IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 6 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 6 Chapter-5 (क्या बताती हैं हमें किताबें और कब्रें)
यह अध्याय हमें यह समझने में मदद करता है कि प्राचीन साहित्य (वेद) और पुरातात्विक कब्रें (महापाषाण) हज़ारों साल पहले के लोगों के जीवन, विश्वास और सामाजिक संरचनाओं के बारे में क्या जानकारी देती हैं।
1. वेद: सबसे पुरानी किताबें
वेद प्राचीन धार्मिक ग्रंथों का एक संग्रह हैं। वेद चार हैं: ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद।
- ऋग्वेद: यह सबसे पुराना वेद है, जिसकी रचना लगभग 3,500 वर्ष पहले हुई थी। इसमें एक हज़ार से अधिक प्रार्थनाएँ हैं जिन्हें ‘सूक्त’ (जिसका अर्थ है “अच्छी तरह से बोला गया”) कहा जाता है।
- देवता: ये सूक्त विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुति में रचे गए हैं। मुख्य रूप से तीन देवता महत्वपूर्ण थे: अग्नि (आग के देवता), इंद्र (युद्ध के देवता) और सोम (एक पौधा जिससे एक विशेष पेय बनाया जाता था)।
- मौखिक परंपरा: ऋग्वेद को मूल रूप से पढ़ा नहीं जाता था; इसे उच्चारण और श्रवण (सुनकर) के माध्यम से याद किया जाता था। ऋषि अपने शिष्यों को अक्षरों और शब्दों को बहुत सावधानी से याद करना सिखाते थे। इसे छापा तो केवल 200 साल से भी कम समय पहले गया है।
- भाषा: इसकी भाषा ‘वैदिक संस्कृत’ है, जो ‘भारोपीय’ (Indo-European) भाषा परिवार का हिस्सा है।
2. ऋग्वैदिक काल का सामाजिक जीवन
ऋग्वेद में लोगों का वर्गीकरण उनके काम और समुदाय के आधार पर किया गया है।
- व्यावसायिक समूह:
- ब्राह्मण (पुरोहित): वे अनुष्ठान और यज्ञ करते थे।
- राजा: ये बाद के समय के राजाओं जैसे नहीं थे। इनके पास न तो बड़े महल थे, न ही स्थायी सेना, और न ही वे कर (Tax) वसूलते थे। उस समय राजा का पद वंशानुगत भी नहीं था।
- समुदाय के लिए शब्द: पूरे समुदाय या जनता के लिए दो शब्दों का प्रयोग होता था— ‘जन’ और ‘विश’ (जिससे वैश्य शब्द निकला है)।
- आर्य और दास: प्रार्थनाओं की रचना करने वाले स्वयं को ‘आर्य’ कहते थे और अपने विरोधियों को ‘दास’ या ‘दस्यु’ कहते थे। दासों को अक्सर युद्ध में बंदी बनाया जाता था और उन्हें उनके मालिकों की संपत्ति माना जाता था।
- युद्ध: युद्ध मवेशियों (गायों), उपजाऊ जमीन (चारागाह), पानी और लोगों को बंदी बनाने के लिए लड़े जाते थे। युद्ध में जीते गए धन का कुछ हिस्सा नेताओं के पास रहता था, कुछ पुरोहितों को दिया जाता था और बाकी आम जनता में बाँट दिया जाता था।
3. महापाषाण: कब्रों के मौन प्रहरी
जिस समय उत्तर-पश्चिम में वेदों की रचना हो रही थी, उसी समय दक्कन, दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व और कश्मीर में लोग ‘महापाषाण’ (Megaliths – बड़े पत्थर) बनाने की परंपरा विकसित कर रहे थे।
- उद्देश्य: इन बड़े पत्थरों को कब्रगाहों को चिह्नित करने के लिए लगाया जाता था। कुछ जमीन के ऊपर दिखते थे और कुछ जमीन के अंदर होते थे।
- सिस्ट (Cists): कुछ महापाषाणों को ‘सिस्ट’ कहा जाता है, जिनमें ‘पोर्ट-होल’ (एक बड़ा छेद) होता था, जिसका उपयोग बाद में मरने वाले परिवार के सदस्यों के शवों को अंदर लाने के लिए प्रवेश द्वार के रूप में किया जाता था।
- कब्रों में वस्तुएं: मृतकों को विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तनों के साथ दफनाया जाता था जिन्हें ‘काले और लाल मृदभांड’ (Black and Red Ware) कहा जाता है। इन कब्रों में लोहे के औजार, घोड़े के उपकरण और सोने व पत्थर के गहने भी मिले हैं।
