यह अध्याय “राष्ट्रीय आंदोलन का संघटन : 1870 के दशक से 1947 तक” संगठित राष्ट्रवाद के उदय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन की त्रासदी तक के भारतीय संघर्ष का व्यापक इतिहास प्रस्तुत करता है।

1870 और 1880 के दशक तक भारतीयों के बीच एक नई राजनीतिक चेतना पैदा हो चुकी थी। लोग यह महसूस करने लगे थे कि भारत के संसाधनों और यहाँ के लोगों के जीवन पर अंग्रेजों का नियंत्रण है। जब तक यह नियंत्रण खत्म नहीं होता, भारत यहाँ के लोगों का नहीं हो सकता।

  • प्रारंभिक संस्थाएँ: 1850 के बाद कई राजनीतिक संगठन अस्तित्व में आए, जैसे— पुणे सार्वजनिक सभा, इंडियन एसोसिएशन, मद्रास महाजन सभा और बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन। इनका नेतृत्व मुख्य रूप से अंग्रेजी शिक्षित पेशेवरों (जैसे वकील) द्वारा किया गया।
  • कांग्रेस की स्थापना: ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस’ की स्थापना दिसंबर 1885 में बंबई (मुंबई) में हुई। इसमें देशभर के 72 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
  • प्रारंभिक नेतृत्व: शुरुआती नेताओं में दादाभाई नौरोजी (जिन्हें ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है), फिरोजशाह मेहता, बदरुद्दीन तैयबजी, डब्ल्यू.सी. बनर्जी, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और रोमेश चंद्र दत्त शामिल थे। नौरोजी उस समय लंदन में रहते थे और ब्रिटिश संसद के सदस्य भी थे।
  • नरमपंथी मांगें (Moderates): अपने पहले बीस वर्षों में कांग्रेस “नरमपंथी” रही। उन्होंने सरकार में भारतीयों को अधिक जगह देने, विधान परिषदों को अधिक शक्तिशाली बनाने और सिविल सेवा परीक्षा भारत में भी आयोजित करने की मांग की। उन्होंने भेदभावपूर्ण ‘आर्म्स एक्ट’ को निरस्त करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी मांग की।
  • कट्टरपंथी नेता: 1890 के दशक तक विपिन चंद्र पाल, बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय (लाल-बाल-पाल) जैसे नेताओं ने नरमपंथियों की “प्रार्थना की राजनीति” की आलोचना शुरू कर दी। उन्होंने आत्मनिर्भरता और रचनात्मक कार्यों पर जोर दिया।
  • तिलक का नारा: तिलक ने प्रसिद्ध नारा दिया— “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा!”
  • बंगाल विभाजन (1905): वायसराय कर्जन ने “प्रशासनिक सुविधा” का बहाना बनाकर बंगाल का विभाजन कर दिया। वास्तविक उद्देश्य बंगाली राजनेताओं के प्रभाव को कम करना और जनता को बांटना था।
  • स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव: इस विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ। इसने ब्रिटिश शासन का विरोध किया, भारतीय शिक्षा और उद्योगों को बढ़ावा दिया और ब्रिटिश सामानों के बहिष्कार का आह्वान किया।

महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, जहाँ उन्होंने नस्लभेदी प्रतिबंधों के खिलाफ अहिंसक आंदोलनों का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया था।

  • प्रारंभिक अभियान: भारत आने के बाद पहले साल गांधीजी ने पूरे देश का दौरा किया। बाद में उन्होंने चंपारण, खेड़ा और अहमदाबाद के स्थानीय आंदोलनों का नेतृत्व किया।
  • रौलट एक्ट (1919): इस कानून के जरिए सरकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाने की शक्ति मिल गई।
  • सत्याग्रह: गांधीजी ने इस कानून के खिलाफ ‘अपमान और प्रार्थना’ दिवस और हड़ताल का आह्वान किया। यह अंग्रेजों के खिलाफ पहला अखिल भारतीय संघर्ष था।
  • जलियाँवाला बाग हत्याकांड: बैसाखी के दिन अमृतसर में जनरल डायर द्वारा किए गए नरसंहार के खिलाफ पूरे देश में आक्रोश फैल गया। इसके विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि वापस कर दी।
  • खिलाफत आंदोलन: मोहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में तुर्की के खलीफा के सम्मान की रक्षा के लिए यह आंदोलन शुरू हुआ।
  • असहयोग आंदोलन (1920): गांधीजी ने खिलाफत और स्वराज की मांग को जोड़कर एक विशाल आंदोलन शुरू किया। भारतीयों ने सरकारी स्कूलों, अदालतों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया।
  • आंदोलन का अंत: 1922 में चौरी-चौरा की घटना (जहाँ भीड़ ने एक पुलिस थाने को जला दिया था और 22 पुलिसकर्मी मारे गए थे) के बाद गांधीजी ने अचानक आंदोलन वापस ले लिया, क्योंकि वे हिंसा के सख्त खिलाफ थे।

