IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 31 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 8 Chapter-5 (जब जनता बग़ावत करती है – 1857 और उसके बाद)
यह अध्याय “जब जनता बगावत करती है – 1857 और उसके बाद” भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ हुए विशाल जन-विद्रोह के कारणों, घटनाओं और परिणामों का विवरण देता है।
1. नीतियां और लोग
ईस्ट इंडिया कंपनी की नीतियों ने समाज के विभिन्न वर्गों—राजाओं, रानियों, किसानों, जमींदारों, आदिवासियों और सिपाहियों को अलग-अलग तरह से प्रभावित किया।
- नवाबों की छिनती सत्ता: 18वीं सदी के मध्य से ही राजाओं और नवाबों की ताकत कम होने लगी थी। उनके दरबारों में ब्रिटिश ‘रेजिडेंट’ तैनात कर दिए गए थे, जिससे उनकी स्वतंत्रता और सम्मान खत्म होता जा रहा था।
- अवध का मामला: 1801 में अवध पर एक ‘सहायक संधि’ थोपी गई और अंततः 1856 में “कुशासन” का आरोप लगाकर उसे ब्रिटिश कब्जे में ले लिया गया।
- किसान और जमींदार: गाँवों में किसान और जमींदार भारी-भरकम लगान और कर वसूली के सख्त तौर-तरीकों से परेशान थे। कई लोग महाजनों का कर्ज नहीं चुका पा रहे थे, जिसके कारण उनकी पीढ़ियों पुरानी जमीनें उनके हाथ से निकलती जा रही थीं।
- भारतीय सिपाही: कंपनी के तहत काम करने वाले भारतीय सिपाही अपने वेतन, भत्तों और सेवा शर्तों के कारण असंतुष्ट थे। कुछ नियमों ने उनकी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, जैसे—समुद्र पार यात्रा करने की अनिवार्यता, जिसे उस समय कई लोग अपने धर्म और जाति के विरुद्ध मानते थे।
2. सुधारों पर प्रतिक्रिया
अंग्रेजों का मानना था कि भारतीय समाज में सुधार करना आवश्यक है।
- सामाजिक कानून: सती प्रथा को रोकने और विधवा विवाह को बढ़ावा देने के लिए कानून बनाए गए।
- शिक्षा: अंग्रेजी भाषा की शिक्षा को जमकर प्रोत्साहन दिया गया।
- धार्मिक परिवर्तन: 1830 के बाद ईसाई मिशनरियों को खुलकर काम करने और यहाँ तक कि जमीन खरीदने की भी छूट दी गई। 1850 में एक नया कानून बनाया गया जिससे ईसाई धर्म अपनाना आसान हो गया और धर्म परिवर्तन करने वालों को अपने पूर्वजों की संपत्ति पर अधिकार सुरक्षित रखने की अनुमति मिल गई।
3. सैनिक विद्रोह जन-विद्रोह बना
मई 1857 में जो एक सैनिक विद्रोह (Mutiny) के रूप में शुरू हुआ, उसने जल्द ही एक व्यापक जन-विद्रोह का रूप ले लिया, जिसने भारत में ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।
मेरठ से दिल्ली तक
- घटना: 29 मार्च, 1857 को युवा सैनिक मंगल पांडे को बैरकपुर में अपने अधिकारियों पर हमला करने के आरोप में फाँसी दे दी गई।
- चर्बी वाले कारतूस: मेरठ में सिपाहियों ने नए कारतूसों का इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया क्योंकि उन्हें शक था कि उन पर गाय और सूअर की चर्बी का लेप चढ़ाया गया है।
- मार्च: 10 मई, 1857 को मेरठ के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया, जेल में बंद अपने साथियों को छुड़ाया और दिल्ली की ओर कूच कर दिया। उन्होंने मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फ़र को अपना नेता घोषित किया।
बगावत फैलने लगी
- विद्रोह का प्रसार: एक के बाद एक कई रेजिमेंटों ने विद्रोह कर दिया और वे दिल्ली, कानपुर और लखनऊ जैसे मुख्य केंद्रों पर जमा होने लगे।
- प्रमुख नेतृत्व:
- कानपुर: पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहेब ने कमान संभाली।
