यह अध्याय “नये राजा और उनके राज्य” सातवीं से बारहवीं शताब्दी के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में शक्तिशाली राजवंशों के उदय और उनकी शासन व्यवस्था का वर्णन करता है।

सातवीं शताब्दी तक उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े भूस्वामी या योद्धा सरदार अस्तित्व में आ चुके थे, जिन्हें राजा ‘सामंत’ कहते थे।

  • सामंतों की भूमिका: उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे राजा के लिए उपहार लाएँ, उनके दरबार में हाज़िरी दें और सैन्य सहायता प्रदान करें।
  • शक्ति का संचय: जब सामंतों के पास अधिक शक्ति और धन आ जाता था, तो वे स्वयं को ‘महा-सामंत’ या ‘महा-मंडलेश्वर’ (पूरे क्षेत्र का महान स्वामी) घोषित कर देते थे।
  • स्वतंत्रता: कुछ सामंतों ने अपने शासकों से खुद को स्वतंत्र कर लिया। उदाहरण के लिए, दक्कन में राष्ट्रकूट शुरू में कर्नाटक के चालुक्यों के अधीनस्थ थे।
  • हिरण्य-गर्भ अनुष्ठान: राष्ट्रकूट प्रधान दंतीदुर्ग ने ‘हिरण्य-गर्भ’ (सोने का गर्भ) नामक एक अनुष्ठान किया। माना जाता था कि इससे व्यक्ति जन्म से क्षत्रिय न होने पर भी ‘क्षत्रिय’ के रूप में पुनर्जन्म प्राप्त कर सकता है।
  • अन्य उदाहरण: कदंब मयूरशर्मण और गुर्जर-प्रतिहार हरिश्चंद्र जैसे ब्राह्मणों ने अपने पारंपरिक पेशे को छोड़कर शस्त्र अपना लिए और सफलतापूर्वक अपने राज्य स्थापित किए।

नए राजाओं ने अक्सर ‘महाराजाधिराज’ (राजाओं के राजा) और ‘त्रिभुवन-चक्रवर्तिन’ (तीन लोकों का स्वामी) जैसी भारी-भरकम उपाधियाँ धारण कीं।

  • संसाधन संग्रह: राजा सामंतों के साथ-साथ किसानों, व्यापारियों और ब्राह्मणों के संगठनों के साथ सत्ता साझा करते थे।
  • लगान/कर: किसानों, पशुपालकों और कारीगरों से उनकी उपज का एक हिस्सा ‘लगान’ के रूप में लिया जाता था।
  • चोल साम्राज्य के कर: चोल अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के करों के लिए 400 से अधिक शब्दों का उल्लेख है, जैसे ‘वेटी’ (जबरन श्रम/बेगार) और ‘कदमाइ’ (भू-राजस्व)।
  • धन का उपयोग: इन संसाधनों का उपयोग राजा के महल के रखरखाव, मंदिरों और किलों के निर्माण तथा युद्धों के वित्तपोषण के लिए किया जाता था।

प्रशस्तियों में शासकों का गुणगान किया जाता था, जिसमें उन्हें शूरवीर और विजयी योद्धा के रूप में दिखाया जाता था।

  • इनकी रचना विद्वान ब्राह्मणों द्वारा की जाती थी जो कभी-कभी प्रशासन में भी मदद करते थे।
  • राजा ब्राह्मणों को भूमि अनुदान से पुरस्कृत करते थे, जिसे ताम्रपत्रों पर दर्ज किया जाता था।
  • कल्हण (12वीं शताब्दी): कश्मीर के इतिहास पर कल्हण ने एक लंबी संस्कृत कविता लिखी। उन्होंने अपने विवरण के लिए शिलालेखों, दस्तावेजों और प्रत्यक्षदर्शियों के वृत्तांतों का उपयोग किया और शासकों की नीतियों की आलोचनात्मक व्याख्या की।

