यह अध्याय “‘देशी जनता’ को सभ्य बनाना राष्ट्र को शिक्षित करना” भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान शिक्षा के विकास और इसके प्रति ब्रिटिश अधिकारियों तथा भारतीय विचारकों की विभिन्न प्रतिक्रियाओं की व्याख्या करता है।

1783 में विलियम जोन्स (William Jones) एक जूनियर जज के रूप में कलकत्ता आए। वे एक भाषाविद (Linguist) थे और उन्होंने स्थानीय पंडितों के साथ संस्कृत, व्याकरण और कविता का अध्ययन करना शुरू किया।

  • परंपरा के प्रति सम्मान: जोन्स और हेनरी थॉमस कोलब्रुक जैसे विद्वान भारत और पश्चिम दोनों की प्राचीन संस्कृतियों के प्रति गहरा सम्मान रखते थे।
  • अतीत की पुनः खोज: उनका मानना था कि भारतीय सभ्यता प्राचीन काल में अपने गौरव के शिखर पर थी, लेकिन बाद में उसका पतन हो गया।
  • संस्कृति के संरक्षक: उनका मानना था कि प्राचीन पवित्र और कानूनी ग्रंथों का अनुवाद करके अंग्रेज भारतीयों को अपनी विरासत को फिर से खोजने में मदद कर सकते हैं, जबकि अंग्रेज उस संस्कृति के “स्वामी” और “अभिभावक” बन जाएंगे।
  • दिल जीतना: अधिकारियों का तर्क था कि अंग्रेजों को वही पढ़ाना चाहिए जिसे देशी लोग महत्व देते हैं और जिससे वे परिचित हैं (संस्कृत और फारसी साहित्य), ताकि वे अपनी प्रजा का सम्मान और विश्वास जीत सकें।
  • कलकत्ता मदरसा (1781): अरबी, फारसी और इस्लामी कानून के अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए स्थापित।
  • हिंदू कॉलेज, बनारस (1791): प्राचीन संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन को प्रोत्साहित करने के लिए, जो प्रशासन में उपयोगी हो सकें।
  • एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल: विलियम जोन्स द्वारा शोध करने और एशियाटिक रिसर्च नामक पत्रिका प्रकाशित करने के लिए स्थापित।

19वीं शताब्दी की शुरुआत तक, कई ब्रिटिश अधिकारियों ने प्राच्यवादी दृष्टिकोण पर हमला करना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे वैज्ञानिक आधारहीन और “गंभीर त्रुटियों” से भरा बताया।

  • प्रसन्नता के बजाय उपयोगिता: मिल का तर्क था कि अंग्रेजों को देशी लोगों को केवल उन्हें खुश करने के लिए उनकी पसंद की चीजें नहीं पढ़ानी चाहिए।
  • पश्चिमी प्रगति: उनका मानना था कि शिक्षा का उद्देश्य “उपयोगी और व्यावहारिक” चीजें सिखाना होना चाहिए, विशेष रूप से पश्चिम की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति।
  • असभ्य भारत: मैकाले भारत को एक असभ्य देश मानते थे जिसे सभ्य बनाना आवश्यक था।
  • “एक अलमारी” का दावा: उन्होंने प्रसिद्ध रूप से घोषणा की कि “एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय की केवल एक अलमारी का एक खाना (Shelf) भारत और अरब के पूरे देशी साहित्य के बराबर है।”
  • 1835 का अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम: इस अधिनियम ने अंग्रेजी को उच्च शिक्षा का माध्यम बना दिया और प्राच्य संस्थानों (जैसे कलकत्ता मदरसा और बनारस हिंदू कॉलेज) को बढ़ावा देना बंद कर दिया।

1854 में ‘बोर्ड ऑफ कंट्रोल’ के अध्यक्ष चार्ल्स वुुड द्वारा जारी इस नीति-पत्र ने भारत के लिए औपचारिक शैक्षिक नीति की रूपरेखा तैयार की।

  • व्यावसायिक लाभ: इसमें तर्क दिया गया कि यूरोपीय शिक्षा से भारतीयों को व्यापार और वाणिज्य के लाभों को पहचानने में मदद मिलेगी, जिससे ब्रिटिश सामानों की मांग पैदा होगी।
  • नैतिक और प्रशासनिक लाभ: इसका दावा था कि पश्चिमी साहित्य भारतीयों को सत्यवादी और ईमानदार बनाएगा, जिससे कंपनी को सिविल सेवकों (कर्मचारियों) की एक भरोसेमंद आपूर्ति मिलेगी।
  • संस्थागत परिवर्तन: इसके परिणामस्वरूप सरकारी शिक्षा विभागों का गठन हुआ और 1857 में कलकत्ता, मद्रास और बंबई में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।

1830 के दशक में, कंपनी ने एक स्कॉटिश मिशनरी विलियम एडम को बंगाल और बिहार के स्थानीय स्कूलों (पाठशालाओं) पर रिपोर्ट देने का काम सौंपा।

