यह अध्याय “यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति” यूरोप में समाजवादी विचारों के उदय और रूस के एक निरंकुश राजतंत्र से दुनिया के पहले समाजवादी राज्य में बदलने की नाटकीय कहानी को दर्शाता है।

फ्रांसीसी क्रांति ने समाज में नाटकीय बदलाव की संभावनाओं के द्वार खोल दिए, जिससे यूरोप में तीन अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण उभरे:

  • उदारवादी (Liberals):
    • वे एक ऐसा राष्ट्र चाहते थे जिसमें सभी धर्मों को बराबर सम्मान और जगह मिले।
    • वे वंशानुगत शासकों की अनियंत्रित सत्ता के विरोधी थे और एक निर्वाचित संसदीय सरकार के पक्ष में थे।
    • उन्होंने शासकों और अधिकारियों से स्वतंत्र एक न्यायपालिका के महत्व पर जोर दिया।
    • हालाँकि, वे “लोकतंत्रवादी” (Democrats) नहीं थे क्योंकि वे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार में विश्वास नहीं करते थे; उनका मानना था कि केवल संपत्ति धारी पुरुषों को ही वोट देने का अधिकार होना चाहिए और वे महिलाओं के लिए वोट के अधिकार के खिलाफ थे।
  • रेडिकल (Radicals):
    • वे ऐसी सरकार चाहते थे जो देश की अधिकांश आबादी के समर्थन पर आधारित हो।
    • वे महिलाओं के मताधिकार आंदोलन (Suffragette movement) के समर्थक थे।
    • वे बड़े जमींदारों और धनी फैक्ट्री मालिकों को मिलने वाले विशेषाधिकारों के विरोधी थे।
    • वे निजी संपत्ति के अस्तित्व के खिलाफ नहीं थे, लेकिन कुछ ही हाथों में संपत्ति के संकेंद्रण (Concentration) को नापसंद करते थे।
  • रूढ़िवादी (Conservatives):
    • 18वीं शताब्दी में वे आमतौर पर परिवर्तन के विचार के विरोधी थे।
    • 19वीं शताब्दी तक उन्होंने स्वीकार किया कि कुछ परिवर्तन अपरिहार्य हैं, लेकिन उनका मानना था कि अतीत का सम्मान किया जाना चाहिए और परिवर्तन की प्रक्रिया धीमी होनी चाहिए।

19वीं शताब्दी के मध्य तक समाजवाद एक प्रसिद्ध विचारधारा बन चुकी थी, जिसकी मुख्य विशेषता निजी संपत्ति का विरोध था।

  • निजी संपत्ति का विरोध: समाजवादियों का मानना था कि निजी संपत्ति ही सभी सामाजिक बुराइयों की जड़ है क्योंकि संपत्ति के मालिक केवल व्यक्तिगत लाभ की चिंता करते थे, न कि उन लोगों के कल्याण की जो उस संपत्ति को उत्पादक बनाते थे।
  • भविष्य की दृष्टि:
    • रॉबर्ट ओवेन: एक अंग्रेज कपड़ा निर्माता, जिन्होंने इंडियाना (USA) में ‘नया समन्वय’ (New Harmony) नामक एक सहकारी समुदाय बनाने की मांग की।
    • लुई ब्लां: फ्रांस में वे चाहते थे कि सरकार सहकारी समितियों (Cooperatives) को प्रोत्साहित करे और पूंजीवादी उद्यमों की जगह ले।
    • कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स: मार्क्स का तर्क था कि औद्योगिक समाज “पूंजीवादी” है और पूंजीपतियों का मुनाफा श्रमिकों द्वारा पैदा किया जाता है। उनका मानना था कि श्रमिकों को एक क्रांतिकारी समाजवादी समाज के निर्माण के लिए पूंजीवाद और निजी संपत्ति को उखाड़ फेंकना होगा जहाँ सारी संपत्ति पर समाज का नियंत्रण हो (साम्यवाद)।

1914 में ज़ार निकोलस II रूस और उसके विशाल साम्राज्य पर शासन कर रहा था, जिसमें आधुनिक फिनलैंड, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया और पोलैंड, यूक्रेन व बेलारूस के हिस्से शामिल थे।

  • आर्थिक स्थिति: रूस एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था था; लगभग 85% आबादी कृषि से अपनी आजीविका कमाती थी, जो फ्रांस या जर्मनी की तुलना में बहुत अधिक थी। किसान बाज़ार और अपनी ज़रूरतों दोनों के लिए उत्पादन करते थे।
  • औद्योगिक स्थिति: उद्योग बहुत कम जगहों पर थे, मुख्य रूप से सेंट पीटर्सबर्ग और मॉस्को में। 1890 के दशक में रूस के रेलवे नेटवर्क के विस्तार और विदेशी निवेश बढ़ने के बाद कई बड़ी फैक्ट्रियाँ स्थापित हुईं।
  • सामाजिक विभाजन: श्रमिक एक विभाजित सामाजिक समूह थे। कुछ का अपने गाँवों से गहरा नाता था, जबकि अन्य शहरों में बस चुके थे। वे कौशल के आधार पर भी विभाजित थे; जैसे—धातु कर्मी खुद को मजदूरों के बीच “कुलीन” मानते थे। विभाजन के बावजूद, वे काम की परिस्थितियों या मालिकों के साथ विवाद होने पर हड़ताल के लिए एकजुट हो जाते थे।

