IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 3 फ़रवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 8 Chapter-7 (बुनकर, लोहा पिघलाने वाले और फैक्ट्री मालिक)
यह अध्याय “बुनकर, लोहा पिघलाने वाले और फैक्ट्री मालिक” ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय हस्तशिल्प और उद्योगों के इतिहास, विशेष रूप से कपड़ा तथा लोहा और इस्पात उद्योगों पर केंद्रित है।
1. भारतीय कपड़े और विश्व बाज़ार
लगभग 1750 के आसपास, अंग्रेजों द्वारा बंगाल पर विजय प्राप्त करने से पहले, भारत दुनिया में सूती कपड़ों का सबसे बड़ा उत्पादक था। भारतीय कपड़े अपनी बेहतरीन गुणवत्ता और बेजोड़ कारीगरी के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे।
कपड़ों के नामों के पीछे का इतिहास
- मलमल (Muslin): यूरोपीय व्यापारियों ने सबसे पहले भारत का बारीक सूती कपड़ा अरब व्यापारियों के पास इराक के मोसुल (Mosul) शहर में देखा था। इसी आधार पर उन्होंने बारीक बुनाई वाले सभी कपड़ों को ‘मलमल’ या ‘मसलिन’ कहना शुरू कर दिया।
- कैलिको (Calico): जब पुर्तगाली मसालों की तलाश में सबसे पहले केरल के कालीकट (Calicut) तट पर उतरे, तो वे वहां से सूती कपड़े भी वापस ले गए। इन कपड़ों को कालीकट के नाम पर ‘कैलिको’ कहा जाने लगा। बाद में सभी सूती कपड़ों को सामान्यतः कैलिको ही कहा जाने लगा।
- छींट (Chintz): यह हिंदी के शब्द ‘छींट’ से निकला है, जिसका अर्थ है रंगीन फूलों के छोटे-छोटे डिजाइन वाला कपड़ा। 1680 के दशक तक इंग्लैंड और यूरोप में भारतीय छींट की भारी मांग थी, क्योंकि इसका आकर्षण और बनावट बहुत सुंदर थी और यह अपेक्षाकृत सस्ता भी था।
- बंडाना (Bandanna): यह हिंदी के ‘बाँधना’ शब्द से बना है। इसका उपयोग गले या सिर पर बाँधने वाले रंगीन छापेदार स्कार्फ के लिए किया जाता था, जिन्हें ‘टाई एंड डाई’ (बाँधने और रंगने) की विधि से बनाया जाता था।
प्रतिस्पर्धा और कैलिको अधिनियम (Calico Act)
18वीं शताब्दी की शुरुआत तक, इंग्लैंड में भारतीय कपड़ों की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि वहां के ऊन और रेशम निर्माताओं ने विरोध करना शुरू कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार ने 1720 में ‘कैलिको अधिनियम’ पारित किया, जिसके तहत इंग्लैंड में छापेदार सूती कपड़ों (छींट) के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई। भारतीय कपड़ों से मुकाबला करने के लिए ब्रिटिश निर्माताओं ने भारतीय डिजाइनों की नकल करना शुरू किया और तकनीकी नवाचारों की तलाश की:
- स्पिनिंग जेनी (1764): जॉन के (John Kaye) द्वारा आविष्कृत इस मशीन ने एक ही मजदूर को एक साथ कई तकलियों पर काम करने की सुविधा दी, जिससे उत्पादन बढ़ गया।
- भाप का इंजन (1786): रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright) के इस आविष्कार ने सूती कपड़े की बुनाई को क्रांतिकारी बना दिया, जिससे बहुत बड़ी मात्रा में और बहुत कम लागत पर कपड़े बुने जाने लगे।
2. बुनकर समुदाय
बुनाई का कौशल विशिष्ट समुदायों के भीतर पीढ़ियों तक हस्तांतरित किया जाता था।
- प्रसिद्ध समुदाय: इनमें बंगाल के तांती, उत्तर भारत के जुलाहे (या मोमिन) और दक्षिण भारत के साले, कैक्कोलार तथा देवांग समुदाय प्रमुख थे।
- श्रम का विभाजन:
- कताई (Spinning): यह मुख्य रूप से महिलाओं का काम था, जो चरखे और तकली का उपयोग करती थीं।
- बुनाई (Weaving): यह काम ज्यादातर पुरुषों द्वारा किया जाता था।
- रंगाई: कपड़ों को रंगने के लिए ‘रंगरेज़’ नामक विशेषज्ञ होते थे।
- छपाई: छापेदार कपड़ा बनाने के लिए ‘चिप्पीगर’ नामक विशेषज्ञ ब्लॉक प्रिंटिंग का काम करते थे।
3. भारतीय कपड़ों का पतन
ब्रिटिश औद्योगिक उत्पादन के उदय ने भारतीय बुनकरों को कई तरह से बर्बाद कर दिया:
- बाज़ार की हानि: 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक ब्रिटिश निर्मित सूती कपड़ों ने भारतीय माल को अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप के पारंपरिक बाज़ारों से बाहर कर दिया।
- भारी सीमा शुल्क: ब्रिटेन में आयात किए जाने वाले भारतीय कपड़ों पर बहुत भारी टैक्स (Tariffs) लगा दिए गए।
- बेरोजगारी: जैसे ही यूरोपीय कंपनियों ने भारतीय माल खरीदना बंद किया, हज़ारों बुनकर (विशेषकर बंगाल के) अपनी आजीविका खो बैठे।
- स्थानीय बाज़ारों में ब्रिटिश कपड़े: 1880 के दशक तक, भारतीयों द्वारा पहने जाने वाले सूती कपड़ों का दो-तिहाई हिस्सा ब्रिटेन में बना होता था।
- राष्ट्रवाद और खादी: हथकरघा बुनाई पूरी तरह खत्म नहीं हुई क्योंकि मशीनों से वैसी बारीक किनारी या पारंपरिक पैटर्न नहीं बनाए जा सकते थे। बाद में महात्मा गांधी ने लोगों से विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करने और ‘खादी’ अपनाने का आह्वान किया, जिससे चरखा भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया।
4. टीपू सुल्तान की तलवार और वुड्स (Wootz) स्टील
भारत में धातु विज्ञान की एक लंबी और गौरवशाली परंपरा थी, जिसका सबसे बेहतरीन उदाहरण टीपू सुल्तान की तलवार है।
- वुड्स स्टील: टीपू की तलवार ‘वुड्स’ नामक विशेष उच्च-कार्बन स्टील से बनी थी, जो पूरे दक्षिण भारत में बनाया जाता था। इस स्टील की विशेषता इसकी धार की मजबूती और उस पर दिखने वाला “बहते पानी” जैसा पैटर्न था, जो लोहे में घुले हुए कार्बन के बेहद छोटे क्रिस्टल से बनता था।
- प्रसिद्ध वैज्ञानिक और वुड्स: महान यूरोपीय वैज्ञानिक माइकल फैराडे ने भी भारतीय वुड्स स्टील की विशेषताओं का चार वर्षों तक अध्ययन किया था।
- प्रगलन (Smelting) की प्रक्रिया: लोहे को मिट्टी की छोटी-छोटी हंडियों में कोयले के साथ मिलाकर और तापमान को नियंत्रित करके यह स्टील तैयार किया जाता था।
स्थानीय प्रगलन का पतन
19वीं शताब्दी में भारत का पारंपरिक लोहा गलाने का शिल्प निम्नलिखित कारणों से समाप्त हो गया:
- वन कानून: औपनिवेशिक सरकार ने आदिवासियों और शिल्पकारों को ‘आरक्षित वनों’ में प्रवेश करने से रोक दिया, जिससे उन्हें कोयला बनाने के लिए लकड़ी या लौह अयस्क मिलना बंद हो गया।
- भारी कर: जहाँ वनों में प्रवेश की अनुमति थी, वहां सरकार प्रत्येक भट्ठी (Furnace) पर बहुत ऊँचा टैक्स वसूलती थी।
- आयातित लोहा: 19वीं सदी के अंत तक, भारतीय लोहारों ने बर्तन बनाने के लिए ब्रिटेन से आने वाले सस्ते लोहे का इस्तेमाल शुरू कर दिया, जिससे स्थानीय लोहे की मांग घट गई।
5. आधुनिक कारखानों का उदय: टिस्को (TISCO)
‘टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी’ (TISCO) की स्थापना भारत में आधुनिक भारी उद्योग की शुरुआत थी।
- अयस्क की खोज: 1904 में, चार्ल्स वेल्ड और दोराबजी टाटा ने अगरिया (Agaria) समुदाय की मदद से राजहरा पहाड़ियों (छत्तीसगढ़) में दुनिया के बेहतरीन लौह अयस्क भंडारों की खोज की।
- जमशेदपुर: कारखाने के लिए सुवर्णरेखा नदी के तट पर एक स्थान चुना गया जहाँ अयस्क के पास ही पानी की पर्याप्त उपलब्धता थी।
- प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव: 1914 में प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने पर टिस्को का तेज़ी से विस्तार हुआ क्योंकि:
- ब्रिटेन से होने वाला स्टील का आयात कम हो गया क्योंकि वहां की फैक्ट्रियाँ युद्ध की जरूरतों को पूरा करने में लगी थीं।
- भारतीय रेलवे ने पटरियों के लिए टिस्को का रुख किया।
- युद्ध के लिए गोलों के खोल और गाड़ियों के पहिये बनाने का काम भी टिस्को को मिला।
- सफलता: 1919 तक ब्रिटिश सरकार टिस्को में बनने वाले स्टील का 90% हिस्सा खुद खरीद रही थी, जिससे यह ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर सबसे बड़ा स्टील उद्योग बन गया।