राजवंश अक्सर विशिष्ट क्षेत्रों पर नियंत्रण पाने के लिए आपस में लड़ते थे।

  • त्रिपक्षीय संघर्ष: गंगा घाटी में कन्नौज पर नियंत्रण के लिए सदियों तक गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट और पाल राजवंशों के शासक आपस में लड़ते रहे।
  • मंदिरों पर हमला: राजा अपनी शक्ति दिखाने के लिए बड़े मंदिर बनवाते थे; इसलिए आक्रमणों के दौरान ये मंदिर ही सबसे पहले निशाना बनते थे।
  • सुल्तान महमूद गज़नी: इसने 997 से 1030 ईस्वी तक उपमहाद्वीप पर 17 बार आक्रमण किया और गुजरात के सोमनाथ जैसे संपन्न मंदिरों को लूटा।
  • अल-बिरूनी: महमूद ने विद्वान अल-बिरूनी को उपमहाद्वीप का लेखा-जोखा लिखने का काम सौंपा, जिसे ‘किताब-उल-हिंद’ के नाम से जाना जाता है।
  • चाहमान (चौहान): इन्होंने दिल्ली और अजमेर पर शासन किया। उनके सबसे प्रसिद्ध शासक पृथ्वीराज तृतीय (1168-1192) थे, जिन्होंने 1191 में सुल्तान मोहम्मद गोरी को हराया, लेकिन अगले ही वर्ष (1192) वे उससे हार गए।

चोलों ने दक्षिण में एक छोटे से परिवार से उठकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।

  • सत्ता का उदय: उरैयूर के चोल परिवार के विजयालय ने नौवीं शताब्दी के मध्य में मुत्तरैयार को हराकर कावेरी डेल्टा पर कब्जा किया।
  • राजराज प्रथम: इन्हें सबसे शक्तिशाली चोल शासक माना जाता है, जो 985 ईस्वी में राजा बने। उनके पुत्र राजेंद्र प्रथम ने गंगा घाटी, श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया पर आक्रमण किया और एक विशाल नौसेना बनाई।
  • भव्य मंदिर: तंजावुर और गंगईकोंडचोलपुरम् के मंदिर वास्तुकला और मूर्तिकला के चमत्कार हैं। ये मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के केंद्र थे।
  • कांस्य मूर्तियाँ: चोल काल की कांस्य मूर्तियाँ (विशेषकर नटराज) दुनिया की बेहतरीन कलाकृतियों में गिनी जाती हैं।
  • कावेरी नदी बंगाल की खाड़ी में गिरने से पहले कई शाखाओं में बंट जाती है, जो खेतों के लिए उपजाऊ मिट्टी और नमी प्रदान करती हैं।
  • जंगलों को साफ कर और जमीन को समतल कर बड़े पैमाने पर खेती शुरू की गई।
  • बाढ़ रोकने के लिए तटबंध और खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए नहरें बनाई गईं। बारिश के पानी को इकट्ठा करने के लिए विशाल टैंक और कुएँ बनाए गए।
  • ऊर (Ur): किसानों की बस्तियों को ‘ऊर’ कहा जाता था।
  • नाडु (Nadu): गाँवों के समूह को ‘नाडु’ कहा जाता था, जो न्याय करने और कर वसूलने जैसे प्रशासनिक कार्य करते थे।
  • ब्रह्मदेय: ब्राह्मणों को उपहार में दी गई भूमि को ‘ब्रह्मदेय’ कहा जाता था, जिससे कावेरी घाटी में कई ब्राह्मण बस्तियाँ बनीं।
  • सभा: प्रत्येक ब्रह्मदेय की देखरेख प्रमुख ब्राह्मण भूस्वामियों की एक सभा द्वारा की जाती थी।
  • उत्तरमेरुर अभिलेख: यह विवरण देता है कि सभा कैसे काम करती थी। सभा में सिंचाई, मंदिर, बगीचे आदि के लिए अलग-अलग समितियाँ थीं। सदस्यों का चुनाव लॉटरी प्रणाली (पर्ची निकालकर) द्वारा किया जाता था।

🏰 नए राजा और उनके राज्य (7वीं-12वीं शताब्दी)

👑 सामंतों का उदय
योद्धा प्रमुख, जिन्हें सामंत कहा जाता था, अपनी शक्ति बढ़ाकर ‘महा-मंडलेश्वर’ बन जाते थे। दन्तिदुर्ग ने हिरण्य-गर्भ नामक अनुष्ठान कर क्षत्रिय का दर्जा प्राप्त किया और राष्ट्रकूट वंश की नींव रखी।
⚔️ धन के लिए युद्ध
कन्नौज पर नियंत्रण के लिए गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूटों के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष चला। इसी दौरान अफगानिस्तान के सुल्तान महमूद गजनवी ने सोमनाथ जैसे समृद्ध मंदिरों को अपनी राजधानी सजाने के लिए लूटा।
🪷 भव्य चोल साम्राज्य
विजयालय द्वारा स्थापित इस वंश का विस्तार राजराज प्रथम ने किया। यह साम्राज्य तंजावुर के मंदिरों और उत्कृष्ट कांस्य मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध था। कावेरी नदी के जल का उपयोग उन्नत सिंचाई के लिए किया जाता था।
🗳️ ग्रामीण लोकतंत्र
चोल गांवों का प्रबंधन सभा करती थी। उत्तरमेरुर अभिलेखों के अनुसार, समितियों के सदस्यों का चुनाव एक अनूठी लॉटरी पद्धति (मिट्टी के घड़े में पर्चियां डालकर) द्वारा किया जाता था।
राजस्व तथ्य चोल अभिलेखों में करों के लिए 400 से अधिक शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे वेट्टी (जबरन श्रम के रूप में कर) और कदमाई (भू-राजस्व)।
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कक्षा-7 इतिहास अध्याय-2 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: नये राजा और उनके राज्य

