IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 19 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 7 Chapter-4 (दिल्ली के सुल्तान)
यह अध्याय भारतीय इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण राजवंशों में से एक—मुगल वंश के उदय, प्रशासन और उनकी विरासत की व्याख्या करता है।
1. मुगल कौन थे?
मुगल दो महान शासक वंशों के वंशज थे:
- माता की ओर से: वे चीन और मध्य एशिया के मंगोल शासक चंगेज खान (मृत्यु 1227) के वंशज थे।
- पिता की ओर से: वे ईरान, इराक और वर्तमान तुर्की के शासक तैमूर (मृत्यु 1404) के उत्तराधिकारी थे।
- पहचान: मुगल खुद को मुगल या मंगोल कहलवाना पसंद नहीं करते थे, क्योंकि ‘मंगोल’ नाम चंगेज खान के नरसंहारों की यादों से जुड़ा था। इसके बजाय, वे ‘तैमूरी’ कहलाने पर गर्व महसूस करते थे क्योंकि उनके महान पूर्वज (तैमूर) ने 1398 में दिल्ली पर कब्जा किया था।
2. मुगल सैन्य अभियान
- बाबर (1526–1530): पहला मुगल सम्राट। उसने 1504 में काबुल पर कब्जा किया और 1526 में पानीपत के प्रथम युद्ध में सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली और आगरा पर अधिकार कर लिया।
- हुमायूँ (1530–1540, 1555–1556): शेर शाह सूरी ने हुमायूँ को पराजित कर ईरान भागने पर मजबूर कर दिया। 1555 में उसने सफ़ाविद शाह की मदद से दोबारा दिल्ली जीती।
- अकबर (1556–1605): मात्र 13 वर्ष की आयु में सम्राट बना। उसने उत्तर भारत, गुजरात, बंगाल और दक्कन तक साम्राज्य का विस्तार किया।
- जहाँगीर (1605–1627) और शाहजहाँ (1627–1658): इन्होंने दक्कन में सैन्य अभियान जारी रखे और अहोम, सिख तथा मेवाड़ के खिलाफ युद्ध किए। शाहजहाँ के काल में मुगल वास्तुकला (जैसे ताजमहल) शिखर पर पहुँची।
- औरंगजेब (1658–1707): इसके काल में साम्राज्य अपने अधिकतम क्षेत्रीय विस्तार तक पहुँच गया, लेकिन उसे मराठों, सिखों, जाटों और सतनामियों के निरंतर विद्रोहों का सामना करना पड़ा।
3. उत्तराधिकार की मुगल परंपराएं
- मुगल ज्येष्ठाधिकार (जहाँ बड़ा बेटा पिता के राज्य का उत्तराधिकारी होता है) के नियम में विश्वास नहीं करते थे।
- इसके बजाय, वे उत्तराधिकार की तैमूरी प्रथा ‘सहदायाद’ (coparcenary inheritance) को अपनाते थे, जिसमें विरासत का विभाजन सभी पुत्रों के बीच कर दिया जाता था। इसी कारण अक्सर भाइयों के बीच सिंहासन के लिए गृहयुद्ध होते थे।
4. मनसबदार और जागीरदार
साम्राज्य के विस्तार के साथ मुगलों ने विभिन्न पृष्ठभूमि के अधिकारियों को नियुक्त किया:
- मनसबदार: यह शब्द उस व्यक्ति के लिए उपयोग होता था जिसे कोई ‘मनसब’ (सरकारी पद या रैंक) मिलता था।
- ज़ात (Zat): पद और वेतन का निर्धारण ‘ज़ात’ नामक संख्यात्मक मूल्य से होता था। ज़ात जितनी अधिक होती थी, दरबार में प्रतिष्ठा और वेतन उतना ही अधिक होता था।
- सैन्य जिम्मेदारी: मनसबदारों को एक निश्चित संख्या में ‘सवार’ (घुड़सवार) रखने पड़ते थे।
- जागीर: मनसबदारों को वेतन के रूप में राजस्व एकत्र करने के लिए क्षेत्र दिए जाते थे, जिन्हें ‘जागीर’ कहा जाता था। मनसबदार अपनी जागीरों में रहते नहीं थे, बल्कि उनके नौकर वहां से राजस्व इकट्ठा करते थे।
5. ज़ब्त और जमींदार
मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य स्रोत किसानों की उपज पर लगने वाला कर था।
