IAS PCS मिशन 2026: Dainik Study Material – 15 जनवरी 2026 (Hindi)
NCERT इतिहास: कक्षा 7 Chapter-1 (हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल)
यह अध्याय भारतीय इतिहास के मध्यकाल (लगभग 700 से 1750 ईस्वी) के परिचय के रूप में कार्य करता है। यह बताता है कि इस सहस्राब्दी (1000 वर्ष) के दौरान मानचित्र, शब्दावली, सामाजिक संरचना और धर्म कैसे विकसित हुए।
1. मानचित्रकला और परिप्रेक्ष्य
मानचित्र हमें किसी विशिष्ट समय के भौगोलिक ज्ञान के बारे में बहुत कुछ बताते हैं।
- अल-इदरीसी का मानचित्र (1154 ईस्वी): इस अरब भूगोलवेत्ता ने दक्षिण भारत को ऊपर की ओर और श्रीलंका को शीर्ष पर एक द्वीप के रूप में दिखाया था।
- फ्रांसीसी मानचित्रकार का मानचित्र (1720 का दशक): लगभग 600 साल बाद बनाया गया यह मानचित्र हमें अधिक परिचित लगता है, जिसमें तटीय क्षेत्रों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
- परिवर्तनशील सटीकता: इन मानचित्रों के बीच का अंतर यह दर्शाता है कि सदियों के दौरान “मानचित्रकला का विज्ञान” काफी बदल गया था।
2. नई और पुरानी शब्दावलियाँ
समय के साथ शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड कई भाषाओं में मौजूद हैं जो सदियों से काफी बदल गए हैं।
- हिंदुस्तान:
- 13वीं शताब्दी में, मिन्हाज-इ-सिराज ने इसका उपयोग पंजाब, हरियाणा और गंगा-यमुना के बीच की भूमि के क्षेत्रों (राजनीतिक संदर्भ) का वर्णन करने के लिए किया था।
- 16वीं शताब्दी तक, बाबर ने उपमहाद्वीप के भूगोल, जीव-जंतुओं और संस्कृति का वर्णन करने के लिए इस शब्द का उपयोग किया।
- विदेशी (Foreigner): आज इसका अर्थ है वह व्यक्ति जो भारतीय नहीं है। मध्यकाल में, इसका अर्थ किसी भी ऐसे अजनबी से था जो किसी गाँव में आता था और उस समाज या संस्कृति का हिस्सा नहीं होता था (जैसे— ‘परदेसी’ या ‘अजनबी’)।
3. इतिहासकार और उनके स्रोत
इतिहासकार उस काल के आधार पर विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग करते हैं जिसका वे अध्ययन कर रहे हैं।
- लिखित रिकॉर्ड: इस अवधि के दौरान लिखित रिकॉर्ड की संख्या और विविधता नाटकीय रूप से बढ़ गई क्योंकि कागज सस्ता और व्यापक रूप से उपलब्ध हो गया था।
- पांडुलिपियाँ (Manuscripts): इन्हें धनी लोगों, शासकों, मठों और मंदिरों द्वारा एकत्र किया गया था। इन्हें पुस्तकालयों और अभिलेखागारों (Archives) में रखा गया था।
- नकलनवीश/लिपिक (Scribes): चूँकि उस समय कोई प्रिंटिंग प्रेस नहीं थी, इसलिए लिपिक हाथ से पांडुलिपियों की नकल करते थे। नकल के दौरान किए गए छोटे-छोटे बदलाव सदियों से बढ़ते गए, जिससे एक ही पाठ के विभिन्न संस्करण एक-दूसरे से काफी अलग हो गए।
4. तकनीकी और सामाजिक नवाचार
700 और 1750 के बीच की अवधि महान गतिशीलता और नए समूहों के उदय का समय था।
- तकनीकी परिवर्तन: नई तकनीकें सामने आईं, जैसे सिंचाई में रहत (Persian wheel), कताई में चरखा और युद्ध में आग्नेयास्त्र (Firearms)।
- नई फसलें: आलू, मक्का, मिर्च, चाय और कॉफी जैसी फसलें उपमहाद्वीप में आईं।
5. नए राजनीतिक और सामाजिक समूह: राजपूत और जातियाँ
- राजपूत: यह नाम “राजपुत्र” (राजा का पुत्र) से निकला है। 8वीं और 14वीं शताब्दी के बीच, यह शब्द योद्धाओं के एक समूह के लिए लागू होता था जो क्षत्रिय होने का दावा करते थे।
- जातियाँ: जैसे-जैसे समाज अधिक विकसित हुआ, लोगों को उनकी पृष्ठभूमि और व्यवसाय के आधार पर जातियों (उप-जातियों) में बांटा गया। जातियों ने अपने सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए अपने स्वयं के नियम और कानून बनाए, जिन्हें बुजुर्गों की एक सभा द्वारा लागू किया जाता था, जिसे जाति पंचायत कहा जाता था।