- सामाजिक अंतर: कब्रों में मिली वस्तुओं से पता चलता है कि समाज में अमीर-गरीब का अंतर था। उदाहरण के लिए, ब्रह्मगिरि में एक व्यक्ति की कब्र में 33 सोने के मनके और शंख मिले हैं, जबकि दूसरी कब्रों में केवल कुछ मिट्टी के बर्तन ही मिले हैं।
4. केस स्टडी: इनामगाँव
इनामगाँव (घोड़ नदी के किनारे) एक विशिष्ट पुरास्थल है जहाँ लोग 3,600 से 2,700 साल पहले रहते थे।
- दफनाने की प्रथा: वयस्कों को आमतौर पर जमीन में सीधा लिटाकर दफनाया जाता था, जिनका सिर उत्तर की ओर होता था।
- विशेष कब्र: एक व्यक्ति को पाँच कमरों वाले घर के आंगन में मिट्टी के एक बड़े जार में बैठा हुआ (पालथी मारकर) दफनाया गया था। इस घर में एक अन्नागार (Granary) भी था, जिससे पता चलता है कि वह शायद गाँव का कोई सरदार रहा होगा।
- आहार और व्यवसाय: साक्ष्यों से पता चलता है कि वे गेहूँ, जौ, चावल, दाल और जानवरों का मांस (गाय, बकरी, मछली आदि) खाते थे। वे बेर, आँवला और जामुन जैसे फल भी इकट्ठा करते थे।
5. प्राचीन चिकित्सा: चरक
लगभग 2,000 साल पहले, चरक नाम के एक प्रसिद्ध चिकित्सक ने ‘चरक संहिता’ नामक पुस्तक लिखी थी। उन्होंने बताया कि मनुष्य के शरीर में 360 हड्डियाँ होती हैं (दांतों, जोड़ों और कार्टिलेज को जोड़कर), जो आधुनिक शरीर रचना विज्ञान द्वारा पहचानी गई 206 हड्डियों से काफी अधिक हैं।
📖 क्या बताती हैं हमें किताबें और कब्रें
कक्षा-6 इतिहास अध्याय-5 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: क्या बताती हैं हमें किताबें और कब्रें
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: भारत में नागरिकता (अनुच्छेद 5–11)
नागरिकता व्यक्ति और राज्य के बीच के संबंधों को दर्शाती है। भारत ‘एकल नागरिकता’ (Single Citizenship) का प्रावधान करता है, जिसका अर्थ है कि यहाँ राज्यों के लिए अलग नागरिकता नहीं होती।
अनुच्छेद 5: संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता
यह अनुच्छेद उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है जिनका 26 जनवरी, 1950 को भारत में अधिवास (Domicile) था और जो निम्नलिखित में से कोई एक शर्त पूरी करते थे:
- उनका जन्म भारत में हुआ हो।
- उनके माता-पिता में से किसी एक का जन्म भारत में हुआ हो।
- संविधान लागू होने के ठीक पहले वे कम से कम पांच वर्ष तक भारत में सामान्य रूप से निवासी रहे हों।
अनुच्छेद 6: पाकिस्तान से भारत आए प्रवासियों की नागरिकता
यह उन लोगों से संबंधित है जो पाकिस्तान से भारत आए थे। एक व्यक्ति भारतीय नागरिक बन गया यदि:
- वह या उसके माता-पिता/दादा-दादी में से कोई अविभाजित भारत में पैदा हुआ हो।
- यदि वह 19 जुलाई, 1948 से पहले आया हो: वह प्रवास की तिथि से ही सामान्य रूप से भारत का निवासी रहा हो।
- यदि वह 19 जुलाई, 1948 के बाद आया हो: उसे भारत सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारी के पास पंजीकरण कराना आवश्यक था, जिसके लिए उसे कम से कम छह महीने भारत में निवास करना पड़ता था।
अनुच्छेद 7: पाकिस्तान गए प्रवासियों की नागरिकता
यह अनुच्छेद 5 और 6 के प्रावधानों पर प्रभावी होता है।
- यदि कोई व्यक्ति 1 मार्च, 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान चला गया, तो वह भारत का नागरिक नहीं रहा।
- हालाँकि, यदि ऐसा व्यक्ति पुनर्वास (Resettlement) के परमिट के तहत भारत वापस आया, तो वह नागरिक बन सकता था (वही नियम लागू होते थे जो 19 जुलाई, 1948 के बाद आने वालों पर लागू थे)।
अनुच्छेद 8: भारत के बाहर रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों की नागरिकता
यह विदेश (जैसे ब्रिटेन या अमेरिका) में रहने वाले उन लोगों के लिए था जो भारतीय नागरिकता का दावा करना चाहते थे।
