यह अध्याय “इमारतें, चित्र तथा किताबें” वास्तुकला, कला, विज्ञान और साहित्य के क्षेत्रों में प्राचीन भारत की उल्लेखनीय उपलब्धियों पर प्रकाश डालता है।

प्राचीन भारतीय धातुविज्ञानी अत्यधिक उन्नत थे। जहाँ हड़प्पावासी कांस्य युग के थे, वहीं उनके उत्तराधिकारी लौह युग में प्रवेश कर चुके थे।

  • लौह स्तंभ: दिल्ली के महरौली में स्थित यह स्तंभ 7.2 मीटर ऊँचा है और इसका वजन 3 टन से अधिक है।
  • ऐतिहासिक महत्व: इसे लगभग 1500 साल पहले ‘चंद्र’ नामक शासक के समय बनाया गया था, जो संभवतः गुप्त वंश के थे।
  • वैज्ञानिक आश्चर्य: 15 शताब्दियों से अधिक पुराना होने के बावजूद, इस स्तंभ में आज तक जंग नहीं लगा है।

इस काल में ईंटों और पत्थरों से बनी भव्य धार्मिक संरचनाओं का निर्माण हुआ।

  • अर्थ: स्तूप का शाब्दिक अर्थ ‘टीला’ होता है।
  • विशेषताएँ: अधिकांश स्तूपों के केंद्र में एक छोटा सा डिब्बा होता है जिसे ‘धातु-मंजूषा’ (Relic casket) कहते हैं। इसमें बुद्ध या उनके अनुयायियों के शरीर के अवशेष (दांत, राख आदि) या उनके द्वारा प्रयुक्त वस्तुएँ रखी जाती थीं।
  • संरचना: इस मंजूषा को मिट्टी से ढक दिया जाता था, जिसके ऊपर ईंटों की परत और बाद में नक्काशीदार पत्थर की शिलाएँ लगाई जाती थीं।
  • प्रदक्षिणा पथ: भक्तों के लिए स्तूप के चारों ओर घूमने के लिए एक गोलाकार मार्ग होता था, जहाँ घड़ी की सुई की दिशा (clockwise) में परिक्रमा की जाती थी।
  • साँची का महान स्तूप: मध्य प्रदेश में स्थित, जिसका ईंटों का टीला अशोक के समय का है और रेलिंग तथा प्रवेश द्वार बाद के शासकों द्वारा जोड़े गए।
  • गर्भगृह: यह मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण भाग था जहाँ मुख्य देवी-देवता (जैसे विष्णु, शिव या दुर्गा) की मूर्ति रखी जाती थी।
  • शिखर: गर्भगृह के ऊपर बनाई गई एक ऊँची मीनार, जो इसकी पवित्रता को दर्शाती थी।
  • मंडप: यह एक सभागार होता था जहाँ लोग इकट्ठा हो सकते थे।
  • एकाश्मक मंदिर (Monoliths): महाबलीपुरम् के मंदिर एक ही विशाल पत्थर को काटकर बनाए गए हैं।

महाराष्ट्र के अजंता की गुफाओं में विश्व प्रसिद्ध मठ हैं जो उत्कृष्ट चित्रों से सजे हैं।

  • तकनीक: चूँकि गुफाओं के भीतर अंधेरा था, इसलिए कलाकारों ने मशालों की रोशनी में ये चित्र बनाए।
  • सामग्री: ये चटकीले रंग पौधों और खनिजों से तैयार किए गए थे, जो 1500 साल बाद भी आज ताज़ा दिखते हैं।

यह युग वीर पुरुषों, महिलाओं और देवताओं के बारे में लंबी रचनाओं का स्वर्ण युग था।

  • तमिल महाकाव्य:
    1. शिल्पदिकारम: लगभग 1800 साल पहले इलांगो द्वारा रचित। यह कोवलन, माधवी और कणगी की कहानी है।
    2. मणिमेखलै: लगभग 1400 साल पहले सत्तनार द्वारा रचित।
  • संस्कृत साहित्य: कालिदास ने ‘मेघदूतम्’ जैसी प्रसिद्ध कृतियाँ लिखीं।
  • पुराण: इसका शाब्दिक अर्थ है ‘पुराना’। इनमें देवी-देवताओं की कहानियाँ हैं और इन्हें सरल संस्कृत में लिखा गया था ताकि महिलाएँ और शूद्र भी इन्हें सुन सकें।
  • संस्कृत महाकाव्य: महाभारत और रामायण लगभग 1500 साल पहले लिखे गए थे। महाभारत के संकलन का श्रेय व्यास को और संस्कृत रामायण के लेखक वाल्मीकि को माना जाता है।

