यह अध्याय “दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया” बताता है कि औपनिवेशिक काल के दौरान नई पश्चिमी शैलियों, तकनीकों और विषयों के आगमन ने भारत की कला और वास्तुकला को कैसे बदल दिया।

अठारहवीं शताब्दी में, यूरोपीय कलाकारों का एक तांता भारत आया, जो अपने साथ तैल चित्र (Oil Painting) की तकनीक और यथार्थवाद (Realism) की अवधारणा लेकर आए। इससे वे ऐसे चित्र बनाने में सक्षम हुए जो बिल्कुल असली और जीवंत दिखते थे।

  • चित्रकला की इस शैली में भारत को एक विचित्र, ऊबड़-खाबड़ और अनगढ़ भूमि के रूप में दिखाया गया जिसे अभी ब्रिटिश शासन द्वारा “सभ्य” बनाया जाना बाकी था।
  • थॉमस डैनियल और उनके भतीजे विलियम डैनियल इस परंपरा के सबसे प्रसिद्ध परिदृश्य कलाकार थे।
  • उनके काम में अक्सर पारंपरिक भारत की छवियों (जैसे खंडहर) की तुलना ब्रिटिश “आधुनिकीकरण” के प्रतीकों (जैसे नई इमारतें और बेहतर परिवहन) के साथ की जाती थी।
  • ब्रिटिश अधिकारियों और भारतीय राजघरानों के लिए अपनी धन-दौलत, प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शित करने हेतु व्यक्तिचित्र (पोर्ट्रेट) बनवाना एक लोकप्रिय तरीका था।
  • भारतीय लघुचित्र परंपरा के विपरीत, ये पोर्ट्रेट आमतौर पर आदमकद (Life-size) तैल चित्र होते थे।
  • भारतीय शासकों, जैसे अवध के नवाब, ने जोहान जोफ़नी जैसे यूरोपीय चित्रकारों को औपनिवेशिक परिवेश में अपना चित्र बनाने के लिए नियुक्त किया ताकि वे ब्रिटिश शक्ति के साथ अपने जुड़ाव पर जोर दे सकें।
  • इस विधा में ब्रिटिश सैन्य विजय के विभिन्न प्रकरणों को नाटकीय रूप से चित्रित किया जाता था।
  • ये चित्र साम्राज्यवादी प्रचार (Propaganda) का काम करते थे, जो अंग्रेजों को अजेय और सर्वशक्तिमान के रूप में दिखाते थे।
  • मैसूर के टीपू सुल्तान की हार को दर्शाने वाले चित्रों की श्रृंखला इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है, जिन्हें ब्रिटिश विजय का जश्न मनाने के लिए लंदन में प्रदर्शित किया गया था।

ब्रिटिश सत्ता के उदय ने पारंपरिक दरबारी चित्रकारों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया, जिससे उनके संरक्षण और शैली में बदलाव आया।

  • पारंपरिक संरक्षण का पतन: जैसे-जैसे स्थानीय शासकों ने शक्ति खोई, मुर्शिदाबाद जैसे क्षेत्रीय दरबारों के कलाकारों ने यूरोपीय तकनीकों, जैसे परिप्रेक्ष्य (Perspective) और प्रकाश के उपयोग को अपनाना शुरू कर दिया।
  • कंपनी पेंटिंग्स: कई कलाकारों ने सीधे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारियों के लिए काम करना शुरू किया।
    • उन्होंने “कंपनी पेंटिंग्स” तैयार कीं—जिनमें भारतीय पौधों, जानवरों, त्योहारों और व्यवसायों के चित्र थे। अंग्रेज इन्हें एक “अजीबोगरीब” (Exotic) उपनिवेश के दस्तावेज़ और स्मारिका के रूप में इकट्ठा करते थे।

उन्नीसवीं शताब्दी में, कलकत्ता जैसे बढ़ते शहरों में एक व्यापक दर्शक वर्ग की जरूरतों को पूरा करने के लिए लोकप्रिय कला का एक नया रूप उभरा।

  • कालीघाट चित्रकला: कलकत्ता के कालीघाट मंदिर में, पारंपरिक पटुआ (स्क्रॉल पेंटर्स) ने गहरे रंगों और मोटी रेखाओं का उपयोग करके एक नई शैली विकसित की।
  • सामाजिक व्यंग्य: उन्नीसवीं सदी के अंत तक, इन कलाकारों ने उन “बाबूओं” (पश्चिमी रंग में रंगे भारतीयों) का मज़ाक उड़ाना शुरू कर दिया जो ब्रिटिश तौर-तरीकों और जीवनशैली की नकल करते थे।
  • छापाखाना (The Printing Press): लकड़ी के ब्लॉक और लिथोग्राफिक प्रिंटिंग की शुरुआत ने इन चित्रों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की अनुमति दी, जिससे ये गरीबों के लिए भी सुलभ और सस्ते हो गए।
  • फोटोग्राफी: उन्नीसवीं सदी के मध्य में फोटोग्राफी का आगमन हुआ। अंग्रेजों ने इसका उपयोग भारतीय वास्तुकला और 1857 के विद्रोह के बाद के दृश्यों को दर्ज करने के लिए किया।

जैसे-जैसे राष्ट्रवादी आंदोलन ने गति पकड़ी, कलाकारों ने एक ऐसी शैली की तलाश की जो पश्चिमी यथार्थवाद की नकल के बजाय वास्तव में “भारतीय” हो।

