यह अध्याय “फ्रांसीसी क्रांति” 1789 में शुरू हुई उन परिवर्तनकारी घटनाओं का विवरण देता है, जिनके कारण फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र का अंत हुआ और लोकतांत्रिक आदर्शों का उदय हुआ।

क्रांति की शुरुआत 14 जुलाई 1789 को पेरिस में बास्तील (Bastille) के किले-जेल पर हमले के साथ हुई। यह किला राजा की निरंकुश शक्तियों का प्रतीक था।

  • अशांति के कारण: पूरा शहर डर और आतंक के माहौल में था क्योंकि ऐसी अफवाहें फैली थीं कि राजा ने सेना को नागरिकों पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया है। लगभग 7,000 स्त्री-पुरुष टाउन हॉल के सामने एकत्र हुए और उन्होंने एक जन-सेना का गठन करने का निर्णय लिया।
  • आर्थिक कष्ट: शहर और देहाती इलाकों में अधिकांश लोग पाव रोटी (Bread) की ऊँची कीमतों और भोजन की व्यापक कमी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।

फ्रांसीसी समाज तीन ‘एस्टेट्स’ (Estates) की सामंती व्यवस्था में विभाजित था:

  • प्रथम एस्टेट (पादरी वर्ग – Clergy): इसमें चर्च के अधिकारी शामिल थे। इन्हें जन्म से ही विशेष अधिकार प्राप्त थे, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण ‘राज्य को कर (Tax) न देने’ की छूट थी।
  • द्वितीय एस्टेट (कुलीन वर्ग – Nobility): इसमें राज्य के उच्च अधिकारी और जमींदार शामिल थे। इन्हें भी करों से छूट मिली हुई थी और वे किसानों से सामंती कर (Feudal dues) वसूलते थे।
  • तृतीय एस्टेट: इसमें जनसंख्या का लगभग 90% हिस्सा शामिल था। इसमें बड़े व्यवसायी, व्यापारी, अदालती कर्मचारी, वकील, किसान और कारीगर आते थे। पूरे करों का बोझ केवल इसी एस्टेट पर था।
    • वे चर्च को ‘टाइद’ (Tithes) नामक धार्मिक कर देते थे।
    • वे राज्य को ‘टाइल’ (Taille) नामक प्रत्यक्ष कर और दैनिक उपभोग की वस्तुओं (नमक, तंबाकू) पर अप्रत्यक्ष कर देते थे।
  • जनसंख्या वृद्धि: फ्रांस की जनसंख्या 1715 में 2.3 करोड़ से बढ़कर 1789 में 2.8 करोड़ हो गई, जिससे खाद्यान्न की मांग तेजी से बढ़ी।
  • जीविका संकट (Subsistence Crisis): अनाज का उत्पादन मांग के साथ तालमेल नहीं बिठा सका। मजदूरों की मजदूरी स्थिर रही जबकि पाव रोटी की कीमतें आसमान छूने लगीं। जब कभी सूखा या ओले पड़ते थे, तो पैदावार गिर जाती थी, जिससे बार-बार “जीविका संकट” पैदा होता था।

18वीं शताब्दी में एक नए सामाजिक समूह का उदय हुआ जिसे ‘मध्य वर्ग’ कहा गया। इन्होंने समुद्री व्यापार और रेशमी व ऊनी कपड़ों के निर्माण के माध्यम से अपनी संपत्ति अर्जित की थी।