  • व्यापक शिक्षा: एडम ने पाया कि वहां 1 लाख से अधिक पाठशालाएँ थीं जिनमें 20 लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे थे।
  • लचीलापन: यह शिक्षा प्रणाली स्थानीय जरूरतों के अनुसार बहुत लचीली थी:
    • न कोई निश्चित शुल्क था, न छपी हुई किताबें, न अलग इमारतें और न ही ब्लैकबोर्ड।
    • फीस माता-पिता की आय पर निर्भर करती थी; अमीर ज्यादा देते थे और गरीब कम।
    • फसल की कटाई के समय कक्षाएं नहीं होती थीं, ताकि किसान परिवारों के बच्चे खेतों में काम कर सकें और बाद में अपनी पढ़ाई जारी रख सकें।
  • कंपनी ने स्कूलों की देखरेख और शिक्षण मानकों में सुधार के लिए सरकारी पंडितों की नियुक्ति की।
  • गुरुओं को पाठ्यपुस्तकों का उपयोग करने, एक निश्चित समय-सारणी का पालन करने और वार्षिक रिपोर्ट जमा करने के लिए मजबूर किया गया।
  • प्रभाव: नियमित उपस्थिति और फसल कटाई के दौरान भी स्कूल आने की अनिवार्यता ने गरीब बच्चों के लिए स्कूल में टिके रहना मुश्किल बना दिया।

कई भारतीयों ने महसूस किया कि पश्चिमी शिक्षा औपनिवेशिक गुलामी का एक साधन है और उन्होंने इसके विकल्प प्रस्तावित किए।

  • हीनता की भावना: गांधी का तर्क था कि औपनिवेशिक शिक्षा ने भारतीयों के गौरव को नष्ट कर दिया है और उन्हें यह विश्वास दिला दिया है कि पश्चिमी सभ्यता श्रेष्ठ है।
  • गरिमा और आत्म-सम्मान: वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों को उनकी गरिमा पुनः प्राप्त करने में मदद करे। उन्होंने छात्रों से ब्रिटिश संस्थानों को छोड़ने का आह्वान किया।
  • व्यावहारिक हस्तशिल्प: गांधी का मानना था कि केवल साक्षरता ही शिक्षा नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि बच्चों को कोई कला या शिल्प सीखना चाहिए और अपने हाथों से काम करना चाहिए ताकि उनके मस्तिष्क और आत्मा का विकास हो सके।
  • “शांति का निवास”: टैगोर ने 1901 में कलकत्ता से 100 किलोमीटर दूर एक ग्रामीण परिवेश में इसकी स्थापना की।
  • रचनात्मक स्वतंत्रता: टैगोर को ब्रिटिश स्कूलों के “जेल जैसे” और कठोर वातावरण से नफरत थी। उनका मानना था कि बचपन प्राकृतिक वातावरण में स्वयं सीखने का समय होना चाहिए।
  • पूर्व और पश्चिम का समन्वय: जहाँ गांधी आधुनिक तकनीक के आलोचक थे, वहीं टैगोर भारतीय परंपरा के सर्वोत्तम तत्वों को आधुनिक पश्चिमी विज्ञान और प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ना चाहते थे।
  1. भाषाविद (Linguist): एक व्यक्ति जो कई भाषाएँ जानता और पढ़ता है।
  2. प्राच्यवादी (Orientalist): एशिया की भाषा और संस्कृति का गहन ज्ञान रखने वाले विद्वान।
  3. मुंशी: एक व्यक्ति जो फारसी पढ़, लिख और पढ़ा सकता है।
  4. वर्नाकुलर (Vernacular): स्थानीय भाषा या बोली जो मानक भाषा से अलग होती है।
NCERT इतिहास   •   कक्षा-8
अध्याय – 8

देसी जनता को सभ्य बनाना, राष्ट्र को शिक्षित करना

प्राच्यवादियों का दृष्टिकोण
विलियम जोन्स: 1783 में आगमन; प्रजा का ‘दिल’ जीतने के लिए भारत के प्राचीन गौरव की पुनर्खोज में विश्वास रखते थे।
प्रमुख केंद्र: संस्कृत और फारसी कानून को संरक्षित करने के लिए कलकत्ता मदरसा (1781) और हिंदू कॉलेज (1791) की स्थापना की गई।
आंग्लवादियों की आलोचना
मैकॉले: भारतीय साहित्य को अवैज्ञानिक मानकर खारिज किया; उनका प्रसिद्ध दावा था कि एक अच्छे यूरोपीय पुस्तकालय का केवल एक खाना ही पूरे भारत और अरब के समूचे साहित्य के बराबर है।
औपनिवेशिक और राष्ट्रीय मार्ग
अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम (1835): उच्च शिक्षा के लिए अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाया गया, ‘उपयोगी और व्यावहारिक’ पश्चिमी ज्ञान पर ध्यान केंद्रित किया गया।
वुड का नीति-पत्र (1854): प्रशासनिक रूप से विश्वसनीय सिविल सेवकों को तैयार करने और पश्चिमी शिक्षा के माध्यम से ब्रिटिश वस्तुओं की मांग बढ़ाने के लिए औपचारिक नीति।
पाठशाला सुधार: विलियम एडम ने लचीले स्थानीय स्कूलों पर रिपोर्ट दी; 1854 के बाद, अंग्रेजों ने कठोर नियम, पाठ्यपुस्तकें और समय-सारणी लागू कर दी।
महात्मा गांधी: अंग्रेजी शिक्षा को “गुलाम बनाने वाली” कहकर विरोध किया, उनका तर्क था कि इसने भारतीयों में हीन भावना पैदा की; उन्होंने हस्तशिल्प सीखने की वकालत की।
रवींद्रनाथ टैगोर: 1901 में शांति निकेतन की स्थापना की; वे प्राकृतिक वातावरण में रचनात्मक स्वतंत्रता को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ना चाहते थे।

