IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 5 फ़रवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 8 Chapter-9 (महिलाएँ, जाति एवं सुधार)
यह अध्याय “महिलाएँ, जाति एवं सुधार” 19वीं और 20वीं शताब्दी के भारत की सामाजिक स्थितियों और उन आंदोलनों की व्याख्या करता है जिन्होंने समाज में व्याप्त गहरी असमानताओं को चुनौती दी।
1. दो सौ साल पहले की सामाजिक स्थिति
19वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय समाज लिंग और जाति के आधार पर गहरे भेदभाव से ग्रस्त था।
महिलाओं की दुर्दशा
- बाल विवाह: अधिकांश बच्चों की शादी बहुत कम उम्र में ही कर दी जाती थी।
- बहुपत्नी प्रथा: हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की अनुमति थी।
- सती प्रथा: देश के कुछ हिस्सों में विधवाओं को उनके पति की चिता पर जिंदा जलने के लिए मजबूर किया जाता था। ऐसी महिलाओं को “सती” (यानी ‘सदाचारी महिला’) कहकर महिमामंडन किया जाता था।
- शिक्षा में बाधाएँ: महिलाओं के लिए शिक्षा के द्वार लगभग बंद थे। समाज में यह अंधविश्वास फैला था कि अगर महिला शिक्षित होगी, तो वह जल्दी विधवा हो जाएगी।
- संपत्ति के अधिकार: संपत्ति पर स्वामित्व या विरासत में महिलाओं के अधिकार बहुत सीमित थे।
जाति पदानुक्रम (Caste Hierarchies)
- उच्च जातियाँ: ब्राह्मण और क्षत्रिय खुद को सबसे ऊपर मानते थे।
- मध्यम जातियाँ: इसके बाद वैश्य (व्यापारी और महाजन) और फिर शूद्र (किसान और बुनकर/कुम्हार जैसे कारीगर) आते थे।
- अस्पृश्यता (छुआछूत): सबसे निचले स्तर पर वे लोग थे जिनके काम को “दूषित” माना जाता था। उन्हें मंदिरों में जाने, सवर्णों के कुओं से पानी भरने या उनके तालाबों का उपयोग करने की अनुमति नहीं थी।
2. सामाजिक सुधारों की शुरुआत
19वीं सदी में छपाई की नई तकनीक (किताबें, अखबार, पत्रिकाएं) के विकास ने सामाजिक मुद्दों पर बहस करना आसान बना दिया। पहली बार आम जनता के बीच इन बुराइयों पर चर्चा शुरू हुई।
राजा राममोहन राय और ब्रह्म समाज
- ब्रह्म सभा: राममोहन राय ने कलकत्ता में ‘ब्रह्म सभा’ (बाद में ब्रह्म समाज) की स्थापना की। उनका मानना था कि समाज में अन्यायपूर्ण प्रथाओं को बदला जाना चाहिए।
- सती प्रथा का अंत: राममोहन राय ने प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान के आधार पर यह सिद्ध किया कि सती प्रथा को प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कहीं भी स्वीकृति नहीं दी गई है।
- कानूनी सफलता: उनके प्रयासों से प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया।
विधवा विवाह (Widow Remarriage)
- ईश्वरचंद्र विद्यासागर: उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का हवाला देकर तर्क दिया कि विधवाओं को दोबारा शादी करने की अनुमति होनी चाहिए।
- कानून: उनके सुझावों पर अमल करते हुए अंग्रेजों ने 1856 में विधवा विवाह के पक्ष में कानून पारित किया।
- आंदोलन का प्रसार: मद्रास प्रेसीडेंसी में वीरेशलिंगम पंतुलु और आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी विधवा विवाह का पुरजोर समर्थन किया।
3. महिला शिक्षा का विस्तार
सुधारकों का मानना था कि महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए शिक्षा सबसे प्रभावी उपकरण है, हालाँकि उन्हें भारी सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा।
- विरोध और भय: लोगों को डर था कि स्कूल जाने से लड़कियाँ घरेलू कामकाज छोड़ देंगी और सार्वजनिक स्थानों से गुजरने पर उन पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।