  • दार्शनिक प्रभाव: इस वर्ग के लोग शिक्षित थे और उनका मानना था कि समाज के किसी भी समूह को जन्म के आधार पर विशेषाधिकार नहीं मिलने चाहिए।
    • जॉन लॉक (John Locke): अपनी पुस्तक ‘टू ट्रीटीज़ ऑफ गवर्नमेंट’ में उन्होंने राजा के दैवीय और निरंकुश अधिकारों के सिद्धांत का खंडन किया।
    • जीन जैक्स रूसो (Jean Jacques Rousseau): उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द सोशल कॉन्ट्रैक्ट’ में जनता और उनके प्रतिनिधियों के बीच एक सामाजिक समझौते पर आधारित सरकार का विचार पेश किया।
    • मोंटेस्क्यू (Montesquieu): अपनी पुस्तक ‘द स्पिरिट ऑफ द लॉज़’ में उन्होंने सरकार के भीतर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सत्ता के विभाजन का प्रस्ताव दिया।
  • एस्टेट्स जनरल: 5 मई 1789 को लुई XVI ने नए करों के प्रस्ताव के लिए एक बैठक बुलाई। प्रथम और द्वितीय एस्टेट ने अपने 300-300 प्रतिनिधि भेजे, जबकि तृतीय एस्टेट के 600 प्रतिनिधि पीछे खड़े हुए। तृतीय एस्टेट ने मांग की कि प्रत्येक सदस्य को एक वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए (लोकतांत्रिक सिद्धांत), जिसे राजा ने ठुकरा दिया।
  • नेशनल असेंबली और टेनिस कोर्ट की शपथ: विरोध में तृतीय एस्टेट के प्रतिनिधि सभा से बाहर चले गए। 20 जून को वे वर्साय (Versailles) के एक इंडोर टेनिस कोर्ट में जमा हुए और खुद को ‘नेशनल असेंबली’ घोषित कर दिया। उन्होंने शपथ ली कि जब तक वे फ्रांस के लिए एक नया संविधान तैयार नहीं कर लेते, तब तक वे अलग नहीं होंगे।
  • संवैधानिक राजतंत्र: 1791 में नेशनल असेंबली ने संविधान का मसौदा पूरा किया। इसका मुख्य उद्देश्य सम्राट की शक्तियों को सीमित करना था। अब शक्तियाँ एक व्यक्ति के हाथ में होने के बजाय विभिन्न संस्थाओं (विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका) को हस्तांतरित कर दी गईं।
  • फ्रांस एक गणराज्य बना: अप्रैल 1792 में नेशनल असेंबली ने प्रशा और ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। 21 सितंबर 1792 को नवनिर्वाचित सभा (कन्वेंशन) ने राजतंत्र को समाप्त कर दिया और फ्रांस को एक गणराज्य घोषित कर दिया। राजा लुई XVI पर देशद्रोह का मुकदमा चला और 21 जनवरी 1793 को उन्हें सार्वजनिक रूप से फाँसी दे दी गई।
  • आतंक का राज (The Reign of Terror – 1793 से 1794): यह काल मैक्सिमिलियन रोबेस्प्येर के शासन का था। उन्होंने नियंत्रण और दंड की सख्त नीति अपनाई। कुलीन वर्ग, पादरी और अन्य राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कर उन पर मुकदमा चलाया गया। यदि वे दोषी पाए जाते, तो उन्हें ‘गिलोटिन’ (दो खंभों वाली मशीन जिस पर अपराधी का सिर धड़ से अलग कर दिया जाता था) पर चढ़ा दिया जाता था। अंततः जुलाई 1794 में रोबेस्प्येर को भी दोषी ठहराया गया और अगले ही दिन उन्हें गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया।
  • स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व: ये विचार फ्रांसीसी क्रांति की सबसे महत्वपूर्ण विरासत थे। इन आदर्शों ने न केवल फ्रांस को बल्कि अगली सदी के दौरान पूरे यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों के राजनीतिक आंदोलनों को प्रेरित किया।
  • दास प्रथा का उन्मूलन: 1794 में फ्रांसीसी उपनिवेशों में दास प्रथा को समाप्त करने का कानून पारित किया गया, जो एक महत्वपूर्ण सामाजिक सुधार था (हालाँकि 10 साल बाद नेपोलियन ने इसे फिर से शुरू कर दिया था)।
  • नेपोलियन बोनापार्ट: डायरेक्टरी के शासन की राजनीतिक अस्थिरता ने नेपोलियन के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। 1804 में उन्होंने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित किया। उन्होंने यूरोप के कई हिस्सों को जीता और निजी संपत्ति की सुरक्षा और माप-तोल की दशमलव प्रणाली जैसे आधुनिक कानून लागू किए। अंततः 1815 में वाटरलू (Waterloo) की लड़ाई में उनकी हार हुई।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-9
अध्याय – 1

फ्रांसीसी क्रांति

प्राचीन राजतंत्र
तीन एस्टेट: पादरी और कुलीन वर्ग को जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त थे, जबकि तृतीय एस्टेट (90%) पूरा टैक्स भरता था।
जीविका संकट: तीव्र जनसंख्या वृद्धि और खराब फसल के कारण खाद्य दंगे हुए और पावरोटी की कीमतें बढ़ गईं।
तर्क का युग
लॉक और रूसो: दैवीय अधिकारों को चुनौती दी; सामाजिक अनुबंध पर आधारित सरकार का प्रस्ताव रखा।
मोंटेस्क्यू: सत्ता को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में विभाजित करने का सुझाव दिया।
क्रांतिकारी घटनाक्रम
बास्तीन (14 जुलाई 1789): किले-जेल पर हमले ने राजा की निरंकुश सत्ता के अंत का संकेत दिया।
नेशनल असेंबली: तृतीय एस्टेट ने राजतंत्र को सीमित करने वाले संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए ‘टेनिस कोर्ट की शपथ’ ली।
गणराज्य: कन्वेंशन ने 1792 में राजतंत्र को समाप्त किया; 1793 में लुई XVI को देशद्रोह के लिए फांसी दी गई।
आतंक का राज (1793-94): रोबेस्पयेर के अधीन “गणराज्य के दुश्मनों” को गिलोटिन पर चढ़ाया गया। अंततः उसे भी फांसी दी गई।
नेपोलियन बोनापार्ट: सैन्य अस्थिरता के बीच 1804 में खुद को सम्राट घोषित किया; खुद को यूरोप का “आधुनिकीकरणकर्ता” माना।