- यदि कोई व्यक्ति या उसके माता-पिता/दादा-दादी अविभाजित भारत में पैदा हुए थे, तो वह उस देश के भारतीय राजनयिक या कांसुलर प्रतिनिधि के पास पंजीकरण कराकर भारत का नागरिक बन सकता था।
अनुच्छेद 9: नागरिकता की समाप्ति
यह एकल नागरिकता के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुच्छेद है।
- यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता ग्रहण कर लेता है, तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वचालित रूप से समाप्त हो जाती है। भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता।
अनुच्छेद 10: नागरिकता के अधिकारों का बने रहना
यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक व्यक्ति, जो उपर्युक्त अनुच्छेदों के तहत भारत का नागरिक है या माना जाता है, वह ऐसा नागरिक बना रहेगा (संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन)।
अनुच्छेद 11: संसद द्वारा नागरिकता का कानून बनाना
अनुच्छेद 5 से 10 केवल संविधान के प्रारंभ (1950) के समय की नागरिकता से संबंधित थे।
- अनुच्छेद 11 भारत की संसद को यह सर्वोच्च शक्ति देता है कि वह नागरिकता के अर्जन (Acquisition), समाप्ति (Termination) और नागरिकता से जुड़े अन्य सभी मामलों के लिए कानून बना सके।
- इसी शक्ति के प्रयोग से संसद ने ‘नागरिकता अधिनियम, 1955’ पारित किया।
नागरिकता अधिनियम, 1955
संविधान के अनुच्छेद केवल 1950 की स्थिति बताते हैं, जबकि यह अधिनियम वर्तमान में नागरिकता के नियमों को परिभाषित करता है:
नागरिकता प्राप्त करने के पांच तरीके:
- जन्म से (By Birth): जन्म की तारीख और माता-पिता की नागरिकता के आधार पर।
- वंश के आधार पर (By Descent): भारत के बाहर जन्मे उन लोगों के लिए जिनके माता-पिता भारतीय हों।
- पंजीकरण द्वारा (By Registration): भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIO) या भारतीय नागरिकों के जीवनसाथी के लिए (भारत में एक निश्चित अवधि तक रहने के बाद)।
- प्राकृतिक रूप से/देशीयकरण द्वारा (By Naturalization): उन विदेशियों के लिए जो 12 वर्षों से भारत में रह रहे हों और विशिष्ट योग्यताएं पूरी करते हों।
- क्षेत्र समाविष्टि द्वारा (By Incorporation of Territory): यदि कोई नया क्षेत्र भारत का हिस्सा बनता है (जैसे पुडुचेरी), तो सरकार निर्दिष्ट करती है कि कौन नागरिक बनेगा।
नागरिकता खोने के तीन तरीके:
- त्याग द्वारा (Renunciation): स्वेच्छा से नागरिकता छोड़ना।
- समाप्ति द्वारा (Termination): दूसरे देश की नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता का स्वतः समाप्त होना।
- वंचित किए जाने द्वारा (Deprivation): सरकार द्वारा अनिवार्य रूप से नागरिकता छीनना (जैसे यदि नागरिकता धोखाधड़ी से प्राप्त की गई हो)।
🇮🇳 नागरिकता (अनुच्छेद 5–11)
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (06 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (06 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. शांति (SHANTI) विधेयक: परमाणु ऊर्जा में एक युगांतरकारी बदलाव
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (ऊर्जा; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास और उनके अनुप्रयोग)
- संदर्भ: संसद ने ‘भारत में परमाणु ऊर्जा का सतत दोहन और उन्नति’ (SHANTI) विधेयक पारित कर दिया है, जिससे परमाणु क्षेत्र में दशकों पुराने सरकारी एकाधिकार का अंत हो गया है।
- मुख्य बिंदु:
- निजी और विदेशी भागीदारी: यह विधेयक निजी भारतीय कंपनियों और विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के लिए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को खोलता है, जिससे NPCIL का एकाधिकार समाप्त हो गया है।