प्राच्यवादी

एशिया की प्राचीन संस्कृतियों, पवित्र ग्रंथों और कानूनों के प्रति गहरा सम्मान रखने वाले विद्वान।

वुड का नीति-पत्र

1854 का वह दस्तावेज जिसने यूरोपीय शिक्षा के औपचारिक प्रशासनिक और आर्थिक लाभों को रेखांकित किया।

शांति निकेतन

प्राकृतिक वातावरण में स्थित एक स्कूल जहाँ टैगोर ने स्व-शिक्षा और कलात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा दिया।

मस्तिष्क का
संघर्ष
औपनिवेशिक भारत में शिक्षा केवल साक्षरता के बारे में नहीं थी; यह एक वैचारिक संघर्ष था। जहाँ अंग्रेजों को कुशल क्लर्क चाहिए थे, वहीं भारतीय विचारक ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों की गरिमा, आत्म-सम्मान और रचनात्मक स्वतंत्रता को बहाल कर सके।

पीठासीन अधिकारी सदनों की गरिमा और विशेषाधिकारों के संरक्षक होते हैं। उनके बिना, संसद एक विचार-विमर्श करने वाले निकाय के रूप में कार्य नहीं कर सकती।

अध्यक्ष लोकसभा का प्रमुख और उसका प्रतिनिधि होता है।

  • निर्वाचन: लोकसभा के सदस्य अपने बीच से ही अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव की तारीख राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है।
  • कार्यकाल: वह लोकसभा के पूरे कार्यकाल के दौरान पद पर बना रहता है। हालाँकि, यदि वह सदन का सदस्य नहीं रहता या उपाध्यक्ष को अपना त्यागपत्र सौंप देता है, तो उसे पद छोड़ना पड़ता है।
  • विशेष शक्तियाँ:
    • धन विधेयक (Money Bill): कोई विधेयक ‘धन विधेयक’ है या नहीं, इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम होता है और उसे न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
    • संयुक्त बैठक: वह संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक (अनुच्छेद 108) की अध्यक्षता करता है।
    • निर्णायक मत (Casting Vote): अध्यक्ष पहली बार में मतदान नहीं करता, लेकिन मतों के बराबर होने (टाई) की स्थिति में वह अपना निर्णायक मत देता है।
    • दसवीं अनुसूची: वह दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यों की अयोग्यता पर निर्णय लेता है।
  • सामयिक अध्यक्ष (Speaker Pro Tem): यह एक अस्थायी अध्यक्ष होता है जिसे राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है (आमतौर पर सदन का सबसे वरिष्ठ सदस्य)। इसका मुख्य कार्य नए सदस्यों को शपथ दिलाना और स्थायी अध्यक्ष का चुनाव करवाना होता है।
  • कौन होता है? भारत का उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति (Ex-officio Chairman) होता है।
  • मुख्य अंतर: लोकसभा अध्यक्ष के विपरीत (जो सदन का सदस्य होता है), सभापति राज्यसभा का सदस्य नहीं होता है।
  • पद से हटाना: सभापति को उसके पद से केवल तभी हटाया जा सकता है जब उसे उपराष्ट्रपति के पद से हटा दिया जाए।
  • शक्तियाँ: सदन की कार्यवाही चलाने के संबंध में उसकी शक्तियाँ लोकसभा अध्यक्ष के समान होती हैं, लेकिन सभापति संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं कर सकता और न ही वह यह तय कर सकता है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं।

राष्ट्रपति के पास संसद के प्रत्येक सदन का सत्र बुलाने (आहूत करने) की शक्ति होती है।

