IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 10 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 6 Chapter-9 (खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर)
यह अध्याय “खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर” कृषि के विकास, ग्रामीण समाज की संरचना, और भारतीय उपमहाद्वीप में शुरुआती शहरों और व्यापारिक नेटवर्कों के उदय की व्याख्या करता है।
1. कृषि क्रांति: लोहा और सिंचाई
शक्तिशाली साम्राज्यों की नींव समृद्ध गाँवों का अस्तित्व था। लगभग 2,500 वर्ष पहले कृषि विकास के दो मुख्य कारण थे:
- लोहे का बढ़ता उपयोग: हालाँकि लोहे का उपयोग 3,000 साल पहले शुरू हो गया था, लेकिन 2,500 साल पहले इसका विस्तार हुआ। इनमें जंगलों को साफ करने के लिए कुल्हाड़ियाँ और लोहे के हल के फाल शामिल थे, जो कठोर जमीन में उत्पादन बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण थे।
- सिंचाई के कार्य: राजाओं ने फसल उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए सिंचाई में निवेश किया। इसके तहत नहरें, कुएँ, तालाब और कृत्रिम झीलें बनाई गईं।
- आर्थिक चक्र: बढ़े हुए उत्पादन से किसानों के लिए कर (Tax) देना आसान हुआ, जिससे राजा की सेना और महलों के लिए धन उपलब्ध हुआ।
2. ग्रामीण सामाजिक संरचना
उत्तर और दक्षिण दोनों क्षेत्रों में समाज स्पष्ट रूप से तीन मुख्य समूहों में विभाजित था:
तमिल क्षेत्र (दक्षिण भारत):
- वेल्लालर (Vellalar): ये बड़े भूस्वामी थे।
- उझवार (Uzhavar): साधारण हलवाहे।
- कडैसियार और अडिमई (Kadaisiyar & Adimai): भूमिहीन मज़दूर और दास।
उत्तर भारत:
- ग्राम भोजक (Grama Bhojaka): गाँव का प्रधान, जो अक्सर सबसे बड़ा भूस्वामी होता था। यह पद अनुवांशिक था। वह शक्तिशाली था; वह राजा के लिए कर वसूलता था और न्यायाधीश या पुलिस के रूप में भी कार्य करता था।
- गृहपति (Grihapatis): स्वतंत्र किसान जो ज्यादातर छोटे भूस्वामी थे।
- दास कर्मकार (Dasa Karmakara): वे स्त्री-पुरुष जिनके पास अपनी जमीन नहीं थी और उन्हें दूसरों के खेतों में काम करना पड़ता था।
3. शहरों का उदय और शहरी जीवन
पुरातत्वविद और इतिहासकार शुरुआती शहरों को समझने के लिए कई प्रकार के साक्ष्यों का उपयोग करते हैं:
- जातक (Jatakas): आम लोगों द्वारा रचित कहानियाँ जिन्हें बौद्ध भिक्षुओं द्वारा संरक्षित किया गया। ये शहर के जीवन की झलकियाँ प्रदान करती हैं।
- वलय कूप (Ring Wells): एक-दूसरे के ऊपर रखे गए बर्तनों या सिरेमिक छल्लों की पंक्तियाँ। इनका उपयोग घरों में शौचालय, नाली या कूड़ेदान के रूप में किया जाता था।
- आहत सिक्के (Punch-marked Coins): सबसे पुराने सिक्के, जो लगभग 500 वर्षों तक चलन में रहे। ये चाँदी या तांबे पर प्रतीकों को ठप्पा मारकर (पंच करके) बनाए जाते थे।
- मूर्तिकला: शहरों, गाँवों और जंगलों के दैनिक जीवन के दृश्यों को प्रवेश द्वारों और स्तंभों को सजाने के लिए उकेरा जाता था।
4. विशिष्ट कार्यों वाले शहर
कुछ शहर अपनी विशेष भूमिकाओं के लिए प्रसिद्ध हुए:
- मथुरा: 2,500 से अधिक वर्षों से एक महत्वपूर्ण बस्ती। यह व्यापारिक मार्गों का चौराहा था (उत्तर-पश्चिम से पूर्व और उत्तर से दक्षिण)। यह बेहतरीन मूर्तिकला का केंद्र और बौद्ध धर्म, जैन धर्म और कृष्ण भक्ति का धार्मिक केंद्र था।
- बेरीगाज़ा (भरुच): खंभात की खाड़ी का एक संकरा बंदरगाह। यहाँ शराब और सोने/चाँदी के सिक्कों का आयात होता था, जबकि हिमालयी जड़ी-बूटियाँ, हाथीदांत, रेशम और सूती कपड़े का निर्यात किया जाता था।