- नियंत्रण तंत्र: यह 49% तक निजी भागीदारी की अनुमति देता है, जबकि केंद्र सरकार ईंधन उत्पादन, सुरक्षा और रणनीतिक निरीक्षण जैसे संवेदनशील कार्यों पर 51% नियंत्रण बनाए रखेगी।
- AERB को वैधानिक दर्जा: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक दर्जा दिया गया है और अब यह केवल कार्यपालिका के बजाय संसद के प्रति जवाबदेह होगा।
- पारदर्शी उत्तरदायित्व (Liability): बड़े संयंत्रों के लिए उत्तरदायित्व सीमा ₹3,000 करोड़ और छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMR) के लिए ₹100 करोड़ निर्धारित की गई है।
- UPSC प्रासंगिकता: “ऊर्जा सुरक्षा”, “रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भारत” और “परमाणु दायित्व कानून” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- रणनीतिक ऊर्जा मिश्रण: इस विधेयक का लक्ष्य 2070 तक भारत के ‘नेट-जीरो’ लक्ष्यों को प्राप्त करना है। यह कोयला आधारित बिजली की तुलना में स्वच्छ और 24 घंटे उपलब्ध रहने वाली ‘बेसलोड पावर’ प्रदान करके ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाएगा।
- जवाबदेही संबंधी चिंताएँ: विपक्ष का तर्क है कि यह विधेयक आपूर्तिकर्ता की जिम्मेदारी को हटाकर और ऑपरेटर की जिम्मेदारी को वास्तविक आपदा लागत (जैसे फुकुशिमा) से बहुत कम रखकर जवाबदेही को कमजोर करता है।
- पारदर्शिता का टकराव: विधेयक की धारा 39 ‘आरटीआई अधिनियम 2005’ के प्रभाव को खत्म करने का प्रयास करती है, जिससे इस क्षेत्र से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी जनता के लिए प्रतिबंधित हो सकती है।
2. UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट का ‘भागीदारी का पदानुक्रम’
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था और शासन; शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही)
- संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के साजिश मामले में आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए “भागीदारी का पदानुक्रम” (Hierarchy of Participation) ढांचा विकसित किया है।
- मुख्य बिंदु:
- मास्टरमाइंड बनाम सहायक: कोर्ट ने उमर खालिद और शारजील इमाम को “कथित मास्टरमाइंड” बताते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
- जमानत मंजूर: पांच अन्य सह-आरोपियों को सशर्त जमानत दी गई क्योंकि उनकी भूमिका “सहायक” पाई गई।
- UAPA प्रतिबंध: कोर्ट ने UAPA की धारा 43D(5) के तहत सख्त जमानत प्रतिबंधों को बरकरार रखा।
- देरी ‘ट्रम्प कार्ड’ नहीं: यह फैसला दिया गया कि यदि आतंकी कृत्य में केंद्रीय भूमिका का प्रमाण है, तो केवल मुकदमे में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकती।
- UPSC प्रासंगिकता: “मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21)”, “UAPA और नागरिक स्वतंत्रता” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- आतंक की परिभाषा: कोर्ट ने व्याख्या की है कि ‘आतंकी कृत्य’ में न केवल अंतिम हिंसा शामिल है, बल्कि पूरी साजिश रचना और आवश्यक आपूर्ति में बाधा डालना भी शामिल है।
- व्यक्तिगत मूल्यांकन: साजिश के मामले में सभी आरोपियों के साथ एक जैसा व्यवहार करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। प्रत्येक व्यक्ति की प्रबंधकीय जिम्मेदारी का अलग से मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
