ज्योतिराव फुले: सत्यशोधक समाज की स्थापना की; गुलामगीरी (1873) लिखी, जिसमें निम्न जाति के भारतीयों के संघर्ष को अमेरिका में दासता के अंत से जोड़ा।
डॉ. बी.आर. अंबेडकर: गहरी जड़ों वाले पूर्वाग्रहों को उजागर करने और दलितों के अधिकारों के लिए मंदिर प्रवेश आंदोलनों (1927-35) का नेतृत्व किया।
पेरियार: दक्षिण में आत्म-सम्मान आंदोलन शुरू किया; ब्राह्मणवादी और पुरुष वर्चस्व को सही ठहराने वाले शास्त्रों की कड़ी आलोचना की।
आधुनिक शिक्षा: सैयद अहमद खान (अलीगढ़ आंदोलन) और सिंह सभाओं ने क्रमशः मुसलमानों और सिखों के लिए शिक्षा के आधुनिकीकरण का कार्य किया।

गुलामगीरी

1873 में फुले द्वारा लिखी गई पुस्तक, जिसका अर्थ है ‘गुलामी’; इसे अमेरिकी दास-मुक्ति आंदोलन को समर्पित किया गया।

आर्य समाज

हिंदू धर्म में सुधार और शिक्षा के समर्थन के लिए 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित।

मंदिर प्रवेश

पवित्र सार्वजनिक स्थानों से दलितों के बहिष्कार को चुनौती देने के लिए अंबेडकर के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलन।

समानता का
उदय
सामाजिक सुधार केवल कानूनों को बदलने के बारे में नहीं था, बल्कि मानसिकता को चुनौती देने के बारे में था। प्राचीन ग्रंथों पर सवाल उठाकर और प्रेस की शक्ति का उपयोग करके, सुधारकों ने एक अधिक समावेशी और लोकतांत्रिक आधुनिक भारत का मार्ग प्रशस्त किया।

भारतीय संसद में विधेयकों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: साधारण विधेयक, धन विधेयक, वित्त विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक। यहाँ पहले तीन प्रकारों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो विधायी कार्यों के बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं।

ये विधेयक वित्तीय विषयों के अलावा किसी भी अन्य मामले से संबंधित होते हैं।

  • प्रस्तुतीकरण: इसे संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है।
  • किसके द्वारा: इसे या तो कोई मंत्री (सरकारी विधेयक) या कोई गैर-सरकारी सदस्य (Private Member) पेश कर सकता है।
  • पारित होना: इसे दोनों सदनों द्वारा ‘साधारण बहुमत’ से पारित किया जाना आवश्यक है।
  • गतिरोध और संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108): यदि दोनों सदनों के बीच विधेयक को लेकर असहमति हो, तो राष्ट्रपति गतिरोध को दूर करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है।
  • राज्यसभा की शक्ति: राज्यसभा किसी साधारण विधेयक को अधिकतम 6 महीने तक रोक सकती है।

अनुच्छेद 110 के अनुसार, कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ तब माना जाता है जब उसमें केवल कराधान (Taxation), सरकार द्वारा धन उधार लेने, या भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से संबंधित मामले शामिल हों।

  • प्रमाणन (Certification): केवल लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ही यह प्रमाणित कर सकता है कि कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं। उनका निर्णय अंतिम होता है और उसे किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • प्रस्तुतीकरण (अनुच्छेद 109):
    1. इसे केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है।
    2. इसे पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश अनिवार्य है।
  • राज्यसभा की सीमित भूमिका:
    1. राज्यसभा इसे न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही इसमें संशोधन कर सकती है; वह केवल सिफारिशें कर सकती है।
    2. राज्यसभा को यह विधेयक 14 दिनों के भीतर वापस करना होता है।
    3. यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर कार्रवाई नहीं करती है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
  • राष्ट्रपति की अनुमति: राष्ट्रपति इसे अपनी सहमति दे सकता है या रोक सकता है, लेकिन वह इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता (क्योंकि यह उनकी पूर्व अनुमति से ही पेश किया गया था)।

एक प्रसिद्ध कहावत है: “सभी धन विधेयक वित्त विधेयक होते हैं, लेकिन सभी वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होते।” इसके दो प्रकार हैं:

A. वित्त विधेयक (I) – अनुच्छेद 117(1):
इसमें अनुच्छेद 110 में उल्लिखित विषयों के साथ-साथ अन्य सामान्य विधायी मामले भी शामिल होते हैं।

  • धन विधेयक के साथ समानता: इसे भी केवल लोकसभा में राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही पेश किया जा सकता है।
  • साधारण विधेयक के साथ समानता: एक बार पेश होने के बाद, इसे साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अर्थात राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकार कर सकती है और इस पर संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है)।

B. वित्त विधेयक (II) – अनुच्छेद 117(3):
इसमें भारत की संचित निधि से व्यय (Expenditure) से जुड़े प्रावधान होते हैं, लेकिन अनुच्छेद 110 का कोई भी विषय इसमें शामिल नहीं होता।

  • प्रक्रिया: इसे पूरी तरह से एक साधारण विधेयक की तरह माना जाता है। इसे किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती (सिफारिश केवल विचार करने के चरण में आवश्यक होती है)।
विशेषतासाधारण विधेयकधन विधेयक (अनु. 110)वित्त विधेयक (I)
उत्पत्ति का सदनकिसी भी सदन मेंकेवल लोकसभा मेंकेवल लोकसभा में
राष्ट्रपति की सिफारिशआवश्यक नहींअनिवार्यअनिवार्य
राज्यसभा की शक्तिसंशोधन/अस्वीकार कर सकती हैन संशोधन, न अस्वीकारसंशोधन/अस्वीकार कर सकती है
गतिरोध का समाधानसंयुक्त बैठकसंयुक्त बैठक का प्रावधान नहींसंयुक्त बैठक
अधिकतम विलंब (RS)6 महीने14 दिन6 महीने

प्रत्येक विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों में इन चरणों से गुजरना पड़ता है:

  1. प्रथम वाचन (First Reading): विधेयक को पेश करना और इसे भारत के राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित करना।
  2. द्वितीय वाचन (Second Reading): इसमें विधेयक पर सामान्य चर्चा होती है और फिर प्रत्येक खंड (Clause) पर विस्तार से विचार किया जाता है। यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
  3. तृतीय वाचन (Third Reading): इस चरण में विधेयक पर अंतिम रूप से मतदान होता है (यहाँ कोई संशोधन नहीं किया जा सकता)।
  4. दूसरे सदन में विधेयक: दूसरे सदन में भी यही तीनों वाचन (Readings) होते हैं।
  5. राष्ट्रपति की अनुमति: जब दोनों सदन विधेयक पारित कर देते हैं, तो यह राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह ‘अधिनियम’ (Act) बन जाता है।

यह याद रखें कि संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों और वित्त विधेयकों के लिए है। धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती।

संघीय विधायिका • अनु. 107-117
विधायी प्रक्रिया

विधेयकों का वर्गीकरण

अनुच्छेद 110
धन विधेयकों को परिभाषित करता है। केवल अध्यक्ष ही किसी विधेयक की प्रकृति को प्रमाणित कर सकते हैं; यह निर्णय अंतिम और निर्विवाद है।
पाँच चरण
प्रत्येक विधेयक को अधिनियम बनने के लिए दोनों सदनों में 3 वाचनों से गुजरना होता है, जिसके बाद राष्ट्रपति की सहमति आवश्यक होती है।
साधारण विधेयक (अनु. 107)
किसी भी मंत्री या गैर-सरकारी सदस्य द्वारा किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। दोनों सदनों में साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है।
गतिरोध: यदि सदन असहमत हों, तो राष्ट्रपति संयुक्त बैठक (अनु. 108) बुला सकते हैं। राज्यसभा इसे अधिकतम 6 महीने तक रोक सकती है।
धन विधेयक (अनु. 109)
राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के साथ केवल लोकसभा में पेश किया जाता है। राज्यसभा के पास इसे अस्वीकार या संशोधित करने की कोई शक्ति नहीं है।
14-दिन का नियम: राज्यसभा को 14 दिनों के भीतर विधेयक वापस करना होगा, अन्यथा इसे पारित माना जाता है। संयुक्त बैठक की अनुमति नहीं है।

वित्त विधेयक (I)

सिफारिश के साथ केवल लोकसभा में पेश किया जाता है; एक बार पेश होने के बाद, इसे साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अनु. 117(1))।

वित्त विधेयक (II)

इसमें संचित निधि से व्यय शामिल होता है। इसे पूरी तरह से साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अनु. 117(3))।

सहमति शक्ति

राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं कर सकते, क्योंकि यह उनकी पूर्व सहमति से ही पेश किया जाता है।

कानूनी
सूत्र
वित्तीय विधानों के बीच संवैधानिक संबंध सरल है: सभी धन विधेयक वित्त विधेयक होते हैं, लेकिन सभी वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होते। जबकि साधारण और वित्त विधेयकों में राज्यसभा की पूर्ण भागीदारी और संयुक्त बैठक का प्रावधान है, धन विधेयक केवल लोकसभा और अध्यक्ष के अनन्य अधिकार क्षेत्र में रहता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (5 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; केंद्र-राज्य संबंध; संघवाद) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा)।

  • संदर्भ: मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को वापस लिया जाना और युमनाम खेमचंद सिंह का राज्य के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना।
  • मुख्य बिंदु:
    • राष्ट्रपति शासन की समाप्ति: राष्ट्रपति शासन को लागू होने के लगभग एक साल बाद वापस ले लिया गया है ताकि एक लोकप्रिय चुनी हुई सरकार की वापसी हो सके और इसे आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक अनिवार्य संवैधानिक संशोधन विधेयक से बचा जा सके।
    • गठबंधन नेतृत्व: नई सरकार में दो उपमुख्यमंत्री शामिल किए गए हैं—नेमचा किपजेन (कुकी-ज़ो समुदाय से) और लोसी दिखो (नागा पीपुल्स फ्रंट से)। इसका उद्देश्य समावेशिता का संदेश देना है।
    • निरंतर विस्थापन: अनुमानित 60,000 विस्थापित व्यक्तियों में से केवल 9,000 ही अपने घरों को लौट पाए हैं, जो समुदायों के बीच विश्वास की भारी कमी को दर्शाता है।
    • जातीय तनाव: भाजपा की आंतरिक एकता के बावजूद, प्रमुख कुकी-ज़ो संगठनों (KZC और KIM) ने अपने विधायकों को सरकार में शामिल होने के खिलाफ चेतावनी दी है और “अलग प्रशासन” की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा चुनौतियां”, “राज्यपाल की भूमिका और राष्ट्रपति शासन” तथा “जातीय-राजनीतिक संघर्ष” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नेतृत्व का परिवर्तन: पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के “विफल दूसरे कार्यकाल” के कारण भाजपा के भीतर विरोधियों के एक गठबंधन ने सफलतापूर्वक नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव बनाया।
    • सुरक्षा बनाम सुलह: हालांकि सुरक्षा बलों ने लूटे गए कई हथियारों को बरामद किया है, लेकिन जनवरी में एक कुकी-ज़ो क्षेत्र में एक मैतेई व्यक्ति की हत्या यह दर्शाती है कि कट्टरपंथी समूहों का अभी भी महत्वपूर्ण प्रभाव बना हुआ है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; सरकारी बजट; राजकोषीय नीति)।

  • संदर्भ: सी. रंगराजन और डी.के. श्रीवास्तव द्वारा 2026-27 के केंद्रीय बजट में व्यय के संरचनात्मक बदलावों और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण (Fiscal Consolidation) की धीमी गति का विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • राजस्व पुनर्गठन: कुल व्यय में राजस्व व्यय की हिस्सेदारी 2014-15 के 88 प्रतिशत से गिरकर 2026-27 में 77 प्रतिशत हो गई है। इसका मुख्य कारण केंद्रीय सब्सिडी में 7 प्रतिशत की कटौती है।
    • स्थिर पूंजीगत व्यय (Capex): हालांकि नाममात्र के पूंजीगत व्यय में 11.5 प्रतिशत की वृद्धि का बजट रखा गया है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में यह पिछले वर्ष के 3.1 प्रतिशत के स्तर पर ही स्थिर है।
    • ब्याज का बोझ: ब्याज भुगतान अब राजस्व प्राप्तियों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा डकार रहा है, जिससे प्राथमिक विकासात्मक कार्यों के लिए राजकोषीय स्थान बहुत कम हो गया है।
    • 16वाँ वित्त आयोग (FC16): वित्त आयोग ने राज्यों के लिए 41 प्रतिशत की हिस्सेदारी बरकरार रखी है, लेकिन ‘राजस्व घाटा अनुदान’ को बंद कर दिया है, जिससे हस्तांतरण में कुल मिलाकर कमी आई है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता”, “राजकोषीय संघवाद” और “संसाधन संग्रहण” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • धीमा सुदृढ़ीकरण: राजकोषीय घाटा-जीडीपी अनुपात में वार्षिक कमी 2026-27 के बजट अनुमानों में घटकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गई है।
    • निजी निवेश का जोखिम: यदि केंद्र और राज्यों का संयुक्त घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 8-9 प्रतिशत पर बना रहता है, तो यह निजी क्षेत्र के लिए निवेश योग्य संसाधनों को बाजार से बाहर धकेल देगा (Crowding out effect)।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।

  • संदर्भ: 5 फरवरी, 2026 को ‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि की समाप्ति और ट्रम्प प्रशासन के तहत नाटो (NATO) के भीतर विश्वास का टूटना।
  • मुख्य बिंदु:
    • हथियार नियंत्रण का अंत: ‘न्यू स्टार्ट’ अमेरिका और रूस के परमाणु शस्त्रागार को सीमित करने वाली अंतिम शेष संधि थी; इसकी समाप्ति शीत युद्ध के दौर जैसी हथियार जमा करने की होड़ की वापसी का संकेत है।
    • आधुनिकीकरण की दौड़: चीन (2023 से प्रतिवर्ष 100 हथियार जोड़ रहा है), रूस और अमेरिका सभी अपने परमाणु भंडारों के आधुनिकीकरण में लगे हुए हैं।
    • रणनीतिक बदलाव: ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप और अमेरिका के बीच आई दरार ने अमेरिका की “अंतिम सुरक्षा गारंटर” वाली छवि को नुकसान पहुँचाया है।
    • यूक्रेन का सबक: इस संघर्ष ने दिखाया है कि एक गैर-परमाणु देश भी परमाणु शक्ति संपन्न शत्रु के खिलाफ अपना बचाव कर सकता है, यदि उसे मजबूत पारंपरिक सैन्य सहायता मिले।
  • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक सुरक्षा संरचना”, “परमाणु अप्रसार” और “अमेरिका-यूरोप-रूस भू-राजनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • यूरोपीय स्वायत्तता: यूरोप अब एक नई सुरक्षा संरचना पर विचार करने के लिए मजबूर है जिसमें ब्रिटिश और फ्रांसीसी “परमाणु छतरी” (Nuclear Umbrella) शामिल हो सकती है।
    • वर्जना बनाम वास्तविकता: हालांकि 1945 के बाद से किसी परमाणु हथियार का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन “उपयोग योग्य” टैक्टिकल परमाणु हथियारों के विकास से परमाणु हमले और पारंपरिक हमले के बीच की रेखा धुंधली हो रही है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था; सामाजिक न्याय; उच्च शिक्षा)।

  • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना, 2026) के नियमों पर रोक लगा दी है, जिसमें स्पष्टता की कमी और संभावित दुरुपयोग का हवाला दिया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • परिभाषा संबंधी विवाद: विवाद का केंद्र “जाति-आधारित भेदभाव” की नई परिभाषा है, जो विशेष रूप से केवल SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों पर केंद्रित है।
    • अपराधी का अनुमान: अनारक्षित (सामान्य) श्रेणी के सदस्यों का आरोप है कि ये नियम अनुचित रूप से यह मान लेते हैं कि वे हमेशा भेदभाव करने वाले पक्ष होंगे।
    • सुरक्षा उपायों का अभाव: 2026 के नियमों ने उन पिछले प्रावधानों को हटा दिया है जिनका उद्देश्य “झूठी” या “प्रेरित” शिकायतों को दंडित करना था।
    • न्यायिक अल्टीमेटम: न्यायालय ने 2026 के नियमों पर रोक लगाते हुए पुराने 2012 के नियमों को लागू रखा है, और यह सवाल उठाया है कि क्या जाति के लिए अलग परिभाषा संवैधानिक रूप से मान्य है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 15)” और “न्यायिक समीक्षा”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • वास्तविक समानता: सरकार का तर्क है कि उसे भेदभाव के विशिष्ट उपसमूहों को पहचानने का अधिकार है, क्योंकि जाति-आधारित पूर्वाग्रह असमान होते हैं और वंचित समूहों के लिए अधिक हानिकारक होते हैं।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शिक्षा से संबंधित मुद्दे; मानव संसाधन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: भारत में 1.5 लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जहाँ शिक्षण कार्यबल का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा अनुबंधात्मक (Contractual) या अंशकालिक है।
  • मुख्य बिंदु:
    • कार्यबल में हिस्सेदारी: अनुबंध के आधार पर नियोजित शिक्षक (शिक्षा मित्र, अतिथि शिक्षक) वर्तमान में भारत के कुल स्कूली कार्यबल का 16 प्रतिशत (16 लाख से अधिक) हैं।
    • वेतन असमानता: विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुबंधात्मक शिक्षक समान कार्य करने के बावजूद नियमित शिक्षकों की तुलना में अक्सर एक-चौथाई या उससे भी कम वेतन पाते हैं।
    • पूर्वोत्तर में एकाग्रता: अनुबंधात्मक कर्मचारियों पर निर्भरता मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे अधिक है।
    • निजी क्षेत्र का प्रभाव: लगभग 21 प्रतिशत निजी स्कूलों में कम से कम आधा कार्यबल अनुबंधात्मक है, जो सभी प्रबंधन प्रकारों में सबसे अधिक है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौतियां”, “श्रम कानूनों का उल्लंघन” और “श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • लेबल का दुरुपयोग: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया कि प्रशासन 10 साल से अधिक समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को स्थायी दर्जा देने से मना करने के लिए “अनुबंधात्मक लेबल” का दुरुपयोग नहीं कर सकता।
    • निरंतर विरोध प्रदर्शन: पुडुचेरी, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में नौकरी के नियमितीकरण के लिए चल रहे प्रदर्शन इस राष्ट्रीय समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं।

संपादकीय विश्लेषण

05 फरवरी, 2026
GS-3 अर्थव्यवस्था संरचनात्मक बजटीय बदलाव

ब्याज भुगतान राजस्व प्राप्तियों का 40% हिस्सा ले रहा है। सब्सिडी में 7% की कटौती की गई क्योंकि राजस्व व्यय का हिस्सा गिरकर 77% रह गया है।

GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध परमाणु हथियारों की दौड़

‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि की समाप्ति सीमाओं के अंत का संकेत है। चीन सालाना 100 वारहेड जोड़ रहा है क्योंकि निवारण अब “उपयोग योग्य” सामरिक परमाणु हथियारों की ओर बढ़ रहा है।

GS-2 शिक्षा / श्रम संविदात्मक स्कूली शिक्षा

1.5 लाख स्कूलों में 50% संविदा कर्मचारी हैं। समान कार्यों के बावजूद पैरा-टीचर्स नियमित कर्मचारियों के वेतन का केवल 1/4 हिस्सा कमाते हैं।

आंतरिक सुरक्षा: 60,000 विस्थापित व्यक्तियों में से केवल 9,000 ही मणिपुर लौटे हैं, जो निरंतर विश्वास की कमी को उजागर करता है।
राजकोषीय: 16वें वित्त आयोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान की समाप्ति राज्यों पर दबाव डालती है; संयुक्त घाटे से निजी पूंजी के बाहर होने (crowding out) का जोखिम है।
रक्षा: नाटो-ट्रंप विश्वास टूटने के कारण यूरोप अब फ्रांसीसी/ब्रिटिश “परमाणु छत्र” (nuclear umbrella) वाले सुरक्षा ढांचे की तलाश कर रहा है।
न्याय: उच्च न्यायालय ने लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को स्थायी दर्जा देने से इनकार करने के लिए ‘संविदात्मक लेबल’ के “दुरुपयोग” के खिलाफ चेतावनी दी है।
GS-4
न्याय और नीति
तात्विक समानता बनाम अस्पष्टता: सरकार जाति-आधारित पूर्वाग्रह को विषम (asymmetric) रूप में विशिष्ट पहचान देने का तर्क देती है। हालाँकि, नीति को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि प्रक्रियात्मक निष्पक्षता से समझौता न हो, क्योंकि कोई भी नियामक अस्पष्टता उसी पूर्वाग्रह को आमंत्रित करती है जिसे वह खत्म करना चाहती है।

यहाँ पारिस्थितिक संगमोंवैज्ञानिक बुनियादी ढांचे, और पवित्र नदी भूगोल पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

इस अभयारण्य का मानचित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की दो सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों के एक अद्वितीय मिलन बिंदु पर स्थित है।

  • संगम बिंदु: यह राजस्थान में विंध्य और अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के भूगर्भीय मिलन बिंदु पर स्थित है।
  • स्थलाकृतिक विशेषता: इसकी विशेषता चंबल नदी बेसिन के विस्तृत और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ (Ravines) हैं।
  • मानचित्रण संदर्भ: यह अभयारण्य लगभग 1,111 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और रणथंभौर तथा उत्तरी आवासों के बीच बाघों की आवाजाही के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण गलियारे (Corridor) के रूप में कार्य करता है।