संस्कृत ग्रंथों में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति दर्ज की गई है।

  • आर्यभट्ट: एक गणितज्ञ और खगोलशास्त्री जिन्होंने ‘आर्यभट्टीयम्’ लिखी। उन्होंने बताया कि पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूमने (Rotation) के कारण दिन और रात होते हैं और उन्होंने ग्रहण (Eclipse) की भी वैज्ञानिक व्याख्या दी।
  • शून्य और अंक: भारतीय गणितज्ञों ने शून्य के लिए एक विशेष चिह्न का आविष्कार किया। अंकों की यह प्रणाली अरबों द्वारा अपनाई गई और फिर यूरोप में फैली।
  • आयुर्वेद: प्राचीन भारत में विकसित स्वास्थ्य विज्ञान। प्रमुख ग्रंथों में चरक द्वारा रचित ‘चरक संहिता’ (औषधि) और सुश्रुत द्वारा रचित ‘सुश्रुत संहिता’ (शल्य चिकित्सा/Surgery) शामिल हैं।

🏛️ इमारतें, चित्र तथा किताबें

🏗️ वास्तुकला
बौद्ध स्तूप (टीला) में धातु-मंजूषा रखी जाती थी, जबकि मंदिरों में गर्भगृह (मुख्य कक्ष) और उसके ऊपर शिखर बनाया जाता था। महाबलीपुरम जैसे मंदिर एकाश्मिक (पत्थरों को काटकर) बने थे।
🧪 विज्ञान और धातु विज्ञान
महरौली का लौह स्तंभ 1,500 साल बाद भी जंग-रहित है। आर्यभट्ट ने ग्रहण और पृथ्वी के घूमने की व्याख्या की, जबकि चरक और सुश्रुत ने आयुर्वेद के विज्ञान को आगे बढ़ाया।
🎨 कला और अजंता
अजंता की गुफाओं के चित्र विश्व प्रसिद्ध हैं। चित्रकारों ने पौधों और खनिजों से बने प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया, जो मशालों की रोशनी वाली गुफाओं में 1,500 साल बाद भी चमकदार हैं।
📚 साहित्य और महाकाव्य
इस काल में सिलप्पदिकारम् जैसे तमिल महाकाव्य और पुराणों का संकलन हुआ। संस्कृत महाकाव्य महाभारत और रामायण ने भी इसी समय अपना अंतिम रूप प्राप्त किया।
नवाचार भारतीय गणितज्ञों ने शून्य और दशमलव प्रणाली के लिए विशिष्ट चिह्न विकसित किए, जिन्हें बाद में अरबों ने अपनाया और पूरे यूरोप में फैलाया।
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कक्षा-6 इतिहास अध्याय-12 PDF

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: इमारतें, चित्र तथा किताबें

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ये अनुच्छेद सुनिश्चित करते हैं कि भारत में धर्म केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं है, बल्कि एक संरक्षित सामूहिक गतिविधि भी है। साथ ही, ये राज्य और धर्म के बीच “पृथक्करण की दीवार” बनाए रखते हैं ताकि राज्य किसी विशेष धर्म का पक्ष न ले सके।

जहाँ अनुच्छेद 25 व्यक्ति की रक्षा करता है, वहीं अनुच्छेद 26 “धार्मिक संप्रदायों” (Religious Denominations) या उनके वर्गों के अधिकारों की रक्षा करता है। यह उन्हें अपने मामलों को संगठित और प्रबंधित करने के अधिकार की गारंटी देता है।

प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को निम्नलिखित अधिकार प्राप्त हैं:

  1. संस्थाओं की स्थापना और पोषण: धार्मिक और धर्मार्थ (Charitable) उद्देश्यों के लिए।
  2. अपने कार्यों का प्रबंधन: विशेष रूप से “धर्म के मामलों” में।
  3. संपत्ति का स्वामित्व और अर्जन: चल (पैसा, वाहन) और अचल (भूमि, भवन) दोनों।
  4. संपत्ति का प्रशासन: कानून के अनुसार।