- संवैधानिक चिंता: मुख्य आरोपियों को जमानत न देते हुए भी, पीठ ने स्वीकार किया कि छह साल की बिना मुकदमे की हिरासत एक “संवैधानिक चिंता” है और निचली अदालत को कार्यवाही तेज करने का निर्देश दिया।
3. राज्यों में बढ़ती सोशल मीडिया निगरानी
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (आंतरिक सुरक्षा; संचार नेटवर्क के माध्यम से चुनौतियां)
- संदर्भ: पुलिस बुनियादी ढांचे के आंकड़ों का विश्लेषण भारत भर में समर्पित सोशल मीडिया निगरानी सेल में 39% की वृद्धि दर्शाता है।
- मुख्य बिंदु:
- बुनियादी ढांचे में वृद्धि: समर्पित निगरानी सेल 2020 में 262 से बढ़कर 2024 में 365 हो गए।
- अग्रणी राज्य: बिहार (52) और महाराष्ट्र (50) परिचालन सेल की संख्या में सबसे आगे हैं।
- संघर्ष क्षेत्रों में निगरानी: मणिपुर में इंटरनेट शटडाउन के बावजूद निगरानी सेल 3 से बढ़कर 16 हो गए।
- उभरते रुझान: व्हाट्सएप, एक्स (X) और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफार्मों पर अपराध के रुझानों को रोकने के लिए इन इकाइयों का विस्तार किया गया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “साइबर सुरक्षा”, “निगरानी बनाम निजता” और “पुलिस व्यवस्था में तकनीक की भूमिका” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- विशिष्ट कार्यात्मक इकाइयाँ: 2021 के बाद से, ये सेल सामान्य साइबर अपराध स्टेशनों के बजाय अलग इकाइयों के रूप में कार्य करने लगे हैं।
- तकनीकी एकीकरण: यह डिजिटल विस्तार एक व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें 2024 तक पुलिस बलों के पास 1,147 ड्रोन की उपलब्धता भी शामिल है।
- प्रशासनिक अंतर: डिजिटल निगरानी में यह वृद्धि तब हो रही है जब देश भर में लगभग 5.93 लाख पुलिस पद अभी भी खाली पड़े हैं।
4. निर्यात में भारत का लचीलापन: दो-पथीय फार्मूला
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; निर्यात प्रदर्शन; विकसित देशों की नीतियों के प्रभाव)
- संदर्भ: नवंबर 2025 के व्यापार आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि कैसे भारतीय निर्यातक विविधीकरण के माध्यम से अमेरिकी टैरिफ का सामना कर रहे हैं।
- मुख्य बिंदु:
- स्मार्टफोन का सहारा: अमेरिका को स्मार्टफोन निर्यात में 237% की वृद्धि ने टैरिफ से प्रभावित अन्य क्षेत्रों की गिरावट को छिपा दिया।
- नए बाजार: निर्यातकों ने चीन और यूरोपीय संघ (स्पेन, बेल्जियम और जर्मनी) की ओर रुख किया है।
- मुद्रा सहायता: डॉलर के मुकाबले रुपये का ₹90 के स्तर पर होना निर्यातकों के लिए नए बाजारों में प्रवेश करने में मददगार साबित हो रहा है।
- UPSC प्रासंगिकता: “भारत का विदेशी व्यापार”, “व्यापार युद्ध और संरक्षणवाद” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- रणनीतिक बदलाव: कुछ वस्तुओं के लिए, अमेरिकी टैरिफ के झटके को आंशिक रूप से अवशोषित कर लिया गया, जबकि अन्य के लिए, सफल बाजार विविधीकरण के कारण कुल निर्यात में वृद्धि हुई।
- नीतिगत सिफारिश: उद्योग निकाय सरकार से आग्रह कर रहे हैं कि वे पारंपरिक बाजारों से बाहर इस गति को बनाए रखने के लिए अधिक ‘मुक्त व्यापार समझौतों’ (FTAs) पर काम करें।
5. सुरक्षा घेरे से बाहर: AI मॉडल (Grok) के दुरुपयोग को रोकना
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां)
- संदर्भ: जनरेटिव एआई चैटबॉट ‘ग्रोक’ (Grok) और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (X) द्वारा नैतिक सुरक्षा उपायों की कमी की आलोचना।
- मुख्य बिंदु:
- समस्या: ग्रोक को जानबूझकर सुरक्षा उपायों की कमी के साथ पेश किया जा रहा है, जो एक लापरवाह रवैये को जन्म देता है।