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बिना प्रवर्तन तंत्र के, अधिकारों की सूची केवल शब्दों का संग्रह है। अनुच्छेद 32 वह तंत्र प्रदान करता है जो यह सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकार ‘वाद-योग्य’ (Justiciable) बने रहें।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को “संविधान की आत्मा और उसका हृदय” कहा था। यह मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपयुक्त कार्यवाही के माध्यम से उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) जाने का अधिकार प्रदान करता है।

  • स्वयं में एक मौलिक अधिकार: उपचार मांगने का अधिकार केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि स्वयं में एक मौलिक अधिकार है।
  • मूल संरचना (Basic Structure): उच्चतम न्यायालय ने फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन कामगार यूनियन मामले में व्यवस्था दी कि अनुच्छेद 32 संविधान की ‘मूल संरचना’ का हिस्सा है; अतः इसे संविधान संशोधन द्वारा भी छीना नहीं जा सकता।
  • दायरा: यह केवल मौलिक अधिकारों (भाग III) के प्रवर्तन के लिए है, न कि वैधानिक या सामान्य कानूनी अधिकारों के लिए।

अनुच्छेद 32 (उच्चतम न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) के तहत न्यायपालिका विशिष्ट आदेश जारी कर सकती है जिन्हें ‘रिट’ कहा जाता है:

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus – “शरीर को प्रस्तुत करना”): किसी हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करने का आदेश ताकि उसकी हिरासत की वैधता की जाँच की जा सके। यह मनमानी गिरफ्तारी के विरुद्ध व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
  2. परमादेश (Mandamus – “हम आज्ञा देते हैं”): यह किसी सार्वजनिक अधिकारी, निचली अदालत या सरकारी निकाय को दिया जाने वाला आदेश है ताकि वे उस कानूनी कर्तव्य का पालन करें जिसे करने में वे विफल रहे हैं।
  3. प्रतिषेध (Prohibition – “रोकना”): यह उच्च न्यायालय द्वारा निचली अदालत या अर्ध-न्यायिक निकाय को जारी किया जाता है ताकि उसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने या प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध कार्य करने से रोका जा सके।
  4. उत्प्रेषण (Certiorari – “पूर्णतः सूचित करना”): यह किसी निचली अदालत या ट्रिब्यूनल द्वारा पहले से पारित आदेश को रद्द करने के लिए जारी किया जाता है। जहाँ प्रतिषेध ‘निवारक’ (Preventive) है, वहीं उत्प्रेषण ‘निवारक और सहायक’ (Curative) दोनों है।
  5. अधिकार-पृच्छा (Quo-Warranto – “किस अधिकार से”): यह किसी व्यक्ति के सार्वजनिक पद के दावे की वैधता की जाँच करने के लिए जारी किया जाता है। यह किसी भी व्यक्ति द्वारा सार्वजनिक पद के अवैध “हड़पने” को रोकता है।

अनुच्छेद 33 संसद को विशिष्ट समूहों के मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने या निरस्त करने की शक्ति देता है ताकि वे अपने कर्तव्यों का उचित पालन कर सकें और उनमें अनुशासन बना रहे।

  • सशस्त्र बलों (Armed Forces) के सदस्य।
  • अर्धसैनिक बलों (Paramilitary Forces) के सदस्य।
  • पुलिस बल।
  • खुफिया एजेंसियां (Intelligence Agencies)।
  • इन सेवाओं के लिए बनाए गए दूरसंचार प्रणालियों में कार्यरत व्यक्ति।

नोट: यह कानून बनाने की शक्ति केवल संसद के पास है, राज्य विधानमंडलों के पास नहीं। इन कानूनों को किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन के आधार पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

अनुच्छेद 34 भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी भी क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू होने पर मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध का प्रावधान करता है।