  • 6 महीने का नियम: संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता। इसलिए, संसद को वर्ष में कम से कम दो बार मिलना अनिवार्य है।
  • तीन पारंपरिक सत्र: भारत में आमतौर पर तीन सत्र आयोजित किए जाते हैं:
    1. बजट सत्र: (फरवरी से मई) – यह सबसे लंबा सत्र होता है।
    2. मानसून सत्र: (जुलाई से सितंबर)।
    3. शीतकालीन सत्र: (नवंबर से दिसंबर) – यह सबसे छोटा सत्र होता है।
  • स्थगन (Adjournment): यह सदन की बैठक को कुछ घंटों, दिनों या हफ्तों के लिए समाप्त कर देता है। यह पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
  • अनिश्चितकालीन स्थगन (Adjournment Sine Die): यह सदन की बैठक को अनिश्चित काल के लिए समाप्त कर देता है (अगली बैठक की तारीख तय किए बिना)। यह भी पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
  • सत्रावसान (Prorogation): यह न केवल बैठक को बल्कि सदन के पूरे सत्र को समाप्त कर देता है। यह राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
  • विघटन (Dissolution): यह सदन (केवल लोकसभा) के जीवन को ही समाप्त कर देता है। इसके बाद नए सिरे से चुनाव होते हैं। यह राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।
  • गणपूर्ति या कोरम (Quorum – अनुच्छेद 100): सदन की कार्यवाही चलाने के लिए उपस्थित सदस्यों की वह न्यूनतम संख्या जो आवश्यक है। यह प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का 1/10वाँ भाग (पीठासीन अधिकारी सहित) होता है।
विशेषतालोकसभा अध्यक्ष (Speaker)राज्यसभा सभापति (Chairman)
क्या वह सदन का सदस्य है?हाँनहीं (उपराष्ट्रपति होता है)
चुनाव की तारीखराष्ट्रपति द्वारा निर्धारितलागू नहीं (पदेन पद)
किसे इस्तीफा देता है?उपाध्यक्ष कोराष्ट्रपति को
संयुक्त बैठकअध्यक्षता करता हैअध्यक्षता नहीं करता
धन विधेयकप्रकृति पर निर्णय लेता हैकोई शक्ति नहीं
वोट देने का अधिकारकेवल बराबर होने पर (Casting Vote)केवल बराबर होने पर (Casting Vote)

यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि जब राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुलाता है, तो उसकी अध्यक्षता हमेशा लोकसभा अध्यक्ष ही करता है। यदि अध्यक्ष अनुपस्थित हो, तो लोकसभा का उपाध्यक्ष अध्यक्षता करता है। यदि वह भी अनुपस्थित हो, तो राज्यसभा का उपसभापति अध्यक्षता करता है। राज्यसभा का सभापति कभी भी संयुक्त बैठक की अध्यक्षता नहीं करता।

विधायी आचरण • अनु. 85-100
संसदीय प्रक्रिया

पीठासीन अधिकारी और सत्र

लोकसभा अध्यक्ष
सदस्यों द्वारा निर्वाचित; धन विधेयकों का निर्णय करते हैं और संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करते हैं।
गणपूर्ति (अनु. 100)
कार्य संचालन के लिए कुल सदस्यता का कम से कम 1/10 हिस्सा उपस्थित होना चाहिए।
राज्यसभा सभापति (अनु. 89)
उपराष्ट्रपति पदेन सभापति होते हैं। अध्यक्ष के विपरीत, वे सदन के सदस्य नहीं होते हैं।
संसद के सत्र (अनु. 85)
6 महीने का नियम: सत्रों के बीच अधिकतम अंतर 6 महीने से अधिक नहीं हो सकता। आमतौर पर बजट, मानसून और शीतकालीन सत्र शामिल होते हैं।
सत्रावसान बनाम विघटन: राष्ट्रपति सत्रों का सत्रावसान करते हैं और लोकसभा को भंग करते हैं; स्थगन पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।

धन विधेयक

कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, इस पर अध्यक्ष का निर्णय अंतिम और निर्विवाद होता है।

निर्णायक मत

पीठासीन अधिकारी केवल मत बराबर होने की स्थिति में वोट देते हैं (प्रथम दृष्टया नहीं)।

दलबदल विरोधी

अध्यक्ष/सभापति 10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता पर निर्णय लेते हैं।

“कार्यवाहक”
अधिकारी
प्रोटेम स्पीकर एक अस्थायी पद है जिसे राष्ट्रपति द्वारा शपथ दिलाने और स्थायी अध्यक्ष के चुनाव की देखरेख के लिए नियुक्त किया जाता है। पदत्याग के संबंध में, अध्यक्ष अपना इस्तीफा उपाध्यक्ष को सौंपते हैं, जबकि सभापति केवल उपराष्ट्रपति के पद से हटने पर ही पद छोड़ते हैं।

यहाँ द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (4 फ़रवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (द्विपक्षीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।