- लखनऊ: नवाब वाजिद अली शाह के बेटे बिरजिस कद्र को नवाब घोषित किया गया।
- झाँसी: रानी लक्ष्मीबाई ने विद्रोही सिपाहियों के साथ मिलकर तांत्या टोपे के साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध किया।
- बिहार: एक पुराने जमींदार कुँवर सिंह ने विद्रोहियों का साथ दिया।
4. कंपनी का पलटवार
विद्रोह की व्यापकता को देखते हुए कंपनी ने अपनी पूरी ताकत लगाकर इसे कुचलने का फैसला किया।
- दिल्ली पर दोबारा कब्जा: इंग्लैंड से और अधिक सैनिक मंगाए गए और सितंबर 1857 में दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया गया।
- सम्राट का भाग्य: बहादुर शाह ज़फ़र पर मुकदमा चलाया गया, उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गई और उन्हें उनकी पत्नी के साथ रंगून (बर्मा) की जेल भेज दिया गया।
- प्रतिरोध का अंत: मार्च 1858 में लखनऊ पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई की हार हुई और वे वीरगति को प्राप्त हुईं। तांत्या टोपे ने कुछ समय तक छापामार युद्ध जारी रखा, लेकिन अंततः उन्हें भी अप्रैल 1859 में पकड़कर फाँसी दे दी गई।
5. विद्रोह के बाद के साल (प्रमुख बदलाव)
ब्रिटिश संसद ने 1858 में एक नया अधिनियम पारित किया ताकि भारत का शासन अधिक जिम्मेदारी से चलाया जा सके।
- सत्ता का हस्तांतरण: ईस्ट इंडिया कंपनी की शक्तियाँ अब ब्रिटिश क्राउन (राजशाही) को सौंप दी गईं। ब्रिटिश कैबिनेट के एक सदस्य को ‘भारत सचिव’ (Secretary of State) नियुक्त किया गया।
- वायसराय: गवर्नर-जनरल का पद नाम बदलकर ‘वायसराय’ कर दिया गया, जो सीधे ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि था।
- रियासतों को आश्वासन: राजाओं को भरोसा दिलाया गया कि भविष्य में उनके क्षेत्रों का कभी विलय नहीं किया जाएगा, बशर्ते वे ब्रिटिश महारानी को अपना सर्वोच्च शासक स्वीकार करें।
- सेना का पुनर्गठन: भारतीय सैनिकों का अनुपात कम किया गया और यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ाई गई। गोरखाओं, सिखों और पठानों की भर्ती पर अधिक जोर दिया गया।
- धार्मिक सम्मान: अंग्रेजों ने वादा किया कि वे भारत के लोगों के पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों का सम्मान करेंगे।
1857 के विद्रोह के प्रमुख नेता (तालिका)
| नेता | क्षेत्र | मुख्य भूमिका और कार्य |
| बहादुर शाह ज़फ़र | दिल्ली | मुगल सम्राट जिन्हें विद्रोहियों ने अपना प्रतीकात्मक नेता चुना। |
| नाना साहेब | कानपुर | पेशवा बाजीराव II के दत्तक पुत्र; उन्होंने अंग्रेजों को कानपुर से खदेड़ दिया। |
| रानी लक्ष्मीबाई | झाँसी | अपने राज्य को वापस पाने के लिए लड़ते हुए शहीद हुईं। |
| बेगम हज़रत महल | लखनऊ | लखनऊ में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह को संगठित करने में सक्रिय भूमिका निभाई। |
| कुँवर सिंह | बिहार | आरा के बुजुर्ग जमींदार जिन्होंने महीनों तक अंग्रेजों से लोहा लिया। |
| बख्त खान | दिल्ली | बरेली के सैनिक जिन्होंने दिल्ली में विद्रोही सेना का नेतृत्व संभाला। |
| मौलवी अहमदउल्लाह शाह | फैजाबाद | उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि अंग्रेजों का राज जल्द खत्म होगा; लखनऊ में जाकर लड़े। |
| तांत्या टोपे | मध्य भारत | रानी लक्ष्मीबाई और नाना साहेब के सहयोगी; छापामार युद्ध के विशेषज्ञ। |
निष्कर्ष:
यद्यपि 1857 का विद्रोह सैन्य रूप से विफल रहा, लेकिन इसने भारत में ब्रिटिश शासन के स्वरूप को हमेशा के लिए बदल दिया और भविष्य के राष्ट्रीय आंदोलनों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना।
जब जनता बगावत करती है – 1857 और उसके बाद
मंगल पांडे
बैरकपुर में अपने अधिकारियों पर हमला करने के लिए 29 मार्च, 1857 को फांसी दी गई।
भारत सचिव
भारतीय मामलों के प्रबंधन के लिए 1858 में नियुक्त ब्रिटिश कैबिनेट का एक सदस्य।
तांत्या टोपे
एक कुशल सेनापति जिन्होंने 1859 में पकड़े जाने तक छापामार युद्ध का नेतृत्व जारी रखा।
कक्षा-8 इतिहास अध्याय-5 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: जब जनता बग़ावत करती है – 1857 और उसके बाद
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: भारत का महान्यायवादी (Attorney General of India) – अनुच्छेद 76
भारत का महान्यायवादी देश का सर्वोच्च विधि अधिकारी (Highest Law Officer) होता है। यह पद अद्वितीय है क्योंकि संघीय कार्यपालिका (Union Executive) का हिस्सा होते हुए भी यह एक राजनीतिक पद के बजाय एक पेशेवर कानूनी पद है। वह भारत सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार के रूप में कार्य करता है।
1. नियुक्ति और कार्यकाल
- नियुक्ति: महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिपरिषद (Council of Ministers) की सलाह पर की जाती है।
- योग्यताएं: महान्यायवादी बनने के लिए व्यक्ति में उन योग्यताओं का होना आवश्यक है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए अनिवार्य हैं:
- वह भारत का नागरिक हो।
- वह 5 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (High Court) का न्यायाधीश रहा हो अथवा 10 वर्षों तक उच्च न्यायालय में वकालत की हो अथवा राष्ट्रपति के मत में वह एक प्रतिष्ठित न्यायविद (Distinguished Jurist) हो।
- कार्यकाल: संविधान में महान्यायवादी का कार्यकाल निश्चित नहीं किया गया है।
- वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (During the pleasure) पद धारण करता है।
- वह राष्ट्रपति को कभी भी अपना त्यागपत्र सौंप सकता है।
- परंपरा के अनुसार, जब सरकार (मंत्रिपरिषद) इस्तीफा देती है या बदलती है, तो महान्यायवादी भी इस्तीफा दे देता है, क्योंकि उसकी नियुक्ति सरकार की सलाह पर की गई थी।
- पारिश्रमिक: महान्यायवादी का वेतन और भत्ता संविधान द्वारा निर्धारित नहीं है; यह राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित किया जाता है।
2. कर्तव्य और कार्य
महान्यायवादी का प्राथमिक कर्तव्य कानूनी मामलों पर भारत सरकार को सलाह देना है।
- कानूनी सलाह: राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए कानूनी विषयों पर भारत सरकार को सलाह देना।
- प्रतिनिधित्व: भारत सरकार से संबंधित मामलों में उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) और किसी भी उच्च न्यायालय (High Court) में सरकार की ओर से पेश होना।
- अनुच्छेद 143: राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत उच्चतम न्यायालय को भेजे गए किसी भी संदर्भ (परामर्शदात्री क्षेत्राधिकार) में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करना।
- संवैधानिक कर्तव्य: संविधान या अन्य किसी कानून द्वारा सौंपे गए अन्य कार्यों का निर्वहन करना।
3. अधिकार और विशेषाधिकार
महान्यायवादी के पास कुछ ऐसे अधिकार हैं जो कार्यपालिका और विधायिका के बीच की कड़ी का काम करते हैं:
- सुनवाई का अधिकार (Right of Audience): उसे भारत के राज्यक्षेत्र के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
- संसदीय भागीदारी: उसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) की कार्यवाही में, उनकी संयुक्त बैठक में और संसद की किसी भी समिति (जिसका वह सदस्य नामांकित हो) में बोलने और भाग लेने का अधिकार है।
- मतदान का अधिकार नहीं: संसद की कार्यवाही में भाग लेने के बावजूद, महान्यायवादी को वोट देने का अधिकार नहीं है।
- उन्मुक्तियाँ: उसे वे सभी विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ (Immunities) प्राप्त होती हैं जो एक संसद सदस्य (MP) को मिलती हैं।
4. सीमाएँ (Limitations)
हितों के टकराव को रोकने के लिए महान्यायवादी पर कुछ प्रतिबंध लगाए गए हैं:
- वह भारत सरकार के खिलाफ कोई सलाह या मामला नहीं ले सकता।
- वह सरकार की अनुमति के बिना किसी आपराधिक मामले में आरोपी व्यक्ति का बचाव नहीं कर सकता।
- वह भारत सरकार की अनुमति के बिना किसी कंपनी या निगम में निदेशक (Director) का पद स्वीकार नहीं कर सकता।
- ध्यान दें: महान्यायवादी सरकार का पूर्णकालिक परामर्शदाता नहीं है और न ही वह एक ‘सरकारी सेवक’ (Government Servant) की श्रेणी में आता है। इसलिए, उसे निजी कानूनी प्रैक्टिस (Private Practice) करने से नहीं रोका गया है।
सारांश तालिका (Summary Table)
| विशेषता | विवरण |
| अनुच्छेद | 76 |
| सर्वोच्च पद | भारत का मुख्य कानून अधिकारी |
| नियुक्ति | राष्ट्रपति द्वारा |
| कार्यकाल | राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (निश्चित नहीं) |
| संसदीय अधिकार | दोनों सदनों में बोलने का अधिकार, लेकिन वोट देने का नहीं |
| निजी प्रैक्टिस | अनुमति है (क्योंकि वह सरकारी कर्मचारी नहीं है) |
| योग्यता | सुप्रीम कोर्ट के जज के समान |
💡 परीक्षा के लिए टिप:
अक्सर छात्र महान्यायवादी और महाधिवक्ता (Advocate General) के बीच भ्रमित हो जाते हैं। याद रखें, महान्यायवादी (AG) केंद्र के लिए होता है (अनुच्छेद 76), जबकि महाधिवक्ता राज्य के लिए होता है (अनुच्छेद 165)। इसके अलावा, महान्यायवादी की सहायता के लिए सॉलिसिटर जनरल और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल होते हैं, लेकिन ये संवैधानिक पद नहीं हैं।
भारत के महान्यायावादी
सुनवाई का अधिकार
कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान उन्हें भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
निजी वकालत
वे पूर्णकालिक सरकारी सेवक नहीं हैं; इसलिए, उन्हें निजी कानूनी वकालत से वंचित नहीं किया गया है।
उन्मुक्तियां
वे उन सभी विशेषाधिकारों और उन्मुक्तियों के हकदार हैं जो एक संसद सदस्य (MP) को उपलब्ध होते हैं।
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (31 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (31 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. सराहनीय कार्य: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का विश्लेषण
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; विकास और वृद्धि; संसाधनों का संग्रहण)।
- संदर्भ: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक स्थिर और महत्वाकांक्षी मध्यम अवधि का ढांचा पेश किया है।
- मुख्य बिंदु:
- विकास स्थिरता: सर्वेक्षण भारत की अर्थव्यवस्था की एक अनुकूल तस्वीर पेश करता है, जिसमें महामारी के बाद विकास की गति तेज होने का अनुमान है।