टायद और टाइल

चर्च को दिया जाने वाला कर और राज्य को दिया जाने वाला प्रत्यक्ष कर।

गिलोटिन

दो खंभों और एक ब्लेड वाली मशीन जिसका उपयोग लोगों का सिर काटने के लिए किया जाता था।

जैकोबिन

रोबेस्पयेर के नेतृत्व में समाज के कम समृद्ध वर्गों का एक राजनीतिक क्लब।

आधुनिक विरासत
फ्रांसीसी क्रांति की असली विरासत स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सार्वभौमिक आदर्श हैं। इसने प्रजा को नागरिकों में बदल दिया और आधुनिक दुनिया में लोकतांत्रिक अधिकारों की नींव रखी।

भारत की एकल एकीकृत न्यायिक प्रणाली में, उच्च न्यायालय (High Court – HC) उच्चतम न्यायालय के नीचे कार्य करता है लेकिन यह राज्य के स्तर पर सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण है। आपके “IAS PCS मिशन 2026” के लिए यह नोट करना महत्वपूर्ण है कि यद्यपि उच्चतम न्यायालय (SC) और उच्च न्यायालय (HC) कई शक्तियाँ साझा करते हैं, लेकिन उनके क्षेत्राधिकार में महत्वपूर्ण अंतर है, विशेष रूप से ‘रिट’ (Writs) के मामले में।

अनुच्छेद 214 के अनुसार, प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय होगा। हालाँकि, 7वें संविधान संशोधन अधिनियम (1956) ने संसद को यह अधिकार दिया कि वह दो या दो से अधिक राज्यों के लिए, अथवा दो या अधिक राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के लिए एक साझा उच्च न्यायालय (Common High Court) स्थापित कर सके।

  • सदस्य संख्या: उच्चतम न्यायालय (जहाँ संसद संख्या तय करती है) के विपरीत, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या राष्ट्रपति द्वारा कार्यभार के आधार पर समय-समय पर निर्धारित की जाती है।
  • नियुक्ति: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
    • मुख्य न्यायाधीश: उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श के बाद की जाती है।
    • अन्य न्यायाधीश: अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श किया जाता है।
  1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. उसने भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम 10 वर्षों तक किसी न्यायिक पद पर कार्य किया हो।
  3. अथवा वह कम से कम 10 वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय (या लगातार दो या अधिक ऐसे न्यायालयों) का अधिवक्ता रहा हो।
  • नोट: उच्चतम न्यायालय के विपरीत, उच्च न्यायालय में “प्रसिद्ध न्यायविद” (Distinguished Jurist) को न्यायाधीश नियुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।
  • कार्यकाल: उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करता है (उच्चतम न्यायालय के लिए यह 65 वर्ष है)।
  • त्यागपत्र: वह राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अपना त्यागपत्र दे सकता है।
  • निष्कासन (Removal): उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया वही है जो उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की है। उन्हें केवल राष्ट्रपति के आदेश द्वारा ‘सिद्ध कदाचार’ या ‘अक्षमता’ के आधार पर हटाया जा सकता है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।

उच्च न्यायालय एक “अभिलेख न्यायालय” (Court of Record) है (अनुच्छेद 215) और इसके पास अपनी अवमानना (Contempt) के लिए दंड देने की शक्ति है।

उच्च न्यायालय के पास मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए और “किसी अन्य उद्देश्य” (सामान्य कानूनी अधिकारों) के लिए भी बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण और अधिकार-पृच्छा जैसी रिट जारी करने की शक्ति है।

  • तुलना: उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार उच्चतम न्यायालय की तुलना में व्यापक है, क्योंकि उच्चतम न्यायालय (अनुच्छेद 32) केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर ही रिट जारी कर सकता है।

प्रत्येक उच्च न्यायालय के पास उन सभी न्यायालयों और अधिकरणों (Tribunals) के अधीक्षण (Superintendence) की शक्ति होती है, जो उसके क्षेत्रीय क्षेत्राधिकार के भीतर आते हैं (सैन्य अदालतों को छोड़कर)।

जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति के संबंध में राज्यपाल उच्च न्यायालय से परामर्श करता है। इसके अतिरिक्त, राज्य की न्यायिक सेवा के अन्य व्यक्तियों पर भी उच्च न्यायालय का नियंत्रण होता है।