  • राजा रवि वर्मा: वे पश्चिमी तैल चित्र तकनीकों को भारतीय पौराणिक और महाकाव्य विषयों के साथ जोड़ने वाले पहले लोगों में से थे। उनके चित्रों के प्रिंट अत्यधिक लोकप्रिय हुए और पूरे भारत के घरों में पाए जाने लगे।
  • अवनिंद्रनाथ टैगोर: उन्होंने रवि वर्मा के पश्चिमी यथार्थवाद को “भौतिकवादी” कहकर खारिज कर दिया।
    • अपने अनुयायियों के साथ, उन्होंने प्रेरणा के लिए अजंता की गुफाओं और मुगल लघुचित्रों की ओर रुख किया। उन्होंने एक आध्यात्मिक और धुंधली शैली बनाई जिसे ‘बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट’ के रूप में जाना गया।

औपनिवेशिक भारत में वास्तुकला का उपयोग ब्रिटिश सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभुत्व को भौतिक रूप से व्यक्त करने के लिए किया गया था।

  • बंबई का कायाकल्प: उन्नीसवीं सदी के मध्य में, बंबई को ‘गॉथिक रिवाइवल’ (Gothic Revival) जैसी यूरोपीय शैलियों का उपयोग करके पुनर्निर्मित किया गया, जिसकी विशेषता नुकीले मेहराब और पत्थर की नक्काशी थी।
  • विक्टोरिया टर्मिनस: यह रेलवे स्टेशन गॉथिक शैली का एक मील का पत्थर है, जिसे यूरोपीय गिरजाघर (Cathedral) जैसा दिखने के लिए डिजाइन किया गया था।
  • इंडो-सारसेनिक शैली: बाद में, अंग्रेजों ने अपनी इमारतों में गुंबद और मीनार जैसे भारतीय तत्वों को शामिल करना शुरू किया ताकि वे खुद को मुगल सम्राटों के वैध उत्तराधिकारी के रूप में पेश कर सकें।
  1. यथार्थवाद (Realism): ऐसी शैली जो चीजों को वैसा ही दिखाती है जैसी वे वास्तव में दिखती हैं।
  2. परिप्रेक्ष्य (Perspective): चित्रकला की वह तकनीक जिससे दूर की चीजें छोटी और पास की चीजें बड़ी दिखाई देती हैं, जिससे गहराई का भ्रम पैदा होता है।
  3. पटुआ: कपड़े या कागज के लंबे रोल पर पेंटिंग करने वाले पारंपरिक कलाकार।
  4. इंडो-सारसेनिक: एक स्थापत्य शैली जिसमें भारतीय और यूरोपीय दोनों तत्व शामिल होते हैं।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 10

दृश्य कलाओं की बदलती दुनिया

शाही सौंदर्यशास्त्र
पिक्चरस्क (मनोरम): डेनियल्स जैसे यूरोपीय कलाकारों ने भारत को एक ऊबड़-खाबड़, “अनगढ़” भूमि के रूप में चित्रित किया जो ब्रिटिश सभ्यता की प्रतीक्षा कर रही थी।
रूप-चित्रण: ब्रिटिश अधिकारियों और नवाबों द्वारा अधिकार और धन की छवि प्रदर्शित करने के लिए आदमकद तेल चित्रों का उपयोग किया गया।
कंपनी चित्रकला
साम्राज्य के स्मृति चिह्न: स्थानीय कलाकारों ने कंपनी अधिकारियों के लिए भारतीय वनस्पतियों, जीवों और त्योहारों को चित्रित करने के लिए परिप्रेक्ष्य और प्रकाश की तकनीक को अपनाया।
राष्ट्रवाद और लोकप्रिय कला
कालीघाट कला: कलकत्ता के पारंपरिक पटुआ कलाकारों ने एक जीवंत शैली विकसित की, जिसने पश्चिमी जीवनशैली की नकल करने वाले “बाबुओं” पर व्यंग्य किया।
राजा रवि वर्मा: उन्होंने पश्चिमी यथार्थवाद और तेल तकनीक को भारतीय पौराणिक कथाओं के साथ जोड़ा, जिससे चित्र हर घर तक सुलभ हो गए।
बंगाल स्कूल: अवनिंद्रनाथ टैगोर ने पश्चिमी यथार्थवाद को त्याग कर अजंता के भित्ति चित्रों और मुगल लघुचित्रों से प्रेरित एक आध्यात्मिक शैली को अपनाया।
औपनिवेशिक वास्तुकला: विक्टोरिया टर्मिनस (गोथिक पुनरुत्थान) जैसी इमारतों में ब्रिटिश प्रभुत्व को भौतिक रूप से स्थापित करने के लिए पत्थर और गुंबदों का उपयोग किया गया।
फोटोग्राफी: वास्तुकला और 1857 के विद्रोह के भयानक परिणामों को दर्ज करने के लिए 19वीं सदी के मध्य में इसका आगमन हुआ।

यथार्थवाद

पेंटिंग की एक शैली जिसका उद्देश्य लोगों और प्रकृति का जीवंत और सटीक चित्रण करना था।

गोथिक पुनरुत्थान

नुकीले मेहराबों वाली वास्तुशिल्प शैली, जिससे इमारतें यूरोपीय गिरजाघरों जैसी दिखती थीं।

