IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 12 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 6 Chapter-10 (व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री)
यह अध्याय “व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री” बताता है कि कैसे वस्तुओं, लोगों और विचारों की आवाजाही ने प्राचीन दुनिया को आकार दिया और भारत को रोम और चीन जैसे दूर के साम्राज्यों से जोड़ा।
1. व्यापार और व्यापारी
इतिहासकारों को व्यापार के प्रमाण पुरातात्विक खोजों और साहित्य के माध्यम से मिलते हैं।
- उत्तरी काले चमकीले पात्र (NBPW): ये बेहतरीन मिट्टी के बर्तन उपमहाद्वीप के कई स्थानों पर मिले हैं। संभवतः व्यापारी इन्हें इनके निर्माण स्थलों से दूर-दूर तक ले गए थे।
- दक्षिण भारत का खजाना: दक्षिण भारत सोना, कीमती पत्थर और काली मिर्च जैसे मसालों के लिए प्रसिद्ध था। रोमन साम्राज्य में काली मिर्च की इतनी अधिक मांग थी कि इसे “काला सोना” कहा जाता था।
- समुद्री मार्ग: व्यापारियों ने अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को तेजी से पार करने के लिए मानसूनी हवाओं का उपयोग किया। उदाहरण के लिए, वे अफ्रीका या अरब से भारत के पश्चिमी तट पर पहुँचने के लिए दक्षिण-पश्चिम मानसून के साथ जहाज चलाते थे।
- रेशम मार्ग (Silk Route):
- उत्पत्ति: रेशम बनाने की तकनीक का आविष्कार लगभग 7,000 साल पहले चीन में हुआ था और इसे हज़ारों वर्षों तक गुप्त रखा गया।
- मांग: लगभग 2,000 साल पहले, रोम के अमीरों के बीच रेशम पहनना एक फैशन और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया।
- नियंत्रण: शासक (विशेषकर कुषाण) रेशम मार्ग पर नियंत्रण करना चाहते थे ताकि वे व्यापारियों से कर, शुल्क और उपहार प्राप्त कर सकें।
2. नए तटीय राज्य
दक्षिण भारत में, शक्तिशाली प्रमुखों ने उपजाऊ नदी घाटियों और तटों पर नियंत्रण किया।
- तीन प्रमुख (मुवेन्दार): तमिल शब्द ‘मुवेन्दार’ का प्रयोग तीन शासक परिवारों के लिए किया गया था: चोल, चेर और पांड्य। ये लगभग 2,300 साल पहले शक्तिशाली हुए।
- सत्ता के केंद्र: प्रत्येक प्रमुख के पास सत्ता के दो केंद्र थे—एक अंतर्देशीय और एक तटीय। इनमें पुहार (चोलों का पत्तन/बंदरगाह) और मदुरै (पांड्यों की राजधानी) सबसे महत्वपूर्ण थे।
- संगम साहित्य: ये प्रमुख नियमित कर नहीं वसूलते थे बल्कि उपहार और भेंट प्राप्त करते थे। वे कवियों को पुरस्कृत करते थे, जिन्होंने उनकी प्रशंसा में कविताएँ लिखीं जो संगम साहित्य में संकलित हैं।
- सातवाहन: लगभग 2,100 साल पहले पश्चिमी भारत में सातवाहन शक्तिशाली हुए। उनके सबसे प्रतापी राजा गौतमीपुत्र श्री शातकर्णी थे। इन शासकों को “दक्षिणापथ के स्वामी” कहा जाता था।
3. बौद्ध धर्म का प्रसार
कुषाण राजा कनिष्क (लगभग 1,900 साल पहले) के शासनकाल में बौद्ध धर्म एक नए चरण में पहुँचा।
- महायान बौद्ध धर्म: इस नए रूप में दो बड़े बदलाव आए:
- बुद्ध की मूर्तियाँ: पहले बुद्ध की उपस्थिति संकेतों (जैसे पीपल का पेड़) के माध्यम से दिखाई जाती थी, लेकिन अब बुद्ध की मूर्तियाँ बनाई जाने लगीं।
- बोधिसत्व: बोधिसत्वों में विश्वास बढ़ा। ये ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ज्ञान प्राप्त कर लिया था, लेकिन वे एकांत में रहने के बजाय दुनिया में रहकर दूसरों को शिक्षा देने और मदद करने के लिए रुक गए।