अनुच्छेदप्रावधान
215उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय (Court of Record) होना।
226रिट जारी करने की शक्ति (अनुच्छेद 32 से व्यापक)।
227सभी अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति।
231दो या अधिक राज्यों के लिए एक साझा उच्च न्यायालय की स्थापना की संसद की शक्ति।
  • बॉम्बे HC: महाराष्ट्र, गोवा, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव।
  • गुवाहाटी HC: असम, नागालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश।
  • पंजाब और हरियाणा HC: पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़।
  • कलकत्ता HC: पश्चिम बंगाल और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह।
विशेषताउच्चतम न्यायालय (SC)उच्च न्यायालय (HC)
सेवानिवृत्ति की आयु65 वर्ष62 वर्ष
रिट अनुच्छेदअनुच्छेद 32 (संकीर्ण दायरा)अनुच्छेद 226 (व्यापक दायरा)
नियुक्तिराष्ट्रपति द्वाराराष्ट्रपति द्वारा
प्रसिद्ध न्यायविदनियुक्त किया जा सकता हैनियुक्त नहीं किया जा सकता
निष्कासनसंसद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारासंसद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा

यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और निष्कासन राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है, लेकिन उन्हें पद की शपथ संबंधित राज्य के राज्यपाल दिलाते हैं। अक्सर छात्र यहाँ भ्रमित हो जाते हैं।

IAS PCS मिशन 2026 • राज्य न्यायपालिका
अनुच्छेद 214–231

उच्च न्यायालय (High Courts)

योग्यता
भारतीय नागरिकता + 10 वर्ष का न्यायिक पद या 10 वर्ष तक HC अधिवक्ता होना आवश्यक। “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” का प्रावधान नहीं।
कार्यकाल
न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं। नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
रिट क्षेत्राधिकार (अनु. 226)
विस्तृत दायरा: HC मौलिक अधिकारों और “किसी अन्य उद्देश्य” (कानूनी अधिकार) के लिए रिट जारी करता है, जिससे इसका दायरा SC (अनु. 32) से व्यापक हो जाता है।
अधीक्षण की शक्ति (अनु. 227)
उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों (सैन्य न्यायालयों को छोड़कर) पर अधीक्षण का प्रयोग करता है।
प्रशासनिक नियंत्रण
अनु. 235 के तहत, जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति और पदस्थापना के लिए राज्यपाल द्वारा HC से परामर्श किया जाता है।

अभिलेख न्यायालय

अनु. 215 के तहत, उच्च न्यायालय के निर्णयों को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखा जाता है और इसके पास अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति है।

साझा HC

अनु. 231 के तहत, संसद दो या अधिक राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक ही HC स्थापित कर सकती है (जैसे बॉम्बे या गुवाहाटी HC)।

पदच्युति प्रक्रिया

SC न्यायाधीशों के समान: कदाचार या अक्षमता के लिए संसद में विशेष बहुमत के बाद राष्ट्रपति का आदेश।

कानूनी
अंतर
जहाँ उच्चतम न्यायालय शीर्ष पर है, वहीं उच्च न्यायालय राज्य का सर्वोच्च न्यायिक निकाय है। मुख्य अंतर बरकरार हैं: सेवानिवृत्ति की आयु (62 बनाम 65), HC की व्यापक रिट शक्ति, और राज्य बेंच के लिए “प्रतिष्ठित विधिवेत्ता” नियुक्ति श्रेणी का अभाव।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (10 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और समझौते; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कुआलालंपुर की 24 घंटे की यात्रा वर्ष 2025 में आए तनावपूर्ण दौर के बाद द्विपक्षीय संबंधों को फिर से स्थापित करने और मजबूत करने के रणनीतिक प्रयास का प्रतीक है।
  • मुख्य बिंदु:
    • गलतियों को सुधारना: अक्टूबर 2025 में आसियान (ASEAN) शिखर सम्मेलन के लिए प्रस्तावित यात्रा के अंतिम समय में रद्द होने के बाद, 2026 में मलेशिया प्रधानमंत्री का पहला विदेशी गंतव्य बना।
    • आतंकवाद विरोध पर सहमति: एक महत्वपूर्ण संयुक्त बयान में “सीमा पार आतंकवाद” की स्पष्ट रूप से निंदा की गई, जो पिछले मतभेदों के बावजूद सुरक्षा चिंताओं पर दोनों देशों के एक साथ आने का संकेत देता है।
    • उच्च-तकनीकी सहयोग: दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) के क्षेत्र में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए, जो ‘आईआईटी मद्रास ग्लोबल’ को मलेशिया की ‘एडवांस्ड सेमीकंडक्टर एकेडमी’ से जोड़ता है।
    • विवादास्पद मुद्दों से किनारा: दोनों पक्षों ने मलेशिया में धर्मोपदेशक जाकिर नाइक के निरंतर प्रवास जैसे संवेदनशील विषयों पर सार्वजनिक चर्चा से सावधानीपूर्वक परहेज किया।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी”, “द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग” और “दक्षिण-पूर्वी एशिया की भू-राजनीति” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • आर्थिक धुरी (Economic Pivot): इस यात्रा का उद्देश्य ‘आसियान-भारत माल व्यापार समझौते’ (AITIGA) पर बातचीत को पुनर्जीवित करना है, जो भारतीय व्यापार अधिकारियों की आलोचनात्मक टिप्पणियों के कारण रुक गई थी।
    • रणनीतिक बहु-संरेखण (Multi-alignment): चूंकि भारत यूरोप और अमेरिका के साथ बड़े मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर काम कर रहा है, इसलिए मलेशिया जैसे आसियान भागीदारों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक है।
    • ब्रिक्स (BRICS) में भागीदारी: भारत ने ब्रिक्स में शामिल होने की मलेशिया की आकांक्षाओं को नोट किया है; प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम को भारत की अध्यक्षता में होने वाले आगामी शिखर सम्मेलन में भागीदार देश के रूप में आमंत्रित किया जाएगा।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; न्यायपालिका; मौलिक अधिकार)।