उच्च-ऊंचाई वाले बुनियादी ढांचे का निर्माण वर्ष 2026 का एक प्रमुख विषय है। ‘ट्रांस-हिमालय’ क्षेत्र में दो प्रमुख “विशाल विज्ञान” (Mega Science) सुविधाओं का मानचित्रण किया जा रहा है।

  • राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (National Large Solar Telescope – NLST): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास स्थापित किया जा रहा है। इस स्थान का चयन रणनीतिक रूप से उच्च-ऊंचाई वाले सौर अनुसंधान के लिए किया गया है।
  • 30-मीटर राष्ट्रीय विशाल ऑप्टिकल दूरबीन (NLOT): यह वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग के लिए एक प्रमुख बिंदु है, जो गहरे अंतरिक्ष (Deep-space) के अवलोकन में भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।

5 फरवरी, 2026 को फल्गु नदी के अद्वितीय “छिपे हुए” भूगोल को इसके सांस्कृतिक और जल विज्ञान संबंधी महत्व के कारण रेखांकित किया गया।

  • संगम और मार्ग: यह गया के पास लीलाजन और मोहना नदियों के मिलन से बनती है। अंततः यह पुनपुन नदी में मिल जाती है, जो गंगा की एक सहायक नदी है।
  • “गुप्त गंगा” (Hidden Ganga): इसे मानचित्र पर एक “छिपी हुई” नदी के रूप में दिखाया जाता है क्योंकि यह एक चौड़े रेतीले तल के नीचे बहती है, और वर्ष के अधिकांश समय सतह पर सूखी दिखाई देती है।
  • मैपिंग पॉइंट: ऐतिहासिक रूप से इस नदी को ‘निरंजना नदी’ के रूप में जाना जाता है, जिसके तट पर गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।

फरवरी 2026 में हुई एक महत्वपूर्ण गणना के अनुसार पक्षियों की आबादी में 21 प्रतिशत का उछाल देखा गया है, जो इसे एक प्रमुख पारिस्थितिक मानचित्रण बिंदु बनाता है।

  • गणना डेटा: 200 से अधिक प्रजातियों के 5 लाख से अधिक पक्षी दर्ज किए गए।
  • भौगोलिक विशेषता: यह 120.82 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है; पक्षियों की आबादी में वृद्धि का मुख्य कारण पिछले दो वर्षों के दौरान नौकायन (Boating) पर पूर्ण प्रतिबंध और शोर प्रदूषण में कमी को माना गया है।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
पर्वत संगमविंध्य-अरावली लिंकधौलपुर-करौली, राजस्थान
छिपी हुई नदीफल्गु (निरंजना)गया, बिहार
सौर विज्ञान केंद्रपैंगोंग झीललद्दाख
आर्द्रभूमि सफलतानलसरोवर गणनागुजरात

फल्गु नदी का अध्ययन करते समय मानचित्र पर ‘विष्णुपद मंदिर’ की स्थिति को भी देखें, जो इसी नदी के तट पर स्थित है। विंध्य और अरावली के संगम को चिह्नित करते समय यह ध्यान रखें कि अरावली श्रृंखला उत्तर-पूर्व की ओर (दिल्ली की तरफ) जाती है, जबकि विंध्य श्रृंखला पूर्व की ओर बढ़ती है।

मानचित्रण विवरण

पारिस्थितिक संगम एवं पवित्र नदियाँ
पर्वतीय संगम विंध्य-अरावली मिलन स्थल

धौलपुर-करौली रिजर्व (1,111 वर्ग किमी) इन प्राचीन श्रेणियों के मिलन बिंदु पर स्थित है, जो चंबल के बीहड़ों को एक महत्वपूर्ण टाइगर कॉरिडोर के रूप में उपयोग करता है।

आर्द्रभूमि सफलता नलसरोवर गणना 2026

गुजरात में पक्षियों की आबादी (5 लाख+) में 21% की वृद्धि दर्ज की गई, जिसका श्रेय अभयारण्य में नौकायन पर पूर्ण प्रतिबंध को दिया गया।

नदी भूगोल
फल्गु: अदृश्य “गुप्त गंगा”

गया के पास लीलाजन और मोहना के संगम से निर्मित यह नदी (प्राचीन निरंजना) रेतीले तल के नीचे बहती है, और साल के अधिकांश समय सतह पर सूखी या “छिपी” रहती है।

उच्च-ऊंचाई विज्ञान
लद्दाख मेगा-टेलीस्कोप

उन्नत अंतरिक्ष अवलोकन के लिए पेंगोंग झील के पास नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप और 30-मीटर ऑप्टिकल टेलीस्कोप का रणनीतिक मानचित्रण।

टाइगर कॉरिडोर

राजस्थान की ऊबड़-खाबड़ बीहड़ स्थलाकृति में बाघों के प्रसार के पैटर्न को समझने के लिए रणथंभौर-DKTR अक्ष का मानचित्रण आवश्यक है।

पर्वतीय संपर्क विंध्य-अरावली (DKTR, राजस्थान)।
पवित्र नदी फल्गु / निरंजना (गया, बिहार)।
सौर केंद्र पेंगोंग झील (लद्दाख)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: धौलपुर-करौली में भूगर्भीय संगम दो अलग-अलग विवर्तनिक (tectonic) इतिहासों का दुर्लभ अध्ययन प्रदान करता है। साथ ही, फल्गु नदी का ‘गुप्त गंगा’ हाइड्रोलॉजिकल मॉडल गंगा प्रणाली में उप-सतह जल निकासी (sub-surface drainage) का एक प्रमुख उदाहरण है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 4 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “‘देशी जनता’ को सभ्य बनाना राष्ट्र को शिक्षित करना” भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा के विकास और इसके प्रति ब्रिटिश अधिकारियों तथा भारतीय विचारकों की विभिन्न प्रतिक्रियाओं की व्याख्या करता है।

1783 में विलियम जोन्स (William Jones) एक जूनियर जज के रूप में कलकत्ता आए। वे एक भाषाविद (Linguist) थे और उन्होंने स्थानीय पंडितों के साथ संस्कृत, व्याकरण और कविता का अध्ययन करना शुरू किया।

  • परंपरा के प्रति सम्मान: जोन्स और हेनरी थॉमस कोलब्रुक जैसे विद्वान भारत और पश्चिम दोनों की प्राचीन संस्कृतियों के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।
  • अतीत की पुनः खोज: उनका मानना था कि भारतीय सभ्यता प्राचीन काल में अपने गौरव के शिखर पर थी, लेकिन बाद में उसका पतन हो गया।
  • संस्कृति के संरक्षक: उनका मानना था कि प्राचीन पवित्र और कानूनी ग्रंथों का अनुवाद करके अंग्रेज भारतीयों को अपनी विरासत को फिर से खोजने में मदद कर सकते हैं, जबकि अंग्रेज उस संस्कृति के “स्वामी” और “अभिभावक” बन जाएंगे।
  • दिल जीतना: अधिकारियों का तर्क था कि अंग्रेजों को वही पढ़ाना चाहिए जिसे देशी लोग महत्व देते हैं और जिससे वे परिचित हैं (संस्कृत और फारसी साहित्य), ताकि वे अपनी प्रजा का सम्मान और विश्वास जीत सकें।
  • कलकत्ता मदरसा (1781): अरबी, फारसी और इस्लामी कानून के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए स्थापित।
  • हिंदू कॉलेज, बनारस (1791): प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए, जो प्रशासन में उपयोगी हो सकें।
  • एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल: विलियम जोन्स द्वारा शोध करने और एशियाटिक रिसर्च नामक पत्रिका प्रकाशित करने के लिए स्थापित।

19वीं शताब्दी की शुरुआत तक, कई ब्रिटिश अधिकारियों ने प्राच्यवादी दृष्टिकोण पर हमला करना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे वैज्ञानिक आधारहीन और “गंभीर त्रुटियों” से भरा बताया।

  • प्रसन्नता के बजाय उपयोगिता: मिल का तर्क था कि अंग्रेजों को देशी लोगों को केवल उन्हें खुश करने के लिए उनकी पसंद की चीजें नहीं पढ़ानी चाहिए।
  • पश्चिमी प्रगति: उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य “उपयोगी और व्यावहारिक” चीजें सिखाना होना चाहिए, विशेष रूप से पश्चिम की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति।
  • असभ्य भारत: मैकाले भारत को एक असभ्य देश मानते थे जिसे सभ्य बनाना आवश्यक था।
  • “एक अलमारी” का दावा: उन्होंने प्रसिद्ध रूप से घोषणा की कि “एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक अलमारी का एक खाना (Shelf) भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य के बराबर है।”
  • 1835 का अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम: इस अधिनियम ने अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बना दिया और प्राच्य संस्थानों (जैसे कलकत्ता मदरसा और बनारस हिंदू कॉलेज) को बढ़ावा देना बंद कर दिया।

1854 में ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के अध्यक्ष चार्ल्स वुुड द्वारा जारी इस नीति-पत्र ने भारत के लिए औपचारिक शैक्षिक नीति की रूपरेखा तैयार की।

  • व्यावसायिक लाभ: इसमें तर्क दिया गया कि यूरोपीय शिक्षा से भारतीयों को व्यापार और वाणिज्य के लाभों को पहचानने में मदद मिलेगी, जिससे ब्रिटिश सामानों की मांग पैदा होगी।
  • नैतिक और प्रशासनिक लाभ: इसका दावा था कि पश्चिमी साहित्य भारतीयों को सत्यवादी और ईमानदार बनाएगा, जिससे कंपनी को सिविल सेवकों (कर्मचारियों) की एक भरोसेमंद आपूर्ति मिलेगी।
  • संस्थागत परिवर्तन: इसके परिणामस्वरूप सरकारी शिक्षा विभागों का गठन हुआ और 1857 में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।

1830 के दशक में, कंपनी ने एक स्कॉटिश मिशनरी विलियम एडम को बंगाल और बिहार के स्थानीय स्कूलों (पाठशालाओं) पर रिपोर्ट देने का काम सौंपा।

  • व्यापक शिक्षा: एडम ने पाया कि वहां 1 लाख से अधिक पाठशालाएँ थीं जिनमें 20 लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे थे।
  • लचीलापन: यह शिक्षा प्रणाली स्थानीय जरूरतों के अनुसार बहुत लचीली थी:
    • न कोई निश्चित शुल्क था, न छपी हुई किताबें, न अलग इमारतें और न ही ब्लैकबोर्ड।
    • फीस माता-पिता की आय पर निर्भर करती थी; अमीर ज्यादा देते थे और गरीब कम।
    • फसल की कटाई के समय कक्षाएं नहीं होती थीं, ताकि किसान परिवारों के बच्चे खेतों में काम कर सकें और बाद में अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।
  • कंपनी ने स्कूलों की देखरेख और शिक्षण मानकों में सुधार के लिए सरकारी पंडितों की नियुक्ति की।
  • गुरुओं को पाठ्यपुस्तकों का उपयोग करने, एक निश्चित समय-सारणी का पालन करने और वार्षिक रिपोर्ट जमा करने के लिए मजबूर किया गया।
  • प्रभाव: नियमित उपस्थिति और फसल कटाई के दौरान भी स्कूल आने की अनिवार्यता ने गरीब बच्चों के लिए स्कूल में टिके रहना मुश्किल बना दिया।

कई भारतीयों ने महसूस किया कि पश्चिमी शिक्षा औपनिवेशिक गुलामी का एक साधन है और उन्होंने इसके विकल्प प्रस्तावित किए।

  • हीनता की भावना: गांधी का तर्क था कि औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के गौरव को नष्ट कर दिया है और उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि पश्चिमी सभ्यता श्रेष्ठ है।
  • गरिमा और आत्म-सम्मान: वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों को उनकी गरिमा पुनः प्राप्त करने में मदद करे। उन्होंने छात्रों से ब्रिटिश संस्थानों को छोड़ने का आह्वान किया।
  • व्यावहारिक हस्तशिल्प: गांधी का मानना था कि केवल साक्षरता ही शिक्षा नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों को कोई कला या शिल्प सीखना चाहिए और अपने हाथों से काम करना चाहिए ताकि उनके मस्तिष्क और आत्मा का विकास हो सके।
  • “शांति का निवास”: टैगोर ने 1901 में कलकत्ता से 100 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण परिवेश में इसकी स्थापना की।
  • रचनात्मक स्वतंत्रता: टैगोर को ब्रिटिश स्कूलों के “जेल जैसे” और कठोर वातावरण से नफरत थी। उनका मानना था कि बचपन प्राकृतिक वातावरण में स्वयं सीखने का समय होना चाहिए।
  • पूर्व और पश्चिम का समन्वय: जहाँ गांधी आधुनिक तकनीक के आलोचक थे, वहीं टैगोर भारतीय परंपरा के सर्वोत्तम तत्वों को आधुनिक पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ना चाहते थे।
  1. भाषाविद (Linguist): एक व्यक्ति जो कई भाषाएँ जानता और पढ़ता है।
  2. प्राच्यवादी (Orientalist): एशिया की भाषा और संस्कृति का गहन ज्ञान रखने वाले विद्वान।
  3. मुंशी: एक व्यक्ति जो फारसी पढ़, लिख और पढ़ा सकता है।
  4. वर्नाकुलर (Vernacular): स्थानीय भाषा या बोली जो मानक भाषा से अलग होती है।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 8

देसी जनता को सभ्य बनाना, राष्ट्र को शिक्षित करना

प्राच्यवादियों का दृष्टिकोण
विलियम जोन्स: 1783 में आगमन; प्रजा का ‘दिल’ जीतने के लिए भारत के प्राचीन गौरव की पुनर्खोज में विश्वास रखते थे।
प्रमुख केंद्र: संस्कृत और फारसी कानून को संरक्षित करने के लिए कलकत्ता मदरसा (1781) और हिंदू कॉलेज (1791) की स्थापना की गई।
आंग्लवादियों की आलोचना
मैकॉले: भारतीय साहित्य को अवैज्ञानिक मानकर खारिज किया; उनका प्रसिद्ध दावा था कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय का केवल एक खाना ही पूरे भारत और अरब के समूचे साहित्य के बराबर है।
औपनिवेशिक और राष्ट्रीय मार्ग
अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835): उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया, ‘उपयोगी और व्यावहारिक’ पश्चिमी ज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया गया।
वुड का नीति-पत्र (1854): प्रशासनिक रूप से विश्वसनीय सिविल सेवकों को तैयार करने और पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से ब्रिटिश वस्तुओं की मांग बढ़ाने के लिए औपचारिक नीति।
पाठशाला सुधार: विलियम एडम ने लचीले स्थानीय स्कूलों पर रिपोर्ट दी; 1854 के बाद, अंग्रेजों ने कठोर नियम, पाठ्यपुस्तकें और समय-सारणी लागू कर दी।
महात्मा गांधी: अंग्रेजी शिक्षा को “गुलाम बनाने वाली” कहकर विरोध किया, उनका तर्क था कि इसने भारतीयों में हीन भावना पैदा की; उन्होंने हस्तशिल्प सीखने की वकालत की।
रवींद्रनाथ टैगोर: 1901 में शांति निकेतन की स्थापना की; वे प्राकृतिक वातावरण में रचनात्मक स्वतंत्रता को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना चाहते थे।

प्राच्यवादी

एशिया की प्राचीन संस्कृतियों, पवित्र ग्रंथों और कानूनों के प्रति गहरा सम्मान रखने वाले विद्वान।

वुड का नीति-पत्र

1854 का वह दस्तावेज जिसने यूरोपीय शिक्षा के औपचारिक प्रशासनिक और आर्थिक लाभों को रेखांकित किया।

शांति निकेतन

प्राकृतिक वातावरण में स्थित एक स्कूल जहाँ टैगोर ने स्व-शिक्षा और कलात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा दिया।

मस्तिष्क का
संघर्ष
औपनिवेशिक भारत में शिक्षा केवल साक्षरता के बारे में नहीं थी; यह एक वैचारिक संघर्ष था। जहाँ अंग्रेजों को कुशल क्लर्क चाहिए थे, वहीं भारतीय विचारक ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों की गरिमा, आत्म-सम्मान और रचनात्मक स्वतंत्रता को बहाल कर सके।

पीठासीन अधिकारी सदनों की गरिमा और विशेषाधिकारों के संरक्षक होते हैं। उनके बिना, संसद एक विचार-विमर्श करने वाले निकाय के रूप में कार्य नहीं कर सकती।

अध्यक्ष लोकसभा का प्रमुख और उसका प्रतिनिधि होता है।

  • निर्वाचन: लोकसभा के सदस्य अपने बीच से ही अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की तारीख राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
  • कार्यकाल: वह लोकसभा के पूरे कार्यकाल के दौरान पद पर बना रहता है। हालाँकि, यदि वह सदन का सदस्य नहीं रहता या उपाध्यक्ष को अपना त्यागपत्र सौंप देता है, तो उसे पद छोड़ना पड़ता है।
  • विशेष शक्तियाँ:
    • धन विधेयक (Money Bill): कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं, इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है और उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
    • संयुक्त बैठक: वह संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) की अध्यक्षता करता है।
    • निर्णायक मत (Casting Vote): अध्यक्ष पहली बार में मतदान नहीं करता, लेकिन मतों के बराबर होने (टाई) की स्थिति में वह अपना निर्णायक मत देता है।
    • दसवीं अनुसूची: वह दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यों की अयोग्यता पर निर्णय लेता है।
  • सामयिक अध्यक्ष (Speaker Pro Tem): यह एक अस्थायी अध्यक्ष होता है जिसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है (आमतौर पर सदन का सबसे वरिष्ठ सदस्य)। इसका मुख्य कार्य नए सदस्यों को शपथ दिलाना और स्थायी अध्यक्ष का चुनाव करवाना होता है।
  • कौन होता है? भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होता है।
  • मुख्य अंतर: लोकसभा अध्यक्ष के विपरीत (जो सदन का सदस्य होता है), सभापति राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है।
  • पद से हटाना: सभापति को उसके पद से केवल तभी हटाया जा सकता है जब उसे उपराष्ट्रपति के पद से हटा दिया जाए।
  • शक्तियाँ: सदन की कार्यवाही चलाने के संबंध में उसकी शक्तियाँ लोकसभा अध्यक्ष के समान होती हैं, लेकिन सभापति संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता और न ही वह यह तय कर सकता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।

राष्ट्रपति के पास संसद के प्रत्येक सदन का सत्र बुलाने (आहूत करने) की शक्ति होती है।

  • 6 महीने का नियम: संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता। इसलिए, संसद को वर्ष में कम से कम दो बार मिलना अनिवार्य है।
  • तीन पारंपरिक सत्र: भारत में आमतौर पर तीन सत्र आयोजित किए जाते हैं:
    1. बजट सत्र: (फरवरी से मई) – यह सबसे लंबा सत्र होता है।
    2. मानसून सत्र: (जुलाई से सितंबर)।
    3. शीतकालीन सत्र: (नवंबर से दिसंबर) – यह सबसे छोटा सत्र होता है।
  • स्थगन (Adjournment): यह सदन की बैठक को कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों के लिए समाप्त कर देता है। यह पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
  • अनिश्चितकालीन स्थगन (Adjournment Sine Die): यह सदन की बैठक को अनिश्चित काल के लिए समाप्त कर देता है (अगली बैठक की तारीख तय किए बिना)। यह भी पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
  • सत्रावसान (Prorogation): यह न केवल बैठक को बल्कि सदन के पूरे सत्र को समाप्त कर देता है। यह राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
  • विघटन (Dissolution): यह सदन (केवल लोकसभा) के जीवन को ही समाप्त कर देता है। इसके बाद नए सिरे से चुनाव होते हैं। यह राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
  • गणपूर्ति या कोरम (Quorum – अनुच्छेद 100): सदन की कार्यवाही चलाने के लिए उपस्थित सदस्यों की वह न्यूनतम संख्या जो आवश्यक है। यह प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का 1/10वाँ भाग (पीठासीन अधिकारी सहित) होता है।
विशेषतालोकसभा अध्यक्ष (Speaker)राज्यसभा सभापति (Chairman)
क्या वह सदन का सदस्य है?हाँनहीं (उपराष्ट्रपति होता है)
चुनाव की तारीखराष्ट्रपति द्वारा निर्धारितलागू नहीं (पदेन पद)
किसे इस्तीफा देता है?उपाध्यक्ष कोराष्ट्रपति को
संयुक्त बैठकअध्यक्षता करता हैअध्यक्षता नहीं करता
धन विधेयकप्रकृति पर निर्णय लेता हैकोई शक्ति नहीं
वोट देने का अधिकारकेवल बराबर होने पर (Casting Vote)केवल बराबर होने पर (Casting Vote)

यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि जब राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है, तो उसकी अध्यक्षता हमेशा लोकसभा अध्यक्ष ही करता है। यदि अध्यक्ष अनुपस्थित हो, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष अध्यक्षता करता है। यदि वह भी अनुपस्थित हो, तो राज्यसभा का उपसभापति अध्यक्षता करता है। राज्यसभा का सभापति कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं करता।