- जमींदार: मुगलों ने सभी बिचौलियों (चाहे वे गाँव के मुखिया हों या शक्तिशाली स्थानीय सरदार) के लिए एक ही शब्द ‘जमींदार’ का उपयोग किया।
- टोडर मल की राजस्व व्यवस्था: अकबर के राजस्व मंत्री टोडर मल ने 10 साल (1570–1580) की अवधि के लिए फसलों की पैदावार, कीमतों और कृषि भूमि का सावधानीपूर्वक सर्वेक्षण किया।
- ज़ब्त (Zabt): इस डेटा के आधार पर प्रत्येक फसल पर नकद कर तय किया गया। प्रत्येक प्रांत को राजस्व मंडलों में बांटा गया था, जिनकी अपनी राजस्व दरों की सूची थी। इस व्यवस्था को ‘ज़ब्त’ कहा जाता था।
6. अकबर की नीतियाँ और “सुलह-ए-कुल”
अबुल फज़ल ने अकबर के शासनकाल का तीन खंडों में इतिहास लिखा, जिसका नाम ‘अकबरनामा’ है (तीसरा खंड ‘आइन-ए-अकबरी’ है)।
- प्रशासन: साम्राज्य प्रांतों में विभाजित था जिन्हें ‘सूबा’ कहा जाता था। सूबे का शासन ‘सूबेदार’ चलाता था, जिसके पास राजनीतिक और सैन्य दोनों शक्तियाँ होती थीं।
- धार्मिक सहिष्णुता: विभिन्न धर्मगुरुओं के साथ चर्चा के बाद अकबर ‘सुलह-ए-कुल’ (सर्वत्र शांति) के विचार पर पहुँचा। इस नैतिकता की प्रणाली (ईमानदारी, न्याय और शांति) ने उसके राज्य में विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच भेदभाव नहीं किया।
7. 17वीं शताब्दी में साम्राज्य और उसके बाद
17वीं शताब्दी के अंत तक मुगल प्रशासनिक दक्षता में गिरावट आने लगी।
- आर्थिक असमानता: एक ओर साम्राज्य अपनी भव्यता के लिए जाना जाता था, वहीं दूसरी ओर भारी गरीबी थी। आंकड़ों के अनुसार, कुल 8,000 मनसबदारों में से केवल 445 उच्च श्रेणी के थे, जो साम्राज्य के कुल अनुमानित राजस्व का 61.5% हिस्सा डकार जाते थे।
- पतन: जैसे-जैसे सम्राट की सत्ता कमजोर हुई, हैदराबाद और अवध जैसे प्रांतों के गवर्नरों ने अपनी शक्ति संगठित कर ली और नए राजवंश स्थापित किए। हालाँकि वे औपचारिक रूप से दिल्ली के मुगल सम्राट को अपना स्वामी मानते रहे।
📅 महत्वपूर्ण मुगल शासकों का क्रम:
- बाबर (1526-1530)
- हुमायूँ (1530-1540 / 1555-1556)
- अकबर (1556-1605)
- जहाँगीर (1605-1627)
- शाहजहाँ (1627-1658)
- औरंगजेब (1658-1707)
👑 मुगल साम्राज्य (1526-1707)
कक्षा-7 इतिहास अध्याय-4 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: मुगल साम्राज्य
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: भाग IV – राज्य के नीति निदेशक तत्व (अनुच्छेद 36–51)
नीति निदेशक तत्व ‘निर्देशों के साधन’ (Instrument of Instructions) हैं, जो सरकार को नीतियां बनाने और कानून लागू करने के लिए दिशा-निर्देश देते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य भारत को एक “पुलिस राज्य” से “कल्याणकारी राज्य” (Welfare State) में बदलना है।
मुख्य विशेषताएँ:
- संवैधानिक स्थिति: भाग IV, अनुच्छेद 36 से 51 तक।
- स्रोत: आयरलैंड के संविधान (Irish Constitution) से लिए गए हैं।
- उद्देश्य: सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना।
- प्रकृति: ये गैर-न्यायिक (Non-justiciable) हैं। यानी, इनके उल्लंघन पर आप सरकार के खिलाफ अदालत नहीं जा सकते, लेकिन ये “देश के शासन में मूलभूत” (Art. 37) हैं।
अनुच्छेद 36: “राज्य” की परिभाषा