1920 के दशक के मध्य के बाद, गाँवों में रचनात्मक कार्यों और नए राजनीतिक बदलावों के कारण राष्ट्रीय आंदोलन को और गति मिली।

  • साइमन कमीशन (1927): भारत के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने के लिए इंग्लैंड से एक आयोग भेजा गया, जिसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। पूरे भारत में इसका विरोध “साइमन गो बैक” के नारों के साथ हुआ।
  • पूर्ण स्वराज (1929): जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ (पूर्ण स्वतंत्रता) का प्रस्ताव पारित किया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
  • नमक मार्च (1930): गांधीजी ने साबरमती से दांडी तक की यात्रा की ताकि नमक कानून को तोड़ा जा सके। नमक पर राज्य का एकाधिकार था और एक बुनियादी ज़रूरत पर टैक्स लगाना गांधीजी को अन्यायपूर्ण लगा।
  • 1935 का अधिनियम: भारत सरकार अधिनियम 1935 ने ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ प्रदान की। 1937 के चुनावों में कांग्रेस ने 11 में से 7 प्रांतों में सरकार बनाई।

संघर्ष का अंतिम चरण द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ।

  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): गांधीजी ने “करो या मरो” का नारा दिया। अंग्रेजों ने भीषण दमन किया, हज़ारों लोगों को जेल में डाल दिया, लेकिन विद्रोह पूरे देश में फैल गया।
  • आज़ाद हिन्द फ़ौज (INA): सुभाष चंद्र बोस ने बाहरी सहायता से भारत को स्वतंत्र कराने के लिए आज़ाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की।
  • वार्ता का दौर: युद्ध के बाद अंग्रेजों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग के साथ बातचीत शुरू की। लेकिन लीग मुसलमानों के लिए एक अलग देश की मांग पर अड़ी रही।

स्वतंत्रता की खुशी देश के विभाजन की हिंसा के कारण फीकी पड़ गई।

  • कूटनीति की विफलता: 1946 का ‘कैबिनेट मिशन’ एक एकीकृत भारत के ढांचे पर सहमति बनाने में विफल रहा। इसके बाद मुस्लिम लीग ने 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ (Direct Action Day) का आह्वान किया।
  • विभाजन (1947): अंततः भारत को स्वतंत्रता मिली, लेकिन देश भारत और पाकिस्तान में बंट गया।
  • मानवीय क्षति: विभाजन के बाद हुए सांप्रदायिक दंगों में लाखों लोग मारे गए और करोड़ों लोग विस्थापित हुए। हज़ारों महिलाओं को अकल्पनीय अत्याचारों का सामना करना पड़ा।
  1. 1885: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना।
  2. 1905: बंगाल का विभाजन।
  3. 1915: गांधीजी का भारत आगमन।
  4. 1919: रौलट सत्याग्रह और जलियाँवाला बाग।
  5. 1930: दांडी यात्रा (सविनय अवज्ञा आंदोलन)।
  6. 1942: भारत छोड़ो आंदोलन।
  7. 1947: भारत की स्वतंत्रता और विभाजन।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 11

राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन: 1870 के दशक से 1947 तक

उदय
1885: 72 प्रतिनिधियों के साथ बॉम्बे में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन; प्रारंभिक नेतृत्व ‘मध्यमार्गी’ था।
गरम दल: लाल-बाल-पाल ने आत्मनिर्भरता पर जोर दिया; तिलक ने नारा दिया, “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है!”
स्वदेशी
1905: बंगाल के विभाजन ने स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया, जिसने ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की वकालत की।
गांधीवादी युग और स्वतंत्रता का मार्ग
आगमन (1915): गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे; रॉलेट सत्याग्रह (1919) के रूप में पहले अखिल भारतीय संघर्ष का नेतृत्व किया।
असहयोग: गांधी ने खिलाफत और स्वराज की मांगों को मिलाया (1920) लेकिन चौरी-चौरा की घटना (1922) के बाद इसे वापस ले लिया।
सविनय अवज्ञा: नेहरू (1929) के नेतृत्व में पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रखा गया। 1930 में गांधी ने दांडी में नमक कानून तोड़ा।
भारत छोड़ो (1942): द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान “करो या मरो” के नारे के साथ शुरू हुआ, जिससे व्यापक जन-आंदोलन हुआ।
विभाजन (1947): स्वतंत्रता प्राप्त हुई लेकिन यह विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी के साथ आई।

रॉलेट एक्ट

1919 का ‘काला कानून’ जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों पर अंकुश लगाया।

दांडी मार्च

एक बुनियादी जरूरत पर राज्य के एकाधिकार को तोड़ने के लिए दांडी तक 240 मील की यात्रा।

आज़ाद हिंद फ़ौज

सुभाष चंद्र बोस द्वारा फिर से संगठित की गई भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA)।