- विस्तार: बौद्ध धर्म मध्य एशिया, चीन, कोरिया और जापान तक फैला। साथ ही, थेरवाद (बौद्ध धर्म का पुराना रूप) श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड और इंडोनेशिया में अधिक लोकप्रिय रहा।
4. तीर्थयात्रियों की खोज
चीनी बौद्ध तीर्थयात्री पवित्र स्थानों के दर्शन करने और प्रसिद्ध मठों में अध्ययन करने के लिए भारत आए।
- प्रसिद्ध तीर्थयात्री: फा-शिएन (1,600 साल पहले), श्वेन त्सांग (1,400 साल पहले), और इ-त्सिन्ग व्यापारियों के साथ यात्रा करते थे और उन्होंने अपनी यात्राओं के खतरों का विवरण लिखा है।
- नालंदा विश्वविद्यालय: श्वेन त्सांग ने बिहार के नालंदा में अध्ययन किया, जो शिक्षा का एक अनूठा केंद्र था। यहाँ के शिक्षक अत्यधिक प्रतिभाशाली थे और नियम बहुत सख्त थे।
- पांडुलिपियाँ: श्वेन त्सांग अपने साथ 600 से अधिक पांडुलिपियाँ वापस ले गया और अपना शेष जीवन उनका संस्कृत से चीनी भाषा में अनुवाद करने में बिताया।
5. भक्ति की शुरुआत
इस काल में ‘भक्ति’ की अवधारणा हिंदू धर्म की एक प्रमुख विशेषता बन गई।
- मुख्य देवता: पूजा का केंद्र शिव, विष्णु और दुर्गा जैसे देवी-देवता थे।
- समर्पण में समानता: भक्ति ने किसी देवता के प्रति व्यक्ति के व्यक्तिगत समर्पण पर जोर दिया। यह मार्ग सभी के लिए खुला था, चाहे उनकी जाति, संपत्ति या लिंग कुछ भी हो।
- भगवद् गीता: भक्ति के विचार इस पवित्र ग्रंथ में मिलते हैं, जहाँ कृष्ण अर्जुन को अपनी शरण में आने के लिए कहते हैं।
- शुद्ध मन: भक्तों का मानना था कि यदि किसी देवता की पूजा शुद्ध मन से की जाए, तो वह देवता उसी रूप में दर्शन देगा जिसे भक्त देखना चाहता है।
- कलात्मक विरासत: इसी भक्ति भाव ने सुंदर मूर्तियों, कविताओं और शुरुआती मंदिरों के निर्माण को प्रेरित किया।
🧭 व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री
कक्षा-6 इतिहास अध्याय-10 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: व्यापारी, राजा और तीर्थयात्री
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: अनुच्छेद 20, 21 और 22 को समझना
जहाँ पिछले अनुच्छेदों (14-19) ने समानता और बुनियादी स्वतंत्रताएँ स्थापित की थीं, वहीं अनुच्छेद 20, 21 और 22 विशिष्ट कानूनी संरक्षण प्रदान करते हैं। ये किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने, दोषी ठहराने या उसके जीवन और स्वतंत्रता को छीनने की राज्य की मनमानी शक्ति के खिलाफ सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं।
1. अनुच्छेद 20: अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण
अनुच्छेद 20 किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति (नागरिक या विदेशी) के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। यह राज्य द्वारा अभियोजन और दंड देने के आधारभूत नियम तय करता है।
तीन प्रमुख संरक्षण:
- कार्योत्तर विधि से संरक्षण (No Ex-Post-Facto Law) [अनुच्छेद 20(1)]: किसी व्यक्ति को ऐसे कार्य के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता जो उसे किए जाने के समय अपराध नहीं था। इसके अलावा, सजा उस समय के कानून द्वारा निर्धारित सजा से अधिक नहीं हो सकती।
- नोट: यह केवल आपराधिक कानूनों पर लागू होता है, दीवानी या कर कानूनों पर नहीं।
- दोहरे दंड से मुक्ति (No Double Jeopardy) [अनुच्छेद 20(2)]: किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जाएगा।
- सीमा: यह संरक्षण केवल न्यायालय या न्यायिक अधिकरण के समक्ष कार्यवाही पर लागू होता है, विभागीय या प्रशासनिक जांच पर नहीं।
- आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध संरक्षण (No Self-Incrimination) [अनुच्छेद 20(3)]: किसी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
- दायरा: इसमें मौखिक और दस्तावेजी दोनों साक्ष्य शामिल हैं। हालाँकि, यह अंगूठे के निशान, रक्त के नमूने या हस्ताक्षर के नमूने देने से सुरक्षा प्रदान नहीं करता है।
2. अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण
अनुच्छेद 21 संविधान का सबसे महत्वपूर्ण अनुच्छेद है। यह कहता है: “किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।”
“मेनका गांधी” क्रांति (1978):
प्रारंभ में, ए.के. गोपालन मामले (1950) में, सुप्रीम कोर्ट ने संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा था कि अनुच्छेद 21 केवल ‘कार्यपालिका’ की मनमानी कार्रवाई से बचाता है। यदि कोई कानून मौजूद है, तो अदालत यह सवाल नहीं उठाएगी कि वह कानून “उचित” है या नहीं।
हालाँकि, मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में कोर्ट ने अपना रुख पूरी तरह बदल दिया:
- स्वर्णिम त्रिभुज: कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 अलग नहीं हैं बल्कि एक “स्वर्णिम त्रिभुज” बनाते हैं। स्वतंत्रता छीनने वाले किसी भी कानून को इन तीनों की कसौटी पर खरा उतरना होगा।
- प्रक्रिया ‘उचित’ होनी चाहिए: “विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया” मनमानी या दमनकारी नहीं होनी चाहिए; यह न्यायपूर्ण, उचित और तर्कसंगत होनी चाहिए। इसने भारतीय कानून में अमेरिकी अवधारणा “विधि की उचित प्रक्रिया” (Due Process of Law) को पेश किया।
अनुच्छेद 21 के तहत विस्तृत अधिकार (न्यायिक सक्रियता):
- गरिमा के साथ जीने का अधिकार।
- निजता का अधिकार (पुट्टस्वामी मामला, 2017)।
- आजीविका का अधिकार (ओल्गा टेलिस मामला)।
- मुफ्त कानूनी सहायता और त्वरित सुनवाई का अधिकार।
- स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार।
3. अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी और निरोध से संरक्षण
अनुच्छेद 22 उन व्यक्तियों को प्रक्रियात्मक सुरक्षा प्रदान करता है जिन्हें गिरफ्तार किया जाता है। यह हिरासत को दो श्रेणियों में विभाजित करता है: दंडात्मक (अपराध होने के बाद) और निवारक (भविष्य में अपराध को रोकने के लिए)।
साधारण (दंडात्मक) हिरासत के तहत अधिकार:
- गिरफ्तारी के कारणों के बारे में जल्द से जल्द सूचित किए जाने का अधिकार।
- अपनी पसंद के कानूनी व्यवसायी (वकील) से परामर्श करने और बचाव करने का अधिकार।
- गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए जाने का अधिकार (यात्रा के समय को छोड़कर)।
- 24 घंटे के बाद रिहाई का अधिकार, जब तक कि मजिस्ट्रेट आगे की हिरासत को अधिकृत न करे।
निवारक निरोध (Preventive Detention):
भारत उन गिने-चुने लोकतांत्रिक देशों में से है जहाँ शांति काल के दौरान भी निवारक निरोध का संवैधानिक प्रावधान है।
- समय सीमा: किसी व्यक्ति को 3 महीने से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि एक सलाहकार बोर्ड (हाई कोर्ट के न्यायाधीशों का) विस्तार के लिए पर्याप्त कारण न पाए।
- बंदी के अधिकार: हिरासत के आधार व्यक्ति को बताए जाने चाहिए (जब तक कि यह जनहित के विरुद्ध न हो), और उन्हें आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन (Representation) करने का जल्द से जल्द अवसर दिया जाना चाहिए।
तुलनात्मक सारांश तालिका
| विशेषता | अनुच्छेद 20 | अनुच्छेद 21 | अनुच्छेद 22 |