विधायी आचरण • अनु. 85-100
संसदीय प्रक्रिया

पीठासीन अधिकारी और सत्र

लोकसभा अध्यक्ष
सदस्यों द्वारा निर्वाचित; धन विधेयकों का निर्णय करते हैं और संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करते हैं।
गणपूर्ति (अनु. 100)
कार्य संचालन के लिए कुल सदस्यता का कम से कम 1/10 हिस्सा उपस्थित होना चाहिए।
राज्यसभा सभापति (अनु. 89)
उपराष्ट्रपति पदेन सभापति होते हैं। अध्यक्ष के विपरीत, वे सदन के सदस्य नहीं होते हैं।
संसद के सत्र (अनु. 85)
6 महीने का नियम: सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता। आमतौर पर बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र शामिल होते हैं।
सत्रावसान बनाम विघटन: राष्ट्रपति सत्रों का सत्रावसान करते हैं और लोकसभा को भंग करते हैं; स्थगन पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।

धन विधेयक

कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम और निर्विवाद होता है।

निर्णायक मत

पीठासीन अधिकारी केवल मत बराबर होने की स्थिति में वोट देते हैं (प्रथम दृष्टया नहीं)।

दलबदल विरोधी

अध्यक्ष/सभापति 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता पर निर्णय लेते हैं।

“कार्यवाहक”
अधिकारी
प्रोटेम स्पीकर एक अस्थायी पद है जिसे राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाने और स्थायी अध्यक्ष के चुनाव की देखरेख के लिए नियुक्त किया जाता है। पदत्याग के संबंध में, अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को सौंपते हैं, जबकि सभापति केवल उपराष्ट्रपति के पद से हटने पर ही पद छोड़ते हैं।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (4 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (द्विपक्षीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित व्यापार समझौते का विश्लेषण, जो महत्वपूर्ण टैरिफ राहत तो लाता है लेकिन कई रणनीतिक सवाल खड़े करता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • टैरिफ (शुल्क) में कटौती: अमेरिका भारतीय आयात पर अपने “पारस्परिक” टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने और रूसी तेल आयात के कारण पहले लगाए गए 25 प्रतिशत के “जुर्माना” टैरिफ को पूरी तरह हटाने पर सहमत हो गया है।
    • संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण: वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि इस सौदे में संवेदनशील कृषि उत्पादों और डेयरी को बाहर रखा गया है, जिससे घरेलू किसानों का संरक्षण सुनिश्चित होगा।
    • श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ: इस कटौती से कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, रत्न और आभूषण तथा इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
    • “बाय अमेरिकन” के प्रति प्रतिबद्धता: राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि उत्पादों को खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है, हालांकि भारत सरकार ने अभी तक इसकी समयसीमा की पुष्टि नहीं की है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “ऊर्जा कूटनीति” से संबंधित प्रश्नों के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रूसी तेल की पहेली: राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी और वेनेजुएला के स्रोतों के पक्ष में रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए सहमत हुए हैं; यदि यह सच है, तो यह एक बड़ा भू-राजनीतिक पुनर्गठन होगा जो भारत-रूस संबंधों पर प्रभाव डाल सकता है।
    • बाजार और रुपये पर प्रभाव: इस समझौते की खबर ने तुरंत भारतीय शेयर बाजारों को मजबूती दी और रुपया घोषणा के दिन 1.28 प्रतिशत की बढ़त के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बुनियादी ढांचा; ऊर्जा संक्रमण; औद्योगिक नीति)।

  • संदर्भ: श्रीकांत माधव वैद्य का एक विश्लेषण कि क्यों भारत की अगली औद्योगिक क्रांति को पारंपरिक ईंधन दहन (अणुओं – Molecules) के बजाय विद्युतीकरण (इलेक्ट्रॉनों – Electrons) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • मुख्य बिंदु:
    • दक्षता का लाभ: इलेक्ट्रिक मोटर इनपुट ऊर्जा के 90 प्रतिशत से अधिक को उपयोगी कार्य में परिवर्तित करती है, जबकि आंतरिक दहन इंजन (Internal Combustion Engines) आमतौर पर 35 प्रतिशत से भी कम ऊर्जा को परिवर्तित कर पाते हैं।
    • वैश्विक नेतृत्व: चीन वर्तमान में अपनी औद्योगिक ऊर्जा का लगभग आधा हिस्सा बिजली (इलेक्ट्रॉनों) से प्राप्त करता है, जबकि भारत लगभग एक-चौथाई के स्तर पर काफी पीछे है।
    • हरित हिस्सेदारी का अंतराल: भारत की अंतिम औद्योगिक ऊर्जा में ‘ग्रीन इलेक्ट्रॉनों’ (नवीकरणीय ग्रिड पावर) की हिस्सेदारी केवल 7-8 प्रतिशत है, जो चीन और यूरोपीय संघ की तुलना में बहुत कम है।
    • CBAM का जोखिम: औद्योगिक प्रक्रियाओं (विशेष रूप से स्टील और सीमेंट) के तेजी से विद्युतीकरण के बिना, भारतीय निर्यात को यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) के तहत भारी दंड का सामना करना पड़ेगा।
  • UPSC प्रासंगिकता: “ऊर्जा सुरक्षा”, “सतत विनिर्माण” और “जलवायु परिवर्तन शमन रणनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रणनीतिक अनिवार्यता: घरेलू बिजली की ओर रुख करने से वैश्विक तेल और गैस की कीमतों के झटकों से बचाव होगा, जिससे राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता में वृद्धि होगी।
    • नीतिगत रोडमैप: लेखक ‘औद्योगिक विद्युतीकरण पर राष्ट्रीय मिशन’ की वकालत करते हैं, जिसका लक्ष्य MSME के कोयला बॉयलरों का विद्युतीकरण और ‘इलेक्ट्रिक-आर्क-फर्नेस’ (EAF) स्टील उत्पादन का विस्तार करना है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आईटी और कंप्यूटर; अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योग बुनियादी ढांचे के भारी चरण (चिप्स और डेटा सेंटर) से हटकर लाभदायक और वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों (Applications) पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • लाभप्रदता का दबाव: 2025 में बुनियादी ढांचे पर 320 अरब डॉलर खर्च करने के बावजूद, ओपनएआई (OpenAI) जैसे ‘फाउंडेशन मॉडल’ व्यवसाय उच्च प्रसंस्करण लागत के कारण कम लाभ मार्जिन का सामना कर रहे हैं।
    • अनुप्रयोगों में वृद्धि: व्यवसायों ने 2025 में एआई अनुप्रयोगों पर 19 अरब डॉलर खर्च किए, जो अब सभी जनरेटिव एआई खर्चों के आधे से अधिक है।
    • विभागीय एआई: वास्तविक मूल्य विशिष्ट क्षेत्रों में उभर रहा है; उदाहरण के लिए, एआई कोडिंग टूल्स का बाजार 2025 में 4 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
    • ऊर्ध्वाधर एकीकरण (Vertical Integration): स्वास्थ्य सेवा, कानून और वित्त जैसे विशिष्ट कार्यप्रवाहों में गहराई से एकीकृत समाधानों को अब सबसे अधिक “निवेश योग्य” एआई व्यवसाय माना जा रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “औद्योगिक क्रांति 4.0”, “डिजिटल अर्थव्यवस्था” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सर्कुलर फाइनेंसिंग (Circular Financing): संपादकीय चेतावनी देता है कि वर्तमान राजस्व आंकड़े अक्सर सर्कुलर फाइनेंसिंग से धुंधले होते हैं, जहाँ बुनियादी ढांचा प्रदाता उन्हीं मॉडलों को वित्तपोषित करते हैं जो उनकी सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं।
    • नियामक संतुलन: नीति निर्माताओं को चेतावनी दी गई है कि वे “एप्लिकेशन लेयर” को समय से पहले सख्त नियमों से न दबाएं, लेकिन उन्हें उन अधिग्रहणों के प्रति सतर्क रहना चाहिए जो संभावित प्रतिस्पर्धियों को खत्म कर देते हैं।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (न्यायपालिका; मौलिक अधिकार; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

  • संदर्भ: ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ (NALSAR) की एक रिपोर्ट से पता चला है कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले तीन वर्षों में एक भी मृत्युदंड की पुष्टि (Confirm) नहीं की है।
  • मुख्य बिंदु:
    • न्यायिक संशयवाद (Judicial Scepticism): जबकि निचली अदालतों ने अकेले 2025 में 128 व्यक्तियों को मौत की सजा सुनाई, उच्चतम न्यायालय का रुख लगातार प्रतिबंधात्मक होता जा रहा है।
    • गलत दोषसिद्धि की चिंता: शीर्ष अदालत ने 2025 में मृत्युदंड पाए 10 कैदियों को बरी कर दिया—जो एक दशक में सबसे अधिक संख्या है—जो निचली अदालतों के स्तर पर गंभीर त्रुटियों को उजागर करता है।
    • प्रक्रियात्मक उल्लंघन: 2025 में लगभग 95 प्रतिशत मृत्युदंड की सजाएं उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों (जैसे मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और शमन सुनवाई) का पालन किए बिना दी गईं।
    • बिना छूट के आजीवन कारावास: मृत्युदंड के निश्चित विकल्प के रूप में ‘बिना किसी छूट के आजीवन कारावास’ का उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “मानवाधिकार” और “दुर्लभतम से दुर्लभ” (Rarest of Rare) सिद्धांत के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • अपीलीय उलटफेर: उच्च न्यायालयों द्वारा पुष्टि किए गए 37 मृत्युदंड के मामलों में से जो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पहुँचे, 15 में कैदी बरी हो गए और 14 की सजा कम कर दी गई, जबकि एक की भी पुष्टि नहीं हुई।
    • डेथ रो (Death Row) पर लंबा इंतजार: रिपोर्ट के अनुसार 2025 के अंत तक भारत में 574 कैदी मृत्युदंड की प्रतीक्षा में थे, जिनमें से कई अंततः बरी होने से पहले पांच साल से अधिक जेल में बिता चुके हैं।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संघवाद; संवैधानिक निकाय; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: इस बात का विश्लेषण कि कैसे 16वें वित्त आयोग की उर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution) सिफारिशें राज्यों के दबाव के बजाय केंद्र के राजकोषीय स्थान को प्राथमिकता देती हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • हस्तांतरण में स्थिरता: 16वें वित्त आयोग ने उर्ध्वाधर हस्तांतरण दर को 41 प्रतिशत पर बनाए रखा, जबकि 18 राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की मांग की थी।
    • विभाज्य पूल का सिकुड़ना: केंद्र के कुल कर राजस्व में विभाज्य पूल (Divisible Pool) की हिस्सेदारी लगातार छह वर्षों से 90 प्रतिशत से नीचे गिर गई है, जिसका कारण उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) में बेतहाशा वृद्धि है।
    • गैर-साझा करने योग्य राजस्व: उपकर और अधिभार (जिन्हें केंद्र राज्यों के साथ साझा नहीं करता) 2011-12 में जीडीपी के 1.1 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में जीडीपी के 2.2 प्रतिशत हो गए।
    • राज्यों की आम सहमति की अनदेखी: आयोग ने केंद्र की प्राथमिकताओं का समर्थन किया, भले ही विभिन्न राज्यों के बीच राजकोषीय तनाव को लेकर एक दुर्लभ आम सहमति थी।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “संसाधन संग्रहण” और “केंद्र-राज्य वित्तीय घर्षण” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कर रणनीति का प्रभाव: मानक करों के बजाय उपकर (जैसे पेट्रोल/डीजल उपकर) का पक्ष लेकर, केंद्र प्रभावी रूप से राज्यों के लिए उपलब्ध “साझा करने योग्य राजस्व” को कम कर देता है।
    • उर्ध्वाधर असंतुलन: रिपोर्ट का तर्क है कि गैर-साझा उपकरणों पर वर्तमान निर्भरता वित्त आयोग की प्रतिशत-आधारित सिफारिशों को राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए कम प्रभावी बना देती है।

संपादकीय विश्लेषण

04 फरवरी, 2026
GS-3 ऊर्जा और उद्योग औद्योगिक विद्युतीकरण

दहन इंजनों की 35% दक्षता की तुलना में इलेक्ट्रिक मोटर 90% दक्षता प्रदान करते हैं। यूरोपीय संघ के CBAM दंड से बचने के लिए ‘हरित इलेक्ट्रॉनों’ की ओर रुख करना आवश्यक है।

GS-3 तकनीक AI: एप्लीकेशन लेयर

चिप से सॉफ्टवेयर की ओर बदलाव; वर्टिकल AI कानून और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश का केंद्र बना। फाउंडेशन मॉडल में सर्कुलर फाइनेंसिंग पर चेतावनी।

GS-2 संघवाद हस्तांतरण की दुविधा

उपकर (Cesses) बढ़कर जीडीपी का 2.2% हो गया। 16वें वित्त आयोग ने राज्यों की सहमति के बजाय केंद्र के राजकोषीय स्थान को प्राथमिकता देते हुए 41% की दर बरकरार रखी।

रणनीति: यदि भारत विशेष रूप से अमेरिका/वेनेजुएला के स्रोतों की ओर रुख करता है, तो ‘रूसी तेल पहेली’ एक बड़े भू-राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत देती है।
अर्थव्यवस्था: व्यापार घोषणा के तुरंत बाद रुपया सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया, जिसमें 1.28% की बढ़त दर्ज की गई।
विनिर्माण: भारत औद्योगिक विद्युतीकरण में 25% पर पिछड़ रहा है; राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता सुरक्षित करने के लिए एक ‘राष्ट्रीय मिशन’ की आवश्यकता है।
अधिकार: भारत में 574 कैदी मृत्युदंड की कतार में हैं; सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ‘बिना किसी छूट के आजीवन कारावास’ का एक निश्चित विकल्प बनाती है।
GS-4
विधि का शासन
न्याय और प्रक्रियात्मक अखंडता: जब मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन या न्यूनीकरण सुनवाई के बिना 95% मृत्युदंड दिए जाते हैं, तो यह निचली अदालतों की प्रणाली की एक नैतिक विफलता है। सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंधात्मक रुख गलत और अपरिवर्तनीय सजा के खिलाफ एक आवश्यक नैतिक बफर के रूप में कार्य करता है।

यहाँ महत्वपूर्ण खनिज बुनियादी ढांचेआपदा प्रबंधन मानचित्रण और रणनीतिक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

एक महत्वपूर्ण विकास के रूप में, हाई-टेक विनिर्माण के लिए आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित करने हेतु समर्पित दुर्लभ मृदा गलियारों की विस्तृत योजना बनाई गई है।

  • तटीय पट्टी का मानचित्रण: ये गलियारे मुख्य रूप से पूर्वी और दक्षिणी तटीय पट्टियों पर केंद्रित हैं, जिनमें विशेष रूप से निम्नलिखित राज्य शामिल हैं:
    • ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल।
  • खनिज केंद्र (Hubs): इन राज्यों के तटीय बालू (Beach sands) में पाए जाने वाले 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट (Monazite) भंडार को मानचित्र पर चिह्नित करें।
  • कठोर चट्टानी निक्षेप (Hard Rock Deposits): राजस्थान और गुजरात के उन विशिष्ट आंतरिक स्थलों को चिह्नित करें जहाँ 1.29 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा ऑक्साइड संसाधनों की पहचान की गई है।

4 फरवरी, 2026 को उत्तर-पूर्व के लिए एक नई एआई (AI) आधारित मानचित्रण परियोजना पर प्रकाश डाला गया, जो उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में अपनी सटीकता के लिए जानी जाती है।

  • सुभेद्यता (Vulnerability) मानचित्रण:
    • अत्यधिक उच्च जोखिम (Very High Risk): मेघालय का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा इसी श्रेणी में आता है।
    • पूर्वी खासी हिल्स (East Khasi Hills): इसे सबसे सुभेद्य जिले के रूप में पहचाना गया है, जिसका 730 वर्ग किमी क्षेत्र “अत्यधिक उच्च जोखिम” क्षेत्र के अंतर्गत वर्गीकृत है।
    • मानचित्र पर अन्य जिले: री भोई (Ri Bhoi), पश्चिम खासी हिल्स और जयंतिया हिल्स को भी मानचित्र पर अंकित करें।

रणनीतिक समुद्री और राजनयिक मानचित्रण IAS/PCS पाठ्यक्रम का एक मुख्य हिस्सा है।

  • सेशेल्स (राजकीय यात्रा):
    • मानचित्रण संदर्भ: हिंद महासागर में स्थित 115 द्वीपों वाला एक द्वीपसमूह राष्ट्र।
    • रणनीतिक महत्व: यह भारत की “ब्लू इकोनॉमी” (नीली अर्थव्यवस्था) और पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • तंजानिया (ज़ांज़ीबार):
    • मानचित्रण संदर्भ: भारत ने हाल ही में ‘चौथी संयुक्त रक्षा सहयोग समिति’ के माध्यम से ज़ांज़ीबार में संबंधों को मजबूत किया है।
    • प्रमुख स्थल: इसकी सीमाओं को विक्टोरिया झील (अफ्रीका की सबसे बड़ी झील) और तांगानिका झील (अफ्रीका की सबसे गहरी झील) के साथ मानचित्र पर दर्शाएं।
  • सुबनसिरी निचली जलविद्युत परियोजना (LHE): अरुणाचल प्रदेश में ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) की विफलताओं के संबंध में चिंताएं जताई गई हैं।
  • मैपिंग पॉइंट: अरुणाचल प्रदेश और असम की सीमा पर सुबनसिरी नदी (ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी) की स्थिति को पहचानें।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
खनिज गलियारादुर्लभ मृदा पेटी (Rare Earth Belt)ओडिशा से केरल तक का तटीय क्षेत्र
उच्च जोखिम क्षेत्रपूर्वी खासी हिल्समेघालय (भूस्खलन मानचित्र)
समुद्री भागीदारसेशेल्सपश्चिमी हिंद महासागर
नदी परियोजनासुबनसिरी LHEअरुणाचल-असम सीमा

खनिज संसाधनों का अध्ययन करते समय उन्हें उन राज्यों के बंदरगाहों के साथ जोड़कर देखें जहाँ से उनका निर्यात संभव है। उदाहरण के लिए, ओडिशा के दुर्लभ मृदा निक्षेपों को पारादीप बंदरगाह के साथ जोड़कर देखा जा सकता है।

मानचित्रण विवरण

महत्वपूर्ण खनिज एवं रणनीतिक भूगोल
खनिज गलियारे रणनीतिक दुर्लभ मृदा (Rare Earths)

ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में तटवर्ती रेत के मोनाजाइट भंडार पर केंद्रित। हार्ड-रॉक ऑक्साइड निक्षेपों के लिए राजस्थान/गुजरात को चिह्नित करें।

आपदा मानचित्रण भूस्खलन जोखिम सुस्पष्टता

नए AI मानचित्रण ने पूर्वी खासी हिल्स (मेघालय) को उच्च-जोखिम वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना है, जिसका 730 वर्ग किमी क्षेत्र “अत्यधिक उच्च सुभेद्यता” श्रेणी में है।

रणनीतिक कूटनीति
पश्चिमी हिंद महासागर आउटरीच

भारत सेशेल्स (115-द्वीपीय द्वीपसमूह) और तंजानिया (ज़ंजीबार) के साथ समुद्री सुरक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है, जो विक्टोरिया और तांगानिका झील की सीमा पर स्थित हैं।

जल-पर्यावरण
सुबनसिरी निचली परियोजना (LHE)

अरुणाचल-असम सीमा पर स्थित, सुबनसिरी नदी (ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी) पर बनी यह परियोजना प्रतिपूरक वनीकरण को लेकर जांच के घेरे में है।

महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाएँ

हाई-टेक विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण 13.15 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा संसाधनों को सुरक्षित करने के लिए पूर्वी तटीय पट्टी के साथ समर्पित गलियारों का मानचित्रण किया जा रहा है।

खनिज पट्टी ओडिशा से केरल तटरेखा।
उच्च जोखिम क्षेत्र पूर्वी खासी हिल्स (मेघालय)।
समुद्री सेशेल्स (पश्चिमी हिंद महासागर)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: भारत की हाई-टेक संप्रभुता के लिए तटवर्ती रेत मोनाजाइट और हार्ड-रॉक दुर्लभ मृदा ऑक्साइड की दोहरी एकाग्रता को समझना महत्वपूर्ण है। GS-III के लिए हिमालय-पूर्वोत्तर के व्यापक जोखिम मैट्रिक्स में पूर्वी खासी हिल्स की भूस्खलन सुभेद्यता को एकीकृत करें।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 3 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “बुनकर, लोहा पिघलाने वाले और फैक्ट्री मालिक” ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय हस्तशिल्प और उद्योगों के इतिहास, विशेष रूप से कपड़ा तथा लोहा और इस्पात उद्योगों पर केंद्रित है।

लगभग 1750 के आसपास, अंग्रेजों द्वारा बंगाल पर विजय प्राप्त करने से पहले, भारत दुनिया में सूती कपड़ों का सबसे बड़ा उत्पादक था। भारतीय कपड़े अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और बेजोड़ कारीगरी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे।