लिथोग्राफी

एक मुद्रण प्रक्रिया जिसने आम जनता के लिए सस्ते चित्रों के बड़े पैमाने पर उत्पादन की अनुमति दी।

सत्ता का
कैनवास
दृश्य कलाएँ पहचान का एक युद्धक्षेत्र थीं। शाही प्रचार चित्रों से लेकर बंगाल स्कूल की आध्यात्मिक धुंध तक, कला का उपयोग या तो औपनिवेशिक शासन को उचित ठहराने के लिए किया गया या स्वतंत्रता चाहने वाले राष्ट्र की आत्मा को पुनः प्राप्त करने के लिए।

भारतीय संविधान में “बजट” शब्द का कहीं भी प्रयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय, अनुच्छेद 112 में इसे ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ (Annual Financial Statement) कहा गया है। यह संसद की सबसे महत्वपूर्ण वित्तीय घटना है, क्योंकि भारत की संचित निधि से कोई भी धन संसदीय स्वीकृति के बिना नहीं निकाला जा सकता।

बजट एक वित्तीय वर्ष (1 अप्रैल से 31 मार्च) के लिए भारत सरकार की अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण होता है।

  • अनुच्छेद 112: राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष ‘वार्षिक वित्तीय विवरण’ रखवाएगा।
  • पूर्व सिफारिश: बजट केवल राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के साथ ही लोकसभा में पेश किया जाता है।
  • कानून के बिना कोई कर नहीं: विधि के प्राधिकार के बिना न तो कोई कर लगाया जाएगा और न ही एकत्र किया जाएगा (अनुच्छेद 265)।
  • व्यय का पृथक्करण: बजट में राजस्व खाते (Revenue account) पर होने वाले व्यय को अन्य व्यय से अलग दिखाना अनिवार्य है।

बजट में दो प्रकार के व्यय शामिल होते हैं:

  1. भारत की संचित निधि पर ‘भारित’ व्यय (Expenditure Charged): इन पर संसद में मतदान नहीं होता (केवल चर्चा की जा सकती है)।
    • उदाहरण: राष्ट्रपति, राज्यसभा के सभापति, लोकसभा अध्यक्ष, उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों और CAG के वेतन व भत्ते; सरकार के ऋण भार।
  2. संचित निधि से ‘किए जाने वाले’ व्यय (Expenditure Made/Voted): इन पर संसद में मतदान होता है और इन्हें ‘अनुदान की मांगों’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

बजट को कानून बनने के लिए इन विशिष्ट चरणों से गुजरना पड़ता है:

  1. बजट का प्रस्तुतीकरण: वित्त मंत्री द्वारा ‘बजट भाषण’ के साथ बजट पेश किया जाता है। (2017 से रेल बजट को आम बजट में मिला दिया गया है)।
  2. सामान्य चर्चा: प्रस्तुति के कुछ दिनों बाद, दोनों सदन बजट पर समग्र रूप से चर्चा करते हैं। इस चरण में कोई प्रस्ताव पेश नहीं किया जाता।
  3. विभागीय समितियों द्वारा जाँच: सामान्य चर्चा के बाद संसद 3-4 सप्ताह के लिए स्थगित हो जाती है। इस दौरान 24 विभागीय स्थायी समितियाँ अनुदान की माँगों की विस्तार से जाँच करती हैं।
  4. अनुदान की माँगों पर मतदान: लोकसभा अनुदान की माँगों पर मतदान करती है। (नोट: राज्यसभा को मांगों पर मतदान करने की कोई शक्ति नहीं है)। इसी चरण में ‘कटौती प्रस्ताव’ (Cut Motions) पेश किए जा सकते हैं:
    • नीतिगत कटौती (Policy Cut): मांग की राशि को घटाकर 1 रुपया करना (नीति की अस्वीकृति)।
    • आर्थिक कटौती (Economy Cut): मांग की राशि को एक विशिष्ट सीमा तक कम करना।
    • सांकेतिक कटौती (Token Cut): मांग की राशि में से 100 रुपये कम करना (विशिष्ट शिकायत दर्ज करना)।
  5. विनियोग विधेयक पारित करना (अनुच्छेद 114): यह विधेयक संचित निधि से धन निकालने को कानूनी मान्यता देता है। इस विधेयक में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।
  6. वित्त विधेयक पारित करना (अनुच्छेद 117): यह विधेयक बजट के आय पक्ष (कराधान प्रस्तावों) को कानूनी रूप देता है।

कभी-कभी सरकार को नियमित बजट चक्र के बाहर धन की आवश्यकता होती है:

  • लेखा अनुदान (Vote on Account – अनुच्छेद 116): चूंकि बजट प्रक्रिया में समय लगता है, इसलिए लोकसभा 2 महीने के लिए सरकार चलाने हेतु कुल अनुमान का 1/6 हिस्सा अग्रिम रूप से देती है।
  • अनुपूरक अनुदान (Supplementary Grant – अनुच्छेद 115): जब किसी सेवा के लिए स्वीकृत राशि उस वर्ष के लिए अपर्याप्त पाई जाती है।
  • अतिरिक्त अनुदान (Excess Grant – अनुच्छेद 115): जब स्वीकृत राशि से अधिक धन खर्च हो जाता है। इसे लोकसभा में लाने से पहले लोक लेखा समिति (PAC) द्वारा अनुमोदित किया जाना अनिवार्य है।
  • प्रत्ययानुदान (Vote of Credit – अनुच्छेद 116): राष्ट्रीय आपातकाल (जैसे युद्ध) के कारण किसी अप्रत्याशित मांग को पूरा करने के लिए दिया गया ‘ब्लैंक चेक’।
  1. भारत की संचित निधि (Consolidated Fund – अनुच्छेद 266): सरकार को प्राप्त होने वाला सारा राजस्व, ऋण और ऋण की वसूली इसी में जमा होती है। संसद की अनुमति के बिना यहाँ से पैसा नहीं निकाला जा सकता।
  2. भारत की आकस्मिकता निधि (Contingency Fund – अनुच्छेद 267): यह राष्ट्रपति के अधिकार में होती है। इसका उपयोग अप्रत्याशित खर्चों के लिए किया जाता है, जिसके लिए बाद में संसद की मंजूरी ली जाती है।
  3. भारत का लोक लेखा (Public Account – अनुच्छेद 266): इसमें भविष्य निधि (PF), बचत जमा आदि का पैसा होता है। इसके भुगतान के लिए संसदीय मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती (यह कार्यकारी प्रक्रिया है)।
शब्दअनुच्छेदउद्देश्य
वार्षिक वित्तीय विवरण112मुख्य बजट दस्तावेज।
विनियोग विधेयक114धन निकालने का कानूनी अधिकार।
वित्त विधेयक117कर लगाने और एकत्र करने का अधिकार।
लेखा अनुदान1162 महीने के लिए अग्रिम धन।
अनुपूरक अनुदान115स्वीकृत राशि कम पड़ने पर अतिरिक्त धन।
संचित निधि266सरकार का मुख्य खजाना।

याद रखें कि ‘गिलोटिन’ (Guillotine) वह प्रक्रिया है जिसमें अनुदान की मांगों के लिए आवंटित समय समाप्त होने पर, शेष सभी मांगों को बिना चर्चा के सीधे मतदान के लिए रख दिया जाता है। यह बजट सत्र के अंतिम दिनों में होता है।

वार्षिक वित्तीय विवरण • अनु. 112
सार्वजनिक वित्त और बजट

केंद्रीय बजट

अनुच्छेद 112
इसे वार्षिक वित्तीय विवरण के रूप में संदर्भित किया जाता है। यह वित्तीय वर्ष के लिए अनुमानित प्राप्तियों और व्यय का विवरण है।
भारित व्यय
गैर-मतदेय व्यय (जैसे, राष्ट्रपति/न्यायाधीशों के वेतन)। इस पर चर्चा की अनुमति है लेकिन मतदान नहीं होता है।
बजट पारित होने के चरण
1. प्रस्तुतिकरण: लोकसभा में वित्त मंत्री द्वारा।
2. सामान्य चर्चा: दोनों सदन कुल आंकड़ों पर चर्चा करते हैं।
3. जांच: 24 विभागीय समितियां अनुदान मांगों की जांच करती हैं।
4. मतदान: केवल लोकसभा में किया जाता है।
5. विनियोग विधेयक (अनु. 114): संचित निधि से निकासी को कानूनी रूप देता है।
6. वित्त विधेयक (अनु. 117): कराधान प्रस्तावों को कानूनी रूप देता है।
विशेष अनुदान (अनु. 115-116)
लेखानुदान: 2 महीने के लिए 1/6 हिस्सा अग्रिम अनुदान।
अनुपूरक: वर्तमान सेवा के लिए अतिरिक्त धनराशि।
प्रत्ययानुदान: राष्ट्रीय आपात स्थितियों के लिए ‘ब्लैंक चेक’।

नीतिगत कटौती

मांग को घटाकर 1 रुपया कर दिया जाता है; यह सरकार की नीति की पूर्ण अस्वीकृति को दर्शाता है।

आर्थिक कटौती

व्यय में मितव्ययिता सुनिश्चित करने के लिए मांग को एक विशिष्ट राशि से कम कर दिया जाता है।

सांकेतिक कटौती

मांग को 100 रुपये कम कर दिया जाता है; इसका उपयोग सरकार के खिलाफ विशिष्ट शिकायत व्यक्त करने के लिए होता है।

कानूनी
ढाल
अनुच्छेद 265 के तहत, कानून के अधिकार के बिना कोई कर एकत्र नहीं किया जा सकता है। इसी तरह, विनियोग विधेयक संचित निधि की एकमात्र कुंजी के रूप में कार्य करता है; इसके पारित हुए बिना, सरकार कानूनी रूप से एक रुपया भी खर्च नहीं कर सकती है, जो कार्यपालिका के खजाने पर पूर्ण संसदीय नियंत्रण सुनिश्चित करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (6 फ़रवरी, 2026) दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; पर्यावरण; बुनियादी ढांचा)।