निष्कर्ष: इस प्रकार, जहाँ ब्रिटिश नीतियों ने भारत के पारंपरिक कपड़ा और लोहा उद्योगों को नुकसान पहुँचाया, वहीं विश्व युद्ध की परिस्थितियों और भारतीय उद्यमियों के साहस ने आधुनिक उद्योगों की नींव रखी।
बुनकर, लोहा पिघलाने वाले और फैक्ट्री मालिक
छींट (Chintz)
हिंदी शब्द ‘छींट’ से निकला; रंगीन फूलदार कपड़ा जिसने यूरोप में एक सनक पैदा कर दी थी।
अगरिया
लोहा पिघलाने वालों का एक समुदाय जिसने टाटा को दुनिया के बेहतरीन लौह अयस्क भंडार तक पहुँचाया।
बंडाना
चमकीले मुद्रित सिर के स्कार्फ जिन्हें ‘बांधना’ (टाई-डाई) विधि के माध्यम से तैयार किया जाता था।
कक्षा-8 इतिहास अध्याय-6 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स:उपनिवेशवाद और शहर
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: भारतीय राजव्यवस्था: संसद की अवधि और सदस्यता
संसद की निरंतरता और उसके सदस्यों की योग्यता व सत्यनिष्ठा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 83, 84 और 102 द्वारा शासित होती है।
1. सदनों की अवधि (अनुच्छेद 83)
राज्यसभा (स्थायी सदन):
- राज्यसभा एक स्थायी सदन है और इसे कभी भी भंग नहीं किया जा सकता।
- यह एक निरंतर चलने वाली संस्था है, लेकिन इसके एक-तिहाई (1/3) सदस्य प्रत्येक दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त हो जाते हैं।
- सदस्यों का कार्यकाल: मूल संविधान में राज्यसभा के सदस्यों का कार्यकाल निर्धारित नहीं किया गया था; इसे संसद पर छोड़ दिया गया था। बाद में, ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (1951)’ के माध्यम से संसद ने सदस्यों का कार्यकाल 6 वर्ष निर्धारित किया।
लोकसभा (अस्थायी सदन):
- लोकसभा का सामान्य कार्यकाल इसकी पहली बैठक की तारीख से 5 वर्ष का होता है।
- 5 वर्ष की अवधि समाप्त होने पर यह स्वतः ही भंग हो जाती है। हालाँकि, राष्ट्रपति को 5 वर्ष पूरे होने से पहले भी इसे किसी भी समय भंग करने का अधिकार है।
- आपातकाल में विस्तार: राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान, संसद कानून बनाकर लोकसभा के कार्यकाल को एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है (ऐसा कितनी भी बार किया जा सकता है)। लेकिन, आपातकाल समाप्त होने के बाद यह विस्तार 6 महीने से अधिक की अवधि के लिए जारी नहीं रह सकता।
2. सदस्यता के लिए योग्यता (अनुच्छेद 84)
संसद का सदस्य (MP) चुने जाने के लिए किसी व्यक्ति के पास निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए:
- वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
- उसे निर्वाचन आयोग द्वारा अधिकृत किसी व्यक्ति के समक्ष शपथ लेनी होगी और उस पर हस्ताक्षर करने होंगे।
- न्यूनतम आयु:
- राज्यसभा के लिए 30 वर्ष से कम नहीं।
- लोकसभा के लिए 25 वर्ष से कम नहीं।
- उसके पास ऐसी अन्य योग्यताएं होनी चाहिए जो संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून (जैसे—जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951) के तहत निर्धारित की गई हों (उदाहरण के लिए: उसे एक पंजीकृत मतदाता होना चाहिए)।
3. सदस्यों की अयोग्यता (अनुच्छेद 102)
यह प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है। संविधान के अनुसार, कोई व्यक्ति संसद सदस्य होने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा यदि:
- लाभ का पद (Office of Profit): वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर हो (मंत्री पद को छोड़कर)।
- विकृत चित्त (Unsound Mind): यदि किसी सक्षम न्यायालय ने उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दिया हो।
- दिवालिया (Insolvent): यदि वह एक ‘अशोधित दिवालिया’ (Insolvent) हो।