- वैश्विक संकट का जोखिम: सर्वेक्षण के अनुसार 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था के 2008 के संकट से भी बदतर स्थिति में जाने की 10%-20% संभावना है।
- उद्यमी राज्य (Entrepreneurial State): CEA ने नीति निर्माण में एक गतिशील बदलाव का आह्वान किया है, जहाँ राज्य अधिक फुर्तीला (Agile), जोखिम लेने वाला और प्रयोग करने को तैयार हो।
- राजकोषीय अनुशासन: केंद्र के लिए भू-आर्थिक अनिश्चितताओं से निपटने हेतु लचीलेपन की मांग करते हुए, राज्यों को “राजकोषीय लोकलुभावनवाद” (Fiscal Populism) और बढ़ते राजस्व घाटे के प्रति आगाह किया गया है।
- छिपी हुई चुनौतियां: सर्वेक्षण में भोजन सुरक्षा पर इथेनॉल उत्पादन का प्रभाव, चारे की कमी और स्मार्टफोन पर “जबरन स्क्रॉलिंग” (Compulsive Scrolling) के मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव जैसे उभरते मुद्दों को रेखांकित किया गया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “समष्टि आर्थिक (Macroeconomic) स्थिरता”, “राजकोषीय संघवाद” और “आर्थिक नियोजन” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- रुपये के आधार: गिरते रुपये का कारण घरेलू आर्थिक कमजोरी के बजाय उन्नत AI उद्योगों वाले देशों की ओर पूंजी प्रवाह और ‘सुरक्षित संपत्ति’ (Safe-haven assets) की ओर झुकाव को बताया गया है।
- रणनीतिक अपरिहार्यता: भारत को आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply chains) के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाने के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक लचीलापन विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
2. पथ पर बने रहें: परिसर समानता (Campus Equity) नियमों पर बहस
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक क्षेत्र/शिक्षा के विकास और प्रबंधन से संबंधित मुद्दे; सामाजिक न्याय)।
- संदर्भ: उत्तर भारत में विरोध प्रदर्शनों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने UGC के ‘समानता को बढ़ावा देने’ (Promotion of Equity) संबंधी 2026 के नियमों पर रोक लगा दी है।
- मुख्य बिंदु:
- भेदभाव को संबोधित करना: इन नियमों का उद्देश्य निरंतर जाति-आधारित भेदभाव से निपटना था। UGC के आंकड़े बताते हैं कि ऐसी शिकायतें 5 वर्षों में दोगुनी से अधिक हो गई हैं।
- संस्थागत जवाबदेही: नया ढांचा ‘समान अवसर केंद्रों’, ‘इक्विटी स्क्वॉड’ और समयबद्ध शिकायत निवारण को अनिवार्य बनाता है, जिसमें अनुपालन न करने पर सख्त दंड का प्रावधान है।
- परिभाषा पर विवाद: प्रदर्शनकारियों को केवल SC/ST/OBC छात्रों पर केंद्रित जातिगत भेदभाव की परिभाषा से आपत्ति है, जिसका तर्क है कि यह सामान्य वर्ग के साथ अन्याय है।
- झूठी शिकायतें: अंतिम मसौदे से झूठी शिकायतों के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधानों को हटाना विवाद का मुख्य बिंदु बन गया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “उच्च शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “संस्थागत निरीक्षण” और “न्यायिक समीक्षा” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- संतुलन की आवश्यकता: संपादकीय सुझाव देता है कि समानता के समग्र लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए न्यायालय व्यापक परिभाषा पर विचार कर सकता है।
- शिकायतकर्ताओं का संरक्षण: दुर्भावनापूर्ण शिकायतों और वास्तविक पीड़ितों के बीच अंतर करना जरूरी है ताकि वास्तविक पीड़ितों पर कोई नकारात्मक प्रभाव (Chilling effect) न पड़े।
