IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 30 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 8 Chapter-4 (आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना)
यह अध्याय, “आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना“, भारत में आदिवासी समुदायों पर औपनिवेशिक शासन के प्रभाव और बिरसा मुंडा जैसे व्यक्तियों के नेतृत्व में हुए बाद के प्रतिरोध पर केंद्रित है।
1. 19वीं शताब्दी में जनजातीय आजीविका
ब्रिटिश शासन के पूर्ण प्रभाव से पहले, आदिवासी समूह विभिन्न प्रकार की जीवन पद्धतियों का पालन करते थे:
- झूम खेती (Jhum Cultivation): इसे ‘घुमंतू खेती’ भी कहा जाता है। यह मुख्य रूप से पूर्वोत्तर और मध्य भारत के जंगलों में जमीन के छोटे टुकड़ों पर की जाती थी। इसमें पेड़ों के ऊपरी हिस्सों को काट दिया जाता था ताकि धूप जमीन तक पहुँच सके और घास-फूस को जलाकर उसकी राख (जिसमें पोटाश होता था) को मिट्टी में मिला दिया जाता था।
- शिकारी और संग्राहक: उड़ीसा के ‘खोंड’ जैसे समूह जंगलों से फल, जड़ें और औषधीय जड़ी-बूटियाँ इकट्ठा करके अपना जीवन बिताते थे। वे खाना पकाने के लिए साल और महुआ के बीजों के तेल का इस्तेमाल करते थे। जब जंगलों में पैदावार कम हो जाती थी, तो वे मज़दूरी के लिए गाँवों की ओर जाते थे।
- पशुपालक: कई जनजातियाँ चरवाहे थीं जो मौसम के अनुसार अपने जानवरों (गाय-बैल या भेड़-बकरी) के झुंड के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते थे। जैसे—पंजाब की पहाड़ियों के ‘वन गुज्जर’, आंध्र प्रदेश के ‘लबाडी’, कुल्लू के ‘गद्दी’ और कश्मीर के ‘बकरवाल’।
- एक जगह टिककर खेती करने वाले: मुंडा, गोंड और संथाल जैसे कई समूहों ने 19वीं सदी से पहले ही एक स्थान पर बसकर खेती करना और हल का उपयोग करना शुरू कर दिया था। वे धीरे-धीरे अपनी ज़मीन के मालिक बनते जा रहे थे।
2. औपनिवेशिक शासन का जनजातीय जीवन पर प्रभाव
ब्रिटिश प्रशासन ने आदिवासियों के जीवन में विनाशकारी बदलाव लाए:
- मुखियाओं की शक्ति का ह्रास: अंग्रेजों के आने से पहले जनजातीय मुखियाओं का अपने क्षेत्र पर आर्थिक और प्रशासनिक नियंत्रण होता था। ब्रिटिश शासन के तहत, उनकी शक्तियाँ छीन ली गईं और उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा बनाए गए कानूनों को मानने के लिए मजबूर किया गया। वे अब केवल नाममात्र के मुखिया रह गए थे।
- घुमंतू खेती करने वालों की समस्या: अंग्रेज चाहते थे कि आदिवासी एक जगह बसकर स्थायी किसान बनें ताकि राज्य को नियमित राजस्व (Tax) मिल सके। लेकिन पानी की कमी और सूखी मिट्टी वाले क्षेत्रों में बसकर खेती करना मुश्किल था, इसलिए पूर्वोत्तर के झूम काश्तकारों ने इसका कड़ा विरोध किया।
- वन कानून और उनके प्रभाव: अंग्रेजों ने जंगलों को ‘राज्य की संपत्ति’ घोषित कर दिया। कुछ जंगलों को ‘आरक्षित वन’ घोषित किया गया जहाँ आदिवासियों को रहने, शिकार करने या फल इकट्ठा करने की अनुमति नहीं थी। इससे वन विभाग के सामने मजदूरों की कमी की समस्या पैदा हुई, जिसे हल करने के लिए उन्होंने ‘वन ग्राम’ बसाए।