  • संदर्भ: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘धार्मिक और जातिगत भावनाओं को ठेस पहुँचाने’ के आधार पर घूसखोर पंडित नामक फिल्म के निर्माताओं के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के निर्देश का आलोचनात्मक विश्लेषण।
  • मुख्य बिंदु:
    • मजबूरन समर्पण: आपराधिक कार्यवाही की धमकी ने निर्माता को तथ्यों की न्यायिक जांच से पहले ही प्रचार सामग्री हटाने के लिए मजबूर कर दिया।
    • संवैधानिक संरक्षण: अनुच्छेद 19(1)(a) को उन विचारों की रक्षा के लिए बनाया गया है जो शक्तिशाली समूहों को अप्रिय लग सकते हैं; अनुच्छेद 19(2) के तहत लगाए गए प्रतिबंध आनुपातिक (Proportionate) होने चाहिए।
    • भावनाएं एक मापदंड के रूप में: संपादकीय का तर्क है कि एक विविध समाज में, “भावनाएं” आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने के लिए एक उपयोगी कानूनी मापदंड नहीं हो सकतीं।
    • विचारों का बाज़ार: विवादित सामग्री को हटाने की प्रक्रिया को सामान्य बनाना समाज को बहिष्कार या व्यंग्य जैसी लोकतांत्रिक प्रतिक्रियाओं का उपयोग करने से रोकता है और सार्वजनिक क्षेत्र को संकुचित करता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता”, “कार्यपालिका की भूमिका” और “अपराध की कानूनी मानक” से संबंधित विषयों के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कार्यकारी अतिरेक (Executive Overreach): फिल्म के शीर्षक की नापसंदगी के लिए पुलिस कार्रवाई का निर्देश देना सार्वजनिक बहस के बजाय मुद्दे को केवल “अनुशासन का मामला” बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
    • प्रतिबंधों का पैटर्न: हाल के उदाहरण, जिनमें द केरला स्टोरी पर प्रतिबंध और बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री इंडिया: द मोदी क्वेश्चन शामिल हैं, दृश्य कलाओं को नियंत्रित करने के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग की प्रवृत्ति का सुझाव देते हैं।
    • न्यायिक उपाय: अवैधता के दावों पर अधिक समझदारी भरी प्रतिक्रिया एकपक्षीय कार्यकारी कार्रवाई के बजाय न्यायिक राहत प्राप्त करना है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; प्रौद्योगिकी का प्रभाव) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: अर्जुन अप्पादुरई द्वारा इस बात का विश्लेषण कि कैसे डिजिटल बाज़ार और प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म मानव सामाजिकता और पहचान को निष्कर्षण (Extraction) के लिए एक वैश्विक वस्तु में बदल रहे हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • पूंजीवादी निष्कर्षण: कच्चे माल या एआई से परे, अब “सामाजिकता स्वयं”—दोस्ती, पसंद-नापसंद और व्यक्तिगत कहानियाँ—पूंजीवादी खनन का प्राथमिक विषय बन गई हैं।
    • निजता का अंत: यह अत्यधिक तीव्र प्रोफाइलिंग (Profiling on steroids) अंतरंगता और विश्वास जैसी पारंपरिक अवधारणाओं को अप्रचलित बना देती है, क्योंकि इन्हें बिना किसी सीमा के खनन किए जाने वाले संसाधन के रूप में माना जाता है।
    • कहानी की अर्थव्यवस्था (Story Economy): ओटीटी (OTT) स्ट्रीमिंग और सोशल मीडिया बाज़ार को नियंत्रित करने के लिए “स्थानीय स्वाद” और सार्वभौमिक चरित्र प्रकारों का शिकार करते हैं ताकि उन्हें व्यावसायिक वस्तु बनाया जा सके।
    • कृत्रिम बनाम मानव: एआई बॉट्स (सिरी, चैटजीपीटी) अब निर्णय और अंतर्ज्ञान (Intuition) के मामले में मनुष्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे एकीकृत व्यक्ति की पहचान और बिखर रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “डिजिटल नैतिकता”, “बड़े डेटा के युग में निजता” और “इंटरनेट का समाजशास्त्र” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सेल्फी के स्रोत: व्यक्तिगत स्वतंत्रता के ज्ञानोदय (Enlightenment) मूल्यों को क्रेडिट स्कोर और एल्गोरिथम आधारित उपभोक्ता प्रोफाइल के एक अस्थिर मिश्रण द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है।
    • लोकतंत्रीकरण का जोखिम: हालांकि अब कोई भी “भाग्यशाली वायरल होने” (Lucky virality) के माध्यम से दर्शकों तक पहुँच सकता है, लेकिन यह प्रवृत्ति मानव अनुभव की हर जीवित खान में “ड्रिल करने” (Drilling) की निरंतर दौड़ को सुगम बनाती है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: भारत ने वर्ष 2026 के लिए ‘किम्बरली प्रक्रिया’ (KP) की अध्यक्षता ग्रहण की है, जो हीरा व्यापार के वैश्विक शासन में सुधार के लिए एक मंच प्रदान करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • भारत का प्रभाव: दुनिया के अग्रणी कटिंग और पॉलिशिंग केंद्र के रूप में, जो वैश्विक कच्चे हीरों का 40% आयात करता है, भारत का इस मूल्य श्रृंखला में अद्वितीय प्रभाव है।
    • ‘संघर्ष’ (Conflict) की परिभाषा: किम्बरली प्रक्रिया की एक बड़ी आलोचना “संघर्ष हीरों” (Conflict Diamonds) की इसकी संकीर्ण परिभाषा है, जो राज्य से जुड़े दुर्व्यवहारों, मानवाधिकारों के उल्लंघन और पर्यावरणीय क्षति की अनदेखी करती है।
    • तकनीकी समाधान: भारत धोखाधड़ी को कम करने और सीमा शुल्क डेटा विनिमय को आधुनिक बनाने के लिए डिजिटल, छेड़छाड़-मुक्त ब्लॉकचेन-आधारित प्रमाणपत्रों को बढ़ावा दे सकता है।
    • आजीविका पर ध्यान: विमर्श को केवल “खराब हीरों” को रोकने से हटाकर एक ऐसे जिम्मेदार व्यापार को सक्षम बनाने की ओर ले जाने की आवश्यकता है जो अफ्रीकी खनन समुदायों का समर्थन करे।
  • UPSC प्रासंगिकता: “अंतर्राष्ट्रीय संसाधन शासन”, “ग्लोबल साउथ में भारत का नेतृत्व” और “आपूर्ति श्रृंखला नैतिकता” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • संस्थागत सुधार: भारत साधारण विद्रोही उग्रवाद से परे मानवाधिकारों के जोखिमों पर आम सहमति बनाने के लिए तकनीकी कार्य समूहों का गठन कर सकता है।
    • त्रिपक्षीय शक्ति: सरकारों, उद्योग और नागरिक समाज के बीच खुले संचार की सुविधा प्रदान करके, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि किम्बरली प्रक्रिया एक प्रगतिशील बहुपक्षीय निकाय बनी रहे।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; रोजगार से संबंधित मुद्दे; सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम – MSME)।