- घरेलू शिक्षा: इस डर के कारण कई महिलाओं को उनके उदारवादी पिताओं या पतियों ने घर पर ही पढ़ाया। राससुंदरी देवी जैसी महिलाओं ने तो मोमबत्ती की रोशनी में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा।
- मुस्लिम सुधारक: मुमताज़ अली ने कुरान की आयतों की पुनर्व्याख्या की ताकि महिलाओं की शिक्षा के पक्ष में तर्क दिया जा सके। भोपाल की बेगमों और बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने मुस्लिम लड़कियों के लिए स्कूल खोले।
4. महिला सुधारकों की आवाज़
19वीं सदी के अंत तक महिलाओं ने स्वयं लिखना और अपनी सामाजिक स्थिति को चुनौती देना शुरू कर दिया।
- ताराबाई शिंदे: उन्होंने ‘स्त्री-पुरुष तुलना’ नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक भेदभाव और दोहरे मानदंडों की कड़ी आलोचना की गई।
- पंडिता रमाबाई: वे संस्कृत की महान विद्वान थीं। उन्होंने ऊँची जातियों की हिंदू महिलाओं के उत्पीड़न पर लिखा और पुणे में एक ‘विधवा गृह’ की स्थापना की ताकि बेसहारा महिलाओं को आश्रय और व्यावसायिक प्रशिक्षण मिल सके।
- राजनैतिक दबाव: 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं ने वोट देने के अधिकार, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और कानूनी समानता के लिए अपने संगठन बनाए।
5. जातिगत असमानता के विरुद्ध आंदोलन
19वीं और 20वीं सदी में जाति व्यवस्था के अन्याय को चुनौती देने वाले कई आंदोलन शुरू हुए।
ज्योतिराव फुले और ‘गुलामगीरी’
- आर्यों की श्रेष्ठता पर हमला: फुले का तर्क था कि ब्राह्मण स्वयं को जो श्रेष्ठ बताते हैं वह गलत है क्योंकि वे बाहर से आए ‘आर्य’ हैं जिन्होंने यहाँ के मूल निवासियों (निम्न जातियों) को गुलाम बनाया।
- सत्यशोधक समाज: फुले द्वारा स्थापित इस संगठन ने जातिगत समानता के विचार का प्रचार किया।
- अंतर्राष्ट्रीय संबंध: 1873 में अपनी पुस्तक ‘गुलामगीरी’ को फुले ने उन अमेरिकियों को समर्पित किया जिन्होंने दासों को मुक्त करने के लिए संघर्ष किया था, इस प्रकार उन्होंने भारत की निम्न जातियों और अमेरिका के काले दासों की स्थिति को एक साथ जोड़ दिया।
20वीं सदी के नेतृत्व
- डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: एक महार परिवार में जन्मे अम्बेडकर ने बचपन से जातिगत भेदभाव झेला था। उन्होंने 1927 से 1935 के बीच तीन मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाए ताकि समाज में जातिगत पूर्वाग्रहों की गहराई को उजागर किया जा सके।
- ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार): उन्होंने दक्षिण भारत में ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ (Self Respect Movement) शुरू किया। वे मनुस्मृति और रामायण जैसे धर्मग्रंथों के कट्टर आलोचक थे, क्योंकि उनका मानना था कि इनका उपयोग ब्राह्मणवादी और पुरुष वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया गया है।
6. प्रमुख सुधार संगठन (Quick Glance)
- ब्रह्म समाज (1830): मूर्ति पूजा और बलि का विरोध किया; उपनिषदों में विश्वास।
- यंग बंगाल आंदोलन: हेनरी डेरोजियो के नेतृत्व में; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तार्किक सोच पर जोर।
- रामकृष्ण मिशन: स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित; समाज सेवा और निस्वार्थ कर्म के माध्यम से मुक्ति का मार्ग।
- अलीगढ़ आंदोलन: सर सैयद अहमद खान के नेतृत्व में; मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए 1875 में ‘मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज’ की स्थापना।