3. ग्रीन स्टील (Green Steel): भारत के जलवायु लक्ष्यों को आकार देना
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; बुनियादी ढांचा; औद्योगिक नीति)।
- संदर्भ: जैसे-जैसे भारत COP30 के लिए अपने ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDC) को संशोधित कर रहा है, स्टील क्षेत्र डीकार्बोनाइजेशन (Decarbonization) के लिए सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा बनकर उभरा है।
- मुख्य बिंदु:
- विकास का आधार: भारत की विकास आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सदी के मध्य तक स्टील उत्पादन को 400 मिलियन टन से अधिक (तीन गुना) करना होगा।
- उत्सर्जन का बोझ: कोयले पर भारी निर्भरता के कारण यह क्षेत्र वर्तमान में भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन के 12% के लिए जिम्मेदार है।
- कार्बन लॉक-इन से बचना: अभी संक्रमण (Transition) करना आवश्यक है ताकि उन तकनीकों में निवेश न फंस जाए जो भविष्य में पर्यावरणीय और आर्थिक रूप से विनाशकारी साबित हो सकती हैं।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय संघ के CBAM (कार्बन बॉर्डर टैक्स) का अर्थ है कि ‘ग्रीन स्टील’ के क्षेत्र में पहले कदम उठाने वाले देश प्रीमियम निर्यात बाजारों तक पहुँच सुनिश्चित कर सकेंगे।
- UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु परिवर्तन शमन”, “सतत औद्योगीकरण” और “ऊर्जा संक्रमण” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- संक्रमण की बाधाएं: मुख्य बाधाओं में ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ की उच्च लागत, उद्योग के लिए अपर्याप्त समर्पित नवीकरणीय ऊर्जा और ‘स्क्रेप’ (Scrap) बाजार की अनौपचारिक प्रकृति शामिल है।
4. पाकिस्तान की लोकतांत्रिक दुविधा: 27वाँ संशोधन
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत के हितों पर क्षेत्रीय नीतियों का प्रभाव; पड़ोसी संबंध)।
- संदर्भ: पाकिस्तान का हालिया 27वाँ संशोधन (PCA) उसके सुप्रीम कोर्ट को हाशिए पर धकेलकर देश की संवैधानिक व्यवस्था को महत्वपूर्ण रूप से बदल देता है।
- मुख्य बिंदु:
- न्यायिक विखंडन: PCA संवैधानिक व्याख्या और प्रांतीय विवादों के क्षेत्राधिकार को एक नए निर्मित ‘संघीय संवैधानिक न्यायालय’ (FCC) को हस्तांतरित करता है।
- कार्यपालिका का प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट की अंतिम मध्यस्थ के रूप में भूमिका को कम करके, यह संशोधन न्यायिक प्राधिकरण को कार्यपालिका के अधीन हाशिए पर धकेलने के प्रति संवेदनशील बनाता है।
- भारत के लिए सबक: संपादकीय इस बात पर जोर देता है कि संवैधानिक लोकतंत्र केवल लिखित पाठ पर नहीं, बल्कि अदालतों की निरंतर स्वतंत्रता और शक्तियों की सीमाओं के सम्मान पर जीवित रहता है।
- UPSC प्रासंगिकता: “पड़ोसी देशों की गतिशीलता”, “संवैधानिक शासन” और “न्यायपालिका की स्वतंत्रता”।
5. स्टेम सेल थेरेपी: ऑटिज्म (Autism) के लिए एक नैदानिक ‘रेड लाइन’
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दे; नियामक निकाय) और GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।
- संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि ‘ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर’ (ASD) के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नैदानिक सेवा (Clinical Service) के रूप में नहीं दिया जा सकता।