नीति निदेशक तत्वों के संदर्भ में, “राज्य” का वही अर्थ है जो भाग III (मौलिक अधिकार) के अनुच्छेद 12 में दिया गया है।
- इसमें भारत सरकार, संसद, राज्य सरकारें, विधानमंडल और भारत के क्षेत्र के भीतर सभी स्थानीय या अन्य अधिकारी (जैसे नगरपालिका, LIC, ONGC आदि) शामिल हैं।
अनुच्छेद 37: सिद्धांतों का लागू होना
यह अनुच्छेद DPSP की कानूनी स्थिति को स्पष्ट करता है। इसके दो मुख्य प्रावधान हैं:
- अप्रवर्तनीय: ये सिद्धांत किसी भी अदालत द्वारा कानूनी रूप से लागू नहीं करवाए जा सकते।
- शासन का आधार: भले ही ये न्यायिक न हों, लेकिन कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।
अनुच्छेद 38: राज्य द्वारा सामाजिक व्यवस्था सुरक्षित करना
इसे DPSP का “प्रमुख” अनुच्छेद माना जाता है क्योंकि यह कल्याणकारी राज्य के लक्ष्य को परिभाषित करता है।
- 38(1): राज्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करेगा जहाँ सभी को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिले।
- 38(2): (44वें संशोधन, 1978 द्वारा जोड़ा गया) राज्य आय, स्थिति, सुविधाओं और अवसरों की असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 39: राज्य द्वारा अनुसरण की जाने वाली नीति के कुछ सिद्धांत
इसमें छह विशिष्ट लक्ष्य (39a से 39f) शामिल हैं:
- 39(a): सभी नागरिकों को आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार।
- 39(b): समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार हो कि उससे सामूहिक हित सध सके (वितरणकारी न्याय)।
- 39(c): धन और उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण रोकना।
- 39(d): पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन।
- 39(e): श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा करना तथा बच्चों का दुरुपयोग रोकना।
- 39(f): बच्चों को स्वस्थ तरीके से विकास के अवसर देना (42वें संशोधन द्वारा संशोधित)।
अनुच्छेद 39A: समान न्याय और मुफ्त कानूनी सहायता
- उत्पत्ति: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा जोड़ा गया।
- शासनादेश: राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि कानूनी प्रणाली इस आधार पर काम करे कि सभी को समान अवसर मिले।
- कार्यान्वयन: यह गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता देने का निर्देश देता है। इसी के तहत विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम (1987) पारित किया गया और NALSA की स्थापना हुई।
अनुच्छेद 40: ग्राम पंचायतों का संगठन
- दर्शन: यह “ग्राम स्वराज” की गांधीवादी विचारधारा को दर्शाता है।
- शासनादेश: राज्य ग्राम पंचायतों को संगठित करने के लिए कदम उठाएगा और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक शक्तियाँ देगा।
- कार्यान्वयन: इसे अंततः 73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से संवैधानिक दर्जा दिया गया।
अनुच्छेद 41: काम, शिक्षा और लोक सहायता का अधिकार
यह अनुच्छेद सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित है। राज्य अपनी आर्थिक क्षमता की सीमाओं के भीतर निम्नलिखित को सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा:
- काम पाने का अधिकार।