- व्यापारी और साहूकार: आदिवासी अपनी जरूरतों का सामान खरीदने के लिए व्यापारियों और साहूकारों पर निर्भर थे। साहूकार उन्हें बहुत ऊँची ब्याज दरों पर कर्ज देते थे, जिससे आदिवासी कर्ज के जाल और गरीबी के दुष्चक्र में फंस गए। आदिवासियों ने इन बाहरी लोगों (दिकुओं) को अपनी दुर्दशा का मुख्य कारण माना।
3. जनजातीय विद्रोह
दमनकारी कानूनों और शोषण के खिलाफ उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में आदिवासियों ने विद्रोह किए:
- कोल विद्रोह: 1831-32 में।
- संथाल विद्रोह: 1855 में।
- बस्तर विद्रोह: 1910 में (मध्य भारत)।
- वर्ली विद्रोह: 1940 में (महाराष्ट्र)।
4. बिरसा मुंडा और ‘उलगुलान’ (महान हलचल)
बिरसा मुंडा ने 1890 के दशक के अंत में छोटानागपुर क्षेत्र (झारखंड) में एक बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया।
- स्वर्ण युग की कल्पना: बिरसा ने अपने अनुयायियों से अपने गौरवशाली अतीत को पुनः प्राप्त करने का आह्वान किया। उन्होंने एक ऐसे ‘स्वर्ण युग’ (सत्युग) की बात की जब मुंडा लोग एक अच्छा जीवन जीते थे, तटबंध बनाते थे, कुदरती झरनों का नियंत्रण करते थे और प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर रहते थे।
- ‘दिकुओं’ के खिलाफ संघर्ष: बिरसा ने ‘दिकु’ (बाहरी लोग जैसे—मिशनरी, साहूकार, हिंदू जमींदार और अंग्रेज अधिकारी) को अपनी गरीबी और गुलामी का कारण बताया। उनका मानना था कि ये लोग आदिवासियों की पारंपरिक जीवन शैली को नष्ट कर रहे हैं।
- राजनीतिक लक्ष्य: इस आंदोलन का उद्देश्य मिशनरियों, साहूकारों और सरकार को बाहर निकालकर बिरसा मुंडा के नेतृत्व में ‘मुंडा राज’ स्थापित करना था।
- परिणाम: 1895 में बिरसा को गिरफ्तार किया गया और 1897 में रिहा होने के बाद उन्होंने फिर से समर्थन जुटाना शुरू किया। 1900 में हैजा (Cholera) से उनकी मृत्यु हो गई और आंदोलन धीमा पड़ गया। हालाँकि, इस आंदोलन ने औपनिवेशिक सरकार को दो महत्वपूर्ण काम करने के लिए मजबूर किया:
- ऐसे कानून बनाए गए जिससे ‘दिकु’ लोग आदिवासियों की ज़मीन आसानी से न छीन सकें (छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम)।
- इसने साबित कर दिया कि आदिवासी अन्याय के खिलाफ खड़े होने और औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध अपना गुस्सा व्यक्त करने में सक्षम हैं।
महत्वपूर्ण शब्द:
- दिकु (Diku): आदिवासियों द्वारा बाहरी लोगों (जैसे साहूकार, जमींदार) के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द।
- उलगुलान (Ulgulan): बिरसा मुंडा के आंदोलन को दिया गया नाम, जिसका अर्थ है ‘महान हलचल’।
- बेगार: बिना किसी भुगतान के काम करवाना।
- प्रति (Fallow): कुछ समय के लिए बिना खेती के छोड़ी गई ज़मीन ताकि उसकी उर्वरता वापस आ सके।
आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना
दीकु
आदिवासियों द्वारा साहूकारों और ब्रिटिश अधिकारियों जैसे बाहरी लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द जिन्होंने उनका शोषण किया।
आरक्षित वन
राज्य द्वारा नियंत्रित वन जहाँ आदिवासियों का संग्रहण या खेती करना प्रतिबंधित था।
उलगुलान
इसका अर्थ है “महान हलचल”, यह बिरसा मुंडा के नेतृत्व में हुए विशाल विद्रोह को संदर्भित करता है।