उच्चतम न्यायालय ने (शिरूर मठ मामले में) किसी समूह को “संप्रदाय” मानने के लिए तीन शर्तें निर्धारित की हैं:

  • यह उन व्यक्तियों का समूह होना चाहिए जिनका एक साझा विश्वास (Common Faith) हो।
  • इसका एक साझा संगठन होना चाहिए।
  • इसे एक विशिष्ट नाम से जाना जाना चाहिए।
  • उदाहरण: रामकृष्ण मिशन और आनंद मार्ग हिंदू धर्म के भीतर संप्रदाय माने गए हैं।

सीमाएँ: अनुच्छेद 25 की तरह, ये अधिकार भी लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन हैं।

अनुच्छेद 27 भारतीय धर्मनिरपेक्षता का एक मुख्य स्तंभ है। यह राज्य को जनता से एकत्रित कर (Tax) का उपयोग किसी एक धर्म को दूसरे के ऊपर बढ़ावा देने के लिए करने से रोकता है।

  • राज्य किसी भी व्यक्ति को ऐसे कर देने के लिए मजबूर नहीं कर सकता जिसका उपयोग विशेष रूप से किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की उन्नति या रखरखाव के लिए किया जाता हो।
  • तर्क: यदि राज्य कर के पैसे का उपयोग केवल एक धर्म के समर्थन के लिए करता है, तो यह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है। हालाँकि, यदि राज्य सभी धर्मों को समान रूप से समर्थन देता है, तो यह इस अनुच्छेद का उल्लंघन नहीं माना जा सकता।

उच्चतम न्यायालय ने यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर किया है:

  • कर (Tax): प्रतिबंधित है, यदि किसी विशिष्ट धर्म के लिए उपयोग किया जाए।
  • शुल्क (Fee): अनुमत (Allowed) है। राज्य तीर्थयात्रियों (जैसे वैष्णो देवी या हज) से “शुल्क” ले सकता है ताकि उन्हें धर्मनिरपेक्ष सेवाएं जैसे स्वच्छता, सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान की जा सकें। शुल्क सेवा के बदले लिया गया भुगतान है, धर्म का प्रचार नहीं।

यह अनुच्छेद शैक्षणिक संस्थानों के “धर्मनिरपेक्ष स्वरूप” से संबंधित है। यह नियंत्रित करता है कि स्कूलों और कॉलेजों में धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है या नहीं।

धार्मिक शिक्षा की वैधता संस्थान के प्रकार पर निर्भर करती है:

संस्थान का प्रकारधार्मिक शिक्षा की स्थिति
पूर्णतः राज्य निधि से संचालितपूरी तरह प्रतिबंधित (Prohibited)।
राज्य द्वारा प्रशासित लेकिन न्यास (Trust) द्वारा स्थापितदी जा सकती है (जैसे किसी धार्मिक ट्रस्ट द्वारा स्थापित स्कूल)।
राज्य द्वारा मान्यता प्राप्तस्वैच्छिक आधार पर (Participation is voluntary)।
राज्य निधि से सहायता प्राप्तस्वैच्छिक आधार पर (Participation is voluntary)।

जिन संस्थानों में धार्मिक शिक्षा की अनुमति है (प्रकार 3 और 4), वहाँ किसी भी व्यक्ति को भाग लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

  • यदि छात्र नाबालिग है, तो उसके संरक्षक (Guardian) की सहमति आवश्यक है।
  • यह सुनिश्चित करता है कि राज्य शिक्षा का उपयोग धार्मिक धर्मांतरण के उपकरण के रूप में न करे।
अनुच्छेदअधिकार की प्रकृतिमुख्य सीमा/विशेषता
26सामूहिक (समूहों/संप्रदायों के लिए)लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य।
27वित्तीय (करों से सुरक्षा)कर (निषेध) और शुल्क (अनुमति) के बीच अंतर।
28शैक्षिक (स्कूल/कॉलेज)सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में जबरन धार्मिक शिक्षा पर रोक।