- शिक्षा का अधिकार।
- लोक सहायता (Public Assistance): विशेष रूप से बेकारी (Unemployment), बुढ़ापे, बीमारी, विकलांगता और अन्य अभाव की स्थितियों में।
- कार्यान्वयन: मनरेगा (MGNREGA) और वृद्धावस्था पेंशन योजनाएं सीधे अनुच्छेद 41 का परिणाम हैं।
विस्तृत सारांश तालिका
| अनुच्छेद | श्रेणी | मुख्य शब्द | कार्यान्वयन का उदाहरण |
| 36 | सामान्य | राज्य की परिभाषा | अनुच्छेद 12 से जुड़ा |
| 37 | प्रकृति | गैर-न्यायिक | कानून निर्माण हेतु मार्गदर्शन |
| 38 | कल्याणकारी | न्याय और समानता | गरीबी उन्मूलन योजनाएं |
| 39 | समाजवादी | वितरणकारी न्याय | समान पारिश्रमिक अधिनियम |
| 39A | न्याय | मुफ्त कानूनी सहायता | NALSA / लोक अदालत |
| 40 | गांधीवादी | पंचायत | 73वां संशोधन अधिनियम |
| 41 | सामाजिक सुरक्षा | लोक सहायता | मनरेगा / पेंशन योजनाएं |
🌿 राज्य के नीति निदेशक तत्व (भाग IV)
| अनुच्छेद | मुख्य विषय | कार्यान्वयन का उदाहरण |
|---|---|---|
| 38 | कल्याणकारी राज्य | गरीबी उन्मूलन योजनाएं |
| 39 | वितरणात्मक न्याय | समान पारिश्रमिक अधिनियम |
| 39A | मुफ्त कानूनी सहायता | लोक अदालतें / NALSA |
| 40 | गांधीवादी स्वराज | पंचायती राज (1992) |
| 41 | सार्वजनिक सहायता | वृद्धावस्था पेंशन / मनरेगा |
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (19 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (19 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. संपादकीय: दादागिरी की रणनीति: ग्रीनलैंड-टैरिफ सांठगांठ
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव; वैश्विक रणनीतिक भू-राजनीति)।
- संदर्भ: ट्रम्प प्रशासन ने यूरोपीय देशों के एक समूह पर बढ़ते टैरिफ (शुल्क) लगाने की धमकी दी है, जब तक कि अमेरिका को ग्रीनलैंड “खरीदने” की अनुमति नहीं दी जाती।
- आर्थिक दबाव (Economic Coercion):
- टैरिफ में वृद्धि: अमेरिका ने 1 फरवरी से यूरोपीय देशों के “सभी सामानों” पर 10% टैरिफ लगाने की योजना बनाई है, जिसे 1 जून तक बढ़ाकर 25% कर दिया जाएगा।
- लक्षित राष्ट्र: इनमें डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं।
- कानूनी स्थिति: इन एकपक्षीय कार्रवाइयों को अमेरिकी कांग्रेस का विधायी समर्थन प्राप्त नहीं है, और ‘अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम’ के उपयोग के खिलाफ न्यायिक फैसले की उम्मीद है।
- रणनीतिक और राजनयिक परिणाम:
- नाटो (NATO) पर प्रभाव: यूरोपीय संघ (EU) चिंतित है क्योंकि यह कदम व्यापार नीति को क्षेत्रीय जबरदस्ती के साथ जोड़ता है, जिससे नाटो गठबंधन में दरार आने का जोखिम है।
- यूरोपीय संघ की प्रतिक्रिया: यूरोपीय देश “जबरदस्ती-रोधी उपकरण” (anti-coercion instrument) को सक्रिय कर सकते हैं, जो यूरोपीय संघ के भीतर प्रमुख अमेरिकी तकनीकी फर्मों के व्यापार को सीमित करने की एक सुविधा है।
- UPSC प्रासंगिकता: “तनाव में बहुपक्षवाद”, “वैश्विक आर्थिक कूटनीति” और “आर्कटिक भू-राजनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
2. संपादकीय: शिक्षा में संकट: उच्च शिक्षा में प्रणालीगत सुधार
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; शिक्षा से संबंधित मुद्दे; शासन)।