  • संदर्भ: केंद्रीय बजट 2026-27 के जलवायु संबंधी दृष्टिकोण का विश्लेषण और यह परीक्षण कि क्या वित्तीय आवंटन भारत के घोषित लक्ष्यों के अनुरूप हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • CCUS का प्रायोगिक चरण: बजट में ‘कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज’ (CCUS) के लिए पांच वर्षों में 20,000 करोड़ रुपये के परिव्यय का प्रस्ताव दिया गया है, जो इन जटिल प्रौद्योगिकियों के प्रदर्शन चरण (Demonstration phase) में प्रवेश का संकेत देता है।
    • छत पर सौर ऊर्जा (Rooftop Solar) का विस्तार: ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ को बढ़ाकर 22,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जिसका लक्ष्य विकेंद्रीकृत प्रणालियों के माध्यम से भूमि के दबाव और घरेलू ऊर्जा लागत को कम करना है।
    • परमाणु और सौर पंप: लागत को कम करने के लिए परमाणु संयंत्र उपकरणों पर शून्य बुनियादी सीमा शुल्क को 2035 तक बढ़ा दिया गया है, जबकि ‘पीएम-कुसुम’ (सौर पंप) के लिए 5,000 करोड़ रुपये का आवंटन बरकरार रखा गया है।
    • हरित हाइड्रोजन का अंतराल: उच्च नीतिगत महत्वाकांक्षा के बावजूद, हरित हाइड्रोजन पर वास्तविक खर्च मामूली बना हुआ है, जो सरकार के इरादे और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच एक निरंतर अंतर को उजागर करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जलवायु वित्त”, “औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन” और “नवीकरणीय ऊर्जा नीति” से संबंधित विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • निर्यात प्रतिस्पर्धा: यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) के लागू होने के साथ, स्टील और एल्युमीनियम जैसे क्षेत्रों को कार्बन मुक्त बनाना अब केवल एक पर्यावरणीय लक्ष्य नहीं बल्कि व्यापारिक अस्तित्व के लिए अनिवार्य हो गया है।
    • निजी पूंजी की अनिश्चितता: हालांकि कानूनी बदलाव अब परमाणु ऊर्जा में निजी भागीदारी की अनुमति देते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि सुरक्षा, दायित्व और राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं से घिरे इस क्षेत्र में निजी निवेश कितनी तेजी से आएगा।
    • संग्रहण की बाधाएं: संपादकीय का तर्क है कि हालांकि इरादा स्पष्ट है, लेकिन बजट वास्तविक आवंटन पर सतर्क रहता है, जिससे तीव्र डीकार्बोनाइजेशन के लिए आवश्यक निजी पूंजी जुटाने की भारत की क्षमता पर अनिश्चितता बनी रहती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सामाजिक क्षेत्र/स्वास्थ्य; शासन; सरकारी बजट)।

  • संदर्भ: 2026 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में 10 प्रतिशत की नाममात्र वृद्धि और सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2.5 प्रतिशत के दीर्घकालिक लक्ष्य को पूरा करने में इसकी विफलता की समीक्षा।
  • मुख्य बिंदु:
    • बजटीय स्थिरता: कुल स्वास्थ्य आवंटन 1.05 लाख करोड़ रुपये से अधिक है, लेकिन यह सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.26 प्रतिशत और कुल सरकारी खर्च का मात्र 1.9 प्रतिशत है।
    • बायोपार्मा शक्ति (SHAKTI) योजना: पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये की एक प्रमुख पहल, जिसे भारत को ‘बायोलॉजिक्स’ और ‘बायोसिमिलर्स’ के लिए वैश्विक विनिर्माण केंद्र में बदलने के लिए डिजाइन किया गया है।
    • वृद्धों की देखभाल (Geriatric Care) पर ध्यान: सरकार का लक्ष्य बुजुर्गों के लिए 1.5 लाख देखभाल कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करना है, जो गिरती प्रजनन दर के कारण भारत के “वृद्ध राष्ट्र” (Grey Nation) की ओर बढ़ने की वास्तविकता को स्वीकार करता है।
    • किफायती उपचार के उपाय: मरीजों और उनके परिवारों पर वित्तीय बोझ कम करने के लिए कैंसर की 17 दवाओं और कई दुर्लभ बीमारियों के उपचार पर सीमा शुल्क माफ कर दिया गया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा”, “भेषज (फार्मास्युटिकल) अनुसंधान एवं विकास” और “जनसांख्यिकीय बदलाव”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • प्रतिबद्धता का अंतराल: सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने 2025 तक सकल घरेलू उत्पाद के 2.5 प्रतिशत खर्च के लक्ष्य तक पहुँचने से सरकार के इनकार की आलोचना की है, जैसा कि मूल रूप से 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में वादा किया गया था।
    • NHM फंडिंग की चिंता: उपयोग की उच्च दरों के बावजूद, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के वित्तपोषण में गिरावट देखी गई है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता के बारे में डर पैदा हो गया है।
    • संघीय असंतुलन: ऐसी चिंताएं बढ़ रही हैं कि जैसे-जैसे केंद्र स्वास्थ्य वित्तपोषण में अपनी हिस्सेदारी कम कर रहा है, राजकोषीय हस्तांतरण से राष्ट्रीय सुधार के बजाय विभिन्न राज्यों में स्वास्थ्य परिणामों में असमानता पैदा हो सकती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (न्यायपालिका)।