  • संदर्भ: भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हाल ही में घोषित व्यापार समझौते का विश्लेषण, जो महत्वपूर्ण टैरिफ राहत तो लाता है लेकिन कई रणनीतिक सवाल खड़े करता है।
  • मुख्य बिंदु:
    • टैरिफ (शुल्क) में कटौती: अमेरिका भारतीय आयात पर अपने “पारस्परिक” टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने और रूसी तेल आयात के कारण पहले लगाए गए 25 प्रतिशत के “जुर्माना” टैरिफ को पूरी तरह हटाने पर सहमत हो गया है।
    • संवेदनशील क्षेत्रों का संरक्षण: वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने पुष्टि की है कि इस सौदे में संवेदनशील कृषि उत्पादों और डेयरी को बाहर रखा गया है, जिससे घरेलू किसानों का संरक्षण सुनिश्चित होगा।
    • श्रम-प्रधान क्षेत्रों को लाभ: इस कटौती से कपड़ा, परिधान, चमड़ा, जूते, रत्न और आभूषण तथा इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।
    • “बाय अमेरिकन” के प्रति प्रतिबद्धता: राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने 500 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी और कृषि उत्पादों को खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है, हालांकि भारत सरकार ने अभी तक इसकी समयसीमा की पुष्टि नहीं की है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध”, “वैश्विक व्यापार गतिशीलता” और “ऊर्जा कूटनीति” से संबंधित प्रश्नों के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रूसी तेल की पहेली: राष्ट्रपति ट्रम्प ने दावा किया कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिकी और वेनेजुएला के स्रोतों के पक्ष में रूसी तेल खरीदना बंद करने के लिए सहमत हुए हैं; यदि यह सच है, तो यह एक बड़ा भू-राजनीतिक पुनर्गठन होगा जो भारत-रूस संबंधों पर प्रभाव डाल सकता है।
    • बाजार और रुपये पर प्रभाव: इस समझौते की खबर ने तुरंत भारतीय शेयर बाजारों को मजबूती दी और रुपया घोषणा के दिन 1.28 प्रतिशत की बढ़त के साथ सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; बुनियादी ढांचा; ऊर्जा संक्रमण; औद्योगिक नीति)।

  • संदर्भ: श्रीकांत माधव वैद्य का एक विश्लेषण कि क्यों भारत की अगली औद्योगिक क्रांति को पारंपरिक ईंधन दहन (अणुओं – Molecules) के बजाय विद्युतीकरण (इलेक्ट्रॉनों – Electrons) को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • मुख्य बिंदु:
    • दक्षता का लाभ: इलेक्ट्रिक मोटर इनपुट ऊर्जा के 90 प्रतिशत से अधिक को उपयोगी कार्य में परिवर्तित करती है, जबकि आंतरिक दहन इंजन (Internal Combustion Engines) आमतौर पर 35 प्रतिशत से भी कम ऊर्जा को परिवर्तित कर पाते हैं।
    • वैश्विक नेतृत्व: चीन वर्तमान में अपनी औद्योगिक ऊर्जा का लगभग आधा हिस्सा बिजली (इलेक्ट्रॉनों) से प्राप्त करता है, जबकि भारत लगभग एक-चौथाई के स्तर पर काफी पीछे है।
    • हरित हिस्सेदारी का अंतराल: भारत की अंतिम औद्योगिक ऊर्जा में ‘ग्रीन इलेक्ट्रॉनों’ (नवीकरणीय ग्रिड पावर) की हिस्सेदारी केवल 7-8 प्रतिशत है, जो चीन और यूरोपीय संघ की तुलना में बहुत कम है।
    • CBAM का जोखिम: औद्योगिक प्रक्रियाओं (विशेष रूप से स्टील और सीमेंट) के तेजी से विद्युतीकरण के बिना, भारतीय निर्यात को यूरोपीय संघ के ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म’ (CBAM) के तहत भारी दंड का सामना करना पड़ेगा।
  • UPSC प्रासंगिकता: “ऊर्जा सुरक्षा”, “सतत विनिर्माण” और “जलवायु परिवर्तन शमन रणनीति” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • रणनीतिक अनिवार्यता: घरेलू बिजली की ओर रुख करने से वैश्विक तेल और गैस की कीमतों के झटकों से बचाव होगा, जिससे राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता में वृद्धि होगी।
    • नीतिगत रोडमैप: लेखक ‘औद्योगिक विद्युतीकरण पर राष्ट्रीय मिशन’ की वकालत करते हैं, जिसका लक्ष्य MSME के कोयला बॉयलरों का विद्युतीकरण और ‘इलेक्ट्रिक-आर्क-फर्नेस’ (EAF) स्टील उत्पादन का विस्तार करना है।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; आईटी और कंप्यूटर; अर्थव्यवस्था)।

  • संदर्भ: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योग बुनियादी ढांचे के भारी चरण (चिप्स और डेटा सेंटर) से हटकर लाभदायक और वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों (Applications) पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
  • मुख्य बिंदु:
    • लाभप्रदता का दबाव: 2025 में बुनियादी ढांचे पर 320 अरब डॉलर खर्च करने के बावजूद, ओपनएआई (OpenAI) जैसे ‘फाउंडेशन मॉडल’ व्यवसाय उच्च प्रसंस्करण लागत के कारण कम लाभ मार्जिन का सामना कर रहे हैं।
    • अनुप्रयोगों में वृद्धि: व्यवसायों ने 2025 में एआई अनुप्रयोगों पर 19 अरब डॉलर खर्च किए, जो अब सभी जनरेटिव एआई खर्चों के आधे से अधिक है।
    • विभागीय एआई: वास्तविक मूल्य विशिष्ट क्षेत्रों में उभर रहा है; उदाहरण के लिए, एआई कोडिंग टूल्स का बाजार 2025 में 4 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
    • ऊर्ध्वाधर एकीकरण (Vertical Integration): स्वास्थ्य सेवा, कानून और वित्त जैसे विशिष्ट कार्यप्रवाहों में गहराई से एकीकृत समाधानों को अब सबसे अधिक “निवेश योग्य” एआई व्यवसाय माना जा रहा है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “औद्योगिक क्रांति 4.0”, “डिजिटल अर्थव्यवस्था” और “प्रौद्योगिकी शासन” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • सर्कुलर फाइनेंसिंग (Circular Financing): संपादकीय चेतावनी देता है कि वर्तमान राजस्व आंकड़े अक्सर सर्कुलर फाइनेंसिंग से धुंधले होते हैं, जहाँ बुनियादी ढांचा प्रदाता उन्हीं मॉडलों को वित्तपोषित करते हैं जो उनकी सेवाओं के लिए भुगतान करते हैं।
    • नियामक संतुलन: नीति निर्माताओं को चेतावनी दी गई है कि वे “एप्लिकेशन लेयर” को समय से पहले सख्त नियमों से न दबाएं, लेकिन उन्हें उन अधिग्रहणों के प्रति सतर्क रहना चाहिए जो संभावित प्रतिस्पर्धियों को खत्म कर देते हैं।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (न्यायपालिका; मौलिक अधिकार; शासन के महत्वपूर्ण पहलू)।