  • परिभाषा: संविधान में “मार्शल लॉ” को परिभाषित नहीं किया गया है, लेकिन इसका अर्थ है ‘सैनिक शासन’ जहाँ लोक व्यवस्था बिगड़ने के कारण सेना प्रशासन को अपने हाथ में ले लेती है।
  • संसदीय क्षतिपूर्ति (Indemnity): मार्शल लॉ के दौरान व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी भी सरकारी कर्मचारी द्वारा किए गए कार्यों को संसद कानून बनाकर ‘वैध’ घोषित कर सकती है और उन्हें कानूनी सजा से मुक्ति दे सकती है।
  • राष्ट्रीय आपातकाल से अंतर: राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) के विपरीत, मार्शल लॉ केवल मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है और एक विशिष्ट क्षेत्र तक सीमित होता है।

अनुच्छेद 35 यह सुनिश्चित करता है कि मौलिक अधिकारों की प्रकृति और उनके उल्लंघन के लिए सजा पूरे भारत में एक समान रहे। यह संसद को विशिष्ट अधिकारों के संबंध में कानून बनाने की विशेष शक्ति देता है।

संसद की विशेष शक्ति: केवल संसद (राज्य विधानमंडल नहीं) के पास निम्नलिखित विषयों पर कानून बनाने की शक्ति है:

  • रोजगार के लिए निवास की शर्त निर्धारित करना (अनुच्छेद 16)।
  • उच्चतम/उच्च न्यायालय के अलावा अन्य अदालतों को रिट जारी करने की शक्ति देना (अनुच्छेद 32)।
  • सशस्त्र बलों के अधिकारों को प्रतिबंधित करना (अनुच्छेद 33)।
  • मार्शल लॉ के दौरान सरकारी कर्मचारियों को क्षतिपूर्ति देना (अनुच्छेद 34)।
  • दंड: संसद के पास उन कृत्यों के लिए सजा निर्धारित करने की शक्ति है जिन्हें भाग III के तहत अपराध घोषित किया गया है (जैसे अनुच्छेद 17 के तहत अस्पृश्यता या अनुच्छेद 23 के तहत बलात श्रम)।
अनुच्छेदविषयमुख्य बिंदु
32संवैधानिक उपचार“हृदय और आत्मा”; रिट याचिका जारी करने की शक्ति।
33सशस्त्र बलअनुशासित बलों के लिए अधिकारों को सीमित करने की संसद की शक्ति।
34मार्शल लॉसैन्य शासन वाले क्षेत्रों में अधिकारों पर प्रतिबंध।
35विधान शक्तिसंसद के माध्यम से अधिकारों का समान प्रवर्तन सुनिश्चित करना।

⚖️ अनुच्छेद 32–35: विधिक उपचार

❤️ अनु. 32: संवैधानिक उपचार
अंबेडकर ने इसे संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा। यह नागरिकों को मूल अधिकारों के उल्लंघन पर सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार देकर उन्हें ‘वाद-योग्य’ बनाता है।
📜 पांच प्रकार की रिट (Writs)
1. बंदी प्रत्यक्षीकरण, 2. परमादेश (कर्तव्य पालन), 3. प्रतिषेध (निचली अदालत को रोकना), 4. उत्प्रेषण (फैसला रद्द करना), 5. अधिकार पृच्छा (अधिकार की जाँच)।
🛡️ अनु. 33: सशस्त्र बल
संसद को यह शक्ति देता है कि वह सशस्त्र बलों, पुलिस और खुफिया एजेंसियों के मूल अधिकारों को सीमित करे ताकि वे अनुशासन के साथ अपना कर्तव्य निभा सकें।
🪖 अनु. 34: मार्शल लॉ
जब किसी क्षेत्र में सैन्य शासन लागू हो, तो वहाँ मूल अधिकारों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। संसद व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए गए कार्यों को ‘क्षतिपूर्ति’ प्रदान कर सकती है।
⚡ अनु. 35: विधान की शक्ति
यह अधिकार केवल संसद को है (राज्यों को नहीं) कि वह अस्पृश्यता (अनु. 17) या बलात् श्रम (अनु. 23) जैसे अपराधों के लिए दंड निर्धारित करने हेतु कानून बनाए।
🏗️ मूल ढांचा (Basic Structure)
अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार संविधान की मूल विशेषता है। इसे संविधान संशोधन द्वारा भी छीना या कम नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष जहाँ अनुच्छेद 32 उपचार प्रदान करता है, वहीं अनुच्छेद 33-35 संसद को राष्ट्रीय सुरक्षा और समान न्याय के लिए अधिकारों को विनियमित करने की शक्ति देते हैं।