कक्षा-8 इतिहास अध्याय-4 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: आदिवासी, दीकु और एक स्वर्ण युग की कल्पना
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: केंद्रीय मंत्रिपरिषद: श्रेणियाँ और भूमिकाएँ
मंत्रिपरिषद (Council of Ministers – CoM) एक बड़ा निकाय है जो संघ के कार्यकारी कार्यों का निष्पादन करता है। 91वें संविधान संशोधन अधिनियम (2003) के अनुसार, मंत्रिपरिषद की कुल संख्या लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 15% से अधिक नहीं हो सकती।
1. मंत्रियों की श्रेणियाँ
मंत्रिपरिषद को रैंक और जिम्मेदारी के आधार पर तीन स्तरों में विभाजित किया गया है:
- कैबिनेट मंत्री (Cabinet Ministers):
- स्थिति: ये सबसे वरिष्ठ सदस्य होते हैं जो गृह, रक्षा, वित्त और विदेश जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के प्रमुख होते हैं।
- भूमिका: ये कैबिनेट की बैठकों में भाग लेते हैं और केंद्र सरकार के मुख्य नीति-निर्माता होते हैं।
- राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) (Ministers of State – Independent Charge):
- स्थिति: ये छोटे मंत्रालयों/विभागों के प्रमुख होते हैं, लेकिन ये किसी कैबिनेट मंत्री को रिपोर्ट नहीं करते।
- भूमिका: इन्हें कैबिनेट की बैठकों में केवल तभी आमंत्रित किया जाता है जब उनके विशिष्ट विभागों से संबंधित मामलों पर चर्चा होती है।
- राज्य मंत्री (Ministers of State – MoS):
- स्थिति: ये कनिष्ठ (Junior) मंत्री होते हैं जो कैबिनेट मंत्रियों के साथ जुड़े होते हैं।
- भूमिका: ये कैबिनेट मंत्रियों को उनके प्रशासनिक, राजनीतिक और संसदीय कर्तव्यों में सहायता करते हैं। ये कैबिनेट की बैठकों में भाग नहीं लेते।
- उप मंत्री (Deputy Ministers):
- स्थिति: ये रैंक में सबसे नीचे होते हैं और कैबिनेट मंत्रियों या राज्य मंत्रियों की सहायता के लिए नियुक्त किए जाते हैं।
- भूमिका: ये विशुद्ध रूप से प्रशासनिक और संसदीय सहायता प्रदान करते हैं। (वर्तमान में इनकी नियुक्ति बहुत कम होती है)।
2. मंत्रिपरिषद बनाम मंत्रिमंडल (कैबिनेट)
छात्र अक्सर इन दोनों के बीच भ्रमित हो जाते हैं। मुख्य अंतर नीचे दी गई तालिका में दिए गए हैं:
| विशेषता | मंत्रिपरिषद (CoM) | मंत्रिमंडल (The Cabinet) |
| आकार | बड़ा निकाय (60-80 मंत्री)। | छोटा निकाय (15-25 वरिष्ठ मंत्री)। |
| संवैधानिक स्थिति | यह एक संवैधानिक निकाय है (अनुच्छेद 74-75)। | मूल संविधान में नहीं था; 44वें संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 में जोड़ा गया। |
| बैठकें | एक निकाय के रूप में इसकी बैठकें शायद ही कभी होती हैं। | यह नीतियों के निर्धारण के लिए बार-बार बैठकें करता है। |
| कार्य | यह वह निकाय है जो औपचारिक रूप से सलाह देता है। | यह वह निकाय है जो वास्तव में निर्णय लेता है। |
कैबिनेट समितियां: “संविधानेत्तर” सहायता
कैबिनेट समितियाँ कैबिनेट के कार्यभार को कम करने और जटिल मुद्दों की गहन जाँच करने के लिए बनाए गए विशिष्ट समूह हैं।
1. मुख्य विशेषताएं:
- संविधानेत्तर (Extra-Constitutional): इनका उल्लेख मूल संविधान में नहीं है; इनकी स्थापना ‘कार्य आवंटन नियम’ (Rules of Business) के तहत की जाती है।