- सिंह सभा आंदोलन: सिखों में व्याप्त अंधविश्वासों और जातिवाद को दूर करने तथा आधुनिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए अमृतसर में शुरुआत।
महत्वपूर्ण शब्दावली:
- सुधारक: वे व्यक्ति जो समाज में बदलाव लाने का प्रयास करते हैं।
- सती: पति के साथ चिता पर जलने वाली ‘पुण्यवान’ महिला (शाब्दिक अर्थ)।
- अस्पृश्य: वे लोग जिन्हें समाज के मुख्य हिस्से से अलग रखा गया था।
- महार: महाराष्ट्र की एक प्रमुख अछूत मानी जाने वाली जाति।
महिलाएँ, जाति एवं सुधार
गुलामगीरी
1873 में फुले द्वारा लिखी गई पुस्तक, जिसका अर्थ है ‘गुलामी’; इसे अमेरिकी दास-मुक्ति आंदोलन को समर्पित किया गया।
आर्य समाज
हिंदू धर्म में सुधार और शिक्षा के समर्थन के लिए 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा स्थापित।
मंदिर प्रवेश
पवित्र सार्वजनिक स्थानों से दलितों के बहिष्कार को चुनौती देने के लिए अंबेडकर के नेतृत्व में चलाए गए आंदोलन।
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: विधायी प्रक्रिया: विधेयकों के प्रकार
भारतीय संसद में विधेयकों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है: साधारण विधेयक, धन विधेयक, वित्त विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक। यहाँ पहले तीन प्रकारों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो विधायी कार्यों के बड़े हिस्से को नियंत्रित करते हैं।
1. साधारण विधेयक (अनुच्छेद 107 और 108)
ये विधेयक वित्तीय विषयों के अलावा किसी भी अन्य मामले से संबंधित होते हैं।
- प्रस्तुतीकरण: इसे संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में पेश किया जा सकता है।
- किसके द्वारा: इसे या तो कोई मंत्री (सरकारी विधेयक) या कोई गैर-सरकारी सदस्य (Private Member) पेश कर सकता है।
- पारित होना: इसे दोनों सदनों द्वारा ‘साधारण बहुमत’ से पारित किया जाना आवश्यक है।
- गतिरोध और संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108): यदि दोनों सदनों के बीच विधेयक को लेकर असहमति हो, तो राष्ट्रपति गतिरोध को दूर करने के लिए दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है।
- राज्यसभा की शक्ति: राज्यसभा किसी साधारण विधेयक को अधिकतम 6 महीने तक रोक सकती है।
2. धन विधेयक (अनुच्छेद 110 और 109)
अनुच्छेद 110 के अनुसार, कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ तब माना जाता है जब उसमें केवल कराधान (Taxation), सरकार द्वारा धन उधार लेने, या भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) से संबंधित मामले शामिल हों।
- प्रमाणन (Certification): केवल लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) ही यह प्रमाणित कर सकता है कि कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं। उनका निर्णय अंतिम होता है और उसे किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- प्रस्तुतीकरण (अनुच्छेद 109):
- इसे केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है।
- इसे पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश अनिवार्य है।
- राज्यसभा की सीमित भूमिका:
- राज्यसभा इसे न तो अस्वीकार कर सकती है और न ही इसमें संशोधन कर सकती है; वह केवल सिफारिशें कर सकती है।
- राज्यसभा को यह विधेयक 14 दिनों के भीतर वापस करना होता है।
- यदि राज्यसभा 14 दिनों के भीतर कार्रवाई नहीं करती है, तो इसे दोनों सदनों द्वारा पारित मान लिया जाता है।
- राष्ट्रपति की अनुमति: राष्ट्रपति इसे अपनी सहमति दे सकता है या रोक सकता है, लेकिन वह इसे पुनर्विचार के लिए वापस नहीं भेज सकता (क्योंकि यह उनकी पूर्व अनुमति से ही पेश किया गया था)।