यहाँ ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ (The Indian Express) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (16 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: अमेरिका के साथ व्यापारिक समझौते पर अनिश्चितता और भारी 50% अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव के बीच, भारत यूरोपीय संघ (EU) के साथ अपने मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं को तेज कर रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • वार्ता का मील का पत्थर: भारत और यूरोपीय संघ ने FTA के 24 में से 20 अध्यायों को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है।
    • गणतंत्र दिवस का संकेत: यूरोपीय परिषद और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। वे 27 जनवरी को 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता भी करेंगे।
    • रणनीतिक बदलाव: यह समझौता परिधान जैसे श्रम-प्रधान भारतीय निर्यातों पर अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
    • मोड 4 (Mode 4) वार्ता: पहली बार, कुशल पेशेवरों की आवाजाही (Mode 4) पर बातचीत हो रही है, जिससे जर्मनी और अन्य देशों में भारतीय पेशेवरों के लिए रास्ते खुल सकते हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ रणनीतिक संबंध”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “निर्यात बाजारों का विविधीकरण”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • बाधाओं को पार करना: पर्यावरण और श्रम अधिकारों के मुद्दों पर यह FTA एक दशक से रुका हुआ था। अमेरिकी संरक्षणवाद के कारण अब दोनों पक्षों में लंबे समय से चले आ रहे विवादों को सुलझाने की तात्कालिकता आई है।
    • जर्मन स्तंभ: यूरोपीय संघ के व्यापार में जर्मनी का प्रभुत्व और उसका “कुशल आप्रवासन अधिनियम” इस समझौते के लिए उत्प्रेरक का काम कर रहे हैं।
    • कार्बन टैक्स की चुनौती: यूरोपीय संघ का ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) अभी भी सबसे बड़ी बाधा है, क्योंकि यह भारत के धातु निर्यात पर भारी शुल्क लगा सकता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत-अमेरिका संबंध; भू-राजनीति)।

  • संदर्भ: पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन द्वारा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल के पहले वर्ष का विश्लेषण और भारत-अमेरिका संबंधों में आई स्थिरता (Stagnation) पर चर्चा।
  • मुख्य बिंदु:
    • ठहराव की स्थिति: पिछले 25 वर्षों से द्विपक्षीय संबंधों में जारी निरंतर वृद्धि अब एक ठहराव पर पहुँच गई है, जिसका कारण उच्च टैरिफ और भारत के रूस के साथ संबंधों पर अमेरिकी आलोचना है।
    • चीन के साथ ‘ग्रैंड बारगेन’: अमेरिकी प्रशासन चीन के साथ एक बड़े समझौते (Grand Bargain) पर अधिक ध्यान केंद्रित करता दिख रहा है, जिससे हिंद-प्रशांत रणनीति और क्वाड (Quad) की प्राथमिकता कम हो सकती है।
    • पैक्स सिलिका (Pax Silica): हालांकि भारत को इस तकनीकी गठबंधन में शामिल किया गया है, लेकिन इसमें हुई देरी बताती है कि भारत को अमेरिका का पसंदीदा भागीदार बने रहने के लिए अधिक प्रयास करने होंगे।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंध”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • लेनदेन वाली कूटनीति (Transactional Diplomacy): विश्लेषकों का तर्क है कि “लेनदेन” वाले अमेरिकी युग में भारत का पारंपरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण कमजोर साबित हो रहा है, जहाँ अमेरिका बड़ी रियायतों और प्रशंसा की उम्मीद रखता है।
    • आगे की राह: भारत को केवल अमेरिका के भरोसे रहने के बजाय अपनी आंतरिक विकास दर को बढ़ाने और अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को स्थिर करने पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी गई है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; कल्याणकारी योजनाएं; डिजाइन और कार्यान्वयन के मुद्दे)।

  • संदर्भ: मनरेगा (MGNREGA) से ‘विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025’ (VB-GRAM G) में संक्रमण।
  • मुख्य बिंदु:
    • दिनों में वृद्धि, पहुंच में शर्त: नया कानून गारंटीशुदा कार्य को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करता है, लेकिन काम की उपलब्धता को अधिक “शर्तों के अधीन” बना सकता है।
    • महिला भागीदारी पर जोखिम: आलोचकों का तर्क है कि घर के पास काम की पूर्ण गारंटी के बिना, ग्रामीण महिलाओं को असुरक्षित और अनौपचारिक कार्यों की ओर धकेला जा सकता है।
    • डिजिटल निरीक्षण: यह अधिनियम ‘पंचायत निर्णय ऐप’ और ‘ई-मेज़रमेंट बुक’ के माध्यम से वास्तविक समय में प्रगति और मजदूरी को ट्रैक करने के लिए डिजिटल ऑडिट पेश करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “ग्रामीण विकास”, “महिला सशक्तिकरण” और “कल्याणकारी शासन”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संक्रमण के नियम: ग्रामीण विकास मंत्रालय वर्तमान में मनरेगा जॉब कार्डों के उपयोग की अनुमति दे रहा है ताकि बदलाव के दौरान काम में बाधा न आए।
    • फंडिंग का बोझ: नए कानून में राज्यों से फंडिंग की हिस्सेदारी बढ़ा दी गई है, जिससे गरीब राज्यों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; स्वास्थ्य; जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र)।

  • संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गांधीनगर, गुजरात में ‘बायो-सेफ्टी लेवल 4’ (BSL-4) लैब की आधारशिला रखी।
  • मुख्य बिंदु:
    • रणनीतिक संपत्ति: यह भारत की पहली ऐसी BSL-4 लैब होगी जो पूरी तरह से राज्य सरकार द्वारा वित्तपोषित और नियंत्रित होगी।
    • घातक रोगजनक (Pathogens): लैब इबोला, मारबर्ग, निपाह और ‘क्रीमियन-कांगो रक्तस्रावी बुखार’ (CCHF) जैसे दुनिया के सबसे घातक वायरस का अध्ययन करेगी।
    • बुनियादी ढांचा: ₹362 करोड़ की इस सुविधा में पशुओं से मनुष्यों में फैलने वाले रोगों (Zoonotic diseases) के अनुसंधान के लिए ‘एनिमल बायो-सेफ्टी लेवल’ (ABSL) मॉड्यूल भी शामिल होंगे।
  • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा”, “जैव-प्रौद्योगिकी विकास” और “आपदा तैयारी”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कमी को दूर करना: वर्तमान में भारत में बहुत कम नागरिक BSL-4 सुविधाएं (पुणे और ग्वालियर) हैं। ऐसी प्रयोगशालाओं की कमी के कारण बीमारी के प्रकोपों की जांच में बाधा आती रही है। यह लैब एक “राष्ट्रीय सुविधा” के रूप में कार्य करेगी।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (बुनियादी ढांचा: सड़कें; आपदा प्रबंधन)।

  • संदर्भ: सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और ‘सेव लाइफ फाउंडेशन’ (SaveLIFE Foundation) की एक संयुक्त रिपोर्ट, जो भारत के शीर्ष 100 जिलों में सड़क दुर्घटनाओं का विश्लेषण करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • इंजीनियरिंग कारक: 59% घातक दुर्घटनाओं में यातायात नियमों का उल्लंघन शामिल नहीं है, बल्कि खराब सड़क इंजीनियरिंग (Engineering) मौत का मुख्य कारण है।
    • ब्लैक स्पॉट: 58% मौतें पहले से ज्ञात दुर्घटना-संभावित स्थानों या “ब्लैक स्पॉट” पर होती हैं।
    • समय: 53% मौतें शाम 6 बजे से रात 12 बजे के बीच दर्ज की जाती हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “बुनियादी ढांचा योजना”, “सार्वजनिक सुरक्षा” और “शहरी शासन”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • ट्रॉमा केयर में कमी: 10 में से 8 पीड़ितों को सरकारी एम्बुलेंस के बजाय अन्य साधनों से अस्पताल पहुँचाया गया, जो दुर्घटना के बाद की चिकित्सा देखभाल (Trauma Care) में गंभीर कमियों को दर्शाता है।
    • समाधान: रिपोर्ट का तर्क है कि नई योजनाओं के बजाय, मौजूदा बजट का उपयोग सड़क इंजीनियरिंग में सुधार और पुलिस व अस्पतालों के बीच बेहतर समन्वय के लिए किया जाना चाहिए।