राष्ट्र की आत्मा
राष्ट्रीय आंदोलन जनचेतना की एक यात्रा थी। इसने औपनिवेशिक प्रांतों के समूह को एक एकीकृत राष्ट्र में बदल दिया, जिसने अहिंसा और निरंतर संघर्ष के माध्यम से आत्मनिर्णय के अपने अधिकार को पुनः प्राप्त किया।

संसदीय समितियाँ संसद की “आँख और कान” कहलाती हैं। चूंकि संसद एक विशाल निकाय है और उसके पास समय सीमित होता है, इसलिए वह प्रत्येक विधायी और कार्यकारी कार्रवाई की विस्तार से जाँच नहीं कर सकती। यह कार्य समितियों को सौंपा जाता है, जो दलीय राजनीति से ऊपर उठकर निष्पक्ष रूप से कार्य करती हैं।

समितियाँ दो प्रकार की होती हैं:

  1. स्थायी समितियाँ (Standing Committees): ये स्थायी प्रकृति की होती हैं और प्रत्येक वर्ष पुनर्गठित की जाती हैं।
  2. तदर्थ समितियाँ (Ad Hoc Committees): ये अस्थायी होती हैं, जिन्हें किसी विशिष्ट कार्य के लिए बनाया जाता है और कार्य पूरा होने पर इन्हें भंग कर दिया जाता है।

यह अनुभाग परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

  • स्थापना: पहली बार 1921 में (भारत सरकार अधिनियम, 1919 के तहत) गठित की गई।
  • संरचना: इसमें कुल 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)।
  • कार्यकाल: 1 वर्ष।
  • भूमिका: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के ऑडिट रिपोर्टों की जाँच करना।
  • मुख्य विशेषता: कोई भी मंत्री इस समिति का सदस्य नहीं बन सकता। 1967 से यह परंपरा रही है कि इस समिति का अध्यक्ष आमतौर पर विपक्ष से होता है।
  • याद रखने की ट्रिक: इसे प्राकलन समिति की “जुड़वां बहन” कहा जाता है।
  • स्थापना: जॉन मथाई की सिफारिश पर (1950)।
  • संरचना: इसमें कुल 30 सदस्य होते हैं (सभी 30 सदस्य केवल लोकसभा से होते हैं)।
  • विशेष नोट: इसमें राज्यसभा का कोई प्रतिनिधित्व नहीं होता।
  • भूमिका: सार्वजनिक व्यय में ‘मितव्ययिता’ (Economy) के सुझाव देना। इसे अक्सर ‘सतत मितव्ययिता समिति’ (Continuous Economy Committee) कहा जाता है।
  • मुख्य विशेषता: यह संसद की सबसे बड़ी समिति है।
  • स्थापना: कृष्णा मेनन समिति की सिफारिश पर (1964)।
  • संरचना: इसमें 22 सदस्य होते हैं (15 लोकसभा से और 7 राज्यसभा से)।
  • भूमिका: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) की रिपोर्ट और खातों की जाँच करना।
  • कुल संख्या: वर्तमान में ऐसी 24 समितियाँ हैं।
  • संरचना: प्रत्येक समिति में 31 सदस्य होते हैं (21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से)।
  • भूमिका: इनका मुख्य कार्य कार्यपालिका की संसद के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से लोकसभा में मतदान से पहले ‘अनुदान की माँगों’ की विस्तृत जाँच करना।
समितिउद्देश्य
कार्य सलाहकार समिति (Business Advisory Committee)सदन के कार्यक्रम और समय-सारणी को विनियमित करती है।
अधीनस्थ विधान संबंधी समिति (Subordinate Legislation)यह जाँच करती है कि कार्यपालिका अपनी “नियम और उपविधि” बनाने की शक्ति का प्रयोग संसद द्वारा दी गई सीमाओं के भीतर कर रही है या नहीं।
आचार समिति (Ethics Committee)सदस्यों के दुर्व्यवहार के मामलों की जाँच करके अनुशासन और मर्यादा बनाए रखती है।
विशेषाधिकार समिति (Privileges Committee)सदन या उसके सदस्यों के “विशेषाधिकार हनन” के मामलों की जाँच करती है।
विशेषतालोक लेखा समिति (PAC)प्राकलन समितिसार्वजनिक उपक्रम समिति
सदस्य संख्या22 (15 LS + 7 RS)30 (केवल लोकसभा)22 (15 LS + 7 RS)
अध्यक्षआमतौर पर विपक्ष सेआमतौर पर सत्ता पक्ष सेलोकसभा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त
मुख्य कार्यखर्च होने के बाद जाँच (Post-mortem)कार्यक्षमता और बचत के सुझाव देनाPSUs का ऑडिट करना
CAG से संबंधCAG के साथ मिलकर कार्य करती हैकोई प्रत्यक्ष संबंध नहींPSUs पर CAG की रिपोर्ट जाँचती है