- अरिकामेडु: पुडुचेरी में एक तटीय बस्ती। यह एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र था जहाँ रोमन सामान जैसे अम्फोरा (शराब के जार) और आरैटाइन (मुहर लगे इतालवी बर्तन) मिले हैं।
5. शिल्प और वाणिज्य: श्रेणियाँ (Shrenis)
शिल्प उत्पादन बहुत संगठित था, विशेष रूप से कपड़ा निर्माण (वाराणसी और मदुरै जैसे केंद्र)।
- उत्तरी काले चमकीले पात्र (NBPW): एक कठोर, धातु जैसा दिखने वाला मिट्टी का बर्तन जिसकी चमक शीशे जैसी काली होती थी।
- श्रेणी (Shrenis): शिल्पकारों और व्यापारियों द्वारा बनाए गए संघ।
- ये प्रशिक्षण प्रदान करते थे और कच्चा माल जुटाते थे।
- इन्होंने व्यापार का आयोजन किया और बैंकों के रूप में कार्य किया जहाँ अमीर लोग पैसा जमा करते थे।
- इस जमा राशि से प्राप्त ब्याज का उपयोग मठों जैसे धार्मिक संस्थानों की सहायता के लिए किया जाता था।
6. कताई और बुनाई के नियम
अर्थशास्त्र में कार्यशालाओं के लिए सख्त दिशा-निर्देश दिए गए थे:
- ऊन, कपास और रेशम को साफ करने के लिए विधवाओं, दिव्यांगों और सेवानिवृत्त नौकरों को काम पर रखा जाता था।
- जो महिलाएं घर से बाहर नहीं निकल सकती थीं, वे कच्चा माल लाने के लिए दासियों को भेजती थीं।
- गलत व्यवहार के लिए अधिकारियों को दंडित किया जाता था और काम अधूरा रहने पर महिलाओं पर जुर्माना लगाया जाता था।
🌾 खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर
कक्षा-6 इतिहास अध्याय-9 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: खुशहाल गाँव और समृद्ध शहर
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: अनुच्छेद 17, 18 और 19 को समझना
जहाँ अनुच्छेद 17 और 18 अतीत की सामाजिक बाधाओं और ऊंच-नीच को दूर करते हैं, वहीं अनुच्छेद 19 वे सकारात्मक “स्वतंत्रताएँ” प्रदान करता है जो एक नागरिक को जीवंत लोकतंत्र में सक्रिय रूप से भाग लेने की अनुमति देती हैं।
1. अनुच्छेद 17: अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत
अनुच्छेद 17 एक ऐतिहासिक प्रावधान है जिसका उद्देश्य भारत में सबसे गहरी जड़ें जमा चुकी सामाजिक बुराई को समाप्त करना है। यह एक ही वाक्य में समाहित एक “सामाजिक क्रांति” है।
प्रमुख कानूनी पहलू:
- पूर्ण प्रकृति (Absolute Nature): अधिकांश मौलिक अधिकारों के विपरीत, अनुच्छेद 17 ‘पूर्ण’ है। इसके कोई “तर्कसंगत प्रतिबंध” नहीं हैं। किसी भी आधार (धर्म, परंपरा या दर्शन) पर अस्पृश्यता का अभ्यास नहीं किया जा सकता।
- कानूनी समर्थन: अनुच्छेद केवल प्रथा को समाप्त घोषित करता है, लेकिन सजा निर्धारित नहीं करता। इसके लिए संसद ने कानून बनाए हैं:
- नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता के आधार पर अस्पतालों, मंदिरों या दुकानों में प्रवेश से रोकने के लिए दंड का प्रावधान करता है।
- SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: घृणा अपराधों को रोकने और विशेष अदालतों के गठन के लिए एक अधिक कठोर कानून।
- क्षैतिज अनुप्रयोग (Horizontal Application): यह केवल राज्य के विरुद्ध ही नहीं, बल्कि निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी लागू है।
- परिभाषा: उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि “अस्पृश्यता” शब्द का प्रयोग यहाँ इसके शाब्दिक या व्याकरणिक अर्थ में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से विकसित उस ‘प्रथा’ के संदर्भ में किया गया है जो जाति व्यवस्था से जुड़ी है।
2. अनुच्छेद 18: उपाधियों का अंत
गणराज्य के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाए रखने के लिए, राज्य को उपाधियों के माध्यम से “कुलीन वर्ग” या विशेषाधिकार प्राप्त नागरिकों का समूह बनाने से रोका गया है।