- मुख्य बिंदु:
- साक्ष्य का अभाव: पीठ ने ASD के लिए स्टेम सेल के उपयोग की प्रभावकारिता और सुरक्षा के संबंध में “स्थापित वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी” को नोट किया।
- नैतिक सीमा: ऐसे अप्रमाणित उपचारों के लिए माता-पिता से प्राप्त सहमति को अमान्य माना गया है, क्योंकि डॉक्टर पर्याप्त जानकारी का खुलासा करने की शर्त को पूरा नहीं करते।
- नियामक विफलता: न्यायालय ने उन क्लीनिकों के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना की जो भारी कीमत पर “चमत्कारी इलाज” का प्रचार कर रहे हैं।
- नया निरीक्षण: सरकार को भारत में सभी स्टेम सेल अनुसंधान पर नियामक निरीक्षण के लिए एक समर्पित प्राधिकरण गठित करने का निर्देश दिया गया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “जैव-नीतिशास्त्र” (Bioethics), “स्वास्थ्य विनियमन” और “चिकित्सा में वैज्ञानिक वैधता”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- देखभाल का मानक: वैज्ञानिक रूप से अपुष्ट प्रक्रियाओं को अपनाना उस मानक देखभाल (Standard of care) का उल्लंघन है जो डॉक्टर अपने मरीजों के प्रति रखते हैं।
- मरीज की स्वायत्तता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मरीज की स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं है कि उसे ऐसी किसी प्रक्रिया का अधिकार मिल जाए जो नैतिक रूप से अस्वीकार्य हो।
संपादकीय विश्लेषण
31 जनवरी, 2026मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) ने ‘अनिवार्य स्क्रॉलिंग’ और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों के प्रति आगाह किया। एक ऐसे राज्य की वकालत जो फुर्तीला, जोखिम लेने वाला और प्रयोगात्मक हो।
12% उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार क्षेत्र को कार्बन मुक्त करना। मध्य-शताब्दी तक उत्पादन को तीन गुना (400MT) करने के लिए महत्वपूर्ण परिवर्तन की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने नैदानिक सेवाओं के रूप में अप्रमाणित उपचारों पर रोक लगाई। “चमत्कारी इलाज” के लिए माता-पिता के दबाव के बावजूद डॉक्टरों को देखभाल के मानकों को बनाए रखना चाहिए।
जैव-नैतिकता
Mapping:
यहाँ नए बाघ अभयारण्यों (Tiger Reserves), रामसर स्थलों के विस्तार और गहरे समुद्र में संसाधन अन्वेषण का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. भारत के नवीनतम बाघ अभयारण्य (2025–2026)
2026 की शुरुआत तक, भारत में कुल 58 बाघ अभयारण्य हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए नवीनतम जोड़ों का मानचित्रण करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- माधव बाघ अभयारण्य (58वाँ), मध्य प्रदेश: मार्च 2025 में अधिसूचित, यह मध्य प्रदेश का 9वाँ बाघ अभयारण्य है।
- मैपिंग पॉइंट: यह शिवपुरी जिले में स्थित है, जो उत्तरी अरावली-विंध्य परिदृश्य को जोड़ता है।
- रातापानी बाघ अभयारण्य (57वाँ), मध्य प्रदेश: भोपाल और होशंगाबाद क्षेत्रों के बीच एक महत्वपूर्ण गलियारा (Corridor)।
- गुरु घासीदास-तमोर पिंगला (56वाँ), छत्तीसगढ़: देश के सबसे बड़े अभयारण्यों में से एक, जो छत्तीसगढ़-यूपी-एमपी सीमा पर एक निरंतर आवास (Contiguous habitat) प्रदान करता है।
2. रामसर स्थलों का मील का पत्थर (जनवरी 2026)