| मुख्य केंद्र | मुकदमे के दौरान अभियुक्त के अधिकार। | जीवन और स्वतंत्रता का सामान्य अधिकार। | गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकार। |
| प्रमुख सिद्धांत | दोहरे दंड/आत्म-अभिशंसन से मुक्ति। | प्रक्रिया न्यायपूर्ण और उचित होनी चाहिए। | 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी। |
| निलंबन | आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता। | आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता। | आपातकाल/निवारक कानूनों के दौरान प्रतिबंधित किया जा सकता है। |
⚖️ अनुच्छेद 20, 21 और 22
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (12 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (12 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. फ्रोजन फ्लो: सोर्स कोड संघर्ष (Frozen Flow)
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (आंतरिक सुरक्षा; साइबर सुरक्षा; विज्ञान और प्रौद्योगिकी- विकास और अनुप्रयोग)।
- संदर्भ: केंद्र सरकार स्मार्टफोन निर्माताओं पर सुरक्षा आवश्यकताओं को लागू करने की दिशा में बढ़ रही है, जिसमें “वल्नरेबिलिटी एनालिसिस” (Vulnerability analysis) की मांग शामिल है। इसमें डिवाइस के ‘सोर्स कोड’ (Source Code) तक पहुंच की मांग भी की जा सकती है।
- मुख्य बिंदु:
- भारतीय दूरसंचार सुरक्षा आश्वासन आवश्यकताएं: मसौदे में 83 सुरक्षा मानकों का प्रस्ताव है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि डिवाइस सुरक्षित हैं और राज्य-प्रायोजित हैकर्स द्वारा प्रभावित नहीं हैं।
- लॉग रिटेंशन: नीति के अनुसार डिवाइस निर्माताओं को सुरक्षा ऑडिट के लिए सभी डिवाइस गतिविधियों का एक साल का ‘लॉग’ (Log) रखना अनिवार्य होगा।
- मालवेयर स्कैनिंग: हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्तर पर स्वचालित और समय-समय पर मालवेयर स्कैनिंग की आवश्यकता होगी।
- उद्योग की आपत्तियां: एप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियों का तर्क है कि ‘सोर्स कोड’ साझा करना बौद्धिक संपदा (IP) के लिए बड़ा जोखिम है और इससे नई सुरक्षा खामियां पैदा हो सकती हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “डेटा संप्रभुता”, “राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम निजता” और “दूरसंचार क्षेत्र की चुनौतियां”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- तकनीकी संप्रभुता: सरकार का तर्क है कि बैंकिंग और ई-गवर्नेंस के लिए स्मार्टफोन प्राथमिक माध्यम हैं, इसलिए “ब्लैक बॉक्स” जैसे बंद सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहना सुरक्षा जोखिम है।
- निजता की चिंता: अनिवार्य लॉग रिटेंशन और ऑटोमैटिक स्कैनिंग पुट्टस्वामी निर्णय के तहत अनुच्छेद 21 (निजता का अधिकार) पर सवाल उठाते हैं।
2. परिसीमन की पुनर्कल्पना (Reimagining Delimitation): दक्षिणी चुनौती
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था और शासन; संघीय ढांचा; जनप्रतिनिधित्व अधिनियम)।
- संदर्भ: आगामी परिसीमन (Delimitation) अभ्यास में दक्षिणी राज्यों के संभावित राजनीतिक और वित्तीय हाशिए पर जाने का विश्लेषण और संरचनात्मक समाधान।
- मुख्य बिंदु:
- जनसंख्या दंड (Population Penalty): जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू किया, उन्हें लोकसभा में अपनी सीटों का अनुपात अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों के पक्ष में खोने का डर है।