- नागरिकता: यदि वह भारत का नागरिक नहीं है, या उसने स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता प्राप्त कर ली है, या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा रखता हो।
- संसदीय कानून: यदि वह संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून (जैसे—RPA 1951) के तहत अयोग्य ठहराया गया हो।
- नोट: RPA 1951 के तहत अयोग्यता के कुछ उदाहरण हैं: चुनावी अपराधों में दोषी होना, 2 या अधिक वर्षों की कैद, भ्रष्टाचार आदि।
निर्णय कौन लेता है? अनुच्छेद 102 के तहत अयोग्यता के प्रश्नों पर राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होता है। हालाँकि, निर्णय लेने से पहले राष्ट्रपति को निर्वाचन आयोग (Election Commission) की राय लेनी अनिवार्य है और वह उसी के अनुसार कार्य करेगा।
4. दलबदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची)
सदस्यों को दलबदल के आधार पर भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है, जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम (1985) द्वारा संविधान की ‘दसवीं अनुसूची’ में जोड़ा गया था:
- स्वेच्छा से त्याग: यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपने राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।
- पार्टी के विरुद्ध मतदान: यदि वह सदन में अपने दल के निर्देशों (व्हिप) के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
- निर्दलीय सदस्य: यदि कोई निर्दलीय निर्वाचित सदस्य किसी भी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
- मनोनीत सदस्य: यदि कोई मनोनीत (Nominated) सदस्य अपने पद ग्रहण के 6 महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है।
निर्णय कौन लेता है? दलबदल के आधार पर अयोग्यता का निर्णय राज्यसभा के मामले में सभापति और लोकसभा के मामले में अध्यक्ष (Speaker) द्वारा लिया जाता है। 1992 में उच्चतम न्यायालय ने व्यवस्था दी कि सभापति/अध्यक्ष का यह निर्णय ‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) के अधीन है।
विस्तृत सारांश तालिका
| विशेषता | राज्यसभा (Rajya Sabha) | लोकसभा (Lok Sabha) |
| प्रकृति | स्थायी (भंग नहीं हो सकती) | अस्थायी (5 वर्ष बाद भंग) |
| कार्यकाल | 6 वर्ष (RPA 1951 के तहत) | 5 वर्ष (सामान्यतः) |
| न्यूनतम आयु | 30 वर्ष | 25 वर्ष |
| अयोग्यता (अनुच्छेद 102) | राष्ट्रपति द्वारा (निर्वाचन आयोग की सलाह पर) | राष्ट्रपति द्वारा (निर्वाचन आयोग की सलाह पर) |
| दलबदल (10वीं अनुसूची) | सभापति (Chairman) द्वारा | अध्यक्ष (Speaker) द्वारा |
💡 परीक्षा के लिए टिप:
हमेशा याद रखें कि ‘अनुच्छेद 102’ (सामान्य अयोग्यता) के लिए निर्णय राष्ट्रपति लेता है, जबकि ‘दसवीं अनुसूची’ (दलबदल) के लिए निर्णय सदन का पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) लेता है। इन दोनों के अंतर को समझना बहुत जरूरी है।
अवधि एवं सदस्यता
अयोग्यता
अनुच्छेद 102 के तहत निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिए जाते हैं। चुनाव आयोग (EC) की सलाह अनिवार्य और बाध्यकारी है।
दलबदल विरोधी
10वीं अनुसूची द्वारा शासित। लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति के पास अंतिम निर्णय लेने की शक्ति होती है।
न्यायिक समीक्षा
दलबदल पर पीठासीन अधिकारी के निर्णय उच्च न्यायालय/उच्चतम न्यायालय द्वारा समीक्षा के अधीन हैं।
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (3 फ़रवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (3 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. एक पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा: राष्ट्रीय सार्वजनिक वस्तु के रूप में आर्द्रभूमि (Wetlands)
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।