इंडियन एक्सप्रेस विश्लेषण

16 जनवरी, 2026
GS-2 अंत. संबंध
🇪🇺 भारत-यूरोपीय संघ FTA: रणनीतिक गति
अमेरिकी टैरिफ के प्रभाव को कम करने के लिए भारत यूरोप की ओर बढ़ा; 24 में से 20 अध्यायों पर बातचीत पूरी। बड़ी सफलता: मोड 4 (कुशल श्रम गतिशीलता) का समावेश। मुख्य बाधा: ईयू का कार्बन बॉर्डर टैक्स (CBAM) भारतीय धातु निर्यात के लिए अब भी जोखिम बना हुआ है।
GS-2 अंत. संबंध
🇺🇸 भारत-अमेरिका संबंध: लेन-देन का ठहराव
ट्रम्प के दूसरे कार्यकाल में चीन के साथ “ग्रैंड बारगेन” के कारण क्वाड (Quad) की प्राथमिकता में कमी। घर्षण बिंदु: ऑपरेशन सिंदूर और लेन-देन वाली कूटनीति। विश्लेषण का सुझाव: भारत को महाशक्ति पर निर्भरता के बजाय आंतरिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
GS-2 कल्याण
🌾 मनरेगा से VB-GRAM G तक
नया अधिनियम गारंटी को बढ़ाकर 125 दिन करता है, लेकिन पंचायत निर्णय ऐप के माध्यम से डिजिटल बाधाएं पेश करता है। चिंता: राज्यों पर बढ़ता वित्तीय बोझ (40%) पहुंच को सीमित कर सकता है, जिसका सीधा प्रभाव ग्रामीण महिलाओं पर पड़ेगा।
GS-3 वि. एवं प्रौ.
🧪 भारत की पहली राज्य-वित्त पोषित BSL-4 लैब
गुजरात ने ₹362 करोड़ की लागत से इबोला, निपाह और मारबर्ग के अध्ययन के लिए लैब लॉन्च की। रणनीतिक मूल्य: केंद्रीय अनुसंधान बाधाओं को दरकिनार करने वाली पहली राज्य-नियंत्रित उच्च-सुरक्षा लैब। इसमें ज़ूनोटिक रोगों की ट्रैकिंग के लिए पशु जैव-सुरक्षा (ABSL) मॉड्यूल शामिल है।
GS-3 बुनियादी ढांचा
🛣️ सड़क सुरक्षा: इंजीनियरिंग का संकट
चौंकाने वाला डेटा: 59% मौतें खराब इंजीनियरिंग के कारण होती हैं, न कि यातायात उल्लंघन से। महत्वपूर्ण समय: 53% मौतें शाम 6 से रात 12 बजे के बीच होती हैं। आवश्यकता: ‘ब्लैक स्पॉट्स’ को खत्म करना और ट्रॉमा केयर में अस्पतालों की तत्परता बढ़ाना।

यहाँ भारत के भौतिक विभागों (Physiographic Divisions), विशेष रूप से हिमालय पर्वतमाला, प्रायद्वीपीय पठार और पश्चिमी घाट के प्रमुख दर्रों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

हिमालय कोई एक अकेली श्रृंखला नहीं है, बल्कि समानांतर पर्वतमालाओं की एक श्रृंखला है। इनका मानचित्रण करने के लिए उनकी ऊर्ध्वाधर परतों (Vertical Layers) को समझना आवश्यक है।

  • ट्रांस-हिमालय (Trans-Himalayas): इसमें कराकोरम, लद्दाख और जास्कर श्रेणियाँ शामिल हैं। भारत की सबसे ऊँची चोटी K2 (गॉडविन-ऑस्टिन) यहीं स्थित है।
  • वृहद हिमालय (हिमाद्रि): यह सबसे उत्तरी और सबसे ऊँची श्रेणी है, जिसमें माउंट एवरेस्ट और कंचनजंगा जैसी चोटियाँ स्थित हैं।
  • लघु हिमालय (हिमाचल): यह हिमाद्रि के दक्षिण में स्थित है; यह पीर पंजाल और धौलाधार श्रेणियों तथा शिमला, मनाली जैसे हिल स्टेशनों के लिए प्रसिद्ध है।
  • शिवालिक: यह सबसे बाहरी और सबसे युवा श्रेणी है। यहाँ समतल घाटियाँ पाई जाती हैं जिन्हें ‘दून’ कहा जाता है (जैसे: देहरादून)।

यह भारत का सबसे पुराना भूभाग है, जिसे नर्मदा नदी द्वारा दो व्यापक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है।

  • मध्य उच्चभूमि (Central Highlands): नर्मदा के उत्तर में स्थित। इसमें मालवा का पठार, विंध्य श्रेणी और अरावली (दुनिया की सबसे पुरानी वलित पर्वत श्रृंखला) शामिल हैं।
  • दक्कन का पठार: नर्मदा के दक्षिण में स्थित एक त्रिकोणीय भूभाग।
    • पश्चिमी घाट (सह्याद्रि): पश्चिमी तट के साथ फैली निरंतर पर्वतमाला; यह पूर्वी घाट से अधिक ऊँची है।
    • पूर्वी घाट: यह कटा-छँटा (Discontinuous) है और पूर्व की ओर बहने वाली नदियों (महानदी, गोदावरी, कृष्णा) द्वारा अपरदित है।
  • नीलगिरी पहाड़ियाँ: वह स्थान जहाँ पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट आपस में मिलते हैं।