  • मलमल (Muslin): यूरोपीय व्यापारियों ने सबसे पहले भारत का बारीक सूती कपड़ा अरब व्यापारियों के पास इराक के मोसुल (Mosul) शहर में देखा था। इसी आधार पर उन्होंने बारीक बुनाई वाले सभी कपड़ों को ‘मलमल’ या ‘मसलिन’ कहना शुरू कर दिया।
  • कैलिको (Calico): जब पुर्तगाली मसालों की तलाश में सबसे पहले केरल के कालीकट (Calicut) तट पर उतरे, तो वे वहां से सूती कपड़े भी वापस ले गए। इन कपड़ों को कालीकट के नाम पर ‘कैलिको’ कहा जाने लगा। बाद में सभी सूती कपड़ों को सामान्यतः कैलिको ही कहा जाने लगा।
  • छींट (Chintz): यह हिंदी के शब्द ‘छींट’ से निकला है, जिसका अर्थ है रंगीन फूलों के छोटे-छोटे डिजाइन वाला कपड़ा। 1680 के दशक तक इंग्लैंड और यूरोप में भारतीय छींट की भारी मांग थी, क्योंकि इसका आकर्षण और बनावट बहुत सुंदर थी और यह अपेक्षाकृत सस्ता भी था।
  • बंडाना (Bandanna): यह हिंदी के ‘बाँधना’ शब्द से बना है। इसका उपयोग गले या सिर पर बाँधने वाले रंगीन छापेदार स्कार्फ के लिए किया जाता था, जिन्हें ‘टाई एंड डाई’ (बाँधने और रंगने) की विधि से बनाया जाता था।

18वीं शताब्दी की शुरुआत तक, इंग्लैंड में भारतीय कपड़ों की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि वहां के ऊन और रेशम निर्माताओं ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने 1720 में ‘कैलिको अधिनियम’ पारित किया, जिसके तहत इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़ों (छींट) के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई। भारतीय कपड़ों से मुकाबला करने के लिए ब्रिटिश निर्माताओं ने भारतीय डिजाइनों की नकल करना शुरू किया और तकनीकी नवाचारों की तलाश की:

  • स्पिनिंग जेनी (1764): जॉन के (John Kaye) द्वारा आविष्कृत इस मशीन ने एक ही मजदूर को एक साथ कई तकलियों पर काम करने की सुविधा दी, जिससे उत्पादन बढ़ गया।
  • भाप का इंजन (1786): रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright) के इस आविष्कार ने सूती कपड़े की बुनाई को क्रांतिकारी बना दिया, जिससे बहुत बड़ी मात्रा में और बहुत कम लागत पर कपड़े बुने जाने लगे।

बुनाई का कौशल विशिष्ट समुदायों के भीतर पीढ़ियों तक हस्तांतरित किया जाता था।

  • प्रसिद्ध समुदाय: इनमें बंगाल के तांती, उत्तर भारत के जुलाहे (या मोमिन) और दक्षिण भारत के साले, कैक्कोलार तथा देवांग समुदाय प्रमुख थे।
  • श्रम का विभाजन:
    • कताई (Spinning): यह मुख्य रूप से महिलाओं का काम था, जो चरखे और तकली का उपयोग करती थीं।
    • बुनाई (Weaving): यह काम ज्यादातर पुरुषों द्वारा किया जाता था।
    • रंगाई: कपड़ों को रंगने के लिए ‘रंगरेज़’ नामक विशेषज्ञ होते थे।
    • छपाई: छापेदार कपड़ा बनाने के लिए ‘चिप्पीगर’ नामक विशेषज्ञ ब्लॉक प्रिंटिंग का काम करते थे।

ब्रिटिश औद्योगिक उत्पादन के उदय ने भारतीय बुनकरों को कई तरह से बर्बाद कर दिया:

  1. बाज़ार की हानि: 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक ब्रिटिश निर्मित सूती कपड़ों ने भारतीय माल को अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप के पारंपरिक बाज़ारों से बाहर कर दिया।
  2. भारी सीमा शुल्क: ब्रिटेन में आयात किए जाने वाले भारतीय कपड़ों पर बहुत भारी टैक्स (Tariffs) लगा दिए गए।
  3. बेरोजगारी: जैसे ही यूरोपीय कंपनियों ने भारतीय माल खरीदना बंद किया, हज़ारों बुनकर (विशेषकर बंगाल के) अपनी आजीविका खो बैठे।
  4. स्थानीय बाज़ारों में ब्रिटिश कपड़े: 1880 के दशक तक, भारतीयों द्वारा पहने जाने वाले सूती कपड़ों का दो-तिहाई हिस्सा ब्रिटेन में बना होता था।
  • राष्ट्रवाद और खादी: हथकरघा बुनाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई क्योंकि मशीनों से वैसी बारीक किनारी या पारंपरिक पैटर्न नहीं बनाए जा सकते थे। बाद में महात्मा गांधी ने लोगों से विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने और ‘खादी’ अपनाने का आह्वान किया, जिससे चरखा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया।

भारत में धातु विज्ञान की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा थी, जिसका सबसे बेहतरीन उदाहरण टीपू सुल्तान की तलवार है।

  • वुड्स स्टील: टीपू की तलवार ‘वुड्स’ नामक विशेष उच्च-कार्बन स्टील से बनी थी, जो पूरे दक्षिण भारत में बनाया जाता था। इस स्टील की विशेषता इसकी धार की मजबूती और उस पर दिखने वाला “बहते पानी” जैसा पैटर्न था, जो लोहे में घुले हुए कार्बन के बेहद छोटे क्रिस्टल से बनता था।
  • प्रसिद्ध वैज्ञानिक और वुड्स: महान यूरोपीय वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने भी भारतीय वुड्स स्टील की विशेषताओं का चार वर्षों तक अध्ययन किया था।
  • प्रगलन (Smelting) की प्रक्रिया: लोहे को मिट्टी की छोटी-छोटी हंडियों में कोयले के साथ मिलाकर और तापमान को नियंत्रित करके यह स्टील तैयार किया जाता था।

19वीं शताब्दी में भारत का पारंपरिक लोहा गलाने का शिल्प निम्नलिखित कारणों से समाप्त हो गया:

  1. वन कानून: औपनिवेशिक सरकार ने आदिवासियों और शिल्पकारों को ‘आरक्षित वनों’ में प्रवेश करने से रोक दिया, जिससे उन्हें कोयला बनाने के लिए लकड़ी या लौह अयस्क मिलना बंद हो गया।
  2. भारी कर: जहाँ वनों में प्रवेश की अनुमति थी, वहां सरकार प्रत्येक भट्ठी (Furnace) पर बहुत ऊँचा टैक्स वसूलती थी।
  3. आयातित लोहा: 19वीं सदी के अंत तक, भारतीय लोहारों ने बर्तन बनाने के लिए ब्रिटेन से आने वाले सस्ते लोहे का इस्तेमाल शुरू कर दिया, जिससे स्थानीय लोहे की मांग घट गई।

‘टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी’ (TISCO) की स्थापना भारत में आधुनिक भारी उद्योग की शुरुआत थी।

  • अयस्क की खोज: 1904 में, चार्ल्स वेल्ड और दोराबजी टाटा ने अगरिया (Agaria) समुदाय की मदद से राजहरा पहाड़ियों (छत्तीसगढ़) में दुनिया के बेहतरीन लौह अयस्क भंडारों की खोज की।
  • जमशेदपुर: कारखाने के लिए सुवर्णरेखा नदी के तट पर एक स्थान चुना गया जहाँ अयस्क के पास ही पानी की पर्याप्त उपलब्धता थी।
  • प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव: 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर टिस्को का तेज़ी से विस्तार हुआ क्योंकि:
    1. ब्रिटेन से होने वाला स्टील का आयात कम हो गया क्योंकि वहां की फैक्ट्रियाँ युद्ध की जरूरतों को पूरा करने में लगी थीं।
    2. भारतीय रेलवे ने पटरियों के लिए टिस्को का रुख किया।
    3. युद्ध के लिए गोलों के खोल और गाड़ियों के पहिये बनाने का काम भी टिस्को को मिला।
  • सफलता: 1919 तक ब्रिटिश सरकार टिस्को में बनने वाले स्टील का 90% हिस्सा खुद खरीद रही थी, जिससे यह ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर सबसे बड़ा स्टील उद्योग बन गया।

निष्कर्ष: इस प्रकार, जहाँ ब्रिटिश नीतियों ने भारत के पारंपरिक कपड़ा और लोहा उद्योगों को नुकसान पहुँचाया, वहीं विश्व युद्ध की परिस्थितियों और भारतीय उद्यमियों के साहस ने आधुनिक उद्योगों की नींव रखी।

NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 7

बुनकर, लोहा पिघलाने वाले और फैक्ट्री मालिक

कपड़ा विरासत
वैश्विक केंद्र: 1750 के आसपास, भारत मलमल और छींट जैसे महीन सूती कपड़ों का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक था।
प्रतियोगिता: कैलिको अधिनियम (1720) ने स्थानीय ऊन और रेशम निर्माताओं की रक्षा के लिए इंग्लैंड में भारतीय छींट पर प्रतिबंध लगा दिया।
धातु विज्ञान
वुत्ज़ स्टील: उच्च कार्बन स्टील जिस पर “बहते पानी” जैसा पैटर्न होता था, इसका उपयोग टीपू सुल्तान की प्रसिद्ध तलवार बनाने के लिए किया गया था।
पतन और औद्योगिक उदय
मशीन युग: स्पिनिंग जेनी (1764) और स्टीम इंजन (1786) जैसे आविष्कारों ने ब्रिटेन को सस्ते कपड़े का बड़े पैमाने पर उत्पादन करने की अनुमति दी, जिसने भारतीय बुनकरों को तबाह कर दिया।
गलाने का संकट: औपनिवेशिक वन कानूनों ने चारकोल के लिए लकड़ी तक पहुंच को प्रतिबंधित कर दिया, जिससे 19वीं सदी के अंत तक लोहा गलाने की पारंपरिक कला समाप्त हो गई।
टिस्को (TISCO): 1912 (जमशेदपुर) में दोराबजी टाटा द्वारा स्थापित; अगरिया समुदाय ने राजहारा पहाड़ियों में लौह अयस्क खोजने में मदद की थी।
प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव: युद्ध के दौरान ब्रिटेन से स्टील का आयात कम होने के कारण टिस्को तेजी से बढ़ा, जिससे यह ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा स्टील उद्योग बन गया।
प्रतिरोध: हथकरघा बुनाई अपनी जटिल डिजाइनों के कारण जीवित रही, और बाद में खादी के माध्यम से राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गई।

छींट (Chintz)

हिंदी शब्द ‘छींट’ से निकला; रंगीन फूलदार कपड़ा जिसने यूरोप में एक सनक पैदा कर दी थी।

अगरिया

लोहा पिघलाने वालों का एक समुदाय जिसने टाटा को दुनिया के बेहतरीन लौह अयस्क भंडार तक पहुँचाया।

बंडाना

चमकीले मुद्रित सिर के स्कार्फ जिन्हें ‘बांधना’ (टाई-डाई) विधि के माध्यम से तैयार किया जाता था।

दुनिया की कार्यशाला
एक कारीगर कपड़ा केंद्र से आधुनिक औद्योगिक शक्ति के रूप में भारत का संक्रमण अस्तित्व की कहानी थी। औपनिवेशिक व्यापार बाधाओं के बावजूद, स्टील के उदय और हथकरघा के पुनरुद्धार ने भारतीय शिल्प कौशल के लचीलेपन को साबित किया।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-6 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स:उपनिवेशवाद और शहर

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संसद की निरंतरता और उसके सदस्यों की योग्यता व सत्यनिष्ठा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 83, 84 और 102 द्वारा शासित होती है।

राज्यसभा (स्थायी सदन):

  • राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे कभी भी भंग नहीं किया जा सकता
  • यह एक निरंतर चलने वाली संस्था है, लेकिन इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
  • सदस्यों का कार्यकाल: मूल संविधान में राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल निर्धारित नहीं किया गया था; इसे संसद पर छोड़ दिया गया था। बाद में, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951)’ के माध्यम से संसद ने सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष निर्धारित किया।

लोकसभा (अस्थायी सदन):

  • लोकसभा का सामान्य कार्यकाल इसकी पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष का होता है।
  • 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने पर यह स्वतः ही भंग हो जाती है। हालाँकि, राष्ट्रपति को 5 वर्ष पूरे होने से पहले भी इसे किसी भी समय भंग करने का अधिकार है।
  • आपातकाल में विस्तार: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, संसद कानून बनाकर लोकसभा के कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है (ऐसा कितनी भी बार किया जा सकता है)। लेकिन, आपातकाल समाप्त होने के बाद यह विस्तार 6 महीने से अधिक की अवधि के लिए जारी नहीं रह सकता।

संसद का सदस्य (MP) चुने जाने के लिए किसी व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए:

  • वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  • उसे निर्वाचन आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होगी और उस पर हस्ताक्षर करने होंगे।
  • न्यूनतम आयु:
    • राज्यसभा के लिए 30 वर्ष से कम नहीं।
    • लोकसभा के लिए 25 वर्ष से कम नहीं।
  • उसके पास ऐसी अन्य योग्यताएं होनी चाहिए जो संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून (जैसे—जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951) के तहत निर्धारित की गई हों (उदाहरण के लिए: उसे एक पंजीकृत मतदाता होना चाहिए)।

यह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। संविधान के अनुसार, कोई व्यक्ति संसद सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा यदि:

  • लाभ का पद (Office of Profit): वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो (मंत्री पद को छोड़कर)।
  • विकृत चित्त (Unsound Mind): यदि किसी सक्षम न्यायालय ने उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दिया हो।
  • दिवालिया (Insolvent): यदि वह एक ‘अशोधित दिवालिया’ (Insolvent) हो।
  • नागरिकता: यदि वह भारत का नागरिक नहीं है, या उसने स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता प्राप्त कर ली है, या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा रखता हो।
  • संसदीय कानून: यदि वह संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून (जैसे—RPA 1951) के तहत अयोग्य ठहराया गया हो।
    • नोट: RPA 1951 के तहत अयोग्यता के कुछ उदाहरण हैं: चुनावी अपराधों में दोषी होना, 2 या अधिक वर्षों की कैद, भ्रष्टाचार आदि।

निर्णय कौन लेता है? अनुच्छेद 102 के तहत अयोग्यता के प्रश्नों पर राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होता है। हालाँकि, निर्णय लेने से पहले राष्ट्रपति को निर्वाचन आयोग (Election Commission) की राय लेनी अनिवार्य है और वह उसी के अनुसार कार्य करेगा।

सदस्यों को दलबदल के आधार पर भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है, जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम (1985) द्वारा संविधान की ‘दसवीं अनुसूची’ में जोड़ा गया था:

  • स्वेच्छा से त्याग: यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
  • पार्टी के विरुद्ध मतदान: यदि वह सदन में अपने दल के निर्देशों (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
  • निर्दलीय सदस्य: यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
  • मनोनीत सदस्य: यदि कोई मनोनीत (Nominated) सदस्य अपने पद ग्रहण के 6 महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।

निर्णय कौन लेता है? दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय राज्यसभा के मामले में सभापति और लोकसभा के मामले में अध्यक्ष (Speaker) द्वारा लिया जाता है। 1992 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि सभापति/अध्यक्ष का यह निर्णय ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के अधीन है।

विशेषताराज्यसभा (Rajya Sabha)लोकसभा (Lok Sabha)
प्रकृतिस्थायी (भंग नहीं हो सकती)अस्थायी (5 वर्ष बाद भंग)
कार्यकाल6 वर्ष (RPA 1951 के तहत)5 वर्ष (सामान्यतः)
न्यूनतम आयु30 वर्ष25 वर्ष
अयोग्यता (अनुच्छेद 102)राष्ट्रपति द्वारा (निर्वाचन आयोग की सलाह पर)राष्ट्रपति द्वारा (निर्वाचन आयोग की सलाह पर)
दलबदल (10वीं अनुसूची)सभापति (Chairman) द्वाराअध्यक्ष (Speaker) द्वारा

हमेशा याद रखें कि ‘अनुच्छेद 102’ (सामान्य अयोग्यता) के लिए निर्णय राष्ट्रपति लेता है, जबकि ‘दसवीं अनुसूची’ (दलबदल) के लिए निर्णय सदन का पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) लेता है। इन दोनों के अंतर को समझना बहुत जरूरी है।

विधायी निरंतरता • भाग V • अनु. 83-102
संसदीय मानक

अवधि एवं सदस्यता

योग्यता
भारतीय नागरिकता, शपथ और आयु की आवश्यकता: राज्यसभा के लिए 30 वर्ष / लोकसभा के लिए 25 वर्ष
अनुच्छेद 102
अयोग्यताओं में लाभ का पद, विकृत चित्त, दिवालियापन, या नागरिकता का अभाव शामिल है।
सदनों की अवधि (अनु. 83)
राज्यसभा: एक स्थायी सदन; प्रत्येक दूसरे वर्ष 1/3 सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं। व्यक्तिगत कार्यकाल 6 वर्ष का होता है (RPA 1951 के माध्यम से)।
लोकसभा: सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष; समय से पहले विघटन के अधीन। आपातकाल के दौरान इसे एक बार में 1 वर्ष के लिए बढ़ाया जा सकता है।
निर्णायक प्राधिकारी
अनुच्छेद 102 के लिए, राष्ट्रपति चुनाव आयोग की सलाह पर निर्णय लेते हैं। दलबदल के लिए, पीठासीन अधिकारी निर्णय लेते हैं।

अयोग्यता

अनुच्छेद 102 के तहत निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिए जाते हैं। चुनाव आयोग (EC) की सलाह अनिवार्य और बाध्यकारी है।

दलबदल विरोधी

10वीं अनुसूची द्वारा शासित। लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति के पास अंतिम निर्णय लेने की शक्ति होती है।

न्यायिक समीक्षा

दलबदल पर पीठासीन अधिकारी के निर्णय उच्च न्यायालय/उच्चतम न्यायालय द्वारा समीक्षा के अधीन हैं।

नैतिक
रक्षक
52वां संशोधन (1985) दलीय अनुशासन सुनिश्चित करता है। यदि सदस्य दल बदलते हैं, पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करते हैं, या (निर्दलीय के लिए) चुनाव के बाद किसी दल में शामिल होते हैं, तो उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। मनोनीत सदस्यों को इस नियम के लागू होने से पहले किसी दल में शामिल होने के लिए 6 महीने का समय दिया जाता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (3 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: विश्व आर्द्रभूमि दिवस (2 फरवरी) के अवसर पर विशेषज्ञों ने इस बात को रेखांकित किया है कि भारत में मजबूत कानून होने के बावजूद पिछले तीन दशकों में लगभग 40 प्रतिशत आर्द्रभूमियाँ लुप्त हो गई हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • कार्यान्वयन का अंतराल: भारत में कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि ‘आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017’ के निरंतर और उच्च गुणवत्ता वाले कार्यान्वयन की कमी है।
    • पारिस्थितिक क्षरण: 40 प्रतिशत की हानि के अलावा, शेष बची हुई आर्द्रभूमियों में से लगभग 50 प्रतिशत प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण गंभीर पारिस्थितिक क्षरण के संकेत दे रही हैं।
    • आपदा लचीलापन: मैंग्रोव, कीचड़ के मैदान (mudflats) और शहरी आर्द्रभूमियों को “प्रकृति-आधारित बुनियादी ढांचे” के रूप में पहचाना गया है, जिन्हें आपदा न्यूनीकरण के लिए आवश्यक जोखिम बफर माना जाना चाहिए।
    • पारंपरिक ज्ञान: वर्ष 2026 का विषय बहाली (restoration) को मजबूत करने के लिए पारंपरिक सामुदायिक ज्ञान, जैसे वायनाड के ‘केनी’ (kenis) या तमिलनाडु के ‘कुलम’ (kulams) का उपयोग करने पर जोर देता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जैव विविधता संरक्षण”, “जलवायु परिवर्तन अनुकूलन” और “भारत में रामसर स्थल” से संबंधित विषयों के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जलागम शासन (Watershed Governance): विभागीय संकीर्णता (silos) से हटकर जलागम-स्तर के शासन की ओर बढ़ने और “सौंदर्यीकरण” के बजाय “पारिस्थितिक कार्यक्षमता” पर ध्यान केंद्रित करने की तत्काल आवश्यकता है।
    • राष्ट्रीय क्षमता मिशन: संपादकीय मौजूदा कौशल अंतराल को पाटने के लिए जल विज्ञान (hydrology), बहाली पारिस्थितिकी और GIS में आर्द्रभूमि प्रबंधकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की वकालत करता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।