- संदर्भ: विश्व आर्द्रभूमि दिवस (2 फरवरी) के अवसर पर विशेषज्ञों ने इस बात को रेखांकित किया है कि भारत में मजबूत कानून होने के बावजूद पिछले तीन दशकों में लगभग 40 प्रतिशत आर्द्रभूमियाँ लुप्त हो गई हैं।
- मुख्य बिंदु:
- कार्यान्वयन का अंतराल: भारत में कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि ‘आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017’ के निरंतर और उच्च गुणवत्ता वाले कार्यान्वयन की कमी है।
- पारिस्थितिक क्षरण: 40 प्रतिशत की हानि के अलावा, शेष बची हुई आर्द्रभूमियों में से लगभग 50 प्रतिशत प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण गंभीर पारिस्थितिक क्षरण के संकेत दे रही हैं।
- आपदा लचीलापन: मैंग्रोव, कीचड़ के मैदान (mudflats) और शहरी आर्द्रभूमियों को “प्रकृति-आधारित बुनियादी ढांचे” के रूप में पहचाना गया है, जिन्हें आपदा न्यूनीकरण के लिए आवश्यक जोखिम बफर माना जाना चाहिए।
- पारंपरिक ज्ञान: वर्ष 2026 का विषय बहाली (restoration) को मजबूत करने के लिए पारंपरिक सामुदायिक ज्ञान, जैसे वायनाड के ‘केनी’ (kenis) या तमिलनाडु के ‘कुलम’ (kulams) का उपयोग करने पर जोर देता है।
- UPSC प्रासंगिकता: “जैव विविधता संरक्षण”, “जलवायु परिवर्तन अनुकूलन” और “भारत में रामसर स्थल” से संबंधित विषयों के लिए अनिवार्य।
- विस्तृत विश्लेषण:
- जलागम शासन (Watershed Governance): विभागीय संकीर्णता (silos) से हटकर जलागम-स्तर के शासन की ओर बढ़ने और “सौंदर्यीकरण” के बजाय “पारिस्थितिक कार्यक्षमता” पर ध्यान केंद्रित करने की तत्काल आवश्यकता है।
- राष्ट्रीय क्षमता मिशन: संपादकीय मौजूदा कौशल अंतराल को पाटने के लिए जल विज्ञान (hydrology), बहाली पारिस्थितिकी और GIS में आर्द्रभूमि प्रबंधकों को प्रशिक्षित करने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की वकालत करता है।
2. व्यापार समझौते में बड़ी सफलता: भारत पर अमेरिकी टैरिफ घटाकर 18% किया गया
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों और राजनीति का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।
- संदर्भ: प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच टेलीफोन पर हुई बातचीत के बाद, अमेरिका ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों पर अपने दंडात्मक टैरिफ (Punitive Tariff) को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमत हो गया है।
- मुख्य बिंदु:
- पारस्परिक कटौती: खबरों के अनुसार, भारत अमेरिका के खिलाफ अपने “टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं” को शून्य करने पर सहमत हो गया है।
- ऊर्जा का केंद्र बदलना (Energy Pivot): एक महत्वपूर्ण बदलाव के तहत, भारत “रूसी तेल खरीदना बंद करने” पर सहमत हो गया है और इसके बजाय संयुक्त राज्य अमेरिका और संभावित रूप से वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदेगा।
- व्यापार प्रतिबद्धता: इस समझौते में भारतीय पक्ष द्वारा 500 बिलियन डॉलर मूल्य के अमेरिकी उत्पादों की खरीद बढ़ाने की प्रतिबद्धता शामिल है।
- सीमा शुल्क तालमेल: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि 2026 के बजट में हालिया सीमा शुल्क (Customs Duty) कटौती एक बड़ी घरेलू सुधार योजना का हिस्सा थी, हालांकि वे अमेरिकी व्यापार मांगों के अनुरूप हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक और आर्थिक संबंध”, “ऊर्जा कूटनीति” और “वैश्विक व्यापार युद्ध” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- द्विपक्षीय तनाव में कमी: यह समझौता उस रिश्ते में एक सकारात्मक मोड़ है जो अगस्त 2025 में 50 प्रतिशत पेनल्टी टैरिफ लगाए जाने के बाद से गंभीर तनाव में था।
- घरेलू प्रभाव: कम किए गए टैरिफ से अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।