  • संदर्भ: एक कानूनी विद्वतापूर्ण आलोचना कि कैसे भारत की उच्च न्यायपालिका कथित तौर पर विकास के नाम पर पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को “कमजोर” करने में सहायता कर रही है।
  • मुख्य बिंदु:
    • पूर्वव्यापी (Retrospective) मंजूरी: उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में अपने स्वयं के 2025 के निर्णय (वनशक्ति बनाम भारत संघ) को वापस ले लिया, जिसने पहले पूर्वव्यापी पर्यावरणीय मंजूरी पर प्रतिबंध लगा दिया था।
    • EIA का सरलीकरण: गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए, नीतिगत बदलाव अब स्थान और क्षेत्र के विशिष्ट विवरणों के बिना ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ (EIA) करने की अनुमति देते हैं।
    • अरावली की परिभाषा: न्यायालय ने अपने 2010 के रुख से हटते हुए एक ऐसी परिभाषा को स्वीकार किया है जो केवल 100 मीटर से ऊपर की चोटियों की रक्षा करती है, जिससे निचली पहाड़ियों के खनन और शोषण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
    • मैंग्रोव की हानि: न्यायिक अनुमति ने महाराष्ट्र के रायगढ़ में औद्योगिक परियोजनाओं के लिए 158 मैंग्रोव के विनाश की अनुमति दी, जो केवल प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) के “वादे” पर आधारित थी।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA)”, “न्यायिक समीक्षा” और “संवैधानिक जवाबदेही”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संवैधानिक निहितार्थ: संपादकीय का तर्क है कि वर्तमान व्याख्याएं अनुच्छेद 21 के तहत ‘स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार’ और अनुच्छेद 48A के तहत राज्य के कर्तव्य को कमजोर करती हैं।
    • प्रक्रियात्मक अन्याय: बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अक्सर संक्षिप्त सुनवाई के साथ नियामक बाधाओं को पार कर जाती हैं, जिससे पर्यावरणीय अनुपालन को केवल एक “चेकलिस्ट” की तरह माना जा रहा है।
    • वैज्ञानिक विरोधाभास: परिपक्व मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र, जो प्राकृतिक बाढ़ नियंत्रण प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं, उन्हें विकसित होने में दशकों लगते हैं और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर वृक्षारोपण अभियानों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (सुरक्षा; रक्षा प्रौद्योगिकी; भारतीय अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: दशकों में पहली बार रक्षा व्यय में दोहरे अंकों की उछाल का विश्लेषण, जो सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत तक पहुँच गया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • आधुनिकीकरण पर जोर: वायु सेना (32 प्रतिशत वृद्धि) और थल सेना (30 प्रतिशत वृद्धि) को भारी वाहनों और हथियारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए आधुनिकीकरण के लिए महत्वपूर्ण धन प्राप्त हुआ।
    • स्वदेशीकरण: पूंजी अधिग्रहण बजट का 75 प्रतिशत घरेलू उद्योगों के लिए आरक्षित है, जो 2014-15 के बाद से घरेलू उत्पादन में 174 प्रतिशत की वृद्धि का समर्थन करता है।
    • पूंजीगत बनाम राजस्व व्यय: एक उल्लेखनीय बदलाव में, पूंजीगत व्यय (22 प्रतिशत की वृद्धि) ने राजस्व बजट को पीछे छोड़ दिया है, जिससे वर्षों की उपेक्षा समाप्त हुई है।
    • बढ़ता निर्यात: रक्षा निर्यात पिछले साल 23,000 करोड़ रुपये तक पहुँच गया, जो 2014 के 1,000 करोड़ रुपये से मजबूत वृद्धि दर्शाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “आंतरिक सुरक्षा”, “रक्षा में आत्मनिर्भर भारत” और “रणनीतिक योजना”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • L-1 की बाधा: ‘न्यूनतम लागत’ (L-1) नियम अभी भी छोटे पैमाने के उच्च-तकनीकी नवोन्मेषकों (Innovators) के बजाय बड़े उद्योगों का पक्ष लेता है, जबकि आधुनिक सेना के लिए ये नवोन्मेषक अनिवार्य हैं।
    • अंतहीन देरी: पनडुब्बियों के लिए ‘प्रोजेक्ट 75’ (1997 में स्वीकृत) और राफेल सौदा एक ऐसी नौकरशाही व्यवस्था को उजागर करते हैं जहाँ आपूर्ति में दशकों लग जाते हैं।
    • बिखरा हुआ अनुसंधान (R&D): जबकि DRDO के वित्तपोषण में वृद्धि हुई है, भारत का कुल अनुसंधान बजट सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.66 प्रतिशत है, और निजी क्षेत्र का अनुसंधान एवं विकास लगभग नगण्य है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था; राज्यपाल की भूमिका; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल में हालिया उदाहरणों से उत्पन्न एक बहस जहाँ राज्यपालों ने या तो सदन से बहिर्गमन किया या राज्य मंत्रिमंडलों द्वारा तैयार किए गए नीतिगत संबोधनों के चुनिंदा अंशों को ही पढ़ा।
  • मुख्य बिंदु:
    • अनुच्छेद 176 का अधिदेश: संविधान के अनुसार राज्यपाल को वर्ष के पहले सत्र की शुरुआत में राज्य विधानमंडल को संबोधित करना और सरकार के एजेंडे को रेखांकित करना अनिवार्य है।
    • प्रतीकवाद बनाम कार्य: इस संबोधन को बनाए रखने के समर्थकों का तर्क है कि यह राज्यपाल को विधानमंडल के एक अभिन्न अंग (अनुच्छेद 168) के रूप में मान्यता देता है और ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ को दर्शाता है।
    • संवैधानिक संकट: यदि कोई राज्यपाल अनिवार्य संबोधन देने से इनकार करता है, तो इससे सत्र के औपचारिक रूप से शुरू न हो पाने का जोखिम पैदा हो जाता है।
    • वैकल्पिक तंत्र: अनुच्छेद 175 पहले से ही राज्यपालों को लंबित विधानों के संबंध में सदन को संदेश भेजने का एक तरीका प्रदान करता है, जिसमें अनुच्छेद 176 जैसे समारोह की आवश्यकता नहीं होती।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संघवाद विवाद”, “संवैधानिक पदाधिकारी” और “शासन स्थिरता”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कोई विवेकाधीन शक्ति नहीं: नबाम रेबिया मामले (2016) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संबोधन एक कार्यकारी कार्य है जो पूरी तरह से मंत्रिमंडल की “सहायता और सलाह” पर किया जाता है।
    • प्रसादपर्यंत सिद्धांत (Pleasure Doctrine) का टकराव: राष्ट्रपति के विपरीत, जो महाभियोग के अधीन हैं, राज्यपाल राष्ट्रपति (केंद्र) के “प्रसादपर्यंत” पद धारण करते हैं, जिससे वे राज्य विधानमंडल के बजाय नई दिल्ली के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाते हैं।
    • प्रणालीगत सुधार: विशेषज्ञों का सुझाव है कि संबोधन को समाप्त करने के बजाय, ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि राज्यपालों की नियुक्ति और निष्कासन में सुधार किया जाए ताकि उनकी प्राथमिक निष्ठा सत्तारूढ़ दल के बजाय संविधान के प्रति हो।