हिमालयी दर्रों के विपरीत, ये ‘घाट’ या अंतराल तटीय मैदानों को आंतरिक पठार से जोड़ने के लिए आवश्यक हैं।

दर्रा (Ghat)किसे जोड़ता हैरणनीतिक महत्व
थल घाटमुंबई से नासिकउत्तर भारत की ओर जाने वाले रेल और सड़क यातायात के लिए मुख्य कड़ी।
भोर घाटमुंबई से पुणेतट को दक्कन के पठार के मुख्य भाग से जोड़ता है।
पाल घाटपलक्कड़ से कोयंबटूरकेरल को तमिलनाडु से जोड़ने वाला पश्चिमी घाट का एक प्रमुख अंतराल।
सेनकोट्टा दर्राकोल्लम से मदुरैकेरल और तमिलनाडु को जोड़ने वाला सबसे दक्षिणी प्रमुख दर्रा।
  • भारत की सबसे ऊँची चोटी: K2 (कराकोरम श्रेणी, लद्दाख)।
  • हिमालय (भारत) की सबसे ऊँची चोटी: कंचनजंगा (सिक्किम)।
  • प्रायद्वीपीय पठार की सबसे ऊँची चोटी: अनाइमुडी (केरल, अन्नामलाई पहाड़ियाँ)।
  • अरावली की सबसे ऊँची चोटी: गुरु शिखर (माउंट आबू, राजस्थान)।
  • पूर्वी घाट की सबसे ऊँची चोटी: जिंदागाड़ा चोटी (आंध्र प्रदेश)।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
सबसे पुरानी पर्वतमालाअरावलीराजस्थान/हरियाणा
सर्वोच्च प्रायद्वीपीय चोटीअनाइमुडीकेरल
घाटों का मिलन बिंदुनीलगिरी पहाड़ियाँतमिलनाडु/केरल/कर्नाटक संगम
सबसे लंबा हिमनद (Glacier)सियाचिनकराकोरम श्रेणी

मानचित्र पर उत्तर से दक्षिण की ओर पर्वत श्रेणियों के क्रम (कराकोरम → लद्दाख → जास्कर → पीर पंजाल) को याद रखें। UPSC अक्सर इनका सही क्रम लगाने के लिए प्रश्न पूछता है।

भौतिक प्रदेश (Physiographic Realms)

वलित पर्वत
🏔️ हिमालयी चाप
समानांतर श्रेणियों का क्रम: ट्रांस-हिमालय (काराकोरम/जास्कर), सबसे ऊँचा हिमाद्रि, हिल-स्टेशनों से समृद्ध हिमाचल, और बाहरी शिवालिक
अभ्यास: मानचित्र पर देहरादून को खोजें और इसे एक ‘दून’ के रूप में पहचानें—लघु हिमालय और शिवालिक के बीच की एक समतल घाटी।
प्राचीन शील्ड
⛰️ प्रायद्वीपीय पठार
नर्मदा नदी भारत के इस सबसे पुराने भूभाग को मध्य उच्च भूमि (विंध्य/अरावली) और त्रिभुजाकार दक्कन के पठार में विभाजित करती है।
अभ्यास: नीलगिरि पहाड़ियों पर पश्चिमी और पूर्वी घाट के मिलन बिंदु को ट्रेस करें।
कनेक्टिविटी
🛣️ सह्याद्रि के प्रमुख दर्रे
पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) के ये प्रमुख मार्ग तटीय मैदानों और आंतरिक पठार के बीच व्यापार और परिवहन को सुगम बनाते हैं।
दर्रा (Ghat) किसे जोड़ता है महत्व
थाल घाटमुंबई से नासिकउत्तर भारत से जुड़ाव
भोर घाटमुंबई से पुणेदक्कन के हृदय तक पहुँच
पाल घाटपलक्कड़ से कोयंबटूरकेरल-तमिलनाडु मार्ग
सर्वोच्च शिखर चेकलिस्ट
क्षेत्र सर्वोच्च शिखर स्थान
काराकोरम श्रेणीK2 (गॉडविन-ऑस्टिन)लद्दाख (POK)
प्रायद्वीपीय पठारअनाइमुडीकेरल (अनामलाई पहाड़ियाँ)
अरावली श्रेणीगुरु शिखरमाउंट आबू, राजस्थान
पूर्वी घाटजिंधागड़ा शिखरआंध्र प्रदेश

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