हमेशा याद रखें कि प्राकलन समिति ही एकमात्र ऐसी वित्तीय समिति है जिसमें राज्यसभा का कोई भी सदस्य शामिल नहीं होता है। इसके अलावा, इन तीनों वित्तीय समितियों में किसी भी मंत्री को सदस्य के रूप में नहीं चुना जा सकता।

संसदीय निगरानी • “आँख और कान”
स्थायी और वित्तीय समितियाँ

लोकतंत्र के समीक्षक

लोक लेखा समिति (PAC)
1921 में स्थापित। 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा)। CAG रिपोर्टों की जाँच करके व्यय की “शव-परीक्षा” (post-mortem) करती है।
विभागीय समितियाँ (DRSCs)
31 सदस्यों वाली 24 विभागीय समितियाँ (21 लोकसभा, 10 राज्यसभा)। अनुदानों की जाँच के माध्यम से कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं।
प्राकलन समिति (1950)
संरचना: 30 सदस्य, सभी केवल लोकसभा से। यह सबसे बड़ी संसदीय समिति है।
उद्देश्य: इसे ‘सतत मितव्ययिता समिति’ के रूप में जाना जाता है; यह सार्वजनिक व्यय में दक्षता और बचत के सुझाव देती है।
सार्वजनिक उपक्रम समिति (COPU)
संरचना: 22 सदस्य (15 लोकसभा, 7 राज्यसभा)। दक्षता सुनिश्चित करने के लिए PSUs के खातों और संबंधित CAG रिपोर्टों की जाँच करती है।

कार्य मंत्रणा समिति

सदन के कार्यक्रम और समय सारणी को विनियमित करती है। इसकी अध्यक्षता अध्यक्ष/सभापति करते हैं।

अधीनस्थ विधान

यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका संसद द्वारा सौंपे गए अधिकारों की सीमा के भीतर ही नियम और उपनियम बनाए।

आचार एवं विशेषाधिकार

सदन की गरिमा बनाए रखने के लिए सदस्यों के दुराचार और “विशेषाधिकार हनन” के मामलों की जाँच करती है।

गैर-पक्षपाती
ढाल
संसदीय समितियाँ एक ‘लघु-संसद’ के रूप में कार्य करती हैं जहाँ सदस्य दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करते हैं। विशेष रूप से, एक मंत्री को PAC, प्राकलन या COPU में नहीं चुना जा सकता। 1967 से, PAC का अध्यक्ष पारंपरिक रूप से विपक्ष से होता है, जो सरकार के वित्तीय निर्णयों का निष्पक्ष ऑडिट सुनिश्चित करता है।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (7 फ़रवरी, 2026) दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; आपदा प्रबंधन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन)।