- चिंताजनक व्यवहार: चैटबॉट द्वारा महिलाओं की बिना सहमति के अश्लील छवियां उत्पन्न करने की खबरें आई हैं।
- सरकारी हस्तक्षेप: भारत सरकार ने ‘एक्स’ से ऐसी छवि निर्माण को रोकने की मांग की है और इसे आपराधिक कृत्य बताया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “एआई में नैतिकता”, “महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध” और “बिग टेक का विनियमन” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- साइबर-शत्रुता: संपादकीय का तर्क है कि ‘ग्रोक’ जैसे उपकरण इंटरनेट पर महिलाओं के लिए शत्रुतापूर्ण वातावरण बनाते हैं, जहाँ यौन हिंसा की धमकियाँ बिना किसी सजा के दी जाती हैं।
- भू-राजनीतिक कवच: मंच की इस लापरवाही को इस धारणा से जोड़ा गया है कि अमेरिकी शक्ति इसे अंतरराष्ट्रीय आलोचना से बचा लेगी।
- नीतिगत अनिवार्यता: संपादकीय सरकार से आग्रह करता है कि वह न केवल प्लेटफार्मों पर दबाव डाले, बल्कि उन व्यक्तियों पर भी मुकदमा चलाए जो ऐसी सामग्री को प्रसारित करते हैं।
संपादकीय विश्लेषण
06 जनवरी, 2026Mapping:
वैदिक और महापाषाण काल के भूगोल को समझने के लिए, हमें यह देखना होगा कि उपमहाद्वीप में अलग-अलग संस्कृतियाँ कैसे उभरीं। ऋग्वेद की रचना उत्तर-पश्चिम में हुई, जबकि महापाषाण संस्कृति दक्षिण और मध्य भारत के क्षेत्रों में फली-फूली।
1. ऋग्वैदिक मानचित्रण: उत्तर-पश्चिम की नदियाँ
ऋग्वेद के सूक्त (प्रार्थनाएँ) उस परिदृश्य का नक्शा प्रदान करते हैं जहाँ प्रारंभिक आर्य रहते थे।
- सिंधु और उसकी सहायक नदियाँ: ऋग्वेद में सिंधु और उसकी सहायक नदियों जैसे व्यास और सतलुज का बार-बार उल्लेख मिलता है।
- व्यास और सतलुज: इन नदियों को देवियों के रूप में पूजा जाता था और उनकी तुलना “दो फुर्तीले घोड़ों” और “दो चमकती गायों” से की गई है।
- सरस्वती: सूक्तों में इस नदी की भी अत्यधिक प्रशंसा की गई है और इसे पवित्र माना गया है।
- गंगा और यमुना: उत्तर-पश्चिमी नदियों के विपरीत, ऋग्वेद में गंगा और यमुना का नाम केवल एक बार आया है। यह दर्शाता है कि उस समय मुख्य सभ्यता अभी पूर्वी मैदानों (गंगा घाटी) में गहराई तक नहीं पहुँची थी।
2. महापाषाण स्थल: कब्रों के मौन प्रहरी
जिस समय उत्तर-पश्चिम में ऋग्वेद की रचना हो रही थी, उपमहाद्वीप के अन्य हिस्सों में महापाषाण (Megalithic) कब्र बनाने की प्रथा प्रचलित थी।
- दक्कन और दक्षिण भारत: यह महापाषाण संस्कृति का प्राथमिक क्षेत्र था। यहाँ ब्रह्मगिरि जैसे प्रसिद्ध स्थल हैं, जहाँ सोने के मनकों वाली समृद्ध कब्रें मिली हैं।
- इनामगाँव: यह महाराष्ट्र में घोड़ नदी (भीमा की सहायक नदी) के तट पर स्थित है।
- उत्तर-पूर्व और कश्मीर: उपमहाद्वीप के इन सुदूर कोनों में भी महापाषाण संरचनाएँ पाई गई हैं।
3. इनामगाँव: एक विस्तृत बस्ती
इनामगाँव प्राचीन जीवन का एक विशिष्ट भौगोलिक संदर्भ प्रदान करता है।
- घोड़ नदी: यह बस्ती इसी सहायक नदी के किनारे बसी थी।
- केंद्रीय आवास: महत्वपूर्ण व्यक्ति, संभवतः सरदार, बस्ती के केंद्र में स्थित बड़े घरों में दफनाए गए थे, जिनमें अक्सर अन्नागार (अनाज भंडार) जैसी संरचनाएँ भी शामिल होती थीं।
🗺️ आपके लिए मानचित्र अभ्यास (Mapping Exercises)
पाठ के आधार पर, आप मानचित्र पर निम्नलिखित स्थानों को खोजने का अभ्यास कर सकते हैं:
- नदियाँ: सिंधु, व्यास और सतलुज को चिह्नित करें यह देखने के लिए कि ऋग्वैदिक सूक्तों की रचना संभवतः कहाँ हुई थी।
- कब्रगाह स्थल: महापाषाण और उत्तर-हड़प्पा संस्कृतियों के विस्तार को समझने के लिए ब्रह्मगिरि और इनामगाँव को खोजें।
- गंगा और यमुना: इन नदियों के मार्ग को देखें और समझें कि क्यों ऋग्वेद के समय इनका महत्व कम था।