- ** यूरोपीय मॉडल:** लेखक यूरोपीय संसद के मॉडल को अपनाने का सुझाव देता है, जहाँ बड़ी आबादी को अधिक सीटें मिलती हैं, लेकिन छोटे क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व अनुपात अधिक रखा जाता है ताकि उनका प्रभुत्व बना रहे।
- राज्यसभा सुधार: संघीय संतुलन की रक्षा के लिए अमेरिकी सीनेट की तरह सभी राज्यों को राज्यसभा में समान प्रतिनिधित्व देने का प्रस्ताव।
- UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद”, “परिसीमन की चुनौतियां” और “जनसांख्यिकीय लाभांश बनाम प्रतिनिधित्व”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- राजकोषीय संबंध: चूंकि परिसीमन अक्सर वित्त आयोग के हस्तांतरण से जुड़ा होता है, राजनीतिक वजन कम होने का मतलब वित्तीय संसाधनों का नुकसान भी होगा, जो विकसित राज्यों के लिए एक तरह का ‘प्रदर्शन दंड’ है।
- संवैधानिक संकट: बिना किसी आम सहमति वाले समाधान के, परिसीमन उत्तर-दक्षिण राजनीतिक विभाजन को जन्म दे सकता है, जो “राज्यों के संघ” की अवधारणा को चुनौती देगा।
3. तेजी का मतलब निष्पक्षता नहीं: POCSO विरोधाभास
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; बच्चों से संबंधित मुद्दे; आपराधिक न्याय प्रणाली)।
- संदर्भ: पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत त्वरित विशेष अदालतों (FTSCs) के प्रदर्शन की समीक्षा, जिसमें यह पाया गया कि मामलों के निपटारे की उच्च दर का मतलब दोषसिद्धि दर में वृद्धि नहीं है।
- मुख्य बिंदु:
- निपटारा बनाम दोषसिद्धि: 2025 में भारत ने पॉक्सो मामलों में 109% की रिकॉर्ड निपटान दर हासिल की, लेकिन दोषसिद्धि दर (Conviction rate) पिछले वर्षों के 35% से गिरकर 29% रह गई।
- व्यवस्थागत कमजोरियां: निपटान के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए जल्दबाजी में की गई जांच अक्सर अधूरी चार्जशीट और मुकरने वाले गवाहों (hostile witnesses) का कारण बनती है।
- सहायक व्यक्तियों की कमी: कानूनी अनिवार्यता के बावजूद, कई राज्यों में बच्चों को सुनवाई के दौरान मार्गदर्शन देने के लिए ‘सहायक व्यक्ति’ (Support person) उपलब्ध नहीं हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “बाल संरक्षण कानून” और “सामाजिक न्याय”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- मात्रात्मक बनाम गुणात्मक: संपादकीय केवल संख्यात्मक डेटा (निपटान) पर ध्यान केंद्रित करने की आलोचना करता है। न्याय की गुणवत्ता के बदले केवल गति को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए।
- फॉरेंसिक बैकलॉग: डीएनए परीक्षण और साइबर फॉरेंसिक में देरी मुख्य बाधा बनी हुई है, जिससे अक्सर “संदेह का लाभ” पाकर आरोपी बरी हो जाते हैं।
4. संरक्षण में औपनिवेशिक विरासत (Fortress Conservation)
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण और पारिस्थितिकी; जैव विविधता संरक्षण; स्वदेशी लोगों से संबंधित मुद्दे)।
- संदर्भ: “किला संरक्षण” (Fortress Conservation) मॉडल का विश्लेषण और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर जनजातीय समुदायों के चल रहे विस्थापन की आलोचना।
- मुख्य बिंदु:
- औपनिवेशिक मॉडल: यह मॉडल इंसानों और वन्यजीवों को एक-दूसरे का विरोधी मानता है, जिससे वनवासियों को जबरन बेदखल किया जाता है।