चार मुख्य निषेध:
- राज्य की उपाधियाँ: राज्य किसी को कोई उपाधि नहीं देगा। अपवाद: सैन्य और शैक्षणिक विशिष्टताएँ (जैसे जनरल, मेजर, डॉक्टर, प्रोफेसर)।
- विदेशी उपाधियाँ: भारत का कोई भी नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता।
- लाभ के पद पर विदेशी: भारत सरकार के अधीन ‘लाभ के पद’ पर कार्यरत कोई विदेशी व्यक्ति राष्ट्रपति की सहमति के बिना विदेशी उपाधि नहीं ले सकता।
- उपहार और उपलब्धियाँ: लाभ के पद पर आसीन कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति की सहमति के बिना विदेशी राज्य से कोई भेंट या पद स्वीकार नहीं करेगा (विदेशी प्रभाव/भ्रष्टाचार रोकने के लिए)।
भारत रत्न विवाद (बालाजी राघवन बनाम भारत संघ, 1996):
- उच्चतम न्यायालय ने फैसला सुनाया कि राष्ट्रीय पुरस्कार (भारत रत्न, पद्म विभूषण, आदि) पुरस्कार हैं, उपाधियाँ नहीं।
- ये समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं करते क्योंकि ये “योग्यता” (Merit) को मान्यता देते हैं।
- नियम: इन्हें नाम के आगे (Prefix) या पीछे (Suffix) इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसा करने पर पुरस्कार वापस लिया जा सकता है।
3. अनुच्छेद 19: छह मौलिक अधिकारों का संरक्षण
अनुच्छेद 19 को “संविधान की आत्मा” माना जाता है। यह केवल नागरिकों को (विदेशी या निगमों को नहीं) बुनियादी लोकतांत्रिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
छह स्वतंत्रताएँ [अनुच्छेद 19(1)]:
- भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इसमें विचार व्यक्त करने, प्रेस की स्वतंत्रता और सूचना का अधिकार (RTI) शामिल है।
- शांतिपूर्ण सम्मेलन की स्वतंत्रता: बिना हथियारों के शांतिपूर्वक इकट्ठा होने का अधिकार (हड़ताल का अधिकार शामिल नहीं है)।
- संघ बनाने की स्वतंत्रता: संगठन, यूनियन या सहकारी समितियां (97वां संशोधन) बनाने का अधिकार।
- अबाध संचरण की स्वतंत्रता: भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार।
- निवास की स्वतंत्रता: देश के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार।
- व्यवसाय की स्वतंत्रता: कोई भी पेशा चुनने या व्यापार और व्यवसाय करने का अधिकार।
नोट: मूल रूप से इसमें 7वां अधिकार (संपत्ति का अधिकार) भी था, जिसे 44वें संशोधन (1978) द्वारा हटा दिया गया।
तर्कसंगत प्रतिबंध (Reasonable Restrictions):
ये अधिकार निरपेक्ष नहीं हैं। राज्य निम्नलिखित आधारों पर इन पर “तर्कसंगत प्रतिबंध” लगा सकता है:
- भारत की संप्रभुता और अखंडता।
- राज्य की सुरक्षा।
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध।
- सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार या नैतिकता।
- न्यायालय की अवमानना या मानहानि।
प्रमुख मामले:
- Bennett Coleman & Co. v. Union of India: इस मामले ने स्थापित किया कि “प्रेस की स्वतंत्रता” अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न अंग है।
- Shreya Singhal v. Union of India (2015): सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66A को रद्द कर दिया, यह कहते हुए कि यह ऑनलाइन भाषण की स्वतंत्रता को असंवैधानिक रूप से प्रतिबंधित करती है।
- K.S. Puttaswamy v. Union of India: निजता पर चर्चा करते हुए, इसने इस बात पर बल दिया कि अनुच्छेद 19 के तहत प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रताएं अनुच्छेद 21 (जीवन) से परस्पर जुड़ी हुई हैं।
तुलनात्मक सारांश तालिका
| विशेषता | अनुच्छेद 17 | अनुच्छेद 18 | अनुच्छेद 19 |