  • संदर्भ: ‘स्क्वायर सर्कल क्लिनिक’ (NALSAR) की एक रिपोर्ट से पता चला है कि उच्चतम न्यायालय ने पिछले तीन वर्षों में एक भी मृत्युदंड की पुष्टि (Confirm) नहीं की है।
  • मुख्य बिंदु:
    • न्यायिक संशयवाद (Judicial Scepticism): जबकि निचली अदालतों ने अकेले 2025 में 128 व्यक्तियों को मौत की सजा सुनाई, उच्चतम न्यायालय का रुख लगातार प्रतिबंधात्मक होता जा रहा है।
    • गलत दोषसिद्धि की चिंता: शीर्ष अदालत ने 2025 में मृत्युदंड पाए 10 कैदियों को बरी कर दिया—जो एक दशक में सबसे अधिक संख्या है—जो निचली अदालतों के स्तर पर गंभीर त्रुटियों को उजागर करता है।
    • प्रक्रियात्मक उल्लंघन: 2025 में लगभग 95 प्रतिशत मृत्युदंड की सजाएं उच्चतम न्यायालय के दिशा-निर्देशों (जैसे मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन और शमन सुनवाई) का पालन किए बिना दी गईं।
    • बिना छूट के आजीवन कारावास: मृत्युदंड के निश्चित विकल्प के रूप में ‘बिना किसी छूट के आजीवन कारावास’ का उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
  • UPSC प्रासंगिकता: “न्यायिक सुधार”, “मानवाधिकार” और “दुर्लभतम से दुर्लभ” (Rarest of Rare) सिद्धांत के लिए अनिवार्य।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • अपीलीय उलटफेर: उच्च न्यायालयों द्वारा पुष्टि किए गए 37 मृत्युदंड के मामलों में से जो हाल ही में सुप्रीम कोर्ट पहुँचे, 15 में कैदी बरी हो गए और 14 की सजा कम कर दी गई, जबकि एक की भी पुष्टि नहीं हुई।
    • डेथ रो (Death Row) पर लंबा इंतजार: रिपोर्ट के अनुसार 2025 के अंत तक भारत में 574 कैदी मृत्युदंड की प्रतीक्षा में थे, जिनमें से कई अंततः बरी होने से पहले पांच साल से अधिक जेल में बिता चुके हैं।

पाठ्यक्रम: सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 (संघवाद; संवैधानिक निकाय; केंद्र-राज्य संबंध)।

  • संदर्भ: इस बात का विश्लेषण कि कैसे 16वें वित्त आयोग की उर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution) सिफारिशें राज्यों के दबाव के बजाय केंद्र के राजकोषीय स्थान को प्राथमिकता देती हैं।
  • मुख्य बिंदु:
    • हस्तांतरण में स्थिरता: 16वें वित्त आयोग ने उर्ध्वाधर हस्तांतरण दर को 41 प्रतिशत पर बनाए रखा, जबकि 18 राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की मांग की थी।
    • विभाज्य पूल का सिकुड़ना: केंद्र के कुल कर राजस्व में विभाज्य पूल (Divisible Pool) की हिस्सेदारी लगातार छह वर्षों से 90 प्रतिशत से नीचे गिर गई है, जिसका कारण उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) में बेतहाशा वृद्धि है।
    • गैर-साझा करने योग्य राजस्व: उपकर और अधिभार (जिन्हें केंद्र राज्यों के साथ साझा नहीं करता) 2011-12 में जीडीपी के 1.1 प्रतिशत से बढ़कर 2023-24 में जीडीपी के 2.2 प्रतिशत हो गए।
    • राज्यों की आम सहमति की अनदेखी: आयोग ने केंद्र की प्राथमिकताओं का समर्थन किया, भले ही विभिन्न राज्यों के बीच राजकोषीय तनाव को लेकर एक दुर्लभ आम सहमति थी।
  • UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “संसाधन संग्रहण” और “केंद्र-राज्य वित्तीय घर्षण” के लिए महत्वपूर्ण।
  • विस्तृत विश्लेषण:
    • कर रणनीति का प्रभाव: मानक करों के बजाय उपकर (जैसे पेट्रोल/डीजल उपकर) का पक्ष लेकर, केंद्र प्रभावी रूप से राज्यों के लिए उपलब्ध “साझा करने योग्य राजस्व” को कम कर देता है।
    • उर्ध्वाधर असंतुलन: रिपोर्ट का तर्क है कि गैर-साझा उपकरणों पर वर्तमान निर्भरता वित्त आयोग की प्रतिशत-आधारित सिफारिशों को राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए कम प्रभावी बना देती है।