6. क्षेत्र और साम्राज्य
चोल, तुगलक या मुगलों जैसे बड़े राज्यों ने कई क्षेत्रों को अपने भीतर समाहित कर लिया था।
- सर्वक्षेत्रीय साम्राज्य (Pan-Regional Empire): यह शब्द विविध क्षेत्रों में फैले साम्राज्यों का वर्णन करता है।
- साम्राज्यों की विरासत: जब बड़े साम्राज्यों का पतन हुआ, तो कई छोटे राज्य उभरे, लेकिन उन क्षेत्रों पर शासन, अर्थव्यवस्था और संस्कृति के क्षेत्रों में “सर्वक्षेत्रीय” शासन की विशिष्ट और साझा विरासत बनी रही।
7. पुराने और नए धर्म
इन हज़ार वर्षों के दौरान धार्मिक परंपराओं में बड़े विकास हुए।
- हिंदू धर्म: परिवर्तनों में नए देवी-देवताओं की पूजा, राजाओं द्वारा मंदिरों का निर्माण और समाज में प्रभावशाली समूहों के रूप में ब्राह्मणों और पुजारियों का बढ़ता महत्व शामिल था।
- भक्ति: भक्ति का विचार उभरा—एक प्रेमपूर्ण, व्यक्तिगत ईष्ट देव की अवधारणा, जहाँ भक्त बिना पुजारियों या विस्तृत यज्ञों की सहायता के स्वयं पहुँच सकते थे।
- इस्लाम: उपमहाद्वीप में नए धर्म आए। व्यापारी और अप्रवासी सबसे पहले 7वीं शताब्दी में पवित्र कुरान की शिक्षाओं को लेकर आए। कई शासक इस्लाम और उलेमा (विद्वान धर्मशास्त्रियों और न्यायविदों) के संरक्षक थे।
8. इतिहास के कालखंडों का विभाजन
इतिहासकारों को इतिहास को समय के “खंडों” में विभाजित करते समय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- ब्रिटिश विभाजन: 19वीं शताब्दी के मध्य में, ब्रिटिश इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को केवल शासकों के धर्म के आधार पर “हिंदू”, “मुस्लिम” और “ब्रिटिश” काल में विभाजित किया।
- आधुनिक दृष्टिकोण: आज अधिकांश इतिहासकार इस धार्मिक विभाजन को अनदेखा करते हैं और इसके बजाय प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक काल के बीच अंतर करने के लिए सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
🗺️ हज़ारों वर्षों के दौरान हुए परिवर्तन (700-1750)
कक्षा-7 इतिहास अध्याय-1 PDF
सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स: हज़ार वर्षों के दौरान हुए परिवर्तनों की पड़ताल
⚖️ भारतीय राजव्यवस्था: अनुच्छेद 29, 30 और 31 को समझना
जहाँ अनुच्छेद 14-28 मुख्य रूप से व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता पर केंद्रित हैं, वहीं अनुच्छेद 29 और 30 सामूहिक पहचान—विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करते हैं। अनुच्छेद 31, जो कभी भाग III का आधार स्तंभ था, निजी संपत्ति की सुरक्षा से लेकर जन कल्याण को सक्षम बनाने तक भारत के संवैधानिक विकास की कहानी बताता है।
1. अनुच्छेद 29: अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण
अनुच्छेद 29 यह सुनिश्चित करता है कि “नागरिकों का कोई भी अनुभाग” अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए रख सके। दिलचस्प बात यह है कि हालाँकि इसके शीर्षक में “अल्पसंख्यक” शब्द है, लेकिन इसके मुख्य पाठ में “नागरिकों के अनुभाग” (Section of citizens) वाक्यांश का उपयोग किया गया है, जो इसके दायरे को व्यापक बनाता है।
मुख्य खंड:
- अनुच्छेद 29(1): भारत के किसी भी हिस्से में रहने वाले नागरिकों के किसी भी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे संरक्षित करने का अधिकार देता है।