  • संदर्भ: 5 फरवरी को मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स में एक अवैध ‘रैट-होल’ कोयला खदान में हुए विस्फोट में कम से कम 18 श्रमिकों की मृत्यु हो गई (बाद में यह संख्या बढ़कर 25 हो गई)। यह घटना शासन की विफलता और न्यायिक प्रतिबंधों के निष्प्रभावी होने को उजागर करती है।
  • मुख्य बिंदु:
    • प्रणालीगत विफलता: यह त्रासदी इस बात की “कठोर याद दिलाती है” कि अदालती निगरानी (जैसे 2014 का नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) प्रतिबंध) प्रभावी राज्य शासन का विकल्प नहीं हो सकती।
    • परिचालन संबंधी मानदंड: रैट-होल खनन इसलिए जारी है क्योंकि इसमें न्यूनतम निवेश की आवश्यकता होती है, लेकिन इसमें इंजीनियर द्वारा निर्मित छत और दीवारों की सुरक्षा का अभाव होता है, जिससे खदान धंसने की घटनाएं बार-बार होती हैं।
    • जवाबदेही का अभाव: भूमि के स्वामित्व का विखंडन और निजी मालिकाना हक खदान संचालकों को श्रमिकों को औपचारिक रिकॉर्ड से बाहर रखने और दुर्घटनाओं की कम रिपोर्टिंग करने की अनुमति देते हैं।
    • आपूर्ति श्रृंखला की सफाई (Laundering): अवैध कोयले को बिचौलियों के माध्यम से वैध बाजारों में आसानी से मिला दिया जाता है, जिससे नीलामी वाले कोयले और अवैध कोयले के बीच अंतर करना कठिन हो जाता है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पर्यावरणीय शासन”, “पूर्वोत्तर भारत की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां” और “सतत खनन नीति” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • निवारक के रूप में तकनीक: संपादकीय अवैध परिवहन की लागत बढ़ाने के लिए कोयला ले जाने वाले वाहनों के लिए अनिवार्य GPS ट्रैकिंग, ड्रोन गश्त और उपग्रह चित्रों के उपयोग की वकालत करता है।
    • विकल्पों की आवश्यकता: विकल्प प्रदान किए बिना प्रतिबंध अक्सर विफल हो जाते हैं; राज्य को खनन क्षेत्र के मजदूरों को खपाने के लिए बागवानी, पर्यटन और लघु विनिर्माण जैसे क्षेत्रों के लिए ऋण और बाजार संपर्क प्रदान करना चाहिए।
    • प्रशासनिक सुधार: स्थानीय संरक्षण (Patronage) का मुकाबला करने के लिए, संपादकीय संवेदनशील जिलों में प्रशासनिक पदों के रोटेशन और सामुदायिक निगरानी को प्रोत्साहित करने के लिए स्थानीय निकायों के साथ जुर्माने की राशि साझा करने का सुझाव देता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (पर्यावरण; संरक्षण; जलवायु परिवर्तन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: COP30 के बाद वैश्विक जलवायु वार्ताओं में आई संरचनात्मक गिरावट का एक आलोचनात्मक विश्लेषण, जहाँ प्रक्रियाएं तो बढ़ी हैं लेकिन वास्तविक कार्रवाई रुक गई है।
  • मुख्य बिंदु:
    • विज्ञान की राजनीति: वैज्ञानिकों की निश्चितता का उपयोग राजनेताओं द्वारा देरी को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है, यह तर्क देते हुए कि निर्णायक कार्रवाई का समय “अभी नहीं आया है।”
    • “ग्लोबल मुतिराओ” (Global Mutirão) पैकेज: COP30 ने सहयोग पर जोर देने वाला एक पैकेज प्रदान किया, लेकिन इसके उपाय काफी हद तक स्वैच्छिक हैं, जो “समान लेकिन विभेदित जिम्मेदारियों” (CBDR) के सिद्धांत को कमजोर करते हैं।
    • वित्त का अंतराल: विकासशील देशों के लिए वर्तमान जलवायु वित्त प्रवाह प्रति वर्ष 400 अरब डॉलर से कम है, जबकि वास्तविक आवश्यकता 2.4 ट्रिलियन से 3 ट्रिलियन डॉलर के बीच है।
    • बाजार की अवसरवादिता: सरकारी कार्रवाई के अभाव में, बाजार दीर्घकालिक पर्यावरणीय परिणामों के बजाय अल्पकालिक लाभ के आधार पर जलवायु अर्थव्यवस्था को चला रहे हैं।
  • UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक पर्यावरणीय राजनीति”, “UNFCCC और COP के परिणाम” तथा “जलवायु वित्त” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सार्वभौमिक वैधता: अपनी कमियों के बावजूद, UNFCCC समन्वित कार्रवाई के लिए एकमात्र सार्वभौमिक रूप से वैध मंच बना हुआ है; G-20 या BRICS जैसे विकल्पों में आवश्यक कानूनी ढांचे का अभाव है।
    • अनुकूलन (Adaptation) में ठहराव: हालांकि COP30 ने अनुकूलन वित्त को “तिगुना” करने का संकल्प लिया, लेकिन आधार वर्ष या बाध्यकारी स्रोतों की कमी के कारण यह वादा केवल एक आकांक्षा बनकर रह गया है।
    • संरचनात्मक विचलन: संपादकीय एक “शून्यता” की चेतावनी देता है जहाँ राष्ट्रीय हित वैश्विक तात्कालिकता पर हावी हो रहे हैं। लेख नोट करता है कि व्यक्ति बातचीत के मंच से तो बाहर निकल सकता है (hop off), लेकिन इस ग्रह से बाहर नहीं निकल सकता।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।

  • संदर्भ: भारत और यूरोपीय संघ के बीच हाल ही में संपन्न व्यापार समझौते का विश्लेषण, जो केवल वाणिज्यिक हितों से हटकर एक व्यापक रणनीतिक पुनर्गठन का संकेत देता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • भू-राजनीतिक झुकाव: “डोनरो डॉक्ट्रिन” (अमेरिकी वाणिज्यिक आक्रामकता) और चीन व रूस के खतरों से प्रेरित यह सौदा एक संघर्षपूर्ण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थिर करने का लक्ष्य रखता है।
    • शिखर सम्मेलन कूटनीति: इस सफलता का श्रेय 10 वर्षों के उच्च-स्तरीय जुड़ाव और स्पष्ट विचारों के आदान-प्रदान को दिया जाता है जिसने नई दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच आपसी विश्वास पैदा किया।
    • रणनीतिक बहुध्रुवीयता: यह साझेदारी बहुध्रुवीयता को व्यावहारिक अर्थ देने का एक “दुर्लभ अवसर” प्रदान करती है, जो विकास और सुरक्षा के लिए एक लोकतांत्रिक विकल्प पेश करती है।
    • आपूर्ति श्रृंखला लचीलापन: सेमीकंडक्टर, एआई (AI) और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे पर सहयोग का उद्देश्य आपसी कमजोरियों को कम करना है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-यूरोपीय संघ संबंध”, “रणनीतिक स्वायत्तता” और “वैश्विक मूल्य श्रृंखला” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • टैरिफ से परे: यदि यह समझौता केवल बाजार पहुंच तक सीमित रहता है, तो यह केवल सामरिक (Tactical) बनकर रह जाएगा; इसे रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और गतिशीलता के क्षेत्रों में और अधिक विस्तार देने की आवश्यकता है।
    • समुद्री स्थिरता: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संयुक्त सैन्य अभ्यास और सूचना साझा करने के बढ़ते अवसर मौजूद हैं।
    • सामाजिक गहराई: छात्रों और शोधकर्ताओं की आवाजाही के माध्यम से राजनीतिक तालमेल को सामाजिक गहराई में बदलने के लिए वीजा और पेशेवर मान्यता संबंधी विवादों को हल किया जाना चाहिए।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; भारत और इसके पड़ोसी; क्षेत्रीय नीतियों का प्रभाव)।