संपादकीय विश्लेषण

04 फरवरी, 2026
GS-3 ऊर्जा और उद्योग औद्योगिक विद्युतीकरण

दहन इंजनों की 35% दक्षता की तुलना में इलेक्ट्रिक मोटर 90% दक्षता प्रदान करते हैं। यूरोपीय संघ के CBAM दंड से बचने के लिए ‘हरित इलेक्ट्रॉनों’ की ओर रुख करना आवश्यक है।

GS-3 तकनीक AI: एप्लीकेशन लेयर

चिप से सॉफ्टवेयर की ओर बदलाव; वर्टिकल AI कानून और स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश का केंद्र बना। फाउंडेशन मॉडल में सर्कुलर फाइनेंसिंग पर चेतावनी।

GS-2 संघवाद हस्तांतरण की दुविधा

उपकर (Cesses) बढ़कर जीडीपी का 2.2% हो गया। 16वें वित्त आयोग ने राज्यों की सहमति के बजाय केंद्र के राजकोषीय स्थान को प्राथमिकता देते हुए 41% की दर बरकरार रखी।

रणनीति: यदि भारत विशेष रूप से अमेरिका/वेनेजुएला के स्रोतों की ओर रुख करता है, तो ‘रूसी तेल पहेली’ एक बड़े भू-राजनीतिक पुनर्गठन का संकेत देती है।
अर्थव्यवस्था: व्यापार घोषणा के तुरंत बाद रुपया सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली एशियाई मुद्रा बन गया, जिसमें 1.28% की बढ़त दर्ज की गई।
विनिर्माण: भारत औद्योगिक विद्युतीकरण में 25% पर पिछड़ रहा है; राष्ट्रीय आर्थिक संप्रभुता सुरक्षित करने के लिए एक ‘राष्ट्रीय मिशन’ की आवश्यकता है।
अधिकार: भारत में 574 कैदी मृत्युदंड की कतार में हैं; सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ‘बिना किसी छूट के आजीवन कारावास’ का एक निश्चित विकल्प बनाती है।
GS-4
विधि का शासन
न्याय और प्रक्रियात्मक अखंडता: जब मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन या न्यूनीकरण सुनवाई के बिना 95% मृत्युदंड दिए जाते हैं, तो यह निचली अदालतों की प्रणाली की एक नैतिक विफलता है। सुप्रीम कोर्ट का प्रतिबंधात्मक रुख गलत और अपरिवर्तनीय सजा के खिलाफ एक आवश्यक नैतिक बफर के रूप में कार्य करता है।

यहाँ महत्वपूर्ण खनिज बुनियादी ढांचेआपदा प्रबंधन मानचित्रण और रणनीतिक अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर केंद्रित मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण दिया गया है:

एक महत्वपूर्ण विकास के रूप में, हाई-टेक विनिर्माण के लिए आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित करने हेतु समर्पित दुर्लभ मृदा गलियारों की विस्तृत योजना बनाई गई है।

  • तटीय पट्टी का मानचित्रण: ये गलियारे मुख्य रूप से पूर्वी और दक्षिणी तटीय पट्टियों पर केंद्रित हैं, जिनमें विशेष रूप से निम्नलिखित राज्य शामिल हैं:
    • ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल।
  • खनिज केंद्र (Hubs): इन राज्यों के तटीय बालू (Beach sands) में पाए जाने वाले 13.15 मिलियन टन मोनाजाइट (Monazite) भंडार को मानचित्र पर चिह्नित करें।
  • कठोर चट्टानी निक्षेप (Hard Rock Deposits): राजस्थान और गुजरात के उन विशिष्ट आंतरिक स्थलों को चिह्नित करें जहाँ 1.29 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा ऑक्साइड संसाधनों की पहचान की गई है।

4 फरवरी, 2026 को उत्तर-पूर्व के लिए एक नई एआई (AI) आधारित मानचित्रण परियोजना पर प्रकाश डाला गया, जो उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करने में अपनी सटीकता के लिए जानी जाती है।

  • सुभेद्यता (Vulnerability) मानचित्रण:
    • अत्यधिक उच्च जोखिम (Very High Risk): मेघालय का लगभग 7 प्रतिशत हिस्सा इसी श्रेणी में आता है।
    • पूर्वी खासी हिल्स (East Khasi Hills): इसे सबसे सुभेद्य जिले के रूप में पहचाना गया है, जिसका 730 वर्ग किमी क्षेत्र “अत्यधिक उच्च जोखिम” क्षेत्र के अंतर्गत वर्गीकृत है।
    • मानचित्र पर अन्य जिले: री भोई (Ri Bhoi), पश्चिम खासी हिल्स और जयंतिया हिल्स को भी मानचित्र पर अंकित करें।