- संदर्भ: भारत के उच्चतम न्यायालय ने छात्र आत्महत्याओं के एक मामले की सुनवाई करते हुए, उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) में छात्रों के तनाव को दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को नौ विशिष्ट निर्देश जारी किए हैं।
- प्रमुख न्यायिक निर्देश:
- संकाय रिक्तियां (Faculty Vacancies): न्यायालय ने आदेश दिया है कि सरकारी और निजी दोनों संस्थानों में शिक्षकों के खाली पदों को चार महीने के भीतर भरा जाना चाहिए।
- नेतृत्व नियुक्तियां: कुलपति और रजिस्ट्रार के पदों के खाली होने के एक महीने के भीतर नियुक्तियां पूरी की जानी चाहिए।
- तनाव की निगरानी: नौ में से सात निर्देश मानसिक स्वास्थ्य तनावों को समझने और उन्हें कम करने के लिए आत्महत्याओं के अलग से रिकॉर्ड रखने और ट्रैकिंग पर केंद्रित हैं।
- संकट का तकनीकी विश्लेषण:
- रिक्तियों की स्थिति: भारत के कई सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में वर्तमान में 50% तक शिक्षकों के पद खाली हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य अंतराल: एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, 65% संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाता उपलब्ध नहीं हैं।
- तनाव के कारण: सख्त उपस्थिति नीतियां, शिक्षकों की कमी और शोषणकारी शैक्षणिक संस्कृति (विशेषकर चिकित्सा शिक्षा में) को मुख्य कारणों के रूप में पहचाना गया।
- UPSC प्रासंगिकता: “मानव संसाधन विकास”, “मानसिक स्वास्थ्य नीति” और “शिक्षा में न्यायिक सक्रियता”।
3. संपादकीय: भ्रष्टाचार और पूर्व मंजूरी: एक विभाजित फैसला
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; पारदर्शिता और जवाबदेही; न्यायपालिका की भूमिका)।
- संदर्भ: उच्चतम न्यायालय की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण (PC) अधिनियम, 1988 की धारा 17A की संवैधानिक वैधता पर एक विभाजित फैसला (Split Verdict) सुनाया।
- कानूनी संघर्ष:
- धारा 17A: यह प्रावधान करती है कि कोई भी पुलिस अधिकारी उपयुक्त सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना किसी लोक सेवक (Public Servant) के खिलाफ जांच शुरू नहीं कर सकता।
- हितों का टकराव: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सरकार को जांच रोकने की शक्ति देना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है, विशेष रूप से वहां जहां विभाग के अधिकारी आपस में मिले हुए हों।
- न्यायाधीशों के अलग मत:
- न्यायमूर्ति नागरत्ना: उन्होंने इस धारा को असंवैधानिक माना क्योंकि पूर्व मंजूरी की आवश्यकता जांच को बाधित करती है और भ्रष्टों को बचाती है।
- न्यायमूर्ति विश्वनाथन: उन्होंने इस प्रावधान को संवैधानिक रूप से वैध पाया, बशर्ते कि मंजूरी की शक्ति सरकार के बजाय लोकपाल जैसी किसी स्वतंत्र एजेंसी के पास हो, ताकि नीतिगत पंगुता (Policy Paralysis) को रोका जा सके।
- UPSC प्रासंगिकता: “भ्रष्टाचार विरोधी ढांचा”, “शक्तियों का पृथक्करण” और “प्रशासनिक कानून”।
4. संपादकीय: बाल तस्करी: एक संवैधानिक और कानूनी चुनौती
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; कमजोर वर्गों के संरक्षण के लिए गठित तंत्र और कानून)।
