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    आधुनिक भारतीय इतिहास एवं संवैधानिक विकास

    24 सितंबर 1932: ऐतिहासिक पूना पैक्ट एवं राजनीतिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न

    24 सितंबर 1932 को पूना की यरवदा सेंट्रल जेल में हस्ताक्षरित पूना पैक्ट (Poona Pact) ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर और महात्मा गांधी के मध्य उत्पन्न गंभीर राजनीतिक गतिरोध का समाधान किया। इस ऐतिहासिक समझौते ने ब्रिटिश सरकार के ‘साम्प्रदायिक पंचाट’ द्वारा दलित वर्ग को दिए गए पृथक निर्वाचक मंडल को समाप्त कर संयुक्त निर्वाचन प्रणाली के भीतर आरक्षित सीटों का उपबंध किया।

    1932 के पूना पैक्ट की पृष्ठभूमि एवं प्रमुख प्रावधान
    पूना पैक्ट (24 सितंबर 1932)
    यरवदा जेल: डॉ. आंबेडकर एवं मदन मोहन मालवीय
    ⚡ मुख्य उत्प्रेरक
    रैम्जे मैकडोनाल्ड का साम्प्रदायिक पंचाट (अगस्त 1932)
    🗳️ सीटों में वृद्धि
    प्रांतीय सीटें 71 से बढ़कर 147; केंद्रीय विधायिका में 18% सीटें
    📜 संवैधानिक प्रभाव
    1935 के अधिनियम एवं अनु. 330/332 का मूल आधार
    1. पृष्ठभूमि एवं साम्प्रदायिक पंचाट का संकट
    • ब्रिटिश घोषणा: 16 अगस्त 1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने साम्प्रदायिक पंचाट (Communal Award) की घोषणा की, जिसके अंतर्गत धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ-साथ ‘दलित / वंचित वर्गों’ (Depressed Classes) को भी पृथक राजनीतिक इकाई मानकर अलग निर्वाचक मंडल प्रदान किया गया।
    • गांधीजी का आमरण अनशन: दलितों को व्यापक हिंदू समाज से राजनीतिक रूप से पृथक किए जाने का विरोध करते हुए महात्मा गांधी ने 20 सितंबर 1932 को यरवदा जेल से आमरण अनशन प्रारंभ किया; उनका दृढ़ मत था कि यह व्यवस्था हिंदू समाज में अस्पृश्यता और सामाजिक विभाजन को स्थायी रूप दे देगी।
    • आंबेडकर का दृष्टिकोण एवं मध्यस्थता: डॉ. आंबेडकर दलितों के स्वतंत्र राजनीतिक सशक्तीकरण हेतु पृथक निर्वाचन पर अडिग थे, किंतु राष्ट्रीय दबाव तथा पं. मदन मोहन मालवीय, सी. राजगोपालाचारी एवं तेज बहादुर सप्रू के मध्यस्थता प्रयासों के उपरांत वे समझौते हेतु सहमत हुए।
    2. तुलनात्मक विश्लेषण: साम्प्रदायिक पंचाट बनाम पूना पैक्ट
    प्रमुख आयाम साम्प्रदायिक पंचाट (अगस्त 1932) पूना पैक्ट (सितंबर 1932)
    निर्वाचक मंडल की संरचना पृथक निर्वाचक मंडल: केवल दलित वर्ग के मतदाता ही अपने वर्ग के उम्मीदवारों का चुनाव कर सकते थे। संयुक्त निर्वाचक मंडल: सामान्य और दलित मतदाता संयुक्त रूप से आरक्षित सीटों पर मतदान करेंगे।
    प्रांतीय विधायिकाओं में सीटें प्रांतीय विधानमंडलों में दलित वर्ग हेतु मात्र 71 सीटें निर्धारित की गई थीं। आरक्षित सीटों की संख्या दोगुने से अधिक बढ़ाकर 147 सीटें कर दी गई।
    केंद्रीय विधानमंडल में आरक्षण केंद्रीय विधायिका में कोई विशिष्ट वैधानिक प्रतिशत सुनिश्चित नहीं किया गया था। केंद्रीय विधायिका में सामान्य निर्वाचन क्षेत्र की कुल सीटों में से 18% सीटें दलितों हेतु आरक्षित की गईं।
    उम्मीदवार चयन प्रणाली केवल पंजीकृत समुदाय के सदस्यों द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन। प्राथमिक निर्वाचन (Primary Election): दलित मतदाता पहले 4 उम्मीदवारों का पैनल चुनेंगे, फिर संयुक्त रूप से अंतिम चयन होगा।
    3. दीर्घकालिक संवैधानिक एवं राजनीतिक परिणाम
    • वैधानिक समावेशन: पूना पैक्ट की शर्तों को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार कर लिया और इन्हें सीधे भारत शासन अधिनियम, 1935 में समाहित किया गया, जहां पहली बार आधिकारिक तौर पर “अनुसूचित जाति” (Scheduled Castes) शब्दावली का प्रयोग हुआ।
    • अस्पृश्यता विरोधी अभियान: इस समझौते के तुरंत बाद गांधीजी ने 1932 में ‘अखिल भारतीय अस्पृश्यता विरोधी लीग’ (बाद में हरिजन सेवक संघ) की स्थापना की तथा 1933 में ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया।
    • संवैधानिक आदर्श: इस पैक्ट ने संयुक्त निर्वाचन के अंतर्गत राजनीतिक आरक्षण का स्थायी मानक स्थापित किया, जो आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 एवं 332 (लोकसभा व विधानसभाओं में SC/ST आरक्षण) का प्रत्यक्ष प्रेरणा स्रोत बना।
    💡 मुख्य परीक्षा एवं प्रारंभिक परीक्षा हेतु विशेष तथ्य: महात्मा गांधी ने पूना पैक्ट के औपचारिक दस्तावेज पर स्वयं हस्ताक्षर नहीं किए थे। इस पर सवर्ण हिंदुओं की ओर से पं. मदन मोहन मालवीय ने तथा दलित वर्ग की ओर से डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने हस्ताक्षर किए थे; साथ ही सी. राजगोपालाचारी, तेज बहादुर सप्रू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और एम.आर. जयकर इसके सह-हस्ताक्षरकर्ता थे।
    🎯 आज का अभ्यास प्रश्न

    वर्ष 1932 के ऐतिहासिक पूना पैक्ट के अंतर्गत प्रांतीय विधानमंडलों में दलित वर्ग (Depressed Classes) हेतु आरक्षित सीटों की संख्या, साम्प्रदायिक पंचाट में प्रदत्त 71 सीटों से बढ़ाकर कितनी कर दी गई थी?

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