🕌 अनुच्छेद 26, 27 और 28

🏛️ अनु. 26: सामूहिक अधिकार
धार्मिक संप्रदायों की रक्षा करता है। उन्हें संस्थाएं स्थापित करने, अपने धार्मिक कार्यों का प्रबंधन करने और कानून के अनुसार संपत्ति के प्रशासन का अधिकार है।
🔍 संप्रदाय क्या है?
शिरूर मठ केस के अनुसार, समूह के पास होना चाहिए: 1. एक साझा विश्वास, 2. एक साझा संगठन, और 3. एक विशिष्ट नाम (जैसे- रामकृष्ण मिशन)।
💰 अनु. 27: राजकोषीय धर्मनिरपेक्षता
राज्य किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म की उन्नति के लिए कर (Tax) देने हेतु मजबूर नहीं कर सकता। यह राज्य की धार्मिक तटस्थता बनाए रखता है।
⚖️ कर बनाम शुल्क
जहाँ धर्म के लिए कर (सामान्य राजस्व) लेना वर्जित है, वहीं राज्य तीर्थयात्रियों को सुरक्षा और स्वच्छता जैसी सेवाएं देने के लिए शुल्क (Fee) ले सकता है।
🏫 अनु. 28: धार्मिक शिक्षा
पूरी तरह से सरकारी धन से चलने वाले स्कूलों में धार्मिक शिक्षा प्रतिबंधित है। सहायता प्राप्त स्कूलों में यह केवल स्वैच्छिक आधार पर दी जा सकती है।
✍️ सहमति और नाबालिग
किसी को भी धार्मिक शिक्षा लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। नाबालिगों के लिए, किसी भी धार्मिक गतिविधि में भाग लेने हेतु अभिभावक की स्पष्ट सहमति अनिवार्य है।
निष्कर्ष अनुच्छेद 26 समूह के अधिकारों को कवर करता है, अनुच्छेद 27 वित्तीय धर्मनिरपेक्षता सुनिश्चित करता है, और अनुच्छेद 28 शिक्षण संस्थानों के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को बनाए रखता है।

यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (14 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत और इसके पड़ोसी देश; सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां)।

  • संदर्भ: थल सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी की वार्षिक प्रेस कॉन्फ्रेंस, जिसमें वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर स्थिति को “स्थिर लेकिन संवेदनशील” बताया गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • परिचालन तत्परता: सेना प्रमुख ने कहा कि यद्यपि डेपसांग और डेमचोक जैसे विशिष्ट क्षेत्रों में ‘डिसइंगेजमेंट’ (सैनिकों का पीछे हटना) हो गया है, लेकिन यथास्थिति को बदलने के किसी भी प्रयास को रोकने के लिए सेना हाई अलर्ट पर है।
    • भरोसे की कमी: उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अप्रैल 2020 के बाद से “भरोसा” सबसे बड़ा हताहत हुआ है। इसे बहाल करने के लिए तीन चरणों की आवश्यकता है: डिसइंगेजमेंट, डी-एस्केलेशन (तनाव कम करना), और अंत में सैनिकों का प्रबंधन।
    • बुनियादी ढांचा समानता: भारत चीन के बराबर बुनियादी ढांचा हासिल करने के लिए सीमा पर सड़कों, सुरंगों और पुलों का निर्माण तेजी से कर रहा है ताकि आवश्यकता पड़ने पर सैनिकों की त्वरित आवाजाही सुनिश्चित हो सके।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-चीन संबंध”, “राष्ट्रीय सुरक्षा” और “सीमा बुनियादी ढांचा विकास” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • डी-एस्केलेशन की चुनौती: डिसइंगेजमेंट से डी-एस्केलेशन की ओर बढ़ना जटिल है। इसमें भारी तोपखाने, टैंकों और हजारों सैनिकों को उनके स्थायी ठिकानों पर वापस भेजना शामिल है—एक ऐसा कदम जिसे उठाने में चीन हिचकिचा रहा है।
    • बफर जोन और गश्त: अस्थायी “नो-पेट्रोल” बफर जोन ने शारीरिक झड़पों को तो रोका है, लेकिन इससे कई गश्त बिंदुओं (Patrolling points) तक भारत की पारंपरिक पहुंच भी सीमित हो गई है।
    • रणनीतिक धैर्य: सेना का रुख एक दीर्घकालिक “प्रतीक्षा करो और देखो” नीति की ओर संकेत करता है, जहाँ कूटनीतिक बातचीत को ज़मीन पर एक मजबूत सैन्य मुद्रा का समर्थन प्राप्त है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; सामाजिक न्याय; न्यायपालिका की भूमिका)।

  • संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी जिसमें सुझाव दिया गया है कि जो लोग आवारा कुत्तों को खिलाते हैं, उन्हें कुत्ते के काटने की स्थिति में पीड़ितों के चिकित्सा खर्च के लिए आर्थिक रूप से उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • कानूनी जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि जानवरों को खिलाना दया का कार्य है, लेकिन इससे सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा नहीं होना चाहिए। खिलाने वालों से उन पीड़ितों के इलाज का खर्च उठाने को कहा जा सकता है जिन्हें उनके द्वारा पालित कुत्ते ने काटा हो।
    • संवैधानिक संतुलन: कोर्ट नागरिकों के “जीवन के अधिकार” (अनुच्छेद 21) और जानवरों के प्रति नैतिक व्यवहार के बीच एक महीन रेखा खींचने की कोशिश कर रहा है।
    • ABC नियमों की अनदेखी: नसबंदी और टीकाकरण की प्राथमिक जिम्मेदारी ‘पशु जन्म नियंत्रण’ (ABC) नियमों के तहत स्थानीय नगर निकायों की है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सक्रियता”, “स्थानीय स्वशासन की चुनौतियां” और “सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संस्थागत विफलता: संपादकीय में उल्लेख किया गया है कि आवारा कुत्तों के हमलों में वृद्धि शहरी स्थानीय निकायों द्वारा नसबंदी कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता का सीधा परिणाम है।
    • सामाजिक संघर्ष: स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में “पशु प्रेमियों” और “रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA)” के बीच घर्षण बढ़ रहा है, जिससे न्यायपालिका को मध्यस्थ के रूप में हस्तक्षेप करना पड़ा है।
    • कार्यान्वयन की बाधा: इस नियम को लागू करने के लिए “नियमित रूप से खिलाने” को कानूनी रूप से परिभाषित करना और एक विशिष्ट कुत्ते को एक विशिष्ट व्यक्ति से जोड़ना एक बड़ी लॉजिस्टिक चुनौती होगी।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 1 (आधुनिक भारतीय इतिहास; सामाजिक सशक्तिकरण; राजनीतिक दर्शन)।

  • संदर्भ: नीले रंग के ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व का विश्लेषण, जो चंपारण के नील के खेतों से शुरू होकर अंबेडकरवादी आंदोलन तक पहुँचता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • चंपारण सत्याग्रह (1917): नीला रंग किसान प्रतिरोध से जुड़ा, जब नील की खेती करने वाले किसानों ने ब्रिटिश बागान मालिकों के खिलाफ संघर्ष किया।
    • अंबेडकर का आसमान: डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन’ के झंडे के लिए नीला रंग चुना, जो आकाश का प्रतिनिधित्व करता है—सार्वभौमिक, विशाल और जाति या धर्म की सीमाओं से मुक्त।
    • दलित अस्मिता: आज, नीला स्कार्फ और झंडा दलित पहचान, गरिमा और संवैधानिक अधिकारों की मांग का एक शक्तिशाली दृश्य प्रतीक है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “सामाजिक सुधार आंदोलन”, “राजनीतिक समाजशास्त्र” और “स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • एक धर्मनिरपेक्ष पहचान: केसरिया या हरे रंग के विपरीत, जो अक्सर विशिष्ट धर्मों से जुड़े होते हैं, नीले रंग को एक “तटस्थ” रंग के रूप में चुना गया जो धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिकता का प्रतीक है।
    • दृश्य एकजुटता: यह रंग भारत की विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों के वंचित वर्गों को सशक्तिकरण पर केंद्रित एक अखिल भारतीय पहचान में जोड़ने का काम करता है।
    • उत्पीड़न से सत्ता तक: औपनिवेशिक शोषण (नील) के प्रतीक से राजनीतिक शक्ति (अंबेडकरवादी आंदोलन) के प्रतीक तक नीले रंग का सफर भारत के बदलते सामाजिक ताने-बाने को दर्शाता है।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी; आपदा प्रबंधन)।