  • संदर्भ: तमिलनाडु के इरोड में एक डेयरी प्रसंस्करण संयंत्र का मामला जो उन संरचनात्मक बाधाओं को उजागर करता है जो भारत में रोजगार-गहन विकास को रोक रही हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • ऋण की बाधा (Credit Bottleneck): प्राथमिक बाधा मांग या बुनियादी ढांचे की कमी नहीं है, बल्कि छोटे उत्पादकों की उत्पादन बढ़ाने के लिए सस्ती और विश्वसनीय औपचारिक ऋण तक पहुँच की कमी है।
    • एकत्रीकरण की शक्ति: अमूल मॉडल से प्रेरित होकर, यह सबक मिलता है कि विकास के लिए संस्थागत सहायता के माध्यम से उत्पादक स्तर पर ऋण की समस्याओं को हल करना आवश्यक है।
    • MSME का लचीलापन: इरोड का औद्योगिक परिदृश्य दिखाता है कि छोटी फर्में बढ़ने के लिए तैयार हैं लेकिन वे नियामक जटिलता, कौशल अंतराल और कर अनिश्चितता के कारण रुकी हुई हैं।
    • रोजगार अवशोषण: अकेले बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भारत के कार्यबल को समाहित नहीं कर सकती हैं; बड़े पैमाने पर रोजगार MSME और कृषि-प्रसंस्करण क्षेत्रों से ही आना चाहिए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “समावेशी विकास”, “ग्रामीण विकास” और “वित्तीय समावेशन रणनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • जनसांख्यिकीय घड़ी: भारत के पास अपनी कार्यशील आयु वाली जनसंख्या के लाभ के कम होने से पहले लगभग दो दशक का समय है; अब गुणवत्तापूर्ण रोजगार पैदा करने में विफल रहने का परिणाम एक खोए हुए अवसर के रूप में निकलेगा।
    • वैश्विक मिसाल: विश्व बैंक का अनुमान है कि लघु और मध्यम उद्यम (SMEs) वैश्विक रोजगार का लगभग 70% प्रदान करते हैं, जो उन्हें भारत के रोजगार संकट के लिए सबसे महत्वपूर्ण समाधान बनाता है।