3. वित्त विधेयक (अनुच्छेद 117)
एक प्रसिद्ध कहावत है: “सभी धन विधेयक वित्त विधेयक होते हैं, लेकिन सभी वित्त विधेयक धन विधेयक नहीं होते।” इसके दो प्रकार हैं:
A. वित्त विधेयक (I) – अनुच्छेद 117(1):
इसमें अनुच्छेद 110 में उल्लिखित विषयों के साथ-साथ अन्य सामान्य विधायी मामले भी शामिल होते हैं।
- धन विधेयक के साथ समानता: इसे भी केवल लोकसभा में राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही पेश किया जा सकता है।
- साधारण विधेयक के साथ समानता: एक बार पेश होने के बाद, इसे साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अर्थात राज्यसभा इसे संशोधित या अस्वीकार कर सकती है और इस पर संयुक्त बैठक बुलाई जा सकती है)।
B. वित्त विधेयक (II) – अनुच्छेद 117(3):
इसमें भारत की संचित निधि से व्यय (Expenditure) से जुड़े प्रावधान होते हैं, लेकिन अनुच्छेद 110 का कोई भी विषय इसमें शामिल नहीं होता।
- प्रक्रिया: इसे पूरी तरह से एक साधारण विधेयक की तरह माना जाता है। इसे किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है और इसे पेश करने के लिए राष्ट्रपति की सिफारिश की आवश्यकता नहीं होती (सिफारिश केवल विचार करने के चरण में आवश्यक होती है)।
तुलनात्मक तालिका (Comparison Table)
| विशेषता | साधारण विधेयक | धन विधेयक (अनु. 110) | वित्त विधेयक (I) |
| उत्पत्ति का सदन | किसी भी सदन में | केवल लोकसभा में | केवल लोकसभा में |
| राष्ट्रपति की सिफारिश | आवश्यक नहीं | अनिवार्य | अनिवार्य |
| राज्यसभा की शक्ति | संशोधन/अस्वीकार कर सकती है | न संशोधन, न अस्वीकार | संशोधन/अस्वीकार कर सकती है |
| गतिरोध का समाधान | संयुक्त बैठक | संयुक्त बैठक का प्रावधान नहीं | संयुक्त बैठक |
| अधिकतम विलंब (RS) | 6 महीने | 14 दिन | 6 महीने |
4. विधेयक के पारित होने के 5 चरण
प्रत्येक विधेयक को कानून बनने के लिए दोनों सदनों में इन चरणों से गुजरना पड़ता है:
- प्रथम वाचन (First Reading): विधेयक को पेश करना और इसे भारत के राजपत्र (Gazette) में प्रकाशित करना।
- द्वितीय वाचन (Second Reading): इसमें विधेयक पर सामान्य चर्चा होती है और फिर प्रत्येक खंड (Clause) पर विस्तार से विचार किया जाता है। यह सबसे महत्वपूर्ण चरण है।
- तृतीय वाचन (Third Reading): इस चरण में विधेयक पर अंतिम रूप से मतदान होता है (यहाँ कोई संशोधन नहीं किया जा सकता)।
- दूसरे सदन में विधेयक: दूसरे सदन में भी यही तीनों वाचन (Readings) होते हैं।
- राष्ट्रपति की अनुमति: जब दोनों सदन विधेयक पारित कर देते हैं, तो यह राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह ‘अधिनियम’ (Act) बन जाता है।
💡 परीक्षा के लिए टिप:
यह याद रखें कि संयुक्त बैठक (Joint Sitting) का प्रावधान केवल साधारण विधेयकों और वित्त विधेयकों के लिए है। धन विधेयक और संविधान संशोधन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक नहीं बुलाई जा सकती।
विधेयकों का वर्गीकरण
वित्त विधेयक (I)
सिफारिश के साथ केवल लोकसभा में पेश किया जाता है; एक बार पेश होने के बाद, इसे साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अनु. 117(1))।
वित्त विधेयक (II)
इसमें संचित निधि से व्यय शामिल होता है। इसे पूरी तरह से साधारण विधेयक की तरह माना जाता है (अनु. 117(3))।
सहमति शक्ति
राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए वापस नहीं कर सकते, क्योंकि यह उनकी पूर्व सहमति से ही पेश किया जाता है।