| प्राथमिक लक्ष्य | सामाजिक कलंक को मिटाना। | वर्ग-पदानुक्रम को हटाना। | व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सशक्त करना। |
| प्रयोज्यता (Applicability) | नागरिक और गैर-नागरिक। | नागरिक और गैर-नागरिक। | केवल नागरिक। |
| अपवाद | पूर्ण (Absolute): कोई अपवाद नहीं। | सैन्य/शैक्षणिक उपाधियाँ दी जा सकती हैं। | सीमित: तर्कसंगत प्रतिबंधों के अधीन। |
🗳️ अनुच्छेद 17, 18 और 19
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (10 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (10 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. प्रवर्तन निर्देश: केंद्रीय एजेंसियों का शस्त्रीकरण
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (संघवाद; शासन के महत्वपूर्ण पहलू, पारदर्शिता और जवाबदेही)।
- संदर्भ: इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के कार्यालय पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापों और केंद्र व पश्चिम बंगाल के बीच उपजे राजनीतिक टकराव की आलोचना।
- मुख्य बिंदु:
- राजनीतिक उपकरण: संपादकीय का तर्क है कि तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सलाहकार संस्था I-PAC पर छापों का समय बताता है कि चुनाव से पहले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को घेरने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का उपयोग किया जा रहा है।
- संस्थागत असंतुलन: एक स्पष्ट प्रवृत्ति देखी जा रही है जहाँ ED, CBI और IT विभाग विपक्षी शासित राज्यों में “अत्यधिक सक्रिय” हैं, लेकिन केंद्र में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ शायद ही कभी कार्रवाई करते हैं।
- चुनावी अखंडता: ऐसी कार्रवाइयाँ चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और सभी के लिए समान अवसर (level playing field) बनाए रखने की संस्थागत क्षमता पर सवाल उठाती हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “केंद्र-राज्य संबंध”, “चुनावी अखंडता” और “संघीय जांच एजेंसियों की भूमिका” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- I-PAC छापा: 8 जनवरी को ED ने कोलकाता में I-PAC के ठिकानों पर तलाशी ली। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि यह 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पार्टी की “आंतरिक रणनीति चुराने” का प्रयास है।
- लोकतंत्र के लिए जोखिम: मुख्य चेतावनी यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए “खेल के नियमों” को तोड़ना सरकारी संस्थानों की अखंडता में जनता के विश्वास को कम करता है।
2. वि-डॉलरकरण (De-dollarisation) का डर: तेल पर अमेरिकी कदम
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध) और GS पेपर 3 (अर्थव्यवस्था; वैश्विक व्यापार और वित्त)।
- संदर्भ: रूस प्रतिबंध विधेयक (Russia Sanctions Bill) का विश्लेषण, जो अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देता है।
- मुख्य बिंदु:
- पेट्रोडॉलर की रक्षा: प्रतिबंधों के प्रति इस आक्रामक रुख को वैश्विक वित्त में अमेरिकी डॉलर की केंद्रीयता को बचाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
- वैकल्पिक व्यवस्था: भारत और चीन जैसे देशों ने ऐसी व्यापारिक व्यवस्थाएं विकसित की हैं जो डॉलर को दरकिनार करती हैं, जैसे रूसी कच्चे तेल के लिए युआन में भुगतान करना।
- चीन से संरचनात्मक चुनौती: इलेक्ट्रिक वाहन (EV) पारिस्थितिकी तंत्र में चीन का प्रभुत्व अमेरिकी तेल वर्चस्व पर आधारित पारंपरिक आर्थिक ढांचे के लिए दीर्घकालिक खतरा है।
- UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक व्यापार गतिशीलता”, “ऊर्जा कूटनीति” और “भारत पर अमेरिकी विदेश नीति का प्रभाव”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- भू-राजनीतिक पुनर्गठन: संपादकीय का तर्क है कि अमेरिकी कदम किसी विशिष्ट भू-राजनीतिक शिकायत को हल करने के बजाय ऊर्जा बाजारों में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से हैं।
- BRICS और समानांतर मुद्रा: BRICS देशों द्वारा विचार की जा रही समानांतर मुद्रा व्यवस्था पारंपरिक डॉलर-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था को और अधिक अस्थिर कर रही है।
3. फलटण मामला: पीड़ित की गरिमा की रक्षा
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; महिलाओं से संबंधित मुद्दे; आपराधिक न्याय प्रणाली)।
- संदर्भ: महाराष्ट्र के फलटण में एक युवा महिला डॉक्टर की आत्महत्या के बाद महिला पीड़ितों की सुरक्षा में व्यवस्थागत विफलताओं पर चर्चा।
- मुख्य बिंदु:
- द्वितीयक प्रताड़ना (Secondary Victimisation): लेख में “दूसरे अपराध” पर प्रकाश डाला गया है—मदद की गुहार लगाने के बाद पीड़ित का सार्वजनिक चरित्र हनन करना।
- संस्थागत विफलता: महाराष्ट्र राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष जैसे सार्वजनिक पदाधिकारियों द्वारा पीड़ित के निजी जीवन के विवरणों का उपयोग करना “अतिरिक्त-न्यायिक पीड़ित शर्मिंदगी” (victim shaming) के रूप में देखा गया है।
- कानूनी संरक्षण: निर्भया अधिनियम (2013) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम पीड़ित के चरित्र को साक्ष्य के रूप में उपयोग करने से रोकते हैं, लेकिन सामाजिक मानसिकता अभी भी पितृसत्तात्मक है।
- UPSC प्रासंगिकता: “महिला सशक्तिकरण”, “अपराधिक न्याय सुधार” और “सामाजिक न्याय”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- मामले का विवरण: डॉक्टर ने अपनी मृत्यु से पहले अपनी हथेली पर लिखे नोट में एक पुलिस अधिकारी द्वारा बलात्कार और उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
- रणनीति: पुलिस और न्यायाधीशों के लिए अनिवार्य संवेदीकरण प्रशिक्षण, पीड़ित को दोषी ठहराने की संस्कृति को समाप्त करना और डिजिटल साक्ष्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है।
4. सोमालीलैंड (Somaliland): एक नया रणनीतिक केंद्र
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित और विकासशील देशों की नीतियों का भारत पर प्रभाव)।
- संदर्भ: दिसंबर 2025 में इज़राइल द्वारा सोमालीलैंड को एक स्वतंत्र संप्रभु राज्य के रूप में मान्यता देने के निर्णय का विश्लेषण।
- मुख्य बिंदु:
- हॉर्न ऑफ अफ्रीका में बदलाव: इज़राइल का यह कदम लाल सागर समुद्री गलियारे के सैन्यीकरण को और बढ़ा सकता है।
- चीन की रणनीतिक दुविधा: सोमालीलैंड को मान्यता मिलना चीन के “वन चाइना” सिद्धांत और बाब अल-मंडेब जलडमरूमध्य में उसके सुरक्षा हितों के लिए चुनौती है।
- स्थिरता बनाम राज्य का दर्जा: सोमालीलैंड के पिछले तीन दशकों की शांति और कार्यात्मक संस्थान सोमालिया की पुरानी अस्थिरता के बिल्कुल विपरीत हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “हिंद-प्रशांत और लाल सागर सुरक्षा” और “चीन की वैश्विक रणनीति”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- ताइवान कारक: सोमालीलैंड के ताइपे के साथ आधिकारिक संबंधों (2020 से) ने इसे चीन के प्रभाव के लिए एक क्षेत्रीय चुनौती बना दिया है।