1914 से पहले रूस में सभी राजनीतिक दल अवैध थे।

  • सोशल डेमोक्रेटिक वर्कर्स पार्टी: इसकी स्थापना 1898 में मार्क्सवादी विचारों का सम्मान करने वाले समाजवादियों द्वारा की गई थी। बाद में यह दो समूहों में बंट गई:
    • बोल्शेविक: व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में। उनका मानना था कि ज़ार जैसे दमनकारी समाज में पार्टी अनुशासित होनी चाहिए और अपने सदस्यों की संख्या और गुणवत्ता पर नियंत्रण रखना चाहिए।
    • मेंशेविक: उनका मानना था कि पार्टी सभी के लिए खुली होनी चाहिए (जैसे जर्मनी में थी)।
  • सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी: 1900 में गठित, इसने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और मांग की कि कुलीनों की जमीन किसानों को हस्तांतरित की जानी चाहिए।

रूस एक निरंकुश शासन (Autocracy) था जहाँ ज़ार संसद के अधीन नहीं था।

  • खूनी रविवार (Bloody Sunday): 1905 में पादरी गैपॉन के नेतृत्व में मजदूरों का एक जुलूस अपनी माँगें लेकर ज़ार के ‘विंटर पैलेस’ पहुँचा। उन पर पुलिस ने हमला किया, जिसमें 100 से अधिक मजदूर मारे गए और 300 घायल हुए।
  • परिणाम: इस घटना ने पूरे देश में हड़तालों की लहर पैदा कर दी, जिसके कारण ज़ार को पहली ‘डूमा’ (एक निर्वाचित परामर्शदाता संसद) बनाने की अनुमति देनी पड़ी।

1914 में युद्ध शुरू हुआ। रूस में शुरुआत में युद्ध को बहुत जन-समर्थन मिला, लेकिन जल्द ही परिस्थितियाँ बदल गईं।

  • रूस पर प्रभाव: 1914 और 1916 के बीच जर्मनी और ऑस्ट्रिया में रूसी सेना को भारी हार का सामना करना पड़ा। 1917 तक 70 लाख लोग मारे जा चुके थे और 30 लाख लोग शरणार्थी बन गए थे। युद्ध के कारण श्रम की कमी हो गई और अनाज की भारी किल्लत हो गई, जिससे 1916 की सर्दियों में रोटी की दुकानों पर दंगे आम हो गए।
  • फरवरी क्रांति: फरवरी 1917 में पेट्रोग्राद में भोजन की कमी के कारण फैक्ट्रियों में तालाबंदी और हड़तालें हुईं। सैनिकों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने से मना कर दिया और सोवियत के साथ मिल गए। 2 मार्च को ज़ार ने गद्दी छोड़ दी और डूमा के नेताओं ने एक ‘अंतरिम सरकार’ (Provisional Government) बनाई।
  • अक्टूबर क्रांति: जैसे-जैसे अंतरिम सरकार की शक्ति कम हुई और बोल्शेविकों का प्रभाव बढ़ा, लेनिन ने विद्रोह का आयोजन किया। 24 अक्टूबर को विद्रोह शुरू हुआ; रात तक शहर बोल्शेविक नियंत्रण में था और मंत्रियों ने आत्मसमर्पण कर दिया।
  • बोल्शेविक सुधार: नवंबर 1917 में अधिकांश उद्योगों और बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया। भूमि को सामाजिक संपत्ति घोषित किया गया और किसानों को कुलीनों की जमीन पर कब्जा करने की अनुमति दी गई।
  • गृहयुद्ध: बोल्शेविक विद्रोह का विरोध “गोरों” (ज़ार समर्थकों) और “हरों” (सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी) ने किया, जिन्हें फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका का समर्थन प्राप्त था। अंततः 1920 तक बोल्शेविक विजयी हुए।
  • स्टालिन का सामूहिकीकरण (Collectivisation): अनाज की कमी को दूर करने के लिए, स्टालिन ने 1929 से किसानों को सामूहिक खेती (कोल्खोज़) के लिए मजबूर किया। विरोध करने वालों को कड़ी सजा दी गई या देश निकाला दे दिया गया।
  1. डूमा: रूस की निर्वाचित परामर्शदाता संसद।
  2. सोवियत: मजदूरों और सैनिकों की परिषद।
  3. कुलक: रूस के संपन्न किसान।
  4. राष्ट्रीयकरण: उद्योगों या बैंकों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित होना।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-9
अध्याय – 2