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (5 फ़रवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (5 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. हाथ मिलाना: मणिपुर में आंतरिक एकता और क्षेत्रीय कलह
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शासन के महत्वपूर्ण पहलू; केंद्र-राज्य संबंध; संघवाद) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (आंतरिक सुरक्षा)।
- संदर्भ: मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को वापस लिया जाना और युमनाम खेमचंद सिंह का राज्य के 13वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेना।
- मुख्य बिंदु:
- राष्ट्रपति शासन की समाप्ति: राष्ट्रपति शासन को लागू होने के लगभग एक साल बाद वापस ले लिया गया है ताकि एक लोकप्रिय चुनी हुई सरकार की वापसी हो सके और इसे आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक अनिवार्य संवैधानिक संशोधन विधेयक से बचा जा सके।
- गठबंधन नेतृत्व: नई सरकार में दो उपमुख्यमंत्री शामिल किए गए हैं—नेमचा किपजेन (कुकी-ज़ो समुदाय से) और लोसी दिखो (नागा पीपुल्स फ्रंट से)। इसका उद्देश्य समावेशिता का संदेश देना है।
- निरंतर विस्थापन: अनुमानित 60,000 विस्थापित व्यक्तियों में से केवल 9,000 ही अपने घरों को लौट पाए हैं, जो समुदायों के बीच विश्वास की भारी कमी को दर्शाता है।
- जातीय तनाव: भाजपा की आंतरिक एकता के बावजूद, प्रमुख कुकी-ज़ो संगठनों (KZC और KIM) ने अपने विधायकों को सरकार में शामिल होने के खिलाफ चेतावनी दी है और “अलग प्रशासन” की अपनी मांग पर अड़े हुए हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा चुनौतियां”, “राज्यपाल की भूमिका और राष्ट्रपति शासन” तथा “जातीय-राजनीतिक संघर्ष” के लिए अनिवार्य।
- विस्तृत विश्लेषण:
- नेतृत्व का परिवर्तन: पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के “विफल दूसरे कार्यकाल” के कारण भाजपा के भीतर विरोधियों के एक गठबंधन ने सफलतापूर्वक नेतृत्व परिवर्तन के लिए दबाव बनाया।
- सुरक्षा बनाम सुलह: हालांकि सुरक्षा बलों ने लूटे गए कई हथियारों को बरामद किया है, लेकिन जनवरी में एक कुकी-ज़ो क्षेत्र में एक मैतेई व्यक्ति की हत्या यह दर्शाती है कि कट्टरपंथी समूहों का अभी भी महत्वपूर्ण प्रभाव बना हुआ है।
2. बजट और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण की अनिवार्यता
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; सरकारी बजट; राजकोषीय नीति)।
- संदर्भ: सी. रंगराजन और डी.के. श्रीवास्तव द्वारा 2026-27 के केंद्रीय बजट में व्यय के संरचनात्मक बदलावों और राजकोषीय सुदृढ़ीकरण (Fiscal Consolidation) की धीमी गति का विश्लेषण।
- मुख्य बिंदु:
- राजस्व पुनर्गठन: कुल व्यय में राजस्व व्यय की हिस्सेदारी 2014-15 के 88 प्रतिशत से गिरकर 2026-27 में 77 प्रतिशत हो गई है। इसका मुख्य कारण केंद्रीय सब्सिडी में 7 प्रतिशत की कटौती है।
- स्थिर पूंजीगत व्यय (Capex): हालांकि नाममात्र के पूंजीगत व्यय में 11.5 प्रतिशत की वृद्धि का बजट रखा गया है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के प्रतिशत के रूप में यह पिछले वर्ष के 3.1 प्रतिशत के स्तर पर ही स्थिर है।
- ब्याज का बोझ: ब्याज भुगतान अब राजस्व प्राप्तियों का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा डकार रहा है, जिससे प्राथमिक विकासात्मक कार्यों के लिए राजकोषीय स्थान बहुत कम हो गया है।
- 16वाँ वित्त आयोग (FC16): वित्त आयोग ने राज्यों के लिए 41 प्रतिशत की हिस्सेदारी बरकरार रखी है, लेकिन ‘राजस्व घाटा अनुदान’ को बंद कर दिया है, जिससे हस्तांतरण में कुल मिलाकर कमी आई है।