रणनीतिक समुद्री और राजनयिक मानचित्रण IAS/PCS पाठ्यक्रम का एक मुख्य हिस्सा है।

  • सेशेल्स (राजकीय यात्रा):
    • मानचित्रण संदर्भ: हिंद महासागर में स्थित 115 द्वीपों वाला एक द्वीपसमूह राष्ट्र।
    • रणनीतिक महत्व: यह भारत की “ब्लू इकोनॉमी” (नीली अर्थव्यवस्था) और पश्चिमी हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
  • तंजानिया (ज़ांज़ीबार):
    • मानचित्रण संदर्भ: भारत ने हाल ही में ‘चौथी संयुक्त रक्षा सहयोग समिति’ के माध्यम से ज़ांज़ीबार में संबंधों को मजबूत किया है।
    • प्रमुख स्थल: इसकी सीमाओं को विक्टोरिया झील (अफ्रीका की सबसे बड़ी झील) और तांगानिका झील (अफ्रीका की सबसे गहरी झील) के साथ मानचित्र पर दर्शाएं।
  • सुबनसिरी निचली जलविद्युत परियोजना (LHE): अरुणाचल प्रदेश में ‘प्रतिपूरक वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) की विफलताओं के संबंध में चिंताएं जताई गई हैं।
  • मैपिंग पॉइंट: अरुणाचल प्रदेश और असम की सीमा पर सुबनसिरी नदी (ब्रह्मपुत्र की एक प्रमुख सहायक नदी) की स्थिति को पहचानें।
श्रेणीमानचित्रण मुख्य बिंदुमुख्य स्थान
खनिज गलियारादुर्लभ मृदा पेटी (Rare Earth Belt)ओडिशा से केरल तक का तटीय क्षेत्र
उच्च जोखिम क्षेत्रपूर्वी खासी हिल्समेघालय (भूस्खलन मानचित्र)
समुद्री भागीदारसेशेल्सपश्चिमी हिंद महासागर
नदी परियोजनासुबनसिरी LHEअरुणाचल-असम सीमा

खनिज संसाधनों का अध्ययन करते समय उन्हें उन राज्यों के बंदरगाहों के साथ जोड़कर देखें जहाँ से उनका निर्यात संभव है। उदाहरण के लिए, ओडिशा के दुर्लभ मृदा निक्षेपों को पारादीप बंदरगाह के साथ जोड़कर देखा जा सकता है।

मानचित्रण विवरण

महत्वपूर्ण खनिज एवं रणनीतिक भूगोल
खनिज गलियारे रणनीतिक दुर्लभ मृदा (Rare Earths)

ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में तटवर्ती रेत के मोनाजाइट भंडार पर केंद्रित। हार्ड-रॉक ऑक्साइड निक्षेपों के लिए राजस्थान/गुजरात को चिह्नित करें।

आपदा मानचित्रण भूस्खलन जोखिम सुस्पष्टता

नए AI मानचित्रण ने पूर्वी खासी हिल्स (मेघालय) को उच्च-जोखिम वाले क्षेत्र के रूप में पहचाना है, जिसका 730 वर्ग किमी क्षेत्र “अत्यधिक उच्च सुभेद्यता” श्रेणी में है।

रणनीतिक कूटनीति
पश्चिमी हिंद महासागर आउटरीच

भारत सेशेल्स (115-द्वीपीय द्वीपसमूह) और तंजानिया (ज़ंजीबार) के साथ समुद्री सुरक्षा संबंधों को मजबूत कर रहा है, जो विक्टोरिया और तांगानिका झील की सीमा पर स्थित हैं।

जल-पर्यावरण
सुबनसिरी निचली परियोजना (LHE)

अरुणाचल-असम सीमा पर स्थित, सुबनसिरी नदी (ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी) पर बनी यह परियोजना प्रतिपूरक वनीकरण को लेकर जांच के घेरे में है।

महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाएँ

हाई-टेक विनिर्माण के लिए महत्वपूर्ण 13.15 मिलियन टन दुर्लभ-मृदा संसाधनों को सुरक्षित करने के लिए पूर्वी तटीय पट्टी के साथ समर्पित गलियारों का मानचित्रण किया जा रहा है।

खनिज पट्टी ओडिशा से केरल तटरेखा।
उच्च जोखिम क्षेत्र पूर्वी खासी हिल्स (मेघालय)।
समुद्री सेशेल्स (पश्चिमी हिंद महासागर)।
एटलस रणनीति
स्थानिक आधार: भारत की हाई-टेक संप्रभुता के लिए तटवर्ती रेत मोनाजाइट और हार्ड-रॉक दुर्लभ मृदा ऑक्साइड की दोहरी एकाग्रता को समझना महत्वपूर्ण है। GS-III के लिए हिमालय-पूर्वोत्तर के व्यापक जोखिम मैट्रिक्स में पूर्वी खासी हिल्स की भूस्खलन सुभेद्यता को एकीकृत करें।

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