संपादकीय विश्लेषण

10 फरवरी, 2026
GS-3 तकनीक / समाज खनन योग्य स्व (The Mineable Self)

“स्वयं सामाजिकता” को एक वस्तु के रूप में निकाला जा रहा है। अत्यधिक प्रोफाइलिंग ‘कहानी अर्थव्यवस्था’ (story economy) में आत्मीयता और विश्वास को अप्रचलित बना रही है।

GS-2/3 अर्थव्यवस्था किम्बरली प्रोसेस 2026

भारत ने अध्यक्षता संभाली। ब्लॉकचेन प्रमाणपत्रों पर जोर और ‘संघर्ष’ की परिभाषा को व्यापक बनाकर इसमें राज्य-संबद्ध दुरुपयोगों को शामिल करने का प्रयास।

GS-3 MSME / रोजगार रोजगार सृजन की बाधाएं

इरोड के डेयरी संयंत्रों से सबक; ऋण की बाधाएं और नियामक जटिलता महत्वपूर्ण MSME रोजगार इंजन को पीछे धकेल रही हैं।

कूटनीति: बदलते वैश्विक मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) के बीच एक्ट ईस्ट और AITIGA वार्ता के लिए मलेशिया के साथ संबंधों को बहाल करना महत्वपूर्ण है।
अर्थव्यवस्था: वैश्विक संसाधन शासन में सुधार के लिए भारत के पास 40% कच्चे हीरे के आयातक के रूप में अद्वितीय लाभ है।
बुनियादी ढांचा: MSMEs के विस्तार के लिए संस्थागत एकत्रीकरण के माध्यम से उत्पादक स्तर पर ऋण बाधाओं को दूर करना आवश्यक है।
समाज: एल्गोरिद्म आधारित उपभोक्ता प्रोफाइल व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जगह ले रहे हैं, जो अनुभवों की हर “जीवंत खदान” में ड्रिल कर रहे हैं।
GS-4
कला की स्वतंत्रता
कार्यकारी अतिरेक: अनुच्छेद 19(1)(a) को विवादित अभिव्यक्ति की रक्षा करनी चाहिए। भावनाओं पर आधारित प्राथमिकी लोकतांत्रिक बहस को राज्य के अनुशासन में बदल देती है, जिससे सार्वजनिक क्षेत्र संकुचित होता है और विचारों का बाजार शांत हो जाता है।

यहाँ महत्वपूर्ण वैश्विक रेखाओं—भूमध्य रेखा (Equator)कर्क और मकर रेखाएँ (Tropics), और प्रधान मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) पर केंद्रित विस्तृत मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

भूमध्य रेखा (विषुवत रेखा) तीन महाद्वीपों के 13 देशों से होकर गुजरती है। यह एकमात्र अक्षांश है जो एक ‘वृहद वृत्त’ (Great Circle) है।

  • दक्षिण अमेरिका (3): इक्वाडोर, कोलंबिया, ब्राजील।
  • अफ्रीका (7): गैबॉन, कांगो गणराज्य, लोकतांत्रिक कांगो गणराज्य, युगांडा, केन्या, सोमालिया, साओ टोम और प्रिंसिपे।
  • एशिया/ओशिनिया (3): मालदीव, इंडोनेशिया, किरिबाती।
  • मैपिंग टिप: ध्यान दें कि जबकि भूमध्य रेखा मालदीव और किरिबाती के क्षेत्रीय जल (Territorial waters) से होकर गुजरती है, यह उनके वास्तविक भूभाग (Landmass) को नहीं छूती है।

यह रेखा उस सबसे उत्तरी बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ सूर्य दोपहर में सीधे सिर के ऊपर (June Solstice – जून संक्रांति) होता है। यह 17 देशों से होकर गुजरती है।