यूरोप में समाजवाद एवं रूसी क्रांति

राजनीतिक विचारधाराएं
उदारवादी: प्रतिनिधि सरकार और व्यक्तिगत अधिकारों के पक्षधर, लेकिन सार्वभौमिक मताधिकार के विरोधी थे।
रेडिकल: ऐसी सरकार के पक्ष में थे जो देश की आबादी के बहुमत के समर्थन पर आधारित हो।
रूढ़िवादी: शुरुआत में बदलाव के विरोधी थे, बाद में अतीत का सम्मान करते हुए धीमी प्रक्रिया को स्वीकार किया।
समाजवादी दृष्टि
कार्ल मार्क्स: उनका तर्क था कि मज़दूरों को पूँजीवाद को उखाड़ फेंकना चाहिए ताकि एक “कम्युनिस्ट” समाज बनाया जा सके जहाँ संपत्ति सामाजिक नियंत्रण में हो।
ज़ारशाही से क्रांति तक
1905 की क्रांति: ‘खूनी रविवार’ की घटना से शुरू हुई; इसके कारण रूस में पहली निर्वाचित परामर्शदाता संसद ‘ड्यूमा’ का गठन हुआ।
फरवरी 1917: पेट्रोग्राद में भोजन की कमी और हड़तालों ने ज़ार निकोलस II को गद्दी छोड़ने पर मजबूर किया, जिससे रोमनोव शासन का अंत हुआ।
अक्टूबर 1917: व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविकों ने अंतरिम सरकार से सत्ता छीन ली और बैंकों व उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया।
गृहयुद्ध: 1920 में बोल्शेविकों की जीत तक ‘रेड्स’ (बोल्शेविक) और ‘व्हाइट्स’ (ज़ार समर्थक) के बीच भीषण संघर्ष चला।
स्टालिन का युग: अनाज संकट को हल करने के लिए 1929 में सामूहिकीकरण (कोलखोज़) शुरू किया गया, किसानों को सरकारी फार्मों में मजबूरन भेजा गया।

बोल्शेविक

लेनिन का अनुशासित बहुमत वाला गुट जिसने एक केंद्रीकृत क्रांतिकारी पार्टी की वकालत की।

खूनी रविवार

1905 में विंटर पैलेस में शांतिपूर्ण मज़दूरों का नरसंहार, जिससे देशव्यापी हड़तालें शुरू हुईं।

कोलखोज़

सामूहिक फार्म जहाँ स्टालिन के शासन में किसानों को ज़मीन और श्रम साझा करने के लिए मजबूर किया गया था।

वैश्विक प्रभाव
रूसी क्रांति ने समाजवादी सिद्धांत को एक वैश्विक वास्तविकता में बदल दिया। इसने पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती दी और दुनिया भर में उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलनों को प्रेरित किया, जिससे 20वीं सदी का राजनीतिक परिदृश्य मौलिक रूप से बदल गया।

अधीनस्थ न्यायालयों को ‘अधीनस्थ’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे संबंधित राज्य के उच्च न्यायालय के प्रशासनिक और न्यायिक अधीक्षण (Superintendence) के अधीन कार्य करते हैं। इनका उल्लेख संविधान के भाग VI के अध्याय VI में किया गया है।

  • शासनादेश: किसी राज्य में जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना (Posting) और पदोन्नति (Promotion) उस राज्य के राज्यपाल द्वारा संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाएगी।
  • पात्रता (Eligibility): वह व्यक्ति जो पहले से ही संघ या राज्य की सेवा में नहीं है, केवल तभी जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए पात्र होगा यदि:
    1. वह कम से कम सात वर्ष तक अधिवक्ता (Advocate) या प्लीडर रहा हो।
    2. उच्च न्यायालय ने उसकी नियुक्ति के लिए सिफारिश की हो।
  • संदर्भ: इसे 20वें संविधान संशोधन अधिनियम (1966) द्वारा जोड़ा गया था।
  • शासनादेश: यह अनुच्छेद उन जिला न्यायाधीशों की नियुक्तियों और उनके द्वारा दिए गए निर्णयों को वैध बनाता है, जिन्हें प्रक्रियात्मक तकनीकी त्रुटियों के कारण अनियमित माना जा सकता था। यह पिछली न्यायिक कार्रवाइयों के लिए एक “रक्षोपाय खंड” (Saving clause) के रूप में कार्य करता है।
  • शासनादेश: यह अनुच्छेद जिला न्यायाधीश के पद से नीचे की ‘न्यायिक सेवा’ (जैसे सिविल जज, मजिस्ट्रेट) की भर्ती से संबंधित है।
  • प्रक्रिया: ये नियुक्तियाँ राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाती हैं। इसके लिए राज्यपाल राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद बनाए गए नियमों के अनुसार कार्य करता है।
  • शासनादेश: यह उच्च न्यायालय के लिए सबसे शक्तिशाली अनुच्छेद है। यह जिला न्यायालयों और उनके अधीनस्थ न्यायालयों पर “नियंत्रण” (Control) की शक्ति उच्च न्यायालय में निहित करता है।
  • नियंत्रण का दायरा: इसमें राज्य की न्यायिक सेवा के व्यक्तियों (जो जिला न्यायाधीश के पद से नीचे के हैं) की पदस्थापना, पदोन्नति और उन्हें छुट्टी (Leave) देने जैसे मामले शामिल हैं।
  • संरक्षण: हालाँकि, यह अनुच्छेद यह सुनिश्चित करता है कि किसी व्यक्ति की अपनी सेवा की शर्तों के अनुसार अनुशासनात्मक कार्रवाइयों के खिलाफ अपील करने का अधिकार सुरक्षित रहे।

यह अनुच्छेद इस अध्याय में उपयोग किए गए शब्दों की कानूनी परिभाषा प्रदान करता है:

  • “जिला न्यायाधीश” (District Judge): इसमें नगर सिविल न्यायालय के न्यायाधीश, अपर जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश, सहायक जिला न्यायाधीश, लघुवाद न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट, सत्र न्यायाधीश और अपर सत्र न्यायाधीश शामिल हैं।
  • “न्यायिक सेवा” (Judicial Service): इसका अर्थ ऐसी सेवा से है जो विशेष रूप से जिला न्यायाधीश के पद और जिला न्यायाधीश के पद से नीचे के अन्य दीवानी न्यायिक पदों को भरने के लिए बनाई गई है।
  • शासनादेश: राज्यपाल लोक अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकता है कि इस अध्याय के प्रावधान (अनुच्छेद 233 से 236) राज्य के किसी भी वर्ग के मजिस्ट्रेटों पर लागू होंगे।
  • उद्देश्य: यह राज्य को कार्यपालक मजिस्ट्रेटों (Executive Magistrates) या अन्य विशेष न्यायिक अधिकारियों को उसी सुरक्षात्मक और प्रशासनिक ढांचे के तहत लाने की अनुमति देता है जो नियमित न्यायिक सेवा के लिए उपलब्ध है।
अनुच्छेदमुख्य विषयशामिल प्राधिकारी
233जिला न्यायाधीशों की नियुक्तिराज्यपाल + उच्च न्यायालय
234निचली न्यायपालिका की भर्तीराज्यपाल + SPSC + उच्च न्यायालय
235अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रणउच्च न्यायालय में निहित
236परिभाषाएँ“जिला न्यायाधीश” और “सेवा” की व्याख्या
237मजिस्ट्रेटों पर लागू होनाराज्यपाल की लोक अधिसूचना

UPSC प्रारंभिक परीक्षा के लिए यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण उच्च न्यायालय के पास होता है, जबकि न्यायाधीशों की नियुक्ति का औपचारिक आदेश राज्यपाल जारी करता है। अनुच्छेद 235 उच्च न्यायालय की स्वतंत्रता और निचले स्तर पर न्यायिक निष्पक्षता सुनिश्चित करने का आधार है।

राज्य न्यायपालिका • भाग VI • अनु. 233-237
अधीनस्थ न्यायपालिका प्रणाली

अधीनस्थ न्यायालय

अनुच्छेद 233
जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति उच्च न्यायालय के परामर्श से राज्यपाल द्वारा की जाती है। इसके लिए अधिवक्ता के रूप में 7 वर्ष का अनुभव आवश्यक है।
अनुच्छेद 235
सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर नियंत्रण (पदस्थापना, पदोन्नति, अवकाश) उच्च न्यायालय में निहित है।
निचली न्यायिक सेवा (अनु. 234)
जिला न्यायाधीश से नीचे के पदों पर भर्ती राज्य लोक सेवा आयोग और उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद राज्यपाल द्वारा की जाती है।
परिभाषाएँ (अनु. 236)
जिला न्यायाधीश: इसमें सिटी सिविल कोर्ट के न्यायाधीश, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, संयुक्त जिला न्यायाधीश और मुख्य प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट शामिल हैं।
न्यायिक सेवा: विशेष रूप से जिला न्यायाधीश और अधीनस्थ नागरिक न्यायिक पदों को भरने के लिए बनाई गई एक सेवा।

अधिमान्यता (233A)

पिछली नियुक्तियों और निर्णयों को मान्य करने के लिए एक “सेविंग क्लॉज” के रूप में कार्य करता है जो तकनीकी कारणों से बाधित हो सकते थे।

मजिस्ट्रेट (237)

राज्यपाल निर्देश दे सकते हैं कि इस अध्याय के प्रावधान राज्य के किसी भी श्रेणी के मजिस्ट्रेट पर लागू हों।

HC पर्यवेक्षण

न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उच्च न्यायालय न्यायिक और प्रशासनिक दोनों तरह का अधीक्षण बनाए रखता है।