- UPSC प्रासंगिकता: “मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता”, “राजकोषीय संघवाद” और “संसाधन संग्रहण” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- धीमा सुदृढ़ीकरण: राजकोषीय घाटा-जीडीपी अनुपात में वार्षिक कमी 2026-27 के बजट अनुमानों में घटकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गई है।
- निजी निवेश का जोखिम: यदि केंद्र और राज्यों का संयुक्त घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 8-9 प्रतिशत पर बना रहता है, तो यह निजी क्षेत्र के लिए निवेश योग्य संसाधनों को बाजार से बाहर धकेल देगा (Crowding out effect)।
3. परमाणु निवारण (Nuclear Deterrence) के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का प्रभाव; द्विपक्षीय संबंध)।
- संदर्भ: 5 फरवरी, 2026 को ‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि की समाप्ति और ट्रम्प प्रशासन के तहत नाटो (NATO) के भीतर विश्वास का टूटना।
- मुख्य बिंदु:
- हथियार नियंत्रण का अंत: ‘न्यू स्टार्ट’ अमेरिका और रूस के परमाणु शस्त्रागार को सीमित करने वाली अंतिम शेष संधि थी; इसकी समाप्ति शीत युद्ध के दौर जैसी हथियार जमा करने की होड़ की वापसी का संकेत है।
- आधुनिकीकरण की दौड़: चीन (2023 से प्रतिवर्ष 100 हथियार जोड़ रहा है), रूस और अमेरिका सभी अपने परमाणु भंडारों के आधुनिकीकरण में लगे हुए हैं।
- रणनीतिक बदलाव: ग्रीनलैंड को लेकर यूरोप और अमेरिका के बीच आई दरार ने अमेरिका की “अंतिम सुरक्षा गारंटर” वाली छवि को नुकसान पहुँचाया है।
- यूक्रेन का सबक: इस संघर्ष ने दिखाया है कि एक गैर-परमाणु देश भी परमाणु शक्ति संपन्न शत्रु के खिलाफ अपना बचाव कर सकता है, यदि उसे मजबूत पारंपरिक सैन्य सहायता मिले।
- UPSC प्रासंगिकता: “वैश्विक सुरक्षा संरचना”, “परमाणु अप्रसार” और “अमेरिका-यूरोप-रूस भू-राजनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- यूरोपीय स्वायत्तता: यूरोप अब एक नई सुरक्षा संरचना पर विचार करने के लिए मजबूर है जिसमें ब्रिटिश और फ्रांसीसी “परमाणु छतरी” (Nuclear Umbrella) शामिल हो सकती है।
- वर्जना बनाम वास्तविकता: हालांकि 1945 के बाद से किसी परमाणु हथियार का उपयोग नहीं किया गया है, लेकिन “उपयोग योग्य” टैक्टिकल परमाणु हथियारों के विकास से परमाणु हमले और पारंपरिक हमले के बीच की रेखा धुंधली हो रही है।
4. यूजीसी (UGC) नियम 2026: समानता पर बहस
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (राजव्यवस्था; सामाजिक न्याय; उच्च शिक्षा)।
- संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना, 2026) के नियमों पर रोक लगा दी है, जिसमें स्पष्टता की कमी और संभावित दुरुपयोग का हवाला दिया गया है।
- मुख्य बिंदु:
- परिभाषा संबंधी विवाद: विवाद का केंद्र “जाति-आधारित भेदभाव” की नई परिभाषा है, जो विशेष रूप से केवल SC, ST और OBC समुदायों के सदस्यों पर केंद्रित है।
- अपराधी का अनुमान: अनारक्षित (सामान्य) श्रेणी के सदस्यों का आरोप है कि ये नियम अनुचित रूप से यह मान लेते हैं कि वे हमेशा भेदभाव करने वाले पक्ष होंगे।
- सुरक्षा उपायों का अभाव: 2026 के नियमों ने उन पिछले प्रावधानों को हटा दिया है जिनका उद्देश्य “झूठी” या “प्रेरित” शिकायतों को दंडित करना था।
- न्यायिक अल्टीमेटम: न्यायालय ने 2026 के नियमों पर रोक लगाते हुए पुराने 2012 के नियमों को लागू रखा है, और यह सवाल उठाया है कि क्या जाति के लिए अलग परिभाषा संवैधानिक रूप से मान्य है।