संपादकीय विश्लेषण

06 फरवरी, 2026
GS-2 स्वास्थ्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अंतराल

व्यय कुल व्यय के 1.9% पर स्थिर। बायोफार्मा SHAKTI और एक “वृद्ध राष्ट्र” के लिए 1.5 लाख जराचिकित्सा देखभाल कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण पर ध्यान।

GS-3 सुरक्षा रक्षा आधुनिकीकरण

रक्षा बजट जीडीपी के 2% तक पहुँचा। घरेलू उद्योग के लिए 75% पूंजीगत बजट का आरक्षण, फिर भी L-1 की बाधाएं उच्च-तकनीकी नवप्रवर्तकों को बाधित करती हैं।

GS-3 पर्यावरण / न्याय न्यायशास्त्र का क्षरण

सुप्रीम कोर्ट ने पिछली तारीख से मंजूरी (Retrospective Clearances) पर प्रतिबंध वापस लिया। अरावली श्रेणियों की नई परिभाषाएं संभावित रूप से निचली चोटियों को खनन शोषण के लिए खोल सकती हैं।

बुनियादी ढांचा: स्वदेशी जहाज निर्माण का रोजगार पर 6.5 गुना गुणक प्रभाव पड़ता है, जो स्वदेशीकरण के माध्यम से विकास को गति देता है।
संघवाद: संघीय असंतुलन तब बढ़ता है जब केंद्र स्वास्थ्य वित्त पोषण में अपनी हिस्सेदारी कम करता है, जिससे राज्यों के परिणामों में विषमता का जोखिम होता है।
संविधान: राज्यपाल “राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत” पद धारण करते हैं, जिससे वे राज्यों की तुलना में संघ के प्रति अधिक जवाबदेह हो जाते हैं।
संरक्षण: परिपक्व मैंग्रोव को विकसित होने में दशकों लगते हैं और उन्हें अलग-अलग स्थानों पर वृक्षारोपण अभियानों द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है।
GS-4
पारिस्थितिक कर्तव्य
सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत: पर्यावरण अनुपालन को औद्योगिक विकास के लिए महज एक “चेकलिस्ट” मानना स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार को कमजोर करता है। पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश पर न्यायिक मंजूरी अनुच्छेद 48A के तहत भविष्य की पीढ़ियों के लिए पारिस्थितिक विरासत को संरक्षित करने के राज्य के नैतिक कर्तव्य का उल्लंघन करती है।

यहाँ सांस्कृतिक भूगोल के विकाससामरिक एयरोस्पेस क्लस्टर और अंतर-क्षेत्रीय संरक्षण पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

6 फरवरी, 2026 तक भारत के पर्यटन भूगोल में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया है, जो पारंपरिक “समुद्र तट बनाम पहाड़” (Beach vs. Hills) के द्वंद्व से आगे बढ़कर अनुभव-आधारित विरासत केंद्रों (Heritage hubs) की ओर बढ़ रहा है।

  • उभरते हुए केंद्रीय केंद्र: अयोध्या (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश), द्वारका (गुजरात) और पुरी (ओडिशा) जैसे शहरों को अब उच्च-मात्रा वाली, साल भर चलने वाली पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं के रूप में मानचित्र पर चिह्नित करें।
  • शिरडी-पंढरपुर बेल्ट का मानचित्रण: महाराष्ट्र के इस प्रमुख तीर्थ गलियारे की स्थिति पहचानें, जो अब एक उच्च-घनत्व वाले “अनुभव-आधारित” (Experience-led) क्षेत्र के रूप में कार्य कर रहा है।
  • रिवरफ्रंट विकास: वाराणसी और महेश्वर के घाटों के किनारे विस्तृत बुनियादी ढांचे के उन्नयन को चिह्नित करें, जहाँ “पवित्र और दैनिक जीवन” को एकीकृत आर्थिक स्थानों के रूप में मैप किया जा रहा है।

6 फरवरी, 2026 को एयरोस्पेस के लिए एक नए ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (CoE) का उद्घाटन किया गया, जिसने वडोदरा को भारत के उच्च-तकनीकी औद्योगिक मानचित्र पर एक प्रमुख बिंदु के रूप में स्थापित किया है।