  • संदर्भ: प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद, अमेरिका ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर अपने दंडात्मक टैरिफ (Punitive Tariff) को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमत हो गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • पारस्परिक कटौती: खबरों के अनुसार, भारत अमेरिका के खिलाफ अपने “टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं” को शून्य करने पर सहमत हो गया है।
    • ऊर्जा का केंद्र बदलना (Energy Pivot): एक महत्वपूर्ण बदलाव के तहत, भारत “रूसी तेल खरीदना बंद करने” पर सहमत हो गया है और इसके बजाय संयुक्त राज्य अमेरिका और संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदेगा।
    • व्यापार प्रतिबद्धता: इस समझौते में भारतीय पक्ष द्वारा 500 बिलियन डॉलर मूल्य के अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता शामिल है।
    • सीमा शुल्क तालमेल: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि 2026 के बजट में हालिया सीमा शुल्क (Customs Duty) कटौती एक बड़ी घरेलू सुधार योजना का हिस्सा थी, हालांकि वे अमेरिकी व्यापार मांगों के अनुरूप हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक और आर्थिक संबंध”, “ऊर्जा कूटनीति” और “वैश्विक व्यापार युद्ध” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • द्विपक्षीय तनाव में कमी: यह समझौता उस रिश्ते में एक सकारात्मक मोड़ है जो अगस्त 2025 में 50 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ लगाए जाने के बाद से गंभीर तनाव में था।
    • घरेलू प्रभाव: कम किए गए टैरिफ से अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध; संवैधानिक निकाय) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: 16वें वित्त आयोग (FC-16) ने वर्ष 2026-31 के लिए उर्ध्वाधर हस्तांतरण अनुपात (केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी) को 41 प्रतिशत पर बनाए रखने की सिफारिश की है।
  • मुख्य बिंदु:
    • क्षैतिज फॉर्मूला (Horizontal Formula) में बदलाव: “कर प्रयास” (tax effort) मानदंड को “जीडीपी में योगदान” के माप में बदल दिया गया है, और कुशल राज्यों को पुरस्कृत करने के लिए इसका भार 2.5% से बढ़ाकर 10% कर दिया गया है।
    • जनसंख्या का भार: जनसंख्या के आकार के भार में मामूली वृद्धि की गई है, जबकि जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (demographic performance) के भार को कम किया गया है, जो जनसंख्या वृद्धि को देखने के नजरिए में बदलाव को दर्शाता है।
    • उपकर और अधिभार का तनाव: आयोग ने केंद्र द्वारा उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) के बढ़ते उपयोग के कारण विभाज्य पूल के सिकुड़ने पर चिंता जताई है, लेकिन उन्हें साझा पूल में शामिल करने की सिफारिश नहीं की है।
    • शहरी स्थानीय अनुदान: आयोग ने शहरी स्थानीय निकायों (ULGs) को दिए जाने वाले अनुदान को तीन गुना कर दिया है, जिससे बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए ₹23.5 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “राजस्व साझाकरण तंत्र” और “राज्य की वित्तीय स्वायत्तता” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • क्रमिक पुनर्गठन: तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक राज्यों के लिए लाभ क्रमिक (incremental) है, क्योंकि आयोग उन राज्यों को अचानक बड़े झटके देने से बचना चाहता है जो हस्तांतरण पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
    • संरचनात्मक असंतुलन: संपादकीय का तर्क है कि सिफारिशें वित्तीय तनाव को तो पहचानती हैं लेकिन संघीय संतुलन बहाल करने के लिए आवश्यक संरचनात्मक परिवर्तनों पर जोर देने में विफल रहती हैं।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सामाजिक न्याय; स्वास्थ्य; न्यायपालिका) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: उच्चतम न्यायालय के एक ऐतिहासिक निर्णय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक ‘जीवन और गरिमा के अधिकार’ में समाहित कर दिया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • स्वायत्तता की परिभाषा: न्यायालय ने फैसला सुनाया कि लड़कियों के लिए शारीरिक स्वायत्तता (Bodily autonomy) तभी सार्थक है जब उनके पास कार्यशील शौचालय, पानी और स्वच्छ उत्पादों तक पहुंच हो।
    • दंडात्मक उपाय: राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक स्कूल में लिंग-आधारित अलग शौचालय हों; अनुपालन न करने पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है।
    • मासिक धर्म गरीबी (Menstrual Poverty): पीठ ने नोट किया कि सुविधाओं की कमी “मासिक धर्म गरीबी” पैदा करती है, जो लड़कियों को पुरुषों के समान स्तर पर शिक्षा के अधिकार का उपयोग करने से रोकती है।
    • कार्यान्वयन अंतराल: हालांकि 15-24 आयु वर्ग की 77.3% महिलाएं अब स्वच्छ तरीकों का उपयोग करती हैं (NFHS-5), लेकिन पात्र महिलाओं का लगभग एक चौथाई हिस्सा अभी भी सहायता के बिना है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “स्वास्थ्य के प्रति अधिकार-आधारित दृष्टिकोण”, “महिला सशक्तिकरण” और “न्यायिक सक्रियता” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • दायित्व का हस्तांतरण: यह निर्णय लड़कियों द्वारा नियमित रूप से सामना किए जाने वाले “कलंक, रूढ़िवादिता और अपमान” को दूर करने की जिम्मेदारी सीधे राज्य पर डालता है।
    • नीतिगत एकीकरण: ‘पैड प्रोजेक्ट’ का आदर्श वाक्य— “मासिक धर्म से एक वाक्य (sentence) समाप्त होना चाहिए, किसी लड़की की शिक्षा नहीं”—इस फैसले के लिए प्रेरणा बना।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार; सरकारी बजट)।

  • संदर्भ: बजट 2026-27 का विश्लेषण एक ऐसे सिद्धांत की ओर संक्रमण का सुझाव देता है जो श्रम अवशोषण (Labour absorption) के बजाय पूंजीगत व्यय (Capex) और ऋण को प्राथमिकता देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • कैपेक्स (Capex) का सिद्धांत: पूंजीगत व्यय 2020-21 के कुल व्यय के 12% से बढ़कर 22% से अधिक हो गया है। यह अब राजकोषीय नीति की रीढ़ के रूप में कार्य कर रहा है।
    • रोजगार का विच्छेद: भारी सार्वजनिक निवेश के बावजूद, युवा NEET दर (वे जो शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में नहीं हैं) 23%-25% के उच्च स्तर पर बनी हुई है।
    • संरचनात्मक उलटफेर: विकास सिद्धांत की अवहेलना हो रही है क्योंकि निर्माण क्षेत्र की रोजगार लोच (Employment elasticity) कम हो रही है, जबकि कृषि—जो एक कम उत्पादकता वाला क्षेत्र है—श्रम को फिर से अवशोषित कर रहा है।
    • दोहरी अर्थव्यवस्था: एक पूंजी-प्रधान ऊपरी परत जीडीपी विकास को चलाती है, जबकि एक विशाल निचली परत कम उत्पादकता वाली अनौपचारिकता और स्व-रोजगार में समाहित हो रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “रोजगार विहीन विकास” (Jobless Growth), “औद्योगिक उत्पादन संरचना” और “मैक्रो-राजकोषीय रुझान” को समझने के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • बढ़ती खाई: प्रति श्रमिक शुद्ध मूल्यवर्धन (Net value added) में तेजी से वृद्धि हुई है, लेकिन औसत वेतन उस गति से नहीं बढ़ा है। यह बताता है कि दक्षता से होने वाला लाभ श्रम आय के बजाय मुनाफे के रूप में जा रहा है।
    • प्राथमिकताओं का पुनर्गठन: रोजगार को अब एक प्राथमिक चर (Variable) के रूप में नहीं देखा जा रहा है जिसे नीति द्वारा बनाया जाए, बल्कि इसे विकास के एक संभावित सह-उत्पाद (By-product) के रूप में छोड़ दिया गया है।

संपादकीय विश्लेषण

03 फरवरी, 2026
GS-2 IR / व्यापार भारत-अमेरिका व्यापार धुरी

अमेरिका ने टैरिफ घटाकर 18% किया। भारत रूसी तेल से हटने पर सहमत हुआ और अमेरिकी उत्पादों की $500 बिलियन की खरीद के लिए प्रतिबद्धता जताई।

GS-2 संघवाद / अर्थव्यवस्था FC-16 राजकोषीय सूत्र

“जीडीपी में योगदान” के लिए क्षैतिज भार बढ़ाकर 10% किया गया। शहरी स्थानीय निकायों को अनुदान तीन गुना बढ़ाकर ₹23.5 लाख करोड़ किया गया।

GS-3 श्रम पूंजीगत व्यय बनाम रोजगार

युवाओं की NEET दर 23%-25% के उच्च स्तर पर। जीडीपी पूंजी-गहन परत द्वारा संचालित है जबकि श्रम कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में पुनः समाहित हो रहा है।

पर्यावरण: बहाली के लिए वायनाड की केनिस (Kenis) जैसे पारंपरिक सामुदायिक ज्ञान का उपयोग करना महत्वपूर्ण है।
संघवाद: 41% ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण हिस्सेदारी को बनाए रखना स्थिरता प्रदान करता है लेकिन गहरे संरचनात्मक सुधार से चूक जाता है।
सामाजिक: शारीरिक स्वायत्तता तभी सार्थक है जब लड़कियों की पहुंच कार्यात्मक और लिंग-पृथक शौचालयों तक हो।
अर्थव्यवस्था: प्रति श्रमिक शुद्ध मूल्य वृद्धि बढ़ रही है, फिर भी श्रम पारिश्रमिक पीछे है, जो दर्शाता है कि दक्षता लाभ को लाभ के रूप में प्राप्त किया जा रहा है।
GS-4
मानवीय गरिमा
एक मौलिक अधिकार के रूप में गरिमा: सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह स्वीकार करता है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य केवल एक जैविक वास्तविकता नहीं बल्कि एक संवैधानिक कर्तव्य है। मासिक धर्म से जुड़े कलंक और रूढ़ियों को खत्म करना बालिकाओं के लिए वास्तविक समानता और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

यहाँ केंद्रीय बजट 2026-27 और ‘विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026’ की घोषणाओं से उत्पन्न होने वाले रणनीतिक भौगोलिक अद्यतनों (Updates) का विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

2 फरवरी, 2026 तक भारत का रामसर नेटवर्क आधिकारिक तौर पर 98 स्थलों तक पहुँच गया है, जो एशिया में अग्रणी देश के रूप में इसकी स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करता है।

नया रामसर स्थलजिला / राज्यमुख्य विशेषताएं
पटना पक्षी अभयारण्यएटा, उत्तर प्रदेशयह एक अत्यंत महत्वपूर्ण लघु आर्द्रभूमि (108.8 हेक्टेयर) है जो पक्षियों की 178 से अधिक प्रजातियों का आश्रय स्थल है; यह ‘सारस क्रेन’ (Sarus Crane) के लिए एक प्रमुख शीतकालीन आवास के रूप में कार्य करता है।
छारी-ढंढ (Chhari-Dhand)कच्छ, गुजरातयह एक मौसमी मरुस्थलीय आर्द्रभूमि है; यहाँ ‘कैराकल’ (Caracal), मरुस्थलीय लोमड़ी और धूसर भेड़िये (Grey Wolf) जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

बजट 2026 ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एक नया “संसाधन मानचित्र” (Resource Map) पेश किया है।

  • दुर्लभ मृदा (Rare Earth) गलियारे: दुर्लभ खनिजों जैसे ‘मोनाज़ाइट’ (जिसका उपयोग उच्च श्रेणी के चुंबक बनाने में होता है) के खनन को बढ़ावा देने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विशेष गलियारे नियोजित किए गए हैं।
  • पूर्वी तट औद्योगिक गलियारा (ECIC): पूर्वी भारत में विनिर्माण संपर्कों को बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक नए ‘नोड’ (Node) की घोषणा की गई है।
  • दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPM) केंद्र: इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और एयरोस्पेस के लिए अनिवार्य चुंबकों के निर्माण हेतु रणनीतिक बिंदु।

शहरी आर्थिक क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सात नए उच्च गति रेल (High-speed rail) गलियारों का मानचित्रण किया गया है।

मानचित्र पर चिह्नित किए जाने वाले 7 गलियारे:

  1. मुंबई – पुणे
  2. पुणे – हैदराबाद
  3. हैदराबाद – बेंगलुरु
  4. हैदराबाद – चेन्नई
  5. चेन्नई – बेंगलुरु
  6. दिल्ली – वाराणसी
  7. वाराणसी – सिलीगुड़ी (यह रणनीतिक रूप से “चिकन नेक” कॉरिडोर को जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण है)।
  • राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (National Large Solar Telescope): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास स्थापित किया जा रहा है—यह सौर अनुसंधान के लिए एक प्रमुख उच्च-ऊंचाई वाला मानचित्रण बिंदु है।
  • राष्ट्रीय विशाल ऑप्टिकल दूरबीन (30 मीटर): यह नई “विशाल विज्ञान” (Mega Science) बुनियादी ढांचा परियोजना का हिस्सा है।
  • पुरातात्विक उन्नयन: 15 विरासत स्थलों का व्यापक विकास किया जाएगा, जिनमें राखीगढ़ी (हरियाणा), धौलावीरा (गुजरात) और लेह पैलेस (लद्दाख) शामिल हैं, ताकि यहाँ आगंतुकों के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं प्रदान की जा सकें।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुवर्तमान 2026 का संदर्भ
आर्द्रभूमि मील का पत्थर98 स्थलस्थलों की संख्या के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है।
खनिज फोकसदुर्लभ मृदा गलियारेओडिशा से केरल तक फैला 4 राज्यों का बेल्ट।
रणनीतिक संपर्कवाराणसी – सिलीगुड़ीउत्तर-पूर्व का प्रवेश द्वार, नया उच्च गति रेल मार्ग।
सौर विज्ञान केंद्रपैंगोंग झील‘नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप’ का निर्माण स्थल।

UPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से, उच्च गति रेल गलियारों को उन औद्योगिक गलियारों (जैसे DMIC) के साथ जोड़कर देखें जिनसे वे गुजरते हैं। इससे आपको आर्थिक और परिवहन भूगोल के अंतर्संबंधों को समझने में मदद मिलेगी।

मानचित्रण विवरण

बजट 2026 एवं संसाधन मानचित्रण
आर्द्रभूमि अपडेट 98 रामसर स्थल

हाल के जुड़ावों में पटना पक्षी अभयारण्य (UP) और मरुस्थलीय आर्द्रभूमि छारी-ढांढ (GJ) शामिल हैं, जो दुर्लभ कराकल का आवास है।

खनिज संसाधन मानचित्र दुर्लभ मृदा गलियारे

REPM चुंबक निर्माण को ईंधन देने के लिए मोनाजाइट खनन हेतु 4 राज्यों (ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु) की पट्टी पर रणनीतिक ध्यान।

हाई-स्पीड रेल (HSR)
शहरी विकास के सूत्रधार

सात नए HSR गलियारों का मानचित्रण, विशेष रूप से वाराणसी–सिलीगुड़ी लिंक जो रणनीतिक रूप से ‘चिकन नेक’ को उत्तर भारत के आर्थिक केंद्रों से जोड़ता है।

मेगा विज्ञान बुनियादी ढांचा
उच्च-ऊंचाई वाले रणनीतिक केंद्र

उन्नत अनुसंधान के लिए पेंगोंग झील, लद्दाख के पास नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप के साथ 30-मीटर ऑप्टिकल टेलिस्कोप की स्थापना।

विरासत पुरातत्व

राखीगढ़ी (HR), धोलावीरा (GJ) और लेह पैलेस सहित 15 स्थलों का उन्नयन ताकि पर्यटन को स्थानिक इतिहास के साथ एकीकृत किया जा सके।

98वां रामसर छारी-ढांढ (कच्छ, GJ)।
महत्वपूर्ण खनिज दुर्लभ मृदा हब (4 राज्य)।
सौर विज्ञान पेंगोंग झील हब (लद्दाख)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: बजट 2026 ‘संसाधन मानचित्र’ को ‘खनिज संप्रभुता’ की ओर स्थानांतरित करता है। दुर्लभ मृदा गलियारों और मौजूदा बंदरगाह बुनियादी ढांचे के बीच ओवरलैप की पहचान करना GS-III आर्थिक विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 2 फ़रवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “उपनिवेशवाद और शहर” मुख्य रूप से दिल्ली के उदाहरण के माध्यम से बताता है कि औपनिवेशिक शासन के दौरान भारतीय शहरों में किस तरह के बदलाव आए।

ब्रिटिश शासन के तहत, व्यापार और सत्ता के समीकरण बदलने से भारतीय शहरों का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।

  • औद्योगिक शहरों का विकास: पश्चिम (जैसे इंग्लैंड) में, औद्योगीकरण के कारण लीड्स और मैनचेस्टर जैसे शहर तेज़ी से बढ़े। इसके विपरीत, 19वीं शताब्दी में भारतीय शहरों का विस्तार उतनी तेज़ी से नहीं हुआ।
  • प्रेसीडेंसी शहरों का उदय: कलकत्ता, बंबई और मद्रास ‘प्रेसीडेंसी शहर’ बन गए। ये ब्रिटिश सत्ता, व्यापार और प्रशासन के मुख्य केंद्र थे।
  • वि-शहरीकरण: कई पुराने विनिर्माण (Manufacturing) और बंदरगाह वाले शहरों का पतन हुआ।
    • पतन के कारण: खास चीजों की मांग में कमी, व्यापार का नए ब्रिटिश बंदरगाहों की ओर मुड़ जाना और स्थानीय शासकों की हार के बाद क्षेत्रीय सत्ता केंद्रों का ढह जाना।
    • प्रभावित शहर: 19वीं शताब्दी में मछलीपट्टनम, सूरत और श्रीरंगपट्टनम वि-शहरीकरण के प्रमुख उदाहरण थे।

अंग्रेजों द्वारा किए गए बदलावों से पहले, दिल्ली का सबसे प्रसिद्ध स्वरूप ‘शाहजहानाबाद’ था, जिसे शाहजहाँ ने 1639 में बनवाना शुरू किया था।

  • संरचना: इसमें लाल किला (महल परिसर) और उससे सटा हुआ 14 द्वारों वाला एक ‘किलेबंद शहर’ शामिल था।
  • मुख्य स्थल:
    • जामा मस्जिद: भारत की सबसे बड़ी और भव्य मस्जिदों में से एक। उस समय पूरे शहर में इस मस्जिद से ऊँचा कोई स्थान नहीं था।
    • चाँदनी चौक: एक चौड़ी मुख्य सड़क जिसके बीचों-बीच एक नहर बहती थी।
  • संस्कृति: यह शहर सूफी संस्कृति का केंद्र था, जहाँ दरगाहें, खानकाहें और ईदगाहें बड़ी संख्या में थीं।
  • सामाजिक विभाजन: इसकी सुंदरता के बावजूद, अमीर (जो ‘हवेलियों’ में रहते थे) और गरीब (जो मिट्टी के घरों में रहते थे) के बीच गहरा अंतर था।

अंग्रेजों ने 1803 में दिल्ली पर नियंत्रण प्राप्त किया। शुरुआत में, उनका दृष्टिकोण अन्य औपनिवेशिक शहरों की तुलना में थोड़ा अलग था।

  • प्रारंभिक सह-अस्तित्व: 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में, अंग्रेज किलेबंद शहर के भीतर ही धनी भारतीयों के साथ रहते थे और उर्दू/फारसी संस्कृति का आनंद लेते थे।
  • दिल्ली पुनर्जागरण: 1830 से 1857 की अवधि को अक्सर ‘पुनर्जागरण’ (Renaissance) कहा जाता है, क्योंकि दिल्ली कॉलेज में विज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में बौद्धिक विकास हुआ था।
  • 1857 का प्रभाव: 1857 के विद्रोह के बाद, अंग्रेजों ने दिल्ली के मुगल अतीत को मिटाने की कोशिश की।
    • उन्होंने लाल किले के आसपास के इलाकों को साफ कर दिया, उद्यानों और मंडपों को नष्ट कर दिया।
    • मस्जिदों का उपयोग अन्य कार्यों के लिए किया गया; जैसे जीनत-अल-मस्जिद को बेकरी में बदल दिया गया।
    • शहर का एक तिहाई हिस्सा ढहा दिया गया और अंग्रेज उत्तर में स्थित ‘सिविल लाइन्स’ (Civil Lines) क्षेत्र में चले गए।

1911 में, अंग्रेजों ने राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की।

  • वास्तुकार: एडवर्ड लुटियंस और हर्बर्ट बेकर को रायसीना हिल पर 10 वर्ग मील के नए शहर को डिजाइन करने का काम सौंपा गया।
  • सत्ता का प्रतीक: इमारतों को ब्रिटिश महत्व को दर्शाने के लिए डिजाइन किया गया था।
    • वाइसराय पैलेस (अब राष्ट्रपति भवन) को जानबूझकर जामा मस्जिद से ऊँचा बनाया गया था।
    • वास्तुकला की शैलियों में प्राचीन यूनान (Greece), सांची के बौद्ध स्तूप और मुगलों की जालियों का मिश्रण था।
  • डिजाइन दर्शन: पुराने शहर की “अराजकता” और “भीड़भाड़ वाले मोहल्लों” के विपरीत, नई दिल्ली में चौड़ी, सीधी सड़कें और बड़े बंगले थे।
  • स्वास्थ्य और स्वच्छता: नई दिल्ली को एक “स्वच्छ और स्वस्थ स्थान” के रूप में नियोजित किया गया था, जिसमें बेहतर जल आपूर्ति, जल निकासी और ताजी हवा के लिए हरे-भरे पेड़ थे।

1947 में भारत के विभाजन ने दिल्ली की जनसंख्या और संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया।

  • जनसंख्या परिवर्तन: हज़ारों मुसलमान पाकिस्तान चले गए, जबकि पंजाब से सिख और हिंदू शरणार्थी दिल्ली में आ गए। दिल्ली की आबादी रातों-रात बढ़ गई।
  • शरणार्थी जीवन: लगभग 5,00,000 प्रवासियों को बसाने के लिए लाजपत नगर और तिलक नगर जैसी नई कॉलोनियाँ बनीं।
  • सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन: प्रवासियों के व्यवसाय (जमींदार, वकील, व्यापारी) उन कारीगरों और मजदूरों से अलग थे जिनकी जगह उन्होंने ली थी। उर्दू आधारित शहरी संस्कृति की जगह पंजाब से आए खान-पान, पहनावे और कला के नए रुझानों ने ले ली।
विशेषताहवेली (मुगलकालीन हवेली)औपनिवेशिक बंगला (Colonial Bungalow)
निवासीकई परिवार एक साथ रहते थे।केवल एक नाभिकीय (छोटा) परिवार।
डिजाइनआंगन और फव्वारों के साथ ऊँची दीवारों वाले घेरे।ढलवाँ छत और चौड़े बरामदे वाला एक मंजिला घर।
लैंगिक स्थानपुरुषों के लिए बाहरी आंगन; महिलाओं के लिए भीतरी हिस्सा।अलग लिविंग रूम, डाइनिंग रूम और बेडरूम।
परिसरशहर के भीतर घनी आबादी के बीच स्थित।एक या दो एकड़ के खुले मैदान में बना।
  1. खानकाह: यात्रियों के विश्राम के लिए सूफी सराय।
  2. ईदगाह: मुसलमानों का खुला प्रार्थना स्थल।
  3. दरगाह: सूफी संत का मकबरा।
  4. कुल-दे-सैक (Cul-de-sac): ऐसी सड़क जो आगे जाकर बंद हो जाती है।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 6