- वैकल्पिक रसद केंद्र: मान्यता मिलने के बाद सोमालीलैंड जिबूती में चीन के सैन्य अड्डे के पास एक वैकल्पिक सुरक्षा और रसद केंद्र के रूप में उभर सकता है।
5. विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): मताधिकार से वंचित लोग
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (चुनावी सुधार; संवैधानिक निकाय; नागरिकता)।
- संदर्भ: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण पर रिपोर्ट, जहाँ पहले चरण में 58 लाख नाम हटाए गए हैं।
- मुख्य बिंदु:
- पैमाना और मानदंड: 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में पंजीकृत मतदाताओं में 12-13% की गिरावट देखी गई है। नाम हटाने का आधार “ASDD” है—अनुपस्थित (Absent), स्थानांतरित (Shifted), मृत (Dead) और डुप्लिकेट (Duplicate)।
- प्रवासियों पर प्रभाव: औद्योगिक क्षेत्रों और जूट मिल बेल्ट में भारी संख्या में नाम हटाए गए हैं जहाँ प्रवासी श्रमिक काम के कारण अस्थायी रूप से बाहर थे।
- राजनीतिक मुद्दा: जहाँ भाजपा इसे “अवैध बांग्लादेशी मतदाताओं” की पहचान के लिए आवश्यक बताती है, वहीं सबसे अधिक नाम सीमावर्ती जिलों के बजाय कोलकाता महानगर में हटाए गए हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “चुनावी अखंडता”, “प्रवासी मतदाताओं के अधिकार” और “केंद्र-राज्य संबंध”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- प्रक्रियात्मक संकट: रिपोर्ट उन मामलों पर प्रकाश डालती है जहाँ ट्रक ड्राइवरों और जूट मिल श्रमिकों को केवल इसलिए हटा दिया गया क्योंकि वे काम पर बाहर थे।
- दस्तावेजी चुनौतियाँ: जूट मिल बेल्ट के कई निवासियों के पास भूमि रिकॉर्ड या संपत्ति के दस्तावेज नहीं हैं, जो सुनवाई के दौरान नागरिकता साबित करने के लिए मांगे जा रहे हैं।
संपादकीय विश्लेषण
10 जनवरी, 2026Mapping:
यहाँ भारत के जैवमंडल आरक्षित क्षेत्रों (Biosphere Reserves), प्रमुख मृदा प्रकारों (Soil Types) और वनस्पति पेटियों (Vegetation Belts) का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. भारत के जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र (Biosphere Reserves)
जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण और सतत विकास के लिए निर्दिष्ट बड़े संरक्षित क्षेत्र होते हैं। भारत में 18 अधिसूचित जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र हैं, जिनमें से कुछ यूनेस्को (UNESCO) के विश्व नेटवर्क का हिस्सा हैं।
- नीलगिरी (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक): भारत का पहला जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र। यह नीलगिरी तहर और शेर जैसी पूंछ वाले बंदर (Lion-tailed Macaque) के लिए प्रसिद्ध है।
- मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु): एक समुद्री जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र जो समुद्री गाय (डगोंग) और प्रवाल भित्तियों (Coral reefs) के लिए जाना जाता है।
- सुंदरवन (पश्चिम बंगाल): दुनिया का सबसे बड़ा मैंग्रोव वन और रॉयल बंगाल टाइगर का घर।
- नंदा देवी (उत्तराखंड): हिमालय की चोटियों में स्थित, अपनी विशिष्ट अल्पाइन वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध।
- नोकरेक (मेघालय): गारो पहाड़ियों का हिस्सा, यह खट्टे फलों की प्रजातियों और लाल पांडा के लिए प्रसिद्ध है।
- पचमढ़ी (मध्य प्रदेश): इसे “सतपुड़ा की रानी” के रूप में जाना जाता है, यहाँ अद्वितीय गुफा चित्र और घने जंगल पाए जाते हैं।
2. भारत की प्रमुख मृदा (मिट्टी) के प्रकार
भारत की विविध भू-आकृति और जलवायु के कारण उपमहाद्वीप में विभिन्न प्रकार की मृदा का निर्माण हुआ है।