- दो प्रकार:
- स्थायी समितियाँ (Standing Committees): ये स्थायी प्रकृति की होती हैं।
- तदर्थ समितियाँ (Ad Hoc Committees): ये अस्थायी होती हैं, जिन्हें विशिष्ट कार्यों के लिए बनाया जाता है।
- संरचना: आमतौर पर इनमें 3 से 8 कैबिनेट मंत्री होते हैं। प्रधानमंत्री इनमें से अधिकांश की अध्यक्षता करते हैं।
2. सबसे महत्वपूर्ण समितियां:
| समिति | अध्यक्ष | जिम्मेदारी |
| राजनीतिक मामलों की समिति | प्रधानमंत्री | घरेलू और विदेशी नीति से संबंधित मामले। इसे “सुपर-कैबिनेट” कहा जाता है। |
| आर्थिक मामलों की समिति | प्रधानमंत्री | आर्थिक क्षेत्र में सरकारी गतिविधियों का निर्देशन और समन्वय करना। |
| नियुक्ति समिति | प्रधानमंत्री | केंद्रीय सचिवालय में सभी उच्च-स्तरीय नियुक्तियों का निर्णय करना। |
| संसदीय मामलों की समिति | गृह मंत्री | संसद में सरकारी कार्यों की प्रगति की देखरेख करना। (नोट: इसकी अध्यक्षता PM नहीं करते)। |
| सुरक्षा संबंधी समिति (CCS) | प्रधानमंत्री | कानून-व्यवस्था, आंतरिक सुरक्षा और रक्षा मामलों से संबंधित निर्णय। |
💡 परीक्षा के लिए टिप:
UPSC परीक्षा में अक्सर यह पूछा जाता है कि किस समिति की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नहीं करते—वह ‘संसदीय मामलों की समिति’ है, जिसकी अध्यक्षता गृह मंत्री करते हैं।
मंत्रियों का पदानुक्रम और भूमिकाएँ
राजनीतिक मामले
इसकी अध्यक्षता PM करते हैं; यह घरेलू/विदेशी नीति से संबंधित है। इसे “सुपर-कैबिनेट” कहा जाता है।
आर्थिक मामले
अध्यक्षता PM द्वारा; आर्थिक क्षेत्र में सरकार की सभी गतिविधियों को निर्देशित और समन्वित करती है।
सुरक्षा (CCS)
अध्यक्षता PM द्वारा; राष्ट्रीय रक्षा, कानून व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा के मामलों को संभालती है।
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (30 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू‘ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (30 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26: उत्साही भारत, संकटग्रस्त विश्व
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (भारतीय अर्थव्यवस्था; योजना; संसाधनों का संग्रहण; विकास और वृद्धि)।
- संदर्भ: मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन द्वारा प्रस्तुत आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26, भारत के मध्यम अवधि के विकास अनुमान को बढ़ाकर 7% करता है, लेकिन साथ ही गंभीर वैश्विक आर्थिक जोखिमों की चेतावनी भी देता है।
- मुख्य बिंदु:
- घरेलू अपग्रेड: पूंजीगत वृद्धि, श्रम भागीदारी और उत्पादन दक्षता में सुधार के कारण घरेलू विकास का अनुमान 6.5% से बढ़ाकर 7% कर दिया गया है।
- वैश्विक संकट का जोखिम: सर्वेक्षण के अनुसार 2026 में 2008 के वित्तीय संकट से भी बदतर वैश्विक संकट आने की 10%-20% संभावना है।
- AI निवेश बुलबुला (Bubble): एक बड़ा उभरता हुआ जोखिम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में “अत्यधिक ऋण आधारित” (Highly-leveraged) निवेश है, जो सुधार होने पर बाजार में भारी अस्थिरता पैदा कर सकता है।