- बाघ बनाम जनजातीय संघर्ष: लेख सहानुभूति के शहरी-ग्रामीण विभाजन को रेखांकित करता है, जहाँ एक बाघ की मृत्यु पर राष्ट्रीय आक्रोश होता है, लेकिन जंगली जानवरों द्वारा ग्रामीणों की हत्या को अनदेखा कर दिया जाता है।
- समावेशी संरक्षण: शोधकर्ता एक ऐसे ढांचे का प्रस्ताव करते हैं जो जैव विविधता प्रबंधन में स्वदेशी लोगों के क्षेत्रीय अधिकारों को एकीकृत करता है।
- UPSC प्रासंगिकता: “मानव-वन्यजीव संघर्ष”, “वन अधिकार अधिनियम (FRA) 2006” और “सतत विकास”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- जंगल के रक्षक: साक्ष्य बताते हैं कि स्वदेशी समुदायों द्वारा प्रबंधित क्षेत्रों में सरकारी संरक्षित पार्कों की तुलना में उच्च जैव विविधता स्तर होते हैं।
- स्थानीय लोगों का अपराधीकरण: संपादकीय पारंपरिक प्रथाओं (जैसे पशु चराना या शहद संग्रह) के अपराधीकरण की आलोचना करता है, जो अक्सर सरकारी पर्यटन बुनियादी ढांचे की तुलना में बहुत कम हानिकारक होते हैं।
5. भारत की समुद्री नीति: विकास और रणनीति
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (सुरक्षा; आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां; नीली अर्थव्यवस्था)।
- संदर्भ: भारत की समुद्री रणनीति की ऐतिहासिक, आर्थिक और तकनीकी समीक्षा।
- मुख्य बिंदु:
- नेट सुरक्षा प्रदाता: भारतीय नौसेना ने 2000 के दशक की शुरुआत में अरब सागर में पायरेसी को रोकने में शानदार भूमिका निभाकर एक ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ (Net security provider) के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की है।
- भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता: विशेषज्ञ समुद्री क्षेत्रों में “हितों के टकराव” को रोकने के लिए द्विपक्षीय चर्चा और नियमों को स्थापित करने की सलाह देते हैं।
- हिंद-प्रशांत का महत्व: यूक्रेन, गाजा और लाल सागर के संकटों के बावजूद हिंद-प्रशांत क्षेत्र भारत की रणनीति का केंद्र बना हुआ है।
- तकनीकी सीमाएँ: भविष्य की रणनीति का ध्यान “अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस” (UDA) और “नीली अर्थव्यवस्था क्रांति” पर होना चाहिए।
- UPSC प्रासंगिकता: “समुद्री सुरक्षा”, “राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति” और “नीली अर्थव्यवस्था नीतियां”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- ऐतिहासिक विरासत: यह विश्लेषण चोल शासकों (समुद्री शेर) से लेकर हिंद-अरब व्यापार मार्गों तक भारत की समुद्री पहुंच का पता लगाता है।
- रणनीति को रिफाइन करना: भारत को अपनी हिंद-प्रशांत दृष्टि को अमेरिका की 2025 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति के आलोक में और बेहतर बनाने की आवश्यकता है, जो चीन को एक प्रतिस्पर्धी के रूप में देखता है।
संपादकीय विश्लेषण
12 जनवरी, 2026Mapping:
यहाँ भारत के बिजली संयंत्रों (तापीय और परमाणु), प्रमुख औद्योगिक समूहों (Industrial Clusters) और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. बिजली संयंत्र: तापीय (Thermal) और परमाणु (Nuclear)
भारत अपनी बढ़ती अर्थव्यवस्था को शक्ति देने के लिए ऊर्जा स्रोतों के मिश्रण पर निर्भर है। ये संयंत्र रणनीतिक रूप से ईंधन स्रोतों या जल निकायों के पास स्थित होते हैं।
परमाणु ऊर्जा संयंत्र (Nuclear Power Plants):
ये बिजली पैदा करने के लिए यूरेनियम का उपयोग करते हैं और अक्सर ठंडा करने के लिए पानी के स्रोतों के पास स्थित होते हैं।
- नरोरा (उत्तर प्रदेश): उत्तरी मैदानों में स्थित।