  • संदर्भ: फूलों की घाटी (यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल) में लगी भीषण आग पांच दिनों से जारी है, जिससे राज्य को भारतीय वायु सेना (IAF) की मदद लेनी पड़ी है।
  • मुख्य बिंदु:
    • पारिस्थितिक क्षति: यह घाटी 600 प्रकार के विदेशी फूलों और दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों का घर है जो वर्तमान में खतरे में हैं।
    • IAF का हस्तक्षेप: वायु सेना दुर्गम और खड़ी ढलानों पर आग बुझाने के लिए “बम्बी बकेट” (Bambi Bucket) का उपयोग कर रही है।
    • जलवायु कारक: सर्दियों में बर्फबारी की भारी कमी और असामान्य रूप से शुष्क मौसम ने जंगलों को ज्वलनशील बना दिया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जैव विविधता का संरक्षण”, “आपदा प्रबंधन तंत्र” और “हिमालयी पारिस्थितिकी”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • नीतिगत कमी: भारत में वनाग्नि प्रबंधन अक्सर प्रतिक्रियात्मक होता है। संपादकीय एक “राष्ट्रीय वनाग्नि नीति” की आवश्यकता बताता है जो सामुदायिक ‘वन पंचायतों’ और उपग्रह-आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों पर केंद्रित हो।
    • आक्रामक प्रजातियाँ: ओक जैसे चौड़े पत्तों वाले पेड़ों के स्थान पर चीड़ (पाइन) के पेड़ों का विस्तार हिमालयी जंगलों को आग के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है क्योंकि चीड़ की पत्तियां अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं।

पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (आंतरिक सुरक्षा; साइबर सुरक्षा; पुलिस व्यवस्था में तकनीक की भूमिका)।

  • संदर्भ: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने “डिजिटल अरेस्ट” घोटाले से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जिसमें जालसाज कानून प्रवर्तन अधिकारी बनकर पैसे ऐंठते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • घोटाले का तरीका: अपराधी वीडियो कॉल का उपयोग करके खुद को CBI या ED अधिकारी बताते हैं और पीड़ितों से कहते हैं कि वे “डिजिटल अरेस्ट” के तहत हैं और जब तक वे जुर्माना नहीं देते, वे घर नहीं छोड़ सकते या कॉल नहीं काट सकते।
    • अंतर-एजेंसी पैनल: इस पैनल में भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C), RBI और दूरसंचार विभाग (DoT) शामिल हैं जो वास्तविक समय में फर्जी सिम को ब्लॉक करने और बैंक खातों को फ्रीज करने का काम करेंगे।
    • सत्यापन प्रोटोकॉल: समिति एक ऐसी प्रणाली पर काम कर रही है जहाँ नागरिक एक सरकारी पोर्टल के माध्यम से कॉल करने वाले अधिकारी की पहचान सत्यापित कर सकें।
  • UPSC प्रासंगिकता: “साइबर सुरक्षा चुनौतियां”, “पुलिस सुधार” और “वित्तीय धोखाधड़ी की रोकथाम”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सीमा पार संबंध: इनमें से कई घोटाले दक्षिण-पूर्व एशिया (कंबोडिया, म्यांमार) के “साइबर-गुलाम” केंद्रों से संचालित होते हैं, जिसके लिए इंटरपोल के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता है।
    • मनोवैज्ञानिक तत्व: जालसाज कानून प्रवर्तन के प्रति आम नागरिक के डर और सम्मान का फायदा उठाते हैं। संपादकीय इस बात पर जोर देता है कि जन जागरूकता ही बचाव की पहली पंक्ति है; कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी वीडियो कॉल के माध्यम से पूछताछ नहीं करती हैं।