  • संदर्भ: जनवरी 2026 के अंत में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) द्वारा किए गए समन्वित हमले पाकिस्तान के सबसे बड़े प्रांत में हिंसा के गहरे होते चक्र पर जोर देते हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • गहराता अलगाव: राज्य की दमनकारी कार्रवाई और उग्रवाद विरोधी अभियान, जिनमें जबरन गायब करना (Enforced disappearances) और न्यायेतर हत्याएं शामिल हैं, ने उसी उग्रवाद को बढ़ावा दिया है जिसे वे कुचलना चाहते हैं।
    • संसाधन संघर्ष: बलूच राष्ट्रवादियों का तर्क है कि 60 अरब डॉलर की CPEC जैसी परियोजनाएं न्यूनतम पारदर्शिता और स्थानीय समुदायों के लिए सीमित आर्थिक लाभ के साथ आगे बढ़ रही हैं।
    • भारत का डर (Bogey): बिना किसी सत्यापन योग्य साक्ष्य के अशांति के लिए बार-बार भारत को दोषी ठहराने की इस्लामाबाद की प्रवृत्ति को एक ऐसी कहानी के रूप में वर्णित किया गया है जो आवश्यक आत्मनिरीक्षण से बचती है।
    • आतंकवादी पुनर्गठन: अफगान सीमा पर बिगड़ती स्थितियों ने बलूच विद्रोहियों और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को अपने अभियानों को तेज़ करने की अनुमति दी है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “पड़ोसी देशों की गतिशीलता”, “क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना” और “मानवाधिकार” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • प्रतिक्रियात्मक प्रतिशोध: संपादकीय नोट करता है कि सैन्य कार्रवाइयों के माध्यम से विद्रोहियों को मारना राजनीतिक समाधान के बिना स्थायी सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं होगा।
    • स्थिरता का मार्ग: शांति के लिए आर्थिक बहिष्कार की लंबे समय से चली आ रही शिकायतों को दूर करने और विद्रोही समूहों के साथ भी संवाद के रास्ते खोलने की आवश्यकता है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन; कल्याणकारी योजनाएं; शासन के महत्वपूर्ण पहलू) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।

  • संदर्भ: तेलंगाना का एक दुखद मामला जहाँ एक पिता ने कथित तौर पर अपनी बेटी की हत्या कर दी ताकि वह महाराष्ट्र के “दो बच्चों के नियम” को दरकिनार कर सके और उसकी पत्नी स्थानीय चुनाव लड़ सके।
  • मुख्य बिंदु:
    • दो बच्चों का नियम: 1990 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण उपाय के रूप में कई राज्यों द्वारा लागू किया गया यह नियम दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करता है।
    • विकृत प्रोत्साहन: यह मामला इस बात पर प्रकाश डालता है कि कैसे कड़े पात्रता मानदंड एक परिवार के कमजोर सदस्यों के लिए चरम और अनपेक्षित परिणाम पैदा कर सकते हैं।
    • संस्थागत बाधाएं: आरोपी ने शुरू में नियम से बचने के लिए अपने बेटे को गोद देने का प्रयास किया था, लेकिन अस्पताल के रिकॉर्ड इसमें बाधा बन गए।
  • UPSC प्रासंगिकता: “जनसंख्या नीति के प्रभाव”, “पंचायती राज शासन” और “सार्वजनिक जीवन में नैतिकता” के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सुनियोजित प्रकृति: जांच से पता चला कि हत्या की योजना सावधानीपूर्वक बनाई गई थी, जिसमें आरोपी ने अपनी पहचान छिपाने के लिए चेहरा ढंका था और ट्रैकिंग से बचने के लिए अपना फोन पीछे छोड़ दिया था।
    • जवाबदेही बनाम अधिकार: हालांकि इस नियम का उद्देश्य जनप्रतिनिधियों के बीच जिम्मेदारी सुनिश्चित करना था, यह रिपोर्ट बताती है कि जब राजनीतिक महत्वाकांक्षा कानूनी बाधाओं से टकराती है, तो यह सामाजिक विकृतियों का कारण बन सकती है।