  • उत्तरी अमेरिका (2): मेक्सिको, बहामास।
  • अफ्रीका (7): पश्चिमी सहारा (विवादित), मॉरिटानिया, माली, अल्जीरिया, नाइजर, लीबिया, मिस्र।
  • एशिया (8): सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), ओमान, भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, ताइवान।
  • रणनीतिक बिंदु (भारत): भारत में, यह 8 राज्यों से होकर गुजरती है: गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिजोरम।

यह रेखा उस सबसे दक्षिणी बिंदु को चिह्नित करती है जहाँ सूर्य सीधे सिर के ऊपर (December Solstice – दिसंबर संक्रांति) होता है। यह 10 देशों से होकर गुजरती है।

  • दक्षिण अमेरिका (4): चिली, अर्जेंटीना, पराग्वे, ब्राजील।
  • अफ्रीका (5): नामीबिया, बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका, मोजाम्बिक, मेडागास्कर।
  • ओशिनिया (1): ऑस्ट्रेलिया।
  • मुख्य तथ्य: ब्राजील दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहाँ से भूमध्य रेखा और मकर रेखा दोनों गुजरती हैं।

प्रधान मध्याह्न रेखा (ग्रीनविच रेखा) पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्ध में विभाजित करती है। यह 8 देशों से होकर गुजरती है।

  • यूरोप (3): यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, स्पेन।
  • अफ्रीका (5): अल्जीरिया, माली, बुर्किना फासो, टोगो, घाना।
  • मानचित्रण संदर्भ: प्रधान मध्याह्न रेखा और भूमध्य रेखा एक-दूसरे को अटलांटिक महासागर में गिनी की खाड़ी (घाना के तट के पास) में काटती हैं।
महत्वपूर्ण रेखामहाद्वीपों की संख्यादेशों की संख्यामुख्य भौगोलिक केंद्र
भूमध्य रेखा313उष्णकटिबंधीय वर्षावन (अमेज़न, कांगो, इंडोनेशिया)।
कर्क रेखा317मरुस्थल (सहारा, थार) और मानसूनी पेटियाँ (भारत)।
मकर रेखा310अटाकामा मरुस्थल, ऑस्ट्रेलियाई आउटबैक।
प्रधान मध्याह्न रेखा28ग्रीनविच (UK) और गिनी की खाड़ी।

UPSC की परीक्षाओं में अक्सर यह पूछा जाता है कि कौन सा देश किस रेखा पर स्थित है। इसे याद करने के लिए महाद्वीप-वार समूहों का उपयोग करें। उदाहरण के लिए, अफ्रीका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है जहाँ से भूमध्य रेखा, कर्क रेखा और मकर रेखा तीनों गुजरती हैं। मानचित्र पर इन रेखाओं के प्रतिच्छेदन बिंदुओं को भी ध्यान से देखें।

मानचित्रण विवरण

महत्वपूर्ण वैश्विक रेखाएँ
भूमध्य रेखा (0°) वृहत् वृत्त (The Great Circle)

ब्राजील, कांगो (DRC) और इंडोनेशिया सहित 13 देशों से गुजरती है। 11 देशों में भूमि को स्पर्श करती है, जबकि मालदीव और किरिबाती में समुद्री क्षेत्रों को पार करती है।

मुख्य मध्याह्न रेखा गोलार्ध विभाजक

यूरोप और अफ्रीका के 8 देशों से होकर गुजरती है। भूमध्य रेखा के साथ इसका मुख्य प्रतिच्छेदन घाना के पास गिनी की खाड़ी में होता है।

कर्क रेखा (23.5° उत्तर)
उत्तरी संक्रांति रेखा

मैक्सिको, मिस्र और भारत सहित 17 देशों को पार करती है। भारतीय संदर्भ में, यह 8 राज्यों से होकर गुजरती है: पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में मिजोरम तक।

मकर रेखा (23.5° दक्षिण)
दक्षिणी संक्रांति रेखा

दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के 10 देशों से होकर गुजरती है। ब्राजील विशिष्ट रूप से एकमात्र ऐसा देश है जहाँ से भूमध्य रेखा और यह रेखा दोनों गुजरती हैं।

क्षेत्रीय भौगोलिक फोकस

ये रेखाएँ वैश्विक जलवायु पेटियों को परिभाषित करती हैं, भूमध्य रेखा के उष्णकटिबंधीय वर्षावनों से लेकर उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के साथ स्थित शुष्क मरुस्थलों (सहारा/अटाकामा) तक।

भूमध्य रेखा 13 देश (वृहत् वृत्त)।
कर्क रेखा 8 भारतीय राज्य (GJ से MZ)।
मकर रेखा ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया को पार करती हुई।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: गिनी की खाड़ी में 0°/0° निर्देशांक को समझना वैश्विक नेविगेशन का शुरुआती बिंदु है। भारत की अद्वितीय जलवायु स्थिति की कल्पना करने के लिए कर्क रेखा के साथ मानसून बेल्ट का पता लगाएं।

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