3. एक सतर्क प्रोत्साहन: 16वाँ वित्त आयोग और राजकोषीय संघवाद
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध; संवैधानिक निकाय) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (अर्थव्यवस्था)।
- संदर्भ: 16वें वित्त आयोग (FC-16) ने वर्ष 2026-31 के लिए उर्ध्वाधर हस्तांतरण अनुपात (केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी) को 41 प्रतिशत पर बनाए रखने की सिफारिश की है।
- मुख्य बिंदु:
- क्षैतिज फॉर्मूला (Horizontal Formula) में बदलाव: “कर प्रयास” (tax effort) मानदंड को “जीडीपी में योगदान” के माप में बदल दिया गया है, और कुशल राज्यों को पुरस्कृत करने के लिए इसका भार 2.5% से बढ़ाकर 10% कर दिया गया है।
- जनसंख्या का भार: जनसंख्या के आकार के भार में मामूली वृद्धि की गई है, जबकि जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (demographic performance) के भार को कम किया गया है, जो जनसंख्या वृद्धि को देखने के नजरिए में बदलाव को दर्शाता है।
- उपकर और अधिभार का तनाव: आयोग ने केंद्र द्वारा उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) के बढ़ते उपयोग के कारण विभाज्य पूल के सिकुड़ने पर चिंता जताई है, लेकिन उन्हें साझा पूल में शामिल करने की सिफारिश नहीं की है।
- शहरी स्थानीय अनुदान: आयोग ने शहरी स्थानीय निकायों (ULGs) को दिए जाने वाले अनुदान को तीन गुना कर दिया है, जिससे बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए ₹23.5 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “राजस्व साझाकरण तंत्र” और “राज्य की वित्तीय स्वायत्तता” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- क्रमिक पुनर्गठन: तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक राज्यों के लिए लाभ क्रमिक (incremental) है, क्योंकि आयोग उन राज्यों को अचानक बड़े झटके देने से बचना चाहता है जो हस्तांतरण पर बहुत अधिक निर्भर हैं।
- संरचनात्मक असंतुलन: संपादकीय का तर्क है कि सिफारिशें वित्तीय तनाव को तो पहचानती हैं लेकिन संघीय संतुलन बहाल करने के लिए आवश्यक संरचनात्मक परिवर्तनों पर जोर देने में विफल रहती हैं।
4. एक पूर्ण विराम: मासिक धर्म स्वच्छता एक मौलिक अधिकार के रूप में
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (सामाजिक न्याय; स्वास्थ्य; न्यायपालिका) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।
- संदर्भ: उच्चतम न्यायालय के एक ऐतिहासिक निर्णय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य और स्वच्छता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक ‘जीवन और गरिमा के अधिकार’ में समाहित कर दिया है।
- मुख्य बिंदु:
- स्वायत्तता की परिभाषा: न्यायालय ने फैसला सुनाया कि लड़कियों के लिए शारीरिक स्वायत्तता (Bodily autonomy) तभी सार्थक है जब उनके पास कार्यशील शौचालय, पानी और स्वच्छ उत्पादों तक पहुंच हो।
- दंडात्मक उपाय: राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक स्कूल में लिंग-आधारित अलग शौचालय हों; अनुपालन न करने पर निजी स्कूलों की मान्यता रद्द की जा सकती है।
- मासिक धर्म गरीबी (Menstrual Poverty): पीठ ने नोट किया कि सुविधाओं की कमी “मासिक धर्म गरीबी” पैदा करती है, जो लड़कियों को पुरुषों के समान स्तर पर शिक्षा के अधिकार का उपयोग करने से रोकती है।
- कार्यान्वयन अंतराल: हालांकि 15-24 आयु वर्ग की 77.3% महिलाएं अब स्वच्छ तरीकों का उपयोग करती हैं (NFHS-5), लेकिन पात्र महिलाओं का लगभग एक चौथाई हिस्सा अभी भी सहायता के बिना है।