उपनिवेशवाद और शहर

शहरी परिवर्तन
प्रेसीडेंसी शहर: कलकत्ता, बंबई और मद्रास व्यापारिक केंद्रों के रूप में उभरे, जबकि सूरत जैसे पुराने बंदरगाहों का पतन हुआ (वि-शहरीकरण)।
शाहजहानाबाद: लाल किले और जामा मस्जिद के साथ 1639 में निर्मित; सूफी संस्कृति और भव्य हवेलियों का केंद्र।
पुनर्जागरण
1830–1857: दिल्ली कॉलेज में बौद्धिक विकास का काल। 1857 के विद्रोह के बाद यह अचानक समाप्त हो गया जब अंग्रेजों ने पुराने शहर को खाली करा दिया।
नई दिल्ली का निर्माण
1911 राजधानी परिवर्तन: अंग्रेजों ने अपनी शाही वैधता को पुनः स्थापित करने के लिए राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित किया।
वास्तुकला की दृष्टि: एडवर्ड लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने रायसीना हिल्स पर नई दिल्ली का डिजाइन तैयार किया, जिसमें सीधी चौड़ी सड़कों और स्वास्थ्य-केंद्रित योजना पर जोर दिया गया।
सत्ता का प्रतीक: वायसराय पैलेस को जामा मस्जिद से ऊँचा बनाया गया ताकि मुगल अतीत पर ब्रिटिश प्रभुत्व का प्रतीक दिखे।
विभाजन (1947): मुस्लिम निवासियों के पाकिस्तान पलायन और पंजाब से आए 5,00,000 हिंदू और सिख शरणार्थियों के कारण शहर की संस्कृति बदल गई।
नया शहरी स्वरूप: लाजपत नगर जैसी शरणार्थी कॉलोनियां उभरीं, और एक नई पंजाबी-प्रभावित संस्कृति ने पुरानी उर्दू-आधारित परंपराओं की जगह ले ली।

हवेली

मुगलकालीन हवेलियां जिनमें आंगन और कई परिवारों के लिए अलग-अलग स्थान होते थे।

बंगला

औपनिवेशिक एकल-परिवार घर जिनमें ढालू छतें, बरामदे और विशाल खुले मैदान होते थे।

गुलिस्तां

पुरानी दिल्ली की बगीचे जैसी गुणवत्ता, जिसका अधिकांश हिस्सा 1857 के बाद नष्ट कर दिया गया था।

दोहरे शहर
औपनिवेशिक दिल्ली दो शहरों की कहानी थी: भीड़भाड़ वाला, ऐतिहासिक शाहजहानाबाद और विस्तृत, व्यवस्थित नई दिल्ली। यह बदलाव मुगल परंपरा को एक ‘आधुनिक’ शाही व्यवस्था से बदलने की ब्रिटिश इच्छा को दर्शाता था।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-6 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स:उपनिवेशवाद और शहर

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भारतीय संविधान के अंतर्गत, संसद केवल दो सदनों से मिलकर नहीं बनी है; यह एक तीन-भाग वाला निकाय है।
संसद = राष्ट्रपति + राज्यसभा + लोकसभा।

यह अनुच्छेद निर्दिष्ट करता है कि संघ के लिए एक संसद होगी, जिसमें राष्ट्रपति और दो सदन शामिल होंगे, जिन्हें क्रमशः राज्यसभा (राज्यों की परिषद) और लोकसभा (लोगों का सदन) के रूप में जाना जाएगा।

  • विशेष नोट: यद्यपि राष्ट्रपति किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता है, फिर भी वह संसद का एक अभिन्न अंग है क्योंकि राष्ट्रपति की सहमति के बिना कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता है।

राज्यसभा एक स्थायी निकाय है और इसे भंग (Dissolve) नहीं किया जा सकता। यह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करती है।

  • अधिकतम सदस्य संख्या: 250
    • 238 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि होते हैं (अप्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित)।
    • 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं (कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र से)।
  • वर्तमान सदस्य संख्या: 245 (233 निर्वाचित + 12 मनोनीत)।
  • निर्वाचन प्रक्रिया:
    • राज्यों के प्रतिनिधियों का चुनाव राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों (MLAs) द्वारा किया जाता है।
    • पद्धति: एकल संक्रमणीय मत (Single Transferable Vote) के माध्यम से आनुपातिक प्रतिनिधित्व।
  • प्रतिनिधित्व: सीटें राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर आवंटित की जाती हैं। (अमेरिकी सीनेट के विपरीत, जहाँ प्रत्येक राज्य को बराबर प्रतिनिधित्व मिलता है)।

लोकसभा ‘लोकप्रिय सदन’ है, जो समग्र रूप से भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करती है।

  • अधिकतम सदस्य संख्या: 550 (पहले यह 552 थी, लेकिन 104वें संविधान संशोधन द्वारा एंग्लो-इंडियन के लिए आरक्षित 2 सीटों को समाप्त कर दिया गया है)।
    • 530 सदस्य राज्यों के प्रतिनिधि।
    • 20 सदस्य केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि।
  • वर्तमान सदस्य संख्या: 543 (सभी निर्वाचित)।
  • निर्वाचन प्रक्रिया:
    • सदस्यों का चुनाव ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार’ के आधार पर सीधे जनता द्वारा किया जाता है।
    • प्रत्येक नागरिक जो 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुका है (61वां संशोधन अधिनियम, 1988), उसे वोट देने का अधिकार है।
  • प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्र: प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में इस प्रकार विभाजित किया जाता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या और उसे आवंटित सीटों की संख्या का अनुपात पूरे राज्य में समान रहे।
विशेषताराज्यसभा (राज्यों की परिषद)लोकसभा (लोगों का सदन)
सामान्य नामउच्च सदन / बुजुर्गों का सदननिम्न सदन / लोकप्रिय सदन
कार्यकालस्थायी निकाय (1/3 सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं)5 वर्ष (समय से पहले भंग की जा सकती है)
पीठासीन अधिकारीउपराष्ट्रपति (पदेन सभापति)अध्यक्ष (स्पीकर)
न्यूनतम आयु30 वर्ष25 वर्ष
अधिकतम संख्या250550
चुनाव का प्रकारअप्रत्यक्ष (विधायकों द्वारा)प्रत्यक्ष (जनता द्वारा)
  • राज्यसभा: यह एक स्थायी सदन है। इसके सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष का होता है। इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दो वर्ष बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
  • लोकसभा: इसका सामान्य कार्यकाल 5 वर्ष है। हालाँकि, राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में, संसद कानून बनाकर इसके कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है (इसकी कोई अधिकतम सीमा नहीं है, लेकिन आपातकाल खत्म होने के बाद यह 6 महीने से अधिक नहीं बढ़ सकता)।

राज्यसभा में राज्यों का प्रतिनिधित्व जनसंख्या पर आधारित है, इसीलिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सीटें अधिक हैं और छोटे राज्यों की कम। इसके विपरीत, अमेरिका में प्रत्येक राज्य को उसकी जनसंख्या की परवाह किए बिना सीनेट में 2 सीटें दी जाती हैं।

संघीय विधायिका • भाग V • अनु. 79-83
भारत का संविधान

संसद का गठन

अनुच्छेद 79
संसद राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा से मिलकर बनती है। राष्ट्रपति की सहमति के बिना कोई भी विधेयक कानून नहीं बनता।
अवधि (अनु. 83)
RS: स्थायी सदन।
LS: 5 साल का कार्यकाल (राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान बढ़ाया जा सकता है)।
राज्यसभा (अनु. 80)
संख्या: अधिकतम 250 (वर्तमान 245)। इसमें कला, विज्ञान, साहित्य और समाज सेवा में उत्कृष्टता के लिए राष्ट्रपति द्वारा 12 सदस्य मनोनीत किए जाते हैं।
निर्वाचन: राज्यों के विधायकों (MLAs) द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से अप्रत्यक्ष चुनाव। सीटें जनसंख्या के आधार पर आवंटित की जाती हैं।
लोकसभा (अनु. 81)
संख्या: अधिकतम 550। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (आयु 18+) के आधार पर जनता द्वारा प्रत्यक्ष चुनाव।
संरचना: राज्यों से 530 प्रतिनिधि + केंद्र शासित प्रदेशों से 20। निर्वाचन क्षेत्रों को समान जनसंख्या-सीट अनुपात बनाए रखने के लिए विभाजित किया गया है।

न्यूनतम आयु

सदस्य बनने के लिए, राज्यसभा के लिए 30 वर्ष और लोकसभा के लिए 25 वर्ष की आयु आवश्यक है।

सदनों के नाम

RS: उच्च सदन / राज्यों की परिषद।
LS: निम्न सदन / जनता का सदन।

पीठासीन अधिकारी

RS: उपराष्ट्रपति (पदेन सभापति)।
LS: अध्यक्ष/स्पीकर (सदस्यों द्वारा निर्वाचित)।

प्रमुख
संशोधन
61वें संशोधन (1988) ने मतदान की आयु 21 से घटाकर 18 कर दी। हाल ही में, 104वें संशोधन अधिनियम ने लोकसभा में आंग्ल-भारतीय समुदाय के 2 सदस्यों को मनोनीत करने के प्रावधान को समाप्त कर दिया, जिससे अधिकतम संख्या 552 से घटकर 550 हो गई।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (2 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; सरकारी बजट; संसाधनों का संग्रहण)।

  • संदर्भ: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 21वीं सदी की दूसरी तिमाही का पहला केंद्रीय बजट 2026 प्रस्तुत किया है, जिसमें मुख्य रूप से उत्पादकता में वृद्धि और रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • राजकोषीय विवेक: इस बजट में किसी भी “बड़े बदलाव” (Big Bang) वाले सुधारों या प्रत्यक्ष करों में किसी बड़ी छूट से परहेज किया गया है। इसके बजाय, मध्यम अवधि के विकास को गति देने के लिए एक संतुलित और निरंतर दृष्टिकोण अपनाया गया है।
    • पूंजीगत व्यय का विस्तार: केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-2027 के लिए पूंजीगत व्यय का लक्ष्य 12.2 लाख करोड़ रुपये निर्धारित किया है, जो सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.4 प्रतिशत है। यह पिछले कम से कम 10 वर्षों में पूंजीगत निवेश का उच्चतम स्तर है।
    • राजकोषीय घाटा: वित्त वर्ष 2026-2027 के लिए राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद का 4.3 प्रतिशत रखा गया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 4.4 प्रतिशत के अनुमान से कम है।
    • अप्रत्यक्ष करों में राहत: समुद्री उत्पादों, चमड़ा उद्योग और कपड़ा क्षेत्रों के निर्यात को बढ़ावा देने और ऊर्जा संक्रमण का समर्थन करने के लिए सीमा शुल्क (Customs Duty) में महत्वपूर्ण कटौती की गई है।
    • नया आयकर अधिनियम: ‘आयकर अधिनियम 2025’ आधिकारिक रूप से 1 अप्रैल, 2026 से प्रभावी होगा। इसका मुख्य उद्देश्य प्रत्यक्ष कर कानूनों को संक्षिप्त, स्पष्ट और समझने में आसान बनाना है।
  • UPSC प्रासंगिकता: यह “समष्टि आर्थिक स्थिरता”, “पूंजीगत व्यय के आर्थिक प्रभाव” और “राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के मार्ग” से संबंधित प्रश्नों के लिए अनिवार्य है।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • तीन ‘कर्तव्य’: संपूर्ण बजट को तीन मुख्य कर्तव्यों के इर्द-गिर्द संरचित किया गया है: निरंतर विकास सुनिश्चित करना, जन-आकांक्षाओं को पूरा करना और देश के सभी क्षेत्रों व आर्थिक वर्गों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करना।
    • कर राजस्व का अनुमान: सरकार ने कर संग्रह के मामले में बहुत ही यथार्थवादी और सतर्क अनुमान लगाए हैं। कॉर्पोरेट कर में 14 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है, जबकि पिछले वर्ष दी गई रियायतों के कारण व्यक्तिगत आयकर की वृद्धि दर को 1.9 प्रतिशत पर ही सीमित रखा गया है।
    • मुआवजा उपकर की समाप्ति: वस्तु एवं सेवा कर (GST) से होने वाले राजस्व में 13.5 प्रतिशत की कमी का अनुमान है, जिसका मुख्य कारण ‘GST मुआवजा उपकर’ (Compensation Cess) की समाप्ति और वर्ष 2025 में की गई कर दरों की युक्तिकरण प्रक्रिया है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (औद्योगिक नीति; विनिर्माण क्षेत्र; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: यह बजट भारत की क्षमताओं को उच्च-मूल्य वाले और प्रौद्योगिकी-प्रधान क्षेत्रों में और अधिक गहरा करने की सरकार की मंशा को स्पष्ट करता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • रणनीतिक क्षेत्र: बजट में सात अत्यंत महत्वपूर्ण उद्योगों को प्राथमिकता दी गई है: जैव-भेषज (Biopharma), सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earths), रसायन, पूंजीगत वस्तुएं और कपड़ा उद्योग।
    • बायोफार्मा शक्ति (SHAKTI) योजना: ‘बायोलॉजिक्स’ और ‘बायोसिमिलर्स’ के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा। इसके साथ ही तीन नए ‘राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान’ (NIPER) स्थापित किए जाएंगे।
    • भारत सेमीकंडक्टर मिशन 2.0: इस मिशन के दूसरे चरण का उद्देश्य केवल चिप निर्माण (Fabrication) तक सीमित न रहकर उपकरणों और कच्ची सामग्रियों के घरेलू उत्पादन को भी विकसित करना है।
    • दुर्लभ मृदा तत्व गलियारे: इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विशेष आर्थिक गलियारे प्रस्तावित किए गए हैं।
    • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) सहायता: इन उद्योगों के लिए 10,000 करोड़ रुपये का एक नया ‘SME ग्रोथ फंड’ बनाया गया है जो इक्विटी सहायता प्रदान करेगा। साथ ही 200 पारंपरिक औद्योगिक समूहों का पुनरुद्धार किया जाएगा।
  • UPSC प्रासंगिकता: “आत्मनिर्भर भारत अभियान”, “महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा” और “भारत का औद्योगिक रूपांतरण” जैसे विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • मूल्य श्रृंखला में उन्नति: यह कदम भारत के निर्यात ढांचे को कम मूल्य वाले सामान्य माल से बदलकर उच्च-तकनीकी और जटिल उत्पादों (जैसे प्रिसिजन इंजीनियरिंग) की ओर ले जाने का एक संगठित प्रयास है।
    • नियामक स्पष्टता: वैश्विक क्षमता केंद्रों (Global Capability Centres) के लिए ‘सेफ हार्बर’ की सीमा को बढ़ाकर 2,000 करोड़ रुपये करना अंतरराष्ट्रीय तकनीकी फर्मों को एक स्थिर कर वातावरण प्रदान करेगा।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (बुनियादी ढांचा: रेलवे; लॉजिस्टिक्स/रसद व्यवस्था)।

  • संदर्भ: आर्थिक पुनरुद्धार के प्राथमिक लीवर के रूप में उच्च गति वाली कनेक्टिविटी और रसद (Logistics) दक्षता पर बड़ा निवेश किया जा रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • उच्च गति रेल (High-Speed Rail): 16 लाख करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से सात नए रेल गलियारे (4,000 किलोमीटर का नेटवर्क) घोषित किए गए हैं। ये दक्षिण भारत के पांच राज्यों और उत्तर भारत के प्रमुख शहरों (जैसे दिल्ली-वाराणसी) को जोड़ेंगे।
    • समर्पित माल ढुलाई गलियारा (DFC): पश्चिम बंगाल के दानकुनी को गुजरात के सूरत से जोड़ने वाले एक नए समर्पित माल ढुलाई गलियारे की घोषणा की गई है।
    • अंतर्देशीय जलमार्ग: देश में 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों को क्रियाशील बनाया जाएगा, जिसकी शुरुआत ओडिशा में राष्ट्रीय जलमार्ग-5 (NW-5) से होगी। इसका लक्ष्य जल परिवहन की हिस्सेदारी को दोगुना करना है।
    • समुद्री पुनरुद्धार: विदेशी जहाजों और कंटेनरों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत में ही कंटेनर निर्माण हेतु पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना”, “क्षेत्रीय असंतुलन को दूर करना” और “रेलवे का आधुनिकीकरण” जैसे विषयों के लिए अत्यंत उपयोगी।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • यात्रा समय में कमी: इस उच्च गति नेटवर्क का उद्देश्य यात्रा के समय को नाटकीय रूप से कम करना है (जैसे चेन्नई से बेंगलुरु केवल 1.5 घंटे और दिल्ली से वाराणसी केवल 3 घंटे 50 मिनट)।
    • रसद दक्षता: भारी कार्गो को सड़क और पारंपरिक रेल से हटाकर जलमार्गों पर स्थानांतरित करने का लक्ष्य 2047 तक माल ढुलाई की कुल लागत को सकल घरेलू उत्पाद के 12 प्रतिशत तक लाना है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सामाजिक न्याय; शिक्षा; स्वास्थ्य; कल्याणकारी योजनाएं)।

  • संदर्भ: यह बजट उस प्रवृत्ति को और मजबूत करता है जहाँ जन-कल्याण पर खर्च की जिम्मेदारी केंद्र से धीरे-धीरे राज्य सरकारों की ओर स्थानांतरित की जा रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • शिक्षा बजट में वृद्धि: शिक्षा मंत्रालय का आवंटन 14.21 प्रतिशत बढ़कर 1.39 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है। इसमें प्रत्येक जिले में लड़कियों के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित (STEM) हॉस्टल बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
    • मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान: रांची और तेज़पुर में दो नए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों की स्थापना की जाएगी और उत्तर भारत में एक विशेष ‘निमहंस’ (NIMHANS) जैसा संस्थान बनाया जाएगा।
    • ग्रामीण रोजगार: ग्रामीण रोजगार के बजट में 43 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि की गई है। इसके साथ ही ‘विकसित भारत रोजगार और आजीविका मिशन ग्रामीण’ (VB-G RAM G) अधिनियम लागू होगा जो ‘मनरेगा’ का स्थान लेगा।
    • वृद्धों की देखभाल (Geriatric Care): बुजुर्गों के लिए एक मजबूत देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र बनाया जाएगा, जिसमें 1.5 लाख देखभाल करने वालों को राष्ट्रीय कौशल योग्यता ढांचे के अनुसार प्रशिक्षित किया जाएगा।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “मानव पूंजी का विकास” और “समाज के कमजोर वर्गों का सशक्तिकरण”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • लागत साझाकरण का बदलाव: नई ग्रामीण रोजगार योजना में केंद्र और राज्य के बीच 60:40 का अनुपात रखा गया है, जो राज्य सरकारों पर एक बड़ा वित्तीय बोझ डालेगा।
    • स्वास्थ्य खर्च में ठहराव: कुछ विशेष घोषणाओं के बावजूद, स्वास्थ्य क्षेत्र पर कुल व्यय अभी भी कुल बजट का मात्र 1.96 प्रतिशत है, जो पिछले वर्षों की तुलना में केवल मामूली वृद्धि है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध; संवैधानिक निकाय)।

  • संदर्भ: 16वें वित्त आयोग की रिपोर्ट ने सिफारिश की है कि करों के विभाज्य पूल में राज्यों की हिस्सेदारी को 41 प्रतिशत पर ही बनाए रखा जाए, जिसे केंद्र सरकार ने स्वीकार कर लिया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • फॉर्मूला में परिवर्तन: नए फॉर्मूले में ‘जनसंख्या’ के भार को बढ़ाकर 17.5 प्रतिशत (15% से) कर दिया गया है, जबकि ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ के भार को घटाकर 10 प्रतिशत (12.5% से) कर दिया गया है।
    • दक्षिणी राज्यों का लाभ: इन बदलावों के बावजूद, अन्य भारित कारकों के कारण तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे पांच दक्षिणी राज्यों की कुल हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है।
    • विभाज्य पूल का छोटा होना: रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) के कारण साझा किया जाने वाला पूल कुल कर राजस्व के 89.1 प्रतिशत (2014-15) से घटकर अब केवल 74-80 प्रतिशत के बीच रह गया है।
    • स्थानीय निकायों के लिए अनुदान: वित्त वर्ष 2026-2027 के लिए ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों तथा आपदा प्रबंधन के लिए 21.4 लाख करोड़ रुपये के अनुदान का प्रावधान किया गया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजस्व साझाकरण तंत्र”, “सहकारी संघवाद की चुनौतियां” और “हस्तांतरण के मानदंड”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • प्रति व्यक्ति आय का महत्व: राज्यों के बीच ‘प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद’ (GSDP) का अंतर अभी भी 42.5 प्रतिशत के साथ सबसे अधिक भार वाला कारक बना हुआ है, जो राज्यों के बीच समानता लाने पर केंद्रित है।
    • राज्यों का असंतोष: कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों ने राजस्व घाटा अनुदान (Revenue Deficit Grants) को बंद करने और पिछले आयोगों की तुलना में कम हिस्सेदारी मिलने पर अपनी नाराजगी व्यक्त की है।