- नोट: अनुच्छेद 19 के विपरीत, यह अधिकार स्पष्ट रूप से “तर्कसंगत प्रतिबंधों” के अधीन नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भाषा के संरक्षण के अधिकार में उसके संरक्षण के लिए आंदोलन करने का अधिकार भी शामिल है।
- अनुच्छेद 29(2): राज्य द्वारा संचालित या राज्य निधि से सहायता प्राप्त करने वाले किसी भी शिक्षण संस्थान में केवल धर्म, मूलवंश, जाति या भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित करने पर रोक लगाता है।
“नागरिकों का अनुभाग” शब्द का दायरा:
अहमदाबाद सेंट जेवियर्स कॉलेज मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 29 केवल अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं है। यहाँ तक कि बहुसंख्यक समुदाय भी (यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र में उनकी अपनी भाषा/संस्कृति है) इस अधिकार का दावा कर सकता है।
2. अनुच्छेद 30: शिक्षा संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार
यह अनुच्छेद विशेष रूप से धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए है। यह उन्हें अपने समुदाय को शिक्षा प्रदान करने की स्वायत्तता देता है।
प्रदान किए गए अधिकार:
- स्थापना का अधिकार: अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान (स्कूल, कॉलेज या विश्वविद्यालय) बनाने का अधिकार।
- प्रशासन का अधिकार: बिना किसी अनावश्यक बाहरी नियंत्रण के संस्थान का प्रबंधन और संचालन करने का अधिकार।
- सहायता में भेदभाव के विरुद्ध संरक्षण: राज्य किसी अल्पसंख्यक संस्थान को वित्तीय सहायता देते समय केवल इस आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता कि वह अल्पसंख्यक प्रबंधन के अधीन है।
प्रमुख कानूनी विकास:
- टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन मामला (2002): उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि “अल्पसंख्यक” का दर्जा राज्य स्तर पर निर्धारित किया जाना चाहिए, न कि राष्ट्रीय स्तर पर। उदाहरण के लिए, हिंदू पंजाब या नागालैंड में अल्पसंख्यक हो सकते हैं।
- नियामक निरीक्षण: हालाँकि अल्पसंख्यक संस्थानों को स्वायत्तता प्राप्त है, लेकिन राज्य अभी भी शैक्षणिक मानकों, स्वच्छता, सुरक्षा और शिक्षकों के कल्याण सुनिश्चित करने के लिए नियम लागू कर सकता है। यह “प्रशासन करने का अधिकार” है, न कि “कुप्रशासन करने का अधिकार”।
3. अनुच्छेद 31: संपत्ति का अधिकार (अब निरस्त)
अनुच्छेद 31 मूल रूप से एक मौलिक अधिकार था जो राज्य को उचित कानून और “मुआवजे” के बिना किसी व्यक्ति की संपत्ति लेने से रोकता था।
निरस्त होने का इतिहास:
स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में, अनुच्छेद 31 भूमि सुधार और जमींदारी प्रथा के उन्मूलन में एक बड़ी बाधा बन गया। जमींदार बार-बार अदालत में सरकारी परियोजनाओं को चुनौती देते थे और भारी मुआवजे की मांग करते थे।
- 44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम (1978): इसके द्वारा अनुच्छेद 31 (और अनुच्छेद 19(1)(f)) को मौलिक अधिकार की सूची से हटा दिया गया।
- वर्तमान स्थिति: इसे संविधान के एक नए अध्याय में अनुच्छेद 300A के रूप में स्थानांतरित कर दिया गया।
आज संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 300A):
- यह अब मौलिक अधिकार नहीं है; यह अब एक विधिक/संवैधानिक अधिकार (Legal/Constitutional Right) है।
- प्रभाव: यदि किसी नागरिक की संपत्ति छीनी जाती है, तो वह अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय नहीं जा सकता। हालाँकि, वह अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय जा सकता है।