| मृदा का प्रकार | क्षेत्र/राज्य | मुख्य विशेषताएं |
| जलोढ़ मृदा (Alluvial) | भारत-गंगा के मैदान (पंजाब से बिहार) | अत्यधिक उपजाऊ; नदियों द्वारा जमा की गई; गेहूँ और चावल के लिए सर्वोत्तम। |
| काली मृदा (Black Soil) | दक्कन ट्रैप (महाराष्ट्र, गुजरात) | इसे ‘रेगुर’ भी कहा जाता है; नमी सोखने की उच्च क्षमता; कपास की खेती के लिए आदर्श। |
| लाल और पीली मृदा | प्रायद्वीपीय पठार (ओडिशा, छत्तीसगढ़) | लोहे की अधिकता; क्रिस्टलीय चट्टानों में लोहे के प्रसार के कारण इसका रंग लाल होता है। |
| लेटराइट मृदा (Laterite) | पश्चिमी घाट, तमिलनाडु, केरल | भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में तीव्र निक्षालन (Leaching) के कारण निर्मित; काजू और चाय के लिए उपयुक्त। |
| शुष्क/मरुस्थलीय मृदा | राजस्थान, उत्तरी गुजरात | उच्च लवणता और कम जैविक पदार्थ; खेती के लिए भारी सिंचाई की आवश्यकता। |
3. प्राकृतिक वनस्पति पेटियाँ (Natural Vegetation Belts)
भारत की वनस्पति वर्षा की मात्रा और ऊँचाई के अनुसार बदलती रहती है।
- उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen): 200 सेमी से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों (पश्चिमी घाट, लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार) में पाए जाते हैं। ये घने होते हैं और इनके पेड़ एक साथ अपनी पत्तियाँ नहीं गिराते।
- उष्णकटिबंधीय पर्णपाती वन (Tropical Deciduous): भारत में सबसे व्यापक वन प्रकार (इन्हें अक्सर मानसूनी वन कहा जाता है)। ये गर्मियों में 6-8 सप्ताह के लिए अपनी पत्तियाँ गिरा देते हैं।
- पर्वतीय वन (Montane Forests): हिमालय जैसे ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं। ऊँचाई बढ़ने के साथ वनस्पति पर्णपाती से शंकुधारी (Coniferous) में बदल जाती है।
- मैंग्रोव वन (Mangrove): ज्वार-भाटे से प्रभावित तटीय क्षेत्रों (गंगा, महानदी और कृष्णा के डेल्टा) में पाए जाते हैं। इनकी जड़ें पानी में डूबी रहती हैं।
🌍 मानचित्रण सारांश तालिका (Summary Table)
| श्रेणी | मुख्य बिंदु | भौगोलिक केंद्र |
| सबसे पुराना जैवमंडल | नीलगिरी | तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक का जंक्शन |
| कपास के लिए सर्वश्रेष्ठ मृदा | काली मृदा (रेगुर) | दक्कन का पठार |
| सबसे बड़ा मैंग्रोव | सुंदरवन | पश्चिम बंगाल डेल्टा |
| सर्वाधिक वर्षा वाली वनस्पति | उष्णकटिबंधीय सदाबहार | पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्व |
💡 मैपिंग टिप:
UPSC परीक्षा के लिए मृदा के वितरण को वर्षा के वितरण मानचित्र (Rainfall Map) के साथ जोड़कर देखें, इससे याद रखना आसान हो जाता है। उदाहरण के लिए, जहाँ वर्षा सबसे अधिक है, वहाँ लेटराइट या सदाबहार वनस्पति पाई जाती है।
प्रकृति एवं पृथ्वी
| मिट्टी का प्रकार | प्रमुख क्षेत्र | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| जलोढ़ (Alluvial) | सिंधु-गंगा के मैदान | अत्यधिक उपजाऊ; गेहूँ/चावल के लिए उत्तम |
| काली (Regur) | दक्कन ट्रैप | नमी धारण क्षमता; कपास के लिए आदर्श |
| लैटेराइट (Laterite) | पश्चिमी घाट | निक्षालित मृदा; काजू/चाय के लिए उपयुक्त |
| श्रेणी | मुख्य विशेषता | भौगोलिक फोकस |
|---|---|---|
| सबसे पुराना जैवमंडल | नीलगिरि | TN, केरल, कर्नाटक का संगम |
| कपास का हृदय स्थल | काली मिट्टी | दक्कन का पठार (MH/GJ) |
| सबसे बड़ा मैंग्रोव | सुंदरबन | पश्चिम बंगाल डेल्टा |
| उच्च वर्षा वनस्पति | सदाबहार | पश्चिमी घाट एवं पूर्वोत्तर |