- FY27 का पूर्वानुमान: सर्वेक्षण ने अगले वित्तीय वर्ष (2026-27) के लिए 6.8%-7.2% की विकास सीमा का अनुमान लगाया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “आर्थिक योजना”, “मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता” और “वैश्विक वित्तीय जोखिमों” के लिए अनिवार्य।
- विस्तृत विश्लेषण:
- तीन वैश्विक परिदृश्य: सर्वेक्षण तीन संभावित परिदृश्यों को रेखांकित करता है: परिदृश्य 1 (सामान्य व्यवसाय – 40%-45%), परिदृश्य 2 (बहुध्रुवीय बिखराव – 40%-45%), और परिदृश्य 3 (सबसे खराब स्थिति – 10%-20%)।
- रुपये पर प्रभाव: सभी परिदृश्य भारत के लिए पूंजी प्रवाह (Capital flow) के बाधित होने और परिणामस्वरूप रुपये पर दबाव के माध्यम से एक सामान्य जोखिम पैदा करते हैं।
- रक्षात्मक प्रतिक्रिया: भू-राजनीतिक तनाव बढ़ने से वैश्विक तरलता (Liquidity) कम हो सकती है और विभिन्न क्षेत्रों में रक्षात्मक आर्थिक नीतियों की ओर बदलाव हो सकता है।
2. हस्तांतरण, ऋण नहीं: राज्यों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध; राजकोषीय संघवाद)।
- संदर्भ: केंद्रीय कर हस्तांतरण के अस्थिर होने के कारण ‘राज्य विकास ऋण’ (SDLs) पर राज्यों की बढ़ती निर्भरता का विश्लेषण।
- मुख्य बिंदु:
- उधारी में उछाल: SDLs अब तमिलनाडु में राजस्व प्राप्तियों का लगभग 35% और महाराष्ट्र में 26% हिस्सा हैं, जो एक दशक पहले असाधारण माना जाता था।
- सेस (Cess) द्वारा क्षरण: यद्यपि विभाज्य पूल (Divisible Pool) में राज्यों की हिस्सेदारी 41% तय है, लेकिन केंद्र द्वारा सेस और अधिभार (Surcharge) के बढ़ते उपयोग ने राज्यों को मिलने वाले प्रभावी संसाधनों को कम कर दिया है।
- क्राउडिंग आउट (Crowding Out): कल्याणकारी प्रतिबद्धताओं (पेंशन/स्वास्थ्य बीमा) के लिए उच्च उधारी सार्वजनिक पूंजीगत व्यय और निजी निवेश के लिए उपलब्ध धन को सीमित करती है।
- क्षैतिज पुनर्गठन: लेख में हस्तांतरण मानदंडों को फिर से तैयार करने की मांग की गई है ताकि केवल जनसंख्या के बजाय कर प्रयास और दक्षता को अधिक महत्व दिया जा सके।
- UPSC प्रासंगिकता: “राजकोषीय संघवाद”, “राज्य ऋण प्रबंधन” और “शासन वित्त”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- वित्तीय स्वायत्तता का क्षरण: बड़े कर आधार वाले औद्योगिक राज्य वित्तीय स्वायत्तता के निरंतर क्षरण का सामना कर रहे हैं क्योंकि वे अपने नियमित खर्चों के लिए भी कर्ज पर निर्भर हैं।
- संरचनात्मक निर्भरता: पश्चिम बंगाल जैसे राज्य संरचनात्मक रूप से केंद्रीय हस्तांतरण पर निर्भर हैं (औसत 47.7%) और इसके बावजूद भारी कर्ज ले रहे हैं।
3. भारत-अरब लीग: संस्कृतियों और अवसरों का सेतु
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (भारत से जुड़े द्विपक्षीय और वैश्विक समूह; अंतर्राष्ट्रीय संबंध)।
- संदर्भ: दिल्ली में आयोजित दूसरी भारत-अरब विदेश मंत्रियों की बैठक (30-31 जनवरी, 2026) 22 सदस्यीय अरब लीग के साथ भारत की गहरी रणनीतिक पहुंच को उजागर करती है।
- मुख्य बिंदु:
- आर्थिक आधार: द्विपक्षीय व्यापार वर्तमान में $240 बिलियन से अधिक है। यह क्षेत्र भारत के 60% कच्चे तेल और 70% प्राकृतिक गैस आयात की आपूर्ति करता है।