- UPSC प्रासंगिकता: “स्वास्थ्य के प्रति अधिकार-आधारित दृष्टिकोण”, “महिला सशक्तिकरण” और “न्यायिक सक्रियता” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- दायित्व का हस्तांतरण: यह निर्णय लड़कियों द्वारा नियमित रूप से सामना किए जाने वाले “कलंक, रूढ़िवादिता और अपमान” को दूर करने की जिम्मेदारी सीधे राज्य पर डालता है।
- नीतिगत एकीकरण: ‘पैड प्रोजेक्ट’ का आदर्श वाक्य— “मासिक धर्म से एक वाक्य (sentence) समाप्त होना चाहिए, किसी लड़की की शिक्षा नहीं”—इस फैसले के लिए प्रेरणा बना।
5. दृश्य प्रगति, अदृश्य अपवर्जन: बजट 2026-27 और श्रम
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार; सरकारी बजट)।
- संदर्भ: बजट 2026-27 का विश्लेषण एक ऐसे सिद्धांत की ओर संक्रमण का सुझाव देता है जो श्रम अवशोषण (Labour absorption) के बजाय पूंजीगत व्यय (Capex) और ऋण को प्राथमिकता देता है।
- मुख्य बिंदु:
- कैपेक्स (Capex) का सिद्धांत: पूंजीगत व्यय 2020-21 के कुल व्यय के 12% से बढ़कर 22% से अधिक हो गया है। यह अब राजकोषीय नीति की रीढ़ के रूप में कार्य कर रहा है।
- रोजगार का विच्छेद: भारी सार्वजनिक निवेश के बावजूद, युवा NEET दर (वे जो शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में नहीं हैं) 23%-25% के उच्च स्तर पर बनी हुई है।
- संरचनात्मक उलटफेर: विकास सिद्धांत की अवहेलना हो रही है क्योंकि निर्माण क्षेत्र की रोजगार लोच (Employment elasticity) कम हो रही है, जबकि कृषि—जो एक कम उत्पादकता वाला क्षेत्र है—श्रम को फिर से अवशोषित कर रहा है।
- दोहरी अर्थव्यवस्था: एक पूंजी-प्रधान ऊपरी परत जीडीपी विकास को चलाती है, जबकि एक विशाल निचली परत कम उत्पादकता वाली अनौपचारिकता और स्व-रोजगार में समाहित हो रही है।
- UPSC प्रासंगिकता: “रोजगार विहीन विकास” (Jobless Growth), “औद्योगिक उत्पादन संरचना” और “मैक्रो-राजकोषीय रुझान” को समझने के लिए अनिवार्य।
- विस्तृत विश्लेषण:
- बढ़ती खाई: प्रति श्रमिक शुद्ध मूल्यवर्धन (Net value added) में तेजी से वृद्धि हुई है, लेकिन औसत वेतन उस गति से नहीं बढ़ा है। यह बताता है कि दक्षता से होने वाला लाभ श्रम आय के बजाय मुनाफे के रूप में जा रहा है।
- प्राथमिकताओं का पुनर्गठन: रोजगार को अब एक प्राथमिक चर (Variable) के रूप में नहीं देखा जा रहा है जिसे नीति द्वारा बनाया जाए, बल्कि इसे विकास के एक संभावित सह-उत्पाद (By-product) के रूप में छोड़ दिया गया है।
संपादकीय विश्लेषण
03 फरवरी, 2026अमेरिका ने टैरिफ घटाकर 18% किया। भारत रूसी तेल से हटने पर सहमत हुआ और अमेरिकी उत्पादों की $500 बिलियन की खरीद के लिए प्रतिबद्धता जताई।
“जीडीपी में योगदान” के लिए क्षैतिज भार बढ़ाकर 10% किया गया। शहरी स्थानीय निकायों को अनुदान तीन गुना बढ़ाकर ₹23.5 लाख करोड़ किया गया।
युवाओं की NEET दर 23%-25% के उच्च स्तर पर। जीडीपी पूंजी-गहन परत द्वारा संचालित है जबकि श्रम कम उत्पादकता वाले क्षेत्रों में पुनः समाहित हो रहा है।
मानवीय गरिमा
Mapping:
यहाँ केंद्रीय बजट 2026-27 और ‘विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2026’ की घोषणाओं से उत्पन्न होने वाले रणनीतिक भौगोलिक अद्यतनों (Updates) का विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. पर्यावरणीय मानचित्रण: नए रामसर स्थल (Ramsar Sites)
2 फरवरी, 2026 तक भारत का रामसर नेटवर्क आधिकारिक तौर पर 98 स्थलों तक पहुँच गया है, जो एशिया में अग्रणी देश के रूप में इसकी स्थिति को और अधिक सुदृढ़ करता है।
| नया रामसर स्थल | जिला / राज्य | मुख्य विशेषताएं |
| पटना पक्षी अभयारण्य | एटा, उत्तर प्रदेश | यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण लघु आर्द्रभूमि (108.8 हेक्टेयर) है जो पक्षियों की 178 से अधिक प्रजातियों का आश्रय स्थल है; यह ‘सारस क्रेन’ (Sarus Crane) के लिए एक प्रमुख शीतकालीन आवास के रूप में कार्य करता है। |