संपादकीय विश्लेषण

14 जनवरी, 2026
GS-2 IR
🏔️ LAC: विश्वास का अभाव
सेना प्रमुख ने सीमा को “स्थिर लेकिन संवेदनशील” बताया। डेपसांग/डेमचोक में पीछे हटने की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद तनाव कम करने (De-escalation) की प्रक्रिया रुकी हुई है। भारत का लक्ष्य: चीन द्वारा यथास्थिति में बदलाव को रोकने के लिए बुनियादी ढांचा समानता प्राप्त करना।
GS-2 शासन
🐕 पशु-पोषण और सार्वजनिक सुरक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों को खिलाने वालों पर वित्तीय दायित्व का सुझाव दिया। कानूनी तनाव: अनुच्छेद 21 (सुरक्षा का अधिकार) बनाम करुणा। मूल कारण: स्थानीय निकायों द्वारा पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में विफलता।
GS-1 इतिहास
🗳️ नीला रंग: नील से सशक्तिकरण तक
चंपारण (1917) के प्रतिरोध से लेकर आंबेडकरवादी आंदोलन तक इस रंग का इतिहास। आकाश (सार्वभौमिक/मुक्त) का प्रतिनिधित्व करने वाला नीला रंग, दलित पहचान और जातिगत पदानुक्रमों के खिलाफ संवैधानिक दावे के लिए एक धर्मनिरपेक्ष सूत्र के रूप में कार्य करता है।
GS-3 आपदा
🔥 फूलों की घाटी: पारिस्थितिक संकट
यूनेस्को स्थल में 5 दिनों से जंगल की आग। कारण: शुष्क सर्दी और ज्वलनशील चीड़ के पेड़ों (Chir Pine) का बढ़ना। IAF द्वारा बाम्बी बकेट का उपयोग। आवश्यकता: सामुदायिक नेतृत्व वाली ‘वन पंचायतों’ के साथ एकीकृत एक राष्ट्रीय वन अग्नि नीति।
GS-3 सुरक्षा
📞 “डिजिटल अरेस्ट” का मुकाबला
गृह मंत्रालय ने जबरन वसूली गिरोहों को खत्म करने के लिए I4C, RBI और DoT के साथ पैनल बनाया। रणनीति: खातों को रियल-टाइम फ्रीज करना और फर्जी सिम ब्लॉक करना। तथ्य: कानून प्रवर्तन एजेंसियां कभी भी वीडियो कॉल के जरिए पूछताछ नहीं करती हैं।

यहाँ भारत की प्रमुख जनजातियोंकृषि पेटियों और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं तथा रणनीतिक रेखाओं का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:

भारत में एक विशाल जनजातीय आबादी है, जो मुख्य रूप से वन क्षेत्रों और पहाड़ी इलाकों में निवास करती है।

  • उत्तर और उत्तर-पूर्व भारत:
    • भोटिया और गुज्जर: उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हिमालयी क्षेत्रों में पाए जाते हैं।
    • गारो, खासी और जयंतिया: मुख्य रूप से मेघालय की पहाड़ियों में निवास करते हैं।
    • नागा: नागालैंड और मणिपुर के कुछ हिस्सों में स्थित हैं।
  • मध्य भारत:
    • गोंड: भारत के सबसे बड़े जनजातीय समूहों में से एक, जो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में पाए जाते हैं।
    • भील: मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में पाए जाते हैं।
    • संथाल: झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में केंद्रित हैं।
  • दक्षिण भारत:
    • टोडा: तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों में रहने वाला एक अद्वितीय समुदाय।
    • चेन्चू: मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की नल्लामाला पहाड़ियों में पाए जाते हैं।

भारत में फसलों का वितरण मिट्टी के प्रकार, वर्षा और तापमान द्वारा निर्धारित होता है।

फसलप्राथमिक क्षेत्रआवश्यक स्थितियाँ
चावलपश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेशउच्च तापमान, उच्च आर्द्रता और भारी वर्षा (100 सेमी से अधिक)।
गेहूँपंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेशबढ़ते समय ठंडा मौसम और पकते समय तेज़ खिली हुई धूप।
कपासगुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगानाउच्च तापमान और हल्की वर्षा; काली मृदा में सर्वोत्तम विकास।
चायअसम, पश्चिम बंगाल (दार्जिलिंग), केरलपहाड़ी ढलानों पर अच्छे जल निकास वाली मिट्टी और बार-बार होने वाली बौछारें।
कॉफीकर्नाटक (बाबा बुदन पहाड़ियाँ), केरलढलानों पर समृद्ध और सुअपवाहित मिट्टी; कर्नाटक सबसे बड़ा उत्पादक है।