सुरक्षा
कवच
अधीनस्थ न्यायालय भारतीय न्यायपालिका की नींव हैं। प्रशासनिक नियंत्रण कार्यपालिका के बजाय उच्च न्यायालय (अनु. 235) में निहित करके, संविधान यह सुनिश्चित करता है कि निचली न्यायपालिका स्वतंत्र रहे और पदस्थापना एवं पदोन्नति जैसे दैनिक कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रहे।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (11 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आईटी और कंप्यूटर; अर्थव्यवस्था) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: “एआई उछाल” (AI surge) का एक विश्लेषण और यह परीक्षण कि क्या मानवीय संस्थाएं, नैतिकता और कानूनी ढांचे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की इस घातीय (exponential) वृद्धि के साथ तालमेल बिठा सकते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • हार्डवेयर की सीमा: एआई के इस उछाल का मुख्य कारण कंप्यूटिंग शक्ति (Compute power) में बड़े पैमाने पर किया जा रहा निवेश है। अनुमान है कि एआई डेटा केंद्रों को चलाने के लिए छोटे देशों के बराबर ऊर्जा की आवश्यकता होगी।
    • आर्थिक विस्थापन: हालांकि एआई उत्पादकता बढ़ाने का वादा करता है, लेकिन संपादकीय मध्यम स्तर की बौद्धिक नौकरियों (Cognitive jobs) के खत्म होने की चेतावनी देता है, विशेष रूप से कोडिंग, कानूनी अनुसंधान और सामग्री निर्माण (Content creation) के क्षेत्रों में।
    • विश्वास की कमी: परिष्कृत ‘डीपफेक’ (Deepfakes) और एआई-जनित गलत सूचनाओं के प्रसार से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की अखंडता और व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरा पैदा हो रहा है।
    • रणनीतिक संप्रभुता: वैश्विक शक्ति तेजी से कुछ “एआई महाशक्तियों” (देशों और निगमों) के हाथों में केंद्रित हो रही है, जो ‘ग्लोबल साउथ’ (Global South) के लिए एक नया डिजिटल विभाजन पैदा कर रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “औद्योगिक क्रांति 4.0”, “डिजिटल नैतिकता” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • ऊर्जा और स्थिरता: संपादकीय एआई की “छिपी हुई पर्यावरणीय लागत” पर प्रकाश डालता है। इसमें उल्लेख किया गया है कि एक एकल ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल’ (LLM) को प्रशिक्षित करने में उतना पानी खर्च हो सकता है जितना 3,000 लोग एक वर्ष में उपयोग करते हैं।
    • नियामक विलंब (Regulatory Lag): वर्तमान विधायी प्रयास (जैसे यूरोपीय संघ का एआई अधिनियम) अक्सर प्रतिक्रियात्मक होते हैं; लेख “अग्रिम शासन” (Anticipatory Governance) की वकालत करता है जो डिजाइन चरण में ही सुरक्षा मानकों को शामिल करता है।
    • मानव-केंद्रित एआई: लक्ष्य मानव एजेंसी को प्रतिस्थापित करना नहीं बल्कि “संवर्धित बुद्धिमत्ता” (Augmented Intelligence) होना चाहिए, जहाँ एआई उपकरणों का उपयोग जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सेवा और संसाधन प्रबंधन जैसी जटिल समस्याओं को हल करने के लिए किया जाए।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार)।

  • संदर्भ: एक दुर्लभ संसदीय घटनाक्रम में, संयुक्त विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ पक्षपाती व्यवहार का आरोप लगाते हुए उन्हें हटाने का नोटिस दिया है।
  • मुख्य बिंदु:
    • संवैधानिक आधार: संविधान के अनुच्छेद 94(c) के तहत, लोकसभा के तत्कालीन सभी सदस्यों के बहुमत से पारित प्रस्ताव द्वारा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है, बशर्ते कि 14 दिन का पूर्व नोटिस दिया गया हो।
    • पक्षपात के आरोप: विपक्ष ने बार-बार माइक्रोफोन बंद करने, विपक्ष के नेता की टिप्पणियों को चुनिंदा रूप से कार्यवाही से हटाने और प्रधानमंत्री के उत्तर के बिना ही ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पारित करने जैसे मुद्दों को आधार बनाया है।
    • अध्यक्ष का बचाव: सत्ता पक्ष का तर्क है कि अध्यक्ष ने अभूतपूर्व व्यवधानों के बीच सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपनी नियमों पर आधारित विवेकाधीन शक्तियों के भीतर कार्य किया है।
    • प्रक्रियात्मक गतिरोध: यह प्रस्ताव सदन में जारी तनाव को और बढ़ाता है, जिसके कारण वर्तमान सत्र में कई दिनों तक कोई कामकाज नहीं हो पाया है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “संसदीय प्रक्रियाएं”, “लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका और निष्पक्षता” तथा “विधायी जवाबदेही”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संस्थागत अखंडता: अध्यक्ष संसदीय लोकतंत्र की धुरी (Linchpin) होता है। संपादकीय का तर्क है कि जब अध्यक्ष की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं, तो पूरी विधायी प्रक्रिया की वैधता दांव पर लग जाती है।
    • ऐतिहासिक मिसालें: भारतीय इतिहास में ऐसे प्रस्ताव अत्यंत दुर्लभ हैं (जैसे 1954 में जी.वी. मावलंकर के खिलाफ)। भले ही इनके पारित होने की संख्यात्मक संभावना कम हो, लेकिन ये एक महत्वपूर्ण “राजनीतिक संकेत” के रूप में कार्य करते हैं।
    • परंपरा की भूमिका: लेख सुझाव देता है कि वर्तमान संकट अध्यक्ष और विपक्ष के बीच अनौपचारिक संवाद और परामर्श की परंपरा के टूटने का परिणाम है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (द्विपक्षीय संबंध)।