- UPSC प्रासंगिकता: “शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 14, 15)” और “न्यायिक समीक्षा”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- वास्तविक समानता: सरकार का तर्क है कि उसे भेदभाव के विशिष्ट उपसमूहों को पहचानने का अधिकार है, क्योंकि जाति-आधारित पूर्वाग्रह असमान होते हैं और वंचित समूहों के लिए अधिक हानिकारक होते हैं।
5. डेटा पॉइंट: स्कूलों में अनुबंधात्मक श्रम (Contractual Labor) की निरंतरता
पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (शिक्षा से संबंधित मुद्दे; मानव संसाधन) और सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 (सामाजिक मुद्दे)।
- संदर्भ: भारत में 1.5 लाख से अधिक ऐसे स्कूल हैं जहाँ शिक्षण कार्यबल का कम से कम 50 प्रतिशत हिस्सा अनुबंधात्मक (Contractual) या अंशकालिक है।
- मुख्य बिंदु:
- कार्यबल में हिस्सेदारी: अनुबंध के आधार पर नियोजित शिक्षक (शिक्षा मित्र, अतिथि शिक्षक) वर्तमान में भारत के कुल स्कूली कार्यबल का 16 प्रतिशत (16 लाख से अधिक) हैं।
- वेतन असमानता: विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार, अनुबंधात्मक शिक्षक समान कार्य करने के बावजूद नियमित शिक्षकों की तुलना में अक्सर एक-चौथाई या उससे भी कम वेतन पाते हैं।
- पूर्वोत्तर में एकाग्रता: अनुबंधात्मक कर्मचारियों पर निर्भरता मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में सबसे अधिक है।
- निजी क्षेत्र का प्रभाव: लगभग 21 प्रतिशत निजी स्कूलों में कम से कम आधा कार्यबल अनुबंधात्मक है, जो सभी प्रबंधन प्रकारों में सबसे अधिक है।
- UPSC प्रासंगिकता: “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की चुनौतियां”, “श्रम कानूनों का उल्लंघन” और “श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- लेबल का दुरुपयोग: पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला सुनाया कि प्रशासन 10 साल से अधिक समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को स्थायी दर्जा देने से मना करने के लिए “अनुबंधात्मक लेबल” का दुरुपयोग नहीं कर सकता।
- निरंतर विरोध प्रदर्शन: पुडुचेरी, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में नौकरी के नियमितीकरण के लिए चल रहे प्रदर्शन इस राष्ट्रीय समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं।
संपादकीय विश्लेषण
05 फरवरी, 2026ब्याज भुगतान राजस्व प्राप्तियों का 40% हिस्सा ले रहा है। सब्सिडी में 7% की कटौती की गई क्योंकि राजस्व व्यय का हिस्सा गिरकर 77% रह गया है।
‘न्यू स्टार्ट’ (New START) संधि की समाप्ति सीमाओं के अंत का संकेत है। चीन सालाना 100 वारहेड जोड़ रहा है क्योंकि निवारण अब “उपयोग योग्य” सामरिक परमाणु हथियारों की ओर बढ़ रहा है।
1.5 लाख स्कूलों में 50% संविदा कर्मचारी हैं। समान कार्यों के बावजूद पैरा-टीचर्स नियमित कर्मचारियों के वेतन का केवल 1/4 हिस्सा कमाते हैं।
न्याय और नीति
Mapping:
यहाँ पारिस्थितिक संगमों, वैज्ञानिक बुनियादी ढांचे, और पवित्र नदी भूगोल पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:
1. भूगर्भीय संगम: धौलपुर-करौली बाघ अभयारण्य (DKTR)
इस अभयारण्य का मानचित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत की दो सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों के एक अद्वितीय मिलन बिंदु पर स्थित है।
- संगम बिंदु: यह राजस्थान में विंध्य और अरावली पर्वत श्रृंखलाओं के भूगर्भीय मिलन बिंदु पर स्थित है।
- स्थलाकृतिक विशेषता: इसकी विशेषता चंबल नदी बेसिन के विस्तृत और ऊबड़-खाबड़ बीहड़ (Ravines) हैं।