संपादकीय विश्लेषण

02 फरवरी, 2026
GS-3 उद्योग PLI से परे: रणनीतिक हब

बायोफार्मा शक्ति (SHAKTI) के लिए ₹10,000 करोड़। ‘महत्वपूर्ण खनिजों’ की मूल्य श्रृंखला को सुरक्षित करने के लिए दुर्लभ मृदा कॉरिडोर और ISM 2.0 का शुभारंभ।

GS-3 बुनियादी ढांचा विकास के सूत्रधार

5 दक्षिणी राज्यों को जोड़ने वाली हाई-स्पीड रेल। 20 नए राष्ट्रीय जलमार्गों के माध्यम से 2047 तक ‘रसद लागत’ को 12% तक लाने का लक्ष्य।

GS-2 सामाजिक न्याय कल्याणकारी योजनाओं का सुदृढ़ीकरण

मनरेगा (MGNREGA) की जगह नया VB-G RAM G अधिनियम। हर जिले में लड़कियों के लिए STEM हॉस्टल और वृद्धों की देखभाल करने वालों के लिए विशेष प्रशिक्षण।

संघवाद: ग्रामीण रोजगार में 60:40 की लागत-साझाकरण व्यवस्था कल्याणकारी बोझ को राज्यों पर महत्वपूर्ण रूप से स्थानांतरित करती है।
कनेक्टिविटी: हाई-स्पीड कॉरिडोर के माध्यम से चेन्नई-बेंगलुरु की यात्रा 1.5 घंटे और दिल्ली-वाराणसी की 4 घंटे से कम हुई।
विनिर्माण: SME ग्रोथ फंड का लक्ष्य इक्विटी सहायता के माध्यम से 200 पुराने औद्योगिक समूहों का कायाकल्प करना है।
स्वास्थ्य: NIMHANS जैसे संस्थानों की स्थापना मानव पूंजी और मानसिक स्वास्थ्य पर बजटीय फोकस को दर्शाती है।
GS-4
राजकोषीय कर्तव्य
विवेक बनाम आकांक्षा: 2026 का बजट विकास और भागीदारी के “तीन कर्तव्यों” को संतुलित करता है। हालाँकि, स्वास्थ्य व्यय का 1.96% पर स्थिर रहना बढ़ती पूंजीगत महत्वाकांक्षाओं के बीच सार्वभौमिक कल्याण की नैतिक अनिवार्यता को चुनौती देता है।

यहाँ केंद्रीय बजट 2026-27 और ‘विश्व आर्द्रभूमि दिवस’ की घोषणाओं से संबंधित रणनीतिक बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिक अद्यतनों (Updates) का विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

31 जनवरी, 2026 तक भारत ने आधिकारिक तौर पर अपने रामसर नेटवर्क का विस्तार 98 स्थलों तक कर लिया है। 2026 के पर्यावरण पाठ्यक्रम के लिए इन “नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों” का मानचित्रण करना अत्यंत आवश्यक है।

नया रामसर स्थलस्थानमुख्य जैव विविधता और विशेषताएं
पटना पक्षी अभयारण्यएटा, उत्तर प्रदेशप्रवासी पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण विश्राम स्थल; लुप्तप्राय पक्षी प्रजातियों और मरुस्थलीय लोमड़ियों का घर।
छारी-ढंढ (Chhari-Dhand)कच्छ, गुजरातकच्छ के रण में स्थित एक मौसमी आर्द्रभूमि; यह ‘कैराकल’ (Caracal), मरुस्थलीय बिल्लियों और भेड़ियों का प्राकृतिक आवास है।

मैपिंग तथ्य: भारत के रामसर नेटवर्क में 2014 के बाद से 276 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिसकी वर्तमान कुल संख्या 98 है।

केंद्रीय बजट 2026 में विकास के विकेंद्रीकरण के लिए 7 नए उच्च गति रेल गलियारों की घोषणा की गई है। “परिवहन और शहरीकरण” अनुभाग के लिए इनका मानचित्रण महत्वपूर्ण है।

मानचित्र पर चिह्नित किए जाने वाले प्राथमिक गलियारे:

  • मुंबई-पुणे-हैदराबाद: पश्चिमी भारत को दक्षिण-मध्य भारत से जोड़ता है।
  • हैदराबाद-बेंगलुरु-चेन्नई: दक्षिण भारत के प्रमुख तकनीकी और औद्योगिक केंद्रों को जोड़ता है।
  • चेन्नई-बेंगलुरु: एक अत्यंत व्यस्त औद्योगिक गलियारा।
  • दिल्ली-वाराणसी-सिलीगुड़ी: उत्तर भारत को उत्तर-पूर्व भारत के प्रवेश द्वार (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) से जोड़ता है।

सरकार रणनीतिक रूप से उच्च-ऊंचाई वाले स्थानों पर “विशाल विज्ञान” (Mega Science) सुविधाओं का मानचित्रण कर रही है।

  • नेशनल लार्ज सोलर टेलीस्कोप (NLST): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास स्थापित किया जा रहा है।
  • 30-मीटर नेशनल लार्ज ऑप्टिकल टेलीस्कोप (NLOT): हिमालयी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक और वैज्ञानिक मानचित्रण बिंदु।

बौद्ध सर्किट और प्राचीन पुरातात्विक स्थलों को आगंतुक बुनियादी ढांचे (Visitor Infrastructure) के लिए विशेष वित्त पोषण प्राप्त हो रहा है।

पुरातात्विक मानचित्रण बिंदु:

  • लोथल और धौलावीरा (गुजरात): प्रमुख हड़प्पाकालीन स्थल।
  • राखीगढ़ी (हरियाणा): सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे बड़ा भारतीय स्थल।
  • लेह पैलेस (लद्दाख): हिमालयी वास्तुकला का प्रतीक।
  • उत्तर-पूर्व बौद्ध सर्किट: इसका उद्देश्य ‘सेवन सिस्टर्स’ राज्यों के विरासत स्थलों को जोड़ना है ताकि तीर्थाटन पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सके।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुवर्तमान 2026 का संदर्भ
नई आर्द्रभूमि केंद्रछारी-ढंढकच्छ, गुजरात।
रेल कनेक्टिविटीवाराणसी-सिलीगुड़ीउत्तर-पूर्व भारत के लिए नया उच्च गति मार्ग।
सौर विज्ञानपैंगोंग झील केंद्रनया विशाल सौर दूरबीन (Telescope)।
प्राचीन स्थल विकासराखीगढ़ीप्रमुख हड़प्पा स्थल का व्यापक विकास।

उच्च गति रेल गलियारों को मैप करते समय “चिकन नेक” (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) की स्थिति पर विशेष ध्यान दें, क्योंकि दिल्ली-वाराणसी-सिलीगुड़ी मार्ग भारत की मुख्य भूमि और उत्तर-पूर्व के बीच सामरिक संपर्क के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

मानचित्रण विवरण

बजट 2026 एवं पारिस्थितिक अपडेट
रामसर विस्तार 98 आर्द्रभूमि मील के पत्थर

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026 के अवसर पर वैश्विक नेटवर्क में पटना पक्षी अभयारण्य (UP) और छारी-ढांढ (GJ) को जोड़ा गया।

मेगा विज्ञान केंद्र उच्च-ऊंचाई अनुसंधान

पेंगोंग झील के पास नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप और हिमालय में 30-मीटर ऑप्टिकल टेलिस्कोप के लिए रणनीतिक वित्त पोषण।

बजट 2026 बुनियादी ढांचा
हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर

सात नए कॉरिडोर विकसित किए जाने की योजना है, जिसमें रणनीतिक दिल्ली–वाराणसी–सिलीगुड़ी लिंक शामिल है, जो उत्तर-पूर्वी भारत के लिए एक तीव्र प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करेगा।

सांस्कृतिक एवं विरासत सर्किट
पुरातात्विक मानचित्रण

लोथल और धोलावीरा जैसे हड़प्पा केंद्रों के साथ-साथ राखीगढ़ी (HR) और लेह पैलेस (लद्दाख) के बड़े उन्नयन पर ध्यान।

उत्तर-पूर्व बौद्ध सर्किट

सेवन सिस्टर्स (पूर्वोत्तर राज्यों) में ऐतिहासिक बौद्ध स्थलों को जोड़ने के लिए समर्पित बुनियादी ढांचा, जिससे आध्यात्मिक पर्यटन और क्षेत्रीय संपर्क को बढ़ावा मिलेगा। बौद्ध सर्किट

आर्द्रभूमि केंद्र छारी-ढांढ (कच्छ, गुजरात)।
NE संपर्क वाराणसी–सिलीगुड़ी रेल लिंक।
सौर विज्ञान पेंगोंग झील हब (लद्दाख)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: बजट 2026 स्थानिक विकेंद्रीकरण पर जोर देता है। GS-I और GS-III में भविष्य के शहरी विकास ध्रुवों के विश्लेषण के लिए हाई-स्पीड रेल नोड्स और पुरातात्विक विरासत स्थलों के बीच ओवरलैप का मानचित्रण करना महत्वपूर्ण है।

IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 31 जनवरी 2026 (Hindi)

यह अध्याय “जब जनता बगावत करती है – 1857 और उसके बाद” भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुए विशाल जन-विद्रोह के कारणों, घटनाओं और परिणामों का विवरण देता है।

ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों ने समाज के विभिन्न वर्गों—राजाओं, रानियों, किसानों, जमींदारों, आदिवासियों और सिपाहियों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया।

  • नवाबों की छिनती सत्ता: 18वीं सदी के मध्य से ही राजाओं और नवाबों की ताकत कम होने लगी थी। उनके दरबारों में ब्रिटिश ‘रेजिडेंट’ तैनात कर दिए गए थे, जिससे उनकी स्वतंत्रता और सम्मान खत्म होता जा रहा था।
  • अवध का मामला: 1801 में अवध पर एक ‘सहायक संधि’ थोपी गई और अंततः 1856 में “कुशासन” का आरोप लगाकर उसे ब्रिटिश कब्जे में ले लिया गया।
  • किसान और जमींदार: गाँवों में किसान और जमींदार भारी-भरकम लगान और कर वसूली के सख्त तौर-तरीकों से परेशान थे। कई लोग महाजनों का कर्ज नहीं चुका पा रहे थे, जिसके कारण उनकी पीढ़ियों पुरानी जमीनें उनके हाथ से निकलती जा रही थीं।
  • भारतीय सिपाही: कंपनी के तहत काम करने वाले भारतीय सिपाही अपने वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों के कारण असंतुष्ट थे। कुछ नियमों ने उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, जैसे—समुद्र पार यात्रा करने की अनिवार्यता, जिसे उस समय कई लोग अपने धर्म और जाति के विरुद्ध मानते थे।

अंग्रेजों का मानना था कि भारतीय समाज में सुधार करना आवश्यक है।

  • सामाजिक कानून: सती प्रथा को रोकने और विधवा विवाह को बढ़ावा देने के लिए कानून बनाए गए।
  • शिक्षा: अंग्रेजी भाषा की शिक्षा को जमकर प्रोत्साहन दिया गया।
  • धार्मिक परिवर्तन: 1830 के बाद ईसाई मिशनरियों को खुलकर काम करने और यहाँ तक कि जमीन खरीदने की भी छूट दी गई। 1850 में एक नया कानून बनाया गया जिससे ईसाई धर्म अपनाना आसान हो गया और धर्म परिवर्तन करने वालों को अपने पूर्वजों की संपत्ति पर अधिकार सुरक्षित रखने की अनुमति मिल गई।

मई 1857 में जो एक सैनिक विद्रोह (Mutiny) के रूप में शुरू हुआ, उसने जल्द ही एक व्यापक जन-विद्रोह का रूप ले लिया, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।

  • घटना: 29 मार्च, 1857 को युवा सैनिक मंगल पांडे को बैरकपुर में अपने अधिकारियों पर हमला करने के आरोप में फाँसी दे दी गई।
  • चर्बी वाले कारतूस: मेरठ में सिपाहियों ने नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें शक था कि उन पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप चढ़ाया गया है।
  • मार्च: 10 मई, 1857 को मेरठ के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जेल में बंद अपने साथियों को छुड़ाया और दिल्ली की ओर कूच कर दिया। उन्होंने मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र को अपना नेता घोषित किया।
  • विद्रोह का प्रसार: एक के बाद एक कई रेजिमेंटों ने विद्रोह कर दिया और वे दिल्ली, कानपुर और लखनऊ जैसे मुख्य केंद्रों पर जमा होने लगे।
  • प्रमुख नेतृत्व:
    • कानपुर: पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब ने कमान संभाली।
    • लखनऊ: नवाब वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र को नवाब घोषित किया गया।
    • झाँसी: रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोही सिपाहियों के साथ मिलकर तांत्या टोपे के साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया।
    • बिहार: एक पुराने जमींदार कुँवर सिंह ने विद्रोहियों का साथ दिया।

विद्रोह की व्यापकता को देखते हुए कंपनी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर इसे कुचलने का फैसला किया।

  • दिल्ली पर दोबारा कब्जा: इंग्लैंड से और अधिक सैनिक मंगाए गए और सितंबर 1857 में दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया गया।
  • सम्राट का भाग्य: बहादुर शाह ज़फ़र पर मुकदमा चलाया गया, उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई और उन्हें उनकी पत्नी के साथ रंगून (बर्मा) की जेल भेज दिया गया।
  • प्रतिरोध का अंत: मार्च 1858 में लखनऊ पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई की हार हुई और वे वीरगति को प्राप्त हुईं। तांत्या टोपे ने कुछ समय तक छापामार युद्ध जारी रखा, लेकिन अंततः उन्हें भी अप्रैल 1859 में पकड़कर फाँसी दे दी गई।

ब्रिटिश संसद ने 1858 में एक नया अधिनियम पारित किया ताकि भारत का शासन अधिक जिम्मेदारी से चलाया जा सके।

  • सत्ता का हस्तांतरण: ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्तियाँ अब ब्रिटिश क्राउन (राजशाही) को सौंप दी गईं। ब्रिटिश कैबिनेट के एक सदस्य को ‘भारत सचिव’ (Secretary of State) नियुक्त किया गया।
  • वायसराय: गवर्नर-जनरल का पद नाम बदलकर ‘वायसराय’ कर दिया गया, जो सीधे ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि था।
  • रियासतों को आश्वासन: राजाओं को भरोसा दिलाया गया कि भविष्य में उनके क्षेत्रों का कभी विलय नहीं किया जाएगा, बशर्ते वे ब्रिटिश महारानी को अपना सर्वोच्च शासक स्वीकार करें।
  • सेना का पुनर्गठन: भारतीय सैनिकों का अनुपात कम किया गया और यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई। गोरखाओं, सिखों और पठानों की भर्ती पर अधिक जोर दिया गया।
  • धार्मिक सम्मान: अंग्रेजों ने वादा किया कि वे भारत के लोगों के पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों का सम्मान करेंगे।
नेताक्षेत्रमुख्य भूमिका और कार्य
बहादुर शाह ज़फ़रदिल्लीमुगल सम्राट जिन्हें विद्रोहियों ने अपना प्रतीकात्मक नेता चुना।
नाना साहेबकानपुरपेशवा बाजीराव II के दत्तक पुत्र; उन्होंने अंग्रेजों को कानपुर से खदेड़ दिया।
रानी लक्ष्मीबाईझाँसीअपने राज्य को वापस पाने के लिए लड़ते हुए शहीद हुईं।
बेगम हज़रत महललखनऊलखनऊ में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाई।
कुँवर सिंहबिहारआरा के बुजुर्ग जमींदार जिन्होंने महीनों तक अंग्रेजों से लोहा लिया।
बख्त खानदिल्लीबरेली के सैनिक जिन्होंने दिल्ली में विद्रोही सेना का नेतृत्व संभाला।
मौलवी अहमदउल्लाह शाहफैजाबादउन्होंने भविष्यवाणी की थी कि अंग्रेजों का राज जल्द खत्म होगा; लखनऊ में जाकर लड़े।
तांत्या टोपेमध्य भारतरानी लक्ष्मीबाई और नाना साहेब के सहयोगी; छापामार युद्ध के विशेषज्ञ।

यद्यपि 1857 का विद्रोह सैन्य रूप से विफल रहा, लेकिन इसने भारत में ब्रिटिश शासन के स्वरूप को हमेशा के लिए बदल दिया और भविष्य के राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।

NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 5

जब जनता बगावत करती है – 1857 और उसके बाद

असंतोष के कारण
रियासतों का विलय: अवध का पतन (1856) और दरबारों में रेजिडेंटों की तैनाती ने नवाबों की सत्ता छीन ली।
सिपाहियों की शिकायतें: कम वेतन, भत्तों, समुद्र पार सेवा के कठोर नियमों और संदिग्ध चर्बी वाले कारतूसों को लेकर नाराजगी।
सामाजिक सुधार
सांस्कृतिक टकराव: विधवा विवाह के कानून और अंग्रेजी शिक्षा के प्रचार को भारतीय रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप माना गया।
विद्रोह और उसके नेता
मेरठ से दिल्ली: 10 मई, 1857 को सिपाहियों ने विद्रोह किया और दिल्ली कूच कर बहादुर शाह ज़फ़र को अपना नेता घोषित किया।
प्रमुख केंद्र: कानपुर में नाना साहेब, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ में बेगम हज़रत महल ने विद्रोह का नेतृत्व किया।
ब्रिटिश प्रतिक्रिया: अंग्रेजों ने सितंबर 1857 में दिल्ली पर पुनः कब्जा कर लिया। ज़फ़र को रंगून निर्वासित किया गया; लक्ष्मीबाई 1858 में युद्ध में शहीद हुईं।
नया प्रशासन: 1858 के अधिनियम के द्वारा सत्ता कंपनी से ब्रिटिश क्राउन को हस्तांतरित कर दी गई, जिसका नेतृत्व वायसराय ने किया।
सैन्य बदलाव: सेना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया और भर्ती के लिए गोरखा, सिख और पठानों को प्राथमिकता दी गई।

मंगल पांडे

बैरकपुर में अपने अधिकारियों पर हमला करने के लिए 29 मार्च, 1857 को फांसी दी गई।

भारत सचिव

भारतीय मामलों के प्रबंधन के लिए 1858 में नियुक्त ब्रिटिश कैबिनेट का एक सदस्य।

तांत्या टोपे

एक कुशल सेनापति जिन्होंने 1859 में पकड़े जाने तक छापामार युद्ध का नेतृत्व जारी रखा।

एक नया युग
1857 का विद्रोह भारतीय इतिहास में एक युगांतरकारी बदलाव था। हालाँकि इस विद्रोह को दबा दिया गया, लेकिन इसने कंपनी शासन का अंत कर दिया और अंग्रेजों को अपनी धार्मिक, क्षेत्रीय और शासन संबंधी नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
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कक्षा-8 इतिहास अध्याय-5 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: जब जनता बग़ावत करती है – 1857 और उसके बाद

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भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी (Highest Law Officer) होता है। यह पद अद्वितीय है क्योंकि संघीय कार्यपालिका (Union Executive) का हिस्सा होते हुए भी यह एक राजनीतिक पद के बजाय एक पेशेवर कानूनी पद है। वह भारत सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार के रूप में कार्य करता है।

  • नियुक्ति: महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) की सलाह पर की जाती है।
  • योग्यताएं: महान्यायवादी बनने के लिए व्यक्ति में उन योग्यताओं का होना आवश्यक है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए अनिवार्य हैं:
    1. वह भारत का नागरिक हो।
    2. वह 5 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (High Court) का न्यायाधीश रहा हो अथवा 10 वर्षों तक उच्च न्यायालय में वकालत की हो अथवा राष्ट्रपति के मत में वह एक प्रतिष्ठित न्यायविद (Distinguished Jurist) हो।
  • कार्यकाल: संविधान में महान्यायवादी का कार्यकाल निश्चित नहीं किया गया है।
    • वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure) पद धारण करता है।
    • वह राष्ट्रपति को कभी भी अपना त्यागपत्र सौंप सकता है।
    • परंपरा के अनुसार, जब सरकार (मंत्रिपरिषद) इस्तीफा देती है या बदलती है, तो महान्यायवादी भी इस्तीफा दे देता है, क्योंकि उसकी नियुक्ति सरकार की सलाह पर की गई थी।
  • पारिश्रमिक: महान्यायवादी का वेतन और भत्ता संविधान द्वारा निर्धारित नहीं है; यह राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जाता है।

महान्यायवादी का प्राथमिक कर्तव्य कानूनी मामलों पर भारत सरकार को सलाह देना है।

  • कानूनी सलाह: राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए कानूनी विषयों पर भारत सरकार को सलाह देना।
  • प्रतिनिधित्व: भारत सरकार से संबंधित मामलों में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और किसी भी उच्च न्यायालय (High Court) में सरकार की ओर से पेश होना।
  • अनुच्छेद 143: राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत उच्चतम न्यायालय को भेजे गए किसी भी संदर्भ (परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार) में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करना।
  • संवैधानिक कर्तव्य: संविधान या अन्य किसी कानून द्वारा सौंपे गए अन्य कार्यों का निर्वहन करना।

महान्यायवादी के पास कुछ ऐसे अधिकार हैं जो कार्यपालिका और विधायिका के बीच की कड़ी का काम करते हैं:

  • सुनवाई का अधिकार (Right of Audience): उसे भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
  • संसदीय भागीदारी: उसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) की कार्यवाही में, उनकी संयुक्त बैठक में और संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य नामांकित हो) में बोलने और भाग लेने का अधिकार है।
  • मतदान का अधिकार नहीं: संसद की कार्यवाही में भाग लेने के बावजूद, महान्यायवादी को वोट देने का अधिकार नहीं है।
  • उन्मुक्तियाँ: उसे वे सभी विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ (Immunities) प्राप्त होती हैं जो एक संसद सदस्य (MP) को मिलती हैं।

हितों के टकराव को रोकने के लिए महान्यायवादी पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं:

  • वह भारत सरकार के खिलाफ कोई सलाह या मामला नहीं ले सकता।
  • वह सरकार की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति का बचाव नहीं कर सकता।
  • वह भारत सरकार की अनुमति के बिना किसी कंपनी या निगम में निदेशक (Director) का पद स्वीकार नहीं कर सकता।
  • ध्यान दें: महान्यायवादी सरकार का पूर्णकालिक परामर्शदाता नहीं है और न ही वह एक ‘सरकारी सेवक’ (Government Servant) की श्रेणी में आता है। इसलिए, उसे निजी कानूनी प्रैक्टिस (Private Practice) करने से नहीं रोका गया है।
विशेषताविवरण
अनुच्छेद76
सर्वोच्च पदभारत का मुख्य कानून अधिकारी
नियुक्तिराष्ट्रपति द्वारा
कार्यकालराष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (निश्चित नहीं)
संसदीय अधिकारदोनों सदनों में बोलने का अधिकार, लेकिन वोट देने का नहीं
निजी प्रैक्टिसअनुमति है (क्योंकि वह सरकारी कर्मचारी नहीं है)
योग्यतासुप्रीम कोर्ट के जज के समान

अक्सर छात्र महान्यायवादी और महाधिवक्ता (Advocate General) के बीच भ्रमित हो जाते हैं। याद रखें, महान्यायवादी (AG) केंद्र के लिए होता है (अनुच्छेद 76), जबकि महाधिवक्ता राज्य के लिए होता है (अनुच्छेद 165)। इसके अलावा, महान्यायवादी की सहायता के लिए सॉलिसिटर जनरल और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल होते हैं, लेकिन ये संवैधानिक पद नहीं हैं।

संघीय कार्यपालिका • सर्वोच्च कानून अधिकारी
अनुच्छेद 76

भारत के महान्यायावादी

योग्यताएँ
उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए योग्य होना चाहिए (नागरिक + 10 वर्ष HC अधिवक्ता या 5 वर्ष HC न्यायाधीश)।
कार्यकाल
वे राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं। संविधान में कोई निश्चित कार्यकाल नहीं बताया गया है।
कर्तव्य और प्रतिनिधित्व
मुख्य सलाहकार: कानूनी मामलों पर भारत सरकार को सलाह देते हैं और राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गए कार्यों का निर्वहन करते हैं।
न्यायालय में उपस्थिति: भारत सरकार से संबंधित मामलों में उच्चतम न्यायालय और किसी भी उच्च न्यायालय में संघ का पक्ष रखते हैं (अनुच्छेद 143 के संदर्भों सहित)।
संसदीय अधिकार
उन्हें दोनों सदनों और उनकी समितियों की कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार है, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं है।

सुनवाई का अधिकार

कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान उन्हें भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।

निजी वकालत

वे पूर्णकालिक सरकारी सेवक नहीं हैं; इसलिए, उन्हें निजी कानूनी वकालत से वंचित नहीं किया गया है।

उन्मुक्तियां

वे उन सभी विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के हकदार हैं जो एक संसद सदस्य (MP) को उपलब्ध होते हैं।

नैतिक
सीमाएँ
हितों के टकराव को रोकने के लिए, महान्यायावादी भारत सरकार के खिलाफ सलाह नहीं दे सकते और न ही सरकार की अनुमति के बिना आपराधिक मामलों में अभियुक्तों का बचाव कर सकते हैं। हालांकि यह एक पेशेवर पद है, लेकिन परंपरा के अनुसार नियुक्ति करने वाली सरकार के बदलने पर महान्यायावादी त्यागपत्र दे देते हैं।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (31 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; विकास और वृद्धि; संसाधनों का संग्रहण)।

  • संदर्भ: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थिर और महत्वाकांक्षी मध्यम अवधि का ढांचा पेश किया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • विकास स्थिरता: सर्वेक्षण भारत की अर्थव्यवस्था की एक अनुकूल तस्वीर पेश करता है, जिसमें महामारी के बाद विकास की गति तेज होने का अनुमान है।
    • वैश्विक संकट का जोखिम: सर्वेक्षण के अनुसार 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के 2008 के संकट से भी बदतर स्थिति में जाने की 10%-20% संभावना है।
    • उद्यमी राज्य (Entrepreneurial State): CEA ने नीति निर्माण में एक गतिशील बदलाव का आह्वान किया है, जहाँ राज्य अधिक फुर्तीला (Agile), जोखिम लेने वाला और प्रयोग करने को तैयार हो।
    • राजकोषीय अनुशासन: केंद्र के लिए भू-आर्थिक अनिश्चितताओं से निपटने हेतु लचीलेपन की मांग करते हुए, राज्यों को “राजकोषीय लोकलुभावनवाद” (Fiscal Populism) और बढ़ते राजस्व घाटे के प्रति आगाह किया गया है।
    • छिपी हुई चुनौतियां: सर्वेक्षण में भोजन सुरक्षा पर इथेनॉल उत्पादन का प्रभाव, चारे की कमी और स्मार्टफोन पर “जबरन स्क्रॉलिंग” (Compulsive Scrolling) के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव जैसे उभरते मुद्दों को रेखांकित किया गया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “समष्टि आर्थिक (Macroeconomic) स्थिरता”, “राजकोषीय संघवाद” और “आर्थिक नियोजन” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रुपये के आधार: गिरते रुपये का कारण घरेलू आर्थिक कमजोरी के बजाय उन्नत AI उद्योगों वाले देशों की ओर पूंजी प्रवाह और ‘सुरक्षित संपत्ति’ (Safe-haven assets) की ओर झुकाव को बताया गया है।
    • रणनीतिक अपरिहार्यता: भारत को आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply chains) के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक लचीलापन विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/शिक्षा के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे; सामाजिक न्याय)।

  • संदर्भ: उत्तर भारत में विरोध प्रदर्शनों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने UGC के ‘समानता को बढ़ावा देने’ (Promotion of Equity) संबंधी 2026 के नियमों पर रोक लगा दी है।
  • मुख्य बिंदु:
    • भेदभाव को संबोधित करना: इन नियमों का उद्देश्य निरंतर जाति-आधारित भेदभाव से निपटना था। UGC के आंकड़े बताते हैं कि ऐसी शिकायतें 5 वर्षों में दोगुनी से अधिक हो गई हैं।
    • संस्थागत जवाबदेही: नया ढांचा ‘समान अवसर केंद्रों’, ‘इक्विटी स्क्वॉड’ और समयबद्ध शिकायत निवारण को अनिवार्य बनाता है, जिसमें अनुपालन न करने पर सख्त दंड का प्रावधान है।
    • परिभाषा पर विवाद: प्रदर्शनकारियों को केवल SC/ST/OBC छात्रों पर केंद्रित जातिगत भेदभाव की परिभाषा से आपत्ति है, जिसका तर्क है कि यह सामान्य वर्ग के साथ अन्याय है।
    • झूठी शिकायतें: अंतिम मसौदे से झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधानों को हटाना विवाद का मुख्य बिंदु बन गया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “संस्थागत निरीक्षण” और “न्यायिक समीक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संतुलन की आवश्यकता: संपादकीय सुझाव देता है कि समानता के समग्र लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए न्यायालय व्यापक परिभाषा पर विचार कर सकता है।
    • शिकायतकर्ताओं का संरक्षण: दुर्भावनापूर्ण शिकायतों और वास्तविक पीड़ितों के बीच अंतर करना जरूरी है ताकि वास्तविक पीड़ितों पर कोई नकारात्मक प्रभाव (Chilling effect) न पड़े।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; बुनियादी ढांचा; औद्योगिक नीति)।

  • संदर्भ: जैसे-जैसे भारत COP30 के लिए अपने ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDC) को संशोधित कर रहा है, स्टील क्षेत्र डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) के लिए सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा बनकर उभरा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • विकास का आधार: भारत की विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सदी के मध्य तक स्टील उत्पादन को 400 मिलियन टन से अधिक (तीन गुना) करना होगा।
    • उत्सर्जन का बोझ: कोयले पर भारी निर्भरता के कारण यह क्षेत्र वर्तमान में भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन के 12% के लिए जिम्मेदार है।
    • कार्बन लॉक-इन से बचना: अभी संक्रमण (Transition) करना आवश्यक है ताकि उन तकनीकों में निवेश न फंस जाए जो भविष्य में पर्यावरणीय और आर्थिक रूप से विनाशकारी साबित हो सकती हैं।
    • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय संघ के CBAM (कार्बन बॉर्डर टैक्स) का अर्थ है कि ‘ग्रीन स्टील’ के क्षेत्र में पहले कदम उठाने वाले देश प्रीमियम निर्यात बाजारों तक पहुँच सुनिश्चित कर सकेंगे।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु परिवर्तन शमन”, “सतत औद्योगीकरण” और “ऊर्जा संक्रमण” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संक्रमण की बाधाएं: मुख्य बाधाओं में ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ की उच्च लागत, उद्योग के लिए अपर्याप्त समर्पित नवीकरणीय ऊर्जा और ‘स्क्रेप’ (Scrap) बाजार की अनौपचारिक प्रकृति शामिल है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत के हितों पर क्षेत्रीय नीतियों का प्रभाव; पड़ोसी संबंध)।

  • संदर्भ: पाकिस्तान का हालिया 27वाँ संशोधन (PCA) उसके सुप्रीम कोर्ट को हाशिए पर धकेलकर देश की संवैधानिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण रूप से बदल देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • न्यायिक विखंडन: PCA संवैधानिक व्याख्या और प्रांतीय विवादों के क्षेत्राधिकार को एक नए निर्मित ‘संघीय संवैधानिक न्यायालय’ (FCC) को हस्तांतरित करता है।
    • कार्यपालिका का प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मध्यस्थ के रूप में भूमिका को कम करके, यह संशोधन न्यायिक प्राधिकरण को कार्यपालिका के अधीन हाशिए पर धकेलने के प्रति संवेदनशील बनाता है।
    • भारत के लिए सबक: संपादकीय इस बात पर जोर देता है कि संवैधानिक लोकतंत्र केवल लिखित पाठ पर नहीं, बल्कि अदालतों की निरंतर स्वतंत्रता और शक्तियों की सीमाओं के सम्मान पर जीवित रहता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पड़ोसी देशों की गतिशीलता”, “संवैधानिक शासन” और “न्यायपालिका की स्वतंत्रता”।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे; नियामक निकाय) और GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि ‘ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर’ (ASD) के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नैदानिक सेवा (Clinical Service) के रूप में नहीं दिया जा सकता।
  • मुख्य बिंदु:
    • साक्ष्य का अभाव: पीठ ने ASD के लिए स्टेम सेल के उपयोग की प्रभावकारिता और सुरक्षा के संबंध में “स्थापित वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी” को नोट किया।
    • नैतिक सीमा: ऐसे अप्रमाणित उपचारों के लिए माता-पिता से प्राप्त सहमति को अमान्य माना गया है, क्योंकि डॉक्टर पर्याप्त जानकारी का खुलासा करने की शर्त को पूरा नहीं करते।
    • नियामक विफलता: न्यायालय ने उन क्लीनिकों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की जो भारी कीमत पर “चमत्कारी इलाज” का प्रचार कर रहे हैं।
    • नया निरीक्षण: सरकार को भारत में सभी स्टेम सेल अनुसंधान पर नियामक निरीक्षण के लिए एक समर्पित प्राधिकरण गठित करने का निर्देश दिया गया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जैव-नीतिशास्त्र” (Bioethics), “स्वास्थ्य विनियमन” और “चिकित्सा में वैज्ञानिक वैधता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • देखभाल का मानक: वैज्ञानिक रूप से अपुष्ट प्रक्रियाओं को अपनाना उस मानक देखभाल (Standard of care) का उल्लंघन है जो डॉक्टर अपने मरीजों के प्रति रखते हैं।
    • मरीज की स्वायत्तता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीज की स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं है कि उसे ऐसी किसी प्रक्रिया का अधिकार मिल जाए जो नैतिक रूप से अस्वीकार्य हो।

संपादकीय विश्लेषण

31 जनवरी, 2026
GS-3 अर्थव्यवस्था सर्वेक्षण: छिपी हुई चुनौतियाँ

मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) ने ‘अनिवार्य स्क्रॉलिंग’ और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति आगाह किया। एक ऐसे राज्य की वकालत जो फुर्तीला, जोखिम लेने वाला और प्रयोगात्मक हो।

GS-3 पर्यावरण ग्रीन स्टील की सीमाएँ

12% उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार क्षेत्र को कार्बन मुक्त करना। मध्य-शताब्दी तक उत्पादन को तीन गुना (400MT) करने के लिए महत्वपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है।

GS-2 स्वास्थ्य स्टेम सेल ऑटिज्म निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने नैदानिक सेवाओं के रूप में अप्रमाणित उपचारों पर रोक लगाई। “चमत्कारी इलाज” के लिए माता-पिता के दबाव के बावजूद डॉक्टरों को देखभाल के मानकों को बनाए रखना चाहिए।

वित्त: गिरता हुआ रुपया वैश्विक AI पूंजी प्रवाह से प्रेरित है, न कि घरेलू बुनियादी सिद्धांतों से; राज्यों को राजकोषीय लोकलुभावनवाद से बचना चाहिए।
पर्यावरण: ग्रीन स्टील क्षेत्र में पहल करने वाले देश यूरोपीय संघ के CBAM शासन के तहत प्रीमियम निर्यात बाजारों तक पहुंच सुरक्षित करेंगे।
शासन: संवैधानिक लोकतंत्र अदालतों की स्वतंत्रता और संस्थागत सीमाओं के सम्मान पर टिका रहता है।
स्वास्थ्य: रोगी की स्वायत्तता किसी को चिकित्सकीय रूप से अप्रमाणित या नैतिक रूप से अस्वीकार्य प्रक्रियाओं का अधिकार नहीं देती है।
GS-4
जैव-नैतिकता
वैज्ञानिक वैधता बनाम आशा: ASD के लिए अप्रमाणित स्टेम-सेल प्रक्रियाएं करना देखभाल के नैतिक कर्तव्य में विफल रहता है। डॉक्टर अमान्य सहमति के पीछे छिपकर जिम्मेदारी से बच नहीं सकते; सच्ची पेशेवर अखंडता के लिए रोगियों को अप्रमाणित चिकित्सा शोषण से बचाना आवश्यक है।

यहाँ नए बाघ अभयारण्यों (Tiger Reserves)रामसर स्थलों के विस्तार और गहरे समुद्र में संसाधन अन्वेषण का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

2026 की शुरुआत तक, भारत में कुल 58 बाघ अभयारण्य हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए नवीनतम जोड़ों का मानचित्रण करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • माधव बाघ अभयारण्य (58वाँ), मध्य प्रदेश: मार्च 2025 में अधिसूचित, यह मध्य प्रदेश का 9वाँ बाघ अभयारण्य है।
    • मैपिंग पॉइंट: यह शिवपुरी जिले में स्थित है, जो उत्तरी अरावली-विंध्य परिदृश्य को जोड़ता है।
  • रातापानी बाघ अभयारण्य (57वाँ), मध्य प्रदेश: भोपाल और होशंगाबाद क्षेत्रों के बीच एक महत्वपूर्ण गलियारा (Corridor)।
  • गुरु घासीदास-तमोर पिंगला (56वाँ), छत्तीसगढ़: देश के सबसे बड़े अभयारण्यों में से एक, जो छत्तीसगढ़-यूपी-एमपी सीमा पर एक निरंतर आवास (Contiguous habitat) प्रदान करता है।

भारत ने अपनी सूची का विस्तार कर 96 रामसर स्थल कर लिए हैं, जिससे यह स्थलों की संख्या के मामले में एशिया में पहले और वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर बना हुआ है।

नया रामसर स्थलराज्यमुख्य महत्व
कोपरा जलाशयछत्तीसगढ़भारत का 95वाँ स्थल; छत्तीसगढ़ का पहला रामसर स्थल, बिलासपुर में स्थित।
सिलीसेढ़ झीलराजस्थानभारत का 96वाँ स्थल; अलवर में स्थित, यह एक महत्वपूर्ण अर्ध-शुष्क मीठे पानी का आवास है।
गोगाबील झीलबिहारभारत का 94वाँ स्थल; कटिहार जिले में स्थित एक प्रमुख गोखुर झील (Oxbow lake)

राज्यों की रैंकिंग: तमिलनाडु 20 स्थलों के साथ शीर्ष पर है, उसके बाद उत्तर प्रदेश 10 स्थलों के साथ दूसरे स्थान पर है।

भारत ‘समुद्रयान’ परियोजना के माध्यम से “ब्लू इकोनॉमी” (नीली अर्थव्यवस्था) पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।

  • पॉलीमेटेलिक नोड्यूल (PMN) क्षेत्र: भारत मध्य हिंद महासागर बेसिन (CIOB) में 75,000 वर्ग किमी क्षेत्र की खोज कर रहा है।
    • मैपिंग पॉइंट: CIOB को चिह्नित करें, जहाँ 5,000 मीटर से अधिक की गहराई पर मैंगनीज, निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिजों का मानचित्रण किया जा रहा है।
  • हाइड्रोथर्मल सल्फाइड साइट्स: हिंद महासागर की मध्य-महासागरीय पर्वतमालाओं (Mid-Oceanic Ridges) के साथ बहु-धातु जमाव का मानचित्रण।
  • मत्स्य 6000 (Matsya 6000): मानवयुक्त पनडुब्बी का 2026 की शुरुआत में चेन्नई तट पर उथले पानी में परीक्षण चल रहा है।

क्षेत्रीय भूगोल और अर्थव्यवस्था अनुभाग के लिए इन टैगों का मानचित्रण आवश्यक है।

  • कलाड़ी (जम्मू-कश्मीर): उधमपुर का एक पारंपरिक डेयरी उत्पाद (इसे ‘जम्मू का मोज़ेरेला’ कहा जाता है)।
  • थुया मल्ली चावल (तमिलनाडु): कावेरी डेल्टा का स्वदेशी चावल, जो अपने “मोती जैसे” रूप के लिए जाना जाता है।
  • उरैयूर सूती साड़ी (तमिलनाडु): कावेरी के तट पर तिरुचि जिले में बुनी जाने वाली प्रसिद्ध साड़ी।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
58वाँ बाघ अभयारण्यमाधव बाघ अभयारण्यशिवपुरी, मध्य प्रदेश
96वाँ रामसर स्थलसिलीसेढ़ झीलअलवर, राजस्थान
गहन समुद्री केंद्रमध्य हिंद महासागर बेसिनभूमध्य रेखा के दक्षिण में
नया डेयरी GI टैगकलाड़ी (Kaladi)उधमपुर, जम्मू-कश्मीर

बाघ अभयारण्यों को मैप करते समय उनके बीच के गलियारों (Corridors) को भी समझने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, माधव अभयारण्य राजस्थान के रणथंभौर और मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान के बीच एक सेतु का काम करता है।

मानचित्रण विवरण

जैव विविधता एवं ब्लू इकोनॉमी
टाइगर रिजर्व 58 अधिसूचित स्थल

माधव (58वां) और रातापानी (57वां) मध्य प्रदेश के परिदृश्य का विस्तार करते हैं। गुरु घासीदास (छ.ग.) एक विशाल सीमा-पारीय आवास को चिह्नित करता है।

रामसर मील के पत्थर एशिया की 96 आर्द्रभूमियाँ

राजस्थान में सिलीसेढ़ झील (96वीं) और छत्तीसगढ़ में कोपरा जलाशय (95वां) 2026 की संरक्षण तालिका में सबसे आगे हैं।

डीप ओशन मिशन
संसाधन अन्वेषण (CIOB)

5,000 मीटर से अधिक की गहराई पर मैंगनीज और कोबाल्ट से भरपूर पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स के लिए सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन (मध्य हिंद महासागर बेसिन) में 75,000 वर्ग किमी क्षेत्र का मानचित्रण।

समुद्री तकनीक
समुद्रयान एवं मत्स्य 6000

चेन्नई तट के पास प्रारंभिक परीक्षण भारत की मानवयुक्त सबमर्सिबल क्षमता को चिह्नित करते हैं। रणनीतिक मानचित्रण मध्य-महासागरीय कटकों के साथ हाइड्रोथर्मल सल्फाइड स्थलों पर केंद्रित है।

जीआई (GI) टैग प्रविष्टियां (2026)

जम्मू की डेयरी विशेषता कलाड़ी से लेकर कावेरी डेल्टा के मोती जैसे थूयमल्ली चावल तक, क्षेत्रीय भूगोल नई आर्थिक पहचान प्राप्त कर रहा है।

58वां रिजर्व माधव (शिवपुरी, म.प्र.)।
96वां रामसर सिलीसेढ़ झील (अलवर, रा.)।
डीप-सी हब सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: GS-III संसाधन विश्लेषण के लिए शिवपुरी-विंध्य स्थलीय गलियारे से CIOB के अगाध मैदानों (Abyssal Plains) तक का संक्रमण आवश्यक है। कोरोमंडल-कावेरी अक्ष में रामसर स्थलों के उच्च घनत्व पर ध्यान दें।

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