- संदर्भ: के.पी. किरण कुमार बनाम राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने बाल तस्करी को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश दिए हैं, और कहा है कि यह जीवन के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
- कानूनी ढांचा:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023: धारा 143 तस्करी को व्यापक रूप से परिभाषित करती है, जिसमें शोषण के उद्देश्य से बल, धोखाधड़ी या शक्ति के दुरुपयोग द्वारा व्यक्तियों की भर्ती शामिल है।
- संवैधानिक संरक्षण: अनुच्छेद 23 और 24 मानव तस्करी और बाल श्रम से विशिष्ट सुरक्षा प्रदान करते हैं।
- सांख्यिकीय विश्लेषण:
- दोषसिद्धि दर: 2018 और 2022 के बीच तस्करी के अपराधों के लिए दोषसिद्धि दर मात्र 4.8% रही, जबकि अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच 53,000 से अधिक बच्चों को बचाया गया।
- UPSC प्रासंगिकता: “बाल अधिकार”, “मानवाधिकार प्रवर्तन” और “कानून-व्यवस्था में संघीय समन्वय”।
5. संपादकीय: दृश्यता का विज्ञान: मौसम विज्ञान संबंधी दृश्य सीमा (MOR)
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; पर्यावरण: प्रदूषण और जलवायु)।
- संदर्भ: दिल्ली में भीषण कोहरे के बीच, मौसम केंद्रों द्वारा “दृश्यता” (Visibility) को मापने के पीछे के विज्ञान का विश्लेषण।
- वैज्ञानिक परिभाषा:
- MOR (Meteorological Optical Range): दृश्यता को औपचारिक रूप से उस दूरी के रूप में परिभाषित किया जाता है जो प्रकाश की एक किरण वायुमंडल में तब तक तय करती है जब तक कि उसकी तीव्रता (Luminous Flux) अपने मूल मूल्य के 5% तक न गिर जाए।
- प्रकीर्णन प्रभाव (Scattering Effect): दृश्यता कम हो जाती है क्योंकि प्रकाश पानी की बूंदों (कोहरा), धुएं के कणों या धूल द्वारा परावर्तित या अवशोषित हो जाता है।
- मापने की तकनीक:
- ट्रांसमिसोमीटर (Transmissometer): ये एक लेजर ट्रांसमीटर और रिसीवर का उपयोग करते हैं जो एक निश्चित दूरी (20-75 मीटर) पर होते हैं। रिसीवर MOR निर्धारित करने के लिए गणना करता है कि कितना प्रकाश दूसरी ओर पहुँचा।
- प्रदूषण का संबंध (Smog): IMD दृश्यता को ‘स्मॉग’ (धुआं + कोहरा) के आधार पर वर्गीकृत करता है। दिल्ली में दृश्यता अक्सर “विपन्न” (Poor – 50-200 मीटर) श्रेणी में गिर जाती है।
- UPSC प्रासंगिकता: “मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक सिद्धांत” और “सर्दियों में बुनियादी ढांचे (विमानन और रेलवे) की चुनौतियां”।
संपादकीय विश्लेषण
19 जनवरी, 2026Mapping:
यहाँ भारत के प्रमुख मौसम विज्ञान संबंधी और प्राकृतिक आपदा क्षेत्रों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. वर्षा का वितरण और समवर्षा रेखाएं (Rainfall Distribution)
कृषि उत्पादकता और जल प्रबंधन को समझने के लिए वर्षा का मानचित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र (>200 सेमी):
- पश्चिमी घाट: पवनमुखी ढलान (Windward slopes) जहाँ पर्वतीय वर्षा (Orographic rainfall) होती है।
- उत्तर-पूर्व भारत: मेघालय की खासी पहाड़ियाँ (मौसिनराम और चेरापूंजी)।
- मध्यम वर्षा वाले क्षेत्र (100–200 सेमी):
- गंगा के मैदान: बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा।