  • संदर्भ: गारमेंट (तैयार कपड़ों) के निर्यात के लिए अमेरिका और बांग्लादेश के बीच एक नई तरजीही व्यापार व्यवस्था (Preferential Trade Arrangement) ने भारतीय कपड़ा निर्माताओं के बीच चिंता पैदा कर दी है।
  • मुख्य बिंदु:
    • प्रतिस्पर्धात्मक अंतराल: यह समझौता बांग्लादेश के परिधान निर्यात को अमेरिकी बाजार में कम शुल्क की सुविधा देता है, जिससे भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं, क्योंकि नए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत भारतीय उत्पादों पर 18% टैरिफ लागू है।
    • इनपुट-आउटपुट लिंक: बांग्लादेश भारतीय कपास और सूत (Yarn) के लिए एक प्रमुख बाजार है। यदि अमेरिकी समझौता कच्चे माल की “स्थानीय सोर्सिंग” (Local sourcing) को अनिवार्य बनाता है, तो भारत के सूत निर्यात को भारी नुकसान हो सकता है।
    • क्षेत्रीय असंतुलन: अमेरिका के इस कदम को ढाका में अंतरिम सरकार का समर्थन करने और चीनी आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकल्प प्रदान करने के तरीके के रूप में देखा जा रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतर्राष्ट्रीय व्यापार”, “कपड़ा क्षेत्र की चुनौतियां” और “दक्षिण एशियाई आर्थिक एकीकरण”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • समान अवसर (Level Playing Field): भारतीय निर्यातक “पारस्परिक समानता” की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि भारत के उच्च पर्यावरणीय और श्रम मानकों को मूल्य-संवर्धन (Value-addition) के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
    • विविधीकरण की आवश्यकता: संपादकीय सुझाव देता है कि भारत को बुनियादी परिधानों पर निर्भरता कम करने के लिए ‘तकनीकी वस्त्र’ (Technical textiles) और मानव निर्मित फाइबर (Man-made fibers) की ओर बढ़ना चाहिए।
    • रणनीतिक व्यापार नीति: यह स्थिति भारत के लिए ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ अपने स्वयं के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) को तेजी से पूरा करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा; सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: मणिपुर के उखरुल जिले में हुई ताज़ा हिंसा के कारण इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया गया है और कर्फ्यू लगा दिया गया है, जो राज्य की नाजुक सुरक्षा स्थिति को दर्शाता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • क्षेत्रीय घर्षण: ताज़ा संघर्ष ‘तंगखुल नागा’ और ‘कुकी-ज़ो’ समुदायों के बीच भूमि विवाद और स्थानीय क्षेत्राधिकार को लेकर है।
    • डिजिटल ब्लैकआउट: इंटरनेट पर प्रतिबंध का उद्देश्य भड़काऊ सामग्री और अफवाहों के प्रसार को रोकना है जो अन्य जिलों में प्रतिशोधात्मक हिंसा को जन्म दे सकते हैं।
    • राज्य की क्षमता: लोकप्रिय सरकार की वापसी के बावजूद, राज्य मशीनरी कई जातीय दरारों (मैतेई-कुकी और नागा-कुकी) को प्रबंधित करने में अत्यधिक दबाव में दिख रही है।
    • नागा शांति प्रक्रिया: उखरुल जैसे नागा बहुल क्षेत्रों में तनाव केंद्र और नागा समूहों के बीच चल रही “फ्रेमवर्क एग्रीमेंट” वार्ता को जटिल बनाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पूर्वोत्तर में आंतरिक सुरक्षा”, “जातीय संघर्ष” और “संकट प्रबंधन”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • बफर जोन का प्रभाव: सुरक्षा विश्लेषकों का सुझाव है कि “बफर जोन” के निर्माण ने अनजाने में समुदायों के बीच “किलेबंदी” (Fortification) कर दी है, जिससे एक-दूसरे के क्षेत्र में आवाजाही हिंसा का कारण बन रही है।
    • नागरिक समाज की भूमिका: सामुदायिक बुजुर्गों और नागरिक संगठनों की शांति स्थापित करने में विफलता राज्य में “मध्यम मार्ग के कट्टरपंथ” (Radicalization of the middle ground) की ओर इशारा करती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी)।

  • संदर्भ: एक वैज्ञानिक लेख जो गगनयान और नासा के SLS जैसे आधुनिक अंतरिक्ष मिशनों में “ड्राई ड्रेस रिहर्सल” और “वेट ड्रेस रिहर्सल” (WDR) के बीच के अंतर को समझाता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • ड्राई ड्रेस रिहर्सल (Dry Dress Rehearsal): इसमें बिना ईंधन भरे लॉन्च काउंटडाउन का पूर्ण अनुकरण (Simulation) किया जाता है। यह संचार, लॉजिक फ्लो और निर्णय लेने की प्रक्रिया का परीक्षण करता है।
    • वेट ड्रेस रिहर्सल (WDR): यह अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है जहाँ रॉकेट में वास्तविक ‘क्रायोजेनिक प्रोपेलेंट्स’ (तरल ऑक्सीजन/हाइड्रोजन) भरे जाते हैं ताकि अत्यधिक ठंड में लीकेज की जाँच की जा सके।
    • क्रायोजेनिक चुनौतियां: केवल WDR ही सील या वाल्व में “क्रायो-लीक” का पता लगा सकता है जो केवल तभी प्रकट होते हैं जब घटक -183°C से -253°C तापमान के कारण सिकुड़ जाते हैं।
    • जोखिम न्यूनीकरण: ये पूर्वाभ्यास टीमों को जमीन पर “सुरक्षित रूप से विफल” (Fail safely) होने की अनुमति देते हैं, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि रॉकेट छोड़ने से पहले हार्डवेयर की खामियों को पकड़ा जा सके।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतरिक्ष मिशन प्रक्रियाएं”, “क्रायोजेनिक इंजन तकनीक” और “वैज्ञानिक सुरक्षा प्रोटोकॉल”।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सांख्यिकीय महत्व: आधुनिक रॉकेट इतने जटिल हैं कि लगभग 40% लॉन्च देरी (Scrubs) उन मुद्दों के कारण होती है जिन्हें WDR के दौरान या उसके ठीक बाद पहचाना जाता है।
    • इसरो की सटीकता: चूंकि भारत मानवयुक्त मिशन (गगनयान) की तैयारी कर रहा है, इसलिए “एकीकृत पूर्वाभ्यास” (Integrated Rehearsals) में महारत हासिल करना अंतरिक्ष में मानव सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतिम मोर्चा है।