- फिनटेक अभिसरण: भारत का UPI अब बहरीन, सऊदी अरब, कतर और UAE में स्वीकार किया जाता है, जबकि दुबई हवाई अड्डों पर रुपया कानूनी मुद्रा है।
- रणनीतिक चोक पॉइंट्स: भारत का अधिकांश विदेशी व्यापार स्वेज नहर और अदन की खाड़ी से होकर गुजरता है, जिससे क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बन गई है।
- रक्षा निर्यात: अरब देश संयुक्त उत्पादन और भारतीय प्लेटफार्मों जैसे तेजस लड़ाकू विमान, ब्रह्मोस और आकाश मिसाइलों में बढ़ती रुचि दिखा रहे हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “पश्चिम एशिया भू-राजनीति”, “ऊर्जा सुरक्षा” और “समुद्री डोमेन जागरूकता”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- क्षेत्रीय दरारें: भारत को सऊदी अरब और UAE के बीच नए तनावों (विशेष रूप से यमन को लेकर) के बीच सावधानी से अपनी क्षेत्रीय रणनीति बनानी होगी।
- IMEC कनेक्टिविटी: ‘भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा’ (IMEC) दीर्घकालिक गति और सामूहिक समृद्धि के लिए एक केंद्र बिंदु बना हुआ है।
4. क्विक पिल (Quick Pill): फार्मा अनुसंधान को तेज़ करना
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; स्वास्थ्य नीति) और GS पेपर 3 (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)।
- संदर्भ: सरकार ने ‘नये ड्रग्स और क्लिनिकल ट्रायल नियम, 2019’ में संशोधन किया है ताकि अनुसंधान के लिए अनिवार्य परीक्षण लाइसेंस के स्थान पर ‘पूर्व सूचना’ (Prior Intimation) तंत्र लागू किया जा सके।
- मुख्य बिंदु:
- ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस: गैर-व्यावसायिक दवा निर्माण के लिए अनिवार्य लाइसेंस के स्थान पर ‘सुगम पोर्टल’ (SUGAM Portal) के माध्यम से ऑनलाइन सूचना देने की व्यवस्था की गई है।
- समय सीमा में कमी: इस कदम से दवा विकास की समय सीमा में कम से कम तीन महीने की कमी आने की उम्मीद है।
- गति बनाम गुणवत्ता: उच्च जोखिम वाली साइकोट्रोपिक दवाओं के लिए वैधानिक प्रसंस्करण समय 90 दिनों से घटाकर 45 दिन किया जा रहा है।
- अनुसंधान पर ध्यान: ‘इरादे की सूचना’ ऑनलाइन स्वीकार होने के बाद कंपनियां अनुसंधान के लिए दवा संश्लेषण (Synthesis) शुरू करने के लिए स्वतंत्र हैं।
- UPSC प्रासंगिकता: “फार्मास्युटिकल विनियमन”, “अनुसंधान एवं विकास सहायता” और “सार्वजनिक स्वास्थ्य दक्षता”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- ‘लाइसेंस राज’ की समाप्ति: संपादकीय बाधाओं को दूर करने की सराहना करता है लेकिन चेतावनी देता है कि गुणवत्ता नियंत्रण (Quality Control) से समझौता नहीं होना चाहिए।
- घातक चूक: हाल ही में कफ सिरप से जुड़ी मौतों ने उजागर किया है कि फार्मा विनिर्माण में खराब निगरानी घातक हो सकती है।
5. सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के UGC कैंपस इक्विटी नियमों पर रोक लगाई
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था; सामाजिक न्याय; उच्च शिक्षा)।
- संदर्भ: उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देना, 2026) पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि ये “अत्यधिक व्यापक” (Too sweeping) हैं।