- नियम: किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। सरकार को अभी भी एक निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन करना होगा और आधुनिक कानूनों (जैसे LARR एक्ट, 2013) के तहत मुआवजा देना होगा।
तुलनात्मक सारांश तालिका
| विशेषता | अनुच्छेद 29 | अनुच्छेद 30 | अनुच्छेद 31 (अब 300A) |
| श्रेणी | सांस्कृतिक एवं शैक्षिक | शैक्षिक स्वायत्तता | संपत्ति का अधिकार |
| किसे उपलब्ध है | नागरिकों का कोई भी अनुभाग (बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक दोनों) | केवल धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक | सभी व्यक्ति |
| वर्तमान स्थिति | मौलिक अधिकार | मौलिक अधिकार | विधिक अधिकार (मौलिक नहीं) |
| मुख्य उद्देश्य | लिपि/संस्कृति का संरक्षण | अपने स्कूलों का प्रबंधन | संतुलित भूमि अधिग्रहण |
💡 परीक्षा के लिए टिप:
याद रखें कि अनुच्छेद 29 ‘नागरिकों के समूह’ के लिए है, जबकि अनुच्छेद 30 केवल ‘अल्पसंख्यकों’ (धार्मिक और भाषाई) के लिए है।
🎨 अनुच्छेद 29, 30 और 31
“The Hindu” संपादकीय का विश्लेषण (15 जनवरी, 2026)
यहाँ ‘द हिंदू’ (The Hindu) संपादकीय का विस्तृत विश्लेषण (15 जनवरी, 2026) हिंदी में दिया गया है, जिसे UPSC पाठ्यक्रम के अनुसार वर्गीकृत किया गया है:
1. न्याय में देरी: दिल्ली दंगा मामलों में निरंतर हिरासत
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (राजव्यवस्था और शासन; शासन के महत्वपूर्ण पहलू, पारदर्शिता और जवाबदेही; न्यायपालिका)।
- संदर्भ: 2020 के दिल्ली दंगों के साजिश मामले में कुछ कार्यकर्ताओं को जमानत देने से इनकार करने के सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले का विश्लेषण, जो यूएपीए (UAPA) की कठोर प्रकृति को उजागर करता है।
- मुख्य बिंदु:
- “भागीदारी का पदानुक्रम”: कोर्ट ने “वैचारिक संचालकों” और “स्थानीय स्तर के मददगारों” के बीच अंतर किया है। जिन्हें वैचारिक संचालक माना गया है, उन्हें बिना मुकदमे के अनिश्चितकालीन हिरासत का सामना करना पड़ रहा है।
- बाधा के रूप में यूएपीए: यूएपीए की धारा 43D(5) जमानत को लगभग असंभव बना देती है यदि अदालत को आरोप प्रथम दृष्टया सही लगते हैं। इससे “प्रक्रिया ही सजा” (Process as punishment) बन जाती है।
- मुकदमे से पहले की हिरासत: संपादकीय चिंता जताता है कि मुकदमे की तारीख तय हुए बिना लंबे समय तक जेल में रखना अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
- UPSC प्रासंगिकता: “आपराधिक न्याय सुधार”, “मौलिक अधिकार” और “आंतरिक सुरक्षा कानून” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- न्यायिक निरंतरता: संपादकीय “जेल नहीं, जमानत” के सिद्धांत के निरंतर पालन का तर्क देता है। यह जिरह (Cross-examination) के बिना केवल अभियोजन पक्ष की कहानी पर भरोसा करने के लिए अदालत की आलोचना करता है।
- आतंक की परिभाषा: विरोध प्रदर्शनों और सड़क जाम को ‘आतंकी कृत्य’ के रूप में वर्गीकृत करने से लोकतंत्र में असहमति (Dissent) के लिए जगह कम होने का खतरा है।
2. परिसर में समानता: यूजीसी (UGC) का नया शासनादेश
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (सामाजिक न्याय; शिक्षा से संबंधित मुद्दे; SC/ST से संबंधित मुद्दे)।
- संदर्भ: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने सभी उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) को जाति-आधारित भेदभाव से निपटने के लिए ‘कैंपस इक्विटी समितियाँ’ (Campus Equity Committees) स्थापित करने का निर्देश दिया है।
- मुख्य बिंदु:
- संरचनात्मक निरीक्षण: प्रत्येक विश्वविद्यालय में अब एक स्थायी समिति होगी जिसकी अध्यक्षता SC/ST समुदाय के एक वरिष्ठ संकाय सदस्य करेंगे।
- अनिवार्य वेब पोर्टल: संस्थानों को छात्रों के लिए गुमनाम रूप से भेदभाव की शिकायत दर्ज करने के लिए समर्पित वेब पोर्टल विकसित करने होंगे।
- नियमित ऑडिट: संस्थानों को अपने परिसरों की सामाजिक समावेशिता का आकलन करने के लिए वार्षिक ‘इक्विटी ऑडिट’ करना होगा और यूजीसी को रिपोर्ट सौंपनी होगी।
- UPSC प्रासंगिकता: “सामाजिक न्याय”, “शिक्षा सुधार” और “समावेशी विकास” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- जवाबदेही: इन समितियों के कामकाज के लिए कुलपति (Vice-Chancellor) को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार बनाकर, यूजीसी का लक्ष्य केवल कागजी खानापूर्ति से आगे बढ़ना है।
- सहायक पारिस्थितिकी तंत्र: इसमें हाशिए पर रहने वाले छात्रों के लिए ‘ब्रिज कोर्स’, ‘पीयर मेंटरिंग’ और मनोवैज्ञानिक परामर्श जैसे सहायक तंत्र बनाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
3. ग्रीनलैंड गैम्बिट (Greenland Gambit): रणनीतिक निहितार्थ
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (अंतर्राष्ट्रीय संबंध; विकसित देशों की नीतियों का भारत के हितों पर प्रभाव)।
- संदर्भ: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दोहराया है कि अमेरिका को “महत्वपूर्ण सुरक्षा” के लिए ग्रीनलैंड की आवश्यकता है, जिससे डेनमार्क के साथ राजनयिक दरार पैदा हो गई है।
- मुख्य बिंदु:
- आर्कटिक भू-राजनीति: जैसे-जैसे आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, ग्रीनलैंड नए शिपिंग मार्गों और विशाल खनिज संसाधनों (दुर्लभ मृदा तत्व – Rare Earth Elements) तक पहुंच के लिए केंद्र बन गया है।
- नाटो (NATO) तनाव: डेनमार्क ने कहा है कि अमेरिकी अधिग्रहण प्रभावी रूप से नाटो गठबंधन को समाप्त कर देगा क्योंकि यह एक सदस्य देश की संप्रभुता को कमजोर करेगा।
- थ्यूल एयर बेस: अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में थ्यूल बेस बनाए रखता है, जो उसकी रडार प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- UPSC प्रासंगिकता: “आर्कटिक परिषद”, “वैश्विक रणनीतिक भू-राजनीति” और “अमेरिकी विदेश नीति” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- खनिज सीमा: ग्रीनलैंड में हरित ऊर्जा परिवर्तन के लिए आवश्यक खनिजों के दुनिया के सबसे बड़े भंडार हैं, जो इसे अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता में एक “रणनीतिक पुरस्कार” बनाते हैं।
- भारत के लिए निहितार्थ: आर्कटिक परिषद में एक स्थायी पर्यवेक्षक के रूप में, भारत का हित यह सुनिश्चित करने में है कि आर्कटिक शक्तियों के संघर्ष के बजाय सहयोग का क्षेत्र बना रहे।
4. मनरेगा (MGNREGA) निशाने पर: कर्नाटक की बहस
पाठ्यक्रम: GS पेपर 2 (शासन; कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं; केंद्र-राज्य संबंध)।
- संदर्भ: कर्नाटक सरकार राज्य में मनरेगा के कार्यान्वयन को समाप्त करने या उसमें महत्वपूर्ण संशोधन करने के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए तैयार है।
- मुख्य बिंदु:
- भ्रष्टाचार के आरोप: राज्य सरकार ने “व्यवस्थागत रिसाव” (Systemic leakages) और “अनुत्पादक संपत्ति निर्माण” को इसके कारणों के रूप में उद्धृत किया है।
- विकल्प: “गारंटीशुदा शारीरिक श्रम” के बजाय राज्य द्वारा संचालित मिशनों के तहत “कौशल-आधारित रोजगार” पर ध्यान केंद्रित करने का प्रस्ताव है।