संपादकीय विश्लेषण

11 फरवरी, 2026
GS-3 विज्ञान एवं तकनीक आगामी AI उछाल

डेटा केंद्रों की बिजली की ज़रूरतें अब छोटे देशों के बराबर। संज्ञानात्मक रोजगार विस्थापन के प्रबंधन के लिए अग्रिम शासन पर ध्यान।

GS-3 अर्थव्यवस्था कपड़ा व्यापार युद्ध

अमेरिका-बांग्लादेश परिधान समझौता भारतीय निर्यात को कम कर रहा है। भारतीय कपास और यार्न बाजारों पर 18% टैरिफ के दबाव से क्षेत्र संकट में।

GS-3 अंतरिक्ष तकनीक रॉकेट रिहर्सल: वेट बनाम ड्राई

WDR ने -253°C पर क्रायो-लीक की पहचान की। महत्वपूर्ण “फेल सेफ” प्रोटोकॉल जहाँ 40% लॉन्च विफलता को पहले ही रोका जाता है।

शासन: एक बड़े AI मॉडल के प्रशिक्षण में 3,000 लोगों के वार्षिक उपयोग के बराबर पानी खर्च होता है।
संसद: अध्यक्ष लोकतंत्र की “धुरी” है; विधायी वैधता के लिए निष्पक्ष आचरण महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था: क्षेत्रीय असंतुलन का सामना कर रहे परिधान खंडों पर निर्भरता कम करने के लिए भारत को तकनीकी वस्त्रों की ओर बढ़ना चाहिए।
सुरक्षा: “बफर ज़ोन” के निर्माण से अनजाने में सांप्रदायिक सुदृढ़ीकरण हुआ है, जिससे राजनीतिक संवाद रुक गया है।
GS-4
संस्थागत निष्पक्षता
मध्यस्थता बनाम पक्षपात: अध्यक्ष की भूमिका सदन का निष्पक्ष मध्यस्थ होने की मांग करती है। जब विधायिका की “धुरी” को पक्षपाती के रूप में देखा जाता है, तो संसदीय लोकतंत्र की वैधता से समझौता हो जाता है, जिससे अनौपचारिक परामर्शदात्री परंपराओं की ओर लौटना आवश्यक हो जाता है।

यहाँ पृथ्वी की वैश्विक संचार प्रणालियों—नदियों और झीलों—पर केंद्रित विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है। ये आपकी UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं, जलवायु विनियमन और सभ्यताओं का आधार बनते हैं।

नदियों को अक्सर उनकी लंबाई, जल विसर्जन आयतन (Discharge volume), या सामरिक सीमा-पारीय (Transboundary) महत्व के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।

महाद्वीपनदीलंबाई (लगभग)महत्व
अफ्रीकानील (Nile)6,650 किमीदुनिया की सबसे लंबी नदी; उत्तर की ओर भूमध्य सागर में गिरती है।
दक्षिण अमेरिकाअमेज़न (Amazon)6,400 किमीजल विसर्जन आयतन के आधार पर सबसे बड़ी; सबसे बड़े वर्षावन से गुजरती है।
एशियायांग्त्ज़ी (Yangtze)6,300 किमीएशिया की सबसे लंबी नदी; पूरी तरह से चीन के भीतर बहती है।
उत्तरी अमेरिकामिसिसिपी (Mississippi)6,275 किमीमैक्सिको की खाड़ी में “पक्षी के पंजे” (Bird-foot) जैसा डेल्टा बनाती है।
यूरोपवोल्गा (Volga)3,530 किमीयूरोप की सबसे लंबी नदी; स्थल-रद्ध कैस्पियन सागर में गिरती है।
ऑस्ट्रेलियामरे-डार्लिंग3,672 किमीऑस्ट्रेलियाई महाद्वीप की प्राथमिक नदी प्रणाली।
  • भूमध्य रेखा को पार करने वाली: कांगो नदी (अफ्रीका) एकमात्र ऐसी प्रमुख नदी है जो भूमध्य रेखा को दो बार पार करती है। यह दुनिया की सबसे गहरी नदी (220 मीटर से अधिक) भी है।
  • “शोक” नदियाँ: चीन की पीली नदी (ह्वांग हे) अपनी विनाशकारी बाढ़ और भारी गाद (Silt) के लिए जानी जाती है।
  • सीमा-पारीय संघर्ष: अंतर्राष्ट्रीय संबंधों (IR) के मानचित्रण के लिए मेकांग (दक्षिण-पूर्व एशिया), ब्रह्मपुत्र (चीन-भारत-बांग्लादेश), और नील (ग्रैंड इथियोपियन रेनेसां डैम विवाद) पर ध्यान केंद्रित करें।