- न्यून वर्षा वाले क्षेत्र (<50 सेमी):
- पश्चिमी राजस्थान: थार मरुस्थल क्षेत्र।
- लेह/लद्दाख: ऊँचाई पर स्थित शीत मरुस्थल।
- वृष्टि-छाया क्षेत्र (Rain-shadow area): आंतरिक दक्कन का पठार (मराठवाड़ा, रायलसीमा)।
2. चक्रवात और तटीय सुभेद्यता (Cyclones and Coastal Vulnerability)
भारत की लंबी तटरेखा को चक्रवातों की आवृत्ति और तीव्रता के आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।
| तट (Coast) | सुभेद्यता स्तर (Vulnerability Level) | उच्च जोखिम वाले जिले/बिंदु |
| पूर्वी तट | अत्यधिक उच्च | ओडिशा (पारादीप, पुरी), आंध्र प्रदेश (विशाखापत्तनम), पश्चिम बंगाल (सुंदरवन)। |
| पश्चिमी तट | मध्यम | गुजरात (कच्छ, सौराष्ट्र), महाराष्ट्र (मुंबई, अलीबाग)। |
3. बाढ़ और सूखा प्रवण क्षेत्र (Flood and Drought Prone Areas)
आपदा प्रबंधन अध्ययन के लिए इन क्षेत्रों का मानचित्रण एक बुनियादी आवश्यकता है।
- बाढ़-प्रवण क्षेत्र:
- ब्रह्मपुत्र बेसिन: असम घाटी (नदी के मार्ग में बार-बार परिवर्तन के कारण)।
- गंगा बेसिन: उत्तरी बिहार (कोसी — “बिहार का शोक”) और पूर्वी उत्तर प्रदेश।
- तटीय डेल्टा: मानसून के दौरान महानदी, गोदावरी और कृष्णा के डेल्टा क्षेत्र।
- सूखा-प्रवण क्षेत्र:
- शुष्क पश्चिम: पश्चिमी राजस्थान और कच्छ।
- अर्ध-शुष्क दक्कन: महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के वे क्षेत्र जो पश्चिमी घाट के वृष्टि-छाया क्षेत्र में आते हैं।
4. भूकंपीय क्षेत्र (Seismic Zones)
भारत को भूकंपीय जोखिम के आधार पर विभिन्न ज़ोन में बांटा गया है:
- ज़ोन V (अत्यधिक उच्च जोखिम): पूरा उत्तर-पूर्वी भारत, जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कच्छ का रण और उत्तरी बिहार।
- ज़ोन IV (उच्च जोखिम): जम्मू-कश्मीर और हिमाचल के शेष हिस्से, दिल्ली और गंगा के मैदान।
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| आपदा/विशेषता | मानचित्रण मुख्य बिंदु | भौगोलिक फोकस |
| सबसे आर्द्र स्थान | मौसिनराम | मेघालय (पूर्वी भारत) |
| बिहार का शोक | कोसी नदी | उत्तरी बिहार |
| वृष्टि छाया क्षेत्र | मराठवाड़ा | आंतरिक महाराष्ट्र |
| चक्रवात हॉटस्पॉट | बंगाल की खाड़ी | भारत का पूर्वी तट |
💡 मैपिंग टिप:
वर्षा के वितरण मानचित्र को जनसंख्या घनत्व मानचित्र के साथ जोड़कर देखें। आप पाएंगे कि मध्यम से उच्च वर्षा वाले क्षेत्रों (जैसे गंगा के मैदान) में जनसंख्या का घनत्व सबसे अधिक है।
आपदा परिदृश्य (Hazard Landscapes)
| जोखिम क्षेत्र | प्रमुख भौगोलिक केंद्र | प्राथमिक आपदा |
|---|---|---|
| क्षेत्र (Zone) V | पूर्वोत्तर भारत, उत्तराखंड, कच्छ | उच्चतम तीव्रता वाले भूकंप |
| असम घाटी | ब्रह्मपुत्र बेसिन | लगातार मार्ग परिवर्तन एवं बाढ़ |
| शुष्क पश्चिम | राजस्थान, उत्तरी गुजरात | गंभीर कृषि सूखा (Drought) |
| आपदा | मैपिंग हाइलाइट | भौगोलिक स्थान |
|---|---|---|
| सबसे गीला स्थान | मौसिनराम | मेघालय (खासी पहाड़ियाँ) |
| बिहार का शोक | कोसी नदी | उत्तरी बिहार डेल्टा |
| वृष्टि छाया क्षेत्र | मराठवाड़ा | आंतरिक महाराष्ट्र |
| चक्रवात हॉटस्पॉट | बंगाल की खाड़ी | भारत का पूर्वी तट |