- मुख्य बिंदु:
- जाति-केंद्रित पूर्वाग्रह: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि 2026 के नियम केवल SC/ST/OBC छात्रों के खिलाफ भेदभाव को मान्यता देते हैं, जबकि सामान्य श्रेणी के छात्रों को सुरक्षा देने में विफल रहते हैं।
- विभाजनकारी क्षमता: CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि इन नियमों के ऐसे व्यापक परिणाम हो सकते हैं जो “समाज को विभाजित करेंगे।”
- रैगिंग के उपाय: कोर्ट ने नोट किया कि नए नियमों के तहत, यदि कोई सामान्य श्रेणी का छात्र किसी SC/ST वरिष्ठ छात्र द्वारा की जा रही रैगिंग का विरोध करता है, तो उसके पास कोई उपाय नहीं होगा।
- समावेशी दायरा: न्यायमूर्ति बागची ने सुझाव दिया कि नियमों को केवल जाति के बजाय “सर्व-समावेशी भेदभाव” पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
- UPSC प्रासंगिकता: “शिक्षा में सामाजिक न्याय”, “न्यायिक निरीक्षण” और “संवैधानिक समानता”।
- विस्तृत विश्लेषण:
- शिक्षा में एकता: न्यायालय ने जोर दिया कि “भारत की एकता उसके शैक्षणिक संस्थानों में परिलक्षित होनी चाहिए,” और अलग-थलग स्कूलों या छात्रावासों के प्रति चेतावनी दी।
- यथास्थिति: फिलहाल, पुराने 2012 के इक्विटी नियम लागू रहेंगे जब तक कि 2026 के संस्करण की गहन जांच नहीं हो जाती।
संपादकीय विश्लेषण
30 जनवरी, 2026घरेलू विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7% किया गया। 2008 जैसे वैश्विक व्यवस्थागत संकट को जन्म देने वाले AI निवेश बुलबुले की चेतावनी।
द्विपक्षीय व्यापार $240 बिलियन से अधिक। खाड़ी के संकीर्ण जलमार्गों (chokepoints) में समुद्री सुरक्षा और तेजस/ब्रह्मोस जैसे रक्षा निर्यात पर ध्यान।
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों को स्थगित रखा। समाज को बांटने वाले व्यापक परिणामों की चेतावनी; 2012 के नियम लागू रहेंगे।
न्याय और एकता
संपादकीय विश्लेषण
30 जनवरी, 2026घरेलू विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7% किया गया। 2008 जैसे वैश्विक व्यवस्थागत संकट को जन्म देने वाले AI निवेश बुलबुले की चेतावनी।
द्विपक्षीय व्यापार $240 बिलियन से अधिक। खाड़ी के संकीर्ण जलमार्गों (chokepoints) में समुद्री सुरक्षा और तेजस/ब्रह्मोस जैसे रक्षा निर्यात पर ध्यान।
सुप्रीम कोर्ट ने 2026 के नियमों को स्थगित रखा। समाज को बांटने वाले व्यापक परिणामों की चेतावनी; 2012 के नियम लागू रहेंगे।
न्याय और एकता
Mapping:
यहाँ सीमा बुनियादी ढांचे (Border Infrastructure) और जनवरी 2026 तक के नए मान्यता प्राप्त संरक्षण स्थलों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. सीमा बुनियादी ढांचा (“हिमालयी रक्षा” बेल्ट)
सीमावर्ती सड़कों और सुरंगों का मानचित्रण आपके पाठ्यक्रम के “आंतरिक सुरक्षा” और “बुनियादी ढांचा” अनुभागों के लिए महत्वपूर्ण है।
- अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे (NH-913): वर्तमान में निर्माणाधीन एक विशाल 1,840 किमी लंबा राजमार्ग।
- मैपिंग पॉइंट: इसे अरुणाचल प्रदेश में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के साथ ट्रेस करें, जो मांगो-टिंग्बू (Mago-Thingbu) को विजयनगर से जोड़ता है।