झीलें पृथ्वी के स्वास्थ्य के “थर्मामीटर” की तरह हैं। 2026 की परीक्षाओं के लिए क्षेत्रफल, आयतन और लवणता के बीच अंतर पर ध्यान दें।

  1. कैस्पियन सागर (खारा पानी): दुनिया का सबसे बड़ा स्थल-रद्ध (Landlocked) जल निकाय। यह 5 देशों की सीमाओं को छूता है: रूस, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ईरान और अजरबैजान।
  2. सुपीरियर झील (मीठा पानी): सतही क्षेत्रफल के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील (USA/कनाडा)।
  3. विक्टोरिया झील (मीठा पानी): सबसे बड़ी उष्णकटिबंधीय झील; यह श्वेत नील (White Nile) का स्रोत है (युगांडा, केन्या, तंजानिया)।
  4. ह्यूरन झील (Lake Huron): उत्तरी अमेरिका की ‘महान झीलों’ (Great Lakes) प्रणाली का हिस्सा।
  5. मिशिगन झील: पूरी तरह से एक ही देश (USA) के भीतर स्थित सबसे बड़ी झील।
  • सबसे गहरी और सबसे पुरानी: बैकाल झील (रूस)। इसमें दुनिया के बिना जमे हुए सतही मीठे पानी का 20% हिस्सा समाहित है।
  • सबसे लंबी मीठे पानी की झील: तांगानिका झील (अफ्रीका)। यह चार देशों में फैली हुई है: तंजानिया, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, बुरुंडी और जाम्बिया।
  • सबसे ऊँची नौगम्य (Navigable) झील: टिटिकाका झील (एंडीज पर्वत; पेरू/बोलीविया सीमा)।
  • पृथ्वी पर सबसे निचला बिंदु: मृत सागर (Dead Sea) (इजराइल/जॉर्डन)। यह समुद्र की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक खारा है।
रिकॉर्डनामस्थान
सबसे लंबी नदीनील (Nile)अफ्रीका
सबसे बड़ी झील (क्षेत्रफल)कैस्पियन सागरयूरेशिया
सबसे गहरी झीलबैकाल झीलरूस
भूमध्य रेखा को दो बार काटने वालीकांगो नदीअफ्रीका
सबसे निचली झीलमृत सागरपश्चिम एशिया

मानचित्र पर अफ्रीका की महान भ्रंश घाटी (Great Rift Valley) की झीलों (जैसे तांगानिका, मलावी, एडवर्ड) को उत्तर-से-दक्षिण क्रम में देखें। साथ ही, उत्तरी अमेरिका की महान झीलों (HOMES: Huron, Ontario, Michigan, Erie, Superior) के पश्चिम-से-पूर्व क्रम को भी याद रखें।

मानचित्रण विवरण

वैश्विक नदियाँ और झीलें
महाद्वीपीय अग्रणी सबसे लंबी नदियाँ

नील (अफ्रीका) विश्व की सबसे लंबी है; अमेज़न (दक्षिण अमेरिका) जल प्रवाह में अग्रणी है। यांग्त्ज़ी एशिया की प्रमुख धमनी है।

रणनीतिक केंद्र नदियों की चरम सीमाएँ

कांगो नदी भूमध्य रेखा को दो बार पार करने वाली एकमात्र नदी है। मिसिसिपी एक अद्वितीय ‘पक्षी-पैर’ जैसा डेल्टा बनाती है।

प्रमुख झील प्रणालियाँ
रिकॉर्ड वाले बेसिन

कैस्पियन सागर सबसे बड़ा स्थलवरुद्ध जलाशय बना हुआ है। सुपीरियर झील क्षेत्रफल के आधार पर ताजे पानी की अग्रणी झील है, जबकि विक्टोरिया झील सफेद नील के उष्णकटिबंधीय स्रोत के रूप में कार्य करती है।

गहराई और लवणता
जलमंडल की चरम सीमाएँ

बैकाल झील (रूस) सबसे गहरी और प्राचीनतम है, जिसमें वैश्विक गैर-हिमित ताजे पानी का 20% हिस्सा है। मृत सागर पृथ्वी का सबसे निचला बिंदु और उच्चतम लवणता को चिह्नित करता है।

नौगम्य ऊँचाइयाँ

पेरू-बोलीविया सीमा पर स्थित, टिटिकाका झील दुनिया की सबसे ऊँची नौगम्य झील है, जबकि तांगानिका सबसे लंबी मीठे पानी की झील है।

सबसे लंबी नदी नील (अफ्रीका) 6,650 किमी।
सबसे गहरी झील बैकाल (रूस) 1,642 मी।
सबसे खारी मृत सागर (इजरायल/जॉर्डन)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: जल-कूटनीति विश्लेषण के लिए मेकांग या ब्रह्मपुत्र जैसी सीमा-पारीय नदियों का मानचित्रण आवश्यक है। यूरोप की सबसे बड़ी स्थलवरुद्ध जल निकासी प्रणाली को समझने के लिए वोल्गा के कैस्पियन तक के मार्ग का पता लगाएं।

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