भारत की सीमाएँ विशिष्ट रेखाओं द्वारा चिह्नित हैं जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों और रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  • रेडक्लिफ रेखा (Radcliffe Line): भारत और पाकिस्तान, साथ ही भारत और बांग्लादेश के बीच की सीमा रेखा।
  • मैकमोहन रेखा (McMahon Line): चीन और भारत के बीच की प्रभावी सीमा (विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश क्षेत्र में)।
  • नियंत्रण रेखा (LoC – Line of Control): जम्मू और कश्मीर के भारतीय और पाकिस्तानी नियंत्रित हिस्सों के बीच की सैन्य नियंत्रण रेखा।
  • वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC – Line of Actual Control): लद्दाख और पूर्वी क्षेत्रों में भारत और चीन के बीच की प्रभावी सीमा।
  • डूरंड रेखा (Durand Line): अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच की सीमा (भारत भी PoK क्षेत्र में अफगानिस्तान के साथ एक छोटी सीमा को मान्यता देता है)।
श्रेणीमुख्य बिंदुभौगोलिक फोकस
सबसे बड़ी जनजातिभील / गोंडमध्य और पश्चिमी भारत
चावल का कटोरापश्चिम बंगाल और पंजाबभारत-गंगा के मैदान
सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमाभारत-बांग्लादेशपूर्वी भारत
कपास का केंद्रदक्कन ट्रैपगुजरात और महाराष्ट्र

जनजातियों के स्थानों को अक्सर उन पहाड़ियों के नाम से याद रखा जा सकता है जहाँ वे रहती हैं, जैसे ‘गारो-खासी-जयंतिया’ पहाड़ियाँ और उनके नाम पर आधारित जनजातियाँ। मानचित्र पर इन पहाड़ियों की स्थिति को ध्यान से देखें।

मानव एवं रणनीतिक परिदृश्य

नृवंशविज्ञान
👤 प्रमुख जनजातियाँ
भारत का सांस्कृतिक मानचित्र मध्य हृदयस्थल के गोंड और संथाल, नीलगिरी पहाड़ियों के टोडा और पूर्वोत्तर के नागा जैसे स्वदेशी समूहों द्वारा परिभाषित है।
अभ्यास: टोडा जनजाति के अनूठे निवास स्थान को खोजने के लिए तमिलनाडु में नीलगिरी पहाड़ियों को लोकेट करें।
कृषि
🌾 कृषि पेटियाँ
फसल वितरण भूगोल का प्रतिबिंब है। जहाँ उत्तर में गेहूँ पनपता है, वहीं कॉफी और चाय के लिए बाबा बुदन पहाड़ियों और दार्जिलिंग के ढलानों की आवश्यकता होती है।
फसल मुख्य क्षेत्र आवश्यक परिस्थितियाँ
कपासगुजरात, महाराष्ट्रकाली मिट्टी; उच्च तापमान
चावलप. बंगाल, पंजाब, UPउच्च आर्द्रता; 100cm+ वर्षा
कॉफीकर्नाटक की पहाड़ियाँअच्छी जल निकासी वाले ढलान
अभ्यास: दक्कन ट्रैप के मानचित्र पर भारत के “कपास हब” की पहचान करें।
भू-राजनीति
🚩 रणनीतिक सीमाएँ
महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय रेखाएँ जैसे रेडक्लिफ रेखा (पाकिस्तान/बांग्लादेश) और मैकमोहन रेखा (चीन) राष्ट्र की संप्रभु सीमाओं को परिभाषित करती हैं।
अभ्यास: जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के मानचित्र पर LoC (पाकिस्तान की ओर) और LAC (चीन की ओर) के बीच अंतर स्पष्ट करें।
मानचित्रण सारांश
श्रेणी मुख्य विशेषता भौगोलिक केंद्र
सबसे बड़ी जनजातिभील / गोंडमध्य एवं पश्चिमी भारत
धान का कटोराप. बंगाल और पंजाबसिंधु-गंगा के मैदान
सबसे लंबी सीमाभारत-बांग्लादेशपूर्वी भारत (4,096 किमी)

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