- रावतभाटा (राजस्थान): राणा प्रताप सागर बांध के पास स्थित।
- काकरापार (गुजरात): पश्चिमी औद्योगिक पट्टी में स्थित।
- तारापुर (महाराष्ट्र): भारत का पहला वाणिज्यिक परमाणु ऊर्जा स्टेशन।
- कैगा (कर्नाटक): दक्षिण-पश्चिमी घाट क्षेत्र में स्थित।
- कुडनकुलम और कलपक्कम (तमिलनाडु): दक्षिण भारत में प्रमुख परमाणु केंद्र।
तापीय ऊर्जा संयंत्र (Thermal Power Plants):
ये कोयला, तेल या गैस जलाकर बिजली पैदा करते हैं।
- नामरूप (असम): उत्तर-पूर्व में एक प्रमुख गैस आधारित संयंत्र।
- सिंगरौली (मध्य प्रदेश): भारत के सबसे बड़े कोयला आधारित संयंत्रों में से एक।
- रामागुंडम (तेलंगाना): दक्षिणी क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण बिजली केंद्र।
2. प्रमुख औद्योगिक समूह (Major Industrial Clusters)
औद्योगिक समूह वे क्षेत्र हैं जहाँ कच्चे माल, श्रम और परिवहन की उपलब्धता के कारण उद्योग केंद्रित होते हैं।
- मुंबई-पुणे क्लस्टर: ऑटोमोबाइल, रसायन और कपड़ों का एक विशाल केंद्र।
- हुगली क्लस्टर (पश्चिम बंगाल): ऐतिहासिक रूप से जूट के लिए और अब इंजीनियरिंग और रसायनों के लिए प्रसिद्ध।
- बैंगलोर-तमिलनाडु क्लस्टर: सूचना प्रौद्योगिकी (IT), इलेक्ट्रॉनिक्स और वैमानिकी (Aeronautics) के लिए भारत का प्राथमिक केंद्र।
- गुजरात क्लस्टर: अहमदाबाद और वडोदरा के आसपास केंद्रित, कपड़ों और पेट्रोकेमिकल्स के लिए प्रसिद्ध।
- छोटा नागपुर क्षेत्र: इसे भारत का ‘खनिज हृदय स्थल’ कहा जाता है, जो भारी लोहा और इस्पात उद्योगों पर केंद्रित है।
3. भारत के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (International Airports)
हवाई अड्डे वैश्विक कनेक्टिविटी और व्यापार के लिए “प्रवेश द्वार” के रूप में कार्य करते हैं।
- इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (दिल्ली): भारत का सबसे व्यस्त हवाई अड्डा, जो राजधानी क्षेत्र की सेवा करता है।
- छत्रपति शिवाजी महाराज अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (मुंबई): पश्चिमी भारत का प्राथमिक प्रवेश द्वार।
- मीनाम्बक्कम (चेन्नई): दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों के साथ कनेक्टिविटी का एक प्रमुख केंद्र।
- नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (कोलकाता): पूर्वी और उत्तर-पूर्वी भारत का मुख्य प्रवेश द्वार।
- राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (हैदराबाद): अपने उन्नत कार्गो और फार्मास्युटिकल (दवा) प्रबंधन के लिए जाना जाता है।
🌍 मानचित्रण सारांश तालिका (Summary Table)
| श्रेणी | मुख्य बिंदु | भौगोलिक स्थिति |
| सबसे पुराना परमाणु संयंत्र | तारापुर | महाराष्ट्र |
| IT औद्योगिक केंद्र | बैंगलोर | कर्नाटक |
| सबसे व्यस्त हवाई अड्डा | दिल्ली (IGI) | उत्तर भारत |
| लोहा और इस्पात केंद्र | छोटा नागपुर | पूर्वी भारत |
💡 मैपिंग टिप:
UPSC के लिए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को उत्तर-से-दक्षिण के क्रम में याद रखें (जैसे: नरोरा → रावतभाटा → काकरापार → तारापुर → कैगा → कलपक्कम → कुडनकुलम)। मानचित्र पर इनकी सटीक स्थिति की पहचान करना महत्वपूर्ण है।
ऊर्जा एवं उद्योग
| श्रेणी | मुख्य विशेषता | भौगोलिक केंद्र |
|---|---|---|
| परमाणु ऊर्जा | तारापुर (सबसे पुराना) | महाराष्ट्र तट |
| IT/इलेक्ट्रॉनिक्स | बेंगलुरु हब | दक्षिणी पठार |
| विमानन | IGI दिल्ली (सबसे व्यस्त) | उत्तर भारत |
| भारी उद्योग | छोटा नागपुर | पूर्वी खनिज पट्टी |