- मानचित्रण संदर्भ: यह अभयारण्य लगभग 1,111 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और रणथंभौर तथा उत्तरी आवासों के बीच बाघों की आवाजाही के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण गलियारे (Corridor) के रूप में कार्य करता है।
2. वैज्ञानिक मानचित्रण: लद्दाख में विशाल दूरबीनें (Mega Telescopes)
उच्च-ऊंचाई वाले बुनियादी ढांचे का निर्माण वर्ष 2026 का एक प्रमुख विषय है। ‘ट्रांस-हिमालय’ क्षेत्र में दो प्रमुख “विशाल विज्ञान” (Mega Science) सुविधाओं का मानचित्रण किया जा रहा है।
- राष्ट्रीय विशाल सौर दूरबीन (National Large Solar Telescope – NLST): इसे लद्दाख की पैंगोंग झील के पास स्थापित किया जा रहा है। इस स्थान का चयन रणनीतिक रूप से उच्च-ऊंचाई वाले सौर अनुसंधान के लिए किया गया है।
- 30-मीटर राष्ट्रीय विशाल ऑप्टिकल दूरबीन (NLOT): यह वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग के लिए एक प्रमुख बिंदु है, जो गहरे अंतरिक्ष (Deep-space) के अवलोकन में भारत की स्थिति को मजबूत करेगा।
3. नदी भूगोल: फल्गु नदी (बिहार)
5 फरवरी, 2026 को फल्गु नदी के अद्वितीय “छिपे हुए” भूगोल को इसके सांस्कृतिक और जल विज्ञान संबंधी महत्व के कारण रेखांकित किया गया।
- संगम और मार्ग: यह गया के पास लीलाजन और मोहना नदियों के मिलन से बनती है। अंततः यह पुनपुन नदी में मिल जाती है, जो गंगा की एक सहायक नदी है।
- “गुप्त गंगा” (Hidden Ganga): इसे मानचित्र पर एक “छिपी हुई” नदी के रूप में दिखाया जाता है क्योंकि यह एक चौड़े रेतीले तल के नीचे बहती है, और वर्ष के अधिकांश समय सतह पर सूखी दिखाई देती है।
- मैपिंग पॉइंट: ऐतिहासिक रूप से इस नदी को ‘निरंजना नदी’ के रूप में जाना जाता है, जिसके तट पर गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था।
4. संरक्षण अद्यतन (Update): नलसरोवर पक्षी अभयारण्य (गुजरात)
फरवरी 2026 में हुई एक महत्वपूर्ण गणना के अनुसार पक्षियों की आबादी में 21 प्रतिशत का उछाल देखा गया है, जो इसे एक प्रमुख पारिस्थितिक मानचित्रण बिंदु बनाता है।
- गणना डेटा: 200 से अधिक प्रजातियों के 5 लाख से अधिक पक्षी दर्ज किए गए।
- भौगोलिक विशेषता: यह 120.82 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है; पक्षियों की आबादी में वृद्धि का मुख्य कारण पिछले दो वर्षों के दौरान नौकायन (Boating) पर पूर्ण प्रतिबंध और शोर प्रदूषण में कमी को माना गया है।
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| श्रेणी | मानचित्रण मुख्य बिंदु | मुख्य स्थान |
| पर्वत संगम | विंध्य-अरावली लिंक | धौलपुर-करौली, राजस्थान |
| छिपी हुई नदी | फल्गु (निरंजना) | गया, बिहार |
| सौर विज्ञान केंद्र | पैंगोंग झील | लद्दाख |
| आर्द्रभूमि सफलता | नलसरोवर गणना | गुजरात |
💡 मैपिंग टिप:
फल्गु नदी का अध्ययन करते समय मानचित्र पर ‘विष्णुपद मंदिर’ की स्थिति को भी देखें, जो इसी नदी के तट पर स्थित है। विंध्य और अरावली के संगम को चिह्नित करते समय यह ध्यान रखें कि अरावली श्रृंखला उत्तर-पूर्व की ओर (दिल्ली की तरफ) जाती है, जबकि विंध्य श्रृंखला पूर्व की ओर बढ़ती है।
मानचित्रण विवरण
पारिस्थितिक संगम एवं पवित्र नदियाँगया के पास लीलाजन और मोहना के संगम से निर्मित यह नदी (प्राचीन निरंजना) रेतीले तल के नीचे बहती है, और साल के अधिकांश समय सतह पर सूखी या “छिपी” रहती है।
उन्नत अंतरिक्ष अवलोकन के लिए पेंगोंग झील के पास नेशनल लार्ज सोलर टेलिस्कोप और 30-मीटर ऑप्टिकल टेलीस्कोप का रणनीतिक मानचित्रण।
राजस्थान की ऊबड़-खाबड़ बीहड़ स्थलाकृति में बाघों के प्रसार के पैटर्न को समझने के लिए रणथंभौर-DKTR अक्ष का मानचित्रण आवश्यक है।