| छारी-ढंढ (Chhari-Dhand) | कच्छ, गुजरात | यह एक मौसमी मरुस्थलीय आर्द्रभूमि है; यहाँ ‘कैराकल’ (Caracal), मरुस्थलीय लोमड़ी और धूसर भेड़िये (Grey Wolf) जैसी दुर्लभ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। |
2. आर्थिक मानचित्रण: रणनीतिक औद्योगिक एवं खनिज गलियारे
बजट 2026 ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए एक नया “संसाधन मानचित्र” (Resource Map) पेश किया है।
- दुर्लभ मृदा (Rare Earth) गलियारे: दुर्लभ खनिजों जैसे ‘मोनाज़ाइट’ (जिसका उपयोग उच्च श्रेणी के चुंबक बनाने में होता है) के खनन को बढ़ावा देने के लिए ओडिशा, केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विशेष गलियारे नियोजित किए गए हैं।
- पूर्वी तट औद्योगिक गलियारा (ECIC): पूर्वी भारत में विनिर्माण संपर्कों को बढ़ाने के लिए पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक नए ‘नोड’ (Node) की घोषणा की गई है।
- दुर्लभ मृदा स्थायी चुंबक (REPM) केंद्र: इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और एयरोस्पेस के लिए अनिवार्य चुंबकों के निर्माण हेतु रणनीतिक बिंदु।
3. बुनियादी ढांचा मानचित्रण: उच्च गति वाले ‘विकास संवाहक’
शहरी आर्थिक क्षेत्रों को जोड़ने के लिए सात नए उच्च गति रेल (High-speed rail) गलियारों का मानचित्रण किया गया है।
मानचित्र पर चिह्नित किए जाने वाले 7 गलियारे:
- मुंबई – पुणे
- पुणे – हैदराबाद
- हैदराबाद – बेंगलुरु
- हैदराबाद – चेन्नई
- चेन्नई – बेंगलुरु
- दिल्ली – वाराणसी
- वाराणसी – सिलीगुड़ी (यह रणनीतिक रूप से “चिकन नेक” कॉरिडोर को जोड़ने के लिए महत्वपूर्ण है)।
4. विज्ञान एवं विरासत मानचित्रण बिंदु
- राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (National Large Solar Telescope): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास स्थापित किया जा रहा है—यह सौर अनुसंधान के लिए एक प्रमुख उच्च-ऊंचाई वाला मानचित्रण बिंदु है।
- राष्ट्रीय विशाल ऑप्टिकल दूरबीन (30 मीटर): यह नई “विशाल विज्ञान” (Mega Science) बुनियादी ढांचा परियोजना का हिस्सा है।
- पुरातात्विक उन्नयन: 15 विरासत स्थलों का व्यापक विकास किया जाएगा, जिनमें राखीगढ़ी (हरियाणा), धौलावीरा (गुजरात) और लेह पैलेस (लद्दाख) शामिल हैं, ताकि यहाँ आगंतुकों के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं प्रदान की जा सकें।
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| श्रेणी | मानचित्रण मुख्य बिंदु | वर्तमान 2026 का संदर्भ |
| आर्द्रभूमि मील का पत्थर | 98 स्थल | स्थलों की संख्या के मामले में भारत विश्व में तीसरे स्थान पर है। |
| खनिज फोकस | दुर्लभ मृदा गलियारे | ओडिशा से केरल तक फैला 4 राज्यों का बेल्ट। |
| रणनीतिक संपर्क | वाराणसी – सिलीगुड़ी | उत्तर-पूर्व का प्रवेश द्वार, नया उच्च गति रेल मार्ग। |
| सौर विज्ञान केंद्र | पैंगोंग झील | ‘नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप’ का निर्माण स्थल। |
💡 मैपिंग टिप:
UPSC परीक्षा के दृष्टिकोण से, उच्च गति रेल गलियारों को उन औद्योगिक गलियारों (जैसे DMIC) के साथ जोड़कर देखें जिनसे वे गुजरते हैं। इससे आपको आर्थिक और परिवहन भूगोल के अंतर्संबंधों को समझने में मदद मिलेगी।
मानचित्रण विवरण
बजट 2026 एवं संसाधन मानचित्रणसात नए HSR गलियारों का मानचित्रण, विशेष रूप से वाराणसी–सिलीगुड़ी लिंक जो रणनीतिक रूप से ‘चिकन नेक’ को उत्तर भारत के आर्थिक केंद्रों से जोड़ता है।
उन्नत अनुसंधान के लिए पेंगोंग झील, लद्दाख के पास नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप के साथ 30-मीटर ऑप्टिकल टेलिस्कोप की स्थापना।
राखीगढ़ी (HR), धोलावीरा (GJ) और लेह पैलेस सहित 15 स्थलों का उन्नयन ताकि पर्यटन को स्थानिक इतिहास के साथ एकीकृत किया जा सके।