संपादकीय विश्लेषण

07 फरवरी, 2026
GS-3 पर्यावरण जलवायु शासन का शून्य

वित्त अंतराल $2.4 ट्रिलियन से अधिक। जहाँ COP प्रक्रियाएँ बढ़ रही हैं, वहीं राष्ट्रीय हितों के वैश्विक तत्परता पर हावी होने से वास्तविक कार्रवाई रुकी हुई है।

GS-2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध भारत-EU: रणनीतिक महत्वपूर्ण मोड़

डोनरो सिद्धांत (Donroe Doctrine) का एक रणनीतिक विकल्प। इस समझौते का लक्ष्य सेमीकंडक्टर, AI और समुद्री क्षेत्र के माध्यम से वैश्विक व्यवस्था को स्थिर करना है।

GS-2 शासन / सामाजिक दो-बच्चा मानदंड की विकृति

तेलंगाना त्रासदी रेखांकित करती है कि स्थानीय चुनावों के लिए कड़ी पात्रता कैसे सुभेद्य परिवारों के लिए अत्यधिक और अनपेक्षित सामाजिक विकृतियाँ पैदा करती है।

शासन: उत्तर-पूर्व भारत में अवैध कोयला परिवहन की लागत बढ़ाने के लिए GPS ट्रैकिंग और ड्रोन गश्त को बढ़ाना अनिवार्य है।
पर्यावरण: देरी के बावजूद UNFCCC एकमात्र सार्वभौमिक रूप से वैध मंच है; “कोई भी इस ग्रह से बाहर नहीं कूद सकता।”
कूटनीति: भारत-यूरोपीय संघ के राजनीतिक तालमेल को सामाजिक गहराई में बदलने के लिए वीजा और पेशेवर पहचान के मुद्दों को हल करना होगा।
सामाजिक: जनसंख्या नियंत्रण नियम बुनियादी नैतिकता और मौलिक अधिकारों की कीमत पर स्थानीय लोकतंत्र में बाधक नहीं बनने चाहिए।
GS-4
विकृत प्रोत्साहन
जवाबदेही बनाम मानवता: तेलंगाना का मामला एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए कानूनी बाधाएं नैतिक तर्क के पतन का कारण बन सकती हैं। जब नीति डिजाइन मानवीय हताशा को समझने में विफल रहता है, तो वह जीवन की पवित्रता का उल्लंघन करने वाले विकृत प्रोत्साहनों को संस्थागत बनाने का जोखिम उठाता है।

यहाँ राजनयिक मानचित्रणनई समुद्री प्रजातियों की खोज और रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

7 फरवरी, 2026 की एक बड़ी राजनयिक घटना में “मानचित्रों के माध्यम से एक संदेश” दिया गया। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के साथ एक मानचित्र जारी किया, जिसके महत्वपूर्ण क्षेत्रीय निहितार्थ हैं।

  • रणनीतिक बदलाव: आधिकारिक अमेरिकी मानचित्र में संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को भारत के हिस्से के रूप में दर्शाया गया है।
  • मानचित्रण का महत्व: यह विवादित क्षेत्रों के लिए ‘डॉटेड लाइन्स’ (बिंदुदार रेखाओं) या टिप्पणियों का उपयोग करने की दीर्घकालिक अमेरिकी प्रथा से एक बड़ा विचलन है। इसे भारत के 1994 के संसदीय प्रस्ताव के अनुरूप एक “प्रतीकात्मक राजनयिक संकेत” के रूप में देखा जा रहा है।
  • मुख्य बिंदु: मानचित्र पर अक्साई चिन (उत्तर-पूर्वी लद्दाख) और PoK की स्थिति पहचानें—ध्यान दें कि पहली बार किसी बड़े अमेरिकी नीति दस्तावेज में इन्हें अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दिखाया गया है।

भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के शोधकर्ताओं ने बंगाल की खाड़ी के पारिस्थितिकी तंत्र में समुद्री कीड़ों (Polychaetes) की दो नई प्रजातियों का पता लगाया है।

  • स्थान: पश्चिम बंगाल तट के कीचड़ के मैदान (Mudflats) और मैंग्रोव क्षेत्र।
  • प्रजातियों के नाम:
    1. Namalycastis solenotognatha (इसकी विशिष्ट जबड़े की संरचना के आधार पर नाम)।
    2. Nereis dhritiae (ZSI की पहली महिला निदेशक, धृति बनर्जी के नाम पर)।
  • पारिस्थितिक महत्व: ये प्रजातियाँ अत्यधिक सल्फाइड युक्त और प्रदूषित वातावरण के अनुकूल हैं। ये सुंदरवन और आसपास के कीचड़ के मैदानों के स्वास्थ्य के ‘सूचक’ (Indicators) के रूप में कार्य करती हैं।