- संवैधानिक बाधा: चूंकि मनरेगा एक केंद्रीय अधिनियम है, इसलिए कोई राज्य इसे एकतरफा रद्द नहीं कर सकता।
- UPSC प्रासंगिकता: “कल्याणकारी शासन”, “संघवाद” और “ग्रामीण विकास” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- सुरक्षा जाल (Safety Net): मजदूर संगठनों का तर्क है कि कृषि संकट के दौरान भूमिहीन गरीबों के लिए मनरेगा ही एकमात्र सहारा है।
- संपत्ति की गुणवत्ता: समस्या कानून में नहीं, बल्कि पंचायत स्तर पर कार्यों की योजना बनाने में है, जो अक्सर स्थायी सिंचाई या मृदा संरक्षण के बुनियादी ढांचे बनाने में विफल रहती है।
5. सीवेज रिसाव और पानी का अधिकार
पाठ्यक्रम: GS पेपर 3 (पर्यावरण; प्रदूषण; आपदा प्रबंधन)।
- संदर्भ: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने उन रिपोर्टों के बाद तीन उत्तर भारतीय राज्यों को नोटिस जारी किया है जिनमें पुष्टि हुई है कि अनुपचारित सीवेज (Untreated sewage) पीने के पानी की लाइनों में रिस रहा है।
- मुख्य बिंदु:
- अंतःसंबद्ध बुनियादी ढांचा: कई शहरों में पुरानी सीवेज लाइनें और पानी की आपूर्ति पाइप समानांतर और बहुत पास चलते हैं, जिससे रिसाव के दौरान क्रॉस-कंटामिनेशन (दूषित होना) होता है।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट: यह विफलता हैजा और दस्त जैसी जल-जनित बीमारियों के हालिया प्रकोपों से जुड़ी है।
- स्वच्छ जल का अधिकार: NGT ने राज्यों को तत्काल “भेद्यता का मानचित्र” (Map of vulnerabilities) प्रदान करने का निर्देश दिया है।
- UPSC प्रासंगिकता: “शहरी बुनियादी ढांचे की चुनौतियां”, “पर्यावरण शासन” और “सार्वजनिक स्वास्थ्य” के लिए महत्वपूर्ण।
- विस्तृत विश्लेषण:
- शहरी शासन की अनदेखी: संपादकीय “स्मार्ट सिटी” की बाहरी सुंदरता पर ध्यान देने और जमीन के नीचे पाइपों की खराब स्थिति की अनदेखी करने की आलोचना करता है।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle): NGT उन नगर निकायों पर भारी जुर्माना लगाने पर विचार कर रहा है जो एक निश्चित समय सीमा के भीतर दोहरी पाइप प्रणाली को अलग करने में विफल रहते हैं।
संपादकीय विश्लेषण
15 जनवरी, 2026Mapping:
यहाँ भारत के यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थलों, प्रमुख महासागरीय धाराओं एवं पवनों, और प्रमुख खनिज पेटियों का मानचित्र अभ्यास (Mapping Practice) विवरण हिंदी में दिया गया है:
1. भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (UNESCO World Heritage Sites)
भारत में कई ऐसे स्थल हैं जिन्हें उनके उत्कृष्ट सांस्कृतिक या प्राकृतिक महत्व के लिए पहचाना गया है। इन्हें सांस्कृतिक, प्राकृतिक और मिश्रित श्रेणियों में बांटा गया है।
सांस्कृतिक स्थल (Cultural Sites):
- अजंता और एलोरा की गुफाएं (महाराष्ट्र): प्राचीन रॉक-कट बौद्ध, हिंदू और जैन गुफाएं जो अद्भुत कला और वास्तुकला का प्रदर्शन करती हैं।
- ताजमहल (उत्तर प्रदेश): यमुना नदी के तट पर स्थित हाथीदांत-सफेद संगमरमर का एक प्रतिष्ठित मकबरा।
- हम्पी (कर्नाटक): विजयनगर साम्राज्य की राजधानी के अवशेष, जिसमें शानदार मंदिर और महल शामिल हैं।
- धौलावीरा (गुजरात): एक प्रमुख हड़प्पा शहर जो अपने अद्वितीय तीन-भाग विभाजन और उन्नत जल प्रबंधन के लिए जाना जाता है।
प्राकृतिक स्थल (Natural Sites):
- काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (असम): एक सींग वाले गेंडों की आबादी के लिए प्रसिद्ध।
- पश्चिमी घाट: भारत के पश्चिमी तट के साथ चलने वाली एक पर्वत श्रृंखला और जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspot)।
- ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (हिमाचल प्रदेश): अपनी ऊँची पर्वत चोटियों और विविध अल्पाइन वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध।
मिश्रित स्थल (Mixed Site):
- कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान (सिक्किम): इसे इसकी अद्वितीय जैविक विविधता और स्थानीय समुदायों के लिए सांस्कृतिक महत्व दोनों के लिए मान्यता प्राप्त है। (यह भारत का एकमात्र मिश्रित स्थल है)।
2. प्रमुख महासागरीय धाराएँ और पवनें (Ocean Currents and Winds)
भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु और समुद्री गतिविधियाँ आसपास के महासागरों और मौसमी हवाओं के पैटर्न से भारी रूप से प्रभावित होती हैं।
मानसूनी पवनें:
- दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon): जून से सितंबर तक; ये नमी से लदी हवाएँ समुद्र से स्थल की ओर चलती हैं, जिससे अधिकांश भारत में भारी वर्षा होती है।
- उत्तर-पूर्वी मानसून (North-East Monsoon): अक्टूबर से दिसंबर तक; ये हवाएँ स्थल से समुद्र की ओर चलती हैं, जिससे मुख्य रूप से कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) पर वर्षा होती है।
हिंद महासागर में समुद्री धाराएँ:
- दक्षिण-पश्चिम मानसूनी धारा: एक गर्म धारा जो गर्मियों के दौरान भारत के तट के साथ घड़ी की दिशा (Clockwise) में बहती है।
- उत्तर-पूर्वी मानसूनी धारा: सर्दियों के महीनों के दौरान घड़ी की विपरीत दिशा (Counter-clockwise) में बहती है।
3. भारत की प्रमुख खनिज पेटियाँ (Major Mineral Belts)
भारत की औद्योगिक शक्ति उसके समृद्ध खनिज भंडारों में निहित है, जो विशिष्ट भूगर्भीय पेटियों में केंद्रित हैं।
| पेटी (Belt) | क्षेत्र/राज्य | प्राथमिक खनिज |
| उत्तर-पूर्वी पठार | झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल | लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, अभ्रक, बॉक्साइट। |
| दक्षिण-पश्चिमी पेटी | कर्नाटक, गोवा, तमिलनाडु | उच्च श्रेणी का लौह अयस्क, मैंगनीज, चूना पत्थर। |
| उत्तर-पश्चिमी पेटी | राजस्थान, गुजरात | तांबा, जस्ता, सीसा, कीमती पत्थर, पेट्रोलियम। |
| मध्य पेटी | छत्तीसगढ़, म.प्र., आंध्र प्रदेश | लौह अयस्क, मैंगनीज, चूना पत्थर, कोयला। |
🌍 मानचित्रण सारांश तालिका (Summary Table)
| श्रेणी | मुख्य बिंदु | भौगोलिक फोकस |
| प्राचीन शहर विरासत | धौलावीरा | गुजरात (पश्चिम) |
| खनिज हृदय स्थल | छोटा नागपुर पठार | पूर्वी भारत |
| प्राथमिक वर्षा पवन | दक्षिण-पश्चिम मानसून | संपूर्ण उपमहाद्वीप |
| प्राचीन बंदरगाह विरासत | लोथल | गुजरात तट |
💡 मैपिंग टिप:
यूनेस्को स्थलों को याद करते समय उन्हें राज्यों के साथ मैप पर चिह्नित करें। खनिज पेटियों के लिए छोटा नागपुर पठार को विशेष रूप से देखें क्योंकि इसे भारत का ‘रूर’ (Ruhr) कहा जाता है।
विरासत एवं तत्व (Heritage & Elements)
| पेटी (Belt) | प्रमुख क्षेत्र | मुख्य खनिज |
|---|---|---|
| उ.पू. पठार | JH, OD, WB | लौह अयस्क, कोयला, अभ्रक |
| दक्षिण-पश्चिमी | कर्नाटक, गोवा | उच्च श्रेणी का लौह अयस्क |
| उत्तर-पश्चिमी | RJ, गुजरात | तांबा, जस्ता, पेट्रोलियम |
| श्रेणी | मुख्य आकर्षण | भौगोलिक केंद्र |
|---|---|---|
| प्राचीन विरासत | धोलावीरा | गुजरात (कच्छ) |
| खनिज हृदयस्थल | छोटा नागपुर पठार | पूर्वी भारत |
| मुख्य वर्षा पवन | द.प. मानसून | संपूर्ण उपमहाद्वीप |
| मिश्रित श्रेणी स्थल | कंचनजंगा | सिक्किम (हिमालय) |