भारत ने अपनी सूची का विस्तार कर 96 रामसर स्थल कर लिए हैं, जिससे यह स्थलों की संख्या के मामले में एशिया में पहले और वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर बना हुआ है।
| नया रामसर स्थल | राज्य | मुख्य महत्व |
| कोपरा जलाशय | छत्तीसगढ़ | भारत का 95वाँ स्थल; छत्तीसगढ़ का पहला रामसर स्थल, बिलासपुर में स्थित। |
| सिलीसेढ़ झील | राजस्थान | भारत का 96वाँ स्थल; अलवर में स्थित, यह एक महत्वपूर्ण अर्ध-शुष्क मीठे पानी का आवास है। |
| गोगाबील झील | बिहार | भारत का 94वाँ स्थल; कटिहार जिले में स्थित एक प्रमुख गोखुर झील (Oxbow lake)। |
राज्यों की रैंकिंग: तमिलनाडु 20 स्थलों के साथ शीर्ष पर है, उसके बाद उत्तर प्रदेश 10 स्थलों के साथ दूसरे स्थान पर है।
3. ‘डीप ओशन मिशन’ और समुद्री मानचित्रण
भारत ‘समुद्रयान’ परियोजना के माध्यम से “ब्लू इकोनॉमी” (नीली अर्थव्यवस्था) पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है।
- पॉलीमेटेलिक नोड्यूल (PMN) क्षेत्र: भारत मध्य हिंद महासागर बेसिन (CIOB) में 75,000 वर्ग किमी क्षेत्र की खोज कर रहा है।
- मैपिंग पॉइंट: CIOB को चिह्नित करें, जहाँ 5,000 मीटर से अधिक की गहराई पर मैंगनीज, निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिजों का मानचित्रण किया जा रहा है।
- हाइड्रोथर्मल सल्फाइड साइट्स: हिंद महासागर की मध्य-महासागरीय पर्वतमालाओं (Mid-Oceanic Ridges) के साथ बहु-धातु जमाव का मानचित्रण।
- मत्स्य 6000 (Matsya 6000): मानवयुक्त पनडुब्बी का 2026 की शुरुआत में चेन्नई तट पर उथले पानी में परीक्षण चल रहा है।
4. नए भौगोलिक संकेत (GI) टैग
क्षेत्रीय भूगोल और अर्थव्यवस्था अनुभाग के लिए इन टैगों का मानचित्रण आवश्यक है।
- कलाड़ी (जम्मू-कश्मीर): उधमपुर का एक पारंपरिक डेयरी उत्पाद (इसे ‘जम्मू का मोज़ेरेला’ कहा जाता है)।
- थुया मल्ली चावल (तमिलनाडु): कावेरी डेल्टा का स्वदेशी चावल, जो अपने “मोती जैसे” रूप के लिए जाना जाता है।
- उरैयूर सूती साड़ी (तमिलनाडु): कावेरी के तट पर तिरुचि जिले में बुनी जाने वाली प्रसिद्ध साड़ी।
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| श्रेणी | मानचित्रण मुख्य बिंदु | मुख्य स्थान |
| 58वाँ बाघ अभयारण्य | माधव बाघ अभयारण्य | शिवपुरी, मध्य प्रदेश |
| 96वाँ रामसर स्थल | सिलीसेढ़ झील | अलवर, राजस्थान |
| गहन समुद्री केंद्र | मध्य हिंद महासागर बेसिन | भूमध्य रेखा के दक्षिण में |
| नया डेयरी GI टैग | कलाड़ी (Kaladi) | उधमपुर, जम्मू-कश्मीर |
💡 मैपिंग टिप:
बाघ अभयारण्यों को मैप करते समय उनके बीच के गलियारों (Corridors) को भी समझने का प्रयास करें। उदाहरण के लिए, माधव अभयारण्य राजस्थान के रणथंभौर और मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान के बीच एक सेतु का काम करता है।
मानचित्रण विवरण
जैव विविधता एवं ब्लू इकोनॉमी5,000 मीटर से अधिक की गहराई पर मैंगनीज और कोबाल्ट से भरपूर पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स के लिए सेंट्रल इंडियन ओशन बेसिन (मध्य हिंद महासागर बेसिन) में 75,000 वर्ग किमी क्षेत्र का मानचित्रण।
चेन्नई तट के पास प्रारंभिक परीक्षण भारत की मानवयुक्त सबमर्सिबल क्षमता को चिह्नित करते हैं। रणनीतिक मानचित्रण मध्य-महासागरीय कटकों के साथ हाइड्रोथर्मल सल्फाइड स्थलों पर केंद्रित है।
जम्मू की डेयरी विशेषता कलाड़ी से लेकर कावेरी डेल्टा के मोती जैसे थूयमल्ली चावल तक, क्षेत्रीय भूगोल नई आर्थिक पहचान प्राप्त कर रहा है।