  • गति शक्ति हब: यह वडोदरा में स्थित गति शक्ति विश्वविद्यालय (GSV) में है, जो परिवहन और रसद (Logistics) पर केंद्रित एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है।
  • सतत विमानन ईंधन (Sustainable Aviation Fuel – SAF): यह केंद्र विशेष रूप से नगर निगम के ठोस कचरे (MSW) से SAF बनाने की तकनीकों का मानचित्रण कर रहा है, जो एक महत्वपूर्ण पर्यावरण-आर्थिक कड़ी है।
  • एयरोस्पेस पारिस्थितिकी तंत्र: वडोदरा को एयरबस-GSV साझेदारी के प्राथमिक केंद्र के रूप में चिह्नित करें, जिसका उद्देश्य वैश्विक एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखला का स्थानीयकरण करना है।

यद्यपि इसकी स्थापना पहले हुई थी, लेकिन करिमपुझा वन्यजीव अभयारण्य को इस तिथि पर “नीलगिरी परिदृश्य” (Nilgiri Landscape) की निरंतरता में इसकी भूमिका के लिए विशेष रूप से रेखांकित किया गया।

  • पारिस्थितिक कड़ी: यह केरल की साइलेंट वैली (शांत घाटी) और तमिलनाडु के मुकुर्थी राष्ट्रीय उद्यान के बीच एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेतु (Bridge) बनाता है।
  • नदी भूगोल: इसका नाम करिमपुझा नदी के नाम पर रखा गया है, जो चालियार नदी की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
  • जनजातीय विरासत: इसे चोलनायक्कन (Cholanaikan) जनजाति के पारंपरिक आवास के रूप में मैप किया गया है, जो पश्चिमी घाट के सबसे अलग रहने वाले शिकारी-संग्राहक समूहों में से एक है।

भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) ने 6 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली में मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ता फिर से शुरू करने की शर्तों पर औपचारिक रूप से हस्ताक्षर किए।

  • छह-देशीय ब्लॉक: अपने मानचित्र पर GCC के सदस्यों को पहचानें: सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन।
  • रणनीतिक चोक पॉइंट: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को भारत को इस व्यापार ब्लॉक से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी (Artery) के रूप में चिह्नित करें।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
नया विरासत केंद्रअयोध्या का कायाकल्पउत्तर प्रदेश
एयरोस्पेस CoEगति शक्ति विश्वविद्यालयवडोदरा, गुजरात
पश्चिमी घाट की कड़ीकरिमपुझा अभयारण्यकेरल (नीलगिरी BR)
व्यापार भूगोलGCC राष्ट्रपश्चिम एशिया / खाड़ी क्षेत्र

सांस्कृतिक केंद्रों को मैप करते समय उनके पास से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों को भी देखें। उदाहरण के लिए, अयोध्या और वाराणसी के बीच की कनेक्टिविटी उत्तर प्रदेश के पूर्वी आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार, वडोदरा की स्थिति दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे (DMIC) पर इसकी सामरिक महत्ता को बढ़ाती है।

मानचित्रण विवरण

सांस्कृतिक केंद्र एवं एयरोस्पेस क्लस्टर
पवित्र भूगोल विरासत-आधारित केंद्र

अयोध्या, उज्जैन और द्वारका जैसे उच्च-आवागमन वाले केंद्रों की ओर झुकाव। महाराष्ट्र में उच्च-घनत्व वाले शिरडी-पंढरपुर तीर्थ बेल्ट पर ध्यान दें।

व्यापारिक गुट GCC FTA की बहाली

6 राष्ट्रों (सऊदी, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान, बहरीन) और होर्मुज जलडमरूमध्य की पहचान करें, जो भारत को खाड़ी से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण ऊर्जा धमनी है।

रणनीतिक एयरोस्पेस हब
वडोदरा सेंटर ऑफ एक्सीलेंस

गति शक्ति विश्वविद्यालय में एयरबस साझेदारी के लिए एक प्राथमिक नोड। मानचित्रण एयरोस्पेस आपूर्ति श्रृंखलाओं के स्थानीयकरण और MSW-से-SAF विमानन ईंधन तकनीक पर केंद्रित है।

अंतर-क्षेत्रीय संरक्षण
करीमपुझा वन्यजीव अभयारण्य

साइलेंट वैली (केरल) और मुकुर्थी (तमिलनाडु) के बीच एक पारिस्थितिक पुल बनाता है। नीलगिरी परिदृश्य में एकांत चोलनायकन जनजाति का आवास।

नदी विरासत

गंगा और नर्मदा नदियों पर वाराणसी और महेश्वर घाटों के साथ बुनियादी ढांचे के मानचित्रण के माध्यम से “पवित्र और रोजमर्रा” को एकीकृत करना।

विरासत केंद्र अयोध्या परिवर्तन (उत्तर प्रदेश)।
एयरोस्पेस हब वडोदरा (गति शक्ति विश्वविद्यालय)।
संरक्षण करीमपुझा अभयारण्य (केरल)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: 2026 का मानचित्रण लॉजिस्टिक्स (गति शक्ति) के साथ पारंपरिक विरासत (पवित्र केंद्रों) के संगम को उजागर करता है। नीलगिरी जैव विविधता गलियारों के विश्लेषण के लिए साइलेंट वैली और मुकुर्थी के बीच संपर्क को देखना आवश्यक है।

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