- शिंकु ला सुरंग (Shinku La Tunnel): यह दुनिया की सबसे ऊँची सुरंग (15,800 फीट पर) बनने वाली है, जो हिमाचल की लाहौल घाटी को लद्दाख की ज़ांस्कर घाटी से जोड़ेगी।
- सेला सुरंग (Sela Tunnel): 13,000 फीट की ऊंचाई पर पहले से ही चालू है; यह तवांग को हर मौसम में कनेक्टिविटी प्रदान करती है।
- DS-DBO रोड: लद्दाख में 255 किमी लंबी दरबुक-शोक-दौलत बेग ओल्डी सड़क, जो दुनिया की सबसे ऊँची हवाई पट्टी (Airstrip) तक जाती है।
2. नए जोड़े गए संरक्षण क्षेत्र (2025–2026)
राजस्थान और तमिलनाडु संरक्षित क्षेत्रों के विस्तार में सबसे सक्रिय रहे हैं।
| विशेषता | राज्य | महत्व |
| गंगा भैरव घाटी | राजस्थान (अजमेर) | फरवरी 2025 में घोषित; शुष्क क्षेत्र की जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण। |
| सोरसन I, II, और III | राजस्थान (बारां) | गोडावण (Great Indian Bustard) और काले हिरण के लिए नए आरक्षित क्षेत्र। |
| कोपरा जलाशय | छत्तीसगढ़ | 2025 के अंत में रामसर स्थल के रूप में नामित; प्रवासी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण। |
| नंजरायण अभयारण्य | तमिलनाडु | तिरुपुर जिले की एक प्रमुख आर्द्रभूमि जिसे रामसर सूची में शामिल किया गया है। |
3. भौगोलिक संकेत (GI) टैग (2026 अपडेट)
मानचित्र पर इन उत्पादों को उनके स्थान से जोड़कर देखना परीक्षा के लिए उपयोगी होता है।
- अरुणाचल याक चुरपी (Yak Churpi): तवांग और पश्चिम कामेंग क्षेत्रों के याक के दूध से बना एक अनूठा पनीर।
- मेघालय गारो दकमंदा (Garo Dakmanda): गारो जनजाति का एक पारंपरिक वस्त्र।
- कच्छी खरेक (Kachchhi Kharek): गुजरात के कच्छ क्षेत्र की खजूर की एक विशिष्ट किस्म।
- माजुली मास्क और पांडुलिपि पेंटिंग: असम के नदी द्वीप माजुली के पारंपरिक शिल्प।
- त्रिपुरा रिसा (Tripura Risa): त्रिपुरा का एक प्रसिद्ध पारंपरिक हथकरघा वस्त्र।
🌍 मानचित्रण सारांश चेकलिस्ट (Summary Checklist)
| श्रेणी | मानचित्रण मुख्य बिंदु | मुख्य स्थान |
| सबसे ऊँची सुरंग | शिंकु ला | हिमाचल-लद्दाख सीमा |
| सबसे लंबी फ्रंटियर रोड | अरुणाचल फ्रंटियर हाईवे | LAC, अरुणाचल प्रदेश |
| गोडावण आवास | सोरसन रिजर्व | बारां, राजस्थान |
| कपड़ा GI हब | त्रिपुरा रिसा | त्रिपुरा |
💡 मैपिंग टिप:
सीमा परियोजनाओं (जैसे DS-DBO रोड) को मैप करते समय उनके पास स्थित नदियों (जैसे शोक नदी) को भी चिह्नित करें, क्योंकि सामरिक भूगोल में नदियों का मार्ग अक्सर सड़क निर्माण को प्रभावित करता है।
मानचित्रण विवरण
सीमा बुनियादी ढांचा और संरक्षणवास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के समानांतर चलने वाली एक विशाल 1,840 किमी लंबी धमनी, जो मागो-थिंग्बू को विजयनगर के पूर्वी छोर से जोड़ती है।
गंगा भैरव घाटी (अजमेर) और सोरसन रिजर्व (बारां) ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ और ‘काला हिरण’ के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करते हैं।
छत्तीसगढ़ का कोपरा जलाशय और तमिलनाडु का नंजरायण अभयारण्य भारत के आर्द्रभूमि नेटवर्क के नवीनतम महत्वपूर्ण अंग हैं।