महाराष्ट्र के पश्चिमी घाट क्षेत्र में ‘ट्रैपडोर स्पाइडर’ (Trapdoor Spider) की एक नई प्रजाति दर्ज की गई है।

  • स्थान: कोल्हापुर जिला, महाराष्ट्र।
  • मानचित्रण संदर्भ: ट्रैपडोर मकड़ियाँ अद्वितीय हैं क्योंकि वे मिट्टी और रेशम से बने “ट्रैपडोर” (गुप्त द्वार) वाले बिलों में रहती हैं। यह खोज उत्तरी पश्चिमी घाट के जैव विविधता मानचित्रण में एक नया अध्याय जोड़ती है, जो क्षेत्र अपनी उच्च ‘स्थानिकता’ (Endemism) के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है।

7 फरवरी को मिली रिपोर्टों के अनुसार, भारत के “रणनीतिक सुरंग मानचित्र” (Strategic Tunnel Map) में तेजी से प्रगति हो रही है।

  • शिंकु ला सुरंग (Shinku La Tunnel): यह हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ती है। पूरा होने पर, यह 15,800 फीट की ऊंचाई के साथ दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग होगी।
  • सेला सुरंग (Sela Tunnel): यह अरुणाचल प्रदेश के तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है। यह उच्च-ऊंचाई वाले सेला दर्रे को बायपास करती है जो अक्सर बर्फबारी के कारण बंद रहता है।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
क्षेत्रीय मानचित्रअविभाजित J&K/लद्दाखभारत-अमेरिका व्यापार ढांचा मानचित्र
समुद्री खोजNereis dhritiaeपश्चिम बंगाल के कीचड़ के मैदान
दक्कन की खोजट्रैपडोर मकड़ीकोल्हापुर, महाराष्ट्र
रणनीतिक सीमातवांग कनेक्टिविटीसेला सुरंग, अरुणाचल प्रदेश

भारत-अमेरिका व्यापार मानचित्र की नई सीमाओं को चिह्नित करते समय सियाचिन हिमनद और गिलगित-बाल्टिस्तान के क्षेत्रों को विशेष रूप से देखें। यह मानचित्र केवल व्यापार के लिए नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता के अंतरराष्ट्रीय समर्थन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

मानचित्रण विवरण

मानचित्रण कूटनीति एवं जैव विविधता
संप्रभु संरेखण अविभाजित जम्मू-कश्मीर व्यापार मानचित्र

आधिकारिक USTR मानचित्र जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoK और अक्साई चिन सहित) को अविभाजित भारतीय क्षेत्र के रूप में दर्शाता है—एक प्रमुख कूटनीतिक बदलाव।

दक्कन स्थानिकता (Endemism) मकड़ी की खोज

महाराष्ट्र में “ट्रैपडोर स्पाइडर” की एक नई प्रजाति, टाइटनिडियोप्स कोल्हापुरेंसिस, दर्ज की गई, जो उत्तरी पश्चिमी घाट के जैव विविधता मानचित्र को समृद्ध करती है।

समुद्री भूगोल
मडफ्लैट्स के जैव-योद्धा

पश्चिम बंगाल में समुद्री कीड़ों की दो नई प्रजातियों, जिनमें नेरेस धृतिया (Nereis dhritiae) शामिल है, की पहचान की गई। सल्फाइड-युक्त प्रदूषित वातावरण के अनुकूल, ये महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र संकेतकों के रूप में कार्य करते हैं।

रणनीतिक सीमा ग्रिड
उच्च-ऊंचाई वाली सुरंगें

लाहौल को ज़ांस्कर से जोड़ने वाली शिंकू ला (15,800 फीट) और अरुणाचल प्रदेश के तवांग तक 365 दिन हर मौसम में पहुँच प्रदान करने वाली सेला सुरंग का मानचित्रण।

बंगाल की खाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र

सुंदरबन मडफ्लैट्स में नए पॉलीकीट्स की खोज लचीले जैविक मोर्चों के रूप में मैंग्रोव के मानचित्रण के महत्व को पुख्ता करती है।

क्षेत्रीय अविभाजित जम्मू-कश्मीर और लद्दाख।
समुद्री पश्चिम बंगाल मैंग्रोव मडफ्लैट्स।
रणनीतिक सेला सुरंग (तवांग पहुँच)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: अमेरिकी व्यापार दस्तावेजों में मानचित्रण परिवर्तन एक प्रमुख भू-राजनीतिक धुरी का संकेत देता है। साथ ही, कोल्हापुर में ट्रैपडोर मकड़ियों का दस्तावेजीकरण दक्कन के पठार की अमानचित्रित सूक्ष्म-स्थानिकता (micro-endemism) को उजागर करता है।

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